Tuesday, 1 September 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-M: महिलाओं से सुलूक और अनेक शादियां

महिलाओं से सुलूक और अनेक शादियां

अब इसमें शक की गुंजाईश नहीं रही जाती कि पुस्तिका का लेखक केवल मनघड़ंत बातें ही लिख रहा है। वह आगे लिखता हैः

‘आधुनिक काल में मौहम्मद के आलोचक उनके स्वयं को पैग़म्बर घोषित करने को लेकर उनकी सच्चाई पर सन्देह करते हैं। इसी प्रकार आधुनिक विचारक उनकी नैतिकता पर शंका करते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार में गुलाम रखने की आलोचना करते हैं, शत्रुओं के साथ मौहम्मद द्वारा किए गए व्यवहार की आलोचना करते हैं, उनकी शादियों की आलोचना करते हैं। मौहम्मद पर परपीड़न-रति ;दूसरोें को पीड़ा देकर काम सुख की अनुभूति करना और निर्दयी होने का आरेाप लगाते हैंद्ध, मदीना में बानू कुरैज़ा ट्राइब पर आक्रमण उनकी निर्दयता का ज्वलन्त एक उदाहरण बताया जाता है। इसके अलावा गुलामों के साथ लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करना ;सम्भोग करनाद्ध, मात्र 6 वर्ष की आयशा के साथ शादी करने की भी आलोचना की जाती है क्योंकि अधिकांश अनुमानों के अनुसार मौहम्मद ने 9 वर्ष की आयु में ही आयशा के साथ सहवास कर लिया था।’

अभी तक पुस्तिका के 8 पेज ही हुए हैं और इसके लेखक जो बातें वह पहले कह चुके हैं बस वही घुमा फिरा कर फिर से कह रहे हैं। जैसे कहते हैं कि ‘आधूनिक काल में मौहम्मद के आलोचक उनके स्वयं को पैग़म्बर घोषित करने को लेकर उनकी सच्चाई पर सन्देह करते हैं।’ इस पर हम विस्तार से बात कर चुके हैं, और आप को दिखाया है कि मध्यकाल हो या आधूनिक काल, सत्य केवल उसकी समझ में आएगा जिसके सात्विक कर्म अधिक हों। गाली गलोच करने वाले या दूसरे का माल बेच कर खाने वाले किसी व्यक्ति के लिए कौन कहेगा कि वह सात्विक का ‘स’ भी जानता होगा।

फिर पुस्तिका के लेखक ने लिखा है कि ‘इसी प्रकार आधुनिक विचारक उनकी नैतिकता पर शंका करते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार में गुलाम रखने की आलोचना करते हैं, शत्रुओं के साथ मौहम्मद द्वारा किए गए व्यवहार की आलोचना करते हंै, उनकी शादियों की आलोचना करते हैं।’ इनमें से अधिकतर आरोपों पर भी हम विस्तार से बात कर चुके हैं। अवतार मौहम्मद के नैतिक मूल्य ऐसे थे कि दुश्मन भी सच्चा और ईमानदार मानते थे, लोग केवल उनके आचरण से प्रभावित होकर उनकी शिक्षा को अपना लेते थे, युद्ध प्रारंभ करने को लेकर, युद्ध के दौरान और समाप्ति के बाद उनके द्वारा बताए कानून आज भी तमाम इंसान मानने लगें तो दुनिया में कभी युद्ध हो ही न; दुनिया में केवल अम्न और सलामती हो। अपने पास ताक़त होते हुए भी शत्रु को माफ कर देने के अनगिनत उदाहरण हमारे सामने हैं, यहां तक कि उनके साथ के मुसलमानों को भी अहिंसा और माफ कर देने की ऐसी सख़ावत समझ नहीं आती थी। 

हक़ीक़त तो यह है कि अवतार मौहम्मद के बाद यदि इस्लाम के अन्दर ऐसे लोग पैदा हो गए जिन्होंने इस्लाम की शिक्षा को पथभ्रष्ट किया तो यह केवल अवतार मौहम्मद के माफ कर देने की प्रवृत्ति के कारण। जो भी युद्ध करने न आए, उससे युद्व न करने के उनके उसूल के कारण। अधिकांश शासक जिससे ज़रा भी खतरा देखते हैं उसे कत्ल कर देते हैं, नहीं तो कैद में डाल देते हैं। आज भी कुछ इस्लामी देश हैं जहां घर में बिना कारण 15-20 लोग भी जमा हो गए तो उस व्यक्ति को क़ैद में डाल दिया जाता है। इसके पीछे डर है कि कहीं कोई साज़िश तो नहीं हो रही। लेकिन अवतार मौहम्मद के यहां तो उसूल था कि गुनहगार कोई जब ही समझा जाएगा जब उसने गुनाह कर लिया हो। यही कारण था कि बड़े बड़े शातिर लोगों ने जब देखा कि अब इस्लाम में शामिल हो जाने में ही भलाई और लाभ है तो वे अपना शातिराना दिमाग़ लिए हुए इस्लाम में शामिल हो गए।

पड़ौसी से लेकर मेहमान तक, भाई, पत्नी और मां से लेकर किसी दूसरे धर्म के मानने वाले तक, ग़रीब से लेकर दौलतमंद तक, ताक़तवर से लेकर अनाथ, विधवा और बेसहारा तक, जानवरों से पेड़ पौधों तक, तमाम दुनिया के इतिहास में किसी ने हर एक के हक़ को इतना विस्तार से नहीं बताया जितना अवतार मौहम्मद ने। न केवल बताया, बल्कि उस पर चल कर बताया। और अपने रब की इबादत तो ऐसे की कि कुरान बोल उठा कि अपने आप को इतना कष्ट न दें। पर यदि कोई कमअक़ल हर बात पर केवल यह कह दे कि ‘उन्होंने अपना व्यवहार ऐसा दिखाया कि लोग उन पर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें’ तो साफ है कि आलोचक उनके व्यवहार में कमी नहीं निकाल पाए तो इस प्रकार की बातें करने लगे। 

पुस्तिका के लेखक द्वारा गुलाम प्रथा की आलोचना की गई है, इस पर हम विस्तार से बात कर चुके हैं। जहां युरोप और अमरीका 18वीं सदी तक गुलामों के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे थे कि आज भी उनका उल्लेख पढ़ कर इंसान सिहर उठता है और यह प्रथा इंसान के दिल और दिमाग़ में ऐसी रची बसी थी कि अमरीका को एक गृह युद्ध से गुज़रना पड़ा जब इस प्रथा को समाप्त करने का फैसला लिया गया, वहीं अवतार मौहम्मद ने कुछ ही वर्षों में इस प्रथा को ऐसे समाप्त किया कि मुसलमान एक दूसरे से होड़ लगाते हुए गुलाम आज़ाद कर रहे थे। 

हम पहले बता चुके हैं कि अन्य सामाजिक समस्याएं न खड़ी हो जाएं, इसलिए इनको आहिस्ता आहिस्ता आज़ाद करना आवश्यक था। अवतार मौहम्मद ने न केवल गुलाम या कनीज़ को आज़ाद करने के रास्ते खोले बल्कि उनके साथ बराबरी का सुलुक करने का उपदेश दिया और उनके हुकूक़ को भी पूरा करने की नसीहत की। यहां तक कि लोग अपने गुलाम के साथ बैठकर खाना खाने लगे, उनको अच्छे कपड़े पहनाने लगे और उनके आराम का पूरा ख़्याल रखने लगे। 

भारत में गुलाम प्रथा हमको इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि यहां एकदम दूसरे समीकरण बन गए थे जिन के अनुसार एक पूरी जाति को गुलामों से भी बदतर जीवन व्यतीत करना पड़ रहा था। इसके बावजूद दास और दासियां रखना तो यहां भी आम बात थी और अनेक स्थानों पर या घरों में आज तक दास या दासियां पाई जाती हैं। 

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क्यों करीं इतनी शादियां

एक बात जिस पर अभी विस्तार से बात होना शेष है वह अवतार मौहम्मद की कई शादियों को लेकर है। उनकी 9 या 13 शादियों के कारण उनके कई आलोचक उन्हें womaniser या sex addict तक कह देते हैं। हालांकि जो बात ग़ौरतलब है वह यह कि यह कैसा womaniser या sex addict था जो रिश्तो की पाकीज़गी की बात करता था, जो केवल 9 रिश्तों के अतिरिक्त किसी औरत की ओर आंख उठा कर भी देखने को मना करता था, जो नामहरम को छूने या हाथ लगाने या हाथ मिलाने की भी इजाज़त नहीं देता था और जो शादी के बाहर बने रिश्ते को इतनी सख़्ती से नाजाएज़ कहता था कि यदि दुनिया में कुछ गुनाहों की सज़ा रखी तो उसमें यह गुनाह भी शामिल है? 

इस संदर्भ में आवश्यक हो जाता है कि इस्लाम में सैक्स और शादी के कानसैप्ट को समझें। लेकिन पहले यह बताना आवश्यक है कि adultery यानी शादी के पाक रिश्ते के बाहर सैक्स हर ज़माने में नाजाएज़ ही रहा है। Exodus के अनुसार मूसा को दी गई 10 Commandments में से एक थी “Thou shalt not commit adultery” (Exodus 20:14) 

Leviticus और Deuteronomy के अनुसार यदि कोई जोड़ा अवैघ संबंध बनाता है तो उसे मार दिया जाना चाहिए।

These three sins absolutely must be avoided: adultery (Leviticus 20:10), idolatry and murder. 

If a man is found lying with the wife of another man, both of them shall die, the man who lay with the woman, and the woman. So you shall purge the evil from Israel. 

(Deuteronomy 22:22)

Adultery is considered a great sin 

Genesis 20:9, Genesis 39:9)

यहूदियों में शादी के बाहर नाजाएज़ संबंध बनाने की सज़ा पत्थरों से जान जाने तक मार देना था। इस्लाम ने इस क़ानून को थोड़ा हल्का करते हुए गै़र शादीशुदा मर्द और औरत के बीच बने शारिरिक संबंध की सज़ा को सरेआम कोड़े मारने तक सीमित कर दिया। इसके साथ ही इस्लाम ने नाबालिग़ लड़कियों के साथ शारिरिक संबंध को भी सख़्ती से मना किया। हालांकि आम तौर पर कहा जाता है कि लड़के 15 वर्ष पर बालिग़ होते हैं और लड़कियां 9 वर्ष पर। यहां गौर करने की बात यह है कि इस्लाम ने ज़बरदस्ती शादी करने की ज़िम्मेदारी मां बाप पर नहीं रखी बल्कि स्वयं लड़के और लड़की पर रखी है। यदि लड़के या लड़की पर निर्भर है कि वह अपना वर चुनें और यह कि कब शादी करना है तो वे तब ही तो करेंगे जब उन्हें अपने शरीर के अन्दर महसूस होने लगे कि अब उनको शादी कर लेना चाहिए। 

यह प्रथा तो भारत में थी कि बहुत छोटी उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती थी और 8-9 वर्ष के होते होते वे अपने ससुराल पहुंचा दी जाती थीं। आप की जानकारी में होगा कि भारत में 1860 मेें Indian Panel Code लागू हुआ। इसका सैक्शन 365 बलात्कार की बात करता है। उस समय यह marital rape की बात करते हुए कहता था कि यदि पत्नी 10 वर्ष से ऊपर है तो इसे बलात्कार नहीं समझा जाएगा। 1890-91 में इसमें बदलाव करते हुए उम्र को 12 वर्ष किया गया और 1949 में इसको 15 वर्ष किया गया। यानी 1860 तक Indian Panel Code 10 वर्ष की लड़की से विवाह की अनुमति देता था। याद रखने की बात यह है कि यह कानून 10 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के विवाह पर पाबन्दी लगाने के लिए बना था जो बहुत अधिक संख्या में हो रही थीं। यह भी याद रखिए कि यह 1860 के भारत की बात है जबकि अरब के रेगिस्तान में पली बढ़ने वाली लड़कियो के लिए कहा जाता था कि वह औरों से पहले जवान हो जाती थीं। 

तंज़ानिया में 1971 का Marriage Act आने तक मुस्लिम और हिन्दु लड़कियों की 12 वर्ष के होने पर शादी की जा सकती है यदि 15 वर्ष की आयु पर विवाह सम्पन्न हो। सूडान में Personal Status of Muslims Act of 1991 दस वर्ष तक के लड़कों और लड़कियों की शादी जाएज़ करता था और इसमें 2020 के अंत में ही बदलाव किया गया है। फिलीपींस में भी 10 वर्ष पर लड़की की और 15 वर्ष पर लड़के की शादी की जा सकती है और इस क़ानून में जनवरी 2022 में बदलाव किया गया है।  

आईए देखें इस विषय पर गूगल क्या कहता है? 

Before the industrial revolution, in many parts of the world, including India, China and Eastern Europe, women tended to marry immediately after reaching puberty, in their mid-teens. Societies where most of the population lived in small agricultural communities were characterized by these marriage practices well into the 19th century.

In ancient and medieval societies, it was common for girls to be betrothed at or even before the age of puberty, According to M.A. Friedman, “arranging and contracting the marriage of a young girl were the undisputed prerogatives of her father in ancient Israel.” Most girls were married before the age of 15, often at the start of their puberty. In the Middle Ages the age at marriage seems to have been around puberty throughout the Jewish world. 

Ruth Lamdan writes: “The numerous references to child marriage in the 16th-century Responsa literature and other sources, shows that child marriage was so common, it was virtually the norm. In this context, it is important to remember that in halakha, the term “minor” refers to a girl under twelve years and a day. A girl aged twelve and a half was already considered an adult in all respects.” 

In Ancient Greece, early marriage and motherhood for girls existed. Even boys were expected to marry in their teens. Early marriages and teenage motherhood were typical. In the Roman Empire, girls could marry from age of 12 and boys from age 14. In the Middle Ages, under English civil laws that were derived from Roman laws, marriages before the age of 16 existed. In Imperial China, child marriage was the norm. 

In contrast to other pre-modern societies – and for reasons that are subject to debate – Northwest Europe was characterized by relatively late marriages for both men and women, with both sexes commonly delaying marriage until their mid-20s or even 30s. The data available for England suggest that it was already the case in the 14th century. This pattern was reflected in English common law, which was the first in Western Europe to establish statutory rape laws and ages of consent for marriage. In 1275, sexual relations with girls under either 12 or 14 (depending on interpretation of the sources) were criminalized; a second law was made with more severe punishments for under the age of 10 in 1576. In the late 18th and early 19th centuries, the British colonial administration introduced marriage age restrictions for Hindu and Muslim girls on the Indian subcontinent.

Jewish scholars and rabbis strongly discouraged marriages before the onset of puberty, but at the same time, in exceptional cases, girls ages 3 through 12 (the legal age of consent according to halakha) might be given in marriage by her father. By Judaism, the minimal girl age, for marriage, was 12 years and one day, “na’arah”, as mentioned in the ancient Talmud Mishnah books (compiled between 536 BCE – 70 CE, redacted in the 3rd century CE), Order Nashim Masechet Kiddushin 41 a & b. 

According to halakha, girls should not marry until they are 12 years and six months old, “bogeret”. Although Moses Maimonides mentions in the Talmud Mishneh Torah (compiled between 1170 and 1180 CE) that in exceptional cases girls ages three through 12 might be given in marriage by her father, he also clarifies in verse 3:19 of the same chapter that: “Although a father has the option of consecrating his daughter to anyone he desires while she is a minor or while she is a maiden, it is not proper for him to act in this manner”.

रोचक बात यह है कि ये तमाम लोग अवतार मौहम्मद की 9 वर्ष की आयु में आयशा के साथ शादी का उपहास उड़ाते हैं। भारतीय भी अन्यों की देखा देखी वही बातें करने लगते हैं, जबकि भारत में बाल विवाह की प्रथा 20वीं शताब्दी में भी आम थी। हालांकि मैं आगे साबित करूंगा कि जब अवतार मौहम्मद की आयशा से शादी हुई तब आयशा की उम्र कम से कम 15 वर्ष थी।

भारतीय रस्मो रिवाज की तर्ज़ पर यहां के मुसलमानों में भी यह प्रथा आ गई कि मां बाप रिश्ता तय करने लगे, और लड़के और लड़की की मर्ज़ी को केवल रस्म तक रहने दिया। अन्यथा इस्लाम इजाज़त देता है कि कोई भी बालिग़ लड़का या लड़की जब महसूस करे कि अब उसे पार्टनर की आवश्यकता है और पार्टनर के बिना उसे परेशानी हो रही है या डर है कि वह गुनाह कर लेगा, तो उसे शादी के बंधन में बंध जाना चाहिए लेकिन किसी भी हाल में शादी के बाहर शारिरिक रिश्ते में लिप्त नहीं होना चाहिए। 

डाक्टरी साईंस के अनुसार कोई भी युवक 18 वर्ष की उम्र में अपनी sexual life की चरम सीमा पर होता है जबकि हमारे समाज में उसको बच्चा ही समझा जाता है। लेकिन समाज ने शारिरिक आवश्यकता के स्थान पर कॅरियर और बैंक बैलेंस बनाने के बाद शादी के बंधन में बंधने की बात की, जिसमें बहुतेरे लोग ज़िन्दगी enjoy कर लेने के बाद बच्चे की ख़ातिर या बुढ़ापा अच्छे से गुज़र जाए इसलिए शादी के बंधन में बंधने लगे। समाज से नैतिक मूल्य यानी  social values यदि ग़ायब हो गईं, तो यह मानसिकता उसका बड़ा कारण है। 

इस्लाम ने जहां मर्द और औरत की शारीरिक आवश्यकता का ध्यान रखा है वहीं इस बात का भी ध्यान रखा है कि समाजी एवं नैतिक ताना बाना बना रहे और कौन बच्चा किस मां बाप से है यह सबको पता रहे। ज़रा सोचिए, भारत में जितनी कट्टरता जाति को लेकर है, यदि यही समाप्त हो गया तो फिर जाति का कैसे पता चलेगा, श्राध आदि की रस्में कैसे पूरी की जांएगी। 

आज के दौर में अनेक देश ऐसे हैं जहां महिलाओं का अनुपात मर्दों से बहुत अधिक है। कई पूर्वी युरोप के देश इस समस्या से पीड़ित हैं। आप यूटयूब पर वीडियो देख सकते हैं कि उन देशों में क्या हाल है, कैसे वहां की जवान लड़कियां हर मुमकिन कोशिश करती हैं कि किसी प्रकार किसी युवक की नज़रों में आ जाएं और वह उनसे शादी कर ले। ऐसे एक नहीं बल्कि असंख्य वीडियो आप को यूटयूब पर देखने को मिल जाएंगे जिससे अंदाज़ा होता है कि यह समस्या कितनी बड़ी है। ज़रा दिल पर हाथ रख कर सोचिए, यदि जवान और सुन्दर लड़कियों के लिए यह समस्या है कि कहीं वे बिना विवाह के न रह जाएं तो फिर विधवाओं से, जिन औरतों की उम्र कुछ अधिक हो गई है, जिन के पति ने उन्हें त्याग दिया है या जिनकी तलाक़ हो गई है, उनसे कौन शादी करेगा?

इस्लाम क़यामत तक के लिए बनाया गया दीन है क्योेंकि इस्लामिक मान्यता के अनुसार अवतार मौहम्मद के बाद कानून की पुस्तक लेकर कोई अन्य अवतार आने वाला नहीं है। फिर इस्लाम इस ज्वलंत समस्या को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता था। विशेषकर उस अरब समाज में जहां के भीषण रेगिस्तानी माहौल में, युद्ध के कारण या सफर में मर्दों की औरतोें से कहीं अधिक मौतें हो जाती थीं और औरतों का मर्दों के मुक़ाबले में अनुपात बढ़ना लाज़मी था। फिर युद्ध या सफर में या बीमारी के कारण मरने वाले मर्दों की विधवाओें की समस्या थी जिसका हल निकालना था। मर्दों का एक औरत से दिल भर गया और उसे छोड़ दिया तो इस्लाम को एक ओर इस समस्या का निवारण करना था कि मर्द ऐसा न करें परन्तु यदि किसी ने ऐसा कर ही दिया तो फिर उस महिला के लिए भी जीवन बसर करने का रास्ता निकालना था। 

किसी विधवा का, कुरूप औरत का या जिसकी उम्र अधिक हो गई है उसका भला कौन ख़्याल रखता जबकि नवजवान लड़कियों की बहुतात हो। केवल वही रख सकता था कि जिसके दिल में अल्लाह का डर या इंसानियत हो। इस्लाम सामाजिक ताना बाना भी नहीं बिगाड़ना चाहता था और समाज में moral values को बनाए रखना चाहता था। इसलिए आवश्यक था कि वह मर्द उस औरत से शादी कर ले। न तो दोनों के किसी नाजाएज़ रिश्ते में बंधने का डर हो और इस तरह औरत को social security यानी सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जा सके। 

मर्द और औरत का नेचर बनाने वाला बहुत अच्छी तरह जानता था कि दोनों की आवश्यकताएं क्या है। मर्द को सुकून की आवश्यकता है जबकि औरत समर्पण के भाव से ओत पोत होती है। कभी वह बाप और भाई को अपना समझती है तो शादी हो जाने के बाद पति की हो जाती है और एक समय आता कि बच्चों के आगे किसी को कुछ नहीं समझती। औरत की सैक्सुअल आवश्यकता को भी पूरा करने के लिए इस्लाम ने कहा कि जब तुम को महसूस हो कि शादी कर लेना चाहिए तभी कर लो। 

इस्लाम ने सैक्स को कभी भी टैबू नहीं समझा। मुसलमानों ने उसको टैबू बना दिया दूसरे धर्माें के सम्पर्क में आ कर। यदि नैचरल इंस्टिक्टस इन दिव्यात्माओं ने बनाई हैं तो इन से अधिक कौन है जो समझ सके कि मर्द की अपने नेचर के हिसाब से क्या जरूरत है और औरत की क्या है। जो इंस्टिंक्टस को पैदा करने वाली ताकतें हैं उनसे अधिक बेहतर कानून और कौन बना सकता है। इस्लाम ने उन नैचरल इंस्टिंक्टस को बांधने या बंद करने का नहीं बल्कि उसको जाएज़ हदों में सीमित करने का, रेगुलेट करने का काम किया है। 

इस्लाम जानता था कि मर्द और औरत जब मिलते हैं तो उनमें से कुछ में अधिक निकटता या प्यार का जज़बा पैदा होना लाज़मी है। ऐसे में मर्द को एक से अधिक शादी करने की अनुमति दी, और यदि एक पत्नी शारिरिक या मानसिक सुख नहीं दे पा रही या किसी और की चाहत है तो मसाज पार्लर में या थाईलैंड जैसे देश जाने के स्थान पर या अपनी चाहत से अवैध रिश्ता बनाने की जगह शादी या मुता की इजाज़त दी। हर ग़ैर शादी शुदा औरत भी आज़ाद है जिस नामहरम से चाहे शादी करे या यदि शादी में नहीं बंधना चाहती तो मुता कर ले। किस बच्चे का बाप कौन है और सामाजिक ताना बाना न बिगड़ जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए औरत को एक समय में एक से अधिक मर्द से रिश्ता बनाए रखने की अनुमति नहीं है। यदि औरत अपने पति से संतुष्ट नहीं है या कोई दूसरा जाएज़ कारण है तो वह कभी भी उस रिश्ते से बाहर निकल सकती है। यह जाएज़ कारण पति का कामसुख न दे पाना भी हो सकता है!

कलियुग के इस दौर में हम देखते हैं कि शादी के बाहर रिश्ते आम हो गए हैं, live-in relationships तक की खुले आम बात हो रही है और शादी महज़ औपचारिकता मात्र रह गई है। ऐसे जोड़े जो live-in relationships में रह रहे हैं और कोई पाबंदी या बंदिश नहीं चाहते वहां इस्लाम ने ऐसी सोच रखने वालों के लिए भी मुता का कानून बनाया था जिसके तहत कोई भी मर्द या औरत किसी ख़ास मुद्दत के लिए पहले से तय शर्तों के तहत किसी कान्टेªक्ट में बंध सकते हैं। यदि इस कान्टेªक्ट के तहत बच्चा पैदा होता है तो उसे बाप का नाम मिलेगा। 

ज्ञात हो कि मुता का कानून अवतार मौहम्मद के बाद कुछ वर्ष तक लागू था परन्तु फिर उस पर पाबंदी लगा दी गई। अली जानते थे कि यह कानून मर्द और गैर शादीशुदा औरत की शारिरिक जरूरत को पूरा करने के लिए है। यदि कोई विधवा या तलाक़शुदा औरत है लेकिन शादी नहीं कर सकती या कोई उससे शादी करने को तैयार नहीं है, और उसको किसी साथी की आवश्यकता है तो वह भी मुता कर सकती थी। कोई मर्द सफर में है या सिपाही कहीं दूर सरहद पर तैनात है या फौजें किसी दूसरे देश में पड़ाव डाले हुए हैं तो भी नाजाएज़ रिश्ता बने इसको रोकने के लिए इस्लाम जाएज़ हदों में रहते हुए अपनी शारिरिक आवश्यकता की पूर्ती करने को कहता है। यही कारण है कि अली ने कहा कि यदि मुता के कानून पर पाबंदी नहीं लगा दी गई होती तो क़यामत तक कोई मुसलमान ज़िना यानी adultery नहीं करता। साफ है कि इस्लाम सैक्स की आवश्यकता को समझता है, उसे आसान बनाना चाहता है पर साथ में विनियमित एवं नियंत्रित करना चाहता है। बलात्कार की तो किसी भी हाल में स्वीकृति नहीं देता, जैसा कि पुस्तिका के लेखक कह रहे हैं।

जो लोग इस्लाम पर आरोप लगाते हैं कि इसने शादी से बाहर रिश्ता बनाने वाले मर्द या औरत के लिए इतने सख़्त क़ानून बनाए, वे भूल जाते हैं कि यह कानून तो मूसा के दौर से चले आ रहे थे और इस्लाम ने इन में नर्मी बरती है। अवतार मौहम्मद से पहले तक यदि पति अपनी पत्नी पर विश्वासघात का आरोप लगा देता था या कोई भी किसी नफरत या गुस्से के कारण किसी महिला पर किसी से शारिरिक रिश्ता बनाने का आरोप लगा देता था तो उसे पत्थर मारे जाते थे जब तक कि वह मर न जाए। इस्लाम ने अवैध संबंध साबित करने के लिए 4 बालिग़ गवाहों की शर्त लगा दी। यानी यह कि यदि 1 या 2 या 3 गवाह भी हैं, तो यह सज़ा नहीं मिल सकती। ज़रा सोचिए, 4 बालिग़ गवाहों को दिखाकर यदि कोई अवैध संबंध बना रहा है तो फिर उसे social या moral values की ज़रा भी परवाह नहीं है तभी तो वह ऐसा कर रहा है। अन्यथा कौन अक़लमंद मर्द या औरत ऐसे हालात में अवैध रिश्ता बनाएगा कि चार गवाह खड़े हो जाएं। साफ है कि इस्लाम की नज़र में सामाजी ताना-बाना बना रहे, इसकी बड़ी अहमियत है। जो गुनाह कर भी रहे हैं, यदि वे खुलेआम समाज से बेपरवाह हो कर कर रहे हैं तो उन्हें तो सज़ा मिलनी ही चाहिए। 

यदि किसी ने गुनाह किया है और तौबा के माध्यम से पश्चाताप करना चाहता है तो अल्लाह हर प्रकार के गुनाहों को माफ कर देने की बात करता है यदि सच्चे दिल से इंसान को पश्चाताप है।

Quran.39.53:

Say, O My servants who have transgressed against themselves (by sinning), do not despair of the mercy of Allah. Indeed, Allah forgives all sins. Indeed, it is He who is the Forgiving, the Merciful

यदि तुम ने किसी को गुनाह करते देखा भी है तो इस्लाम तुम को किसी और से उसकी बात करने की अनुमति नहीं देता और ग़ीबत के लिए कहता है कि यह अपने मृत भाई का मास खाने के बराबर गुनाह है। सोचो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? अल्लाह जानता है कि जिन लोगों को उसने मासूम यानी गुनाहों से पाक बनाया है उनके अतिरिक्त हर कोई पर तमस यानी जुलमत अपने डोरे डालने में लगी है। वह भी उन पर अधिक शक्तियां लगाती है जिनके बारे में वह जानती है कि ये हक़ के मार्ग पर हैं या उस मार्ग पर आ सकते हैं। भारतीय पौराणिक कथाओं में विश्वामित्र का उदाहरण दिया जाता है जो मोक्ष के पथ पर अग्रसर थे लेकिन तमस यानी जुलमत ने एक सुन्दर नर्तकी के माध्यम से उन्हें नीचे खींच लिया। 

इस्लाम तुम से हर किसी के गुनाह छिपाने को कहता है इसलिए कि वह जानता है कि तमस यानी जुलमत उसकी कुदरत में उतनी ही शक्तिशाली है जितनी हिदायत की ताक़त। मुमकिन है कि जिस ने किसी कमज़ोर लम्हे में कोई गुनाह किया हो, और उस पर पश्चाताप कर रहा हो, और जिस समय तुम उसके गुनाह को दूसरों को बता रहे हो, उसका रब उसके गुनाह को माफ कर चुका हो। 

इसका एक और कारण भी है! इस्लाम के अनुसार कुछ गुनाहों की सज़ा उस समय तक नहीं दी जा सकती जब तक चार लोग उस गुनाह की गवाही न दें। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लाम जानता है कि हर आम इंसान कमज़ोरी के पलों से गुज़रता है। यदि किसी ने कोई गुनाह किया और तुम को उसकी ख़बर है तो तुम किसी दूसरे से उसकी बात नहीं कर सकते। उसको उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए जब तक कि गवाही देने को चार गवाह सामने न आ जाएं। चार गवाहों का सामने आने का अर्थ है कि अब यह उसका निजी गुनाह नहीं रहा बल्कि उस व्यक्ति के कर्म से समाजी ताना-बाना बिगड़ने का डर है। इसलिए उसको सज़ा देना लाज़मी है। 

जिनको तुम बहुत बड़ा ज्ञानी, बड़ा प्रचारक, गुरू आदि समझ रहे हो, यदि वह सत्यमार्ग की ओर अग्रसर है तो यह समझ लो कि तमस यानी जुलमत उसके खि़लाफ भी तमाम कारिंदे लगा देगी। मुमकिन है जब तुम उसके किसी बुरे कर्म को दूसरों को बता रहे हो, तमस यानी जुलमत ने तुम्हें छोड़ रखा हो पर उसके खि़लाफ अपने कारिंदों की फौज लगा रखी हो कि इसको सत्य मार्ग पर आगे बढ़ने से रोकें। 

इस सब वार्तालाप से उन perfectly pure हस्तियों की आवश्यकता और अधिक समझ आती है। क्यों आवश्यक है कि कुछ हस्तियां ऐसी हों जिन की पाकीज़गी की गवाही स्वयं तुम्हारे रब की ओर से हो, जिन पर तुम आंख बंद करके भरोसा कर सको और उन्हें अपना गुरू मानते हुए उनका अनुसरण कर सको। इन्हीं पाक हस्तियों की गीता सप्तऋषि कह कर बात कर रही है। दुनिया के गुरू तो समय के अवतार के खि़लाफ भी मोर्चाबंदी कर सकते हैं जैसा हमने महाभारत के युद्ध में देखा; जिनको उसने इंसान के लिए गुरू बनाया है उनके बताए मार्ग पर चलते रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे। 

अपने विषय पर वापिस पलटते हैं और आपको ईसा की ज़िन्दगी का एक वाक़ेया याद दिलाते हैं! John 7:53-8:11 के अनुसार फारसी लोग ईसा के सामने एक औरत को पकड़ कर लाए और उनसे पूछा कि क्यों न इस औरत को यहूदी क़ानून के अनुसार मार देना चाहिए जो अवैध सैक्स करती पकड़ी गई है।

यहां पर उल्लेखनीय है कि यदि औरत को अवैध रिश्ता बनाने के लिए पकड़ा गया होगा तो उसके साथ मर्द भी यक़ीनी तौर पर होगा। लेकिन केवल बेसहारा औरत को लाया गया जो दिखाता है male chauvinistic society में मर्द के लिए भिन्न क़ानून थे और औरत के लिए भिन्न। इस्लाम ने यहां पर भी बराबरी दिखाते हुए दोनों के लिए एक समान क़ानून बनाया। 

ईसा ने उनकी बात को नज़रअंदाज़ करना चाहा। लेकिन वह इस ज़िद पर अड़े थे कि ईसा अपना फैसला सुनाएं। ईसा ने उनसे कहा कि इस औरत पर पहला पत्थर वह मारे जिस ने स्वयं कभी गुनाह न किया हो। तमाम लोग पीछे हो लिए। 

यह तो उस समय की बात थी जब गुनाह समाज पर इतने भी हावी नहीं हुए थे। आज जब हम कलियुग के अंत की ओर अग्रसर है, बहुतेरे लोग विवाह को मात्र औपचारिकता मानते हैं, निचली और ऊपरी सोसायटी में रिश्तों की पाकदामनी कम से कम होती जा रही है और कई लोग इसे middle class syndrome नाम देते हैं तथा थाईलैंड जैसे देशों में मसाज पार्लर आदि के नाम पर सैक्स मंडियां बन चुकी हैं जहां पत्नी को घर में छोड़ बहुतेरे लोग व्यापार के नाम पर जाते हैं और घूम कर आते हैं, इस दौर में भी इस्लामी शिक्षा समाजी ताना-बाना बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। 

इस परिपेक्ष में आईए देखें इस्लाम में शादी का कानसैप्ट और पढ़ें अवतार मौहम्मद की शादियों के बारे में!

जैसा हम ने कहा कि इस्लाम चाहता है कि लड़का या लड़की स्वयं तय करें कि क्या अब उन्हें शादी की ज़रूरत है और फिर यह तय करें कि किससे शादी करना है। Puberty तक पहुंचने यानी बालिग़ होने से पहले शादी किसी भी हाल में जाएज़ नहीं। फिर जो लोग यह कहते हैं कि आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी के समय उम्र 6 वर्ष थी वे भूल जाते हैं कि स्वयं अवतार मौहम्मद द्वारा पेश किए गए इस्लाम में puberty तक पहुंचने से पहले लड़का या लड़की शादी नहीं कर सकते थे।

हां कुछ कारण तो हैं कि अवतार मौहम्मद या अन्य अहललबैत ने कई कई शादियां कीं। ये वही समझ सकता है जो समझता है कि नबी सुलेमान की इस्लामिक सोर्सेज़ के अनुसार 100 और बाईबल के अनुसार 700 पत्नियां और 300 concubines थीं। Concubines का dictionary में ‘उपस्त्री’ अनुवाद दिया है। कृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियां और 16000 या 16100 दूसरी पत्नियां थीं। विकिपीडिया ने इनको junior wives नाम दिया है। अब जऱा बताईए जूनियर वाईव्ज़ के क्या अर्थ है। आप जिसको लौंडी या कनीज़ कहते हैं, क्या उसी के क़रीब ये जूनियर वाईव्ज़ नहीं आतीं?

कहते हैं यह junior wives नरकुश नामी राजा की सेवा में थीं। जब कृष्ण ने नरकुश का वध किया तो इन तमाम महिलाओं ने अपने को कृष्ण को सुपर्दु कर दिया। इनकी गरिमा बचाए रखने के लिए कृष्ण ने इन्हें junior wives के रूप में रख लिया। 

जो लोग समझाने के लिए कहते हैं कि वे इसलिए कृष्ण के साथ थीं क्योंकि उन्होंने स्वयं को कृष्ण के सुपुर्द कर दिया था वे बताएं कि आज यदि 5 पत्नियां रखने वाला कोई मर जाए और उसकी पत्नियां अपने को मेरे सुपुर्द करें तो क्या मैं उन्हें junior wives बना सकता हूँ? इस्लाम ने यहां पर ही मुता का कानून दिया था लेकिन अवतार मौहम्मद के बाद यह क़ानून मुसलमानों में ज़्यादा समय तक राएज नहीं रह सका। साफ है कि कृष्ण को यदि यह विशेष छूट थी तो इसलिए कि वह अवतार थे। यदि हम अवतार मौहम्मद को उसी सोर्स का अवतार मानते हैं जिस सोर्स से कृष्ण थे, तो हमें समझना चाहिए कि अवतार को कुछ विशेष छूट दी जाती रही हैं और उनमें एक यह है। 

अवतार मौहम्मद पर 9 या 13 शादियां करने की आलोचना करने वाले भूल जाते हैं कि उनके लिए और भी विशेष कानून थे। जैसे आम मुसलमान पर दिन में केवल 17 रकअत नमाज़ फर्ज़ है। लेकिन अवतार मौहम्मद के लिए देर रात में पढ़ी जाने वाली सलातुल लैल भी फर्ज़ थीं। क्यों कोई नहीं कहता कि उनके लिए औरों से अधिक इबादत क्यों फर्ज़ की गई थी?

यदि आप ये समझाना चाहें कि कृष्ण उन सारी जूनियर वाईव्ज के पास नहीं जाते थे, तो जहां इतनी अधिक पत्नियों का उल्लेख है वहीं आठ पत्नियों से 80 पुत्रों और प्रत्येक 16000 junior wives से एक एक पुत्री और दस दस पुत्रों तक का उल्लेख है। कहीं पर केवल एक लाख से अधिक पुत्रों की बात लिखी है। 

मान्यता है कि नारद को समझ में नहीं आ रहा था कि कृष्ण इतनी सारी पत्नियों के पास कैसे जाते हैं तो एक रात नारद ने चैक करने की सोची। उनके अचंभे का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि कृष्ण सारी 16008 पत्नियों के पास ऐसे मौजूद थे जैसे बस एक के पास हों। 

इंसाफ और अदालत की बात करने वाले बताएं कि क्या उन पत्नियों की शारिरिक आवश्यकताएं नहीं थीं जिनसे कृष्ण ने शादी की थी? अवश्य थीं, और सृष्टि के मालिक से सीधा संबंध रखने वाले कृष्ण से आशा नहीं की जा सकती कि वह इन पत्नियों की तमाम आवश्यकताओं की चिंता नहीं करेंगे। उनमें से कुछ आवश्यकताएं पत्नी होने के तहत उनके अधिकार थे।

आप यह अवश्य कह सकते हैं कि यह सब झूठी मनघडं़त कहानियां हैं जो पौराणिक पुस्तकों में आ गईं। यदि ऐसा है तो समझिए कि ज़ुलमत यानी तमस कभी भी नहीं चाहती कि हक़ के नुमाईंदों की सही शिक्षा आप तक पहुंचे और आप उसे ग्रहण करें। यही कारण है कि चाहे कृष्ण का समय हो या मौहम्मद का, जुलमत यानी तमस के कारिंदों ने अनेक ऐसी बातें किताबों में दाखि़ल कर दीं कि हर ज़माने में वे लोगों को हक़ और हक़ीक़त की समझ से दूर रखने का काम करें। 

मैं तो साबित करता आ रहा हूँ कि जिस दिव्यात्मा का कोई अंश कृष्ण के शरीर में काम कर रहा था, वही सारे अंश अहललबैत के शरीर को आफिस बना कर इंसानियत को सत्यमार्ग की डगर पर लाने और चलाने के काम में लगे थे। यही कारण है कि मेहदी को आज भी बहुतेरे लोग ‘बक़ियातुल्लाह’ यानी ‘अल्लाह में का बाक़ी’ कहते हैं। इस पर भी मेरा एक लैक्चर है जो आप सुन सकते हैं। 

जिस दिन आप को कृष्ण की 16000 से अधिक शादियों का राज़ समझ में आ जाएगा उसी दिन अवतार मौहम्मद की 9 या 13 पत्नियां और हसन की 10 शादियों का राज़ भी समझ में आ जाएगा। 

अब आईए, अवतार मौहम्मद की पत्नियों का भी कुछ हाल जान लें। उनकी पहली पत्नी ख़्वेलद इब्ने असद और फातिमा बिन्ते ज़ाएदा की पुत्री ख़दीजा थीं जिनका जन्म 555 ईस्वी में हुआ था जबकि अवतार मौहम्मद का जन्म 570 ईस्वी में हुआ। इस प्रकार ख़दीजा अवतार मौहम्मद से 15 वर्ष बड़ी थीं। जब दोनों का विवाह हुआ तो ख़दीजा की उम्र 40 वर्ष और अवतार मौहम्मद की 25 वर्ष थी। इसके 15 वर्ष बाद, अवतार मौहम्मद जब स्वयं 40 वर्ष के थे तब उन्होंने अपने अवतार होने की घोषणा की और इस घोषणा के 10 वर्ष बाद तक ख़दीजा ज़िन्दा रहीं। यानी जब ख़दीजा का देहान्त हुआ तो उनकी उम्र्र 65 वर्ष थी और अवतार मौहम्मद की उम्र 50 वर्ष थी। 

अवतार मौहम्मद पर womaniser होने का आरोप लगाने वाले ग़ौर करें कि भले ही खदीजा की उम्र 65 वर्ष हो गई हो, उन्होंने उनकी ज़िन्दगी में दूसरी शादी की नहीं सोची। अपनी स्वयं की उम्र भी 50 वर्ष हो जाने के बावजूद उन्होंनेे दूसरी शादी की नहीं सोची। इसका साफ अर्थ है कि बाद में की गई शादियां किसी ख़ास परिस्तिथी में, कोई ख़ास संदेश देने के लिए, या किसी विधवा या वृद्धा को सहारा देने के लिए की गई थीं। 

आरोप लगाने वाले अकबर से लेकर महाराजा रंजीत सिंह पर, बाईज़ैनटीन शहंशाहों से लेकर उस्मानी खलीफाओं पर आरोप नहीं लगाते जिन्होंने ताक़त के नशे में सैकड़ों औरतों को अपने हरम में रखा। यह लोग एक अंग्रेज़ कवि का भी बखान करने से नहीं थकते जिसने कथित तौर पर सैकड़ों युरोपीय औरतों से शादी के बाहर संबंध बनाए। आज फिल्म एक्टर्स से लेकर राजनीतिज्ञ तक, बड़े उद्योगपतियों से लेकर कालेज में पढ़ रहे दौलतमंद घरानों के बच्चों तक, इनमें अधिकतर यदि आत्मचिंतन करें तो पाएंगे कि वे कहां कहां पर राह से भटके हैं। जुलमत के कारिंदे इसी काम में तो लगे हैं कि आप को उस मार्ग से भ्रमित कर दें जो आप की बेहतरी का मार्ग है। वे लोग जो हक़ के मार्ग की तलाश में हैं, उन पर विशेष तौर पर जुलमत यानी तमस अपनी तमाम ताक़तें लगा देती है ताकि या तो वे गुमराह हो जाएं और उस पथ पर चलने लाएक़ न रह जाएं या उनको बदनाम करके उनके शब्दों की ताक़त को छीन ले। 

ग़ौर करने की बात यह है कि अवतार मौहम्मद ने यदि अपनी ज़िन्दगी में 9 या 13 औरतों से शादी की तो उन्होंने उनसे शादी ही की, हरम नहीं बनाए, और न ही किसी से अवैघ संबंध रखे जैसा कि पुस्तिका के लेखक प्रथम पृष्ट पर छपी फोटो में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। 

यह भी याद रखने की बात है कि अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी के अंत तक 4 शादियों तक सीमित रहने का कानून भले ही आ गया हो, उनकी ज़िन्दगी में मुता करने का कानून मौजूद था, जिसके अनुसार किसी भी औरत को सहारा देने के लिए या किन्हीं और कारणों से मुता किया जा सकता था। मुता का कानून मुसलमानों ने अवतार मौहम्मद के देहान्त के बाद त्यागा। इसलिए हमें नहीं पता कि उनकी पत्नियों में कितनी से निकाह हुआ था, कितनी से मुता। 

भारत के एक आलिम का किस्सा बताए चलते हैं। वह बेहद बीमार थे। आवश्यकता थी कि कोई आया उनकी सेवा के लिए रखी जाए। पर कोई नामहरम उनको हाथ लगाए, इस्लाम इसकी स्वीकृति नहीं देता। इसके लिए पहले यह निश्कर्ष निकाला गया कि उनकी सेवा के लिए ऐसी औरत को ढूंढा जाए जिससे वह मुता कर सकें। मैंने पहले भी बताया कि यदि कोई मर्द लंबे सफर में है और उसको शारिरिक आवश्यकताओं की पूर्ती करना है, कोई मर्द और अविवाहित औरत शादी नहीं कर सकते लेकिन एक दूसरे से क़रीब आना चाहते हैं, या ऐसे और भी कारण हो सकते हैं जब मुता जाएज़ किया गया था। 

ईश्वर द्वारा बताए गए रास्ते से कोई संबंध बनाना ही उसको जाएज़ करता है। मुता पर यदि पाबंदी नहीं होती तो इस्लाम ने live-in relationship या friendship के नाम पर बनने वाले रिश्तों को भी जाएज़ करने का रास्ता बताया था। 

इस्लाम मर्द और औरत दोनों की ज़रूरतों को जानता है और केवल उन ज़रूरतों की पूर्ती में अल्लाह की याद दिलाकर उन्हें जाएज़ करता है। यही तो शादी का भी कानसैप्ट है; जो रिश्ता अन्यथा अवैध है वह अल्लाह की याद के साथ बनता है तो शादी कहलाती है। दूसरे इस्लाम यह नहीं चाहता कि कोई अवैध ढंग से अपनी वासना की पूर्ती करे और यदि बच्चा पेट में आ जाए तो उसका क़त्ल करे। बल्कि इस्लाम उस बच्चे को भी बाप का नाम देना चाहता है। यदि बच्चा नहीं चाहते तो एहतियात करो, यदि बच्चा हो जाए तो तुम उसको मारने का पाप नहीं कर सकते क्योंकि इस्लाम की नज़र में एक बेगुनाह को मारना तमाम इंसानियत का क़त्ल करने के बराबर है। 

इस्लामी इतिहास की मशहूर किताबों तारीखे इब्ने हश्शाम और तारीखे इब्ने सआद के अनुसार ख़दीजा मक्का की बहुत ही इज़्ज़तदार और ऐसी मालदार महिला थीं कि जब व्यापारिक क़ाफिले सीरिया आदि के लिए जाते थे तो उसमें केवल ख़दीजा के ऊंटों की संख्या इतनी होती थी जितनी तमाम कुरैश के व्यापारियों के होते थे। इसके अतिरिक्त आप अपना माल दूसरों को बेचने के लिए शिरकत पर भी दिया करती थीं। 

किताबों में दर्ज है कि अवतार मौहम्मद से शादी के पूर्व एक बार ख़दीजा ने सपने में देखा कि तमाम आसमान नूरानी हो गया और एक बहुत ही तेज़ किरणें डालने वाला सूर्य उनकी गोद में आ गया जिसकी रौशनी से तमाम सृष्टि दमकने लगी। ख़दीजा ने अपना सपना अपने चाचा के पुत्र वरक़ा से बताया जो बेहद ज्ञानी और रूहानी व्यक्ति थे। वरक़ा ने बताया कि तुम को मुबारक हो, क्योंकि तुम को शीघ्र ही आख़िरी रसूल की पत्नी होने का दर्जा मिलेगा जिसके सामने आने का समय क़रीब आ रहा है। 

ज्ञात हो कि उस समय यह बात आम थी कि अंतिम रसूल के आने का समय करीब है। कुरान भी इसकी गवाही देते हुए कह रहा है कि यह भविष्यवाणी पहले की तमाम किताबों में दे दी गई थी। सलमान फारसी के लिए भी मशहूर है कि उन्होंने ईसाईयों की किताबों में पढ़ा कि अंतिम रसूल के आने का समय क़रीब है और जब उन्होंने सुना कि मक्का में किसी व्यक्ति ने अपने अंतिम रसूल होने का दावा किया है तो उस खोज में मक्का का सफर किया। 

अवतार मौहम्मद की ईमानदारी की ख़बर ख़दीजा को भी थी। उन्हें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो ईमानदारी के साथ उनका माल ले जाए और उनके व्यापार में अधिक से अधिक लाभ दे। उन्होंने अवतार मौहम्मद को उनके क़ाफिले की अगुवाई करने का न्योता दिया जिनकी उम्र अभी 25 वर्ष भी नहीं थी। अभी 15 वर्ष से अधिक बाक़ी थे जब मौहम्मद ने अपने अवतार होने का दावा किया। ऐसे समय में उन्होंने ख़दीजा के व्यापारिक क़ाफिले को लेकर बसरा का सफर किया। रास्ते में नस्तूरी राहिब का वाक़ेया पेश आया जिसका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। मौहम्मद एक सूखे पेड़ के नीचे ठहरे तो लोगों ने देखा कि चंद लम्हे में वह सूखा पेड़ हरा भरा हो गया। नस्तूरी राहिब पुरानी खुदाई किताबें ले आया जिन में आने वाले अवतार का हुलिया ब्यान किया गया था। वह अपनी किताब को पढ़ता जाता था और मौहम्मद के हुलिये से मिलाता जाता था और कहता जाता था कि ईसा पर इंजील पुस्तक भेजने वाले खुदा की क़सम ये वही हैं जिनकी भविष्यवाणी ईसा दे गए हैं और कोई शक नहीं है कि यही अंतिम ज़माने के रसूल हैं जिनकी खबर हमारी किताबों में दी गई हैं। 

यह व्यापारिक क़ाफिला जब वापिस पलट रहा था और मक्का के करीब था तो वह दोपहर का समय था। ख़दीजा को जब यह पता चला कि उनका क़ाफिला वापिस आ रहा है तो वह छत पर गईं। उन्होंने देखा कि मौहम्मद इस हाल में वापिस आ रहे हैं कि उनके चेहरे से एक नूर रौशन है और उनके सिर पर दो पंछी इस तरह अपने परों से साया किए हुए हैं कि धूप उन पर नहीं पड़ने पाती। वापिस आने पर उनके गुलाम मैयसरा और उनके रिश्तेदार खज़ीमा ने सफर के हालात और मार्ग में जो अजीब बातें देखी थीं वे बताईं तो ख़दीजा को यक़ीन हो गया कि यही वह व्यक्ति है जो अंतिम ज़माने का रसूल होगा। 

40 वर्ष की आयु में जब मौहम्मद ने अपने अवतार होने की घोषणा की जिसके फलस्वरूप तमाम मक्का उनका दुश्मन हो गया और ज़िन्दगी में मुसीबतें आना प्रारंभ हुई तो भी इन दोनों की ज़िन्दगी में सब्र और सुकून ऐसा था जैसे वे एक दूसरे को देखकर जीते थे। यही सुकून किसी शादी को सम्पन्न बनाता है और यह न मिलने पर ही कोई मर्द किसी दूसरे की ओर आकर्षित होता है। 

जब ख़दीजा ने महसूस किया कि अवतार मौहम्मद को इस्लाम की शिक्षा फैलाने के लिए माल-ओ-दौलत की आवश्यकता है तो अपना तमाम माल और दौलत खुशी खुशी अवतार मौहम्मद को भेंट कर दिया कि जैसे चाहें खर्च करें। यहां तक कि दस वर्ष के भीतर वे दिन भी आए जब कई कई दिन भूखे रहना पड़ता और पेड़ों की छाल खाकर या पेट पर पत्थर बांधकर गुज़ारा करना पड़ता। 

निज़ामुद्दीन हसन इब्ने मौहम्मद निशापुरी ने अपनी किताब तफसीरे निशापुरी में और फख़रूद्दीन राज़ी ने अपनी किताब तफसीरे कबीर में लिखा है कि एक रोज़ अवतार मौहम्मद ख़दीजा के पास ग़मगीन हालत में आए। ख़दीजा ने पूछा कि आप क्यों ग़मगीन हैं तो अवतार मौहम्मद ने बताया कि हर ओर सूखा पड़ा है और लोगों की परेशानी मुझ से नहीं देखी जाती। यह सुनते ही ख़दीजा ने तमाम कुरैश को जमा किया जिसमें अबू बक्र भी थे। अबू बक्र का ब्यान है कि ख़दीजा ने अशरफियां निकलवा कर इतना ढेर लगवा दिया कि जो लोग मेरे सामने बैठे थे वे अशरफियों के कारण मेरी निगाहों से छिप गए। फिर ख़दीजा ने तमाम कुरैश को संबोधित करते हुए कहा कि तुम सब गवाह रहो कि यह माल और इसके अतिरिक्त जितना भी मेरा माल जहां पर भी है वह सब आज से मेरा नहीं बल्कि मौहम्मद का है जिसे मैंने अपनी रिज़ामंदी और खुशी से उनको दिया और वह अब इसके मालिक हैं, जिस तरह चाहें खर्च करें और मुझ से कोई मतलब नहीं। 

यही बात करते हुए कुरान ने कहा कि ‘ऐ रसूल हम ने तुम को मुफलिस और मोहताज पाया तो ग़नी बना दिया’। माल तो ख़दीजा का था लेकिन खुदा कह रहा है कि हमने तुम को मालदार बना दिया। यदि कोई खुदा की राह में कुछ कर्म करता है तो खुदा उसको अपना कर्म तक मान लेता है। 

सहीह तिरमीज़ी के अनुसार आयशा कहती थीं कि मैंने किसी औरत पर इतना रश्क नहीं किया जितना ख़दीजा पर किया। हालांकि आयशा से अवतार मौहम्मद ने शादी की तो ख़दीजा के देहान्त को कुछ वर्ष बीत चुके थे। आयशा कहती हैं कि मैंने रसूल से कई मरतबा कहा कि आप तो ख़दीजा को कुछ इतना समझते हैं कि जिससे पता चलता है कि दुनिया में ख़दीजा के सिवा आप की और काई औरत ही नहीं है। 

सहीह मुस्लिम और सहीह बुख़ारी में आयशा से इसी तर्ज़ की एक रिवायत दर्ज है जिसके अनुसार अवतार मौहम्मद हर लम्हे ख़दीजा को याद किया करते थे और कहते थे कि मैं क्या करूं इसलिए कि खुदा ने ख़दीजा की मौहब्बत मेरे दिल में भर दी है। यह इस बात की दलील है कि अवतार मौहम्म्द को जो खुशी और सुकून ख़दीजा के साथ बिताए वर्षों में मिला वह बाद में कभी नहीं मिला। यह इस बात की भी दलील है कि बाद में की गई शादियां विभिन्न कारणों से की गईं। इन पत्नियों में कई आम सोच की औरतें थीं और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ अवतार मौहम्मद को खुदा द्वारा दिए गए मक़ाम की भी पूरी समझ नहीं रखती थीं, शायद यह भी नहीं कि उनके पति खुदा की ओर से रसूल हैं। इतिहास की किताबों में मौजूद इनकी बातें बताती हैं कि इनमें आम औरतों के समान एक दूसरे से ईष्र्या, आदि की भावना भी मौजूद थी। यहां तक कि अवतार दूसरे के पास न जाएं और अपने ही पास आएं, इस कोशिश में भी लगी रहती थीं। 

मौहम्मद हुसैन हैकल और अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी किताबों में एक हदीस ब्यान की है जिसके अनुसार एक दिन अबू बक्र और उमर ने अवतार मौहम्मद से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। जब वे उनके सामने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि अवतार मौहम्मद ख़ामोश बैठे हैं और उनके इर्द गिर्द उनकी कुछ पत्नियां बैठी हैं जो अपने पति से अधिक रक़म की मांग कर रही थीं क्योंकि वे ग़रीबी में नहीं रह सकतीं। इस पर अबू बक्र और उमर दोनों ने कहा कि यदि मेरी पुत्री ने आप से कभी भी अधिक रक़म की ख़्वाहिश की तो मैं उसके बाल पकड़ कर उसे सज़ा दूंगा। अबू बक्र और उमर दोनों ने खड़े होकर अपनी अपनी बेटी यानी आयशा और हफसा के बाल पकड़ कर खींचे और उन्हें तन्बीह की कि वे अल्लाह के रसूल से वे सब न मांगें जो वह नहीं दे सकते। 

उपरोक्त इस वाक़ेय के बाद ही कुरान की यह आयत अवतरित हुईः 

Quran.33.28-29:

O prophet! Say to thy consorts: “If it be that ye desire the life of this world and its glitter, - then come! I will provide for your enjoyment and set you free in a handsome manner.

But if ye seek Allah and his apostle, and the home of hereafter, verily Allah has prepared for the well-doers amongst you a great reward.”

यहां पर ग़ौर करने की बात यह है कि यह उस समय का वाक़ेया है जब अवतार मौहम्मद की आयशा और हफसा से शादी हो चुकी थी। यानी साफ है कि मदीना के अंतिम कुछ वर्षों का वाक़ेया है जब अरब के बड़े हिस्से में लोग इस्लाम कुबूल कर चुके थे और कई युद्धों में मुसलमानों को फतेह मिल चुकी थी। रिवायतों के अनुसार खंदक़ के युद्ध में विजय के बाद तो इतना माल हाथ लगा था कि सोने को काटने के लिए कुलहाड़ी प्रयोग करना पड़ी थी। 

उपरोक्त विवरण से साफ है कि इस समय भी अवतार मौहम्मद ऐसी सादा जिन्दगी गुज़ार रहे थे कि उनकी पत्नियों को उस खर्चे में ज़िन्दगी बसर करने में कठिनाई हो रही थी। किताबों में अनेक उदाहरण मौजूद हैं कि कैसे अवतार मौहम्मद या अन्य अहललबैत उनके पास जो कुछ है वह ग़रीबों में बांट देते थे और कितने ही समय ऐसे गुज़रे कि उन्होंने अपने सामने की रोटी उठा कर किसी को दे दी और स्वयं भूखा ही सोना पड़ा। आयशा और हफसा का यह विवरण भी दर्शाता है कि पुस्तिका के लेखक द्वारा प्रथम पष्ष्ठ पर दी गई फोटो झूठी है और हक़ीक़त से उसका कोई नाता नहीं। 

किताबों में यह भी दर्ज है कि अवतार मौहम्मद रात के अंधेरे में कब्रिस्तान चले जाया करते थे जहां वह इबादत करते और मुर्दा लोगों के हक़ में दुआ करते थे। एक बार उनकी एक पत्नी ने उनका पीछा किया केवल यह जानने के लिए कि वह कहीं और तो नहीं जा रहे और पाया कि उनकी मंज़िल कब्रिस्तान थी। 

पत्नियों द्वारा अधिक रक़म की फरमाईश भी ख़दीजा की अहमियत को दर्शाती है कि जिन्होंने अपनी तमाम दौलत अल्लाह के रसूल और उनकी खुशी की ख़ातिर न्योछावर कर दी और इस हाल को पहुंची कि शेबे अबूतालिब में 3 वर्ष की भूख और तकलीफ के कारण वहां से बाहर आने पर अधिक समय ज़िन्दा न रह सकीं। 

जो लोग अवतार मौहम्मद को womanizer और sex addict कहते है वे बताएं कि क्या इस आचरण का कोई व्यक्ति 25 वर्ष की उम्र में अपने से 15 वर्ष बड़ी महिला से विवाह करेगा और उस विवाह को अगले 25 वर्ष तक निभाएगा जब पत्नी की आयु 65 वर्ष हो चुकी हो। यदि कोई womanizer और sex addict है तो यह बीमारी उसके आचरण में पहले दिन से दिखाई देती है। ऐसा मुमकिन नहीं कि जीवन के उस हिस्से में जब sexual prowess सब से अधिक होती है कोई इंसान अपनी सारी ज़िन्दगी अपनी उम्र से 15 वर्ष बड़ी किसी महिला के साथ गुज़ार दे और फिर ज़िन्दगी के अंतिम दस वर्ष में उसके चरित्र में यह बीमारी देखने को मिले।

फिर इस प्रवृत्ती का व्यक्ति समाज की सब से सुन्दर समझी जाने वाली महिला से विवाह करेगा न कि विभिन्न क़बीलों में अम्न पैदा करने की ख़ातिर, विधवाओं को सहारा देने की ख़ातिर, रूढ़ीवादी रीति रिवाज को समाप्त करने की ख़ातिर, वह भी ऐसी महिलाओं से जिन में से कोई भी अधिक सुन्दरता के लिए नहीं जानी जाती थी।

यदि ऐसा करना होता तो 40 वर्ष की उम्र में मक्का वालों का वह प्रस्ताव ही ले लेते जिसके अनुसार यदि मौहम्मद दौलत चाहते तो वे दौलत के अंबार लगाने को तैयार थे, यदि ताक़त चाहते तो वे सरदारी देने को तैयार थे और यदि औरतें चाहते तो वे अरब की सब से सुन्दर औरतें उनके क़दमों में ला देने के लिए तैयार थे। 

ऐसा व्यक्ति जो बनी हाशिम के सरदार के घराने में पैदा होने और अपनी नाम और इज़्ज़त के कारण जिस महिला से चाहता उससे विवाह कर सकता था वह केवल    विधवाओं, बेसहारा और रूढ़ीवादी रीति रिवाज समाप्त करने की ख़ातिर विवाह करता नज़र आता है। कुुछ से विवाह करता है कि उनको सामाजिक सुरक्षा मिल सके और कुछ से इसलिए कि उनको सहारा मिल सके, और विशेषकर इसलिए कि उनके मानने और चाहने वाले उनके बाद भी विधवा, गरीब, बूढ़ी या तलाक़शुदा औरतों को सहारा और सामाजिक सुरक्षा देने हेतु विवाह करते रहें। 

अफसोस कि मुसलमानों में भी सबसे सुन्दर अविवाहित स्त्री से विवाह करने का चलन आम हो गया!

ख़दीजा के दुनिया से जाने के बाद ही अवतार मौहम्मद ने कोई शादी की। इनमे पहली शादी 50 वर्ष की उम्र में सौदा बिन्ते ज़माह से की, जो विधवा थीं और जिनकी उस समय उम्र करीब 37 वर्ष थीं। सौदा के पति का एबीसीनिया से वापसी में देहान्त हो गया था। सौदा मुस्लिम महिला थी जिसने अपने धर्म के कारण एबीसीनिया से अरब की यात्रा की थी। यदि वह एबीसीनिया वापिस जाती तो उसके परिवार वाले धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लेने के लिए उनको यातनाएं देते जैसा कि वे लोग अन्य लोगों को यातनाएं दे रहे थे जिन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया था। धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लेने वाले लोगों पर वे जुल्म करते और जबरन उन्हें अपने पुराने धर्म में वापिस पलट आने के लिए मजबूर करते। 

इब्ने कसीर के अनुसार “She was a tall and large black-skinned woman, with a jolly, kindly disposition”. यानी विधवा, बहुत लंबी, मोटी और काली। इब्ने कसीर आगे लिखते हैं कि मक्का में लोग अचंभे में थे कि मौहम्मद ने ऐसी विधवा से विवाह किया है जो न तो कमउम्र थी और न सुन्दर। सौदा से शादी करके वह अरबों की सोच को एक बड़ा धच्का दे रहे थे जिनके लिए किसी असुन्दर विधवा से शादी करने का कोई कारण नहीं बनता था।  

अवतार मौहम्मद ने जैनब बिन्ते खुज़ैमाह से शादी की जब उनके पति अब्दुल्लाह इब्ने जैह्श ओहद के युद्ध में शहीद हो गए। वे अपने समय की सबसे उदार और दानी महिला के रूप में प्रख्यात थी। लोग उन्हें ‘ग़रीबों की मां’ कह कर पुकारते थे। उनसे विवाह करके अवतार मौहम्मद ने उनकी गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा को बरक़रार रखा।

उन्होंने उम्मे सलमाह से विवाह किया जिनका असली नाम हिन्द था - यानी मुमकिन है कि वह भारत से थीं - उनका विवाह अब्दुल्लाह अबू सलामाह से हुआ था। यह दोनों एबीसीनिया जाने वाले पहले मुस्लिम क़ाफिले में शामिल थे। उम्मे सलमाह ने दुनिया को छोड़ रूहानियत का मार्ग अपना लिया था। वह अपनी धार्मिकता और बुद्धिमत्ता के लिए प्रख्यात थीं। जब उनके पति का देहान्त हुआ तब उनकी उम्र बहुत अधिक हो चुकी थी और उनके साथ कई अनाथ बच्चे थे। यही कारण था कि अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह किया। 

सफिया यहूदी कबीले बनु नादिर के सरदार हुयई इब्ने अख़्तब की पुत्री थी। उनके पति खैबर के युद्ध में मारे गए थे और पिता बनु कुरैज़ा से थे जिनको क़त्ल किया गया। इसका विवरण आगे आएगा। पति के मारे जाने के बाद उनको युद्ध-बन्दी के रूप में लाया गया था। एक यहूदी सरदार की पुत्री तिरस्कार और अवमानना से न गुज़रे इसलिए अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह कर लिया। इस प्रकार उन्होंने बनू इज़राइल से भी अपना रिश्ता क़ायम कर लिया।

जुवैरिययाह जिन्हें बरराह भी कहते हैं क़बीला बनू मुस्तालीक़ के सरदार अल-हारिस की बेटी थी। बनू मुस्तालीक़ से युद्ध के बाद मुसलमानों ने 200 लोगों को बन्दी बनाया  औरतें और जिनमें बच्चे भी थे। अवतार मौहम्मद ने जुवैरिययाह से विवाह कर लिया। इस पर मुसलमानों ने कहा कि इस शादी के बाद तमाम क़ैदी तो अल्लाह के रसूल के संबंधी हो गए, इसलिए उन्हें बन्दी नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सबको आज़ाद कर दिया। इस शराफत से प्रभावित होकर समूचा क़बीला बनू मुस्तालीक़ मुसलमान हो गया। यह बहुत ही बड़ा क़बीला था। इस उदारता ने तमाम अरब क़बीलों को मुसलमानों और इस्लाम से क़रीब कर दिया। आलोचक जो युद्ध-बन्दियों को लेकर तरह तरह के आरोप लगाते हैं वे बताएं कि क्या वे सही करते हैं? 

अवतार मौहम्मद की एक पत्नी मयमूना थी जिनका नाम बरराह बिन्ते अल-हारिस अल-हिलालियाह था। उनके दूसरे पति अबू रूह्म इब्ने अबदिल उज़्ज़ा अल-अमीरी के देहान्त के बाद उन्होंने अवतार मौहम्मद के सामने आकर अपने को उनके सामने पेश किया। अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह कर लिया जिसके फलस्वरूप कुरान की एक आयत इस बारे में अवतरित हुई। 

अवतार मौहम्मद ने एक विवाह उम्मे हबीबाह से किया जिनका नाम रामलाह बिन्ते अबू सुफियान था। वह उबैदुल्लाह इब्ने जैह्श की पत्नी थी। मुसलमानों ने जब एबीसीनिया की ओर दूसरी हिजरत की तो उसमें यह दोनों शामिल थे। वहां उबैदुल्लाह ने ईसाई धर्म अपना लिया पर यह इस्लाम पर रहीं उस समय भी जब उनका पिता अबू सूफियान फौजें जमा कर रहा था मुसलमानों को समाप्त कर देने के लिए। अवतार मौहम्मद ने उनसे विवाह किया ताकि उन्हें सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान किया जा सके। 

ज़ैनब बिन्ते जैह्श से अवतार मौहम्मद का विवाह पुराने रूढ़ीवादी रस्म-ओ-रिवाज को तोड़कर इस्लामी कानून की पूर्ती और उसपर अमल करने हेतु किया गया। ज़ैनब का विवाह ज़ैद इब्ने हारिस से हुआ था जिनको अवतार मौहम्मद ने पाला था जिसके चलते लोग उनको मौहम्मद का बेटा कहकर पुकारने लगे थे। ज़ैद ने ज़ैनब को तलाक़ दे दिया जिसके पश्चात अवतार मौहम्मद ने ज़ैनब से विवाह किया।

इस्लाम ने मुंह बोला बेटा या मुंह बोले भाई या बहन का इंकार किया है। किसी को बेटा या भाई या बहन कह देने से वह महरम नहीं हो जाता और न मुंह बोले बेटे की पत्नी बहू हो जाती है। जबकि अरब में यह मान्यता थी कि मुंह बोले बेटे की पत्नी से शादी नहीं हो सकती। कुरान ने इसका खंडन किया तो अवतार मौहम्मद ने इस प्रथा को तोड़ने हेतु ज़ैनब से विवाह किया। इस विषय पर कुरान की कई आयतें आई हैं जिन पर मैं एक लैक्चर में चर्चा कर चुका हूँ। 

उमर जो दूसरे ख़लीफा हुए उनकी पुत्री हफसाह बिन्ते उमर के पति खुनैस इब्ने हुज़ैफाह बद्र के युद्ध में शहीद हुए थे जिसके तदोपरांत अवतार मौहम्मद ने हफसाह से विवाह कर लिया। इसके अतिरिक्त अबू बक्र जो कि पहले ख़लीफा हुए उनकी पुत्री आयशा से भी अवतार मौहम्मद ने विवाह किया। आयशा अवतार मौहम्मद की अकेली पत्नी हैं जिनकी पहले कोई शादी नहीं हुई थी हालांकि उनकी जिस व्यक्ति से शादी तय थी उसने शादी करने से इंकार कर दिया था जब अबू बक्र ने इस्लाम कुबूल कर लिया था।

अबू बक्र और उमर ने मुसलमानों में बड़ा दबदबा बना रखा था। यह इस बात से भी साबित है कि अवतार मौहम्मद के बाद यही दोनों पहले और दूसरे ख़लीफा हुए। मेरी समझ के अनुसार यह दोनों शादियां सियासी शादियां थीं और इससे अवतार मौहम्मद का मक़सद दोनों को अपने से क़रीब बांधे रखना था। यदि यह कारण नहीं था तो बस एक कारण और समझ में आता है आयशा से शादी करने का जो एक रिवायत के अनुसार अवतार मौहम्मद की पुत्री फातमा से पांच वर्ष छोटी थीं और दूसरी रिवायतों के अनुसार भी उम्र में कोई बहुत अधिक अंतर नहीं था। जिस प्रकार जै़नब बिन्ते जैह्श से अवतार मौहम्मद का विवाह पुराने रूढ़ीवादी रस्म-ओ-रिवाज को तोड़कर इस्लामी क़ानून की पूर्ती और उस पर अमल करने हेतु किया गया ताकि दुनिया को यह पैग़ाम दे सकें कि इस्लाम में जो सगे संबंधी महरम हैं उनके बाहर तुम किसी को महरम नहीं बना सकते। यानी किसी को बेटे जैसा कह देने से कोई बेटा नहीं हो जाएगा, किसी को भाई जैसा या बहन जैसा कह देने से, जैसे cousins के लिए आम-तौर पर कहा जाता है, वह सगा भाई या बहन नहीं हो जाएंगे, उसी प्रकार बेटी जैसा कोई नहीं हो जाएगा यदि वह बेटी की उम्र का है। महरम और नामहरम रिश्तों की पासदारी तुम्हें वैसे ही पाकदामिनी के साथ करनी है; उन महरम रिश्तों से बाहर यदि दोनों पक्ष चाहें तो ‘बेटी-जैसी’ या ‘बाप-जैसे’ रिश्तों से या ‘मां-जैसी’ या ‘बेटे-जैसे’ रिश्तों से विवाह के बंधन में जुड़ सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह समाज में हो नहीं रहा है, खूब धड़ल्ले से हो रहा है, विशेषकर समाज के उस तब्क़े में जो दौलतमंद तबक़ा कहा जाता है, परन्तु वहां पर हम ‘बेटी-जैसी’ या ‘बेटे-जैसा’ नहीं कहते जैसा हम अवतार मौहम्मद के लिए बेहिचक कह देते हैं। हमनें गूगल पर चैक किया तो सब से पहले जो लेख सामने आया उसका शीर्षक था ‘70 Celebrity Couples Who Make It Work Despite Huge Age Gaps’.  इस लेख की प्रारंभिक लाईनें इस प्रकार थीः When you picture your perfect partner, you probably think of someone who is your age—or at least in the same generation as you. But love doesn’t always work that way, and some couples make it work despite a huge age gap. These May-December romances, as they’re called, have faced their share of criticism, but they’re still going strong. 

क्या तुम समझते हो कि वह अवतार जो ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में बनी रूढ़ीवादी सोच को तोड़ कर तुम्हें अस्ली इस्लामी शिक्षा पर चलने के लिए तैयार कर रहा हो और अपने को एक अमली नमूना बना कर पेश कर रहा हो, वह उम्र में अन्तर हो तो भी दोनों चाहें तो शादी हो सकती है, इस का अमली नमूना पेश नहीं करेगा? तुम्हें उनका यह कर्म तो याद रहा, रात-रात भर जाग कर अपने रब के आगे इबादत में डूबे रहना याद नहीं रहा!

हमें इन विवाह को समझने के लिए अवतार मौहम्मद की समूची ज़िन्दगी के विवरण को पढ़ना और समझना होगा। जो व्यक्ति जवानी के दिनों से सिर्फ अपने रब से क़रीब होने की कोशिश में लगा रहा, जिसने अदालत, इंसाफ और ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ा, जो कमज़ोर, ग़रीब, बेसहारा, अनाथ और विधवाओं का मसीहा बना रहा, जो तमाम इंसानियत और तमाम दुनियाओं के लिए रहमत बन कर आया था, और जिसने सात्विक जीवन व्यतीत करने की तमाम उम्र शिक्षा दी, वह क्योंकर अपने रास विलास के लिए विवाह करता? यदि कुछ ऐसी रिवायते किताबों में आ गई हंै जो यह दर्शाती हैं तो उसकी ज़िम्मेदार जुलमत यानी तमस है। पुस्तिका के लेखक उन रिवायतों से लाभांवित होकर बड़े प्रसन्न भले ही होते हों, वह भूल जाते हैं कि उनका सम्पर्क कौन सी ताक़त से है कि वह ऐसा कर रहे हंै।

इस दुनिया के इतिहास मे अवतार मौहम्मद वह पहले समाज सुधारक हैं जिन्होंने महिला का मान सम्मान बढ़ाया। औरत के प्रति जो परोप्कार और हितकारिता की भावना उन्होंने दर्शाई वह अपने आप में मिसाल है। ऐसे समय मे जब औरत को मात्र एक वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता था जिसको इस्तेमाल करके छोड़ देना था। जो समाज महिला उत्पीड़न में सबसे आगे था उस समाज में उन्होने उसकी मान मर्यादा और गौरव को बढ़ाया और उसकी रक्षा की। महिला हित को लेकर वह इतना अधिक चिंतित थे कि उनके अंतिम शब्दों में भी मर्दों को औरतों के हुकूक़ याद दिलाए गए हैं। उन्हांेने कहाः

“Be careful about prayer ; and (about) what your right hands possess, do not impose on them what they have no strength for; (fear) Allah, (fear) Allah about the women, because they are helpless in your hands ...”

लोगों ने बहुत सी ऊल जलूल बातें बना लीं जैसे अवतार मौहम्मद में 40 पुरूषों की शक्ति थी या यह कि वह रोज़ाना हर पत्नी के पास जाया करते थे। यहां यह बताना आवश्यक है कि इस्लाम ने तमाम पत्नियों के साथ अदालत करने की बात की है न कि बराबरी करने की। अदालत और बराबरी में अन्तर न करने वाले लोग भी कई बार अवतार मौहम्मद के आचरण को नहीं समझ पाते।

उदाहरण के रूप में एक भोग है जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि सबके साथ बराबरी का सुलूक होगा। कुछ लोग घर से खाना खा कर आए थे और कुछ भूखे थे। बच्चे, औरतों, बूढ़े और जवान थे। सब को दो दो रोटी दे दी गई। यह बराबरी तो हुई पर अदालत नहीं। बच्चे के लिए दो रोटी अधिक थी और जवान के लिए कम। जो लोग घर से खा कर आए थे उन्हें एक की भी आवश्यकता नहीं थी और जो भूखे थे उनके लिए चार भी कम थी। इस्लाम बराबरी के स्थान पर अदालत की बात करता है। कमअक़ल आलोचक चाहते हैं कि सौदा जैसी पत्नी जिसको अब पुरूष की कोई आवश्यकता नहीं हैं, उनका पति अब भी उनके साथ उसी बराबरी से पेश आए जैसे वह कमउम्र पत्नी जैसे आयशा के साथ पेश आता है। मौहम्मद का यह उसूल था कि वह बारी बारी, एक ही दिन में नहीं, अपनी पत्नियों के साथ रात बिताया करते थे। यदि सौदा अपनी मर्ज़ी से उन्हें किसी और के पास जाने को कहती हैं तो यह कह उठते हैं कि सौदा को डर था कि कहीं मौहम्मद उन्हें तलाक़ न दे दें इसलिए उन्होंने ऐसा किया। यदि डर था भी तो वह सौदा के दिल में, जो अवतार मौहम्मद को शायद पूरी तरह समझ भी नहीं पाईं। 

कुरान की यह आयत अवतार मौहम्मद के आचरण को दर्शाती हैः

You (O Mohammad) can postpone (the turn of) whom you will of them (your wives), and you may receive whom you will. And whomsoever you desire of those whom you have set aside (her turn temporarily), it is no sin on you (to receive her again), that is better; that they may be comforted and not grieved, and may all be pleased with what you give them. Allah knows what is in your hearts. And Allah is Ever All-Knowing, Most Forbearing.

इस पर पत्नी आयशा का ब्यान किताबों में दर्ज है कि उन्होंने कहाः

Aisha said: “The Messenger of Allah used to ask permission of us (for changing days) after this Ayah was revealed. I said, `If it were up to me, I would not give preference to anyone with regard to you, O Messenger of Allah!’’’

यह आयत आने से पहले अवतार मौहम्मद बारी बारी हर पत्नी के पास जाया करते थे। इस आयत के आने के बाद वह किसी भी पत्नी के पास जाने से पहले उससे इजाज़त ले लिया करते थे जिसकी अब बारी थी। यह आवश्यक नहीं कि ऐसा केवल शारिरिक रिश्ता बनाने के लिए ही करते थे। अपने अंतिम दिनों में भी, जब वह बीमार थे और हर पत्नी के घर जाने में असमर्थ थे, तो भी वह उनसे अनुमति लेते थे जिसकी बारी थी कि वह जहां हैं वहीं ठहरे रहें कि नहीं!

इस्लाम इंसाफ को अंधा नहीं बल्कि आंखों और अक़ल के साथ देखता हुआ पेश करना चाहता है। यही कारण है कि जब चोरी करने के जुर्म में एक क़ैदी की उंगलियां काटी जाने की सज़ा सुनाई गई तो अली ने उसको रोक दिया। उनसे पूछा गया कि इस्लाम तो चोर की उंगलियां काटने को कहता है, फिर अली ने ऐसा करने से क्यों रोका। अली ने कहा कि इसने चोरी की है रोटी की। यदि सज़ा ही दी जानी है तो शासक को दी जानी चाहिए कि उसके शासन में किसी व्यक्ति को दो समय की रोटी भी नहीं मिली। अली जब ख़लीफा हुए और करीब चार वर्ष बीत गए तो उन्होंने तमाम शहर वासियों को बुलाया और पूछा कि क्या कोई ऐसा है जिस को दो समय का खाना नहीं मिला, या जिसके तन पर कपड़ा नहीं या सिर पर छत नहीं। कोई एक भी सामने नहीं आया। यह है इस्लाम की अदालत!

बराबरी और अदालत का एक और अन्तर देखिए। आप की सालाना आमदनी 5 लाख है तो आप को कितना टैक्स देना है यह सबको पता है। कानून यह नहीं देखता कि एक व्यक्ति अकेला अपने पुश्तैनी घर में रहता है तो दूसरा मां बाप, भाई बहन, पत्नी और दो बच्चों के साथ किराये के मकान में रहता है जहां भाई बहन के कालेज की पढ़ाई, बच्चोें के स्कूल की पढ़ाई के साथ मां के दिल की दवाई और पिता की सप्ताह में तीन बार डायलिसिस होनी होती है। इस्लाम कहता है कि जो भी तुम्हारा लाईफस्टाईल है उसके अनुसार ज़िन्दगी गुजारने के बाद एक बंधी हुई तारीख़ को जो कुछ तुम्हारे पास बचा रह जाए उसमें से तुम टैक्स निकाल दो। एक ओर बराबरी है, दूसरी ओर अदालत!

प्रश्न यह उठता है कि जो अवतार हर समय अदालत क़ायम करने की कोशिश में हो क्या वह 9 वर्ष की आयशा से शादी करेगा? हमको एक लेख मिला जिसकी बुनियाद पर आईए जानने की कोशिश करें कि आयशा की उम्र क्या थी जब उनका अवतार मौहम्मद से विवाह सम्पन्न हुआ?

कुछ हदीसों में आया है कि जब आयशा का विवाह हुआ उस समय उनकी उम्र 9 वर्ष थी। ज़ाहिर है जो कुछ हदीसों में आया है वह सब सत्य पर आधारित नहीं है। हमें इन हदीसों को अक़ल की रौशनी में देखना होगा। ऐसा इसलिए कि इस्लाम नाबालिग़ लड़की से शादी की इजाज़त नहीं देता। हमको समझना होगा कि क्यों अवतार मौहम्मद ने स्वयं कहा कि यदि मेरी कोई हदीस तुम तक पहुंचे जो कुरान से टकरा रही हो तो उसको दीवार पर दे मारो। पर आलोचक तो आलोचक हैं। वे बैठे ही हैं आलोचना लाएक़ मवाद इकट्ठा करने। वह ऐसी हदीसों को दिल से लगा लेते है और भूल जाते है कि वे जुलमत यानी तमस के मोहरे बनकर लोगों को हक़ और हक़ीक़त से दूर करने का काम कर रहे हैं। 

शादी के समय आयशा की उम्र को लेकर जो रिवायतें आई हैं उनमें अधिकांश हिशाम बिन उरवाह के माध्यम से आई हैं जिसने अपने पिता से रिवायत की। आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी इतनी बड़ी बात थी कि यदि उनकी उम्र इतनी कम होती कि उस पर निगाह उठती तो बहुतेरों ने उसकी चर्चा की होती, न कि केवल दो तीन ने। 

क्या यह बड़ी अजीब बात नहीं है कि जिस मदीना में अवतार मौहम्मद और आयशा का विवाह हुआ उसमे हिशाम बिन अरवाह के अतिरिक्त कोई और नहीं था जो आयशा की उम्र लिखता। हिशाम बिन उरवाह ने अपनी उम्र के 71 वर्ष मदीना में गुज़ारे और फिर जब वह ईराक़ चले गए तो मदीना में मालिक इब्ने अनस जैसे उनके अनेक शागिर्द थे। किसी ने भी आयशा की उम्र पर कोई रिवायत नहीं लिखी। जिन लोगों ने यह रिवायत नक़ल की है वे ईराक़ के रावी हैं जिन्होंने हिशाम से इस बारे में सुना। 

किताब तहज़ीबुल तहज़ीब, जो विभिन्न रावियों की जीवनी और उनके कथनों की हक़ीक़त पर बहस करती है, कहती है कि याकूब इब्ने शाएबाह के अनुसार हिशाम द्वारा की गई रिवायतें विश्वस्नीय हैं सिवाय उनके जो ईराक़ के लोगों के माध्यम से आईं। किताब कहती है कि मालिक इब्ने अनस स्वयं हिशाम से आई उन रिवायतों को विश्वस्नीय नहीं मानते थे जो ईराक़ के लोगों के माध्यम से पहुंचीं। 

मीज़ानुल एतदाल, एक और पुस्तक जो हदीसों की रिवायत करने वालों पर बात करती है लिखती है कि उम्र के आखिरी हिस्से में हिशाम की याददाश्त खो गई थी। 

आम तौर पर जो रिवायत मानी जाती है उसके अनुसार आयशा का जन्म हिजरत से 8 वर्ष पहले हुआ था। परन्तु सहीह बुखारी की एक और रिवायत के अनुसार, जो किताबुल तफसीर में दर्ज है, आयशा ने स्वयं रिवायत की कि जब सूरह क़मर अवतरित हुआ उस समय ‘‘मैं कमसिन बच्ची थी’’। याद रहे कि कुरान का 54वां सूरह, सूरह क़मर, हिजरत से 9 वर्ष पहले अवतरित हुआ था। इस रिवायत के अनुसार, आयशा का न केवल इस सूरह के अवतरण से पहले जन्म हो चुका था बल्कि वह ‘जारियाह’ यानी ‘कमसिन लड़की’ थी न कि ‘सिबयाह’ यानी ‘गोद-खेलती बच्ची’। यदि यह रिवायत सही है तो यह हिशाम बिन उरवाह की रिवायत की रद्द करती है। कुछ और दलीलें जो हम पेश करेंगे उनकी रौशनी में इसी रिवायत को मानना ज़्यादा उचित लगता है। 

कई रिवायतों के अनुसार आयशा बद्र और ओहद के युद्ध में मुस्लिम लश्कर के हमराह थीं। रिवायतों में यह भी लिखा है कि 15 वर्ष से नीचे किसी को भी ओहद के युद्ध में हिस्सा लेने की इजाज़त नहीं थी। जितने भी लड़के 15 वर्ष से कम उम्र के थे उनको वापिस भेज दिया गया था। यदि आयशा ने बद्र और ओहद के युद्ध में शिरकत की तो इससे साफ है कि उस समय उनकी उम्र 9 या 10 वर्ष नहीं होगी बल्कि अधिक होगी। सोचने की बात है कि युद्ध मे औरतें मर्दो की सहायता करने के लिए शरीक होती हैं न कि उन पर बोझ बनने के लिए। 

तमाम इतिहासकारों का मानना है कि आयशा से उनकी बहन असमा दस वर्ष बड़ी थीं। दो किताबों, तक़रीबुल तहज़ीब और अल-बिदायाह वल-निहायाह में दर्ज है कि असमा का देहान्त हिजरत के 73वें वर्ष में हुआ जब उनकी उम्र 100 वर्ष की थी। यदि असमा की उम्र 73 हिजरी में 100 वर्ष थी तो हिजरत के समय वह 27 या 28 वर्ष की होंगी। इस हिसाब से हिजरत के समय आयशा की उम्र 17 या 18 वर्ष रही होगी। आयशा की अवतार मौहम्मद से शादी हिजरत के पहले या दूसरे वर्ष में हुई। इस हिसाब से विवाह के समय उनकी उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच होना चाहिए। 

इस्लामिक इतिहासकार तबरी अबू बक्र के बारे में लिखते हुए कहता है कि उनके 4 औलादें थीं और चारों दौरे जाहिलियत में पैदा हुई थीं। दौरे जाहिलियत उस ज़माने को कहते हैं जब तक अवतार मौहम्मद ने अपने अवतार होने की घोषणा नहीं की थी। इस घोषणा के 13 वर्ष बाद मक्का से मदीना हिजरत हुई और हिजरत के बाद पहले या दूसरे वर्ष में आयशा से शादी हुई। यदि आयशा का जन्म दौरे जाहिलियत में हुआ था तो विवाह के समय उनकी उम्र किसी भी हाल में 14 वर्ष से कम नहीं हो सकती। 

इतिहासकार इब्ने हिशाम के अनुसार आयशा ने उमर बिन ख़त्ताब से काफी पहले इस्लाम को अपना लिया था। इससे साफ है कि आयशा मौहम्मद द्वारा अपने अवतार होने की घोषणा के बाद पहले ही वर्ष में इस्लाम में दाखिल हो गई थीं। घोषणा के 13 वर्ष बाद हिजरत हुई और फिर हिजरत के पहले या दूसरे वर्ष में शादी। यह तो आप मानेंगे कि यदि कोई दूध पीती बच्ची हो तो उसके इस्लाम में दाखिल होने की बात कोई क्यों करेगा। उनकी उम्र इतनी तो होगी कि वह अपने फैसले कर सकें। फिर आयशा की 6 या 7 वर्ष की उम्र में सगाई और 9 वर्ष की उम्र में शादी की बात कैसे सही हो सकती है? 

तबरी ने यह भी तहरीर किया है कि जब अबू बक्र ने हबशा की ओर कूच की सोची, जो हिजरत के 8 वर्ष पहले का वाक़ेया है, तो वह मुताम के पास गए जिनके पुत्र से आयशा की सगाई हो चुकी थी और उनसे कहा कि वह आयशा को अपनी बहु के रूप में घर में रख लें। मुताम ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि क्योंकि अबू बक्र ने इस्लाम कुबूल कर लिया है इसलिए उसके पुत्र ने आयशा को तलाक़ दे दी है। 

बड़ा प्रश्न यह उठता है कि हिजरत से 8 वर्ष पहले आयशा की न केवल सगाई हो चुकी थी बल्कि इतनी उम्र थी कि अबू बक्र मुताम के पास जाकर उनको अपनी   पुत्रवधू के रूप में घर में रख लेने की गुज़ारिश कर रहे थे जिस पर मुताम ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उनके पुत्र ने आयशा को तलाक़ दे दी है। 

जो लोग इस वाक़ेय के 9 वर्ष बाद हुई शादी के लिए यह साबित करने में जुटे हैं कि उस समय आयशा की उम्र केवल 9 वर्ष थी, वे बताएं कि हिजरत के 8 वर्ष पहले आयशा की उम्र क्या थी जब उनके पिता मुताम से सिफारिश कर रहे थे कि उन्हें बहु के रूप में घर में जगह दें? ज़ाहिर है आयशा की सगाई तो उससे भी पहले हो चुकी थी। 

दूसरे यह कि जो लोग आयशा को अविवाहित यानी virgin कह कर अवतार मौहम्मद की दूसरी पत्नियों से उनका रूतबा बढ़ाने की सोचते हैं वे भी जान लें कि विवाह सम्पन्न भले ही न हुआ हो, पर मुताम के कथनुसार उसके पुत्र ने उन्हें तलाक़ दे दी थी। दूसरे यह कि यदि virgin होने से वह समझते हैं कि आयशा का रूतबा बढ़ता है तो यह उनकी भूल है, क्योंकि इस्लाम virgin या non virgin में तमीज़ नहीं करता और कर्मों पर अधिक ज़ोर देता है। 

अहमद इब्ने हंबल द्वारा ब्यान की गई एक रिवायत के अनुसार ख़दीजा के देहान्त के उपरान्त जब ख़ौला अवतार मौहम्मद के समक्ष आईं और उनसे फिर शादी करने की नसीहत की तो अवतार मौहम्मद ने उनसे पूछा कि उनके लिए क्या क्या विकल्प हैं। ख़ौला ने कहाः “You can marry a virgin (bikr) or a woman who has already been married (thayyib)”. जब अवतार मौहम्मद ने पूछा कि ‘बिक्र’ कौन है, तो ख़ौला ने आयशा का नाम लिया। जो लोग अरबी भाषा जानते हैं उन्हें पता है कि ‘बिक्र’ का शब्द 9 वर्ष की अपरिपक्व बालिका के लिए प्रयोग नहीं होता। ऐसे में ‘जारियाह’ शब्द प्रयोग किया जाता है। ‘बिक्र’ एक अविवाहित स्त्री के लिए प्रयोग किया जाता है; ज़ाहिर है 9 वर्ष की बालिका ‘अविवाहित स्त्री’ नहीं होती।

इब्ने हजर के अनुसार, फातिमा आयशा से उम्र में पांच वर्ष बड़ी थीं। रिवायतों के अनुसार जब फातिमा का जन्म हुआ, उस समय अवतार मौहम्मद की उम्र 35 वर्ष थी। यदि इन रिवायतों को सही मानें तो भी हिजरत के समय आयशा की उम्र किसी भी हाल में 14 वर्ष से कम नहीं हो सकती। इस हिसाब से भी शादी के समय उनकी उम्र कम से कम 15 या 16 वर्ष थी। 

लेकिन अजीब बात यह है कि शिया इस रिवायत को सही नहीं मानते कि फातिमा की पैदाईश के समय अवतार मौहम्मद की उम्र 35 वर्ष थी। हालांकि उनके यहां भी कई रिवायतें मौजूद हैं। लेकिन अधिकतर शिया उलमा जिस रिवायत को सही मानते हैं उसके अनुसार दुनिया से जाने के समय फातिमा की उम्र मात्र 18 वर्ष की थी। 

फातिमा की भी कम उम्र साबित करने की होड़ में यह भी यही साबित करते दिखाई देते हैं कि फातिमा की अली से शादी के समय उनकी उम्र करीब 9 वर्ष ही थी। ज़ाहिर है जब फातिमा 18 वर्ष की उम्र में 4 बच्चों को पैदा करने के बाद दुनिया से गईं और एक का देहांत हो गया, तो शादी के समय उनकी उम्र करीब 9 वर्ष ही रही होगी। प्रश्न यह उठता है कि क्या हक़ीक़त में उस समय तमाम अरब में 9 या 10 वर्ष की उम्र में शादी होना आम बात थी या फातिमा के चाहने वालों ने भी वैसे ही उम्र कम की जैसे आयशा की उम्र कम करके कुछ जगह लिखी गई? 

शिया उलमा की सोच को जगाने के लिए एक वाक़िया पेश है। अवतार मौहम्मद का पड़ौसी उक़बा था। जब अवतार मौहम्मद ने एकेश्वरवाद की शिक्षा देना प्रारंभ की तो उक़बा उनका बड़ा दुश्मन बन गया। जब भी वह घर से निकलते या वापिस आते, उक़बा उन्हें बुरा भला कहता था। सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, अल-बैहक़ी की सुनन और अश-शाशी की मुसनद में दर्ज रिवायत के अनुसार एक बार जब अवतार मौहम्मद काबा में इबादत कर रहे थे और अल्लाह के आगे सिर को ज़मीन पर रखा, उक़बा कुछ दूसरे कुरैश सरदारों के कहने पर ऊंट की अंतड़ियां आदि लाया और उनकी पीठ पर डाल दीं। वे सब इतना हंसे की हंसते हंसते एक दूसरे पर गिर रहे थे। अवतार मौहम्मद सिजदे से अपना सिर नहीं उठा पा रहे थे। अबू बक्र ने फातिमा को बुलाया जिन्होंने आकर बाप की पीठ पर से अंतड़ियों को हटाया, तब अवतार मौहम्मद ने सिजदे से सिर उठाया। किताब अरराहिक़ुल मख़्तूम के अनसुार यह वाक़ेया नुबूवत की घोषणा के चैथे वर्ष में पेश आया। 

उक़बा इस्लाम का ऐसा ही दुश्मन था कि एक बार उसने अवतार मौहम्मद के मुंह पर थूक दिया। हुआ यूँ कि उबैय इब्ने ख़लफ इब्ने सफवान की उक़बा से गहरी दोस्ती थी। जब उबैय को पता चला कि उक़बा ने अवतार मौहम्मद के सामने बैठ कर उनकी बातें सुनी हैं तो उसने उक़बा से कहा कि मैं क़सम खाता हूँ कि मैं न तो तुम से मिलूंगा और न ही बात करूंगा यदि तुम उनके मुंह पर थूकोगे नहीं। उक़बा ने जाकर अवतार मौहम्मद के मुंह पर थूका, जिसके बाद इन दोनों के लिए कुरान की यह आयत अवतरित हुईः

Quran.25.27:

On the day that the sinner bites his hands, saying, would that I had chosen a path with the apostle.

यह दूसरा वाक़ेया हमने इसलिए पेश किया कि आप जानें कि वह कैसा अम्न और इंसानियत का पैग़म्बर था कि लोग उसको तरह तरह से ज़लील करने की कोशिश कर रहे थे, उसको यातनाएं दे रहे थे, लेकिन वह इनको माफ करता और इनसे इंसानियत का सुलूक करता नज़र आता है। पुस्तिका के लेखक यदि यह सब नहीं देख पाए तो इसलिए कि इन्होंने रूहानियत की आंख बंद कर रखी है! 

मेरा फातिमा के चाहने वालों से प्रश्न है? जो लोग फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष साबित करते हैं वे तमाम दूसरी रिवायतों को हलका साबित करते हैं जो सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम आदि जैसी किताबों में दर्ज हैं। वे कहते हैं कि यह कैसे मुमकिन है कि फातिमा, जिनकी उम्र उस समय 2 या 3 वर्ष रही होगी, वह आकर पिता की पीठ पर से ऊंट की भारी अंतड़ियां हटा पाएं। इसलिए वे कहते हैं कि उक़बा ने सारी अंतड़ियां नहीं डाली थीं, और बस थोड़ी सी डाली थीं जो फातिमा ने आकर हटा दीं। यह लोग भूल जाते हैं कि अवतार मौहम्मद ने उस समय तक सिजदे से सिर नहीं उठाया जब तक अबू बक्र ने फातिमा को नहीं बुला भेजा जिन्होंने आकर बाप की पीठ से अंतड़ियों को हटाया। प्रश्न यह उठता है कि यदि अंतड़ियों का वज़न नहीं था तो फिर अवतार मौहम्मद ने इतनी देर तक सिजदे से सिर क्यों नहीं उठाया जब तक फातिमा ने आकर उस वज़न को नहीं हटाया। फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष साबित करने वाले यह तक कहेंगे कि मौहम्मद फातिमा को पहचनवाना चाहते थे, आदि। लेकिन वे भूल रहे हैं कि अबू बक्र ने फातिमा को बुला भेजा, जिन्होंने आकर पीठ पर से उस बोझ को हटाया। यह वह समय था जब अवतार मौहम्मद के घर में पत्नी ख़दीजा भी थीं, चाचा अबू तालिब भी थे और अबू तालिब के पुत्र अली भी थे। यदि अबू बक्र स्वयं पीठ पर से इस भार को नहीं उठाना चाहते थे तो भी क्या कोई 2 या 3 वर्ष की बच्ची को बुलाएगा? क्या 2 या 3 वर्ष की बच्ची से उम्मीद की जा सकती है कि आप जैसा चाहें वह वैसा करेगी? लेकिन यदि फातिमा की कुल उम्र 18 वर्ष मानना है तो इन सब बातों को भी मानना होगा! 

यह कुछ प्वाईंट्स है जो ज़ाहिर करते हैं कि अवतार मौहम्मद की 9 वर्ष की उम्र में आयशा से शादी की रिवायतें ग़लत हैं। 

जैसा हम बता चुके हैं कि ऐसी अधिकांश रिवायतें हिशाम बिन उरवाह के माध्यम से ईराक़ी इतिहासकारों ने लिखी हैं। न ही अरब क़ाएदा था और न ही अवतार मौहम्मद ने आयशा से कमउम्री में विवाह किया। अरब के लोगों ने उसका विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। जुलमत यानी तमस ने ऐसी रिवायतों को किताबों में दर्ज कराया ठीक वैसे जैसे इंद्रदेव को दिखाया कि कैसे वह ज़मीन पर आकर जंगल में स्त्रियों से रिश्ते बनाते हैं जिस रिश्ते से बच्चे तक जन्म लेते हैं। 

बग़ावत की सज़ा

यदि यहां तक बात साफ हो गई तो बस एक विषय और रह गया है जिसका उपरोक्त पैराग्राफ में पुस्तिका के लेखक ने उल्लेख किया है। पुस्तिका के लेखक ने मदीना में बानू कुरैज़ा क़बीले की बात की है। हम को देखना होगा कि बानू कुरैज़ा का वाक़ेया क्या है?

बनु कुरैज़ा यहूदियों की एक ट्राईब थी जो मदीना में रहती थी और उनके मदीना के दो बड़े कबीलों औस और खज़रज, जो मुसलमान हो गए थे, उनसे एग्रीमेंट थे। इस प्रकार अवतार मौहम्मद से भी उनका एग्रीमेंट था, जो औस और खज़रज दोनों के सरदार थे और मदीना के भी हाकिम थे। 627 ईस्वी में, हिजरत के पांचवे साल में, अबू सूफियान ने बड़े लश्कर के साथ मदीना पर हमला किया। इसको Battle of Trench या जंगे खंदक कहते हैं। इस जंग में मुसलमानों ने गहरी खाई खोद ली थी कि दुश्मन सीधा हमलावर न हो सके। 

प्रारंभ में बनु कुरैज़ा मुआहिदे की पासदारी करते हुए मुसलमानों की मदद कर रहे थे लेकिन फिर शायद उन्हें लगा कि इतनी बड़ी फौज के सामने मुसलमान नहीं टिक पाएंगे। उन्होंने दुश्मन से साझंगांठ शुरू कर दी। ग़ौर करने की बात ये थी कि बनु कुरेज़ा मदीना के अन्दर रहते थे। हमला अब बाहर से नहीं था बल्कि शहर के अन्दर से एक पूरी ट्राईब दुश्मन से मिल गई थी। 

इब्ने इस्हाक़ की रिपोर्ट के अनुसार हुयाई इब्ने अख़तब नामी एक यहूदी सरदार को उसकी दुश्मनी और इस्लाम से नफरत के कारण कुछ समय पहले मदीना से शहरबद्र करने का हुक्म सुनाया गया था। लेकिन इस युद्ध के दौरान बनु कुरैज़ा ने उसको वापिस बुला लिया। युद्ध के समय उसको बुलाने का क्या मतलब था? अल वाक़िदी की रिपोर्ट के अनुसार हुयाई ने मदीना में मुसलमानों से किए गए एग्रीमेंट को फाड़ दिया। जिस वक़्त मक्का से आई फौज हमले की तैयारी कर रही थी, मदीना में ये अफवाह फैलने लगी कि बनु कुरैज़ा ने अवतार मौहम्मद से किया एग्रीमेंट तोड़ दिया है। अवतार मौहम्मद ने कुछ लोगों को इस बात की तस्दीक़ करने भेजा। विलियम मुईर के अनुसार, बनु कुरैज़ा ने उनसे कहाः कौन है मौहम्मद और कौन है अल्लाह का रसूल, कि हम उसका हुक्म मानें। हमारे और उनमें कोई समझौता नहीं है। 

इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि जिस समय अवतार मौहम्मद हिजरत करके मदीना पहुंचे, उस समय वहां पांच बड़े क़बीले आबाद थे। इनमें दो, औस और खज़रज, ने इस्लाम कुबूल कर लिया था; इन्हीं के बुलावे पर अवतार मौहम्मद और उनके साथी मक्का से मदीना आए थे। इसके अतिरिक्त तीन यहूदी क़बीले - कैनुक़ा, नज़ीर और कुरैज़ा - भी मदीना में आबाद थे। औस और खज़रज अनसार कहलाए जबकि मक्का से आने वाले मुहाजिर या मुहाजिरून कहलाए। यहूदी अपने धर्म पर चलते रहे और उनके साथ किसी प्रकार की ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की गई। अवतार मौहम्मद ने वह प्रख्यात ‘Charter of Medina’ बनाया जो तमाम शहरियों की सिविल और धार्मिक हुकूक़ की और बराबरी के साथ जीवन व्यापन के हक़ की गारण्टी लेता था। बदले में यहूदी क़बीलों ने मौहम्मद को मदीना का सियासी सरबराह यानी हाकिम माना और बाहरी दुश्मन के हमले की सूरत में मुसलमानों के साथ मिलकर शहर की हिफाज़त करने का प्रण लिया। उन्होंने इस पर भी रज़ामंदी दिखाई कि इस्लाम के दुश्मनों और विशेषकर मक्का वालों की किसी प्रकार की भी खुलकर या छिप कर सहायता नहीं करेंगे।  

कुछ हिस्टोरियंस का कहना है कि कोई एग्रीमेंट पहले से नहीं था; यदि कोई एग्रीमेंट था तो सिर्फ ये था कि बनु कुरैज़ा हमले के वक़्त हमलावरों का साथ नहीं देंगे। ऐसा कहने वाले लोग ‘Charter of Medina’ की अंदेखी करते हैं। मान भी लें कि कोई एग्रीमेंट नहीं था, परन्तु इसमें तो शक नहीं कि उन्होंने हमलावरों को युद्ध में strategic support दिया। और जिस व्यक्ति को बतौर मदीना के हाकिम अवतार मौहम्मद शहर से निकाल चुके थे उसको एैन उस समय वापिस बुला लिया जब युद्ध हो रहा था। बनु कुरैज़ा की सोच के विपरीत इस युद्ध में जीत अवतार मौहम्मद की हुई और हमलावर फौज पस्पा हो गई। 

इसके पश्चात अवतार मौहम्मद ने बनु कुरैज़ा की घेरा बंदी का हुक्म दिया जब तक कि उन्होंने आत्म समर्पर्ण नहीं कर दिया। जिन यहूदियों ने अवतार मौहम्मद के खि़लाफ बग़ावत का समर्थन नहीं किया था, मुसलमानों ने उन्हें शहर से बाहर जाने की अनुमति दे दी। दोनों पक्ष इस पर राज़ी हुए कि साद इब्ने मुआद जो फैसला करेंगे वे दोनों के लिए माननीय होगा। यहूदी साद बिन मुआद के नाम पर इसलिए राज़ी हुए थे क्योंकि उनके आपस में अच्छे रिश्ते रहे थे। साद बिन मुआद ने उस समय के बग़ावत के क़ानून को देखते हुए सज़ा सुनाई कि बग़ावत में शामिल होने वाले मर्दों को क़त्ल कर दिया जाए और उनकी औरतों और बच्चों को क़ैद कर लिया जाए। इस फैसले के बाद क़रीब 600 से 900 मर्दों को मौत की सज़ा सुनाई गई। 

ये फैसला उस समय के क़ानून के हिसाब से किया गया जिसके अनुसार बाग़ी की सज़ा मौत थी। सज़ा उसने सुनाई जिसको जज बनाने पर बनु क़ुरैज़ा स्वयं राज़ी थे।

प्रश्न यह उठता है कि यदि किसी स्टेट के अन्दर से उस स्टेट के खि़लाफ बग़ावत होती है तो उनकी सज़ा क्या होनी चाहिए? यदि हमारा कोई पड़ौसी देश हमलावर हो और भारत के अन्दर का कोई गुट उस समय पड़ौसी देश से सांझगांठ करके तमाम खुफिया जानकारी उनको देने लगे या खुल कर बग़ावत कर दे तो किसी भी अदालत में क्या फैसला होगा? 

यूनाईटेड स्टेट्स के आज के कानून के अनुसार पहले mutiny और sedition शब्दों की व्याख्या देखते हैं और फिर देखते हैं कि इस को लेकर आज कानूनी सज़ा क्या है? यह जानकारी Legal Information Institute की वैबसाईट से ली गई है। 10 U.S. Code § 894 - Art. 94. Mutiny or sedition’ के शीर्षक के तहत मौजूद विवरण देखिएः

(a) Any person subject to this chapter who—

(1) with intent to usurp or override lawful military authority, refuses, in concert with any other person, to obey orders or otherwise do his duty or creates any violence or disturbance is guilty of mutiny;

(2) with intent to cause the overthrow or destruction of lawful civil authority, creates, in concert with any other person, revolt, violence, or other disturbance against that authority is guilty of sedition;

(3) fails to do his utmost to prevent and suppress a mutiny or sedition being committed in his presence, or fails to take all reasonable means to inform his superior commissioned officer or commanding officer of a mutiny or sedition which he knows or has reason to believe is taking place, is guilty of a failure to suppress or report a mutiny or sedition.

(b) A person who is found guilty of attempted mutiny, mutiny, sedition, or failure to suppress or report a mutiny or sedition shall be punished by death or such other punishment as a court-martial may direct.

(Aug. 10, 1956, ch. 1041, 70A Stat. 68.)

यूनाईटेड स्टेट्स के Uniform Code of Military Justice (UCMJ) के अनुसारः Among the UCMJ’s so-called “punitive articles” is the seemingly pertinent offense of sedition. According to Article 94(a)(2), anyone subject to the UCMJ who, “with intent to cause the overthrow or destruction of lawful civil authority, creates, in concert with any other person, revolt, violence, or other disturbance against the authority is guilty of sedition.” Persons who are subject to the UCMJ also violate this article if they fail to do their utmost to prevent and suppress sedition committed in their presence, or fail to notify their superiors of sedition they know or have reason to believe is taking place. Either kind of sedition—actual or the failure-to-suppress or -inform subset—is punishable “by death or such other punishment as a court-martial may direct.”

यह कानून sedition की व्याख्या करते हुए यहां तक कह रहा है कि यदि किसी के सामने इस प्रकार की गतिविधी हो और वह उसे न रोके या अपने सीनियर अफसरों को सूचित न करे या उसको यक़ीन हो कि ऐसा कुछ हो रहा है तो भी वह सिपाही sedition के तहत मौत की सज़ा का हक़दार होगा।

साफ है कि बनु कु़रैज़ा ने जो कुछ किया उसकी यूनाईटेड स्टेट्स के आज के क़ानून में भी सज़ा मौत ही है। लेकिन यह लोग यूनाईटेड स्टेट्स के क़ानून की आलोचना नहीं करेंगे!

अवतार मौहम्मद तो युद्ध के कै़दियों के लिए कहते थे कि अगर वे पढ़े लिखे हों तो हमारे किसी को पढ़ना लिखना सिखा दें और आज़ाद हो जाएं। जो काफिर बढ़ बढ़ कर हमला करने आते थे और अवतार मौहम्मद के अनेक साथियों को शहीद करने के ज़िम्मेदार थे, अवतार मौहम्मद को मक्का पर फतेह मिली तो एक को भी नहीं मारा गया, बल्कि आम माफी का ऐलान कर दिया गया। इसके साथ यह उदाहरण भी पेश करना था कि यदि कोई स्टेट या देश है और उसके निवासी स्टेट या देश के खिलाफ अन्द्रूनी युद्ध कर बैठते हैं या आक्रमणकारियों की सहायता करते हैं तो उन्हें माफ नहीं किया जा सकता। अब यह अवतार मौहम्मद का निजी मामला नहीं रह गया था बल्कि बनु कुरैज़ा की साज़िश के कारण मदीना के तमाम मुसलमानों को बड़ा नुक़सान उठाना पड़ सकता था और अनेक जाने जा सकती थीं। 

जब तक हम अवतार मौहम्मद को एक आम आदमी समझते रहेंगे और उनका उस दिव्यात्मा से रिश्ता नहीं समझ सकेंगें जो उनको खुदा से जोड़ती थी, हम अवतार मौहम्मद द्वारा उठाए गए कई क़दम नहीं समझ पांएगे। हर ज़माने में इन दिव्यात्माओं का काम है धर्म के उसूलों की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना। अधर्म का नाश तब होगा जब वे लोग जिनकी आत्मा तमस की गुलाम हो चुकी है, उनका सफाया हो जाए। यही कारण है कि अर्जुन लड़ने को तैयार नहीं, फिर भी कृष्ण उनको मना रहे हैं और कहते हैं कि ये तो पहले ही मरे हुए हैं, तुम उनको मार कर सिर्फ एक फारमैलिटी निभाओगे। क्या अर्जुन और इधर या उधर का कोई भी जानता था कि उधर से जो लड़ रहे हैं उनकी आत्मा मरे हुए लेवल तक पहुंच चुकी है। नहीं, अधिकतर लोग तो उन्हें बड़ा ज्ञानी और धर्म गुरू के रूप में देख रहे थे। लेकिन कृष्ण के फैसले को हम इसलिए मानते हैं क्योंकि जानते हैं कि कृष्ण का संबंध परमात्मा से है, वह गलत फैसला नहीं कर सकते। लेकिन क्योंकि हमारा यकीन नहीं है कि अवतार मौहम्मद का संबंध उसी परमात्मा से था, इसलिए हम उनके लिए गए निर्णयों पर शक करते हैं।

कलकी अवतार या मेहदी का संबंध भी उसी परमात्मा से होगा। वह भी अनेक युद्ध लड़ेंगे। क्योंकि उनका संबंध भी परमात्मा से है इसलिए वहां भी वही कानून लागू हांेंगे जो कृष्ण या मौहम्मद के समय थे। 

यह रिश्ता समझने में अकल लगाना है। और यदि इनमें से किसी का रिश्ता ब्रहमण और परमात्मा से साबित हो गया, तो फिर अब किस बात की अक़ल लगाना कि उन्होने ऐसा कैसे किया या वैसा कैसे किया। 

यही कारण है कि इस्लाम का साफ कहना है कि एक क्रिएटर की मौजूदगी को अक़ल से समझो, वह इंसाफ और अदल करने वाला है इसको अक़ल से समझो, उसने सिस्टम बनाया है हमारी हिदायत का इसको अक़ल से समझो और उसकी हिदायत के सिस्टम में कौन लोग शामिल हैं इसको अक़ल से समझो, और जब इतना समझ में आ जाए तो फिर वे जो कुछ भी कह रहे हैं, उसको आंख बंद करके मानो क्योंकि उनका रिश्ता वहां से है जो हमारे नेचर का जानने वाला है, जो नूर और जुलमत का हाकिम है और जानता है कि कौन नूर की ओर आने की कैपैसिटी रखता है और कौन नहीं, और किसने अपनी आत्मा को जुलमत के हवाले कर रखा है। 

कृष्ण के खिलाफ जब अधर्मियों ने एका कर लिया तो उनसे युद्ध करने को आ गए। हालात यहां तक पहुंच गए कि युद्ध में या तो वे इन्हें कत्ल कर देंगे या ये उन्हें। तब कृष्ण ने अपने अनुयायियों को न केवल युद्ध करने के लिए तैयार किया बल्कि स्वयं उस युद्ध की क़यादत की, यहां तक कि कौरवों की सेना बुरी तरह पराजित हुई और उसके तमाम सेनापति मारे गए। 

गीता में कृष्ण के मुख से परमात्मा कह रहा है कि अवतार का एक मुख्य काम यह भी होता है कि वह evil doers यानी बुरे कर्म करने वालों का नाश कर दे। कृष्ण ने अपने समय में ऐसा किया, मौहम्मद ने अपने समय में युद्ध पर उतारू लोगों का नाश किया। दोनों एक ही सोर्स के अवतार थे, दोनों ने एक समान ही हमलावरों से निपटने के रास्ते ढूंढें। 


Sunday, 30 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-L: सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए

आईए आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि पुस्तिका का लेखक आगे क्या लिख रहा है? वह लिखता हैः

‘मौहम्मद की आलोचना 7वीं शताब्दी से ही शुरू हो गयी थी। उदाहरण के लिए उनके गैर-मुस्लिम अरब समकालीनों ने उनकी बड़ी आलोचना की थी जब उन्होंने एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार किया था। इसी प्रकार अरब के यहूदी जनजातियों ने उनकी यह कहकर आलोचना की कि मौहम्मद ने बाईबल के आख्यानों और व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से अपना लिया, यहूदी विश्वास के विष को पी गए थे, और बिना किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हुए खुद को ‘‘अंतिम पैगंबर’’ घोषित कर दिया था। यह भी आलोचना की गयी थी कि हिब्रू बाईबल में भगवान द्वारा चुने गए सच्चे पैगंबर और झूठे दावेदार के बीच अन्तर बताया गया है। उस पर भी मौहम्मद खरे नहीं उतरते। इन्हीं सब कारणों से वे लोग मौहमम्द को ‘‘हा-मेशुगा’’ कहकर बुलाने लगे जिसका हिब्रू में अर्थ होता है ‘‘पागल’’।

मध्य युग में विभिन्न पश्चिमी और बाईज़ैन्टीन ईसाई विचारक मौहम्मद को विकृत, दुराचारी, झूठा पैग़म्बर, और यहां तक कि ईसा विरोधी मानते थे। ईसाई जगत में उन्हें अकसर एक विधर्मी (heretic) या दानव के जाल में फंसा हुआ माना जाता था। उनमें से थाॅमस एक्विनास आदि कुछ विचारकों ने मौहम्मद की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने अगले जन्म में इन्द्रिय आनन्द मिलने का वादा किया।’

बेचारा लेखक अपनी कमअक़ली में ही मारा जाता है! यहां वह यह मानने पर मजबूर है कि मौहम्मद के खि़लाफ ‘बड़ी आलोचना’ का कारण उनके द्वारा ‘एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार’ था। जुलमत यानी तमस का एजेंडा साफ हो गया कि नहीं? हर ज़माने में एकेश्वरवाद का प्रचार करने वालों को जुल्म और आक्रोश का सामना करना पड़ा है। 

नमरूद ने यदि इब्राहीम को दहकती आग में डालने का प्लान बनाया तो उसके पीछे यही कारण था। राम ने अधर्मी रावण का नाश किया और उसकी लंका को जला कर राख कर दिया इसकी खुशी हिन्दु आज भी दीवाली के नाम पर हर वर्ष मनाते हैं। दाऊद और सुलेमान ने एक खुदा के मार्ग के प्रचार और प्रसार के लिए कितनी ही हुकूमतों से युद्ध लड़े यह आज भी बाईबल में मौजूद है। मूसा से फिरऔन की तमाम दुश्मनी का एकमात्र कारण था मूसा द्वारा एकेश्वरवाद का प्रचार। याद रहे कि यहूदी अपने को इब्राहीम और मूसा के रास्ते पर चलने वाला और ईसाई अपने को इब्राहीम, मूसा और ईसा के रास्ते पर चलने वाला बताते हैं जिन का कुरान जगह जगह उल्लेख करता है।

भारतीय लोकगाथाओं के अनुसार प्रहलाद के अपने पिता ने उसको जान से मार देने की हर मुमकिन कोशिश की, कभी उसे पहाड़ की ऊंचाई से नीचे बहती नदी में फेंका, कभी आग में जलाने की कोशिश की गई, पर हर बार वह बच जाता था। अपने पिता की नज़र में यदि प्रहलाद का कोई गुनाह था तो वह यह कि वह विष्णू का बड़ा भक्त था। सनातन पुस्तकों के अनुसार विष्णू कोई और नहीं बल्कि एक निराकार एबसोलूट ताक़त का साकार रूप है, जिसे परमात्मा भी कहते हैं। यानी एकेश्वरवाद की ही ख़ातिर प्रहलाद को भी बार बार मारने की कोशिश की जा रही थी, स्वयं उसके पिता द्वारा।

कृष्ण ने भी देवताओं की पूजा से आगे बढ़ कर विष्णू और एक एबसोलूट खुदा तक अपने कर्मों को सुपुर्द करने की बात की। उनके खिलाफ भी तमाम ताक़तें एकत्रित हो कर युद्ध को आ गईं। यदि अवतार मौहम्मद के खिलाफ अरब के बहुतेरे क़बीले अपनी तमाम नफरतों और दुश्मनी के साथ लामबंध हो गए और उनकी हर प्रकार से सहायता करने के लिए यहूदी और ईसाई क़बीले भी खड़े हो गए तो यह कोई नई बात नहीं थी। 

प्रश्न उठता है कि यहूदी और ईसाई क्यों? यही तो विधी का विधान रहा है। अवतार तब आता है जब लोगों ने पिछले अवतार के पथ को त्याग दिया। यदि यहूदी मूसा के पथ पर चल रहे होते तो बाद के अवतारों को आना ही नहीं पड़ता। न ही ईसा को आना पड़ता। इसी प्रकार यदि अपने को सनातन धर्मी कहने वाले सनातन वेद के मार्ग पर चल रहे होते तो कृष्ण ही क्यों आते और यदि कृष्ण की शिक्षा से लोग भटके न होते तो बुद्ध क्यों आए होते? 

जिस प्रकार अपने को सनातन धर्म का मुहाफिज़ समझने वाले ब्रहमिण कृष्ण से युद्ध करने को फौजें एकत्रित करते नज़र आते हैं ठीक वैसे ही हम पाते हैं कि अनेक यहूदी और ईसाई अवतार मौहम्मद और उनके दीन के खिलाफ झूठी बातों का प्रसार करते और अरब क़बीलों को उकसाते नज़र आते हैं। 

यह तो गीता से साबित है कि अवतार तब ही आता है जब अधर्म बढ़ जाए और लोग धर्म के उसूलों से भ्रमित हो जाएं। यदि दुनिया को    अंधकार ने न घेर लिया होता, तमस यानी जुलमत ने पैर न पसार लिए होते और कलियुग भी अंत की ओर न चल दिया होता तो मौहम्मद और अन्य अहललबैत को आकर एक बार फिर एक खुदा की इबादत और भक्ति के मार्ग को प्रशस्त न करना पड़ता। 

जो हक़ीक़त समझने की है वह ये कि इन्हीं यहूदियों, ईसाईयों और गैर-मुस्लिम समकालीनों में अनेक ऐसे थे जो एक के बाद एक अवतार मौहम्मद की शिक्षा को अपनाते जा रहे थे। कितने यहूदी और ईसाई अपनी अपनी किताबों में दी गई अंतिम मसीहा की भविष्यवाणियों और निशानियों को पहचानते हुए अवतार मौहम्मद द्वारा बताए जा रहे पथ पर आ रहे थे। जिन अनगिनत लोगों ने अवतार मौहम्मद की शिक्षा अपना ली, वे क्यों आलोचना करने लगे। आलोचना तो वे ही करेंगे न जिन के किसी क़रीबी ने अपना धर्म छोड़ कर इस शिक्षा को अपना लिया। या वे धर्म गुरू करेंगे जिन की जय-जयकार करने वाले निरंतर घटते जा रहे थे और उन्हें डर था कि कहीं धर्म के नाम पर जो धंधे उन्होंने चला रखे थे वही समाप्त न हो जाएं। यदि यहूदियों और ईसाईयों ने भी गै़र-मुस्लिम अरब समकालीनों की तर्ज़ पर विरोध का झंडा उठा लिया, जैसा कि लेखक ने कहा, तो उसके कारण समझे जा सकते हैं।

सुलह हुदैबिया के मौक़े पर संधी लिखे जाने वाला वाक़ेया फिर से याद दिला देते हैं। उन्होंने यही तो कहा था कि यदि हम आप को अल्लाह का रसूल मान रहे होते तो हम में मतभेद ही क्यों होता। जिनकी आत्मा एकेश्वरवाद की रूहानी शिक्षा ग्रहण करने के लिए थोड़ी सी भी तय्यार थीं उन्होंने विपरीत हालात होने के बावजूद न केवल उस शिक्षा को ग्रहण किया बल्कि तमाम जुल्म सहते रहने के बाद भी उस पर अड्गि रहे। 

एकेश्वरवाद की जितनी शिद्दत से अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत ने शिक्षा दी वह उससे पहले कभी भी नहीं दी गई थी। यदि आप यह समझ लेंगे तो आपको यह समझते देर नहीं लगेगी कि आखि़र क्यों जुलमत यानी तमस ने अपनी तमाम ताक़त नहीं लगा दी होगी उनकी शिक्षा को कमज़ोर करने के लिए। वह तो इतनी तेज़ काम करती है कि मूसा 30 रोज़ के लिए पहाड़ पर गए थे; वहां केवल 10 दिन अधिक रूक गए तो इतने समझ में जुलमत यानी तमस को अवसर मिल गया कि वह एकेश्वरवाद को मानने वाले यहूदियों को एक बछड़े की पूजा पर लगा दें। बुद्ध तमाम उम्र नाच और गाने को बुरा कहते रहे लेकिन उनके मरने पर 14 दिनों तक उनके चाहने वाले केवल नाच और गाने में मग्न रहे। 

जुलमत यानी तमस ने न केवल अवतार मौहम्मद के समय में उनकी शिक्षा की पहुंच को आहिस्ता करने की तमाम कोशिश कर डाली बल्कि अवतार मौहम्मद की आंख बंद होने के बाद उसने कोई कोशिश नहीं छोड़ी कि शिक्षा के तेज़ बहाव पर जितना रोक लगा सके उतना करे। इसके लिए इस्लाम के बाहर और अन्दर दोनों के बीच मोहरे तलाश करना आवश्यक था; जैसा कि हम पाते हैं कि जुलमत ने किया। 

अहललबैत के खिलाफ तमाम ताक़तों का खुल कर आ जाना और अवतार मौहम्मद के चरित्र को दाग़दार करने की कोशिशें इसी कड़ी का हिस्सा हैं। कौन व्यक्ति जुलमत यानी तमस का कारिंदा बन कर काम कर रहा था और कौन प्रोपेगेंडा के बहकावे में आकर अवतार मौहम्मद और अहललबैत की दुश्मनी पर उतर आया हम आप नहीं बता सकते। 

सत्य और असत्य की, नूर और जुलमत की यह लड़ाई हर ज़माने में जारी रही है। जुलमत निरे झूठ को प्रसारित नहीं करती बल्कि झूठ को सत्य का लबादा ओढ़ा कर पेश करती है ताकि इंसान को घेर कर जुलमत के मार्ग पर खींच लाया जा सके।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर एकेश्वरवाद के कानसैप्ट से दूसरों को इतनी नफरत और दुश्मनी क्यों पैदा हो जाती है कि वे उसका नामोनिशान तक मिटाने को एकजुट हो जाते हैं। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि इंसान अभी तक तमस यानी जुलमत नामी उस negative force को पहचान ही नहीं सका जिसका मुख्य उद्देश्य ही इंसान को सत्यमार्ग से भटका कर दुनिया की चाहतों और वसवसों में गर्क़ कर देना है। हर ज़माने में अनेक दुनियापरस्त लोग उस negative force से जुड़ कर नाम, ताक़त और दौलत हासिल करते रहे। 

अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कुछ लोग खुल कर इस negative force से न केवल जुड़े होने की बात को कुबूल करते हैं बल्कि यह भी मानते हैं कि इस की पूजा अर्चना करने से दुनिया की ताक़त, शोहरत, दौलत आदि मिलती है। ऐसे लोग illuminati के नाम से अपने विचारों का प्रसार तक करने लगे हैं, हालांकि अनेक अन्य भी हैं। यानी कलियुग के लोगों की गिरावट अब इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि उन्हें कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि अपने को खुल कर शैतानी ताक़तों का परस्तार बतलाएं। 

एक ही खुदा का मार्ग हर ज़माने में बताया जा रहा था इसका एक जीता जागता सुबूत यह है कि आज हर धर्म के मानने वाले किसी न किसी मसीहा की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके आने पर सारी दुनिया अम्न और इंसाफ से भर जाएगी। 

हिन्दु कलकी अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं और मानते हैं कि उनके आने पर हर ओर धर्म के उसूल फैल जाएंगे। यहूदी maschiach की प्रतीक्षा इस बेसब्री से कर रहे हैं कि उनके रब्बियों ने तमाम यहूदियों को दुनिया भर में अपने व्यापार आदि छोड़ कर इज़राइल पलटने का आहवान किया है। यहूदियों का मानना है कि इस maschiach के आने पर हर ओर यहूदियत फैल जाएगी। ईसाई ग्रन्थों में मिलता है कि एक नहीं बल्कि दो मसीहा आएंगे, जिनमें एक ईसा होंगे। इनके आने पर हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा। मुसलमान भी मेहदी और ईसा दोनों के आने की प्रतीक्षा में हैं और यह मानते हैं कि उनके आने पर हर ओर इस्लाम की शिक्षा फैल जाएगी। उनका यह भी मानना है कि मेहदी स्वयं मुस्लिम उलमा से युद्ध करेंगे और उन्हें कत्ल करेंगे जिससे साफ हो जाता है कि मुसलमान भी धर्म की अपनी अस्ल शिक्षा से उतने ही पथभ्रष्ट हो चुके हैं जितने अन्य। केवल इतना ही नहीं, मध्यकालीन युग में उत्तर और दक्षिण अमरीका में रहने वाले रैड इंडियंस भी, जिनकी एक बड़ी सलतनत एज़टैक एमपायर के नाम से थी, Quetzalcoatl नामी किसी मसीहा के आने की प्रतीक्षा में थे। 

यह कैसे मुमकिन है कि यह तमाम मान्यताएं सच्ची साबित हो जाएं। हर कोई जो आज किसी धर्म या सोच को मान रहा है वह इसीलिए तो मान रहा है कि वह उसको सही और दूसरे धर्मों या सोच को ग़लत समझता है। तो क्या वे सब लोग ग़लत है जो यह मानते हैं कि अंतिम ज़माने के मसीहा के आने पर उनका धर्म हर ओर फैल जाएगा। हमारा मानना है कि यह सब लोग सही हैं पर इनकी अपने धर्म की समझ ग़लत है जिसपर यह पूरी तरह नहीं चल रहे हैं। 

हर ग्रन्थ में बताया जा रहा था कि अंतिम ज़माने में उस सत्यमार्ग पर, जिसे अरबी में सिराते मुस्तक़ीम यानी सीधा रास्ता कहा गया, इंसानियत आ जाएगी। केवल दो मार्ग रह जाएंगे - एक सत्यमार्ग और दूसरा उससे विचलित मार्ग। कोई किधर ही विचलित क्यों न हो, वह भटका हुआ तो कहलाएगा ही! फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि कोई हिन्दु है या कोई मुसलमान, ईसाई है या यहूदी। इससे भी क्या अन्तर पड़ता कि कोई हिन्दु धर्म त्याग कर मुसलमान होने की घोषणा कर रहा है या मुसलमान धर्म त्याग कर हिन्दु होने की घोषणा कर रहा है। ज़्यादा आवश्यक यह है कि हर कोई जिस अवतार को मान रहा है उसके द्वारा दी गई एकेश्वरवाद की शिक्षा को मान रहा कि नहीं और उसने जो ग्रन्थ दिए उनको सही सही समझकर अपनी आत्मा को पाकीज़गी की राह पर आगे बढ़ाने की कोशिश में लगा है कि नहीं?

जब सत्यधर्म का मसीहा, चाहे उसे maschiach कहें, कलकी कहें या मेहदी, वह आएगा, तो ग्रन्थों में है कि जुलमत भी दज्जाल या anti-Christ बनकर मानव रूप में आ जाएगी। यह इस बात का सबूत है कि जिस प्रकार नूरानी ताक़तें मानव शरीर को आफिस बना कर हिदायत का काम करती हैं, जुलमत भी मानव शरीर को अपने वश में करके गुमराही की राहें दिखाने में लगी है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या जुलमत खुदा की मंशा के विरूद्ध अपने आप ही एक ताक़त के रूप में खड़ी हो गई या वह खुदा के प्लान का हिस्सा है। 

जितना हम विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ और पुस्तकें पढ़ते हैं, यह बात साफ होती जाती है कि नूर और जुलमत, दोनों एक प्लान के तहत बनाए गए। दोनों की शक्तियां भी हर हाल में एक ही होंगी क्योंकि सब से अधिक इंसाफ करने वाले रब से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि एक शक्ति को थोड़ा कमज़ोर और दूसरे को थोड़ा अधिक ताक़त के साथ पैदा करता। दोनों ही शक्तियों के क्रिएट किए जाने के बाद इंसान का क्रिएशन हुआ जिसको सारे क्रिएशन से बेहतर मस्तिष्क देकर खुदा ने दोनों शक्तियों के बीच पैदा कर दिया ताकि देख सके कि कितने इंसान इस मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए अपने रब तक पहुंचते हैं। यही खुदा का Divine Creation Plan है इंसान को लेकर!

यही कारण है कि जुलमत अपनी तमाम ताक़तें लगा देती है जब वह पाती है कि कोई इंसान एकेश्वरवाद के उस मार्ग को पहचानने या उस पर चलने की कोशिश कर रहा है। उसको गुमराह करना ही जुलमत का काम है। इंसान के लिए अनिवार्य है कि वह जुलमत द्वारा फैलाई गई तमाम गुमराही और बिछाई गई भूलभुलईयां की बिसात को अक़ल की बुनियाद पर पार करते हुए राह में आने वाले कांटों को निकालते हुए बस सत्य मार्ग की पहचान कर उस पर चलते हुए आगे बढ़ता जाए।

इस पुस्तक के प्रारंभ में हम आपको मैत्री उपनिषद VII.8 दिखा चुके हैं जो साफ शब्दों में कहता है कि सब से बड़ी गुमराही यह है कि जो हस्तियां स्वर्ग के लाएक़ हैं यानी जो Divine Creation Plan का हिस्सा हैं उनके साथ वे हस्तियां जोड़ दी जाएं जो स्वर्ग मे जाने के भी लाएक़ नहीं हैं। क्या यही मुसलमानों का शिर्क का कानसैप्ट नहीं है? कोई भी चीज़ जो अल्लाह की ज़ात के बराबर खड़ी कर दी जाए, जो उस स्थान पर खड़ी किए जाने लाएक़ नहीं है, वह शिर्क कहलाती है और एक बड़ा गुनाह है। एकेश्वरवाद की ही बात सनातन किताबें भी कर रही हैं, जैसा मैंने अपनी पुस्तकों और लैक्चर्स में जगह जगह साबित किया है। 

मैंने यह भी दिखाया कि मैत्री उपनिषद यह तक कह रहा है कि जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक ताक़तों को एकदम विपनीत मार्ग बताया गया है जिसके कारण वे अशुभ को शुभ समझते हैं और शुभ को अशुभ। ये ताक़तें असत्य को ऐसे देखती हैं जैसे वही सत्य हो और इनका मुख्य उद्देश्य इंसान को निजात यानी मोक्ष की राह की पहचान से वापिस दुनिया में खींच लाना है। 

वे वेद की शिक्षा से और बाद में परमात्मा की ओर से आने वाले ग्रन्थों की शिक्षा से इंसान को दूर करने में केवल इसीलिए लगे हैं कि उनको यही रास्ता बताया गया है। जो लोग इनके मार्ग को अपना लेते हैं वे अंधेरे में ही चक्कर काटते रहते हैं, हालांकि वे अपने को अकलमंद और ज्ञानी समझ रहे होते हैं, पर वे उन अंधों के समान हैं जिनको कोई   अंधा ही मार्ग दिखा रहा हो।

साफ है कि नूर और जुलमत के बीच इंसान को सब से अधिक अक़ल देकर रखना ही विधि का विधान है ताकि देखा जा सके कि कौन सच्चे रास्ते की पहचान करते हुए अपनी आत्मा को उस मार्ग पर लगाता है और कौन दुनिया में गर्क़ हो जाता है। 

अवतार मौहम्मद भी जानते थे कि जुलमत उनकी शिक्षा को पथभ्रष्ट करने की भरपूर कोशिश करेगी। इसके लिए वह तरह तरह की कहानियां और हदीसें प्रचारित करने का प्रयास करेगी। जुलमत ने ऐसा किया भी। आज भी यदि कुछ लोग अवतार मौहम्मद की छवि को ख़राब करके पेश करने की कोशिश करते नज़र आते हैं तो वे सुबूत के तौर पर ऐसी ही हदीसों और रिवायतों को पेश करते हैं जो विभिन्न किताबों में दर्ज हैं। यही कारण है कि अवतार मौहम्मद ने कहा कि यदि मेरी कोई हदीस भी तुम्हें कुरान से टकराती नज़र आए तो उसे दीवार पर दे मारो, भले ही वह कथन स्वयं मौहम्मद या उनके किसी क़रीबी समझे वाले व्यक्ति से जोड़ कर क्यों न बताया गया हो।  

सोचने की बात यह है कि बनी उमैय्या के दौर में तमाम इस्लामी सलतनत में हर जुमे के खुबते में अली के खिलाफ झूठ प्रसारित किया जा रहा था। तो क्या यह समझा जाए कि बनी उमैय्या अली के दुश्मन थे और मौहम्मद को दोस्त रखते थे? जिस अली को अवतार मौहम्मद ने पहचनवाने में कोई कमी न छोड़ी, जिसको स्वर्ग के मर्दों का सरदार बतलाया, जिसकी मौहब्बत का दिल में होना ईमान की निशानी बताया, उस अली से दुश्मनी का मतलब था अवतार मौहम्मद द्वारा पेश किए गए अस्ल इस्लाम से दुश्मनी। यह अवतार मौहम्मद से खुल कर अपनी दुश्मनी ज़ाहिर नहीं कर सकते थे। क्योंकि उनके नाम पर ही इन्होंने अपनी हुकूमत क़ायम की थी। इसलिए इन्होंने जो कोशिश की वह यह कि झूठी रिवायतों के माध्यम से अवतार मौहम्मद के चरित्र को गुमराह करके पेश किया जाए। ये लोग मोहरे बने जुलमत यानी तमस के एजेंडे को लागू करने का।

यदि ऐसा नहीं था तो बताईए कि इनके ज़मानें में अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी पर कुछ भी लिखने पर रोक क्यों लगी थी? क्यों इन्होंने सुन्नियों के एक प्रख्यात इमाम को मौत की सज़ा सुनाई जब उन्होंने अली के बारे में ब्यान की गई फज़ीलतों पर किताब लिखी? अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के सौ-दो सौ साल बाद जब हदीसे लिखने की मनाई हटी तब तक हक़ और बातिल, सत्य और असत्य में अंतर करना मुश्किल हो चुका था। 

यह ठीक वैसे था जैसे ईसा के जाने के बाद 300 सालों तक उनके मानने वालों पर प्रताड़ना जारी रही, उनका नाम लेने, उनके रास्ते पर खुल कर चलने पर पाबन्दी थी और ईसा के मानने वालों को भूखे शेरों के सामने डाल दिया जाता था या ज़िन्दा जला दिया जाता था। 300 साल बाद जब कांस्टेंटीन नामी बादशाह ने ईसा की शिक्षा को अपनाया और खुल कर ईसा की शिक्षा का प्रचार प्रसार प्रारंभ हुआ तब तक ईसा की अस्ली शिक्षा की समझ से लोग दूर आ चुके थे। जुलमत यानी तमस ने God, Holy Spirit and Jesus की शिक्षा को ऐसे पेश किया था कि अब उस शिक्षा के आगे किसी आने वाले अवतार का कोई स्थान शेष नहीं रह गया था।

आज यदि हिन्दुओं के घरों में वेद नहीं मिलते तो इसके पीछे भी यही कारण है। जुलमत यानी तमस अच्छी तरह जानती है कि वेद में वे राज़ छिपे हैं जो इंसान को हक़ और हक़ीक़तों की पहचान के क़रीब ला खड़ा करेंगे। उसने जो बड़ी कोशिश की है वह यह कि उसने वेद से लेकर कुरान तक की ग़लत समझ प्रचलित कर दी है। हक़ीक़तें दिन के उजाले के समान सामने आ जाएंगी जब वेद और कुरान आदि का इस नई रौशनी में जो हम पेश कर रहे हैं एक बार फिर अनुवाद होगा।

जुलमत यानी तमस का काम ही यह है कि वह इंसान को सत्यमार्ग से गुमराह करे और इसके लिए वह और उसके तमाम कारिंदे काम में जुटे हैं। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि आम लोग क्यों इनका अनुसरण करते हुए एकेश्वरवाद के खिलाफ मोर्चे में शामिल में हो जाते हैं?

यह कुछ वैसा ही था कि जब हर घराने का कोई न कोई कुलदेवता था जिसकी पूजा होती थी और विभिन्न अवसरों पर विभिन्न देवताओं की पूजा होती थी, तो ऐसे लोगों के बीच कृष्ण ने कहा कि देवता तो स्वयं एक डिवाईन प्लान का हिस्सा हैं, उनसे आगे बढ़ो और परमात्मा की समझ पैदा करो, वहां तक पहुंच जाओ तो एक निराकार एबसोलूट ब्रहम के आगे, जिसको मुसलमान अल्लाह कहते हैं, स्वयं को समपिर्त कर दो। वहां भी धर्म गुरू और ब्रहमिण ही सबसे अधिक नफरतें दिल में पाले कृष्ण के खिलाफ कौरवों और अन्य महारथियों को एकजुट करते नज़र आते हैं और यहां भी यहूदी और ईसाई पादरी एवं विभिन्न क़बीलों के सरदार ऐसी नफरतें लिए नज़र आते हैं कि ओहद के युद्ध में हम पाते हैं कि अबू सूफियान की पत्नी हिन्दा हमज़ा के मृत शरीर को काट कर दिल निकालती है और उसे खाती है। 

यदि अवतार मौहम्मद कहते कि तमाम खुदाओं के बीच मेरे खुदा को भी शामिल कर लो तो अरब क़बाएल को कोई आपत्ती न होती। आखि़र जो 360 खुदाओं को मान रहे थे उन्हें एक और खुदा के मानने में क्या आपत्ती हो सकती थी। लेकिन सवाल था 360 खुदाओं को नकारने का! बाप दादा ने जिन खुदाओं को पूजा था उनको कैसे छोड़ सकते थे। विशेषकर तब जब मक्का वासियों की तमाम दौलत, ताक़त और शान-ओ-शौकत उस काबा से जुड़ी थी जिसमें इन्होंने अपने 360 खुदाओं की मूर्तियां रखी हुई थीं। दूर दूर से बद्दू अरब अपनी कमाई ला कर इन खुदाओं के आगे न्योछावर करते थे, जो अंतः इनको ही मिलती थी। 

दरअस्ल हक़ीक़त तो यह है कि हर ज़माने में एक खुदा को न मानने के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण अधिक रहे है। कृष्ण के समय के गुरू और ब्रहमिणों की भी तमाम इज़्ज़त, दौलत और ताक़त इस कारण थी कि खुदा और आम इंसान के बीच उन्होंने अपने को विराजमान कर लिया था। उनके बिना न तो खुदा की पूजा हो सकती थी और न यज्ञ। इससे ही लोग उनका आदर करते थे, उनके लिए अपनी तमाम दौलत न्योछावर करने को तैयार थे। ऐसा इसलिए कि इन्होंने ऐसा माहौल बना रखा था जिसमें इन तक आने पर ही खुदा के मार्ग पर आगे बढ़ने के दरवाज़े खुलते थे। 

यह क्योंकर आसानी से मान लेते यदि कोई कहता कि उस खुदा से गहरा रिश्ता तो तुम अपनी कुटिया के किसी कोने में बैठ कर भी बना सकते हो। यदि कोई कहता कि तुम को आलीशान मंदिर में आ कर कुछ रस्में निभाने की आवश्यकता नहीं, तुम अपना हर कर्म सात्विक बना सकते हो यदि तुम उस कर्म को करते समय खुदा की याद को दिल में जगा लो। इबादतखानों की गुल्लक़ में अपनी दौलत डालने के स्थान पर सीधे किसी ग़रीब, अनाथ, विधवा, बेसहारा या यात्री पर खर्च करो। यदि कोई पंडित या मुल्ला के पास से स्वर्ग खींच कर कहे कि स्वर्ग तो मां के पैरों तले है इसलिए मां की सेवा करो। जिस दौलत को तुम अपनी पूंजी समझते हुए औरतों और शराब आदि पर उड़ा रहे हो, कोई कहे कि तमाम दौलतों के मालिक, यहां तक कि तुम जो खाना खाते हो, उसके भी मालिक देवता यानी अहललबैत हैं और तुम्हें वह दौलतें देकर उनका संरक्षक बनाया गया है, लिहाज़़ा यदि तुम अपने खाने में से इन देवताओं के नाम का नहीं निकालते तो तुम चोर हो।

Gita.III.12:

Those devas shall bestow on you all gratifications you desire: one who eats what is given to them without giving in turn to them, he is a thief indeed.

तुम ने औरतों को अपनी संपत्ति समझ लिया हो और जब चाहे एक औरत को किनारे कर दूसरी औरत पर अपना प्रेम न्योछावर करते फिरते हो और कोई तुम्हें अधिकतर 4 औरतों तक सीमित कर दे और वह भी इस शर्त के साथ कि तुम उन के साथ बराबरी और इंसाफ करो। यह बराबरी और इंसाफ ऐसी हो कि तुम यदि एक के लिए कोई उपहार लाए तो दूसरे के लिए भी लाओ, एक के साथ एक रात बिताओं तो दूसरी रात दूसरे के साथ बिताओ, विरासत में दोनों को बराबर का शरीक करो, चाहे तुम को एक दूसरे से अधिक पसंद क्यों न हो। 

जिस समाज में ऊंच नीच की दीवारें ऐसी खड़ी हो चुकी थीं कि एक के हाथ का छुआ दूसरा खाना पसंद नहीं करता था, ब्रहमिण बताते थे कि कौन मंदिर में आ सकता है कौन नहीं, ऐसे समय में गीता ने कहा कि पंडित तो वह है जिसके लिए ब्रहमिण, गाय, हाथी, कुत्ता और कोई यदि कुत्ता पका कर खाता हो, वे सब बराबर हैं। 

Gita.V.18:

In regard to a Brahmin endowed with learning or humility, a cow, an elephant, and even a dog, as also one who cooks dog (for food), the well-informed ones (panditah) see the same (differenceless reality).

आखि़र क्यों न ब्रहमिण कृष्ण के खि़लाफ उतर आते?

तो दूसरी ओर कुरान ने कहा कि तुम में ऊंच नीच का कोई अन्तर नहीं सिवाय इसके कि जो अच्छे कर्मों में दूसरों से बेहतर हो। तुम्हारा रंग, तुम्हारी नस्ल, क़बीला जिस में तुम पैदा हुए हो, मालदार हो या ग़रीब, कोई भी चीज़ तुम्हें दूसरे से बड़ा या बेहतर नहीं बनाती सिवाय इसके कि तुम अच्छे कर्म करने में दूसरों से आगे हो। 

Quran.49.13:

O people, we created you from the same male and female, and rendered you distinct peoples and tribes that you may recognize one another. The best among you in the sight of GOD is the most righteous. GOD is Omniscient, Cognizant.

कहा गया कि ईमान का रास्ता यदि हक़ीक़त में कोई छोड़ता है तो वह वो है जो अनाथ के साथ बुरा सुलूक करे या ग़रीब को खाना खिलाने के खि़लाफ हो, जो एक खुदा की पूरी सच्चाई से इबादत न करे बल्कि इबादत में दिखावा करे और जो दान दक्षिणा का विरोध करे। 

Quran.107.1-7:

Do you know who really rejects the faith? That is the one who mistreats the orphans. And does not advocate the feeding of the poor. And woe to those who observe the contact prayers (Salat) - who are totally heedless of their prayers. They only show off. And they forbid charity.

इस्लाम ने जबरन धर्म परिवर्तन को भी मना कर दिया। कोई ऐसा व्यक्ति जो अपने धर्म में रहते हुए अपनी आत्मा को साध नहीं पाया वह किसी दूसरे धर्म में जाकर भी क्या आत्मा को साध लेगा। यदि उसने किसी भी धर्म में रहते हुए अपनी आत्मा को बेहतरी के मार्ग पर लगाते हुए एक रब की इबादत की होती और सच्चे दिल से हक़ और हक़ीक़त को पाने की कामना किए होता तो उसको सत्यमार्ग की ओर खींच लेना तो स्वयं परमात्मा की जिम्मेदारी हो जाती है; हम और आप कौन होते हैं जबरन किसी को इस धर्म से उस धर्म में लाने वाले या उधर से इधर लाने वाले?

Quran.18.29:

Proclaim: “This is the truth from your Lord,” then whoever wills let him believe, and whoever wills let him disbelieve.

अब आप शायद समझ सकें कि अबू सूफियान जैसे कुरैश सरदार या स्वयं मौहम्मद के चाचा अबू लहब आदि क्यों मौहम्मद की इतनी शिद्दत से मुख़ालिफत कर रहे थे। अबू सूफियान मक्का आ रहे क़ाफिलों की देख भाल का काम करता था। इस देखभाल के काम में उनको ठहरने के स्थान के साथ शराब से लेकर औरतें तक मौहय्या कराई जाती थीं। जुए के अड्डे भी चलते थे और यदि बाहर से आया कोई मुसाफिर कुछ अधिक रक़म जीत लेता था तो वापसी के सफर पर डाकुओं के भेस में हमला करके उससे वह दौलत वापिस छीन ली जाती थी। 

एक खुदा के मानने वाले गैर औरतों को छूना तो दूर उनकी ओर निगाह भी उठा कर नहीं देखते थे। शराब से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था। इस्लाम उनसे जाएज़ आमदनी के लिए कोशिश करने को कहता था और जाएज़ रास्तों पर ख़र्च करने की नसीहत देता था। जुए और इस प्रकार के मनोरंजन से भी मुसलमान को दूर रखा गया था। अबू सूफियान जैसे बहुत अच्छी तरह जान रहे थे कि जो गुलाम आंख बंद करके उनके हर हुक्म पर अमल करते थे वे अब इंसाफ और जुल्म की बात करते दिखाई दे रहे हैं, जो कनीज़े सिर्फ थोड़ी सी रक़म की ख़ातिर किसी को भी खुश करने को तैयार थीं, वे अब पाकदामिनी की बात करने लगी हैं। इस्लाम ने बेगुनाह का क़त्ल करने या उस पर हमला करने की अब कोई गुंजाईश नहीं थी। जब इनके सिपाही ही बेगुनाह पर जुल्म करने या डाकुओं के भेस में हमला करने को ग़लत समझने लगेंगे तो फिर इनके हुक्म पर कौन चलेगा। 

वर्षों से आंख बंद करके हुक्म की तामील करने वाले गुलाम अब सत्य और असत्य, जाएज़ और नाजाएज़, हक़ और बातिल की बात करने लगे थे। इस सब के कारण कुरैश सरदार मौहम्मद और इस्लाम दुश्मनी पर उतर आए, यह तो समझ में आता है। आज के दौर के लोग क्यों दुश्मनी रखें हैं, यह ग़ौर करने का विषय है।

इस्लाम पस्ती में गिरी हुई रूहों को फिर से तरक्क़ी की राह पर आगे बढ़ाने आया था। इसके लिए आवश्यक था कि अपने कर्म खुदा की याद को दिल में बसाए हुए करें। रूहानी तरक़की के बिना धर्म के कोई मायनी नहीं। आत्मा को साधने में नाकाम रहे अनेक मुसलमानों ने भी अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत की शिक्षा को नहीं समझा। जो मुसलमान अपनी आत्मा को साधने में नाकाम रहे, उनकी आत्मा फिर पस्ती के दलदल में गिरती चली गई। अब वे कहने को तो मुसलमान थे लेकिन असली धर्म से इनका कोई लेना देना नहीं था। यही वे लोग हैं जिन्होंने अवतार मौहम्मद के बाद इस्लाम की शिक्षा को हाईजैक करके एक ऐसे इस्लाम की छवि पेश की जिसका अवतार मौहम्मद और कुरान के इस्लाम से कोई सरोकार नहीं था। यह लोग इस हद तक बढ़ गए कि अवतार मौहम्मद की आंख बंद होने के बाद उन्होंने अहललबैत को, जो उनकी शिक्षा के असली वारिस थे, हर प्रकार की यातनाएं दीं, उन्हें कैद में या नज़रबंद रखा, और उन्हें क़त्ल कर दिया। 

इन्हें यह तो नहीं पता था कि अहललबैत ही वेदों के देवता हैं, मनु हैं, मारूत हैं, रूद्र हैं, इनमें से दो अस्विन कहलाए और इनमें की एक देवी है और इन्ही देवताओं को तमाम गुनाह, बुराईयां और परेशानियां झाड़ देने वाला और हर चीज़ जो हमारे लिए लाभकारी और शुभ है वह प्रदान करने वाला बनाया गया है।

O All-creating Deva please sweep away from us all sins, vices and miseries and grant us all that is beneficial and auspicious.

अवतार मौहम्मद ने कितनी ही बार अपना और अन्य अहललबैत का खुदा से और उसके Divine Creation Plan में रिश्ता बताया था। जब आत्मा कुएं की गहराई में डूबी हों तो सत्यमार्ग की चमक क्योंकर दिखाई दे सकती है?

अब आप की समझ मे आ रहा होगा कि क्यों पुस्तिका का लेखक कह रहा है कि ‘मौहम्मद की आलोचना 7वीं शताब्दी से ही शुरू हो गयी थी। उदाहरण के लिए उनके गैर-मुस्लिम अरब समकालीनों ने उनकी बड़ी आलोचना की थी जब उन्होंने एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार किया था।’ अब शायद आप यह भी समझ रहे हों कि समय के सब से बड़े ब्रहमिण और गुरू क्यों कृष्ण के विरूध युद्ध की आग भड़काते नज़र आते हैं; मूसा और ईसा द्वारा पेश की गई शिक्षा से क्यों उनके मानने वाले बार बार भटकाओ और गुमराही की राह पर चलते नज़र आते हैं। 

आगे पुस्तिका का लेखक लिखता है कि यहूदी और ईसाई क्योंकर मौहम्मद को पैगंबर मान लेते जिन्होंने ‘बिना किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हुए खुद को ‘‘अंतिम पैगंबर’’ घोषित कर दिया था।’ यह बात ग़ौर करने की है। इस पुस्तक में कुछ पहले हम अनेक चमत्कार लिख चुके हैं जो अवतार मौहम्मद ने दिखाए। यह तो बस कुछ ही हैं जो हमने लिखे हैं। कितने अन्य चमत्कार न केवल उनकी बल्कि अन्य अहललबैत की ज़िंदगी से जुड़े हैं जो किताबों में दर्ज हैं।

हर ज़माने में विभिन्न अवतारों ने चमत्कार दिखाए परन्तु लोगों ने आंखों से देखने के बाद भी उन्हें झुठलाया। मूसा का उदाहरण सामने है। कभी उन्होंने अपनी लाठी से नील नदी को छुआ और उसका पानी लाल हो गया। कभी उन्होंने जादूगरों द्वारा फेंके गए सांपों के सामने अपनी लाठी रख दी जिसने तमाम सांपों को निगल लिया। इस पर तमाम जादूगर तो एक खुदा की ताक़त को पहचानते हुए मूसा के मार्ग पर आ गए पर वहां उपस्थित फिरऔन और अन्य दरबारियों ने नहीं माना। ऐसे अनेक चमत्कार मूसा ने दिखाए पर अधिकांश लोगों ने नहीं माना। यहां तक कि समुद्र में डूब कर मौत आने तक फिरऔन और उसकी फौज मूसा और उनके साथियों को क़त्ल कर देने की कोशिश में लगे रहे।

कृष्ण ने अनेक चमत्कार दिखाए, यहां तक कि सूरज की गति को रोक दिया, लेकिन क्या सामने लड़ने आई फौज ने कृष्ण को सही मानते हुए उनकी शिक्षा को अपना लिया। ईसा भी तो अनेक चमत्कार दिखा रहे थे, कभी मुर्दे को ज़िन्दा कर रहे थे, कभी कोढ़ के मरीज़ को ठीक कर रहे थे, कभी कुछ मछलियों और रोटियों से उनके तमाम साथी पेट भर कर खाना खा रहे थे, लेकिन अनेक लोग फिर भी उनकी जान लेने पर उतारू थे। 

चमत्कार हिदायत नहीं बन सकते। बल्कि हमने तो मूसा की ही ज़िंदगी में देखा है कि जब मूसा को पहाड़ पर 10 दिन अधिक हो गए तो केवल इतने समय में जुलमत यानी तमस के एक कारिंदे ने तमाम लोगों का सोना इकट्ठा करवा के उससे एक बछड़ा बनवाया जो कुछ ऐेसे बना था कि जब हवा उसकी नाक में से निकलती थी तो उसमें से आवाज़ पैदा होती थी। आज कोई भी जो सीटी की साईंस को जानता है वह इसको समझ सकता है। लेकिन जो लोग मूसा के रब की पूजा कर रहे थे उन्हें अधिक समय नहीं लगा इस सोने के बछड़े की पूजा प्रारंभ कर देने में। 

चमत्कार केवल उस व्यक्ति की आस्था और विश्वास को बढ़ा सकता है जो पहले से सत्यमार्ग का मुसाफिर हो और उस मार्ग पर कुछ आगे बढ़ चुका हो। 

जो लोग चमत्कार द्वारा हक़ को पहचानने की कोशिश करते हैं वे गुमराह भी हो सकते हैं। बल्कि अंतिम ज़माने में दज्जाल यानी एंटीक्राईस्ट चमत्कार दिखा कर ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगा। फिर याद दिला दूं कि सब से बड़ा उपहार यदि इंसान को दिया गया है तो वह अक़ल है। अपनी रूह को पाक करने और पाक रखने की निरंतर कोशिश के साथ अक़ल का प्रयोग करने से ही इंसान के लिए सत्य मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वह सत्यमार्ग जो उन हस्तियों द्वारा प्रदर्शित किया गया जिनका स्थान स्वर्ग में है और जो तमाम सृष्टि के एक रचयिता की पूजा और उपासना की ओर लेकर जाता है। 

यही कारण है कि उपनिषद ने कहाः This is indeed the source of the net of delusion, the association of one who is worthy of heaven with those who are not worthy of heaven, that is it

कुरान भी उसी एक खुदा के मार्ग को प्रशस्त करने की गवाही दे रहा है जिस एक खुदा की ओर कुरान से पहले आने वाले तमाम ग्रन्थ इंसान को ले जाने की कोशिश कर रहे थे। मैं पहले भी दिखा चुका हूँ कि अल्लाह कोई मुसलमानों के खुदा का नाम नहीं है। बल्कि हर वह किताब जो परमात्मा की ओर से आई, भले ही इब्राहीम, इस्माईस, इस्हाक़ या याकूब पर, या विभिन्न क़बीलों में पैदा हुए ऋषियों पर, या मूसा और ईसा पर और या किसी भी ऋषि पर जिसका संबंध परमात्मा से हो, कुरान मुसलमान होने की परिभाषा बताते हुए कह रहा है कि वे न केवल इन सब किताबों पर ईमान रखते हैं, यानी उनके परमात्मा की ओर से होने को दिल से स्वीकारते हैं, बल्कि उनमें अंतर भी नहीं करते। 

Quran.2.136: 

(You) declare: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down to us, and that which was sent down to Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the Prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses and Jesus, and that which was given to all other Prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and we are Muslims (submitted to Him wholly and exclusively).

तमाम किताबें जो परमात्मा की ओर से हैं उन को उसकी ओर से स्वीकार करना ही बड़ी बात थी, कुरान उन तमाम किताबों में अंतर भी नहीं करने की बात कर रहा है। यानी यदि तुम मुसलमान हो तो तुम वेद और कुरान में कभी अंतर नहीं करोगे, दोनों को एक समान श्रद्धा से देखोगे, बिना कोई अन्तर किए दोनों को समझने की कोशिश करोगे और जो मायनी अपनी तमाम सच्ची कोशिश के बाद समझ में आएं उन्हें स्वीकार करोगे।

एक और स्थान पर कुरान में आयाः

Quran.3.84:

Say: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down on us, and that which was sent down on Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the Prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses, Jesus, and all other Prophets from their Lord; we make no distinction between any of them (in believing), and we are Muslims (submitted to Him exclusively).

कुरान में दो स्थान पर एक समान आयत का आना दिखाता है कि कुरान का भेजने वाला हर मुसलमान को पैग़ाम देना चाहता है कि मुसलमान होने का अर्थ है उस हिदायत के कारखाने को समझना जिस ने हर ज़माने में इसान को सत्यमार्ग पहचानने, अपनी बुराईयों और आत्मिक बीमारियों को उतार फेंकने और मोक्ष की राह पर चलने की हिदायत की। 

कुरान केवल परमात्मा की ओर से आए ग्रन्थों में अन्तर न करने की ही बात नहीं कर रहा बल्कि खुदा और उसके तमाम अवतारों को दिल से मानने और उनमें अन्तर न करने की बात कर रहा है। फिर यदि तुम पर यह साबित है कि राम, कृष्ण और बुद्ध भी उसी सोर्स के अवतार थे जिस सोर्स के अवतार मूसा, ईसा और मौहम्मद थे, और इन सब को आदर की एक ही नज़र से देखते हो तो यह भी कुरान की शिक्षा के अनुरूप ही है। 

Quran.4.152: 

But as for those who believe in God and His Messengers and make no distinction between them (between God and His Messengers or between the Messengers themselves), to them God will grant their rewards (in full). God is indeed All-Forgiving, All-Compassionate.

जब कुरान हर ज़माने में आए अवतारों में कोई अन्तर नहीं करने की बात कर रहा है और साफ कह रहा है कि यह अवतार विभिन्न भाषा बोलने वालों के दरमियान आए, तो यह कैसे समझा जा सकता है कि भारतवर्ष में अवतार नहीं आए होंगे। 

Quran.14.4:

We have sent no Messenger save with the tongue of his people, that he might make (the Message) clear to them. Then God leads whomever He wills astray, and He guides whomever He wills. He is the All-Glorious with irresistible might, the All-Wise.

एक ओर कुरान गवाही दे रहा है कि हर भाषा बोलने वालों के बीच अवतार आए तो दूसरी ओर गीता में परमात्मा कह रहा है कि जब जब धर्म से लोग दूर होते हैं और अधर्म फैल जाता है तब धर्म को पुनः स्थापित करने और अधर्म और अधर्मियों का नाश करने कोई अवतार आता है। 

Gita.IV.7:

Whenever there comes to be laxity in regard to right life (dharma) O Bharata (Arjuna), and wrong coming to assert itself, then I bring about the creation of myself.

Gita.IV.8:

To protect those who are good and to destroy evil doers, for establishing righteousness, I assume being, age by age.

जब सत्य धर्म पर चलने वालों की संख्या घट जाए और बुराई सब पर हावी होने लगे, तब परमात्मा या दिव्यात्मा का अवतार आता है। 'Age by age' की बात हुई है। ‘जब जब’ और ‘तब तब’ से साबित है कि तमाम सृष्टि पर अधीन परमात्मा का यह कानून हर उस जगह पर लागू है जहां जहां क्रिएशन बसती है। यह कानून केवल भारतवर्ष के लिए नहीं हो सकता जबकि तमाम इंसानियत, जिन्नात आदि उस परमात्मा के अधीन हैं। हालांकि पूरी दुनिया ही अंधकार में डूबी थी लेकिन विशेषकर अरब में तो यह वो समय था जब बुराई और अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका था, सत्स और असत्य, इंसाफ और जुल्म, अच्छाई और बुराई में अन्तर मिट गया था, ऐसे में एक बार फिर कोई रूह किसी पाक मानव शरीर को अपना आफिस बनाने जा रही थी, जिसको लोग मौहम्मद कहते थे। 

जब मुसलमानों ने पहले आई किताबों को त्याग दिया और कुरान को ही अपने लिए काफी मान लिया तो पहले आए स्क्रिपचर्स में दिए गए ज्ञान से वंचित रह गए। English में किसी ने उसे Holy Spirit कहा तो संस्कृत में परमात्मा और अरबी में रूह। Spirit, आत्मा और रूह के मायनी एक ही तो हुए। लेकिन ईसाईयों ने Holy Spirit को ईसा से जोड़ लिया और समझा कि अन्य सब अवतार झूठे और हिन्दुओं ने परमात्मा को कृष्ण से जोड़ लिया और अन्य अवतारों को झुठला दिया। कुरान रूह केे मौहम्मद से रिश्ते को ब्यान कर रहा था लेकिन पहले के ग्रन्थों में बताए गए तथ्यों को नज़रअंदाज़ करने के कारण मुसलमान रूह के सही मायनी की समझ से बहुत दूर भटकते रहे। 

एक ओर दिव्यात्मा की बात हो रही थी तो दूसरी ओर किसी ने उन्हें Lights लिखा और मुसलमानों ने नूर कहा। दिव्य का अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे तो Light हुआ और अरबी में अनुवाद करेंगे तो नूर हुआ। दिव्यात्मा का अरबी अनुवाद नूरानी रूह हुआ। कुरान ने उसी हस्ती को कभी नूर कहा और कभी रूह और एक स्थान पर यह तक कहा कि रूह ही नूर है लेकिन मुसलमान इन हक़ीक़तों को ज़रा भी नहीं समझ पाए। यहां तक कि विभिन्न अनुवादकों ने कुरान में जब रूह शब्द आया तो उसके भिन्न भिन्न अर्थ लिए। 

आईए देखें कि कुरान इस बारे में क्या कह रहा है। कुरान का पहला सूरह जो अवतार मौहम्मद पर नाज़िल यानी अवतरित हुआ वह सूरह इन्ना अंज़लना है। आईए, देखें कि इसमें रूह का शब्द आया तो कमेंटेटर्स ने कैसे कैसे अनुवाद किया। 

In the name of Allah, the Most Affectionate, the Merciful

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहम करने वाला है। 

Undoubtedly we sent it down in the blessed and valuable night

बेशक हमने इसे शबे क़द्र में उतारा। 

शबे कद्र रमज़ान के महिने की किसी रात को कहते हैं, जिसमें ज़मीन पर कुछ उतरने की बात हो रही है। लेकिन क्या उतरने की बात हो रही है? अनुवाद में ‘इसे’ लिखा है और अंग्रेज़ी में 'It' के शब्द का प्रयोग हुआ है। ‘इस’ या 'It' इशारे के रूप में प्रयोग होते हैं जब हम उस चीज़ की पहचान रखते हों जिसकी ओर इशारा किया जा रहा है। हमें आयतों को ध्यान से पढ़ना होगा और चौकन्ना रहना होगा कि ‘इस’ या 'It' के इशारे से किस ओर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। 

अगली आयत में उस रात की बात हो रही है जिसमें वे हस्तियां अवतरित होती हैं जिन्हें ‘इस’ या 'It' के इशारे से संबोधित किया जा रहा है। 

And what you know, what the blessed night is?

तुम क्या जानो क्या है शबे क़द्र? 

The blessed and the valuable night is better than a thousand months

यह सौभाग्यशाली और मूल्यवान रात हज़ार महिनों से बेहतर है। 

Therein descends angels and the Rooh (the Spirit) by the command of their Lord for every affair

इसमें मलक यानी फरिश्ते और रूह उतरते हैं अपने रब के हुक्स से हर काम के लिए।

That is all peace till the rising of the dawn

वो सलामती है सुबह नमूदार होने तक

यह कुरान का पहला सूरह है जो अवतरित हुआ रमज़ान के महिने की आखि़री दहाई की किसी रात में। अवतार मौहम्मद अपने रब की पूजा और उपासना करने हेतु मक्का से बाहर एक गुफा में जाया करते थे। कभी अकेले जाते और कभी पत्नी ख़दीजा भी साथ जाती थीं। वहां वे कई कई दिन केवल खुदा की इबादत में गुज़ारा करते थे। एक दिन जब वह इबादत में लीन थे तब कुरान का यह सूरह अवतरित हुआ। इस सूरह की बात हम आगे करेंगे और देखेंगे कि उस दिन गुफा में क्या हुआ कि मौहम्मद ने बाहर आकर अपने अवतार होने की घोषणा की।

अभी केवल यह देखते हैं कि सूरह इन्नाअंज़लना क्या कह रहा है। किसी पाक दिन खुदा की ओर से कुछ नीचे भेजे जाने की बात हो रही है। ‘अंज़लना’ का शब्द प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ हुआ ‘नाज़िल होना’ या ‘अवतरित होना’। लेकिन क्या अवतरित हुआ? आगे कुरान उत्तर देते हुए कह रहा है कि ‘नाज़िल होते हैं मलक और रूह’। 

प्रश्न यह उठता है कि रूह क्या है? कुछ रिवायतों की बुनियाद पर मुसलमानों ने यह अर्थ निकाला कि ‘रूह’ से फरिश्ता जिब्रील मुराद है। कुरान बार बार कह रहा है कि तुम उसकी आयतों पर ग़ौर क्यों नहीं करते यानी अपनी अक़ल क्यों नहीं लगाते। एक ही लाईन में मलक और रूह के अवतरित होने की बात हुई। ज़रा ग़ौर कीजिए! पूरी specie यानी जनजाति को यदि एक जगह रख दिया जाए तो क्या उस specie के किसी भाग को आप अलग रखेंगे। 

कुरान का सूरह अस्र कह रहा है कि तमाम इंसान घाटे में हैं सिवाय उनके कि जो सीधे रास्ते पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और सत्य मार्ग पर चले और सब्र किया। इसको क्या ऐसे कोई कहेगा तमाम इंसान और सैयद हैदर घाटे में हैं। यदि ‘और’ के साथ आप यह कहंेगे तो इसका अर्थ हुआ कि सैयद हैदर इंसान के अतिरिक्त कुछ और है। आप ऐसा इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि सैयद हैदर भी इंसान है। यह तो कहा जा सकता है कि तमाम इंसान और जिन्नात या तमाम इंसान और जानवर पर क्या कोई कहेगा कि तमाम इंसान और नरेंद्र मोदी या इंसान और सैयद हैदर? लेकिन पहले आए ग्रन्थों को छोड़ देने वाले मुसलमानों ने ‘रूह’ का अर्थ निकाला ‘जिब्रील’ और कुरान की समझ को दूसरी किताबों से और दूर कर लिया। समझिए, बस ऐसे ही विभिन्न डिवाईन किताबें एक दूसरे से और दूर होती गईं! 

मुसलमानों द्वारा पेश किए जाना वाला अर्थ यह हुआ कि इस रात में फरिश्ते और जिब्रील उतरते हैं, जबकि जिब्रील भी फरिश्ता हैं। पहले अवतरित हुए किसी ग्रन्थ में आत्मा की बात हुई थी और किसी में Spirit की, फिर भी मुसलमानों ने रूह का अनुवाद ‘जिब्रील’ किया। परमात्मा से संबंध कृष्ण का बताया गया था तो Holy Spirit से संबंध ईसा का बताया गया था लेकिन मुसलमानों ने ‘रूह’ से मौहम्मद का संबंध न समझते हुए फरिश्ता जिब्रील को बीच में दाखि़ल कर लिया। 

कुरान का भेजने वाला फरिश्तों के साथ रूह के भेजने की बात कर रहा था। दूसरी ओर ईसाई किताबें पहले ही बताती आ रही थीं कि 7 रूहें थीं जो ज़मीन की ओर आई थीं। उपनिष्द भी 7 दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों की बात कर रहे थे जिनमें एक देवी है। यही दिव्यात्माएं हर ज़माने में हिदायत देने की जिम्मेदार थीं। ग़लत अर्थ पहना देने के कारण मुसलमान इस समझ से दूर हो गए।

जैसा मैंने कहा, मुसलमानों ने कुरान की उन आयतों का अनुसरण ही नहीं किया जो कुरान और पहले भेजी गई किताबों मे अन्तर न करने की शिक्षा दे रही थीं, इसलिए वे नहीं जान पाए कुरान दरअस्ल रूह या spirit या दिव्यातमा के किसी पाक इंसान के शरीर में, जिसने तप और इबादत से अपनी आत्मा को पाक किया हो, अवतरित होने की बात कर रहा है।

जिस प्रकार ईसाई trinity के कानसैप्ट को अपनी अक़ल से समझने की कोशिश में भटक गए और God, Holy Spirit and Son of God का कानसैप्ट बना लिया उसी प्रकार हिन्दुओं ने भी God यानी ब्रहमण, Holy Spirit यानी विष्णु यानी परमात्मा और उसके बाद कृष्ण जिनके शरीर में नूरानी रूह काम कर रही थी उसको ही परमात्मा या भगवान कहना प्रारंभ कर दिया। एक ने God के साथ Son of God का कानसैप्ट बना लिया तो दूसरे ने परमात्मा ने जिस शरीर के माध्यम से बात की थी, उसको ही god कह दिया। लेकिन परमात्मा तो स्वयं कृष्ण के मुख से कह रहा है कि जब जब धर्म के उसूल मिटने लगते हैं, हर युग में, तब तब मैं किसी शरीर में अवतरित होता हूँ। पृथ्वी पर कोई इतिहास नहीं मिलता और न ही परमात्मा ने ऐसा कहा है कि जिस शरीर को कोई डिवाईन आत्मा आफिस के रूप में प्रयोग करे, उसका नाम कृष्ण ही होगा। शरीर का नाम तो कुछ भी हो सकता है जिसे आत्मा पसन्द करे। यदि गीता ने बार बार, युग युग में, अवतरण की बात न की होती तो हम इस राज़ को नहीं समझ सकते थे।   

कृष्ण तो बस एक ही आए हैं इस सृष्टि के इतिहास में। फिर यदि पृथ्वी के किसी और भाग में कोई अवतार किसी और नाम से आया, मान लीजिए मूसा के नाम से, तो क्या हम ये कहेंगे कि मूसा ही खुदा हैं। या खुदा मूसा के शरीर में उतर आया। हम खुदा को बहुत छोटा कर रहे हैं यदि हम उसको किसी मानव शरीर में उतरता मानें। फिर एक समय आने पर जब उस शरीर का देहांत होगा तो फिर क्या कहेंगे?

यदि हमें कृष्ण के नाम का कोई और अवतार नहीं मिलता और दूसरी पाक हस्तियां मिलती हैं जिनमें आत्मा या रूह के अवतरित होने की बात हो रही है तो हमको समझना होगा कि जिस शरीर में भी वह डिवाईन आत्मा आती है, उसे अवतार कहते हैं और ऐसे ही एक अवतार कृष्ण भी थे। 

मेरे एक सनातनी मित्र के अनुसार ग्रन्थों में दर्ज है कि कृष्ण पर जब योग अवतरित होता था तब लोग कहते थे कि अब वह परमात्मा हो गए। यानी जब आयत आना होती थी, या मेरे मित्र के अनुसार परमात्मा का भाव उन पर आता था, तब लोग समझते थे कि वह परमेश्वर हो गए। बल्कि उनके अनुसार कृष्ण ने स्वयं परमात्मा होने की बात को नकारा है और जब महाभारत समाप्त हो जाती है तो वह कहते हैं कि ‘हे लोगों, उस समय मैं योग में था, इस समय मैं योग में नहीं हूँ।‘ यदि वह परमेश्वर होते तो क्या कहते कि इस समय मैं योग में नहीं हूँ? गीता के अनुसार योग का अर्थ है वह समय जब मानव शरीर की आत्मा का परमात्मा से कनैक्शन स्थापित हो जाए या कोई देवात्मा उस शरीर को आफिस के रूप में प्रयोग करने लगे। 

कुरान भी अवतार मौहम्मद के शरीर में रूह के अवतरित होने की बात कर रहा था लेकिन मुसलमानों ने रूह का अनुवाद जिब्रील लिखकर कुरान के अर्थ और समझ को दूसरी ओर मोड़ दिया। उनकी अनेक हदीसें भी भुला दीं जिनमें वह अपने नूर की बात कर रहे थे, कभी तो अहललबैत के शरीर में भी उसी नूर के हिस्से होने की बात कर रहे थे और कुरान कह रहा था कि अल्लाह ने रूह को नूर बनाया यानी यह कि अवतार मौहम्मद जिस नूर की बात कर रहे थे वह दरअस्ल नूरानी रूह की बात थी। 

अधिक समझने के लिए आइए देखते हैं कि कुरान में रूह का शब्द और किस किस स्थान आया है। यदि सब स्थानों पर रूह का अर्थ जिब्रील ही साबित हो रहा है तो हमारी दलील कमज़ोर पड़ जाएगी परन्तु यदि विभिन्न स्थानों पर रूह का अर्थ जिब्रील नहीं निकल रहा है तो हमारी यह दलील साबित हो जाएगी कि रूह का अर्थ जिब्रील नहंी बल्कि कुछ और ही होना चाहिए। 

कुरान का सूरह अश-शूरह जो कि 42वां सूरह है, उसकी 52वीं आयत देखते हैं, जैसा कि अनुवाद किया गया है, जिसमें रूह का शब्द आया हैः

Quran.42.52:

Thus, have We revealed to you O Mohammad, a Spirit (inspired Book - The Qur’an) by Our command: while you did not know what is The Book and what is the Iman (faith)? But We have made it (The Qur’an) a light [noor] whereby We guide those of Our servants whom We please; and surely you are guiding mankind to the Right Way.

रूह का अनुवाद हर अनुवादक ने अपने हिसाब से किया। हमने जो अनुवाद दिया है वह मालिक का है। मालिक ने रूह के स्थान पर वैसे ही 'Spirit' रहने दिया लेकिन ब्रेकिट में कुरान लिख दिया है। मेरा इन अनुवादकों से प्रश्न है कि इसी आयत में आगे कहा जा रहा है कि इससे हम अपने बंदों में से जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं। तो क्या यह मायनी लें कि कुरान से हम जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं? क्या मौहम्मद को कुरान से हिदायत मिली या मौहम्मद हिदायत पाए हुए थे इसलिए उनके द्वारा कुरान हम तक पहुंचा?

जब कुरान नहीं आया था तब खुदा कैसे हिदायत करता था? हिदायत का यह कारख़ाना तो हर ज़माने में क़ायम रहा है और उसके लिए भी है जिसके पास कुरान मौजूद नहीं है।

कहा जा रहा है कि जो चीज़ मौहम्मद की ओर भेजी गई वह नूर है। ग़लत अनुवाद करके लोगों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया कि जो कुरान भेजा गया वह नूर है। जबकि हर पहले आई किताब में spirit यानी रूह को नूर बताया जा रहा था जिसे मुस्लिम कमेंटेटर्स इसलिए नहीं समझ पाए क्योंकि उन्होंने पहले की किताबों में दी गई जानकारी को पढ़ने या समझने की कोशिश ही नहीं की। अवतार मौहम्मद भी कुरान को नहीं बल्कि अपने और अहललबैत के अन्दर नूर होने की बात कर रहे थे, यहां तक कह रहे थे कि अली और मैं एक नूर के दो टुकड़े हैं, या मेरा नूर उस समय भी मौजूद था जब आदम आब-ओ-गिल के दरमियान थे यानी पैदा किए जा रहे थे।

किसी ने यह भी नहीं सोचा कि कैसे यह कहना उचित होगा कि हमने तुम्हारी ओर किताब को भेजा जबकि तुम को न तो किताब का ज्ञान था न ईमान था। किताब जब आई ही नहीं थी तो उसका ज्ञान हो ही कहां से सकता था? सत्य यह है कि रूह आई और आसमान पर मौजूद किताब में क्या लिखा है उसका ज्ञान भी हो गया और सत्य की आगाही भी हो गई। 

यही कारण है कुरान ने एक और स्थान पर कहा किः ये अल्लाह की आयतें हैं जो हम तुम्हें ठीक ठीक पढ़कर सुनाते हैं। 

कम से कम मालिक ने ये तो किया कि जहां अरबी भाषा में रूह था वहां अंग्रेज़ी के अनुवाद मे ैचपतपज ही लिखा और ब्रैकिट में कुरान लिखा जैसा वह समझ रहे थे लेकिन अनेक दूसरे अनुवादकों ने तो अनुवाद में ही अपनी समझ शामिल कर दी। 

अब्दुल्लाह यूसुफ अली ने रूह के मायनी 'inspiration' लिखे हैं। लेकिन इसी आयत में आगे जहां आया था कि हमने इसको नूर बनाया वहां कैसे कहते कि हमने inspiration को नूर बनाया तो उन्होंने इस स्थान पर ‘हमने इसको’ के आगे ब्रैकिट में ‘कुरान’ लिख दिया और फिर लिखा कि ‘इसको हमने नूर बनाया‘। स्वयं देखिएः

And thus have We by Our command sent inspiration to thee: thou knowest not (before) what was Revelation and what was Faith; but We have made (Qur’an) a Light (Noor) wherewith We guide such of Our servants as We will; and verily thou dost guide (men) to the Straight Way (Sirat-e-Mustaqeem)

मौहम्मद असद ने अंग्रेज़ी अनुवाद किया तो उन्होंने रूह का अनुवाद 'life giving message' किया और आगे लिखा कि ‘हमने इस मैसेज को लाईट यानी नूर बनाया’।

And thus, too, [O Mohammad,] have We revealed unto thee a life-giving message, [coming] at Our behest. [Ere this message came unto thee,] thou didst not know what revelation is, nor what faith [implies]: but [now] We have caused this [message]to be a light, whereby We guide whom We will of Our servants: and, verily, [on the strength thereof]thou, too, shalt guide [men] onto the straight way-

डाक्टर मुस्तफा खत्ताब ने ‘रूह’ का अंग्रेजी अनुवाद किया तो इसका अर्थ 'revelation' लिखा और आगे लिखा कि हमने इस 'revelation' को 'light' यानी नूर बनाया। 

And so We have sent to you O Prophet a revelation by Our command. You did not know of this Book and faith before. But We have made it a light, by which We guide whoever We will of Our servants. And you are truly leading all to the Straight Path –

इसी प्रकार उर्दू और हिन्दी अनुवादकों ने ‘रूह’ का अनुवाद विभिन्न मायनी के साथ किया, जिसको कुछ समझ नहीं आया उसने बस ‘रूह’ ही रहने दिया लेकिन किसी ने भी वे मायनी नहीं लिखे जो पहले के स्क्रिपचर्स और विशेषकर उपनिषद और गीता से साबित हो रहे थे। 

जबकि सीधा सरल अनुवाद जो वेद, उपनिषद और बाईबल आदि तमाम स्क्रिपचर्स से साबित है वह यह होना थाः 

ऐ मौहम्मद हमने अपने हुक्म से तुम्हारी ओर दिव्यात्मा यानी रूह को भेजा। ;इसको तुम्हारे शरीर को आफिस बनाने तकद्ध तुम न तो किताब को जानते थे न ईमान को। लेकिन हमने इसको नूर बनाया है कि इससे हम अपने बंदों में से जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं। बेशक तुम सीधा रास्ता दिखाते हो।

आप ने देखा कि जब कुरान की इस आयत में रूह का शब्द आया तो किसी ने Quran अनुवाद किया, किसी ने insiration, किसी ने revelation किसी ने वैसा का वैसा ‘रूह’ ही लिख दिया लेकिन सूरह इन्ना अंज़लना में जब ‘रूह’ का शब्द आया तो यही अनुवादक उसका अर्थ ‘जिब्रील’ लिख रहे हैं। 

एक और आयत दिखाकर आगे बढ़ते हैं। यदि सूरह इन्ना अंज़लना में फरिश्तों और रूह के ज़मीन पर अवतरित होने की बात हो रही है तो एक और आयत में रूह और फरिश्तों के एक साथ खड़े होने की बात हो रही है और कहा जा रहा है कि उस दिन इनमें से कोई बात नहीं करेगा सिवाय उसके जिसको अनुमति दी जाए अल्लाह की ओर से और जिसका वक्तव्य हमेशा सच्चा है। 

Quran.78.38:

On the day the holy spirit and the angels will stand in ranks. None will talk, except those granted permission by the Most Compassionate and whose words are true.

साफ है कि यहां पर जिब्रील की बात नहीं हो रही जबकि यह आयत बिलकुल उसी प्रकार बात कर रही है जैसे सूरह इन्ना अंज़लना की आयत बात कर रही थी। एक स्थान पर रूह और फरिश्तों के अवतरित होने की बात हो रही थी तो दूसरी जगह अपने रब के सामने खड़े होने की बात हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि उनमें से कोई भी कलाम नहीं करेगा, सिवाय उसके जिसको उनका रब अनुमति दे।

अनुवादकों ने यहां पर ‘रूह’ या 'spirit' का अनुवाद जिब्रील भी नहीं किया जैसा सूरह इन्ना अंज़लना में अनुवाद करके कुरान पढ़ने वालों को वेद, उपनिषद, गीता और बाईबल से दूर कर दिया था और बीच में ग़लत समझ की दीवार बना दी थी। 

यदि रूह शब्द के मायनी नहीं समझ आ रहे थे तो बस वैसे ही ‘रूह’ या 'spirit' लिख देते तो कम गड़बड़ी होती। जिन लोगों ने अपने मन से दूसरे मायनी पहनाए, उन्होंने कुरान की आयतों के मायनी को दूसरे ग्रन्थों से अलग कर दिया। यहां तक कि मौहम्मद किस प्रकार अवतार हुए, यह समझ भी धूमिल पड़ गई। मुसलमानों में कुछ ऐसी सोच बन गई कि जैसे जिब्रील आए और उन्होंने आयतों को पढ़ाया तो मौहम्मद ने पढ़ा। कुछ ने तो यहां तक कहा कि जिब्रील ने मौहम्मद के दिल को चीर कर नूर से धोया और फिर उन्हें आयत बताई। जबकि असलियत तो यह है कि जिब्रील या दूसरे तमाम फरिश्ते आसमानों पर इन दिव्यात्माओं यानी अहललबैत के मातहत हैं और यही दिव्यात्माएं यानी अहललबैत विभिन्न काम उनके सुपुर्द करती हैं। 

ऐसी ही समझ के फेर के कारण हमें वेद समझने में कठिनाई होती है। आज हालत यहां तक पहुंच गई है कि हिन्दु वेद को आसमानी किताबें मानते तो हैं लेकिन       अधिकांश घरों में आपको वेद नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जब वे वेद पढ़ने बैठते हैं तो वे उनकी अक़ल पर नहीं उतरते। इसलिए क्योंकि वेदों का अनुवाद करने वालों ने जो कुछ समझ नहीं आया उसका भी अनुवाद कर डाला। इंसानियत वेद से सही मायनों में लाभान्वित तब होगी जब नई उजागर हुई हक़ीक़तों की रौशनी में वेदों का एक बार फिर अनुवाद किया जाएगा। 

कुरान के 40वें सूरह की 15वीं आयत बिलकुल साफ कह रही है कि आसमान और ज़मीन का मालिक अपने बंदों में से जिस पर चाहता है अपने हुक्म से रूह अवतरित कर देता है ताकि वह लोगों को आखिरी दिन जब सब इकट्ठा किए जाएंगे उससे डराए। और कुरान के सूरह इसरा की 85वीं आयत साफ कह रही है कि रूह की हक़ीक़त एक राज़ है जिसके बारे में बहुत ही कम जानकारी दी जा रही है। 

अल्लामा तबातबाई ने तफसीरे मीज़ान में लिखा है कि रूह उन लोगों के शरीर में डाली जाती है जिन्हें रसूल के रूप में चुना जाता है, अन्यथा यह फरिश्तों के साथ स्वर्ग मंे रहती हैै। अल्लामा असलियत के क़रीब हैं लेकिन वह भी नहीं जानते थे कि उपनिषद आदि में बड़े विस्तार से इसकी हक़ीक़त बताई गई है। एक रूह के विभाजन से 7 रूहें बनीं जो हर ज़माने में हिदायत के काम में लगी हैं। 

गीता के शब्दों को ग़ौर से पढ़ने पर साफ होता है कि महाभारत के युद्ध में दोनों सेनाओं के आमने सामने आने और कृष्ण और अर्जुन के दरमियान वार्तालाप प्रारंभ होने के काफी समय बाद तक अर्जुन को इस बात का एहसास नहीं था कि कृष्ण के मुख से परमात्मा बोल रहा है। यानी साफ है कि यह जान पाना आसान नहीं कि अमुक व्यक्ति के शरीर को अपने आफिस के रूप में परमात्मा प्रयोग कर रहा है। न ही यह जान पाना आसान है कि अमुक शरीर को जुलमत ने अपना कारिंदा बना रखा है। हम किसी के बारे में यक़ीन के साथ कोई राय नहीं बना सकते। 

यही कारण है कि खुदा ने इंसान को बाद में पैदा किया पहले इस हिदायत के कारख़ाने को तैयार किया। जुलमत भी पैदा हुई क्योंकि इन दोनों के बिना इंसान की परीक्षा के कोई मायनी ही नहीं थे। इन चनिंदा हस्तियोें को नूरानी रूप में भी पाक तत्वों से बना बताया और जब यह मानव शरीर में अवतरित हुए और अहललबैत कह कर संबोधित किया, तो इनके लिए गारण्टी ली कि उनके क़रीब बुराई का गुज़र भी नहीं हो सकता। उनको perfectly pure बताया। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके शरीर में दिव्यात्मा शक्ति के वह अंश काम कर रहे थे जो पाक तत्वों से बनी थी। यही सप्तऋषि है। इनको ही गुरू मानना है। और क्योंकि परमात्मा ही इनकी मुकम्मल पाकीज़गी की गारण्टी ले रहा है, इसलिए यदि कोई पथ इनका बताया हुआ साबित है तो उसपर आंख बंद करके चलना ही अक़लमंदी होगी।

हर ज़माने में यह दिव्यात्माएं एक ही उपदेश देती नज़र आती हैं। वह उपदेश है एकेश्वरवाद का, एक खुदा के आगे अपने को समर्पित करने का, केवल उसकी इबादत करने का। यह उपदेश केवल उसके लिए है जो अपने मस्तिष्क को परमात्मा से जोड़ दे, जो केवल परमात्मा की याद बसा कर कर्म करे, उसके आगे ही सिर झुकाए और उसको ही अपनी मंज़िल जाने। सब कुछ त्याग कर उसकी ओर बढ़े, उसमें ही आसरा खोजे, तो ऐसे व्यक्ति के तमाम गुनाह धो दिए जाएंगे। कुरान और गीता दोनों एक ही मैसेज देते दिखाई देते हैं। 

Gita.XVIII.65:

Become one in mind with Me: be devoted to Me: sacrifice to Me: bow down to Me: you shall come to Me alone: I promise you (in) truth: you are dear to Me.

Gita.XVIII.66:

Abandoning all duties, come to Me, the One, for refuge; I shall absolve you from all sins; do not despair.

उस एक की पूजा और उपासना की शिक्षा वेद ने भी दी थी जो आम हिन्दु नहीं समझ पाए। ब्रहम सूत्र कहता हैः

Ekam Brahm dvitiya naste, neh, na, naste, kinchan

[The Brahm is One, there is none other, nay, none, not the least]

एक खुदा की बात कुरान भी करता है जब सूरह इखलास में कहा जाता हैः

In the name of Allah, The Most Gracious and Merciful

Say, “He is Allah, (who is) One,

Who is Eternal, (the uncaused cause of all that exists)

Who has neither given birth nor is he born

And there is no equivalent to Him.

यानी कहा जा रहा है किः 

कहो कि अल्लाह एक है

वह हमेशा के लिए है, बेनियाज़ है

न उसकी कोई संतान है और न किसी न पैदा किया

और न उस जोड़ का उस जैसा कोई है।

और कुरान कहता हैः

Quran.14.10:

. . . What! about Allah is there any doubt, the Originator of the heavens and the earth ?. . .

Quran.21.22:

Had there been in (the heavens and the earth [other]) gods except Allah, they both had been in disorder. . .

Quran.112.1-4:

Say: ‘He (Allah) is One (alone). Allah, the needless.He begetteth not, nor is He begotten. And there is none like unto Him

Quran.6.104:

Vision perceiveth Him not, and He perceiveth (all) vision; He is the Subtle, the All-aware

Quran.16.74:

So coin ye not any similitudes to Allah; verily Allah knoweth (every thing) and ye know not.

Quran.42.11:

. . .Nothing whatsoever (is there) like the like of Him; and He (alone) is the All-hearing and the All-seeing.

अहललबैत की तमाम ज़िन्दगी केवल एक खुदा को पहचनवाने और उसकी इबादत की ओर मानवता को लाने में गुज़री। यदि उन्होंने तमाम यातनाएं सही तो केवल इस मक़सद की ख़ातिर। इस एकेश्वरवाद की ओर लाने के लिए दिव्यात्माएं हर ज़माने में लगी रहीं। उन दिव्यातमाओं को पहचानते हुए उनके बताए जा रहे मार्ग पर आगे बढ़ते जाने से इंसान मोक्ष की राहों पर आगे बढ़ सकता है। 

अंत में आपको दिखाते हैं कि अहललबैत अली ने एकेश्वरवाद को किन शब्दों में ब्यान किया है। पेश है किताब नहजुल बलाग़ा से एक खुदा की पहचान और उसका विवरणः

Nahjul Balagha.Sermon 1:

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए जिस का व्याख्यान कोई वक्ता नहीं कर सकता, जिस की नेयमतों को किसी कैल्कूलेटर द्वारा गिना नहीं जा सकता। कोई भी उसकी इबादत और अनुपालन करके उसके हक़ को पूरा नहीं कर सकता। इंसान की अक़ल यानी सोच अपनी चरम ऊंचाई पर भी उसकी पहचान नहीं कर सकती, उसकी अक़ल अपनी तमाम गहराई में डूब कर भी उस तक नहीं पहुंच सकती। वो जिसके वर्णन की कोई सीमा नहीं रखी गई है, उसकी प्रशंसा के लिए कोई शब्द नहीं हैं, जिसके लिये न समय की सीमा है और न कोई बंदिश। 

धर्म की सबसे अधिक बुलंदी उसकी उपस्थिति का इक़रार करने में है, उसका इक़रार करने की सब से अधिक बुलंदी उसके वुजूद की गवाही देना है, उसके वुजूद की गवाही देने की सब से अधिक बुलंदी उसके एकमैव होने पर विश्वास रखना है, उसके एकमैव होने में विश्वास रखने की सबसे अधिक बुलंदी उसकी शुद्धता एवं पवित्रता को मानने में और उस पर विश्वास रखने में है, और उसकी पवित्रता की पूर्णता उसमें गुणों को नकारना है, क्योंकि हर गुण साबित करता है कि वह उससे भिन्न है जिससे उसको जोड़ा जा रहा है और हर वह जिससे कोई गुण जोड़ा जाए उस गुण से भिन्न हो जाता है। 

इसलिए जिस किसी ने अल्लाह के साथ कोई गुण जोड़ा उस ने उस जैसा किसी को माना, और जिस किसी ने उस जैसा किसी को माना, वह उसमें दुई मान रहा है, और जिस ने उसमें दुई को माना, वह उसके भाग मान रहा है, और जिस किसी ने उसके भाग माने, उसने ग़लत समझा, और जिस ने उसको ग़लत समझा उसने उस पर नुक्ताचीनी की, और जिस ने उस पर नुक्ताचीनी की, उसने उसको सीमाओं में      बांध दिया और जिस ने उसको सीमाओं में बांधा उसने उसको संख्या में सीमित किया। जिस किसी ने कहा कि वह किस में है, उस ने माना कि वह किसी चीज़ में अंतरविष्ट है और जिस किसी ने कहा वह किस पर है उसने माना कि कुछ है जिस पर वह नहीं। 

वह एक हस्ती है पर किसी घटना के कारण वह हस्ती वुजूद में नहीं आई। वह मौजूद है लेकिन गै़र वुजूद से वुजूद में नहीं आया। वह हर चीज़ के साथ है परन्तु यह भौतिक निकटता नहीं। वह हर चीज़ से जुड़ा है पर यह भौतिक जुदाई नहीं। वह कर्म करता है पर जुंबिश या हरकत और साधन या यंत्र का इशारा न समझ लेना। वह देखता है उस समय भी जब उसकी क्रिएशन में कुछ नहीं है देखने के लिए। वह केवल एक है ऐसा कि कोई दूसरा नहीं जो उसका साथी हो या जिसकी जुदाई का कोई दुख हो। 

Sermon 185:

सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। वह ऐसा है कि इंद्रियां उसको महसूस नहीं कर सकती, वह किसी स्थान में समा नहीं सकता, आंखें उसको देख नहीं सकती और पर्दे उसको ढक नहीं सकते। यह कि वह अनंत है, वह साबित करता है तमाम सृष्टि के वुजूद में आने से, और सृष्टि को पैदा करने से भी वह साबित करता है अपने वुजूद को, और उन में समानता के माध्यम से वह दिखाता है कि उसके समान कुछ भी नहीं। 

वह अपने प्रण से सच्चा है। वह इससे बहुत ऊंचा है कि अपनी सृष्टी के साथ नाइंसाफी करे। वह निष्पक्षता के साथ अपनी सृष्टी के साथ खड़ा होता है और उनके साथ केवल इंसाफ करता है। वह सृष्टि के सृजन से और उसकी ताक़त के आगे उनकी असक्षमता से और उसके अनंत होने की समाप्ति में उनकी असक्षमता से साबित करता है कि वह हमेशा से है, अनंत है। 

वह एक है पर गिनती में एक नहीं। वह हमेशा से रहने वाला है बिना किसी सीमा के। वह है पर बिना किसी सहायता के। मस्तिष्क उसको मानने को तैयार है पर किसी इंद्रियों के कारण नहीं। जो कुछ भी नज़र में आता है वह उसकी गवाही देता नज़र आता है बिना उसका साक्षात्कार किए। हमारी सोच के घेरे में वह समा नहीं सकता। वह हमारी कल्पना शक्ति में स्पष्ट होता है उसकी कल्पना की सहायता से, और कल्पना उसकी कल्पना करने में असक्षम है। उसने कल्पना को ही मध्यस्थ बना दिया है इस मामले में। वह बड़ा इस प्रकार नहीं है कि विस्तार या फैलाओ में बड़ा है और इसलिए उसका शरीर भी बहुत बड़ा है। और न ही वह शक्तिमान है इस तरह कि उसकी ताक़त की पहुंच बहुत दूर तक है और उसका डील डौल बहुत फैला हुआ है। लेकिन वह बड़ा है रूतबे में और कुदरत में शक्तिमान है। 

Sermon 91:

सारी प्रशंसा उस परवरदिगार के लिए है जिसके ख़ज़ाने में फज़्ल-ओ-करम के रोक देने और मेहरबानियों पर रोक लगा देने से बढ़ौतरी नहीं होती है और उसके करम और सख़ावत के खज़ाने में कमी नहीं आती। इसलिए कि उसके अतिरिक्त हर देने वाले के यहां कमी हो जाती है और उसके सिवा हर न देने वाला कंजूस कहलाता है। वह सबसे बेहतरीन नेयमतों और न समाप्त होने वाली रोज़ी के माध्यम से एहसान करने वाला है। तमाम जीव जन्तु और दूसरी क्रिएशन उस पर आश्रित है।

उसने सबकी रोज़ी निश्चित कर दी है और जीविका निर्धारित कर दी है। अपनी ओर तवज्जो करने वालों और उससे नेयमतें मांगने वालों के लिए रास्ता खोल दिया है और मांगने वालों को न मांगने वालो से अधिक अता नहीं करता है। 

वह ऐसा अव्वल है कि जिसकी कोई पूर्व नहीं कि उससे पहले कोई हो जाए और ऐसा आखि़र है जिसके आखि़र में कोई नहीं है कि उसके बाद कोई रह जाए। 

वह आंखों की रौशनी को अपने तक पहुंचने और उसको समझ पाने से रोके हुए है। उस पर ज़माना या समय कोई अन्तर नहीं डालता है कि हालात बदल जाएं, और वह किसी स्थान में नहीं है कि वहां से कहीं और चला जाए। यदि वह उन तमाम रत्न और जवाहेरात को तुम को अता कर दे जो पहाड़ अपने अन्दर से निकाल कर बाहर फेंकते है या जिन्हें समुद्र के सीप मुस्कराकर बाहर फेंक देते हैं, चाहे वह चांदी हो या सोना, मोती हों या मरजान, तो भी उसके करम और सख़ावत पर कोई असर न पड़ेगा और न उसके ख़ज़ानों की संख्या में कोई कमी आ सकती है। उसके बाद भी उसके पास नेयमतों के वह ख़ज़ाने रह जाएंगे, जिन्हें मांगने वालों का मांगना समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए कि वह ऐसा करीम है कि न मांगने वालों के सवाल उसके यहां कमी पैदा कर सकते हैं और न ग़रीबों की पुकार उसे बांटने से रोक सकती है। 

उसने तमाम क्रिएश्न को बग़ैर किसी नमूने को निगाह में रखे हुए पैदा किया है और किसी पहले के क्रिएटर और क्रिएश्न के बनाए नक़शे के बिना पैदा किया है।  ...

जब उनको नर्क में डाल दिया जाएगा तो वे आपस में झगड़ा करते हुए अपने झूठे खुदाओं से कहेंगे जो वहीं नर्क में उनके साथ होंगेः अल्लाह की क़सम हम खुली हुई गुमराही में थे, जब हम तुम्हें सब जहानों के रब के बराबर ठहराते थे।

Quran.26.97-98:

By Allah, we were certainly in manifest error when we equalled you with the Lord of the worlds.

और कुरान कहता है कि बेशक तुझे हर चीज़ पर कुदरत है।

Quran.66.8:

Certainly, Thou art powerful over every thing. 

इंसान की कमअक़ली की अंतिम हद यह है कि वह अल्लाह की हिकमत की दलील तलाश कर रहा है जबकि उसने अपनी अक़ल से काम लिया होता तो उसे अंदाज़ा हो जाता कि जिन आंखों से उसकी कुदरत की खोज कर रहा है और जिस दिमाग़ से उसके होने के सबूत ढूंढ रहा है, ये दोनों अपनी ज़बाने बे ज़बानी से आवाज़ दे रहे हैं कि अगर कोई क्रिएटर न होता तो हम भी न होते। हम स्वयं उसकी कुदरत और ताक़त के बेहरीन गवाह हैं। हमारे होते हुए अल्लाह की कुदरत और ताक़त की खोज करना बग़ल में कटोरा रखकर शहर में ढिन्ढोरा पीटने के बराबर है और यह अक़लमंदों को शोभा नहीं देता। 

Sermon 91: 

सुनो, ऐ प्रशन करने वाले, अपने को सीमित रखो उसके उन गुणों तक जो कुरान ने बताए हैं, और उसकी हिदायत की रौशनी से लाभांवित हो। शैतान तुम को और गहराई में जाने के लिए प्रेरित करता है, उससे आगे का ज्ञान अल्लाह पर छोड़ दो जो न तो कुरान तुम से जानने के लिए कहता है और न जिस के बारे में नबी या अन्य हिदायत याफता इमामों के कथन में उल्लेख है। बस जो बता दिया गया वही जानना अल्लाह की ओर से तुम पर फर्ज़ है।

जान लो ज्ञान अर्जित करने में पक्के वे हैं जो वह पर्दे उठाने से बचते हैं जो अनजान और नामालूम की ओर लेकर जाते हैं, और जिस का ज्ञान उनसे छिपा है जिसको न जानने पर वे अभिस्विकृति देते हुए और    अधिक छानबीन से बचते हैं। अल्लाह उनकी इस स्वीकृति की प्रशंसा करता है कि वे वे ज्ञान अर्जित नहीं कर पाए जो उनके लिए नहीं था। वे बहुत गहराई में बातचीत में नहीं जाते कि जो उस अनंत के बारे में जानने से निशेधित किया गया है और वे इसको दृढ़ता कहते हैं। वे इस पर रज़ामंद हैं और अल्लाह के प्रभुत्व और महानता को अपनी अक़ल के दायरे में परिसीमित नहीं करते, ऐसा करने पर वे तबाह होने से नहीं बच पाएंगे।

अपनी अक़ल के मुताबिक़ अल्लाह की बड़ाई और कुदरत का अन्दाज़ा न करो कि हलाक होने वालों में गिने जाओगे। देखो, वह ऐसा कुदरत रखने वाला है कि जब कोई अक़ल उसकी कुदरत की हद पता करने के लिए आगे बढ़ती है और हर तरह के वसवसे से पाक कोई सोच उसकी सलतनत के छिपे राज़ों को समझना चाहती है और दिल मौहब्बत में ओत पोत उसके गुणों को पता करने की चेष्टा करता है और अक़ल की राहें उसकी ज़ात का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसके गुणों की मदद से आगे बढ़ना चाहती हैं तो वह उन्हें उस हालत में वापिस कर देता है कि वह अदृश्य दुनिया की गहराईयों की राहें तय कर रही होती हैं और सम्पूर्ण रूप से उसकी ओर आकर्षित होती हैं जिसके नतीजे में अक़लें ये मानते हुए पलट आती हैं कि यदि सोच पाक नहीं तो उसकी हक़ीक़त की समझ प्राप्त नहीं हो सकती।

Quran.2.112:

No! Rather, whoever submits his whole being to God (and does so) as one devoted to doing good, aware that God is seeing him, his reward is with his Lord, and all such will have no fear ( for they will always find my support and help with them), nor will they grieve.

पूरी तरह समर्पण की बात हो रही है और अच्छे कर्म के लिए भी अपने को समर्पित करने की बात हो रही है। अपनी इंद्रियों को, शरीर को, सोच को, submits his whole being!

आप समझ सकते हैं कि एबसोलूट की समझ पैदा करना नामुमकिन है। केवल उस सोर्स से जुड़ी दिव्यात्माएं ही, अहललबैत ही, उस हक़ीक़त का सही और सच्चा विवरण पेश कर सकते हैं। अली द्वारा पेश किया गया विवरण हर डिवाईन पुस्तक, जिसमें गीता, उपनिषद और वेद भी शामिल हैं, सब से साबित है। कलियुग का इंसान ऐसा हटधर्म हो चुका है कि सृष्टि के उस रचयिता और मालिक की इबादत पर पाबंदी लगा रहा है या इबादत स्थलों को मलियामेट करने की सोच रहा है। सृष्टि का वह रचियता जिसको गीतन ने एबसोलूट यानी सर्व-शक्तिशाली यानी क़ादिरे मुतलक़ कहा और जिसकी बात करते हुए कहाः

Gita.IV.24:

(For him) the Absolute is the act of offering, the Absolute is the substance offered into the Absolute which is the fire offered by (him) the Absolute, the end to be reached by him being even the Absolute by means of his peace supreme of absolutist action.

Gita.V.17:

Those having That Absolute for reasoning, that for the Self, that for finalized discipline, that for supreme goal, they go to a state of final non-return, all their dross being cancelled out by wisdom.