Lecture 001. Do Muslims use the term ‘Kafir’ wrongly?
एक ही रास्ता थाए और एक ही पैग़ाम था जो हर हर ज़माने में मुख्तलिफ लैंगुएजेज़ में दिया जा रहा था। लेकिन हम ने उनको कई जगह इंटरप्रेट गलत किया, कई जगह समझा ग़लत, कई जगह वो वाईटल लिंक्स हम को नहीं मिले जिनकी वजह से उनको समझा जा सकता था।
मसलन, मुसलमानों के लिए अल्लाह एक ऐसा नाम है जिसकी वो इबादत करते हैं और जिसके आगे सर ब सजूद होने की बात करते हैं। लेकिन अगर हम सिर्फ अल्लाह के लफज़ को लें तो मैं कह सकता हूं कि बहुत सारे मुसलमानों ने अल्लाह के लफज़ को भी ग़लत समझा। क्योंकि अल्लाह नाउन नहीं है, संज्ञा नहीं है, अल्लाह सिफत है, अल्लाह एडजैक्टिव है, विशेषण है। प्राब्लम क्या है कि जब हम अल्लाह को संज्ञा बना देते हैं, नाउन बना देते हैं, तो हम कहते हैं हमारा अल्लाह, तुम्हारा ईश्वर। किसी और का गाॅड!
अल का मतलब है इंगलिश का ‘द’ और इलाह का मतलब है ‘गाड’। रसूलअल्लाह ने जब तालीम देना शुरू की तो सब से पहले कहाः ला इलाहा इलल्लाह, ला के साथ भी इलाह आ रहा है और फिर एक बार फिर एक बार और इलाह आ रहा है। कोई खुदा नहीं है सिवाय खुदा के। There is no god but the God. यानी जिस किताब में भी और जहां भी एक क़ादिरे मुतलक़ एबसोलूट गाॅड का कान्सैप्ट मौजूद है, वही हमारा अल्लाह है। यानी अगर कोई एक खुदा की बात कर रहा है, तो वो एक खुदा, जो एबसोलूट है, कादिरे मुतलक है, आल परवेडिंग है, हर तरफ मौजूद है, वो एक खुदा ही अल्लाह है, द गाॅड।
इसी तरीके से आम तौर पर हम कहते हैं कि अल्लाह के 99 नाम हैं। लेकिन वो 99 नाम नहीं हैं, सिफतें यानी एडजैक्टिव हैं। हमने उनको नाउन समझा। संज्ञा समझा। वो करीम है ये उसकी सिफत है। वो हकीम है ये उसकी सिफत है। वो समीअ है सब कुछ सुनने वाला है, बसीर है, सब कुछ देखने वाला है, ये उसकी सिफत है। हम ने उस सब को नाउन बना दिया।
ला इलाहा इलल्लाह, There is no god but the God. यानी उस कादिरे मुतलक खुदा के अलावा कोई खुदा नहीं है। यही बात वेद कह रहे हैं। एक खुदा का कानसैप्ट ईसाईयों में भी है। हम इस पर बाद में आएंगे कि कहां पर डेविएशंस हुए लेकिन एक खुदा का कानसैप्ट यहूदियों और ईसाईयों में भी है।
ब्रहम सूत्र कहता हैः ekam brahm dvitiya naste, neh, na, naste,
kinchan
(The Brahm is One, there is none other, nay, none, not the least)
बार बार, जोर देते हुए, वेद कह रहे हैं, और कोई नहीं है, बस वो एक है। अगर आप आम हिन्दुओं में देखिए तो एक खुदा का कानसैप्ट दिमाग़ों में वैसे मौजूद नहीं है लेकिन उनकी किताबों में एक खुदा की ही बात हो रही है।
इसी तरीके से लफज़ मुस्लिम या मुसलमान भी नाउन नहीं है। हम ने इन शब्दों को नाउन समझ लिया है। हम समझते हैं कि जो कोई पैदा हो गया किसी मुसलमान घर में और चाहे जो कुछ भी कर रहा है वो मुसलमान है। मुसलमान का अर्थ होता है सम्पूर्ण आत्मसमर्पर्ण। जिसने अपने को मुकम्मल तौर पर अल्लाह के आगे सुपुर्द कर दिया।
Muslim = sampurna atma samarpan
= complete surrender to the Will of God
= Mukammal supurdgi
= Musallam Imaan
गीता में भी कम्प्लीट सरेंडर के उदाहरण भरे पड़े हैं। मैं बस एक उदाहरण देता हूं, इस से ज्यादा बेहतर और क्या उदाहरण हो सकता हैः
Gita.XIII.7
Freedom from conventional pride, unpretentiousness, non-hurting, non-retaliating, forbearance, straightforwardness, loyal support of the teacher [acharya], purity, steadfastness, and state of self-withdrawal;
Gita.XIII.8
Detachment in respect of sense-interests, absence of egoism, insight regarding the pain and evil of birth, death, old age, and disease:
Gita.XIII.9
Without clinging to, [and] without intensely involved attachment to, [relations such as] sons, wives, [and property such as] houses and having a constant neutral minded attitude in respect of desirable and undesirable happenings,
Gita.XIII.10
Devotion to Me to the exclusion of everything extraneous, and never straying from the [direct] path, preference to dwell in a place apart, distaste for crowded living;
हर बाहर की चीज़ को छोड़कर मेरे लिए डिवोशन
अगर मुसलमान का मतलब मुकम्मल सुपुर्दगी है तो मुकम्मल सुपुर्दगी की बात यहां भी हो रही है।
अगर हम शब्द मुस्लिम को नाउन बना लेेंगे तो हर कोई जो मुसलमान घराने में पैदा हुआ वो मुस्लिम है लेकिन अल्लाह ने जो पैरामीटर्स बनाए हैं उनपर मुसलमान बहुत कम रह जाएंगे। अस्ल में मुस्लिम वही है जो कभी भी सीधे रास्ते से विचलित न हो।
Gita.XIII.11
Everlasting affiliation to the wisdom pertaining to the Self [atma], insight into the content of philosophical wisdom – this is declared to be wisdom; whatever is other than this is ignorance.
नोलेज और विस्डम में बड़ा फर्क होता है। किताब से शिक्षा, नोलेज मिलती है, लेकिन विस्डम किताब से नही आती। गीता के अनुसार आत्मा का ज्ञान ही अस्ल में विस्डम है।
कुरान के दूसरे सूरह की 112वीं आयत कहती है जो कोई भी अपने को मुकम्मल सुपुर्द कर दे अल्लाह के आगे ये समझते हुए कि वो देख रहा है उसको इनाम उसके खुदा की तरफ से मिलेगा।
Quran.2.112
No! Rather, whoever submits his whole being to God [and does so] as one devoted to doing good, aware that God is seeing him, his reward is with his Lord, and all such will have no fear, [for they will not always find My help and support with them], nor will they grieve.
हम को ये भी समझाना जरूरी है कि काफिर का लफज भी हमने नाउन ले लिया है। जबकि काफिर का लफज़ नाउन नहीं है। मुसलमानों पर ये इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वो दूसरों को काफिर कहते हैं, और हम दरअस्ल ऐसा कहते भी हैं, ये मुसलमानो की सब से बड़ी गल्ती है, कि उन्होंने शब्द काफिर को भी एक नाउन यानी संज्ञा समझ लिया, एडजैक्टिव यानी विशेषण समझने की जगह। शब्द काफिर की एक डेफिनिशन है, उस डेफिनिशन में जो आए वो काफिर है। हम कर किसी को काफिर नहीं कह सकते।
लोग कहते हैं कि कुरान में आया कि काफिरों के सिर क़लम कर दो। हम कई बार डिफेंसिव हो जाते हैं जब कोई इस किस्म का हमला करता है। हम को कुरान में देखना होगा कि उसमें आया क्या है।
कुरान 86 15-17
They (who reject it) are busy making schemes;
And I am making a scheme.
So allow time for the kafirs. Leave them awhile.
बेशक वो [काफिर] पुर फरेब तदबीरों में लगे हुए हैं।
और मैं अपनी तदबीर बना रहा हूं।
बस आप काफिरों को कुछ मोहलत दे दीजिए; उन्हें थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए।
यानी काफिर वो है जो तदबीर कर रहा है आप के खिलाफ; जो प्लानिंग कर रहा है आपके खिलाफ। काफिर हर कोई नहीं हो सकता।
जो आप के खिलाफ तदबीर कर रहा है, प्लानिंग कर रहा है आपको नुकसान पहुंचाने के लिए, अभी हम इस आयत से यही मतलब निकाल सकते हैं।
सवाल ये है कि तदबीर कौन करेगा?
जो हक़ को समझ गया है और झुठला रहा है, वो काफिर है।
कुरान में जहां जहां काफिर का लफज़ इस्तेमाल हुआ है, उसको देखते हुए मैं जो मतलब निकाल पाया हूं वो ये कि जिस ने हक को पहचान लिया, और पहचानने के बाद उसने उसे झुठलाया, या उसके बाद वो आप से लड़ने को आ गया, वो कुरान की रू से काफिर है।
अब आप बताईए, जो आप के खिलाफ स्कीम्स बना रहा है, प्लानिंग कर रहा है, जो आपको नुक़सान पहुंचाने के दरपै हो, ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाए। ऐसे लोगों के खिलाफ अल्लाह क्या ये कहेगा कि बस अपने सिर झुका लो, मेरे सिज्दे में गिर जाओ, भले ही वो तुम को क़त्ल कर दें। बल्कि हत्तल इमकान हर मुमकिन कोशिश करने की बात कुरान कर रहा है।
कुरान 47:4 देखिएः
So when you meet those who are kafirs in war, smite at their necks [without giving them an opportunity to defeat you]. At length, when you have sufficiently suppressed them [without continuing fighting], bind a firm bond of captivity on them. Then set them free either as a favour, without demanding anything in return, or for ransom [which may consist of a reciprocal exchange of prisoners of war], so that the war may lay down its burdens [and come to an end]. That [is God’s command]. Had God so willed, He would certainly exact retribution from them [Himself], but [He orders you to fight] in order to try you by means of one another. As for those who are killed in God’s cause, He will never render their deeds vain.
जब तुम काफिरो से - जो तुम को पहचानते हुए झुठला रहे हैं, तुम्हारे खिलाफ प्लानिंग कर रहे हैं और तुम से लड़ने को आ गये ऐसे लोगों से - युद्ध में मिलो, तो उनकी गर्दनों पर हमला करो यहां तक कि तुम उन्हें पूरी तरह काबू में ले लो। उनको अच्छे से बन्धनों में जकड़ लो ;कैदी बनाओद्ध और फिर या तो उनपर एहसान करो ;बिना फिरौती लिए उन्हें छोड़ दोद्ध या फिदया ;फिरौती या अर्थ-दंडद्ध का मामला करो, जब तक कि युद्ध अपने हथियार न रख दे ;समाप्त न हो जाएद्ध। बात ये है, और यदि अल्लाह चाहता तो स्वयं उनसे बदला ले लेता, लेकिन वो चाहता है कि तुम में से एक को दूसरे के माध्यम से परखे। और जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गये, वो उनके कर्मों को कभी व्यर्थ नहीं करेगा।
ये आयत काफिरों की गर्दन क़लम करने की बात कर रही है लेकिन क्या कह रही है, आप खुद देखिए। उन्होंने प्लानिंग की, मुसलमान के लिए ये भी उसूल है कि वो कभी युद्ध की शुरूआत नहीं कर सकता, वो हमलावर हुए, अब मुसलमान क्या करे, क्या सिर झुका दे उनके सामने। अब कहा जा रहा है कि उनकी गर्दनों पर हमला करो। तब तक युद्ध करो जब तक कि उनपर काबू न पा लो, और उन्हें कैदी न बना लो। लेकिन अब ये नहीं कहा जा रहा है कि कैदियों की गर्दनें उतार लो, उनका सिर तन से जुदा कर लो। अब कहा जा रहा है कि उन पर एहसान करते हुए उन्हें छोड़ दो। अच्छा तो ये है कि बिना फिरौती लिए ही उन्हें छोड़ दो, लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम कुछ फिरौती लेकर उनको छोड़ दो। जो तुम्हारे क़ब्ज़े में हैं, उन्हें कत्ल करने को कहीं भी नहीं कहा जा रहा। साफ है कि युद्ध करने को भी सैल्फ डिफेंस में कहा गया। युद्ध न तुम को शुरू करना है और न ही उसको खींचना है। काफिर के लिए अल्लाह कह रहा है कि जब तुम उनसे लड़ लो, उनको कैद कर लो, तो फिर उनको छोड़ दो। ताकि युद्ध का खात्मा हो जाएं।
इतिहास पढ़ेंगे तो हम पाएंगे कि पैगम्बर मौहम्मद के समय में जब लोग पकड़े जाते थे, जंगों में, तो वो उनके साथ क्या सुलूक करते थे। ये लोग रसूल से, समय के अवतार से जंग करने आए थे, बहुत से जानते थे कि हक उनके ही साथ है फिर भी युद्ध करने आ रहे थे। उनके साथ फिरौती ऐसे ली जाती थी कि उनसे कहा जाता था कि अगर तुम पढ़े लिखे हो तो हम में से एक को पढ़ना लिखना सिखा दो और तुम आज़ाद हो। अगर कुरान कह रहा है कि उनसे तुम फिरौती यानी रैनसम भी ले सकते हो तो रैनसम वो ऐसे लेते थे।
रसूल ने काफिरों के साथ क्या सुलूक किया, आप ने देखा। हिन्दुस्तान के हिन्दू तो उनसे लड़ने आए नहीं थे। लड़ने कौन आए थे, मक्का के वो लोग जो उनको झुठला रहे थे, उनको अल्लाह का रसूल नहीं मान रहे थे। झुठलाने के बाद भी अगर वो अपनी अपनी जगह पर बैठे रहते तो उनसे लड़ने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन वो हमलावर हो रहे थे। ऐसे में डिफेंसिव लड़ाईयां उनसे हुई। लेकिन जब फतहे मक्का हुई और मुसलमानों ने मक्का पर कब्ज़ा कर लिया तब क्या सुलूक था? आज़ाद करने के जैसे बहाने ढूंढे जा रहे थे। जो कोई अबू सूफियान के घर पनाह ले ले, उसको भी छोड़ने का हुक्म दे दिया गया। जबकि अबू सूफियान काफिरों का सब से बड़ा लीडर था उस वक्त। ऐलान किया गया कि जो हथ्यार डाल दे, या जो यहां से चला जाए, या अबू सूफियान के घर में श्रण ले ले, उसके खिलाफ कुछ नहीं किया जाएगा। हमने ही इन विशेषणों का गलत इंटरप्रेटेशन किया और आज इनके कारण बदनाम हो रहे हैं।
एक कहानी मशहूर है कि रसूल जब गली से गुजरते थी तो एक बूढ़ी औरत उन पर कूड़़ा फेंकती थी। वो काफिर नहीं थी, क्योंकि वो जानती ही नहीं थी, इनको खुदा के रसूल के तौर पर पहचानती ही नहीं थी, तब तो कूड़ा डालती थी। मेरे हिसाब से वो काफिर की डेफिनिशन में नहीं आती।
सोचने की बात ये है कि उस वक्त ऐसी आबादी नहीं थी मक्का में कि एक ही गली थी और रसूल के लिए उसी गली से और उसी घर के नीचे से गुजरना जरूरी था। आप देखिए कि रोज़ वहीं से गुज़रते थे। उसने कूड़ा फेंकना बंद नहीं किया तो इन्होंने रास्ता भी नहीं बदला। रास्ता भी नहीं बदला क्योंकि जानते थे कि वो इनको नहीं पहचानती इस लिए ऐसा कर रही है और जब वो बीमार पड़ी और इन्हें मालूम हुआ कि वो बीमार है तो उसकी अयादत के लिए पहुंच गये।
कफर के लफज़ का मतलब होता है जिस ने कोई चीज़ छिपा दी, या डिनाई कर दिया। डिनाई कब करेगा, जब जान जाएगा सच्चाई को। जिसने जाना ही नहीं वो डिनाई क्योंकर करेगा। ?
कफर का लफज़ कुरान में जहां भी आया है वो इसी मायनी में आया कि कोई किसी चीज़ को छिपा दे या डिनाई कर दे।
Quran.14:32
Allah [is] the One who created the heavens and the earth, and sent down from the sky water, then brought forth from it of the fruits [as] a provision for you, and subjected for you the ships, so that they may sail in the sea by His command, and subjected for you the rivers.
14:33
And He subjected for you the sun and the moon, both constantly pursuing their courses, and subjected for you the night and the day.
14:34
And He gave you of all what you ask of Him. And if you count [the] favour of Allah not you will be able to count them. Indeed, the mankind [is] surely unjust [and] ungrateful.
अल्लाह की दी हुई नेयमतों की बात हो रही है, जो तुम रोज़ाना देखते हो, जो तुम्हारे इर्द गिर्द है, जिनको तुम झुठला नहीं सकते लेकिन अगर फिर भी तुम उनको भुला दो तो कहा जा रहा है कि इंसान कुफफार में से है, झुठलाने वालों में से है। हर उस इंसान के लिए कहा जा रहा है जो अल्लाह की नेयमतों को देखता है और फिर भुला देता है, ये मुसलमान भी हो सकते हैं, हिन्दु भी हो सकते हैं, ईसाई भी हो सकते हैं। जो कोई भी अल्लाह की चारों ओर फैली नेयमतों को देखे और उसके अहसानों को भुला दे, वो कुफफार में से है, ऐसा कहा जा रहा है।
फिर हिन्दू, तमाम हिन्दू, कैसे काफिर हुए? ये तो एडजैक्टिव है, विशेषण है, जिस किसी में भी वो खास विशेषता पाई जाए, वो काफिर है।
एक जगह कुरान में यहूदियों के लिए कफर का लफज़ इस्तेमाल किया गया।
Quran.17.2-8
And We gave Moses the scripture, and made it a guide for the children of Israel: Take none for protector other than Me. The descendents of those We carried with Noah. He was an appreciative servant. And We conveyed to the children of Israel in the scripture: you will commit evil on earth twice, and you will rise to a great height.
ये सब बताने के बाद कि हम ने तुम्हारी तरफ किताब भेजी, हिदायत देने के लिए और हम ने नूह की औलादों को हमने जल प्रलय से बचाया और ये सब बताने के बाद आठवीं आयत में कहा जा रहा है किरू उम्मीद है - इस के बाद - तुम्हारा रब तुम पर रहम फरमाएगा और अगर तुम ने फिर वही - सरकशी का तर्जे़ अमल इखतेयार - किया तो हम भी वहीं - अज़ाब दोबारा - करेंगे, और हमने दोज़ख को काफिरों के लिए क़ैदखाना बना दिया है।
Perhaps your Lord will have mercy on you. But if you revert, We will revert. We have made hell a prison for the Kafirs.
साफ है, यहूदियों में से जो अल्लाह की तरफ से आई मदद और हिदायत के बावजूद मुकर रहे थे, उनके लिए कहा जा रहा है कि दोज़ख यानी नरक को काफिरों के लिए कै़दखाना बना दिया गया है।
एक जगह तो कुरान में खुदा के लिए खुद काफिर का लफज़ इस्तेमाल किया गया है। यानी खुदा के लिए भी काफिर शब्द प्रयोग हो सकता है कि वो काफिर तो है नहीं।
Quran.21.94:
Whoever does any deed of good and righteousness, being a true believer, his endeavour will not be left unrewarded in ingratitude. We are keeping the record of every good deed of his in his favour [without the least being neglected].
जो कोई भी अच्छे कर्म करता है, और सच्चा ईमान रखता है, उसकी कोशिशों को हम देख रहे हैं और छिपाएंगे नहीं, यहां पर अपने लिए कुरान का भेजने वाला कुफर का लफज़ इस्तेमाल कर रहा है।
अल्लाह तुम्हारे किसी भी अच्छे कर्म को छिपाएगा नहीं, यानी कुफर का शब्द इस्तेमाल किया गया है। काफिर नाउन यानी संज्ञा तो नहीं हुआ?
एक जगह गुनाहों को माफ करने या छिपा देने के लिए काफिर का लफज़ इस्तेमाल किय गया। कुरान 29:7 में कहा जा रहा हैः और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, हम उनके गुनाहों को उनसे दूर कर देंगे, यहां पर कफर का लफज आया है, यानी उनके गुनाहों को हम छिपा देंगे, और उनको उनके आमाल का बहुत अच्छा बदला देंगे।
Quran.29.7
And those who belive and do righteous [deeds], surely, We will remove
from them their evil deeds, and We will surely reward them [the] best [of] what
they used [to] do.
इसी तरह चैथे सूरह की 150वीं और 151वीं आयत कफर का लफज इस मायनी में इस्तेमाल करती है कि जो लोग अल्लाह के रसूलों को पहचान कर झुठला दें। आयत कहती हैः बिला शुबह, जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कफर करते है और चाहते हैं कि अल्लाह और उसके रसूलों के दरमियान तफरीक़ करें और कहते है कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते और चाहते है कि इस - ईमान और कुफर - के दरमियान कोई राह निकाल लें।
Quran.4.150-151:
Indeed, those who disbelieve in Allah and His messengers [yakforoon], they wish that they differentiate between Allah and His messengers, and they say, “We believe in some and we disbelieve [kaforo] in others.” And they wish that they take between that a way.
यानी जान रहे हैं कि वो सब अल्लाह के रसूल हैं, और कुछ को झुठला रहे हैं, इसलिए कफर का लफज़ इस्तेमाल हुआ है।
एक जगह कफर का लफज़ किसान के लिए इस्तेमाल हुआ है, जो बीज को मिट्टी में छिपा देता है। वो छिपाना कफर है।
यानी मतलब ये हुआ कि हम डिस्बिलीवर या अनबिलीवर मतलब नहीं ले सकते। जो नहीं मानता, ये मायनी काफिर के नहीं हो सकते। हमने लेकिन यही मायनी समझ रखे हैं। लेकिन अगर ये मायनी भी हैं तो भी काफिर कोई गाली तो नहीं हुई, ये तो विशेषण है उसके लिए जो मौहम्मद को अल्लाह का रसूल नहीं मानता। ठीक वैसे जैसे जो अल्लाह को नहीं मानता, वो नास्तिक कहलाता है। नास्तिक कोई गाली तो नहीं हुई।
लेकिन जैसा मैं ने कहा कि काफिर के मायनी न मानने वाला के नहीं होते। बहुत से लोग मौहम्मद को रसूल नहीं मानते। ईसाई भी नहीं मानते। लेकिन सारे ईसाई तो काफिर नहीं है।
आईडल वर्शिपर, बुत परस्त भी मायनी नहीं लिए जा सकते। बुत परस्ती तो बहुत जगह हो रही है, ईसाई मरयम और ईसा की मूर्तियां भी लगा रहे हैं। लेकिन हम उनको काफिर नहीं मानते।
इसी प्रकार हिन्दुओं में आर्य समाजी हैं जो एक खुदा को मानते हैं, वो बुत परस्ती नहीं करते। यानी सारे हिन्दुओं को भी हम काफिर नहीं कह सकते। मतलब वही निकल रहा है, जो जानते हुए झुठला दे, नकार दे, वो काफिर है।
एक और मायनी देखते हैं। जो इस्लाम के कानून को नहीं माने, क्या वो काफिर हुआ। नहीं, ये मतलब भी नहीं हो सकता। कुरान खुद कह रहा है कि तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन, मेरे लिए मेरा दीन। दीन में कोई जबरदस्ती नहीं है।
सूरह बक़रा, 2 30 से आगे देखते हैंः
Quran.2.30 onwards:
[Recollect O our Apostle Mohammad] When said thy Lord unto the angels: ‘Verily I [intend to] appoint a vicegerent in the earth, they said: ‘Wilt Thou [O our Lord] appoint therein one who will cause mischief and shed blood, while we celebrate by Thy praise and hallow Thee alone?” Said [the Lord to the angels] “Verily, I know what ye know not.”And He taught Adam the names, all of them, and then set them unto the angels and said, “Declare ye unto Me the names of these if ye be truthful.”
They said: “Glory be to Thee [O Lord] we have no knowledge save what Thou hast taught us; Verily, Thou, Thou [alone] art the All-Knowing, the All-Wise.”
Said He, “O Adam! Inform thou unto them their names,” and We had informed unto them their names;
Said [the Lord]: “Said I not unto you that verily, I know the secrets of the heavens and the earth and know that which ye declare and which ye conceal?”
जो तुम छिपाते हो मै उस सब को जानता हूं। यहां पर काफिर का लफज़ आया है।
इसी तरह कुरान कह रहा हैः क्या तुम ये तवक्क़ों रखते हो कि यहूदी तुम पर यकीन कर लेंगे जबकि उनमें एक गिरोह के लोग ऐसे भी थे कि अल्लाह का कलाम तौरैत सुनते थे फिर उसे समझने के बाद खुद बदल देते थे। जो समझने के बाद बदल देते थे, उनके लिए काफिर का लफज़ आया है। दूसरे सूरह की 75वीं आयत। यही हकीकतन काफिर है।
अब देखना ये है कि काफिर का कोई पैरेलल शब्द हिन्दुओं के पास है। उनके यहां भी ये लफज़ मौजूद है। और वहां भी नाउन नहीं है। आताईना का लफज इस्तेमाल हुआ है उसके लिए जो धर्म पर चल रहा था लेकिन फिर उससे अलग हो जाए, उसे छोड़ दे और समय के अवतार के खिलाफ युद्ध पर उतर आए।
और मनुस्मृति आताईना को देखते ही कत्ल कर देने की बात कर रही है।
Manusmriti: Kill the Aatayinah at sight.
यानी जानते बूझते सत्य को छिपा देना अल्लाह की नजर में बड़ा गुनाह है तब तो ऐसा कहा जा रहा है।
और आताईना का लफज़ गीता में प्रयोग हुआ है, कौरवों के लिए, जो कृष्ण के विरू द्ध लड़ने को जमा हुए थे, उनके लिए पूछा जा रहा है कि क्या ये आताईना हैं।
Gita.I.36:
Having killed the sons of Dhritarashtra, what delight can there be for us, O Janardana [Krishna]? Only sin would come to us after killing this aatayinah
इसका लोगों ने marauding rabble, desperate men,
desparadoes, कई मायनों में अनुवाद किया है। और अर्जुन के शब्दों से पता चल रहा है कि उनको भी पता था कि आताईना को कत्ल कर देने का हुक्म है।
हे जर्नादन! धृतराष्ट् के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।
ये वो लोग थे जो उस समय का ईश्वर का जो अवतार था उससे लड़ने आ गये थे। ऐसे लोगों के लिए कुरान और गीता दोनों कह रहे हैं कि ये अंधे, गूंगे, बहरे लोग हैं, ये मरे हुए है और इनतक हिदायत नहीं पहुंच सकती। या फिर काफिर की ये डेफिनिशन होगी कि जो समय के अवतर के सामने लड़ने आ जाए।
आप देख रहे हैं कि हम अपनी ही किताबों को कितने गलत मायनी में समझते हैं। जब हमारी स्टडी आगे बढ़ेगी तो आप देखेंगे कि चाहे गीता और वेद हों, या फिर कुरान हो, ओल्ड टेस्टेमेंट हो या बुद्ध की शिक्षा हो, या और बहुत सारे जो पैगम्बर हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि अल्लाह की ओर से आए मैसेज में भिन्नता पाई जाए, यहां कुछ बताया जाए, वहां कुछ और बताया जाए। या एक ही सोर्स के नुमाईदे कोई ऐसा पैगाम दे रहे हो जो आपस में विरोधाभासी हो। एक ही खुदा है तो एक ही पैगाम था जो हर हर जमाने मे विभिन्न पैगम्बरो और अवतारो द्वारा दिया गया।