Thursday, 3 September 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-N: नूरानी हस्तियों की पहचान वेद, गीता और उपनिषद से

नूरानी हस्तियों की पहचान वेद, गीता और उपनिषद से

अब हम इस पुस्तक के अंत की ओर अग्रसर हैं। हक़ और बातिल, सत्य और असत्य की इस लड़ाई में यदि असत्य यानी बातिल शक्तिशाली होता दिखाई दे रहा है तो उसके ज़िम्मेदार हम हैं क्योंकि हमने अपनी आत्मा को उस मार्ग पर लगाया ही नहीं कि नूरानी रूहों को शक्ति प्रदान करते। हम बातें तो हक़ और इंसाफ की करते हैं लेकिन हम में से अनेक की आत्मा तमस अर्थात जुलमत के कैंप में है और इस प्रकार उसको शक्ति प्रदान कर रही है। 

जो बात हम को समझना है वह यह कि हिन्दू सनातन पुस्तकों से बहुत दूर आ गए इसलिए वे हक़ और हक़ीक़तोें की समझ से अनभिज्ञ हैं। सनातन पुस्तकों के जानकार समझे जाने वालों ने ऐसे बेतुके और मनघड़ंत अनुवाद किए हैं कि इन पुस्तकों को पढ़ने वालों को कुछ भी समझ नहीं आता। यही कारण है कि हम बार-बार कहते हैं कि हक़ और हक़ीक़तों को जानने के लिए आवश्यक है कि इन पुस्तकों का फिर से अनुवाद किया जाए। 

अभी इस समय हमारे पास जो अनुवाद हैं केवल उनसे ही हम आपको कितनी समानताएं दिखा रहे हैं। जिस दिन तमाम सनातन पुस्तकों को और कुरान को फिर से समझने की कोशिश होगी, उस दिन आप पाएंगे कि एकदम एक ही हक़ और हक़ीक़तें दोनों की पुस्तकों में बताई जा रही हैं, केवल भाषा का अंतर है। 

एक उदाहरण देखिएः

सुबाला उपनिषद बताता है कि सृष्टि में जो कुछ भी है वह परमात्मा के लिए food यानी रिज़्क़ है।

Subala.V.15:

This (self) is all-knowing. This is the Lord of all This is the ruler of all. This is the indwelling spirit. This is the source of all. This, that is resorted to by all forms of happiness, does not stand in need of happiness of any kind. This, that is adored by all the Vedic texts and scriptures does not stand in need of Vedic texts and scriptures. Whose food is all this but who (himself) does not become the food of any. For that very reason (it is) the most excellent, the supreme director of all. Consisting of food (it is) the self of (all) gross objects; consisting of life (it is) the self of (all) sense organs; consisting of bliss, (it is) the self of dissolution, when there is not Oneness whence (can arise) duality? When there is not mortality, whence (can arise) immortality? (It is) not (endowed) with internal knowledge; nor with external knowledge; nor with both these kinds of knowledge, not a mass of knowledge, not knowledge, nor not-knowledge, not (previously) known or capable of being known. This is the doctrine relating to liberation. This is the doctrine of Veda. This is the doctrine of the Veda.

बृहद अराण्यका उपनिषद कहता है कि जिस प्रकार तमाम पशु इंसानों की सेवा के लिए बने हैं, इंसान देवताओं की सेवा के लिए बना है। जिस प्रकार यदि एक पशु चला जाता है तो हमें खेद होता है उसी प्रकार यदि एक व्यक्ति भी नूर के मार्ग से जुलमत अपनी ओर खींच लेती है तो यह खेद का विषय है। यदि बहुत सारे मनुष्य उस मार्ग से विचलित हो जाएं तो कितना खेद का विषय होगा? 

यानी हम नूर के मार्ग पर आकर नूरानी ताक़तों को शक्ति दे सकते हैं और जुलमत के मार्ग पर चल कर शैतानी ताक़तों को शक्ति प्रदान कर सकते हैं। उपनिषद यह भी कह रहे हैं कि नूर और जुलमत के बीच के इस युद्ध में एक एक व्यक्ति का महत्व है। 

Brhad-aranyaka.I.IV.10:

So whoever worships another divinity thinking that he is one and another, he knows not. He is like an animal to the Devas. As many animals serve a man so does each man serve the Devas (divine persons). Even if one animal is taken away, it cause displeasure, what should one say of many (animals)? Therefore it is not pleasing to those that men should know this.

एक ओर कुरान कह रहा है कि वे लोग जब उन पर कोई मुसीबत पड़ती है तो कहते हैं कि हम अल्लाह की ओर से हैं और उसकी ओर ही वापिस पलटना है। ये ही हक़ पर सत्य मार्ग पर चलने वाले हैं। जिन्होंने अल्लाह की राह में जान दी उन्हें मुर्दा न समझो बल्कि वे ज़िन्दा हैं पर तुम नहीं समझते। 

Quran.2.154-157:

Never say that those martyrd in the cause of Allah are dead – in fact, they are alive! But you do not perceive it.

We will certainly test you with a touch of fear and famine and loss of property, life, and crops. Give good news to those who patiently endure-

Who, when faced with disaster, say, “Surely to Allah we belong and to Him we will all return.”

They are the ones who will receive Allah’s blessings and mercy. And it is they who are rightly guided.

दूसरी ओर ब्रहद अराण्यका उपनिषद कहता है जिसने सत्य पथ पर रहते हुए जान दी उसको मौत के पार की हमेशा की ज़िन्दगी में ले जाया जाता है जहां उसे रिज़्क़ यानी खान-पान भी मिलता है।  

Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.11:

That divinity, verily, having struck off the evil, the death, of those divinities, next carried them beyond death.

Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.116:

Thus, verily, that divinity carries beyond death him who knows thus.

Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.17:

Then it chanted food for itself. For whatever food is eaten is eaten by him alone. In it is established.

Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.18:

These divinities said, ‘Verily, just this much is whatever food there is and that you have obtained for yourself by chanting. Now let us have a share in this food.’ He said, ‘then sit around, facing me’. ‘So be it’. They sat around him on all sides. Therefore, whatever food one eats by this breath, they are satisfied by it. So do his relations come to him who knows this, he becomes the supporter of his people, their chief, their foremost leader, an eater of food and their lord. Whoever among his people desires to be the equal of him who has this knowledge, he is not able to support his own dependants. But whoever follows him and whoever, following him, desires to support his dependents, he, indeed, will be able to support his dependents.

ब्रहद अराण्यका उपनिषद उस मरने वाले के लिए, जिसको सत्य मार्ग का ज्ञान था और उस पर चलते हुए मौत पाई न केवल हमेशा की ज़िन्दगी की बात कर रहा है बल्कि रब की ओर से रिज़्क़ मिलने की बात कर रहा है तो कुरान भी उन लोगों के लिए जो अल्लाह की राह पर चलते हुए मरे उनके लिए हमेशा की ज़िन्दगी और रब की ओर से रिज़्क़ की बात कर रहा है। 

Quran.3.169-170:

Do not think at all of those killed in God’s cause as dead. Rather, they are alive; with their Lord they have their sustenance (food),

Rejoicing in what God has granted them out of His bounty, and joyful in the glad tidings for those left behind who have not yet joined them, that (in the event of martyrdom) they will have no fear, nor will they grieve.

एक ओर अवतार मौहम्मद कह रहे हैं कि पंजेतन या पांच हस्तियां ही स्वर्ग की सरदार हैं तो दूसरी ओर इस पुस्तक में कुछ आगे हम ने छंदोग्या उपनिषद से दिखाया है कि वह किन्हीं पांच हस्तियों की बात कर रहा है जिनके बिना स्वर्ग में दाखि़ला मुमकिन नहीं। 

अवतार मौहम्मद कहते हैं कि मेरा नूर इस सृष्टि के बिलकुल प्रारंभ में बना; 

I was a Prophet even when Adam was between sand and water.

वह कहते हैं कि अली और मैं एक ही नूर के दो टुकड़े हैंः

Ali and my self are divisions of the same noor (light)

और इन नूरानी हस्तियों की बात करते हुए अवतार मौहम्मद कहते हैं कि यह सब मौहम्मद हैं, यानी सब बिलकुल एक समान हैं। 

First is Mohammad, last is Mohammad, middle is Mohammad, all are Mohammad.

तो दूसरी ओर ब्रहद-अराण्यका उपनिषद भी इन दिव्यात्माओं के क्रिएशन की बात करते हुए कह रहा है कि वे बिलकुल एक समान हैं।

Brhad-Aranyaka.I.5.13:

These are all alike, all endless. Verily, he who meditates on them as finite, wins a finite world. But he who meditates on them as infinite wins an infinite world.

मौहम्मद की पुत्री फातिमा का अली से विवाह हुआ तो फिर हसनैन यानी हसन और हुसैन पैदा हुए तो देवता और देवी के मिलन से अश्विन के क्रिएशन की बात हो रही है जो दो देवता हैंः अग्नि देव और वासु देव, जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक में दिखाया है। 

मुसलमानों की किताबों में जब एक नूर से कई नूर बने जो उस पहले जैसे थे तो उस को सिलसलतुल ज़हद यानी स्वर्ण सिलसिला या स्वर्ण चेन कहा गया तो दूसरी ओर सुबाला उपनिषद खंड 2 में एक दिव्यात्मा शक्ति के विभाजन से दो नूरानी हस्तियां [Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light)], क्रिएट होने की बात हो रही है और फिर एक टुकड़े या भाग के दिव्यात्मा के दूसरे टूकड़े या भाग से मिलने की बात हो रही है। यह नूरे अली और नूरे फातिमा का मिलन था जिसको उपनिषद ने शिव और शक्ति का मिलन बताया। 

Subala Upanishad. Khand 2:

The Atma (or the Self of Purusha i.e. Vishnu) is Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light) into which all the universe is absorbed. He divided Atma (his Self) into two moieties (noor of Mohammad and Ali); out of one moiety, the woman was created (noor of Fatima); and out of the other, man (Ali). Having become a Deva, He created the Devas (remaining Devatas). Having become a Rishi, He created the Rishis; also He created Yakshas, Rakshasas, Gandharvas, wild and domestic beasts and others such as cows, bulls, mares and horses, she-asses and assess and Visvambhara (the Supporter) and Visvambhara (the earth). Becoming Vaisvanara (fire) at the end (of creation), He burnt up all objects. Then (in dissolution), prithvi was absorbed in apas, apas in agni, agni in vayu, vayu in akash, akash in indriyas (organs), indriyas into tanmatras (rudimentary properties), tanmatras into bhutadi, bhutadi into mahat, mahat into avyakta, avyakta into akshara (the indestructible), akshara into tamas (darkness). And tamas becomes one with the supreme Lord. And then there is neither Sat nor asat, nor Sat-asat. This is the teaching of Nirvana and this is the teaching of the Vedas. Yea, This is the teaching of the Vedas.

बहुत सी बातें समझ से बाहर हैं जो तब ही समझ आएंगी जब इन का फिर से अनुवाद होगा; अभी तो केवल वह समझिए जो सामने दिखाई दे रहा है। Having become a Deva, He created the Devas; Having become a Rishi, He created the Rishis कहकर बताया जा रहा है कि इस प्रकार अन्य देवताओं की उत्पत्ति हुई। एक दिव्यात्मा शक्ति अंतः 7 दिव्यात्माओं में बदल गई जो सब के सब उस पहली दिव्यात्मा शक्ति समान थी जिस से बंट कर एक शक्ति 7 में बदल गई, जिनमें एक देवी और अन्य 6 देव थे।

आप ने देखा कि आत्मा या self जो hiranyajyoti है यानी सुनहरा नूर है और जिसमें सारी सृष्टि सिमटी हुई है, उसके दो आत्माओं या spirits में बंटने की बात सुबाला उपनिषद कर रहा है। 

The Atma (or the Self of Purusha i.e. Vishnu) is Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light) into which all the universe is absorbed. He divided Atma (his Self) into two moieties (noor of Mohammad and Ali)

जब इन दोनों नूरानी शक्तियों ने मानव शरीर में जन्म लिया तो स्वेतास्वतर उपनिषद इन दो को एक ही ेमस.िेंउम जतमम से जुड़ा बता रहा है। मौहम्मद और अली, जिनके शरीर में एक ही दिव्यात्मा शक्ति यानी नूरानी रूह के दो हिस्से काम कर रहे थे, जो इंद्र देव और रूद्र यानी शिव थे, और जिनमें से एक को रसूल होने का फल खाने को दिया गया और दूसरे को नहीं, यदि इन दो की बात नहीं हो रही तो फिर किस की बात हो रही है?

Svetasvatara Upanishad.IV.6-7:

Two birds, companions (who are) always united, cling to the self-same tree. (Of these two) the one eats the sweet fruit, and the other looks on without eating. 

On the self-same tree, a person immersed (in the sorrows of the world) is deluded and grieves on account of his helplessness. When he sees the other, the Lord who is worshipped and His greatness, he becomes freed from sorrow.

स्वेतास्वतर उपनिषद का यह छंद हम पहले भी पेश कर चुके हैं। हम इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण दे सकते हैं, जिनसे साबित होगा कि वेद के देवता ही अहललबैत हैं जिनके नवजात बच्चों के समान मानव शरीर में आने की भविष्यवाणी इंसानियत के प्रारंभिक दौर में ही वेदों द्वारा मनुष्य को दी जा रही थी।

किताब ‘बसाएरे दरजातल कुबरा फी फज़ाएले आले मौहम्मद’ जिसको अबू जाफर मौहम्मद बिन हसन बिन फरूख़ सिफार ने लिखा है जिनका देहान्त 290 हिजरी में हुआ, इसकी जिल्द 1 के पेज 22 पर हदीस है कि इन नूरानी हस्तियों की समझ बहुत सख़्त है यानी आसान नहीं है। 

जाबिर कहते हैं कि अवतार मौहम्मद ने फरमाया कि आले मौहम्मद की हदीस अति मुश्किल है यानी आम व्यक्ति की समझ में आने वाली नहीं है। 

बिहारूल अनवार जिल्द 72 पेज 83 कहती है कि एक स्थान पर अहललबैत कहते हैं कि हमारा अम्र छिपा हुआ है यानी हमारे राज़ समझना आसान नहीं है। इसको नहीं बरदाश्त कर सकता मगर वह फरिश्ता जो अल्लाह के क़रीब हो, या वह नबी जो कि रसूल हो या वह बंदा जिसके दिल की अल्लाह ने परीक्षा ले ली हो। 

एक और स्थान पर अहललबैत ने कहा कि तुम हमारे बारे में जो बड़ाई सोच सकते हो, सोच लो, तुम हम को उससे बड़ा पाओगे, बस एक शर्त है कि हमें अल्लाह की बंदगी से बाहर न करना। 

दूसरी ओर गीता भी इन देवताओं की बड़ाई तो बेइंतेहा बता रही है लेकिन परमात्मा के बाद इन देवताओं का स्थान बता रही है। 

Gita.XI.38:

You are the first of the Devas and the Ancient Spirit; You are the Supreme Basis of the Universe; You are both the Knower and the Knowable; You are the (transcendent) Beyond and the (immanent) Receptacle (here); the universe is pervaded by You, O One (capable) of Limitless Form. 

Gita.III.11:

With this do you gratify the devas and they the devas gratify you; thus gratifying reciprocally you shall reach to supreme merit.

Gita.III.12:

Those devas shall bestow on you all gratifications you desire: one who eats what is given to them without giving in turn to them, he is a thief indeed.  

एक ओर गीता देवताओं के लिए कहती है कि यदि तुम अपने रिज़्क़ यानी खाने में से इन्हें दिए बिना खाओ तो तुम चोर हो तो दूसरी ओर हम किताबों में दर्ज पाते हैं कि एक अहललबैत कुछ लम्हे ख़्यालों में चले गए। उनसे किसी ने पूछा कि मौला, आप चंद लम्हे के लिए कहां चले गए थे, तो उन्होंने उत्तर दिया कि मैं तमाम सृष्टि को रिज़्क़ बांटने गया था, यानी साफ इशारा दे रहे थे कि हम ही हर किसी को रिज़्क़ देने के ज़िम्मेदार हैं। 

गीता और उपनिषद से इन दिव्यात्माओं की जानकारी मिलने से पहले तक जो बातें हम बता रहे हैं ये मुस्लिम किताबों में दर्ज तो थीं लेकिन मुसलमान आम तौर पर यही समझते थे कि यह सब बातें अहललबैत के चाहने वालों ने बढ़ा चढ़ा कर उनके बारे में गढ़ ली हैं। 

ये हस्तियां कभी इशारा करती दिखाई देती हैं तो क़ालीन पर बना शेर जीवित हो उठता है और जादूगरों को मार डालता है और कभी इन्हें भूखे शेरों के बीच डाल दिया जाए तो शेर इनके पैरों के पास ऐसे बैठे दिखाई देते हैं जैसे इनके इशारे पर चल रहे हों। ये दुआ करते हैं तो वर्षा होने लगती है, ये आंखों से दूर या आने वाले समय का हाल बताते दिखाई देते हैं और इनके दर से जुड़े  लोग साईंस आदि में ऐसी तरक्क़ी करते नज़र आते हैं कि सारी दुनिया उनके ज्ञान का लोहा मान लेती है।

ऐसे अनेक इशारे अहललबैत ने विभिन्न अवसरों पर दिए जिनसे हमें वेद और उपनिषद के कथन पूरे होते दिखाई देते हैं। अपने को पहचनवाने से अधिक ये हर समय सृष्टि के एक रचियता को पहचनवाने में लगे रहे। 

Brhad-aranyaka Upanishad.III.8.10:

Whoever, O Gargi, in this world, without knowing this Imperishable performs sacrifices, worships, performs austerities for a thousand years, his work will have no end; whosoever O Gargi, without knowledge of this Imperishable departs from this world, is pitiable. But, O Gargi, he who knowing the Imperishable departs from this world is a Brahmana.’

ऐसा इसलिए क्योंकि यही मक़सद है निराकार एबसोलूट द्वारा अपने साकार स्वरूप और इन दिव्यात्माओं के क्रिएशन का। 

Brhad-aranyaka Upanishad.I.II.1:

There was nothing whatsoever, here in the beginning. By death indeed was this covered, or by hunger for hunger is death. He created the mind, thinking ‘let me have a self’. Then he (self) moved about, worshipping. 

इस्लामी हदीसों के अनुसार नूरे मौहम्मदी जिसका क्रिएशन सृष्टि के बिलकुल प्रारंभ में हुआ जब कुछ भी नहीं था, उसने क्रिएट होते ही अपने रब की पूजा और इबादत प्रारंभ कर दी। दूसरा कोई भी क्रिएशन नहीं था और केवल यह पहला क्रिएशन हज़ारों वर्षों तक रब की पूजा और इबादत करता रहा जिसके बाद अन्य क्रिएशन वुजूद में आई। दूसरी ओर ऋग वेद कह रहा है कि ये हस्तियां इस सृष्टि के dawn के समय क्रिएट हुईं यानी सृष्टि की रचना के एकदम प्रारंभ में। 

Rig Veda.I.VI.3:

Thou who createst light where there was no light and form. O men! Where there was no form, hast been born together with the dawns.

किताब ‘बसाएरे दरजातल कुबरा फी फज़ाएले आले मौहम्मद’ लिखती है कि अहललबैत की वे हदीसें जो तुम तक पहुंची हों, यानी उनके बारे में जो कुछ तुम तक पहुंचा है और तुम्हारा दिल उनकी ओर झुका हो, यानी उस हदीस को तुम ने पहचान लिया हो तो उसको मान लो और कोई हदीस सुनो और तुम्हारा दिल न माने और तुम्हारा दिल उसका इंकार कर दे तो उसे अल्लाह और उसके रसूल की ओर वापिस कर दो, हलाक होने वाला वह है जो ऐसी हदीस सुने और इंकार कर दे। 

अबूज़र के लिए अवतार मौहम्मद ने कहा कि वह ईमान के 9वें दर्जे यानी लेवल पर थे तो सलमान के लिए कहा कि वह ईमान के 10वें दर्जे यानी लेवल पर थे। हदीस है कि यदि अबूज़र को पता चल जाए कि सलमान के दिल में क्या है तो वह उसे क़त्ल कर दें, क्योंकि अबूज़र वह सब कुछ बरदाश्त ही नहीं कर पाएंगे जो कुछ सलमान के दिल में है, हालांकि अवतार मौहम्मद ने दोनों को भाई बनाया था।

अबू हमज़ा सुमाली ने अहललबैत से प्रश्न किया कि ज़मीन का कौन सा टुकड़ा है जो सब से अफज़ल है। अहललबैत ने फरमायाः ज़मीन का टुकड़ा जो रूक्न और मक़ाम के दरमियान - यानी मक्का में काबा का एक हिस्सा - वह पूरी ज़मीन में सब से अफज़ल है। ;ऐ सुमालीद्ध, यदि कोई व्यक्ति नूह की उस ज़िन्दगी के बराबर ज़िन्दगी बसर करे जो आप ने अपनी क़ौम के दरमियान तबलीग़ में गुज़ारी - जो कि 950 वर्ष थी - वह व्यक्ति उस ज़िन्दगी में सारे दिन रोज़े रखे और सारी रातें खुदा की इबादत में गुज़ारे, उसकी रातें और दिन उस ;काबा मेंद्ध उस अफज़ल मक़ाम पर गुज़रें, फिर भी वह हमारी विलायत ;पहचानद्ध के बिना मर जाए तो उसकी इबादत उसको कोई लाभ नहीं पहुंचाएगी।

हदीसों में यह भी दर्ज है कि दो व्यक्तियों ने अहललबैत अली से कहा कि अपनी हक़ीक़त ब्यान करें। अली ने बताने से मना किया कि तुम बरदाश्त नहीं कर पाओगे। वे दोनों इस पर इसरार करते रहे। अली ने उन्हें बताना प्रारंभ किया तो वे दोनों ही बरदाश्त न कर पाए और दिमाग़ी संतुलन खो बैठे। 

आप ने देखा कि कैसे वेद, उपनिषद, गीता भी उन दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों को पहचनवा रही हैं जिन्हें मुस्लिम किताबें भी पहचनवाती दिख रही हैं। लेकिन जुलमत ने कभी भी नहीं चाहा कि इंसान इन हस्तियों की असली पहचान बना पाए।

नूर के मार्ग पर बढ़ रहे लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए जुलमत अपने जाल बिनती है, रास्ते हमवार करती है, और डोरे डाल कर उसे अपनी ओर खींचने की हर मुमकिन कोशिश करती है। यदि तुम्हारी रूह को उसने नीचे खींच लिया तो अब तुम को नूरानी ताक़तों द्वारा प्रदान की जा रही हिदायत की रौशनी नहीं मिल सकती। 

बुद्ध के अनुसार भी सत्य मार्ग की समझ जुलमत से निकल कर नूर के रास्ते से ज्ञान अर्जित करने और उस रास्ते पर चलने से ही मिलेगी। यही समझाने की कोशिश करते हुए उन्होंने कहाः

There are ways from light [Noor] into darkness [Zulmat] and from darkness [Zulmat] into light [Light]. There are ways, also, from gloom into deeper darkness [Zulmat], and from the dawn into brighter light [Noor]. The wise man will use the light [Noor] as he has to receive more light [Noor]. He will constantly advance to the knowledge of the truth.

यही कारण है कि अवतार मौहम्मद ने कहा कि अंतिम ज़माने में जब हालात बद से बदतर हो जाएं, और तुम्हारे बस में उनको बदलना मुमकिन न हो तो अपने को अल्लाह की इबादत में लगा देना। हालात सुधारने के लिए तुम कुछ न भी कर पाओ, कम से कम यह इबादत तुम्हें जुलमत की ओर खिंच जाने से रोके रखेगी। नूरानी ताक़तों को इतना शक्ति प्रदान करती रहेगी कि वे जुलमत द्वारा बिछाई गई बिसात को उलट सकें।

आईए पुस्तिका की ओर वापिस पलटते हैं और देखते हैं कि इसका लेखक आगे क्या कुछ लिखता हैः

‘अरब के रेगिस्तान में कबीलों की आपसी लड़ाई में मौहम्मद नामक मानसिक बीमार व्यक्ति ने एक शक्ति को अल्लाह का नाम देते हुए इस्लाम धर्म स्थापित किया और मौहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम के क्रूर ख़लीफाओं ने तलवार की नोक पर लोगों का गला काट कर जबरन पूरी दुनिया में इस्लाम को फैलाया जो आज दुनिया में एक बड़ा धर्म बन चुका है और दुनिया के लिए ही एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है।’

पुस्तिका का लेखक झूठ और मनघड़ंत बातों को जितना ज़ोर शोर से बोले, कहीं न कहीं हक़ीक़तें सामने आ ही जाती हैं। इस पैराग्राफ में लेखक ने मौहम्मद को मानसिक बीमार तो कहा पर यहां भी यह मानने से न बच सका कि एक ही शक्ति है जिसे मौहम्मद ने अल्लाह कहा। उस शक्ति से इंकार कर देता तो हिन्दु, यहूदी, ईसाई सब उसके सामने खड़े हो जाते क्योंकि सब ही एक शक्ति को मानते हैं।

लेखक को आपत्ती है तो इस बात पर कि अवतार मौहम्मद ने उस शक्ति को अल्लाह कहा। अब कोई लेखक को समझाए कि यदि कोई उस शक्ति को God या ब्रहमण या महेश कह रहा है, तो पूजा और अर्चना तो उसी शक्ति की कर रहा है न? फिर कोई उस शक्ति को अल्लाह कह रहा है तो क्यों आपत्ती है? अवतार मौहम्मद ने तो नहीं कहा कि उनके द्वारा जिस अल्लाह की इबादत करने की बात हो रही है वो़ उस एबसोलूट या सर्वशक्तिमान से भिन्न है जिसकी बात सनातन पुस्तकों में हुई है। हां यह अवश्य कहा कि उस क़ादिरे मुतलक़ सर्वशक्तिमान एबसोलूट के बराबर औरों को खड़ा न करो। यही तो एकेश्वरवाद है जिसकी शिक्षा पहले आए तमाम अवतार, यहां तक कि मूसा और ईसा भी, और कृष्ण भी हम को देते नज़र आ रहे हैं।

पुस्तिका का लेखक शायद मन में कहीं न कहीं जान रहा होगा कि अवतार मौहम्मद के दौर में तो केवल इस्लाम का रहमदिल, करम करने वाला और माफ करने वाला चेहरा ही सामने आया था इसलिए कहने पर मजबूर हो गया कि ‘मौहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम के क्रूर ख़लीफाओं ने तलवार की नोक पर लोगों का गला काट कर जबरन पूरी दुनिया में इस्लाम को फैलाया जो आज दुनिया में एक बड़ा धर्म बन चुका है।’ 

अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के बाद इस्लाम का चेहरा बिगड़ा तो सही, इसमें दो राय नहीं है, परन्तु उसके बावजूद मंगोलों और युरोपियंस ने दुनिया पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए मौत का जो खेल खेला, मुसलमान उसके पास भी खड़े नज़र नहीं आते। यह कहना ज़्यादा दुरूस्त होगा कि इस्लाम और अवतार मौहम्मद का मार्ग छोड़ने के बाद मुसलमान भी उतने ही दुनियापरस्त और गुनाहों में लिप्त नज़र आते हैं जितना कि दूसरे। 

केवल एक खुदा के आगे अपने को सुपुर्द करने ने उन्हें जो शक्ति दी थी और उनके दिलों में रहमदिली और इंसाफ का जो बीज बोया था, वह आहिस्ता आहिस्ता हल्का पड़ता गया, यहां तक कि उनमें और दूसरों में कोई अन्तर नहीं रहा। 

ताक़त, दौलत, नाम, रूतबा, औरत, ज़िन्दगी और उसके मज़े - इसकी ख़्वाहिश उनके दिलों को भी सताने लगी। ईष्र्या, लालच, हसद, नफरत, गुस्सा, इंतेक़ाम, आदि बीमारियों ने उनकी रूह को भी जकड़ लिया। इन्हीं में से किसी को हथ्यार बना कर तमस यानी जुलमत अपने डोरे डालती है जिनकी ओर इंसान खिंचा चला जाता है। 

जैसा मैं लिख चुका हूँ, इस्लाम ने एकेश्वरवाद को जितना ज़ोर शोर से पेश किया उसके बाद पुस्तिका का लेखक यह तो कह ही नहीं सकता था कि अवतार मौहम्मद एक से अधिक सृष्टि के रचियता की बात कर रहे थे। उस समय जब इंसान ने कई खुदा बना लिए थे, हर दिन का खुदा अलग था, उस समय अवतार मौहम्मद ने एक बार फिर से एक खुदा के कानसैप्ट पर इतना शिद्दत से ज़ोर दिया कि तमाम विश्व में भिन्न भिन्न समय में पेश किए गए एकेश्वरवाद के कानसैप्ट को इस्लामी शिक्षा से जोड़ कर देखा जाने लगा। 

अवतार मौहम्मद पहले की डिवाईन किताबों के माध्यम से आए तमाम ईश्वीय ज्ञान की पुष्टी करते हैं। लेकिन याद रखने की बात यह है कि वह उस समय आए थे जब कलियुग फैल चुका था और दुनिया अंधेरे में डूब चुकी थी। इंसानी जिस्मों में क़ैद आत्माओं को जुलमत यानी तमस ने अपने वश में कर लिया था। एक खुदा की परस्तिश भुला दिए जाने की कगार पर थी। जुलमत यानी तमस प्रसन्न थी कि वह कामयाब हो गई। धरती उस ओर बढ़ रही थी कि एक खुदा की परस्तिश करने वाले न रहें। हर ओर जुल्म, बरबरियत और अफरातफरी थी। ऐसे में उन भटकी हुई आत्माओं को नूर ने रास्ता दिखाया। दुनिया में एक बार फिर एक खुदा की इबादत करने वाले तेज़ी से बढ़े। इन्होंने दूसरे धर्मों के मानने वालों को भी अपना आत्ममंथन करने पर विवश किया। दूसरे देश भी इस्लामी कानूनों की तर्ज़ पर ह्यूमन राईट्स आदि पर कानून बनाने लगे, औरतों के हितों की बात करने लगे, इंसानियत की बात करने लगे।

अवतार मौहम्मद के गुज़रने के बाद मुसलमानों को अधिक समय नहीं लगा उनकी शिक्षा से दूरी बनाने में। उन्होंने अक़ल और logic के मार्ग को छोड़ अपनी अपनी दीवारें खड़ी कर लीं, कोई वहाबी बन गया, कोई बरेलवी, कोई शिया तो कोई सुन्नी। अवतार मौहम्मद ने ऐसी कोई भी दीवार नहीं बनाई थी, केवल हक़ का मार्ग था और उसको समझना था। उस मार्ग से गुमराह करने वाला हर मार्ग शैतान का मार्ग था। 

आज जो कोई भी अपने को सुन्नी या शिया या अहलेहदीस या बरेलवी आदी कह रहा है, दरअस्ल वह बिदअत कर रहा है क्योंकि अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी तक कोई भी इस शब्दावली से वाक़िफ नहीं था। 

शैतानी ताक़तें वहीं तो काम करती हैं जहां लोग या तो हक़ और सत्य के मार्ग पर हों, उसकी समझ उन में पैदा हो रही हो या वे उस मार्ग की ओर अग्रसर हों। यह इसलिए कि जुलमत नहीं चाहती कि लोग नूर की हक़ीक़त को पहचानें, रूहानियत के मार्ग को समझें और उसको अपनाएं। इसलिए उसने ऐसी भूल भुलईया बना डाली कि सत्य को समझने की कोशिश करने वाले भी बस चक्कर काटते रहें और दिव्यात्माओं और उनके मार्ग को न पहचान सकें। 

कभी उसने सत्य मार्ग की ओर खींचने वालों या पथ को प्रदर्शित करने वालों की छवि ऐसी बनाने की कोशिश की कि लोग भ्रमित हो जाएं और हक़ीक़तें छिपी की छिपी रहें। कभी उसने सब से बड़े ज्ञानी और गुरू समझे जाने वालों को समय के अवतार कृष्ण के सामने ऐसे ला खड़ा किया कि समझना मुश्किल हो गया कि सत्य इस ओर है या उस ओर। 

हम पहले भी प्रश्न करते रहे हैं और फिर कर रहे हैं! यदि मयंमार के बौध रोहिंगया मुसलमानों पर जुल्म की हदें पार कर देते हैं या श्रीलंका के बौध तमिल शहरियों पर अत्याचार करते हैं, और आप इस सब को बुद्ध की शिक्षा से नहीं जोड़ते, यदि युरोपियन ईसाई माया सभ्यता का संहार करते हैं और उनकी ज़मीनों पर अपना क़ब्ज़ा बना लेते हैं, यदि ऐसे ही ईसाई आस्ट्रेलिया में लाखों एबोरिजींस का सफाया कर देते हैं, यदि ईसाई अम्रीका बौध जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी को मिटा देता है और ईसाई जर्मनी युरोप और एशिया के लाखों यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानोें की मौत का कारण बनता है और आप इस सब को ईसा की शिक्षा से नहीं जोड़ते तो फिर यदि उस्मानी खलीफा आसपास के देशों में मारकाट का बाज़ार गर्म करते हैं या आईसिस, दाएश और अल-क़ाएदा जैसी संगठनें यदि कुछ ईसाईयों का क़त्ल करती नज़र आती हैं तो उससे अधिक मुसलमानों का नरसंहार करती दिखाई देती हैं, आप उनके कुकर्मों को इस्लाम और अवतार मौहम्मद से जोड़ने में देर नहीं लगाते। ऐसा इसलिए कि आप ने न तो अवतार मौहम्मद की जीवनी पढ़ी और न ही अपने आप को सात्विक मार्ग पर लगाया कि इन बातों की समझ पैदा होती। 

अब समय है एक बार पुनः प्रश्न करने का! क्या कारण है अवतार मौहम्मद और इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगेंडा को फैलाने के पीछे? इसका यह कारण नहीं है कि मुसलमान ताक़तवर हो रहे हैं और अपने हक़ की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। वे तो बेचारे और अधिक बदहाली में गिरते जा रहे हैं। यह भी कारण नहीं है कि कुछ मुसलमानों ने आतंकवाद को पकड़ा है और कुछ उनके हिमायती हैं। यदि अधिकांश लोग जो आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं वे मुसलमान हैं और यह आतंकवादी अधिकतर मुसलमानों को ही मार रहे हैं तो फिर मानना पड़ेगा कि कारण कुछ और है।

इसके पीछे मुख्य कारण छिपा है उन अनगिनत वीडियो और लेखों में जो यूटयूब और गूगल आदि पर मिल जाते हैं और जो End Times की भविष्यवाणी करते हैं। बाईबल और ईसाईयों और यहूदियों की अनेक पुस्तकें और साथ में अवतार मौहम्मद की भविष्यवाणियां End Times के हालात का विवरण विस्तार से देती दिखाई पड़ती हैं। एक बड़े युद्ध की भविष्यवाणी हर किताब ने की है जिसको ईसाईयोें ने Armageddon नाम दिया है तो मुसलमान उसे मलहमतुल कुबरा कहते हैं। 

लेकिन बड़ी विरोधाभासी बात यह है कि हिन्दुओं का मानना है कि कलकी अवतार के आने पर हर ओर धर्म फैल जाएगा। इससे वे यह समझ बनाए हैं कि तमाम ओर हिन्दु धर्म के मानने वाले होंगे। यहूदी शिद्दत से Mashiach के आने की प्रतीक्षा में हैं और यह मानते है कि आसपास के मुस्लिम देश सबसे बड़ी बाधा हैं ग्रेटर इस्रायल के क़याम में, जिसके बाद ही Mashiach की आमद होगी। ईसाईयों का विचार है कि मसियाह की Second Coming के पश्चात हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा पर यह तब ही होगा जब मुसलमानों के विरूद्ध एक भीषण युद्ध होगा। मुसलमान यह मानते है कि हर ओर इस्लाम फैल जाएगा जब मेहदी आएंगे पर यह तभी होगा जब उनका यहूदियों के खिलाफ युद्ध होगा। 

बहुतेरे मुसलमान जो आज लड़ रहे हैं वे समझते हैं कि वे आने वाले भविष्य में मेहदी की फौज का हिस्सा होंगे। मैंने अपने लेखों में दिखाया है कि माया सभ्यता के Red Indians भी किसी Quetzalcoatl की प्रतीक्षा में थे और जब केवल क़रीब 500 स्पेनी अम्रीका के तट पर उतरे, तो इन Red Indians ने समझा कि ये भिन्न वेश भूषा वाले लोग वहीं हैं जिनकी उन्हें प्रतीक्षा थी और बहुतेरों ने अपने हथ्यार डाल दिए। फलस्वरूप मात्र थोड़े से युरोपियंस ने तमाम एज़टेक एम्पायर को धराशाई कर दिया। 

एक धर्म द्वारा दूसरे को अधीन कर लेने की यही सोच सारी समस्याओं की जड़ है। यही कारण है कि हर धर्म दूसरे धर्म के खिलाफ प्रोपेगेंडा में लगा है। 

ज़रा सोचिए, क्या तमाम भविष्यवाणियां सच्ची साबित हो सकती हैं? उदाहरण के तौर पर यदि ईसाई अपनी किताबों में दिए गए ज्ञान के बल पर मानते हैं कि हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा, तो यह तो मुसलमानों को बताई गई भविष्यवाणियों से एकदम विपरीत बात है जिन के अनुसार मेहदी के आने पर हर ओर इस्लाम का बोलबाला होगा। अब ईसाई क्यों न मानें कि मौहम्मद एक false prophet थे। 

इसी प्रकार यदि यहूदी और ईसाई किताबों में अनेक भविष्यवाणियां हैं कि उनका धर्म सब ओर फैल जाएगा, तो मुसलमान यह मानने पर विवश हैं कि उन्होंने झूठ गढ़ लिया है क्योकि मुसलमान मानते है कि सत्य तो उनके पास है और हर ओर इस्लाम को फैलना है।

हिन्दु भी मानते हैं कि कलकी अवतार के आने पर हर ओर धर्म फैल जाएगा पर वे इसकी अधिक बात करते नहीं दिखाई देते इसलिए कि उन्होंने यह ग़लत मान्यता बना रखी है कि कलकि अवतार के आने में अभी लाखों वर्षों का समय है। उन्हें डर है तो मुसलमानों की भविष्यवाणियों से जिनके अनुसार हर ओर इस्लाम फैल जाएगा। आईसिस, दाएश और अल-क़ाएदा जैसी संगठनें उनकी सोच को बल देती नज़र आती हैं और इस कारण उनमें से भी कुछ ने मुसलमानों के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया है। 

हमारा मानना है कि दुनिया इस समभ्रम में इसलिए गिरफतार है क्योंकि वह पहचान ही नहीं पाई कि असली दुश्मन कौन है। कौन है जो हम में से सब को पथभ्रष्ट किए हुए है? हिन्दु हो या मुसलमान, यहूदी हो या ईसाई, हर कोई दुनिया के रंगों में रंगा है और दूसरों की बुराईयां और कमियां ढूंढ रहा है। अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखता। हर कोई भूल गया है कि इंसान को क्रिएट करने के पीछे क्या अपेक्षा थी। पहले भी बता चुका हूँ और एक बार फिर बताए देता हूँ। शायद शब्द भिन्न हो जाएंः

एक निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी ब्रहमण ने जिसे मुसलमान क़ादिरे मुतलक़ खुदा यानी अल्लाह कहते हैं एक साकार शक्ति क्रिएट की। उपनिषद के अनुसार इस साकार ताक़त ने क्रिएट होते ही निराकार की पूजा अर्चना प्रारंभ शुरू कर दी। 

मुसलमान अपनी किताबों में मौजूद हदीसों की बुनियाद पर इस पहली क्रिएशन को नूरे मौहम्मदी कहते हैं। सनातन किताबों में क्रिएशन के हर स्टेज को अलग नाम से याद किया गया है जबकि इस्लामिक ग्रन्थों में इसकी अधिक व्याख्या नहीं मिलती और इस पहली क्रिएट हुई शक्ति को ही नूरे मौहम्मदी कहते हैं। ज़्यादा व्याख्या शायद इसलिए भी नहीं मिलती क्योंकि सब कुछ तो पहले के ग्रन्थों में बता दिया गया था, कलियुग के अंत में तो अब केवल एक खुदा के आगे समर्पण और उसकी याद में ज़िन्दगी गुज़ारने का तरीक़ा बताना था, वह भी उस इंसान को जो गुमराह था और अपनी आत्मा को स्वयं अपनी कोशिश से सीधे मार्ग पर लगाने में असमर्थ था। 

उपनिषदों के अनुसार निराकार एबसोलूट की पूजा अर्चना करने के बाद साकार शक्ति ने एक नूरानी रूह या दिव्यात्मा शक्ति क्रिएट की जो एक थी पर ऐसे विभाजित हुई कि अब 7 दिव्यात्मा शक्तियां थीं जो सब बिलकुल एक समान थीं और जिन में एक देवी थी। एक समान शक्यिां होने की बात अवतार मौहम्मद भी बताते हैं जब वह अहललबैत के लिए कहते हैं कि हम में से पहला भी मौहम्मद है, अंतिम भी मौहम्म्द है, बीच वाला भी मौहम्मद है, सब के सब मौहम्मद हैं। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि जैसा उपनिषदों ने बताया था कि पहली शक्ति जिससे विभाजन हुआ था, और जिसको मुसलमान नूरे मौहम्मदी कहते हैं, उसके विभाजन से बनी 7 दिव्यात्माएं उस पहली के बिलकुल समान थीं जिससे विभाजन हुआ। 

इस दिव्यात्मा शक्ति के साथ ही एक अन्य विपरीत शक्ति क्रिएट हुई जिसको जुलमत या तमस कहते हैं जिसने डेमोनिक शक्तियों को जन्म दिया। नूर और जुलमत का क्रिएशन हो चुका था और अल्लाह ने ही किया था जिसकी गवाही कुरान ने भी दी। अब इंसान को क्रिएट किया जाना था। पहला इंसान क्रिएट किया गया जिस ने इन नूरानी हस्तियों को पहचाना तब कुरान के अनुसार आदम को ज़मीन पर अल्लाह के ख़लीफा का ओहदा मिला। लेकिन अभी आदम को एक और ट्रेनिंग से गुज़रना था। 

आदम ने उन नूरानी हस्तियों को तो पहचान लिया था जो इंसान को हिदायत देने की जिम्मेदार हैं और जिनको क्रिएट करने का अस्ली मक़सद है कि इबादत करने वाले अधिक हों। लेकिन अभी उन्हें समझना था कि जुलमत भी उनके कितने क़रीब है और उन्हें कैसे गुमराह कर सकती है। जिस दिन आदम की यह टेªनिंग पूरी हो गई, उस दिन उन्हें ज़मीन पर भेज दिया गया क्योंकि इसी ज़मीन के लिए तो उन्हें पैदा किया गया था। शैतान को स्वर्ग से निकाला गया तो उसे भी इसी ज़मीन पर भेजा गया और 7 नूरानी रूहें भी आदम के साथ इसी ज़मीन पर आ गईं, जैसा कि हमें ईसा ने बताया। यह पृथ्वी ही कर्म भूमि है; इस पृथ्वी पर आई आत्मा को यहां से निकलने के लिए हिदायत करने वाली नूरानी रूहों को पहचानना होगा और उनके मार्ग पर आगे बढ़ना होगा। जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक शक्तियां कभी भी नहीं चाहेंगी कि ऐसा हो। उनका काम है इंसान के नूर के मार्ग पर आगे बढ़ते क़दमों को वापिस खींच लेना या उसे गुमराह कर देना। 

हिन्दु, मुस्लिम, यहूदी, ईसाई - सब अपने अपने ढंग से गुमराही में फंसे हैं। रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश सब ने छोड़ दी है। एक दूसरे को ज़लील करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अपनी आत्मा की चिंता नहीं। दूसरों की चिंता छोड़ दो! उन नूरानी शक्तियों को पहचानते हुए जो हर ज़माने में सत्यमार्ग की ओर तुम्हें खींच लाने की कोशिश में लगी हैं, अपनी आत्मा को उस पथ पर लगाओ और पुल के पार हो जाओ। वह पुल जो स्वर्ग में हमेशा की ज़िन्दगी देने का मार्ग है और जिसका उल्लेख करते हुए मुस्लिम हदीसों एवं उपनिषदों ने उसे पुले सिरात या determining bridge कहा। जब तक अपने असली दुश्मन को नहीं पहचानोगे, तब तक तुम को राह मिलने से रही!

जब जब भी इन नूरानी रूहों में से किसी ने ज़मीन पर किसी पाक इंसान के शरीर को चुना कि उसके माध्यम से मानव कल्याण के मार्ग को प्रदर्शित किया जा सके, जुलमत यानी तमस ने अपनी तमाम शक्तियां लगा दीं, उस मार्ग से इंसान को भ्रमित करने के लिए। आज हिन्दु अपने को कृष्ण का मानने वाला भले ही बता रहे हों पर सत्य यही है कि कृष्ण के खिलाफ युद्ध करने जमा होने वाले हिन्दुओं की संख्या उससे अधिक थी जो उनके साथ थे। इसी जुलमत की ताक़त ने और उसके कारिंदों ने मूसा के मानने वालों को बार बार बहकाया, यहां तक कि जब 7 नूरानी रूहों में से एक ने ईसा के शरीर में अवतरण लिया तो मूसा के मानने वालों ने ईसा को अपनाने से इंकार कर दिया ठीक वैसे जैसे कृष्ण के मानने वालों को महावीर को मानने में और महावीर के मानने वालों को बुद्ध को मानने में कठिनाई हुई। मूसा और ईसा के मानने वालों ने मौहम्मद को नहीं पहचाना और मौहम्मद के बाद अपने को मुसलमान कहने वालों ने उन अहललबैत को जिनकी पाकीज़गी की गारंटी कुरान ले रहा था इतना सताया कि उन्हें क़ैद में बंद किया, उन्हें ज़लील करने की कोशिश की और अंतः उन्हें शहीद कर दिया। 

जब तक ईसाई रोमन शहंशाहों के जुल्म से बाहर आए, God, Holy Spirit and Jesus के बीच अस्ली रिश्ते की समझ गड़बड़ा चुकी थी। जब तक इस्लाम उमवी और अब्बासी हुकमरानों की पकड़ से बाहर निकला, अहललबैत की असली समझ मुसलमान खो चुके थे। सनातन धर्मी ऐसे दौर से गुज़रे कि अशोक जैसे शहंशाह ने कथित तौर पर तीन बार भारत को बुद्ध के नाम पर विजय किया; ज़ाहिर है जब बुद्ध के नाम पर विजय प्राप्त हो रही हो तो ब्रहमिणों को अपनी किताबें छिपाना पड़ गईं। ऐसे में सनातन धर्म की किताबों की असली समझ लुप्त हो गई। बुद्ध के मानने वाले भी अपने को प्रताड़ना से नहीं बचा पाए। भारत में ऐसे हालात भी पैदा हुए कि बुद्ध मत के मानने वालों को पहाड़ों पार ही श्रण मिली या फिर वह जंगलों में पहाड़ी गुफाओं में छिप कर बुद्ध की शिक्षा को बचाए रखने के लिए दीवारों पर चित्र बना रहे थे जो आज भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। जुलमत यानी तमस द्वारा कराए गए हर ऐसे हमले में एक खुदा, परमात्मा और इन नूरानी हस्तियों की पहचान और रोल की समझ धूमिल पड़ती गई। जैसा मैंने बार बार कहा, हमारी आत्मा मोक्ष यानी निजात तब ही प्राप्त कर सकती है जब हम इन दिव्यात्माओं को पहचान लें और उनके बताए मार्ग पर आगे बढ़ें।

तुम कृष्ण के मार्ग को सही सही समझते हुए आगे बढ़ोगे तो भी वहीं पहुंचोंगे जहां ईसा के मार्ग को समझते हुए आगे बढ़ने पर पहुंचोगे। वेद यदि ठीक ठीक समझे तो वे तुम्हें कुरान और अहललबैत तक लाएंगे जिनमें अवतार मौहम्मद सब अहललबैत के लीडर हैं और कुरान यदि ठीक ठीक समझोगे तो वेद और गीता को अपने गले से ऐसे ही लगाओगे जैसे कुरान को लगाते हो। उन दिव्यात्माओं की समझ आवश्यक है जो मोक्ष यानी निजात की राह प्रदर्शित करने हेतु क्रिएट की गईं। जैसा मैं पहले लिख चुका हूँ कि गीता साफ शब्दों में कह रही है कि सत्य मार्ग को पहचानते हुए आगे बढ़ोगे तो यदि कुछ गुनाह किए हैं तो वे भी माफ हो जाएंगे और तुम स्वर्ग में हमेशा की ज़िन्दगी पाओगे परन्तु यदि उस मार्ग की समझ नहीं बना पाए तो तुम्हारे अच्छे कर्म भी कुछ काम नहीं आएंगे; जब तुम्हारे अच्छे कर्मों का फल तुम भुगत चुकोगे तो एक बार फिर तुम्हें इस दुनिया में परीक्षा हेतु भेज दिया जाएगा।

यही 7 दिव्यात्माएं जो अहललबैत के जिस्मों में कार्यरत थीं, हर ज़माने में विभिन्न स्थानों पर और भिन्न भाषा बोलने वालों के बीच पाक इंसानी जिस्मों को अपना आफिस बना कर उनसे हिदायत का काम करती रहीं। इन जिस्मों में किसी का नाम कृष्ण था, किसी का मूसा, किसी का ईसा और किसी का मौहम्मद। जिस शरीर को कोई दिव्यात्मा अपना आफिस बना ले, उस शरीर से परमात्मा अपना संदेश देने लगता है। जैसा कि मैंने बताया है कि कृष्ण और मौहम्मद के शरीर से एक समान अंदाज़ और लहजे में बात होती दिखाई देती है। जब हमने इन दिव्यात्माओं की ही समझ खो दी, जिन के बारे में हर अवतार हमें समझाने में लगा था, तो हम नाम के किसी धर्म से जुड़े तो हो सकते हैं लेकिन हमने उस अवतार की शिक्षा को नहीं समझा जिसको हम अपना कहते और समझते हैं। यह है हमारे अपने धर्म पर चलने की असलियत!

अब समझिए! End Times में नूर और जुलमत के बीच चल रही लड़ाई को एक बार फिर से अपनी चरम सीमा पर पहुंचना है। जैसा मैंने कहा, हम सब मोक्ष यानी निजात की सीधी राह से भटके हुए हैं। सारे डिवाईन समझे जाने वाले ग्रन्थ किसी न किसी अवतार द्वारा बताए गए थे। यदि हर ग्रन्थ कह रहा है कि इस ग्रन्थ में दी गई शिक्षा चारों ओर फैल जाएगी तो क्या ग़लत कह रहा है जबकि तमाम ग्रन्थ एक ही सोर्स से थे, उनकी शिक्षा भी एक ही थी। यह तो हम हैं जिन्होंने उस शिक्षा को समझने में ग़लती की। एक ही मार्ग बताया जा रहा था। उस मार्ग को जिस ने जैसा समझा उसको हमने धर्म का नाम दे दिया। यदि धर्म नहीं बना तो sect बन गया। 

वेद तमाम इंसानियत के लिए हिदायत का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। अपने को हिन्दु कहने वालों ने उसे अलग अलग तरीक़े से समझा। किसी ने समझा कि देवता किसी ज़माने में रहते थे और किसी ने समझा कि देवता तो कुछ नहीं होते। क्या दोनों समझ सही हो सकती हैं? यह तो हो सकता है कि दोनों की समझ ग़लत हो, पर यह नहीं हो सकता कि दोनों सही हों। आज दोनों समझ रखने वालों में से किसी को भी चिंता नहीं कि अपने मोक्ष की चिंता करे।  

कलकी अवतार, मसियाह, मेहदी, Mashiach, Soshiant, Quetzalcoatl ये सब अलग हस्तियां नहीं हैं बल्कि एक ही हस्ती के विभिन्न ग्रन्थों में दिए गए नाम हैं। ठीक वैसे जैसे आत्मा को किसी ने रूह कहा और किसी ने Spirit. 

End Times में जो होना है वह समझिए! एक सीधा मार्ग जो हर ज़माने में बताया जा रहा था वह सामने आ जाएगा। अपनी अपनी किताबों की ग़लत समझ जो लोगों ने बना रखी है वह मिट जाएगी और सीधा रास्ता एकदम साफ हमारी नज़रों के सामने होगा। हमारे ऊपर निर्भर करेगा कि हम उस मार्ग को समझते हुए उस पर चलते हैं कि नहीं। वेद हों कि बाईबल, गीता हो कि कुरान, सब की शिक्षा एक समान समझ ली जाएगी, और उस पर चलने वाले लोग ही हक़ पर होंगे। गीता और वेद से लोग कुरान की ओर आएंगे और कुरान पढ़ कर वेद और गीता को अपना कहेंगे। उस मार्ग से विचलित हर मार्ग गुमराही का मार्ग होगा। लेकिन जुलमत ऐसा क्यों चाहेगी?

हमारा सब से बड़ा दुश्मन हमारे अन्दर विराजमान है और हमें खबर नहीं है। उसने अल्लाह से यही तो क्हा था कि मैं इंसानों को बहकाता ही रहूँगा और उसको जवाब मिला था कि जो नेक बन्दे हैं वे तेरे बहकावे में नहीं आएंगे। जब से आज तक जुलमत ने न जाने कितने परिवारों में कलह पैदा कर दी, भाई को भाई से, इंसान को इंसान से और इंसान को खुदा से जुदा कर दिया। अल्लाह हर बन्दे से चाहता है कि वह अपने अन्दर के शैतान के साथ एक आखि़री जेहाद करे, जिसे जेहादे अकबर कहा जाता है, और अपने अन्दर घुसपैठ बनाए बैठे शैतान को बाहर निकाले। 

आदम जमीन पर आए तो उन्हें एक ही रास्ता बताया गया जिस पर चल कर वह वापिस स्वर्ग में पहुंच सकते थे पर आदम की औलाद को उस शैतान ने ऐसे बहकाया कि अनेक रास्ते बन गए जिन सब के बीच वह एक रास्ता जो मोक्ष या निजात का रास्ता था खो गया और इंसान इसी दुनिया का हो कर रह गया। 

जुलमत की ताक़त नहीं चाहती कि हम असली धर्म की शिक्षा की ओर आएं, हक़ और हक़ीक़त को पहचानें। यह आखि़री समय वह है जब सत्य एक बार फिर सामने आएगा। दुनिया अब समापन की ओर बढ़ रही है। कलियुग के बाद कोई युग नहीं आना है। क़यामत से पहले ईश्वर एक बार फिर हक़ को बताना चाह रहा है। जो देवताओं यानी मौहम्मद और अन्य अहललबैत के मार्ग पर आ जाएगा वह अपना स्वयं का भला कर लेगा जबकि अन्य लोग गुमराही की दलदल में बह जाएंगे। 

वेद के मानने वाले हो तो देवताओं को पहचानो, कुरान के मानने वाले हो तो अहललबैत को पहचानो। तुम पाओगे कि दोनों एक ही मार्ग के मुसाफिर हो! 

जुलमत भी जान रही है कि वह दिन नज़दीक है जब यह होना है। नूर और जुलमत की हक़ीक़त सामने आना है। हक़ और बातिल उजागर होना है। इस आखि़री समय में हक़ को पहचानने का एक और अवसर दिया जा रहा है। यही कारण है कि जुलमत ने अपनी कोशिशें तेज़ कर दी हैं। नूर के रास्ते पर लोग न आएं इसलिए वह हर मुमकिन कोशिश करेगी, कुछ को ज़लील-ओ-रूसवा कराएगी, कुछ को क़त्ल, विभिन्न गुटों में दूरियां और अधिक बढ़ाएगी। लेकिन जो भविष्यवाणी कर दी गई है उसको कोई टाल नहीं सकता। सत्य तो सामने आ कर रहेगा; और यह सत्य यदि कुरान में है तो वेद और गीता में भी है, बाईबल और ओल्ड टेस्टामेंट में भी है। आवश्यकता है तो यह कि हम इन सब ग्रन्थों को अपना समझते हुए नए ज्ञान की रोशनी में फिर से अनुवाद करके पढ़ें।

आप विश्व भर में देखें नफरतें कितनी तेज़ी से फैल रही हैं। आज इंसान इंसान को मारने काटने से नहीं बच रहा। धर्म और जाति की बुनियादों पर हिंसा का खेल जारी है। जुलमत के कारिंदे फेसबुक, इंटरनेट और मोबाईल के माध्यम से नफरतों और द्वेष को फैलाने में जुटे हैं। हक़ को पहचानिए। सत्य, अहिंसा और इंसानियत के रास्ते पर आएं। शैतानी ताकत़ों की कोशिशों को नाकाम कर दें। अपने अन्दर के शैतान को मात दे दें जो हमसे गुनाह करा रहा है। जो घरों में भी नफरतों को बढ़ावा दे रहा है। जिसने भाई भाई में, पति पत्नी में और बाप बेटे में दूरी पैदा कर दी है और हम को नूर के रास्ते से विचलित कर materialistic चाहतों में गर्क़ कर दिया है। क्यों न करे, जुलमत की ताक़त स्वयं इन्हीं चीज़ों से बनी है। उसका काम ही रूहानियत से खींच कर हमको माद्दियत यानी दुनियावी चाहतों में डाल देना है। 

रूहानियत को सामने आना है। यसूअ मसीह यानी ईसा इसी की ओर इशारा कर रहे थे जब वह भविष्यवाणी कर रहे थे ‘when the spirit of God will come’ के माध्यम से। आईये नूर के रास्ते पर। द्वेष और नफरत को मिटा फेंके। इंसानियत के मार्ग पर आएं, प्रेम के मार्ग पर आएं, रूहानियत के मार्ग पर आएं।

यही बात बार बार वेदों और उपनिषदों में कही गई। कभी कहा गया कि यह देवता जो दिव्य अथार्त नूर से बने हैं इनको अपनी इंद्रियों और दूसरे अंगों का हाकिम मान लो। जब तुम देवताओं को हाकिम मान लोगे तो गलत कार्य कैसे करोगे? कभी कहा गया कि अपनी इंद्रियों को अन्दर की तरफ समेट लो। कभी कहा गया कि हमारे अन्दर दिव्य अथार्त नूर का बसेरा है, केवल उसे जागरूक करने की आवश्यकता है। 

तुम्हारे अन्दर की नूरानियत जब ही ज़ाहिर होगी जब अपने अन्दर की जुलमत को कोशिश करके हटा दोगे। हिन्दुस्तान के वासियो, समय आ गया है कि अब तुम अपने अन्दर के शैतान को कुचल कर नूर के क़रीब हो जाओ। खुदा हिन्दुस्तान को बेहतर दर्जा देना चाहता है, खुदा को खुश कर दो।


Tuesday, 1 September 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-M: महिलाओं से सुलूक और अनेक शादियां

महिलाओं से सुलूक और अनेक शादियां

अब इसमें शक की गुंजाईश नहीं रही जाती कि पुस्तिका का लेखक केवल मनघड़ंत बातें ही लिख रहा है। वह आगे लिखता हैः

‘आधुनिक काल में मौहम्मद के आलोचक उनके स्वयं को पैग़म्बर घोषित करने को लेकर उनकी सच्चाई पर सन्देह करते हैं। इसी प्रकार आधुनिक विचारक उनकी नैतिकता पर शंका करते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार में गुलाम रखने की आलोचना करते हैं, शत्रुओं के साथ मौहम्मद द्वारा किए गए व्यवहार की आलोचना करते हैं, उनकी शादियों की आलोचना करते हैं। मौहम्मद पर परपीड़न-रति ;दूसरोें को पीड़ा देकर काम सुख की अनुभूति करना और निर्दयी होने का आरेाप लगाते हैंद्ध, मदीना में बानू कुरैज़ा ट्राइब पर आक्रमण उनकी निर्दयता का ज्वलन्त एक उदाहरण बताया जाता है। इसके अलावा गुलामों के साथ लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करना ;सम्भोग करनाद्ध, मात्र 6 वर्ष की आयशा के साथ शादी करने की भी आलोचना की जाती है क्योंकि अधिकांश अनुमानों के अनुसार मौहम्मद ने 9 वर्ष की आयु में ही आयशा के साथ सहवास कर लिया था।’

अभी तक पुस्तिका के 8 पेज ही हुए हैं और इसके लेखक जो बातें वह पहले कह चुके हैं बस वही घुमा फिरा कर फिर से कह रहे हैं। जैसे कहते हैं कि ‘आधूनिक काल में मौहम्मद के आलोचक उनके स्वयं को पैग़म्बर घोषित करने को लेकर उनकी सच्चाई पर सन्देह करते हैं।’ इस पर हम विस्तार से बात कर चुके हैं, और आप को दिखाया है कि मध्यकाल हो या आधूनिक काल, सत्य केवल उसकी समझ में आएगा जिसके सात्विक कर्म अधिक हों। गाली गलोच करने वाले या दूसरे का माल बेच कर खाने वाले किसी व्यक्ति के लिए कौन कहेगा कि वह सात्विक का ‘स’ भी जानता होगा।

फिर पुस्तिका के लेखक ने लिखा है कि ‘इसी प्रकार आधुनिक विचारक उनकी नैतिकता पर शंका करते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार में गुलाम रखने की आलोचना करते हैं, शत्रुओं के साथ मौहम्मद द्वारा किए गए व्यवहार की आलोचना करते हंै, उनकी शादियों की आलोचना करते हैं।’ इनमें से अधिकतर आरोपों पर भी हम विस्तार से बात कर चुके हैं। अवतार मौहम्मद के नैतिक मूल्य ऐसे थे कि दुश्मन भी सच्चा और ईमानदार मानते थे, लोग केवल उनके आचरण से प्रभावित होकर उनकी शिक्षा को अपना लेते थे, युद्ध प्रारंभ करने को लेकर, युद्ध के दौरान और समाप्ति के बाद उनके द्वारा बताए कानून आज भी तमाम इंसान मानने लगें तो दुनिया में कभी युद्ध हो ही न; दुनिया में केवल अम्न और सलामती हो। अपने पास ताक़त होते हुए भी शत्रु को माफ कर देने के अनगिनत उदाहरण हमारे सामने हैं, यहां तक कि उनके साथ के मुसलमानों को भी अहिंसा और माफ कर देने की ऐसी सख़ावत समझ नहीं आती थी। 

हक़ीक़त तो यह है कि अवतार मौहम्मद के बाद यदि इस्लाम के अन्दर ऐसे लोग पैदा हो गए जिन्होंने इस्लाम की शिक्षा को पथभ्रष्ट किया तो यह केवल अवतार मौहम्मद के माफ कर देने की प्रवृत्ति के कारण। जो भी युद्ध करने न आए, उससे युद्व न करने के उनके उसूल के कारण। अधिकांश शासक जिससे ज़रा भी खतरा देखते हैं उसे कत्ल कर देते हैं, नहीं तो कैद में डाल देते हैं। आज भी कुछ इस्लामी देश हैं जहां घर में बिना कारण 15-20 लोग भी जमा हो गए तो उस व्यक्ति को क़ैद में डाल दिया जाता है। इसके पीछे डर है कि कहीं कोई साज़िश तो नहीं हो रही। लेकिन अवतार मौहम्मद के यहां तो उसूल था कि गुनहगार कोई जब ही समझा जाएगा जब उसने गुनाह कर लिया हो। यही कारण था कि बड़े बड़े शातिर लोगों ने जब देखा कि अब इस्लाम में शामिल हो जाने में ही भलाई और लाभ है तो वे अपना शातिराना दिमाग़ लिए हुए इस्लाम में शामिल हो गए।

पड़ौसी से लेकर मेहमान तक, भाई, पत्नी और मां से लेकर किसी दूसरे धर्म के मानने वाले तक, ग़रीब से लेकर दौलतमंद तक, ताक़तवर से लेकर अनाथ, विधवा और बेसहारा तक, जानवरों से पेड़ पौधों तक, तमाम दुनिया के इतिहास में किसी ने हर एक के हक़ को इतना विस्तार से नहीं बताया जितना अवतार मौहम्मद ने। न केवल बताया, बल्कि उस पर चल कर बताया। और अपने रब की इबादत तो ऐसे की कि कुरान बोल उठा कि अपने आप को इतना कष्ट न दें। पर यदि कोई कमअक़ल हर बात पर केवल यह कह दे कि ‘उन्होंने अपना व्यवहार ऐसा दिखाया कि लोग उन पर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें’ तो साफ है कि आलोचक उनके व्यवहार में कमी नहीं निकाल पाए तो इस प्रकार की बातें करने लगे। 

पुस्तिका के लेखक द्वारा गुलाम प्रथा की आलोचना की गई है, इस पर हम विस्तार से बात कर चुके हैं। जहां युरोप और अमरीका 18वीं सदी तक गुलामों के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे थे कि आज भी उनका उल्लेख पढ़ कर इंसान सिहर उठता है और यह प्रथा इंसान के दिल और दिमाग़ में ऐसी रची बसी थी कि अमरीका को एक गृह युद्ध से गुज़रना पड़ा जब इस प्रथा को समाप्त करने का फैसला लिया गया, वहीं अवतार मौहम्मद ने कुछ ही वर्षों में इस प्रथा को ऐसे समाप्त किया कि मुसलमान एक दूसरे से होड़ लगाते हुए गुलाम आज़ाद कर रहे थे। 

हम पहले बता चुके हैं कि अन्य सामाजिक समस्याएं न खड़ी हो जाएं, इसलिए इनको आहिस्ता आहिस्ता आज़ाद करना आवश्यक था। अवतार मौहम्मद ने न केवल गुलाम या कनीज़ को आज़ाद करने के रास्ते खोले बल्कि उनके साथ बराबरी का सुलुक करने का उपदेश दिया और उनके हुकूक़ को भी पूरा करने की नसीहत की। यहां तक कि लोग अपने गुलाम के साथ बैठकर खाना खाने लगे, उनको अच्छे कपड़े पहनाने लगे और उनके आराम का पूरा ख़्याल रखने लगे। 

भारत में गुलाम प्रथा हमको इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि यहां एकदम दूसरे समीकरण बन गए थे जिन के अनुसार एक पूरी जाति को गुलामों से भी बदतर जीवन व्यतीत करना पड़ रहा था। इसके बावजूद दास और दासियां रखना तो यहां भी आम बात थी और अनेक स्थानों पर या घरों में आज तक दास या दासियां पाई जाती हैं। 

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क्यों करीं इतनी शादियां

एक बात जिस पर अभी विस्तार से बात होना शेष है वह अवतार मौहम्मद की कई शादियों को लेकर है। उनकी 9 या 13 शादियों के कारण उनके कई आलोचक उन्हें womaniser या sex addict तक कह देते हैं। हालांकि जो बात ग़ौरतलब है वह यह कि यह कैसा womaniser या sex addict था जो रिश्तो की पाकीज़गी की बात करता था, जो केवल 9 रिश्तों के अतिरिक्त किसी औरत की ओर आंख उठा कर भी देखने को मना करता था, जो नामहरम को छूने या हाथ लगाने या हाथ मिलाने की भी इजाज़त नहीं देता था और जो शादी के बाहर बने रिश्ते को इतनी सख़्ती से नाजाएज़ कहता था कि यदि दुनिया में कुछ गुनाहों की सज़ा रखी तो उसमें यह गुनाह भी शामिल है? 

इस संदर्भ में आवश्यक हो जाता है कि इस्लाम में सैक्स और शादी के कानसैप्ट को समझें। लेकिन पहले यह बताना आवश्यक है कि adultery यानी शादी के पाक रिश्ते के बाहर सैक्स हर ज़माने में नाजाएज़ ही रहा है। Exodus के अनुसार मूसा को दी गई 10 Commandments में से एक थी “Thou shalt not commit adultery” (Exodus 20:14) 

Leviticus और Deuteronomy के अनुसार यदि कोई जोड़ा अवैघ संबंध बनाता है तो उसे मार दिया जाना चाहिए।

These three sins absolutely must be avoided: adultery (Leviticus 20:10), idolatry and murder. 

If a man is found lying with the wife of another man, both of them shall die, the man who lay with the woman, and the woman. So you shall purge the evil from Israel. 

(Deuteronomy 22:22)

Adultery is considered a great sin 

Genesis 20:9, Genesis 39:9)

यहूदियों में शादी के बाहर नाजाएज़ संबंध बनाने की सज़ा पत्थरों से जान जाने तक मार देना था। इस्लाम ने इस क़ानून को थोड़ा हल्का करते हुए गै़र शादीशुदा मर्द और औरत के बीच बने शारिरिक संबंध की सज़ा को सरेआम कोड़े मारने तक सीमित कर दिया। इसके साथ ही इस्लाम ने नाबालिग़ लड़कियों के साथ शारिरिक संबंध को भी सख़्ती से मना किया। हालांकि आम तौर पर कहा जाता है कि लड़के 15 वर्ष पर बालिग़ होते हैं और लड़कियां 9 वर्ष पर। यहां गौर करने की बात यह है कि इस्लाम ने ज़बरदस्ती शादी करने की ज़िम्मेदारी मां बाप पर नहीं रखी बल्कि स्वयं लड़के और लड़की पर रखी है। यदि लड़के या लड़की पर निर्भर है कि वह अपना वर चुनें और यह कि कब शादी करना है तो वे तब ही तो करेंगे जब उन्हें अपने शरीर के अन्दर महसूस होने लगे कि अब उनको शादी कर लेना चाहिए। 

यह प्रथा तो भारत में थी कि बहुत छोटी उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती थी और 8-9 वर्ष के होते होते वे अपने ससुराल पहुंचा दी जाती थीं। आप की जानकारी में होगा कि भारत में 1860 मेें Indian Panel Code लागू हुआ। इसका सैक्शन 365 बलात्कार की बात करता है। उस समय यह marital rape की बात करते हुए कहता था कि यदि पत्नी 10 वर्ष से ऊपर है तो इसे बलात्कार नहीं समझा जाएगा। 1890-91 में इसमें बदलाव करते हुए उम्र को 12 वर्ष किया गया और 1949 में इसको 15 वर्ष किया गया। यानी 1860 तक Indian Panel Code 10 वर्ष की लड़की से विवाह की अनुमति देता था। याद रखने की बात यह है कि यह कानून 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के विवाह पर पाबन्दी लगाने के लिए बना था जो बहुत अधिक संख्या में हो रही थीं। यह भी याद रखिए कि यह 1860 के भारत की बात है जबकि अरब के रेगिस्तान में पली बढ़ने वाली लड़कियो के लिए कहा जाता था कि वह औरों से पहले जवान हो जाती थीं। 

तंज़ानिया में 1971 का Marriage Act आने तक मुस्लिम और हिन्दु लड़कियों की 12 वर्ष के होने पर शादी की जा सकती है यदि 15 वर्ष की आयु पर विवाह सम्पन्न हो। सूडान में Personal Status of Muslims Act of 1991 दस वर्ष तक के लड़कों और लड़कियों की शादी जाएज़ करता था और इसमें 2020 के अंत में ही बदलाव किया गया है। फिलीपींस में भी 10 वर्ष पर लड़की की और 15 वर्ष पर लड़के की शादी की जा सकती है और इस क़ानून में जनवरी 2022 में बदलाव किया गया है।  

आईए देखें इस विषय पर गूगल क्या कहता है? 

Before the industrial revolution, in many parts of the world, including India, China and Eastern Europe, women tended to marry immediately after reaching puberty, in their mid-teens. Societies where most of the population lived in small agricultural communities were characterized by these marriage practices well into the 19th century.

In ancient and medieval societies, it was common for girls to be betrothed at or even before the age of puberty, According to M.A. Friedman, “arranging and contracting the marriage of a young girl were the undisputed prerogatives of her father in ancient Israel.” Most girls were married before the age of 15, often at the start of their puberty. In the Middle Ages the age at marriage seems to have been around puberty throughout the Jewish world. 

Ruth Lamdan writes: “The numerous references to child marriage in the 16th-century Responsa literature and other sources, shows that child marriage was so common, it was virtually the norm. In this context, it is important to remember that in halakha, the term “minor” refers to a girl under twelve years and a day. A girl aged twelve and a half was already considered an adult in all respects.” 

In Ancient Greece, early marriage and motherhood for girls existed. Even boys were expected to marry in their teens. Early marriages and teenage motherhood were typical. In the Roman Empire, girls could marry from age of 12 and boys from age 14. In the Middle Ages, under English civil laws that were derived from Roman laws, marriages before the age of 16 existed. In Imperial China, child marriage was the norm. 

In contrast to other pre-modern societies – and for reasons that are subject to debate – Northwest Europe was characterized by relatively late marriages for both men and women, with both sexes commonly delaying marriage until their mid-20s or even 30s. The data available for England suggest that it was already the case in the 14th century. This pattern was reflected in English common law, which was the first in Western Europe to establish statutory rape laws and ages of consent for marriage. In 1275, sexual relations with girls under either 12 or 14 (depending on interpretation of the sources) were criminalized; a second law was made with more severe punishments for under the age of 10 in 1576. In the late 18th and early 19th centuries, the British colonial administration introduced marriage age restrictions for Hindu and Muslim girls on the Indian subcontinent.

Jewish scholars and rabbis strongly discouraged marriages before the onset of puberty, but at the same time, in exceptional cases, girls ages 3 through 12 (the legal age of consent according to halakha) might be given in marriage by her father. By Judaism, the minimal girl age, for marriage, was 12 years and one day, “na’arah”, as mentioned in the ancient Talmud Mishnah books (compiled between 536 BCE – 70 CE, redacted in the 3rd century CE), Order Nashim Masechet Kiddushin 41 a & b. 

According to halakha, girls should not marry until they are 12 years and six months old, “bogeret”. Although Moses Maimonides mentions in the Talmud Mishneh Torah (compiled between 1170 and 1180 CE) that in exceptional cases girls ages three through 12 might be given in marriage by her father, he also clarifies in verse 3:19 of the same chapter that: “Although a father has the option of consecrating his daughter to anyone he desires while she is a minor or while she is a maiden, it is not proper for him to act in this manner”.

रोचक बात यह है कि ये तमाम लोग अवतार मौहम्मद की 9 वर्ष की आयु में आयशा के साथ शादी का उपहास उड़ाते हैं। भारतीय भी अन्यों की देखा देखी वही बातें करने लगते हैं, जबकि भारत में बाल विवाह की प्रथा 20वीं शताब्दी में भी आम थी। हालांकि मैं आगे साबित करूंगा कि जब अवतार मौहम्मद की आयशा से शादी हुई तब आयशा की उम्र कम से कम 15 वर्ष थी।

भारतीय रस्मो रिवाज की तर्ज़ पर यहां के मुसलमानों में भी यह प्रथा आ गई कि मां बाप रिश्ता तय करने लगे, और लड़के और लड़की की मर्ज़ी को केवल रस्म तक रहने दिया। अन्यथा इस्लाम इजाज़त देता है कि कोई भी बालिग़ लड़का या लड़की जब महसूस करे कि अब उसे पार्टनर की आवश्यकता है और पार्टनर के बिना उसे परेशानी हो रही है या डर है कि वह गुनाह कर लेगा, तो उसे शादी के बंधन में बंध जाना चाहिए लेकिन किसी भी हाल में शादी के बाहर शारिरिक रिश्ते में लिप्त नहीं होना चाहिए। 

डाक्टरी साईंस के अनुसार कोई भी युवक 18 वर्ष की उम्र में अपनी sexual life की चरम सीमा पर होता है जबकि हमारे समाज में उसको बच्चा ही समझा जाता है। लेकिन समाज ने शारिरिक आवश्यकता के स्थान पर कॅरियर और बैंक बैलेंस बनाने के बाद शादी के बंधन में बंधने की बात की, जिसमें बहुतेरे लोग ज़िन्दगी enjoy कर लेने के बाद बच्चे की ख़ातिर या बुढ़ापा अच्छे से गुज़र जाए इसलिए शादी के बंधन में बंधने लगे। समाज से नैतिक मूल्य यानी  social values यदि ग़ायब हो गईं, तो यह मानसिकता उसका बड़ा कारण है। 

इस्लाम ने जहां मर्द और औरत की शारीरिक आवश्यकता का ध्यान रखा है वहीं इस बात का भी ध्यान रखा है कि समाजी एवं नैतिक ताना बाना बना रहे और कौन बच्चा किस मां बाप से है यह सबको पता रहे। ज़रा सोचिए, भारत में जितनी कट्टरता जाति को लेकर है, यदि यही समाप्त हो गया तो फिर जाति का कैसे पता चलेगा, श्राध आदि की रस्में कैसे पूरी की जांएगी। 

आज के दौर में अनेक देश ऐसे हैं जहां महिलाओं का अनुपात मर्दों से बहुत अधिक है। कई पूर्वी युरोप के देश इस समस्या से पीड़ित हैं। आप यूटयूब पर वीडियो देख सकते हैं कि उन देशों में क्या हाल है, कैसे वहां की जवान लड़कियां हर मुमकिन कोशिश करती हैं कि किसी प्रकार किसी युवक की नज़रों में आ जाएं और वह उनसे शादी कर ले। ऐसे एक नहीं बल्कि असंख्य वीडियो आप को यूटयूब पर देखने को मिल जाएंगे जिससे अंदाज़ा होता है कि यह समस्या कितनी बड़ी है। ज़रा दिल पर हाथ रख कर सोचिए, यदि जवान और सुन्दर लड़कियों के लिए यह समस्या है कि कहीं वे बिना विवाह के न रह जाएं तो फिर विधवाओं से, जिन औरतों की उम्र कुछ अधिक हो गई है, जिन के पति ने उन्हें त्याग दिया है या जिनकी तलाक़ हो गई है, उनसे कौन शादी करेगा?

इस्लाम क़यामत तक के लिए बनाया गया दीन है क्योेंकि इस्लामिक मान्यता के अनुसार अवतार मौहम्मद के बाद कानून की पुस्तक लेकर कोई अन्य अवतार आने वाला नहीं है। फिर इस्लाम इस ज्वलंत समस्या को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता था। विशेषकर उस अरब समाज में जहां के भीषण रेगिस्तानी माहौल में, युद्ध के कारण या सफर में मर्दों की औरतोें से कहीं अधिक मौतें हो जाती थीं और औरतों का मर्दों के मुक़ाबले में अनुपात बढ़ना लाज़मी था। फिर युद्ध या सफर में या बीमारी के कारण मरने वाले मर्दों की विधवाओें की समस्या थी जिसका हल निकालना था। मर्दों का एक औरत से दिल भर गया और उसे छोड़ दिया तो इस्लाम को एक ओर इस समस्या का निवारण करना था कि मर्द ऐसा न करें परन्तु यदि किसी ने ऐसा कर ही दिया तो फिर उस महिला के लिए भी जीवन बसर करने का रास्ता निकालना था। 

किसी विधवा का, कुरूप औरत का या जिसकी उम्र अधिक हो गई है उसका भला कौन ख़्याल रखता जबकि नवजवान लड़कियों की बहुतात हो। केवल वही रख सकता था कि जिसके दिल में अल्लाह का डर या इंसानियत हो। इस्लाम सामाजिक ताना बाना भी नहीं बिगाड़ना चाहता था और समाज में moral values को बनाए रखना चाहता था। इसलिए आवश्यक था कि वह मर्द उस औरत से शादी कर ले। न तो दोनों के किसी नाजाएज़ रिश्ते में बंधने का डर हो और इस तरह औरत को social security यानी सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जा सके। 

मर्द और औरत का नेचर बनाने वाला बहुत अच्छी तरह जानता था कि दोनों की आवश्यकताएं क्या है। मर्द को सुकून की आवश्यकता है जबकि औरत समर्पण के भाव से ओत पोत होती है। कभी वह बाप और भाई को अपना समझती है तो शादी हो जाने के बाद पति की हो जाती है और एक समय आता कि बच्चों के आगे किसी को कुछ नहीं समझती। औरत की सैक्सुअल आवश्यकता को भी पूरा करने के लिए इस्लाम ने कहा कि जब तुम को महसूस हो कि शादी कर लेना चाहिए तभी कर लो। 

इस्लाम ने सैक्स को कभी भी टैबू नहीं समझा। मुसलमानों ने उसको टैबू बना दिया दूसरे धर्माें के सम्पर्क में आ कर। यदि नैचरल इंस्टिक्टस इन दिव्यात्माओं ने बनाई हैं तो इन से अधिक कौन है जो समझ सके कि मर्द की अपने नेचर के हिसाब से क्या जरूरत है और औरत की क्या है। जो इंस्टिंक्टस को पैदा करने वाली ताकतें हैं उनसे अधिक बेहतर कानून और कौन बना सकता है। इस्लाम ने उन नैचरल इंस्टिंक्टस को बांधने या बंद करने का नहीं बल्कि उसको जाएज़ हदों में सीमित करने का, रेगुलेट करने का काम किया है। 

इस्लाम जानता था कि मर्द और औरत जब मिलते हैं तो उनमें से कुछ में अधिक निकटता या प्यार का जज़बा पैदा होना लाज़मी है। ऐसे में मर्द को एक से अधिक शादी करने की अनुमति दी, और यदि एक पत्नी शारिरिक या मानसिक सुख नहीं दे पा रही या किसी और की चाहत है तो मसाज पार्लर में या थाईलैंड जैसे देश जाने के स्थान पर या अपनी चाहत से अवैध रिश्ता बनाने की जगह शादी या मुता की इजाज़त दी। हर ग़ैर शादी शुदा औरत भी आज़ाद है जिस नामहरम से चाहे शादी करे या यदि शादी में नहीं बंधना चाहती तो मुता कर ले। किस बच्चे का बाप कौन है और सामाजिक ताना बाना न बिगड़ जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए औरत को एक समय में एक से अधिक मर्द से रिश्ता बनाए रखने की अनुमति नहीं है। यदि औरत अपने पति से संतुष्ट नहीं है या कोई दूसरा जाएज़ कारण है तो वह कभी भी उस रिश्ते से बाहर निकल सकती है। यह जाएज़ कारण पति का कामसुख न दे पाना भी हो सकता है!

कलियुग के इस दौर में हम देखते हैं कि शादी के बाहर रिश्ते आम हो गए हैं, live-in relationships तक की खुले आम बात हो रही है और शादी महज़ औपचारिकता मात्र रह गई है। ऐसे जोड़े जो live-in relationships में रह रहे हैं और कोई पाबंदी या बंदिश नहीं चाहते वहां इस्लाम ने ऐसी सोच रखने वालों के लिए भी मुता का कानून बनाया था जिसके तहत कोई भी मर्द या औरत किसी ख़ास मुद्दत के लिए पहले से तय शर्तों के तहत किसी कान्टेªक्ट में बंध सकते हैं। यदि इस कान्टेªक्ट के तहत बच्चा पैदा होता है तो उसे बाप का नाम मिलेगा। 

ज्ञात हो कि मुता का कानून अवतार मौहम्मद के बाद कुछ वर्ष तक लागू था परन्तु फिर उस पर पाबंदी लगा दी गई। अली जानते थे कि यह कानून मर्द और गैर शादीशुदा औरत की शारिरिक जरूरत को पूरा करने के लिए है। यदि कोई विधवा या तलाक़शुदा औरत है लेकिन शादी नहीं कर सकती या कोई उससे शादी करने को तैयार नहीं है, और उसको किसी साथी की आवश्यकता है तो वह भी मुता कर सकती थी। कोई मर्द सफर में है या सिपाही कहीं दूर सरहद पर तैनात है या फौजें किसी दूसरे देश में पड़ाव डाले हुए हैं तो भी नाजाएज़ रिश्ता बने इसको रोकने के लिए इस्लाम जाएज़ हदों में रहते हुए अपनी शारिरिक आवश्यकता की पूर्ती करने को कहता है। यही कारण है कि अली ने कहा कि यदि मुता के कानून पर पाबंदी नहीं लगा दी गई होती तो क़यामत तक कोई मुसलमान ज़िना यानी adultery नहीं करता। साफ है कि इस्लाम सैक्स की आवश्यकता को समझता है, उसे आसान बनाना चाहता है पर साथ में विनियमित एवं नियंत्रित करना चाहता है। बलात्कार की तो किसी भी हाल में स्वीकृति नहीं देता, जैसा कि पुस्तिका के लेखक कह रहे हैं।

जो लोग इस्लाम पर आरोप लगाते हैं कि इसने शादी से बाहर रिश्ता बनाने वाले मर्द या औरत के लिए इतने सख़्त क़ानून बनाए, वे भूल जाते हैं कि यह कानून तो मूसा के दौर से चले आ रहे थे और इस्लाम ने इन में नर्मी बरती है। अवतार मौहम्मद से पहले तक यदि पति अपनी पत्नी पर विश्वासघात का आरोप लगा देता था या कोई भी किसी नफरत या गुस्से के कारण किसी महिला पर किसी से शारिरिक रिश्ता बनाने का आरोप लगा देता था तो उसे पत्थर मारे जाते थे जब तक कि वह मर न जाए। इस्लाम ने अवैध संबंध साबित करने के लिए 4 बालिग़ गवाहों की शर्त लगा दी। यानी यह कि यदि 1 या 2 या 3 गवाह भी हैं, तो यह सज़ा नहीं मिल सकती। ज़रा सोचिए, 4 बालिग़ गवाहों को दिखाकर यदि कोई अवैध संबंध बना रहा है तो फिर उसे social या moral values की ज़रा भी परवाह नहीं है तभी तो वह ऐसा कर रहा है। अन्यथा कौन अक़लमंद मर्द या औरत ऐसे हालात में अवैध रिश्ता बनाएगा कि चार गवाह खड़े हो जाएं। साफ है कि इस्लाम की नज़र में सामाजी ताना-बाना बना रहे, इसकी बड़ी अहमियत है। जो गुनाह कर भी रहे हैं, यदि वे खुलेआम समाज से बेपरवाह हो कर कर रहे हैं तो उन्हें तो सज़ा मिलनी ही चाहिए। 

यदि किसी ने गुनाह किया है और तौबा के माध्यम से पश्चाताप करना चाहता है तो अल्लाह हर प्रकार के गुनाहों को माफ कर देने की बात करता है यदि सच्चे दिल से इंसान को पश्चाताप है।

Quran.39.53:

Say, O My servants who have transgressed against themselves (by sinning), do not despair of the mercy of Allah. Indeed, Allah forgives all sins. Indeed, it is He who is the Forgiving, the Merciful

यदि तुम ने किसी को गुनाह करते देखा भी है तो इस्लाम तुम को किसी और से उसकी बात करने की अनुमति नहीं देता और ग़ीबत के लिए कहता है कि यह अपने मृत भाई का मास खाने के बराबर गुनाह है। सोचो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? अल्लाह जानता है कि जिन लोगों को उसने मासूम यानी गुनाहों से पाक बनाया है उनके अतिरिक्त हर कोई पर तमस यानी जुलमत अपने डोरे डालने में लगी है। वह भी उन पर अधिक शक्तियां लगाती है जिनके बारे में वह जानती है कि ये हक़ के मार्ग पर हैं या उस मार्ग पर आ सकते हैं। भारतीय पौराणिक कथाओं में विश्वामित्र का उदाहरण दिया जाता है जो मोक्ष के पथ पर अग्रसर थे लेकिन तमस यानी जुलमत ने एक सुन्दर नर्तकी के माध्यम से उन्हें नीचे खींच लिया। 

इस्लाम तुम से हर किसी के गुनाह छिपाने को कहता है इसलिए कि वह जानता है कि तमस यानी जुलमत उसकी कुदरत में उतनी ही शक्तिशाली है जितनी हिदायत की ताक़त। मुमकिन है कि जिस ने किसी कमज़ोर लम्हे में कोई गुनाह किया हो, और उस पर पश्चाताप कर रहा हो, और जिस समय तुम उसके गुनाह को दूसरों को बता रहे हो, उसका रब उसके गुनाह को माफ कर चुका हो। 

इसका एक और कारण भी है! इस्लाम के अनुसार कुछ गुनाहों की सज़ा उस समय तक नहीं दी जा सकती जब तक चार लोग उस गुनाह की गवाही न दें। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लाम जानता है कि हर आम इंसान कमज़ोरी के पलों से गुज़रता है। यदि किसी ने कोई गुनाह किया और तुम को उसकी ख़बर है तो तुम किसी दूसरे से उसकी बात नहीं कर सकते। उसको उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए जब तक कि गवाही देने को चार गवाह सामने न आ जाएं। चार गवाहों का सामने आने का अर्थ है कि अब यह उसका निजी गुनाह नहीं रहा बल्कि उस व्यक्ति के कर्म से समाजी ताना-बाना बिगड़ने का डर है। इसलिए उसको सज़ा देना लाज़मी है। 

जिनको तुम बहुत बड़ा ज्ञानी, बड़ा प्रचारक, गुरू आदि समझ रहे हो, यदि वह सत्यमार्ग की ओर अग्रसर है तो यह समझ लो कि तमस यानी जुलमत उसके खि़लाफ भी तमाम कारिंदे लगा देगी। मुमकिन है जब तुम उसके किसी बुरे कर्म को दूसरों को बता रहे हो, तमस यानी जुलमत ने तुम्हें छोड़ रखा हो पर उसके खि़लाफ अपने कारिंदों की फौज लगा रखी हो कि इसको सत्य मार्ग पर आगे बढ़ने से रोकें। 

इस सब वार्तालाप से उन perfectly pure हस्तियों की आवश्यकता और अधिक समझ आती है। क्यों आवश्यक है कि कुछ हस्तियां ऐसी हों जिन की पाकीज़गी की गवाही स्वयं तुम्हारे रब की ओर से हो, जिन पर तुम आंख बंद करके भरोसा कर सको और उन्हें अपना गुरू मानते हुए उनका अनुसरण कर सको। इन्हीं पाक हस्तियों की गीता सप्तऋषि कह कर बात कर रही है। दुनिया के गुरू तो समय के अवतार के खि़लाफ भी मोर्चाबंदी कर सकते हैं जैसा हमने महाभारत के युद्ध में देखा; जिनको उसने इंसान के लिए गुरू बनाया है उनके बताए मार्ग पर चलते रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे। 

अपने विषय पर वापिस पलटते हैं और आपको ईसा की ज़िन्दगी का एक वाक़ेया याद दिलाते हैं! John 7:53-8:11 के अनुसार फारसी लोग ईसा के सामने एक औरत को पकड़ कर लाए और उनसे पूछा कि क्यों न इस औरत को यहूदी क़ानून के अनुसार मार देना चाहिए जो अवैध सैक्स करती पकड़ी गई है।

यहां पर उल्लेखनीय है कि यदि औरत को अवैध रिश्ता बनाने के लिए पकड़ा गया होगा तो उसके साथ मर्द भी यक़ीनी तौर पर होगा। लेकिन केवल बेसहारा औरत को लाया गया जो दिखाता है male chauvinistic society में मर्द के लिए भिन्न क़ानून थे और औरत के लिए भिन्न। इस्लाम ने यहां पर भी बराबरी दिखाते हुए दोनों के लिए एक समान क़ानून बनाया। 

ईसा ने उनकी बात को नज़रअंदाज़ करना चाहा। लेकिन वह इस ज़िद पर अड़े थे कि ईसा अपना फैसला सुनाएं। ईसा ने उनसे कहा कि इस औरत पर पहला पत्थर वह मारे जिस ने स्वयं कभी गुनाह न किया हो। तमाम लोग पीछे हो लिए। 

यह तो उस समय की बात थी जब गुनाह समाज पर इतने भी हावी नहीं हुए थे। आज जब हम कलियुग के अंत की ओर अग्रसर है, बहुतेरे लोग विवाह को मात्र औपचारिकता मानते हैं, निचली और ऊपरी सोसायटी में रिश्तों की पाकदामनी कम से कम होती जा रही है और कई लोग इसे middle class syndrome नाम देते हैं तथा थाईलैंड जैसे देशों में मसाज पार्लर आदि के नाम पर सैक्स मंडियां बन चुकी हैं जहां पत्नी को घर में छोड़ बहुतेरे लोग व्यापार के नाम पर जाते हैं और घूम कर आते हैं, इस दौर में भी इस्लामी शिक्षा समाजी ताना-बाना बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। 

इस परिपेक्ष में आईए देखें इस्लाम में शादी का कानसैप्ट और पढ़ें अवतार मौहम्मद की शादियों के बारे में!

जैसा हम ने कहा कि इस्लाम चाहता है कि लड़का या लड़की स्वयं तय करें कि क्या अब उन्हें शादी की ज़रूरत है और फिर यह तय करें कि किससे शादी करना है। Puberty तक पहुंचने यानी बालिग़ होने से पहले शादी किसी भी हाल में जाएज़ नहीं। फिर जो लोग यह कहते हैं कि आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी के समय उम्र 6 वर्ष थी वे भूल जाते हैं कि स्वयं अवतार मौहम्मद द्वारा पेश किए गए इस्लाम में puberty तक पहुंचने से पहले लड़का या लड़की शादी नहीं कर सकते थे।

हां कुछ कारण तो हैं कि अवतार मौहम्मद या अन्य अहललबैत ने कई कई शादियां कीं। ये वही समझ सकता है जो समझता है कि नबी सुलेमान की इस्लामिक सोर्सेज़ के अनुसार 100 और बाईबल के अनुसार 700 पत्नियां और 300 concubines थीं। Concubines का dictionary में ‘उपस्त्री’ अनुवाद दिया है। कृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियां और 16000 या 16100 दूसरी पत्नियां थीं। विकिपीडिया ने इनको junior wives नाम दिया है। अब जऱा बताईए जूनियर वाईव्ज़ के क्या अर्थ है। आप जिसको लौंडी या कनीज़ कहते हैं, क्या उसी के क़रीब ये जूनियर वाईव्ज़ नहीं आतीं?

कहते हैं यह junior wives नरकुश नामी राजा की सेवा में थीं। जब कृष्ण ने नरकुश का वध किया तो इन तमाम महिलाओं ने अपने को कृष्ण को सुपर्दु कर दिया। इनकी गरिमा बचाए रखने के लिए कृष्ण ने इन्हें junior wives के रूप में रख लिया। 

जो लोग समझाने के लिए कहते हैं कि वे इसलिए कृष्ण के साथ थीं क्योंकि उन्होंने स्वयं को कृष्ण के सुपुर्द कर दिया था वे बताएं कि आज यदि 5 पत्नियां रखने वाला कोई मर जाए और उसकी पत्नियां अपने को मेरे सुपुर्द करें तो क्या मैं उन्हें junior wives बना सकता हूँ? इस्लाम ने यहां पर ही मुता का कानून दिया था लेकिन अवतार मौहम्मद के बाद यह क़ानून मुसलमानों में ज़्यादा समय तक राएज नहीं रह सका। साफ है कि कृष्ण को यदि यह विशेष छूट थी तो इसलिए कि वह अवतार थे। यदि हम अवतार मौहम्मद को उसी सोर्स का अवतार मानते हैं जिस सोर्स से कृष्ण थे, तो हमें समझना चाहिए कि अवतार को कुछ विशेष छूट दी जाती रही हैं और उनमें एक यह है। 

अवतार मौहम्मद पर 9 या 13 शादियां करने की आलोचना करने वाले भूल जाते हैं कि उनके लिए और भी विशेष कानून थे। जैसे आम मुसलमान पर दिन में केवल 17 रकअत नमाज़ फर्ज़ है। लेकिन अवतार मौहम्मद के लिए देर रात में पढ़ी जाने वाली सलातुल लैल भी फर्ज़ थीं। क्यों कोई नहीं कहता कि उनके लिए औरों से अधिक इबादत क्यों फर्ज़ की गई थी?

यदि आप ये समझाना चाहें कि कृष्ण उन सारी जूनियर वाईव्ज के पास नहीं जाते थे, तो जहां इतनी अधिक पत्नियों का उल्लेख है वहीं आठ पत्नियों से 80 पुत्रों और प्रत्येक 16000 junior wives से एक एक पुत्री और दस दस पुत्रों तक का उल्लेख है। कहीं पर केवल एक लाख से अधिक पुत्रों की बात लिखी है। 

मान्यता है कि नारद को समझ में नहीं आ रहा था कि कृष्ण इतनी सारी पत्नियों के पास कैसे जाते हैं तो एक रात नारद ने चैक करने की सोची। उनके अचंभे का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि कृष्ण सारी 16008 पत्नियों के पास ऐसे मौजूद थे जैसे बस एक के पास हों। 

इंसाफ और अदालत की बात करने वाले बताएं कि क्या उन पत्नियों की शारिरिक आवश्यकताएं नहीं थीं जिनसे कृष्ण ने शादी की थी? अवश्य थीं, और सृष्टि के मालिक से सीधा संबंध रखने वाले कृष्ण से आशा नहीं की जा सकती कि वह इन पत्नियों की तमाम आवश्यकताओं की चिंता नहीं करेंगे। उनमें से कुछ आवश्यकताएं पत्नी होने के तहत उनके अधिकार थे।

आप यह अवश्य कह सकते हैं कि यह सब झूठी मनघडं़त कहानियां हैं जो पौराणिक पुस्तकों में आ गईं। यदि ऐसा है तो समझिए कि ज़ुलमत यानी तमस कभी भी नहीं चाहती कि हक़ के नुमाईंदों की सही शिक्षा आप तक पहुंचे और आप उसे ग्रहण करें। यही कारण है कि चाहे कृष्ण का समय हो या मौहम्मद का, जुलमत यानी तमस के कारिंदों ने अनेक ऐसी बातें किताबों में दाखि़ल कर दीं कि हर ज़माने में वे लोगों को हक़ और हक़ीक़त की समझ से दूर रखने का काम करें। 

मैं तो साबित करता आ रहा हूँ कि जिस दिव्यात्मा का कोई अंश कृष्ण के शरीर में काम कर रहा था, वही सारे अंश अहललबैत के शरीर को आफिस बना कर इंसानियत को सत्यमार्ग की डगर पर लाने और चलाने के काम में लगे थे। यही कारण है कि मेहदी को आज भी बहुतेरे लोग ‘बक़ियातुल्लाह’ यानी ‘अल्लाह में का बाक़ी’ कहते हैं। इस पर भी मेरा एक लैक्चर है जो आप सुन सकते हैं। 

जिस दिन आप को कृष्ण की 16000 से अधिक शादियों का राज़ समझ में आ जाएगा उसी दिन अवतार मौहम्मद की 9 या 13 पत्नियां और हसन की 10 शादियों का राज़ भी समझ में आ जाएगा। 

अब आईए, अवतार मौहम्मद की पत्नियों का भी कुछ हाल जान लें। उनकी पहली पत्नी ख़्वेलद इब्ने असद और फातिमा बिन्ते ज़ाएदा की पुत्री ख़दीजा थीं जिनका जन्म 555 ईस्वी में हुआ था जबकि अवतार मौहम्मद का जन्म 570 ईस्वी में हुआ। इस प्रकार ख़दीजा अवतार मौहम्मद से 15 वर्ष बड़ी थीं। जब दोनों का विवाह हुआ तो ख़दीजा की उम्र 40 वर्ष और अवतार मौहम्मद की 25 वर्ष थी। इसके 15 वर्ष बाद, अवतार मौहम्मद जब स्वयं 40 वर्ष के थे तब उन्होंने अपने अवतार होने की घोषणा की और इस घोषणा के 10 वर्ष बाद तक ख़दीजा ज़िन्दा रहीं। यानी जब ख़दीजा का देहान्त हुआ तो उनकी उम्र्र 65 वर्ष थी और अवतार मौहम्मद की उम्र 50 वर्ष थी। 

अवतार मौहम्मद पर womaniser होने का आरोप लगाने वाले ग़ौर करें कि भले ही खदीजा की उम्र 65 वर्ष हो गई हो, उन्होंने उनकी ज़िन्दगी में दूसरी शादी की नहीं सोची। अपनी स्वयं की उम्र भी 50 वर्ष हो जाने के बावजूद उन्होंनेे दूसरी शादी की नहीं सोची। इसका साफ अर्थ है कि बाद में की गई शादियां किसी ख़ास परिस्तिथी में, कोई ख़ास संदेश देने के लिए, या किसी विधवा या वृद्धा को सहारा देने के लिए की गई थीं। 

आरोप लगाने वाले अकबर से लेकर महाराजा रंजीत सिंह पर, बाईज़ैनटीन शहंशाहों से लेकर उस्मानी खलीफाओं पर आरोप नहीं लगाते जिन्होंने ताक़त के नशे में सैकड़ों औरतों को अपने हरम में रखा। यह लोग एक अंग्रेज़ कवि का भी बखान करने से नहीं थकते जिसने कथित तौर पर सैकड़ों युरोपीय औरतों से शादी के बाहर संबंध बनाए। आज फिल्म एक्टर्स से लेकर राजनीतिज्ञ तक, बड़े उद्योगपतियों से लेकर कालेज में पढ़ रहे दौलतमंद घरानों के बच्चों तक, इनमें अधिकतर यदि आत्मचिंतन करें तो पाएंगे कि वे कहां कहां पर राह से भटके हैं। जुलमत के कारिंदे इसी काम में तो लगे हैं कि आप को उस मार्ग से भ्रमित कर दें जो आप की बेहतरी का मार्ग है। वे लोग जो हक़ के मार्ग की तलाश में हैं, उन पर विशेष तौर पर जुलमत यानी तमस अपनी तमाम ताक़तें लगा देती है ताकि या तो वे गुमराह हो जाएं और उस पथ पर चलने लाएक़ न रह जाएं या उनको बदनाम करके उनके शब्दों की ताक़त को छीन ले। 

ग़ौर करने की बात यह है कि अवतार मौहम्मद ने यदि अपनी ज़िन्दगी में 9 या 13 औरतों से शादी की तो उन्होंने उनसे शादी ही की, हरम नहीं बनाए, और न ही किसी से अवैघ संबंध रखे जैसा कि पुस्तिका के लेखक प्रथम पृष्ट पर छपी फोटो में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। 

यह भी याद रखने की बात है कि अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी के अंत तक 4 शादियों तक सीमित रहने का कानून भले ही आ गया हो, उनकी ज़िन्दगी में मुता करने का कानून मौजूद था, जिसके अनुसार किसी भी औरत को सहारा देने के लिए या किन्हीं और कारणों से मुता किया जा सकता था। मुता का कानून मुसलमानों ने अवतार मौहम्मद के देहान्त के बाद त्यागा। इसलिए हमें नहीं पता कि उनकी पत्नियों में कितनी से निकाह हुआ था, कितनी से मुता। 

भारत के एक आलिम का किस्सा बताए चलते हैं। वह बेहद बीमार थे। आवश्यकता थी कि कोई आया उनकी सेवा के लिए रखी जाए। पर कोई नामहरम उनको हाथ लगाए, इस्लाम इसकी स्वीकृति नहीं देता। इसके लिए पहले यह निश्कर्ष निकाला गया कि उनकी सेवा के लिए ऐसी औरत को ढूंढा जाए जिससे वह मुता कर सकें। मैंने पहले भी बताया कि यदि कोई मर्द लंबे सफर में है और उसको शारिरिक आवश्यकताओं की पूर्ती करना है, कोई मर्द और अविवाहित औरत शादी नहीं कर सकते लेकिन एक दूसरे से क़रीब आना चाहते हैं, या ऐसे और भी कारण हो सकते हैं जब मुता जाएज़ किया गया था। 

ईश्वर द्वारा बताए गए रास्ते से कोई संबंध बनाना ही उसको जाएज़ करता है। मुता पर यदि पाबंदी नहीं होती तो इस्लाम ने live-in relationship या friendship के नाम पर बनने वाले रिश्तों को भी जाएज़ करने का रास्ता बताया था। 

इस्लाम मर्द और औरत दोनों की ज़रूरतों को जानता है और केवल उन ज़रूरतों की पूर्ती में अल्लाह की याद दिलाकर उन्हें जाएज़ करता है। यही तो शादी का भी कानसैप्ट है; जो रिश्ता अन्यथा अवैध है वह अल्लाह की याद के साथ बनता है तो शादी कहलाती है। दूसरे इस्लाम यह नहीं चाहता कि कोई अवैध ढंग से अपनी वासना की पूर्ती करे और यदि बच्चा पेट में आ जाए तो उसका क़त्ल करे। बल्कि इस्लाम उस बच्चे को भी बाप का नाम देना चाहता है। यदि बच्चा नहीं चाहते तो एहतियात करो, यदि बच्चा हो जाए तो तुम उसको मारने का पाप नहीं कर सकते क्योंकि इस्लाम की नज़र में एक बेगुनाह को मारना तमाम इंसानियत का क़त्ल करने के बराबर है। 

इस्लामी इतिहास की मशहूर किताबों तारीखे इब्ने हश्शाम और तारीखे इब्ने सआद के अनुसार ख़दीजा मक्का की बहुत ही इज़्ज़तदार और ऐसी मालदार महिला थीं कि जब व्यापारिक क़ाफिले सीरिया आदि के लिए जाते थे तो उसमें केवल ख़दीजा के ऊंटों की संख्या इतनी होती थी जितनी तमाम कुरैश के व्यापारियों के होते थे। इसके अतिरिक्त आप अपना माल दूसरों को बेचने के लिए शिरकत पर भी दिया करती थीं। 

किताबों में दर्ज है कि अवतार मौहम्मद से शादी के पूर्व एक बार ख़दीजा ने सपने में देखा कि तमाम आसमान नूरानी हो गया और एक बहुत ही तेज़ किरणें डालने वाला सूर्य उनकी गोद में आ गया जिसकी रौशनी से तमाम सृष्टि दमकने लगी। ख़दीजा ने अपना सपना अपने चाचा के पुत्र वरक़ा से बताया जो बेहद ज्ञानी और रूहानी व्यक्ति थे। वरक़ा ने बताया कि तुम को मुबारक हो, क्योंकि तुम को शीघ्र ही आख़िरी रसूल की पत्नी होने का दर्जा मिलेगा जिसके सामने आने का समय क़रीब आ रहा है। 

ज्ञात हो कि उस समय यह बात आम थी कि अंतिम रसूल के आने का समय करीब है। कुरान भी इसकी गवाही देते हुए कह रहा है कि यह भविष्यवाणी पहले की तमाम किताबों में दे दी गई थी। सलमान फारसी के लिए भी मशहूर है कि उन्होंने ईसाईयों की किताबों में पढ़ा कि अंतिम रसूल के आने का समय क़रीब है और जब उन्होंने सुना कि मक्का में किसी व्यक्ति ने अपने अंतिम रसूल होने का दावा किया है तो उस खोज में मक्का का सफर किया। 

अवतार मौहम्मद की ईमानदारी की ख़बर ख़दीजा को भी थी। उन्हें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो ईमानदारी के साथ उनका माल ले जाए और उनके व्यापार में अधिक से अधिक लाभ दे। उन्होंने अवतार मौहम्मद को उनके क़ाफिले की अगुवाई करने का न्योता दिया जिनकी उम्र अभी 25 वर्ष भी नहीं थी। अभी 15 वर्ष से अधिक बाक़ी थे जब मौहम्मद ने अपने अवतार होने का दावा किया। ऐसे समय में उन्होंने ख़दीजा के व्यापारिक क़ाफिले को लेकर बसरा का सफर किया। रास्ते में नस्तूरी राहिब का वाक़ेया पेश आया जिसका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। मौहम्मद एक सूखे पेड़ के नीचे ठहरे तो लोगों ने देखा कि चंद लम्हे में वह सूखा पेड़ हरा भरा हो गया। नस्तूरी राहिब पुरानी खुदाई किताबें ले आया जिन में आने वाले अवतार का हुलिया ब्यान किया गया था। वह अपनी किताब को पढ़ता जाता था और मौहम्मद के हुलिये से मिलाता जाता था और कहता जाता था कि ईसा पर इंजील पुस्तक भेजने वाले खुदा की क़सम ये वही हैं जिनकी भविष्यवाणी ईसा दे गए हैं और कोई शक नहीं है कि यही अंतिम ज़माने के रसूल हैं जिनकी खबर हमारी किताबों में दी गई हैं। 

यह व्यापारिक क़ाफिला जब वापिस पलट रहा था और मक्का के करीब था तो वह दोपहर का समय था। ख़दीजा को जब यह पता चला कि उनका क़ाफिला वापिस आ रहा है तो वह छत पर गईं। उन्होंने देखा कि मौहम्मद इस हाल में वापिस आ रहे हैं कि उनके चेहरे से एक नूर रौशन है और उनके सिर पर दो पंछी इस तरह अपने परों से साया किए हुए हैं कि धूप उन पर नहीं पड़ने पाती। वापिस आने पर उनके गुलाम मैयसरा और उनके रिश्तेदार खज़ीमा ने सफर के हालात और मार्ग में जो अजीब बातें देखी थीं वे बताईं तो ख़दीजा को यक़ीन हो गया कि यही वह व्यक्ति है जो अंतिम ज़माने का रसूल होगा। 

40 वर्ष की आयु में जब मौहम्मद ने अपने अवतार होने की घोषणा की जिसके फलस्वरूप तमाम मक्का उनका दुश्मन हो गया और ज़िन्दगी में मुसीबतें आना प्रारंभ हुई तो भी इन दोनों की ज़िन्दगी में सब्र और सुकून ऐसा था जैसे वे एक दूसरे को देखकर जीते थे। यही सुकून किसी शादी को सम्पन्न बनाता है और यह न मिलने पर ही कोई मर्द किसी दूसरे की ओर आकर्षित होता है। 

जब ख़दीजा ने महसूस किया कि अवतार मौहम्मद को इस्लाम की शिक्षा फैलाने के लिए माल-ओ-दौलत की आवश्यकता है तो अपना तमाम माल और दौलत खुशी खुशी अवतार मौहम्मद को भेंट कर दिया कि जैसे चाहें खर्च करें। यहां तक कि दस वर्ष के भीतर वे दिन भी आए जब कई कई दिन भूखे रहना पड़ता और पेड़ों की छाल खाकर या पेट पर पत्थर बांधकर गुज़ारा करना पड़ता। 

निज़ामुद्दीन हसन इब्ने मौहम्मद निशापुरी ने अपनी किताब तफसीरे निशापुरी में और फख़रूद्दीन राज़ी ने अपनी किताब तफसीरे कबीर में लिखा है कि एक रोज़ अवतार मौहम्मद ख़दीजा के पास ग़मगीन हालत में आए। ख़दीजा ने पूछा कि आप क्यों ग़मगीन हैं तो अवतार मौहम्मद ने बताया कि हर ओर सूखा पड़ा है और लोगों की परेशानी मुझ से नहीं देखी जाती। यह सुनते ही ख़दीजा ने तमाम कुरैश को जमा किया जिसमें अबू बक्र भी थे। अबू बक्र का ब्यान है कि ख़दीजा ने अशरफियां निकलवा कर इतना ढेर लगवा दिया कि जो लोग मेरे सामने बैठे थे वे अशरफियों के कारण मेरी निगाहों से छिप गए। फिर ख़दीजा ने तमाम कुरैश को संबोधित करते हुए कहा कि तुम सब गवाह रहो कि यह माल और इसके अतिरिक्त जितना भी मेरा माल जहां पर भी है वह सब आज से मेरा नहीं बल्कि मौहम्मद का है जिसे मैंने अपनी रिज़ामंदी और खुशी से उनको दिया और वह अब इसके मालिक हैं, जिस तरह चाहें खर्च करें और मुझ से कोई मतलब नहीं। 

यही बात करते हुए कुरान ने कहा कि ‘ऐ रसूल हम ने तुम को मुफलिस और मोहताज पाया तो ग़नी बना दिया’। माल तो ख़दीजा का था लेकिन खुदा कह रहा है कि हमने तुम को मालदार बना दिया। यदि कोई खुदा की राह में कुछ कर्म करता है तो खुदा उसको अपना कर्म तक मान लेता है। 

सहीह तिरमीज़ी के अनुसार आयशा कहती थीं कि मैंने किसी औरत पर इतना रश्क नहीं किया जितना ख़दीजा पर किया। हालांकि आयशा से अवतार मौहम्मद ने शादी की तो ख़दीजा के देहान्त को कुछ वर्ष बीत चुके थे। आयशा कहती हैं कि मैंने रसूल से कई मरतबा कहा कि आप तो ख़दीजा को कुछ इतना समझते हैं कि जिससे पता चलता है कि दुनिया में ख़दीजा के सिवा आप की और काई औरत ही नहीं है। 

सहीह मुस्लिम और सहीह बुख़ारी में आयशा से इसी तर्ज़ की एक रिवायत दर्ज है जिसके अनुसार अवतार मौहम्मद हर लम्हे ख़दीजा को याद किया करते थे और कहते थे कि मैं क्या करूं इसलिए कि खुदा ने ख़दीजा की मौहब्बत मेरे दिल में भर दी है। यह इस बात की दलील है कि अवतार मौहम्म्द को जो खुशी और सुकून ख़दीजा के साथ बिताए वर्षों में मिला वह बाद में कभी नहीं मिला। यह इस बात की भी दलील है कि बाद में की गई शादियां विभिन्न कारणों से की गईं। इन पत्नियों में कई आम सोच की औरतें थीं और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ अवतार मौहम्मद को खुदा द्वारा दिए गए मक़ाम की भी पूरी समझ नहीं रखती थीं, शायद यह भी नहीं कि उनके पति खुदा की ओर से रसूल हैं। इतिहास की किताबों में मौजूद इनकी बातें बताती हैं कि इनमें आम औरतों के समान एक दूसरे से ईष्र्या, आदि की भावना भी मौजूद थी। यहां तक कि अवतार दूसरे के पास न जाएं और अपने ही पास आएं, इस कोशिश में भी लगी रहती थीं। 

मौहम्मद हुसैन हैकल और अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी किताबों में एक हदीस ब्यान की है जिसके अनुसार एक दिन अबू बक्र और उमर ने अवतार मौहम्मद से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। जब वे उनके सामने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि अवतार मौहम्मद ख़ामोश बैठे हैं और उनके इर्द गिर्द उनकी कुछ पत्नियां बैठी हैं जो अपने पति से अधिक रक़म की मांग कर रही थीं क्योंकि वे ग़रीबी में नहीं रह सकतीं। इस पर अबू बक्र और उमर दोनों ने कहा कि यदि मेरी पुत्री ने आप से कभी भी अधिक रक़म की ख़्वाहिश की तो मैं उसके बाल पकड़ कर उसे सज़ा दूंगा। अबू बक्र और उमर दोनों ने खड़े होकर अपनी अपनी बेटी यानी आयशा और हफसा के बाल पकड़ कर खींचे और उन्हें तन्बीह की कि वे अल्लाह के रसूल से वे सब न मांगें जो वह नहीं दे सकते। 

उपरोक्त इस वाक़ेय के बाद ही कुरान की यह आयत अवतरित हुईः 

Quran.33.28-29:

O prophet! Say to thy consorts: “If it be that ye desire the life of this world and its glitter, - then come! I will provide for your enjoyment and set you free in a handsome manner.

But if ye seek Allah and his apostle, and the home of hereafter, verily Allah has prepared for the well-doers amongst you a great reward.”

यहां पर ग़ौर करने की बात यह है कि यह उस समय का वाक़ेया है जब अवतार मौहम्मद की आयशा और हफसा से शादी हो चुकी थी। यानी साफ है कि मदीना के अंतिम कुछ वर्षों का वाक़ेया है जब अरब के बड़े हिस्से में लोग इस्लाम कुबूल कर चुके थे और कई युद्धों में मुसलमानों को फतेह मिल चुकी थी। रिवायतों के अनुसार खंदक़ के युद्ध में विजय के बाद तो इतना माल हाथ लगा था कि सोने को काटने के लिए कुलहाड़ी प्रयोग करना पड़ी थी। 

उपरोक्त विवरण से साफ है कि इस समय भी अवतार मौहम्मद ऐसी सादा जिन्दगी गुज़ार रहे थे कि उनकी पत्नियों को उस खर्चे में ज़िन्दगी बसर करने में कठिनाई हो रही थी। किताबों में अनेक उदाहरण मौजूद हैं कि कैसे अवतार मौहम्मद या अन्य अहललबैत उनके पास जो कुछ है वह ग़रीबों में बांट देते थे और कितने ही समय ऐसे गुज़रे कि उन्होंने अपने सामने की रोटी उठा कर किसी को दे दी और स्वयं भूखा ही सोना पड़ा। आयशा और हफसा का यह विवरण भी दर्शाता है कि पुस्तिका के लेखक द्वारा प्रथम पष्ष्ठ पर दी गई फोटो झूठी है और हक़ीक़त से उसका कोई नाता नहीं। 

किताबों में यह भी दर्ज है कि अवतार मौहम्मद रात के अंधेरे में कब्रिस्तान चले जाया करते थे जहां वह इबादत करते और मुर्दा लोगों के हक़ में दुआ करते थे। एक बार उनकी एक पत्नी ने उनका पीछा किया केवल यह जानने के लिए कि वह कहीं और तो नहीं जा रहे और पाया कि उनकी मंज़िल कब्रिस्तान थी। 

पत्नियों द्वारा अधिक रक़म की फरमाईश भी ख़दीजा की अहमियत को दर्शाती है कि जिन्होंने अपनी तमाम दौलत अल्लाह के रसूल और उनकी खुशी की ख़ातिर न्योछावर कर दी और इस हाल को पहुंची कि शेबे अबूतालिब में 3 वर्ष की भूख और तकलीफ के कारण वहां से बाहर आने पर अधिक समय ज़िन्दा न रह सकीं। 

जो लोग अवतार मौहम्मद को womanizer और sex addict कहते है वे बताएं कि क्या इस आचरण का कोई व्यक्ति 25 वर्ष की उम्र में अपने से 15 वर्ष बड़ी महिला से विवाह करेगा और उस विवाह को अगले 25 वर्ष तक निभाएगा जब पत्नी की आयु 65 वर्ष हो चुकी हो। यदि कोई womanizer और sex addict है तो यह बीमारी उसके आचरण में पहले दिन से दिखाई देती है। ऐसा मुमकिन नहीं कि जीवन के उस हिस्से में जब sexual prowess सब से अधिक होती है कोई इंसान अपनी सारी ज़िन्दगी अपनी उम्र से 15 वर्ष बड़ी किसी महिला के साथ गुज़ार दे और फिर ज़िन्दगी के अंतिम दस वर्ष में उसके चरित्र में यह बीमारी देखने को मिले।

फिर इस प्रवृत्ती का व्यक्ति समाज की सब से सुन्दर समझी जाने वाली महिला से विवाह करेगा न कि विभिन्न क़बीलों में अम्न पैदा करने की ख़ातिर, विधवाओं को सहारा देने की ख़ातिर, रूढ़ीवादी रीति रिवाज को समाप्त करने की ख़ातिर, वह भी ऐसी महिलाओं से जिन में से कोई भी अधिक सुन्दरता के लिए नहीं जानी जाती थी।

यदि ऐसा करना होता तो 40 वर्ष की उम्र में मक्का वालों का वह प्रस्ताव ही ले लेते जिसके अनुसार यदि मौहम्मद दौलत चाहते तो वे दौलत के अंबार लगाने को तैयार थे, यदि ताक़त चाहते तो वे सरदारी देने को तैयार थे और यदि औरतें चाहते तो वे अरब की सब से सुन्दर औरतें उनके क़दमों में ला देने के लिए तैयार थे। 

ऐसा व्यक्ति जो बनी हाशिम के सरदार के घराने में पैदा होने और अपनी नाम और इज़्ज़त के कारण जिस महिला से चाहता उससे विवाह कर सकता था वह केवल    विधवाओं, बेसहारा और रूढ़ीवादी रीति रिवाज समाप्त करने की ख़ातिर विवाह करता नज़र आता है। कुुछ से विवाह करता है कि उनको सामाजिक सुरक्षा मिल सके और कुछ से इसलिए कि उनको सहारा मिल सके, और विशेषकर इसलिए कि उनके मानने और चाहने वाले उनके बाद भी विधवा, गरीब, बूढ़ी या तलाक़शुदा औरतों को सहारा और सामाजिक सुरक्षा देने हेतु विवाह करते रहें। 

अफसोस कि मुसलमानों में भी सबसे सुन्दर अविवाहित स्त्री से विवाह करने का चलन आम हो गया!

ख़दीजा के दुनिया से जाने के बाद ही अवतार मौहम्मद ने कोई शादी की। इनमे पहली शादी 50 वर्ष की उम्र में सौदा बिन्ते ज़माह से की, जो विधवा थीं और जिनकी उस समय उम्र करीब 37 वर्ष थीं। सौदा के पति का एबीसीनिया से वापसी में देहान्त हो गया था। सौदा मुस्लिम महिला थी जिसने अपने धर्म के कारण एबीसीनिया से अरब की यात्रा की थी। यदि वह एबीसीनिया वापिस जाती तो उसके परिवार वाले धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लेने के लिए उनको यातनाएं देते जैसा कि वे लोग अन्य लोगों को यातनाएं दे रहे थे जिन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया था। धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लेने वाले लोगों पर वे जुल्म करते और जबरन उन्हें अपने पुराने धर्म में वापिस पलट आने के लिए मजबूर करते। 

इब्ने कसीर के अनुसार “She was a tall and large black-skinned woman, with a jolly, kindly disposition”. यानी विधवा, बहुत लंबी, मोटी और काली। इब्ने कसीर आगे लिखते हैं कि मक्का में लोग अचंभे में थे कि मौहम्मद ने ऐसी विधवा से विवाह किया है जो न तो कमउम्र थी और न सुन्दर। सौदा से शादी करके वह अरबों की सोच को एक बड़ा धच्का दे रहे थे जिनके लिए किसी असुन्दर विधवा से शादी करने का कोई कारण नहीं बनता था।  

अवतार मौहम्मद ने जैनब बिन्ते खुज़ैमाह से शादी की जब उनके पति अब्दुल्लाह इब्ने जैह्श ओहद के युद्ध में शहीद हो गए। वे अपने समय की सबसे उदार और दानी महिला के रूप में प्रख्यात थी। लोग उन्हें ‘ग़रीबों की मां’ कह कर पुकारते थे। उनसे विवाह करके अवतार मौहम्मद ने उनकी गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा को बरक़रार रखा।

उन्होंने उम्मे सलमाह से विवाह किया जिनका असली नाम हिन्द था - यानी मुमकिन है कि वह भारत से थीं - उनका विवाह अब्दुल्लाह अबू सलामाह से हुआ था। यह दोनों एबीसीनिया जाने वाले पहले मुस्लिम क़ाफिले में शामिल थे। उम्मे सलमाह ने दुनिया को छोड़ रूहानियत का मार्ग अपना लिया था। वह अपनी धार्मिकता और बुद्धिमत्ता के लिए प्रख्यात थीं। जब उनके पति का देहान्त हुआ तब उनकी उम्र बहुत अधिक हो चुकी थी और उनके साथ कई अनाथ बच्चे थे। यही कारण था कि अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह किया। 

सफिया यहूदी कबीले बनु नादिर के सरदार हुयई इब्ने अख़्तब की पुत्री थी। उनके पति खैबर के युद्ध में मारे गए थे और पिता बनु कुरैज़ा से थे जिनको क़त्ल किया गया। इसका विवरण आगे आएगा। पति के मारे जाने के बाद उनको युद्ध-बन्दी के रूप में लाया गया था। एक यहूदी सरदार की पुत्री तिरस्कार और अवमानना से न गुज़रे इसलिए अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह कर लिया। इस प्रकार उन्होंने बनू इज़राइल से भी अपना रिश्ता क़ायम कर लिया।

जुवैरिययाह जिन्हें बरराह भी कहते हैं क़बीला बनू मुस्तालीक़ के सरदार अल-हारिस की बेटी थी। बनू मुस्तालीक़ से युद्ध के बाद मुसलमानों ने 200 लोगों को बन्दी बनाया  औरतें और जिनमें बच्चे भी थे। अवतार मौहम्मद ने जुवैरिययाह से विवाह कर लिया। इस पर मुसलमानों ने कहा कि इस शादी के बाद तमाम क़ैदी तो अल्लाह के रसूल के संबंधी हो गए, इसलिए उन्हें बन्दी नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सबको आज़ाद कर दिया। इस शराफत से प्रभावित होकर समूचा क़बीला बनू मुस्तालीक़ मुसलमान हो गया। यह बहुत ही बड़ा क़बीला था। इस उदारता ने तमाम अरब क़बीलों को मुसलमानों और इस्लाम से क़रीब कर दिया। आलोचक जो युद्ध-बन्दियों को लेकर तरह तरह के आरोप लगाते हैं वे बताएं कि क्या वे सही करते हैं? 

अवतार मौहम्मद की एक पत्नी मयमूना थी जिनका नाम बरराह बिन्ते अल-हारिस अल-हिलालियाह था। उनके दूसरे पति अबू रूह्म इब्ने अबदिल उज़्ज़ा अल-अमीरी के देहान्त के बाद उन्होंने अवतार मौहम्मद के सामने आकर अपने को उनके सामने पेश किया। अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह कर लिया जिसके फलस्वरूप कुरान की एक आयत इस बारे में अवतरित हुई। 

अवतार मौहम्मद ने एक विवाह उम्मे हबीबाह से किया जिनका नाम रामलाह बिन्ते अबू सुफियान था। वह उबैदुल्लाह इब्ने जैह्श की पत्नी थी। मुसलमानों ने जब एबीसीनिया की ओर दूसरी हिजरत की तो उसमें यह दोनों शामिल थे। वहां उबैदुल्लाह ने ईसाई धर्म अपना लिया पर यह इस्लाम पर रहीं उस समय भी जब उनका पिता अबू सूफियान फौजें जमा कर रहा था मुसलमानों को समाप्त कर देने के लिए। अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह किया ताकि उन्हें सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान किया जा सके। 

ज़ैनब बिन्ते जैह्श से अवतार मौहम्मद का विवाह पुराने रूढ़ीवादी रस्म-ओ-रिवाज को तोड़कर इस्लामी कानून की पूर्ती और उसपर अमल करने हेतु किया गया। ज़ैनब का विवाह ज़ैद इब्ने हारिस से हुआ था जिनको अवतार मौहम्मद ने पाला था जिसके चलते लोग उनको मौहम्मद का बेटा कहकर पुकारने लगे थे। ज़ैद ने ज़ैनब को तलाक़ दे दिया जिसके पश्चात अवतार मौहम्मद ने ज़ैनब से विवाह किया।

इस्लाम ने मुंह बोला बेटा या मुंह बोले भाई या बहन का इंकार किया है। किसी को बेटा या भाई या बहन कह देने से वह महरम नहीं हो जाता और न मुंह बोले बेटे की पत्नी बहू हो जाती है। जबकि अरब में यह मान्यता थी कि मुंह बोले बेटे की पत्नी से शादी नहीं हो सकती। कुरान ने इसका खंडन किया तो अवतार मौहम्मद ने इस प्रथा को तोड़ने हेतु ज़ैनब से विवाह किया। इस विषय पर कुरान की कई आयतें आई हैं जिन पर मैं एक लैक्चर में चर्चा कर चुका हूँ। 

उमर जो दूसरे ख़लीफा हुए उनकी पुत्री हफसाह बिन्ते उमर के पति खुनैस इब्ने हुज़ैफाह बद्र के युद्ध में शहीद हुए थे जिसके तदोपरांत अवतार मौहम्मद ने हफसाह से विवाह कर लिया। इसके अतिरिक्त अबू बक्र जो कि पहले ख़लीफा हुए उनकी पुत्री आयशा से भी अवतार मौहम्मद ने विवाह किया। आयशा अवतार मौहम्मद की अकेली पत्नी हैं जिनकी पहले कोई शादी नहीं हुई थी हालांकि उनकी जिस व्यक्ति से शादी तय थी उसने शादी करने से इंकार कर दिया था जब अबू बक्र ने इस्लाम कुबूल कर लिया था।

अबू बक्र और उमर ने मुसलमानों में बड़ा दबदबा बना रखा था। यह इस बात से भी साबित है कि अवतार मौहम्मद के बाद यही दोनों पहले और दूसरे ख़लीफा हुए। मेरी समझ के अनुसार यह दोनों शादियां सियासी शादियां थीं और इससे अवतार मौहम्मद का मक़सद दोनों को अपने से क़रीब बांधे रखना था। यदि यह कारण नहीं था तो बस एक कारण और समझ में आता है आयशा से शादी करने का जो एक रिवायत के अनुसार अवतार मौहम्मद की पुत्री फातमा से पांच वर्ष छोटी थीं और दूसरी रिवायतों के अनुसार भी उम्र में कोई बहुत अधिक अंतर नहीं था। जिस प्रकार जै़नब बिन्ते जैह्श से अवतार मौहम्मद का विवाह पुराने रूढ़ीवादी रस्म-ओ-रिवाज को तोड़कर इस्लामी क़ानून की पूर्ती और उस पर अमल करने हेतु किया गया ताकि दुनिया को यह पैग़ाम दे सकें कि इस्लाम में जो सगे संबंधी महरम हैं उनके बाहर तुम किसी को महरम नहीं बना सकते। यानी किसी को बेटे जैसा कह देने से कोई बेटा नहीं हो जाएगा, किसी को भाई जैसा या बहन जैसा कह देने से, जैसे cousins के लिए आम-तौर पर कहा जाता है, वह सगा भाई या बहन नहीं हो जाएंगे, उसी प्रकार बेटी जैसा कोई नहीं हो जाएगा यदि वह बेटी की उम्र का है। महरम और नामहरम रिश्तों की पासदारी तुम्हें वैसे ही पाकदामिनी के साथ करनी है; उन महरम रिश्तों से बाहर यदि दोनों पक्ष चाहें तो ‘बेटी-जैसी’ या ‘बाप-जैसे’ रिश्तों से या ‘मां-जैसी’ या ‘बेटे-जैसे’ रिश्तों से विवाह के बंधन में जुड़ सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह समाज में हो नहीं रहा है, खूब धड़ल्ले से हो रहा है, विशेषकर समाज के उस तब्क़े में जो दौलतमंद तबक़ा कहा जाता है, परन्तु वहां पर हम ‘बेटी-जैसी’ या ‘बेटे-जैसा’ नहीं कहते जैसा हम अवतार मौहम्मद के लिए बेहिचक कह देते हैं। हमनें गूगल पर चैक किया तो सब से पहले जो लेख सामने आया उसका शीर्षक था ‘70 Celebrity Couples Who Make It Work Despite Huge Age Gaps’.  इस लेख की प्रारंभिक लाईनें इस प्रकार थीः When you picture your perfect partner, you probably think of someone who is your age—or at least in the same generation as you. But love doesn’t always work that way, and some couples make it work despite a huge age gap. These May-December romances, as they’re called, have faced their share of criticism, but they’re still going strong. 

क्या तुम समझते हो कि वह अवतार जो ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में बनी रूढ़ीवादी सोच को तोड़ कर तुम्हें अस्ली इस्लामी शिक्षा पर चलने के लिए तैयार कर रहा हो और अपने को एक अमली नमूना बना कर पेश कर रहा हो, वह उम्र में अन्तर हो तो भी दोनों चाहें तो शादी हो सकती है, इस का अमली नमूना पेश नहीं करेगा? तुम्हें उनका यह कर्म तो याद रहा, रात-रात भर जाग कर अपने रब के आगे इबादत में डूबे रहना याद नहीं रहा!

हमें इन विवाह को समझने के लिए अवतार मौहम्मद की समूची ज़िन्दगी के विवरण को पढ़ना और समझना होगा। जो व्यक्ति जवानी के दिनों से सिर्फ अपने रब से क़रीब होने की कोशिश में लगा रहा, जिसने अदालत, इंसाफ और ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ा, जो कमज़ोर, ग़रीब, बेसहारा, अनाथ और विधवाओं का मसीहा बना रहा, जो तमाम इंसानियत और तमाम दुनियाओं के लिए रहमत बन कर आया था, और जिसने सात्विक जीवन व्यतीत करने की तमाम उम्र शिक्षा दी, वह क्योंकर अपने रास विलास के लिए विवाह करता? यदि कुछ ऐसी रिवायते किताबों में आ गई हंै जो यह दर्शाती हैं तो उसकी ज़िम्मेदार जुलमत यानी तमस है। पुस्तिका के लेखक उन रिवायतों से लाभांवित होकर बड़े प्रसन्न भले ही होते हों, वह भूल जाते हैं कि उनका सम्पर्क कौन सी ताक़त से है कि वह ऐसा कर रहे हंै।

इस दुनिया के इतिहास मे अवतार मौहम्मद वह पहले समाज सुधारक हैं जिन्होंने महिला का मान सम्मान बढ़ाया। औरत के प्रति जो परोप्कार और हितकारिता की भावना उन्होंने दर्शाई वह अपने आप में मिसाल है। ऐसे समय मे जब औरत को मात्र एक वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता था जिसको इस्तेमाल करके छोड़ देना था। जो समाज महिला उत्पीड़न में सबसे आगे था उस समाज में उन्होने उसकी मान मर्यादा और गौरव को बढ़ाया और उसकी रक्षा की। महिला हित को लेकर वह इतना अधिक चिंतित थे कि उनके अंतिम शब्दों में भी मर्दों को औरतों के हुकूक़ याद दिलाए गए हैं। उन्हांेने कहाः

“Be careful about prayer ; and (about) what your right hands possess, do not impose on them what they have no strength for; (fear) Allah, (fear) Allah about the women, because they are helpless in your hands ...”

लोगों ने बहुत सी ऊल जलूल बातें बना लीं जैसे अवतार मौहम्मद में 40 पुरूषों की शक्ति थी या यह कि वह रोज़ाना हर पत्नी के पास जाया करते थे। यहां यह बताना आवश्यक है कि इस्लाम ने तमाम पत्नियों के साथ अदालत करने की बात की है न कि बराबरी करने की। अदालत और बराबरी में अन्तर न करने वाले लोग भी कई बार अवतार मौहम्मद के आचरण को नहीं समझ पाते।

उदाहरण के रूप में एक भोग है जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि सबके साथ बराबरी का सुलूक होगा। कुछ लोग घर से खाना खा कर आए थे और कुछ भूखे थे। बच्चे, औरतों, बूढ़े और जवान थे। सब को दो दो रोटी दे दी गई। यह बराबरी तो हुई पर अदालत नहीं। बच्चे के लिए दो रोटी अधिक थी और जवान के लिए कम। जो लोग घर से खा कर आए थे उन्हें एक की भी आवश्यकता नहीं थी और जो भूखे थे उनके लिए चार भी कम थी। इस्लाम बराबरी के स्थान पर अदालत की बात करता है। कमअक़ल आलोचक चाहते हैं कि सौदा जैसी पत्नी जिसको अब पुरूष की कोई आवश्यकता नहीं हैं, उनका पति अब भी उनके साथ उसी बराबरी से पेश आए जैसे वह कमउम्र पत्नी जैसे आयशा के साथ पेश आता है। मौहम्मद का यह उसूल था कि वह बारी बारी, एक ही दिन में नहीं, अपनी पत्नियों के साथ रात बिताया करते थे। यदि सौदा अपनी मर्ज़ी से उन्हें किसी और के पास जाने को कहती हैं तो यह कह उठते हैं कि सौदा को डर था कि कहीं मौहम्मद उन्हें तलाक़ न दे दें इसलिए उन्होंने ऐसा किया। यदि डर था भी तो वह सौदा के दिल में, जो अवतार मौहम्मद को शायद पूरी तरह समझ भी नहीं पाईं। 

कुरान की यह आयत अवतार मौहम्मद के आचरण को दर्शाती हैः

You (O Mohammad) can postpone (the turn of) whom you will of them (your wives), and you may receive whom you will. And whomsoever you desire of those whom you have set aside (her turn temporarily), it is no sin on you (to receive her again), that is better; that they may be comforted and not grieved, and may all be pleased with what you give them. Allah knows what is in your hearts. And Allah is Ever All-Knowing, Most Forbearing.

इस पर पत्नी आयशा का ब्यान किताबों में दर्ज है कि उन्होंने कहाः

Aisha said: “The Messenger of Allah used to ask permission of us (for changing days) after this Ayah was revealed. I said, `If it were up to me, I would not give preference to anyone with regard to you, O Messenger of Allah!’’’

यह आयत आने से पहले अवतार मौहम्मद बारी बारी हर पत्नी के पास जाया करते थे। इस आयत के आने के बाद वह किसी भी पत्नी के पास जाने से पहले उससे इजाज़त ले लिया करते थे जिसकी अब बारी थी। यह आवश्यक नहीं कि ऐसा केवल शारिरिक रिश्ता बनाने के लिए ही करते थे। अपने अंतिम दिनों में भी, जब वह बीमार थे और हर पत्नी के घर जाने में असमर्थ थे, तो भी वह उनसे अनुमति लेते थे जिसकी बारी थी कि वह जहां हैं वहीं ठहरे रहें कि नहीं!

इस्लाम इंसाफ को अंधा नहीं बल्कि आंखों और अक़ल के साथ देखता हुआ पेश करना चाहता है। यही कारण है कि जब चोरी करने के जुर्म में एक क़ैदी की उंगलियां काटी जाने की सज़ा सुनाई गई तो अली ने उसको रोक दिया। उनसे पूछा गया कि इस्लाम तो चोर की उंगलियां काटने को कहता है, फिर अली ने ऐसा करने से क्यों रोका। अली ने कहा कि इसने चोरी की है रोटी की। यदि सज़ा ही दी जानी है तो शासक को दी जानी चाहिए कि उसके शासन में किसी व्यक्ति को दो समय की रोटी भी नहीं मिली। अली जब ख़लीफा हुए और करीब चार वर्ष बीत गए तो उन्होंने तमाम शहर वासियों को बुलाया और पूछा कि क्या कोई ऐसा है जिस को दो समय का खाना नहीं मिला, या जिसके तन पर कपड़ा नहीं या सिर पर छत नहीं। कोई एक भी सामने नहीं आया। यह है इस्लाम की अदालत!

बराबरी और अदालत का एक और अन्तर देखिए। आप की सालाना आमदनी 5 लाख है तो आप को कितना टैक्स देना है यह सबको पता है। कानून यह नहीं देखता कि एक व्यक्ति अकेला अपने पुश्तैनी घर में रहता है तो दूसरा मां बाप, भाई बहन, पत्नी और दो बच्चों के साथ किराये के मकान में रहता है जहां भाई बहन के कालेज की पढ़ाई, बच्चोें के स्कूल की पढ़ाई के साथ मां के दिल की दवाई और पिता की सप्ताह में तीन बार डायलिसिस होनी होती है। इस्लाम कहता है कि जो भी तुम्हारा लाईफस्टाईल है उसके अनुसार ज़िन्दगी गुजारने के बाद एक बंधी हुई तारीख़ को जो कुछ तुम्हारे पास बचा रह जाए उसमें से तुम टैक्स निकाल दो। एक ओर बराबरी है, दूसरी ओर अदालत!

प्रश्न यह उठता है कि जो अवतार हर समय अदालत क़ायम करने की कोशिश में हो क्या वह 9 वर्ष की आयशा से शादी करेगा? हमको एक लेख मिला जिसकी बुनियाद पर आईए जानने की कोशिश करें कि आयशा की उम्र क्या थी जब उनका अवतार मौहम्मद से विवाह सम्पन्न हुआ?

कुछ हदीसों में आया है कि जब आयशा का विवाह हुआ उस समय उनकी उम्र 9 वर्ष थी। ज़ाहिर है जो कुछ हदीसों में आया है वह सब सत्य पर आधारित नहीं है। हमें इन हदीसों को अक़ल की रौशनी में देखना होगा। ऐसा इसलिए कि इस्लाम नाबालिग़ लड़की से शादी की इजाज़त नहीं देता। हमको समझना होगा कि क्यों अवतार मौहम्मद ने स्वयं कहा कि यदि मेरी कोई हदीस तुम तक पहुंचे जो कुरान से टकरा रही हो तो उसको दीवार पर दे मारो। पर आलोचक तो आलोचक हैं। वे बैठे ही हैं आलोचना लाएक़ मवाद इकट्ठा करने। वह ऐसी हदीसों को दिल से लगा लेते है और भूल जाते है कि वे जुलमत यानी तमस के मोहरे बनकर लोगों को हक़ और हक़ीक़त से दूर करने का काम कर रहे हैं। 

शादी के समय आयशा की उम्र को लेकर जो रिवायतें आई हैं उनमें अधिकांश हिशाम बिन उरवाह के माध्यम से आई हैं जिसने अपने पिता से रिवायत की। आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी इतनी बड़ी बात थी कि यदि उनकी उम्र इतनी कम होती कि उस पर निगाह उठती तो बहुतेरों ने उसकी चर्चा की होती, न कि केवल दो तीन ने। 

क्या यह बड़ी अजीब बात नहीं है कि जिस मदीना में अवतार मौहम्मद और आयशा का विवाह हुआ उसमे हिशाम बिन अरवाह के अतिरिक्त कोई और नहीं था जो आयशा की उम्र लिखता। हिशाम बिन उरवाह ने अपनी उम्र के 71 वर्ष मदीना में गुज़ारे और फिर जब वह ईराक़ चले गए तो मदीना में मालिक इब्ने अनस जैसे उनके अनेक शागिर्द थे। किसी ने भी आयशा की उम्र पर कोई रिवायत नहीं लिखी। जिन लोगों ने यह रिवायत नक़ल की है वे ईराक़ के रावी हैं जिन्होंने हिशाम से इस बारे में सुना। 

किताब तहज़ीबुल तहज़ीब, जो विभिन्न रावियों की जीवनी और उनके कथनों की हक़ीक़त पर बहस करती है, कहती है कि याकूब इब्ने शाएबाह के अनुसार हिशाम द्वारा की गई रिवायतें विश्वस्नीय हैं सिवाय उनके जो ईराक़ के लोगों के माध्यम से आईं। किताब कहती है कि मालिक इब्ने अनस स्वयं हिशाम से आई उन रिवायतों को विश्वस्नीय नहीं मानते थे जो ईराक़ के लोगों के माध्यम से पहुंचीं। 

मीज़ानुल एतदाल, एक और पुस्तक जो हदीसों की रिवायत करने वालों पर बात करती है लिखती है कि उम्र के आखिरी हिस्से में हिशाम की याददाश्त खो गई थी। 

आम तौर पर जो रिवायत मानी जाती है उसके अनुसार आयशा का जन्म हिजरत से 8 वर्ष पहले हुआ था। परन्तु सहीह बुखारी की एक और रिवायत के अनुसार, जो किताबुल तफसीर में दर्ज है, आयशा ने स्वयं रिवायत की कि जब सूरह क़मर अवतरित हुआ उस समय ‘‘मैं कमसिन बच्ची थी’’। याद रहे कि कुरान का 54वां सूरह, सूरह क़मर, हिजरत से 9 वर्ष पहले अवतरित हुआ था। इस रिवायत के अनुसार, आयशा का न केवल इस सूरह के अवतरण से पहले जन्म हो चुका था बल्कि वह ‘जारियाह’ यानी ‘कमसिन लड़की’ थी न कि ‘सिबयाह’ यानी ‘गोद-खेलती बच्ची’। यदि यह रिवायत सही है तो यह हिशाम बिन उरवाह की रिवायत की रद्द करती है। कुछ और दलीलें जो हम पेश करेंगे उनकी रौशनी में इसी रिवायत को मानना ज़्यादा उचित लगता है। 

कई रिवायतों के अनुसार आयशा बद्र और ओहद के युद्ध में मुस्लिम लश्कर के हमराह थीं। रिवायतों में यह भी लिखा है कि 15 वर्ष से नीचे किसी को भी ओहद के युद्ध में हिस्सा लेने की इजाज़त नहीं थी। जितने भी लड़के 15 वर्ष से कम उम्र के थे उनको वापिस भेज दिया गया था। यदि आयशा ने बद्र और ओहद के युद्ध में शिरकत की तो इससे साफ है कि उस समय उनकी उम्र 9 या 10 वर्ष नहीं होगी बल्कि अधिक होगी। सोचने की बात है कि युद्ध मे औरतें मर्दो की सहायता करने के लिए शरीक होती हैं न कि उन पर बोझ बनने के लिए। 

तमाम इतिहासकारों का मानना है कि आयशा से उनकी बहन असमा दस वर्ष बड़ी थीं। दो किताबों, तक़रीबुल तहज़ीब और अल-बिदायाह वल-निहायाह में दर्ज है कि असमा का देहान्त हिजरत के 73वें वर्ष में हुआ जब उनकी उम्र 100 वर्ष की थी। यदि असमा की उम्र 73 हिजरी में 100 वर्ष थी तो हिजरत के समय वह 27 या 28 वर्ष की होंगी। इस हिसाब से हिजरत के समय आयशा की उम्र 17 या 18 वर्ष रही होगी। आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी हिजरत के पहले या दूसरे वर्ष में हुई। इस हिसाब से विवाह के समय उनकी उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच होना चाहिए। 

इस्लामिक इतिहासकार तबरी अबू बक्र के बारे में लिखते हुए कहता है कि उनके 4 औलादें थीं और चारों दौरे जाहिलियत में पैदा हुई थीं। दौरे जाहिलियत उस ज़माने को कहते हैं जब तक अवतार मौहम्मद ने अपने अवतार होने की घोषणा नहीं की थी। इस घोषणा के 13 वर्ष बाद मक्का से मदीना हिजरत हुई और हिजरत के बाद पहले या दूसरे वर्ष में आयशा से शादी हुई। यदि आयशा का जन्म दौरे जाहिलियत में हुआ था तो विवाह के समय उनकी उम्र किसी भी हाल में 14 वर्ष से कम नहीं हो सकती। 

इतिहासकार इब्ने हिशाम के अनुसार आयशा ने उमर बिन ख़त्ताब से काफी पहले इस्लाम को अपना लिया था। इससे साफ है कि आयशा मौहम्मद द्वारा अपने अवतार होने की घोषणा के बाद पहले ही वर्ष में इस्लाम में दाखिल हो गई थीं। घोषणा के 13 वर्ष बाद हिजरत हुई और फिर हिजरत के पहले या दूसरे वर्ष में शादी। यह तो आप मानेंगे कि यदि कोई दूध पीती बच्ची हो तो उसके इस्लाम में दाखिल होने की बात कोई क्यों करेगा। उनकी उम्र इतनी तो होगी कि वह अपने फैसले कर सकें। फिर आयशा की 6 या 7 वर्ष की उम्र में सगाई और 9 वर्ष की उम्र में शादी की बात कैसे सही हो सकती है? 

तबरी ने यह भी तहरीर किया है कि जब अबू बक्र ने हबशा की ओर कूच की सोची, जो हिजरत के 8 वर्ष पहले का वाक़ेया है, तो वह मुताम के पास गए जिनके पुत्र से आयशा की सगाई हो चुकी थी और उनसे कहा कि वह आयशा को अपनी बहु के रूप में घर में रख लें। मुताम ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि क्योंकि अबू बक्र ने इस्लाम कुबूल कर लिया है इसलिए उसके पुत्र ने आयशा को तलाक़ दे दी है। 

बड़ा प्रश्न यह उठता है कि हिजरत से 8 वर्ष पहले आयशा की न केवल सगाई हो चुकी थी बल्कि इतनी उम्र थी कि अबू बक्र मुताम के पास जाकर उनको अपनी   पुत्रवधू के रूप में घर में रख लेने की गुज़ारिश कर रहे थे जिस पर मुताम ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उनके पुत्र ने आयशा को तलाक़ दे दी है। 

जो लोग इस वाक़ेय के 9 वर्ष बाद हुई शादी के लिए यह साबित करने में जुटे हैं कि उस समय आयशा की उम्र केवल 9 वर्ष थी, वे बताएं कि हिजरत के 8 वर्ष पहले आयशा की उम्र क्या थी जब उनके पिता मुताम से सिफारिश कर रहे थे कि उन्हें बहु के रूप में घर में जगह दें? ज़ाहिर है आयशा की सगाई तो उससे भी पहले हो चुकी थी। 

दूसरे यह कि जो लोग आयशा को अविवाहित यानी virgin कह कर अवतार मौहम्मद की दूसरी पत्नियों से उनका रूतबा बढ़ाने की सोचते हैं वे भी जान लें कि विवाह सम्पन्न भले ही न हुआ हो, पर मुताम के कथनुसार उसके पुत्र ने उन्हें तलाक़ दे दी थी। दूसरे यह कि यदि virgin होने से वह समझते हैं कि आयशा का रूतबा बढ़ता है तो यह उनकी भूल है, क्योंकि इस्लाम virgin या non virgin में तमीज़ नहीं करता और कर्मों पर अधिक ज़ोर देता है। 

अहमद इब्ने हंबल द्वारा ब्यान की गई एक रिवायत के अनुसार ख़दीजा के देहान्त के उपरान्त जब ख़ौला अवतार मौहम्मद के समक्ष आईं और उनसे फिर शादी करने की नसीहत की तो अवतार मौहम्मद ने उनसे पूछा कि उनके लिए क्या क्या विकल्प हैं। ख़ौला ने कहाः “You can marry a virgin (bikr) or a woman who has already been married (thayyib)”. जब अवतार मौहम्मद ने पूछा कि ‘बिक्र’ कौन है, तो ख़ौला ने आयशा का नाम लिया। जो लोग अरबी भाषा जानते हैं उन्हें पता है कि ‘बिक्र’ का शब्द 9 वर्ष की अपरिपक्व बालिका के लिए प्रयोग नहीं होता। ऐसे में ‘जारियाह’ शब्द प्रयोग किया जाता है। ‘बिक्र’ एक अविवाहित स्त्री के लिए प्रयोग किया जाता है; ज़ाहिर है 9 वर्ष की बालिका ‘अविवाहित स्त्री’ नहीं होती।

इब्ने हजर के अनुसार, फातिमा आयशा से उम्र में पांच वर्ष बड़ी थीं। रिवायतों के अनुसार जब फातिमा का जन्म हुआ, उस समय अवतार मौहम्मद की उम्र 35 वर्ष थी। यदि इन रिवायतों को सही मानें तो भी हिजरत के समय आयशा की उम्र किसी भी हाल में 14 वर्ष से कम नहीं हो सकती। इस हिसाब से भी शादी के समय उनकी उम्र कम से कम 15 या 16 वर्ष थी। 

लेकिन अजीब बात यह है कि शिया इस रिवायत को सही नहीं मानते कि फातिमा की पैदाईश के समय अवतार मौहम्मद की उम्र 35 वर्ष थी। हालांकि उनके यहां भी कई रिवायतें मौजूद हैं। लेकिन अधिकतर शिया उलमा जिस रिवायत को सही मानते हैं उसके अनुसार दुनिया से जाने के समय फातिमा की उम्र मात्र 18 वर्ष की थी। 

फातिमा की भी कम उम्र साबित करने की होड़ में यह भी यही साबित करते दिखाई देते हैं कि फातिमा की अली से शादी के समय उनकी उम्र करीब 9 वर्ष ही थी। ज़ाहिर है जब फातिमा 18 वर्ष की उम्र में 4 बच्चों को पैदा करने के बाद दुनिया से गईं और एक का देहांत हो गया, तो शादी के समय उनकी उम्र करीब 9 वर्ष ही रही होगी। प्रश्न यह उठता है कि क्या हक़ीक़त में उस समय तमाम अरब में 9 या 10 वर्ष की उम्र में शादी होना आम बात थी या फातिमा के चाहने वालों ने भी वैसे ही उम्र कम की जैसे आयशा की उम्र कम करके कुछ जगह लिखी गई? 

शिया उलमा की सोच को जगाने के लिए एक वाक़िया पेश है। अवतार मौहम्मद का पड़ौसी उक़बा था। जब अवतार मौहम्मद ने एकेश्वरवाद की शिक्षा देना प्रारंभ की तो उक़बा उनका बड़ा दुश्मन बन गया। जब भी वह घर से निकलते या वापिस आते, उक़बा उन्हें बुरा भला कहता था। सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, अल-बैहक़ी की सुनन और अश-शाशी की मुसनद में दर्ज रिवायत के अनुसार एक बार जब अवतार मौहम्मद काबा में इबादत कर रहे थे और अल्लाह के आगे सिर को ज़मीन पर रखा, उक़बा कुछ दूसरे कुरैश सरदारों के कहने पर ऊंट की अंतड़ियां आदि लाया और उनकी पीठ पर डाल दीं। वे सब इतना हंसे की हंसते हंसते एक दूसरे पर गिर रहे थे। अवतार मौहम्मद सिजदे से अपना सिर नहीं उठा पा रहे थे। अबू बक्र ने फातिमा को बुलाया जिन्होंने आकर बाप की पीठ पर से अंतड़ियों को हटाया, तब अवतार मौहम्मद ने सिजदे से सिर उठाया। किताब अरराहिक़ुल मख़्तूम के अनसुार यह वाक़ेया नुबूवत की घोषणा के चैथे वर्ष में पेश आया। 

उक़बा इस्लाम का ऐसा ही दुश्मन था कि एक बार उसने अवतार मौहम्मद के मुंह पर थूक दिया। हुआ यूँ कि उबैय इब्ने ख़लफ इब्ने सफवान की उक़बा से गहरी दोस्ती थी। जब उबैय को पता चला कि उक़बा ने अवतार मौहम्मद के सामने बैठ कर उनकी बातें सुनी हैं तो उसने उक़बा से कहा कि मैं क़सम खाता हूँ कि मैं न तो तुम से मिलूंगा और न ही बात करूंगा यदि तुम उनके मुंह पर थूकोगे नहीं। उक़बा ने जाकर अवतार मौहम्मद के मुंह पर थूका, जिसके बाद इन दोनों के लिए कुरान की यह आयत अवतरित हुईः

Quran.25.27:

On the day that the sinner bites his hands, saying, would that I had chosen a path with the apostle.

यह दूसरा वाक़ेया हमने इसलिए पेश किया कि आप जानें कि वह कैसा अम्न और इंसानियत का पैग़म्बर था कि लोग उसको तरह तरह से ज़लील करने की कोशिश कर रहे थे, उसको यातनाएं दे रहे थे, लेकिन वह इनको माफ करता और इनसे इंसानियत का सुलूक करता नज़र आता है। पुस्तिका के लेखक यदि यह सब नहीं देख पाए तो इसलिए कि इन्होंने रूहानियत की आंख बंद कर रखी है! 

मेरा फातिमा के चाहने वालों से प्रश्न है? जो लोग फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष साबित करते हैं वे तमाम दूसरी रिवायतों को हलका साबित करते हैं जो सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम आदि जैसी किताबों में दर्ज हैं। वे कहते हैं कि यह कैसे मुमकिन है कि फातिमा, जिनकी उम्र उस समय 2 या 3 वर्ष रही होगी, वह आकर पिता की पीठ पर से ऊंट की भारी अंतड़ियां हटा पाएं। इसलिए वे कहते हैं कि उक़बा ने सारी अंतड़ियां नहीं डाली थीं, और बस थोड़ी सी डाली थीं जो फातिमा ने आकर हटा दीं। यह लोग भूल जाते हैं कि अवतार मौहम्मद ने उस समय तक सिजदे से सिर नहीं उठाया जब तक अबू बक्र ने फातिमा को नहीं बुला भेजा जिन्होंने आकर बाप की पीठ से अंतड़ियों को हटाया। प्रश्न यह उठता है कि यदि अंतड़ियों का वज़न नहीं था तो फिर अवतार मौहम्मद ने इतनी देर तक सिजदे से सिर क्यों नहीं उठाया जब तक फातिमा ने आकर उस वज़न को नहीं हटाया। फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष साबित करने वाले यह तक कहेंगे कि मौहम्मद फातिमा को पहचनवाना चाहते थे, आदि। लेकिन वे भूल रहे हैं कि अबू बक्र ने फातिमा को बुला भेजा, जिन्होंने आकर पीठ पर से उस बोझ को हटाया। यह वह समय था जब अवतार मौहम्मद के घर में पत्नी ख़दीजा भी थीं, चाचा अबू तालिब भी थे और अबू तालिब के पुत्र अली भी थे। यदि अबू बक्र स्वयं पीठ पर से इस भार को नहीं उठाना चाहते थे तो भी क्या कोई 2 या 3 वर्ष की बच्ची को बुलाएगा? क्या 2 या 3 वर्ष की बच्ची से उम्मीद की जा सकती है कि आप जैसा चाहें वह वैसा करेगी? लेकिन यदि फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष मानना है तो इन सब बातों को भी मानना होगा! 

यह कुछ प्वाईंट्स है जो ज़ाहिर करते हैं कि अवतार मौहम्मद की 9 वर्ष की उम्र में आयशा से शादी की रिवायतें ग़लत हैं। 

जैसा हम बता चुके हैं कि ऐसी अधिकांश रिवायतें हिशाम बिन उरवाह के माध्यम से ईराक़ी इतिहासकारों ने लिखी हैं। न ही अरब क़ाएदा था और न ही अवतार मौहम्मद ने आयशा से कमउम्री में विवाह किया। अरब के लोगों ने उसका विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। जुलमत यानी तमस ने ऐसी रिवायतों को किताबों में दर्ज कराया ठीक वैसे जैसे इंद्रदेव को दिखाया कि कैसे वह ज़मीन पर आकर जंगल में स्त्रियों से रिश्ते बनाते हैं जिस रिश्ते से बच्चे तक जन्म लेते हैं। 

बग़ावत की सज़ा

यदि यहां तक बात साफ हो गई तो बस एक विषय और रह गया है जिसका उपरोक्त पैराग्राफ में पुस्तिका के लेखक ने उल्लेख किया है। पुस्तिका के लेखक ने मदीना में बानू कुरैज़ा क़बीले की बात की है। हम को देखना होगा कि बानू कुरैज़ा का वाक़ेया क्या है?

बनु कुरैज़ा यहूदियों की एक ट्राईब थी जो मदीना में रहती थी और उनके मदीना के दो बड़े कबीलों औस और खज़रज, जो मुसलमान हो गए थे, उनसे एग्रीमेंट थे। इस प्रकार अवतार मौहम्मद से भी उनका एग्रीमेंट था, जो औस और खज़रज दोनों के सरदार थे और मदीना के भी हाकिम थे। 627 ईस्वी में, हिजरत के पांचवे साल में, अबू सूफियान ने बड़े लश्कर के साथ मदीना पर हमला किया। इसको Battle of Trench या जंगे खंदक कहते हैं। इस जंग में मुसलमानों ने गहरी खाई खोद ली थी कि दुश्मन सीधा हमलावर न हो सके। 

प्रारंभ में बनु कुरैज़ा मुआहिदे की पासदारी करते हुए मुसलमानों की मदद कर रहे थे लेकिन फिर शायद उन्हें लगा कि इतनी बड़ी फौज के सामने मुसलमान नहीं टिक पाएंगे। उन्होंने दुश्मन से साझंगांठ शुरू कर दी। ग़ौर करने की बात ये थी कि बनु कुरेज़ा मदीना के अन्दर रहते थे। हमला अब बाहर से नहीं था बल्कि शहर के अन्दर से एक पूरी ट्राईब दुश्मन से मिल गई थी। 

इब्ने इस्हाक़ की रिपोर्ट के अनुसार हुयाई इब्ने अख़तब नामी एक यहूदी सरदार को उसकी दुश्मनी और इस्लाम से नफरत के कारण कुछ समय पहले मदीना से शहरबद्र करने का हुक्म सुनाया गया था। लेकिन इस युद्ध के दौरान बनु कुरैज़ा ने उसको वापिस बुला लिया। युद्ध के समय उसको बुलाने का क्या मतलब था? अल वाक़िदी की रिपोर्ट के अनुसार हुयाई ने मदीना में मुसलमानों से किए गए एग्रीमेंट को फाड़ दिया। जिस वक़्त मक्का से आई फौज हमले की तैयारी कर रही थी, मदीना में ये अफवाह फैलने लगी कि बनु कुरैज़ा ने अवतार मौहम्मद से किया एग्रीमेंट तोड़ दिया है। अवतार मौहम्मद ने कुछ लोगों को इस बात की तस्दीक़ करने भेजा। विलियम मुईर के अनुसार, बनु कुरैज़ा ने उनसे कहाः कौन है मौहम्मद और कौन है अल्लाह का रसूल, कि हम उसका हुक्म मानें। हमारे और उनमें कोई समझौता नहीं है। 

इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि जिस समय अवतार मौहम्मद हिजरत करके मदीना पहुंचे, उस समय वहां पांच बड़े क़बीले आबाद थे। इनमें दो, औस और खज़रज, ने इस्लाम कुबूल कर लिया था; इन्हीं के बुलावे पर अवतार मौहम्मद और उनके साथी मक्का से मदीना आए थे। इसके अतिरिक्त तीन यहूदी क़बीले - कैनुक़ा, नज़ीर और कुरैज़ा - भी मदीना में आबाद थे। औस और खज़रज अनसार कहलाए जबकि मक्का से आने वाले मुहाजिर या मुहाजिरून कहलाए। यहूदी अपने धर्म पर चलते रहे और उनके साथ किसी प्रकार की ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की गई। अवतार मौहम्मद ने वह प्रख्यात ‘Charter of Medina’ बनाया जो तमाम शहरियों की सिविल और धार्मिक हुकूक़ की और बराबरी के साथ जीवन व्यापन के हक़ की गारण्टी लेता था। बदले में यहूदी क़बीलों ने मौहम्मद को मदीना का सियासी सरबराह यानी हाकिम माना और बाहरी दुश्मन के हमले की सूरत में मुसलमानों के साथ मिलकर शहर की हिफाज़त करने का प्रण लिया। उन्होंने इस पर भी रज़ामंदी दिखाई कि इस्लाम के दुश्मनों और विशेषकर मक्का वालों की किसी प्रकार की भी खुलकर या छिप कर सहायता नहीं करेंगे।  

कुछ हिस्टोरियंस का कहना है कि कोई एग्रीमेंट पहले से नहीं था; यदि कोई एग्रीमेंट था तो सिर्फ ये था कि बनु कुरैज़ा हमले के वक़्त हमलावरों का साथ नहीं देंगे। ऐसा कहने वाले लोग ‘Charter of Medina’ की अंदेखी करते हैं। मान भी लें कि कोई एग्रीमेंट नहीं था, परन्तु इसमें तो शक नहीं कि उन्होंने हमलावरों को युद्ध में strategic support दिया। और जिस व्यक्ति को बतौर मदीना के हाकिम अवतार मौहम्मद शहर से निकाल चुके थे उसको एैन उस समय वापिस बुला लिया जब युद्ध हो रहा था। बनु कुरैज़ा की सोच के विपरीत इस युद्ध में जीत अवतार मौहम्मद की हुई और हमलावर फौज पस्पा हो गई। 

इसके पश्चात अवतार मौहम्मद ने बनु कुरैज़ा की घेरा बंदी का हुक्म दिया जब तक कि उन्होंने आत्म समर्पर्ण नहीं कर दिया। जिन यहूदियों ने अवतार मौहम्मद के खि़लाफ बग़ावत का समर्थन नहीं किया था, मुसलमानों ने उन्हें शहर से बाहर जाने की अनुमति दे दी। दोनों पक्ष इस पर राज़ी हुए कि साद इब्ने मुआद जो फैसला करेंगे वे दोनों के लिए माननीय होगा। यहूदी साद बिन मुआद के नाम पर इसलिए राज़ी हुए थे क्योंकि उनके आपस में अच्छे रिश्ते रहे थे। साद बिन मुआद ने उस समय के बग़ावत के क़ानून को देखते हुए सज़ा सुनाई कि बग़ावत में शामिल होने वाले मर्दों को क़त्ल कर दिया जाए और उनकी औरतों और बच्चों को क़ैद कर लिया जाए। इस फैसले के बाद क़रीब 600 से 900 मर्दों को मौत की सज़ा सुनाई गई। 

ये फैसला उस समय के क़ानून के हिसाब से किया गया जिसके अनुसार बाग़ी की सज़ा मौत थी। सज़ा उसने सुनाई जिसको जज बनाने पर बनु क़ुरैज़ा स्वयं राज़ी थे।

प्रश्न यह उठता है कि यदि किसी स्टेट के अन्दर से उस स्टेट के खि़लाफ बग़ावत होती है तो उनकी सज़ा क्या होनी चाहिए? यदि हमारा कोई पड़ौसी देश हमलावर हो और भारत के अन्दर का कोई गुट उस समय पड़ौसी देश से सांझगांठ करके तमाम खुफिया जानकारी उनको देने लगे या खुल कर बग़ावत कर दे तो किसी भी अदालत में क्या फैसला होगा? 

यूनाईटेड स्टेट्स के आज के कानून के अनुसार पहले mutiny और sedition शब्दों की व्याख्या देखते हैं और फिर देखते हैं कि इस को लेकर आज कानूनी सज़ा क्या है? यह जानकारी Legal Information Institute की वैबसाईट से ली गई है। 10 U.S. Code § 894 - Art. 94. Mutiny or sedition’ के शीर्षक के तहत मौजूद विवरण देखिएः

(a) Any person subject to this chapter who—

(1) with intent to usurp or override lawful military authority, refuses, in concert with any other person, to obey orders or otherwise do his duty or creates any violence or disturbance is guilty of mutiny;

(2) with intent to cause the overthrow or destruction of lawful civil authority, creates, in concert with any other person, revolt, violence, or other disturbance against that authority is guilty of sedition;

(3) fails to do his utmost to prevent and suppress a mutiny or sedition being committed in his presence, or fails to take all reasonable means to inform his superior commissioned officer or commanding officer of a mutiny or sedition which he knows or has reason to believe is taking place, is guilty of a failure to suppress or report a mutiny or sedition.

(b) A person who is found guilty of attempted mutiny, mutiny, sedition, or failure to suppress or report a mutiny or sedition shall be punished by death or such other punishment as a court-martial may direct.

(Aug. 10, 1956, ch. 1041, 70A Stat. 68.)

यूनाईटेड स्टेट्स के Uniform Code of Military Justice (UCMJ) के अनुसारः Among the UCMJ’s so-called “punitive articles” is the seemingly pertinent offense of sedition. According to Article 94(a)(2), anyone subject to the UCMJ who, “with intent to cause the overthrow or destruction of lawful civil authority, creates, in concert with any other person, revolt, violence, or other disturbance against the authority is guilty of sedition.” Persons who are subject to the UCMJ also violate this article if they fail to do their utmost to prevent and suppress sedition committed in their presence, or fail to notify their superiors of sedition they know or have reason to believe is taking place. Either kind of sedition—actual or the failure-to-suppress or -inform subset—is punishable “by death or such other punishment as a court-martial may direct.”

यह कानून sedition की व्याख्या करते हुए यहां तक कह रहा है कि यदि किसी के सामने इस प्रकार की गतिविधी हो और वह उसे न रोके या अपने सीनियर अफसरों को सूचित न करे या उसको यक़ीन हो कि ऐसा कुछ हो रहा है तो भी वह सिपाही sedition के तहत मौत की सज़ा का हक़दार होगा।

साफ है कि बनु कु़रैज़ा ने जो कुछ किया उसकी यूनाईटेड स्टेट्स के आज के क़ानून में भी सज़ा मौत ही है। लेकिन यह लोग यूनाईटेड स्टेट्स के क़ानून की आलोचना नहीं करेंगे!

अवतार मौहम्मद तो युद्ध के कै़दियों के लिए कहते थे कि अगर वे पढ़े लिखे हों तो हमारे किसी को पढ़ना लिखना सिखा दें और आज़ाद हो जाएं। जो काफिर बढ़ बढ़ कर हमला करने आते थे और अवतार मौहम्मद के अनेक साथियों को शहीद करने के ज़िम्मेदार थे, अवतार मौहम्मद को मक्का पर फतेह मिली तो एक को भी नहीं मारा गया, बल्कि आम माफी का ऐलान कर दिया गया। इसके साथ यह उदाहरण भी पेश करना था कि यदि कोई स्टेट या देश है और उसके निवासी स्टेट या देश के खिलाफ अन्द्रूनी युद्ध कर बैठते हैं या आक्रमणकारियों की सहायता करते हैं तो उन्हें माफ नहीं किया जा सकता। अब यह अवतार मौहम्मद का निजी मामला नहीं रह गया था बल्कि बनु कुरैज़ा की साज़िश के कारण मदीना के तमाम मुसलमानों को बड़ा नुक़सान उठाना पड़ सकता था और अनेक जाने जा सकती थीं। 

जब तक हम अवतार मौहम्मद को एक आम आदमी समझते रहेंगे और उनका उस दिव्यात्मा से रिश्ता नहीं समझ सकेंगें जो उनको खुदा से जोड़ती थी, हम अवतार मौहम्मद द्वारा उठाए गए कई क़दम नहीं समझ पांएगे। हर ज़माने में इन दिव्यात्माओं का काम है धर्म के उसूलों की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना। अधर्म का नाश तब होगा जब वे लोग जिनकी आत्मा तमस की गुलाम हो चुकी है, उनका सफाया हो जाए। यही कारण है कि अर्जुन लड़ने को तैयार नहीं, फिर भी कृष्ण उनको मना रहे हैं और कहते हैं कि ये तो पहले ही मरे हुए हैं, तुम उनको मार कर सिर्फ एक फारमैलिटी निभाओगे। क्या अर्जुन और इधर या उधर का कोई भी जानता था कि उधर से जो लड़ रहे हैं उनकी आत्मा मरे हुए लेवल तक पहुंच चुकी है। नहीं, अधिकतर लोग तो उन्हें बड़ा ज्ञानी और धर्म गुरू के रूप में देख रहे थे। लेकिन कृष्ण के फैसले को हम इसलिए मानते हैं क्योंकि जानते हैं कि कृष्ण का संबंध परमात्मा से है, वह गलत फैसला नहीं कर सकते। लेकिन क्योंकि हमारा यकीन नहीं है कि अवतार मौहम्मद का संबंध उसी परमात्मा से था, इसलिए हम उनके लिए गए निर्णयों पर शक करते हैं।

कलकी अवतार या मेहदी का संबंध भी उसी परमात्मा से होगा। वह भी अनेक युद्ध लड़ेंगे। क्योंकि उनका संबंध भी परमात्मा से है इसलिए वहां भी वही कानून लागू हांेंगे जो कृष्ण या मौहम्मद के समय थे। 

यह रिश्ता समझने में अकल लगाना है। और यदि इनमें से किसी का रिश्ता ब्रहमण और परमात्मा से साबित हो गया, तो फिर अब किस बात की अक़ल लगाना कि उन्होने ऐसा कैसे किया या वैसा कैसे किया। 

यही कारण है कि इस्लाम का साफ कहना है कि एक क्रिएटर की मौजूदगी को अक़ल से समझो, वह इंसाफ और अदल करने वाला है इसको अक़ल से समझो, उसने सिस्टम बनाया है हमारी हिदायत का इसको अक़ल से समझो और उसकी हिदायत के सिस्टम में कौन लोग शामिल हैं इसको अक़ल से समझो, और जब इतना समझ में आ जाए तो फिर वे जो कुछ भी कह रहे हैं, उसको आंख बंद करके मानो क्योंकि उनका रिश्ता वहां से है जो हमारे नेचर का जानने वाला है, जो नूर और जुलमत का हाकिम है और जानता है कि कौन नूर की ओर आने की कैपैसिटी रखता है और कौन नहीं, और किसने अपनी आत्मा को जुलमत के हवाले कर रखा है। 

कृष्ण के खिलाफ जब अधर्मियों ने एका कर लिया तो उनसे युद्ध करने को आ गए। हालात यहां तक पहुंच गए कि युद्ध में या तो वे इन्हें कत्ल कर देंगे या ये उन्हें। तब कृष्ण ने अपने अनुयायियों को न केवल युद्ध करने के लिए तैयार किया बल्कि स्वयं उस युद्ध की क़यादत की, यहां तक कि कौरवों की सेना बुरी तरह पराजित हुई और उसके तमाम सेनापति मारे गए। 

गीता में कृष्ण के मुख से परमात्मा कह रहा है कि अवतार का एक मुख्य काम यह भी होता है कि वह evil doers यानी बुरे कर्म करने वालों का नाश कर दे। कृष्ण ने अपने समय में ऐसा किया, मौहम्मद ने अपने समय में युद्ध पर उतारू लोगों का नाश किया। दोनों एक ही सोर्स के अवतार थे, दोनों ने एक समान ही हमलावरों से निपटने के रास्ते ढूंढें।