नूरानी हस्तियों की पहचान वेद, गीता और उपनिषद से
अब हम इस पुस्तक के अंत की ओर अग्रसर हैं। हक़ और बातिल, सत्य और असत्य की इस लड़ाई में यदि असत्य यानी बातिल शक्तिशाली होता दिखाई दे रहा है तो उसके ज़िम्मेदार हम हैं क्योंकि हमने अपनी आत्मा को उस मार्ग पर लगाया ही नहीं कि नूरानी रूहों को शक्ति प्रदान करते। हम बातें तो हक़ और इंसाफ की करते हैं लेकिन हम में से अनेक की आत्मा तमस अर्थात जुलमत के कैंप में है और इस प्रकार उसको शक्ति प्रदान कर रही है।
जो बात हम को समझना है वह यह कि हिन्दू सनातन पुस्तकों से बहुत दूर आ गए इसलिए वे हक़ और हक़ीक़तोें की समझ से अनभिज्ञ हैं। सनातन पुस्तकों के जानकार समझे जाने वालों ने ऐसे बेतुके और मनघड़ंत अनुवाद किए हैं कि इन पुस्तकों को पढ़ने वालों को कुछ भी समझ नहीं आता। यही कारण है कि हम बार-बार कहते हैं कि हक़ और हक़ीक़तों को जानने के लिए आवश्यक है कि इन पुस्तकों का फिर से अनुवाद किया जाए।
अभी इस समय हमारे पास जो अनुवाद हैं केवल उनसे ही हम आपको कितनी समानताएं दिखा रहे हैं। जिस दिन तमाम सनातन पुस्तकों को और कुरान को फिर से समझने की कोशिश होगी, उस दिन आप पाएंगे कि एकदम एक ही हक़ और हक़ीक़तें दोनों की पुस्तकों में बताई जा रही हैं, केवल भाषा का अंतर है।
एक उदाहरण देखिएः
सुबाला उपनिषद बताता है कि सृष्टि में जो कुछ भी है वह परमात्मा के लिए food यानी रिज़्क़ है।
Subala.V.15:
This (self) is all-knowing. This is the Lord of all This is the ruler of all. This is the indwelling spirit. This is the source of all. This, that is resorted to by all forms of happiness, does not stand in need of happiness of any kind. This, that is adored by all the Vedic texts and scriptures does not stand in need of Vedic texts and scriptures. Whose food is all this but who (himself) does not become the food of any. For that very reason (it is) the most excellent, the supreme director of all. Consisting of food (it is) the self of (all) gross objects; consisting of life (it is) the self of (all) sense organs; consisting of bliss, (it is) the self of dissolution, when there is not Oneness whence (can arise) duality? When there is not mortality, whence (can arise) immortality? (It is) not (endowed) with internal knowledge; nor with external knowledge; nor with both these kinds of knowledge, not a mass of knowledge, not knowledge, nor not-knowledge, not (previously) known or capable of being known. This is the doctrine relating to liberation. This is the doctrine of Veda. This is the doctrine of the Veda.
बृहद अराण्यका उपनिषद कहता है कि जिस प्रकार तमाम पशु इंसानों की सेवा के लिए बने हैं, इंसान देवताओं की सेवा के लिए बना है। जिस प्रकार यदि एक पशु चला जाता है तो हमें खेद होता है उसी प्रकार यदि एक व्यक्ति भी नूर के मार्ग से जुलमत अपनी ओर खींच लेती है तो यह खेद का विषय है। यदि बहुत सारे मनुष्य उस मार्ग से विचलित हो जाएं तो कितना खेद का विषय होगा?
यानी हम नूर के मार्ग पर आकर नूरानी ताक़तों को शक्ति दे सकते हैं और जुलमत के मार्ग पर चल कर शैतानी ताक़तों को शक्ति प्रदान कर सकते हैं। उपनिषद यह भी कह रहे हैं कि नूर और जुलमत के बीच के इस युद्ध में एक एक व्यक्ति का महत्व है।
Brhad-aranyaka.I.IV.10:
So whoever worships another divinity thinking that he is one and another, he knows not. He is like an animal to the Devas. As many animals serve a man so does each man serve the Devas (divine persons). Even if one animal is taken away, it cause displeasure, what should one say of many (animals)? Therefore it is not pleasing to those that men should know this.
एक ओर कुरान कह रहा है कि वे लोग जब उन पर कोई मुसीबत पड़ती है तो कहते हैं कि हम अल्लाह की ओर से हैं और उसकी ओर ही वापिस पलटना है। ये ही हक़ पर सत्य मार्ग पर चलने वाले हैं। जिन्होंने अल्लाह की राह में जान दी उन्हें मुर्दा न समझो बल्कि वे ज़िन्दा हैं पर तुम नहीं समझते।
Quran.2.154-157:
Never say that those martyrd in the cause of Allah are dead – in fact, they are alive! But you do not perceive it.
We will certainly test you with a touch of fear and famine and loss of property, life, and crops. Give good news to those who patiently endure-
Who, when faced with disaster, say, “Surely to Allah we belong and to Him we will all return.”
They are the ones who will receive Allah’s blessings and mercy. And it is they who are rightly guided.
दूसरी ओर ब्रहद अराण्यका उपनिषद कहता है जिसने सत्य पथ पर रहते हुए जान दी उसको मौत के पार की हमेशा की ज़िन्दगी में ले जाया जाता है जहां उसे रिज़्क़ यानी खान-पान भी मिलता है।
Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.11:
That divinity, verily, having struck off the evil, the death, of those divinities, next carried them beyond death.
Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.116:
Thus, verily, that divinity carries beyond death him who knows thus.
Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.17:
Then it chanted food for itself. For whatever food is eaten is eaten by him alone. In it is established.
Brhad-aranyaka Upanishad.I.III.18:
These divinities said, ‘Verily, just this much is whatever food there is and that you have obtained for yourself by chanting. Now let us have a share in this food.’ He said, ‘then sit around, facing me’. ‘So be it’. They sat around him on all sides. Therefore, whatever food one eats by this breath, they are satisfied by it. So do his relations come to him who knows this, he becomes the supporter of his people, their chief, their foremost leader, an eater of food and their lord. Whoever among his people desires to be the equal of him who has this knowledge, he is not able to support his own dependants. But whoever follows him and whoever, following him, desires to support his dependents, he, indeed, will be able to support his dependents.
ब्रहद अराण्यका उपनिषद उस मरने वाले के लिए, जिसको सत्य मार्ग का ज्ञान था और उस पर चलते हुए मौत पाई न केवल हमेशा की ज़िन्दगी की बात कर रहा है बल्कि रब की ओर से रिज़्क़ मिलने की बात कर रहा है तो कुरान भी उन लोगों के लिए जो अल्लाह की राह पर चलते हुए मरे उनके लिए हमेशा की ज़िन्दगी और रब की ओर से रिज़्क़ की बात कर रहा है।
Quran.3.169-170:
Do not think at all of those killed in God’s cause as dead. Rather, they are alive; with their Lord they have their sustenance (food),
Rejoicing in what God has granted them out of His bounty, and joyful in the glad tidings for those left behind who have not yet joined them, that (in the event of martyrdom) they will have no fear, nor will they grieve.
एक ओर अवतार मौहम्मद कह रहे हैं कि पंजेतन या पांच हस्तियां ही स्वर्ग की सरदार हैं तो दूसरी ओर इस पुस्तक में कुछ आगे हम ने छंदोग्या उपनिषद से दिखाया है कि वह किन्हीं पांच हस्तियों की बात कर रहा है जिनके बिना स्वर्ग में दाखि़ला मुमकिन नहीं।
अवतार मौहम्मद कहते हैं कि मेरा नूर इस सृष्टि के बिलकुल प्रारंभ में बना;
I was a Prophet even when Adam was between sand and water.
वह कहते हैं कि अली और मैं एक ही नूर के दो टुकड़े हैंः
Ali and my self are divisions of the same noor (light)
और इन नूरानी हस्तियों की बात करते हुए अवतार मौहम्मद कहते हैं कि यह सब मौहम्मद हैं, यानी सब बिलकुल एक समान हैं।
First is Mohammad, last is Mohammad, middle is Mohammad, all are Mohammad.
तो दूसरी ओर ब्रहद-अराण्यका उपनिषद भी इन दिव्यात्माओं के क्रिएशन की बात करते हुए कह रहा है कि वे बिलकुल एक समान हैं।
Brhad-Aranyaka.I.5.13:
These are all alike, all endless. Verily, he who meditates on them as finite, wins a finite world. But he who meditates on them as infinite wins an infinite world.
मौहम्मद की पुत्री फातिमा का अली से विवाह हुआ तो फिर हसनैन यानी हसन और हुसैन पैदा हुए तो देवता और देवी के मिलन से अश्विन के क्रिएशन की बात हो रही है जो दो देवता हैंः अग्नि देव और वासु देव, जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक में दिखाया है।
मुसलमानों की किताबों में जब एक नूर से कई नूर बने जो उस पहले जैसे थे तो उस को सिलसलतुल ज़हद यानी स्वर्ण सिलसिला या स्वर्ण चेन कहा गया तो दूसरी ओर सुबाला उपनिषद खंड 2 में एक दिव्यात्मा शक्ति के विभाजन से दो नूरानी हस्तियां [Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light)], क्रिएट होने की बात हो रही है और फिर एक टुकड़े या भाग के दिव्यात्मा के दूसरे टूकड़े या भाग से मिलने की बात हो रही है। यह नूरे अली और नूरे फातिमा का मिलन था जिसको उपनिषद ने शिव और शक्ति का मिलन बताया।
Subala Upanishad. Khand 2:
The Atma (or the Self of Purusha i.e. Vishnu) is Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light) into which all the universe is absorbed. He divided Atma (his Self) into two moieties (noor of Mohammad and Ali); out of one moiety, the woman was created (noor of Fatima); and out of the other, man (Ali). Having become a Deva, He created the Devas (remaining Devatas). Having become a Rishi, He created the Rishis; also He created Yakshas, Rakshasas, Gandharvas, wild and domestic beasts and others such as cows, bulls, mares and horses, she-asses and assess and Visvambhara (the Supporter) and Visvambhara (the earth). Becoming Vaisvanara (fire) at the end (of creation), He burnt up all objects. Then (in dissolution), prithvi was absorbed in apas, apas in agni, agni in vayu, vayu in akash, akash in indriyas (organs), indriyas into tanmatras (rudimentary properties), tanmatras into bhutadi, bhutadi into mahat, mahat into avyakta, avyakta into akshara (the indestructible), akshara into tamas (darkness). And tamas becomes one with the supreme Lord. And then there is neither Sat nor asat, nor Sat-asat. This is the teaching of Nirvana and this is the teaching of the Vedas. Yea, This is the teaching of the Vedas.
बहुत सी बातें समझ से बाहर हैं जो तब ही समझ आएंगी जब इन का फिर से अनुवाद होगा; अभी तो केवल वह समझिए जो सामने दिखाई दे रहा है। Having become a Deva, He created the Devas; Having become a Rishi, He created the Rishis कहकर बताया जा रहा है कि इस प्रकार अन्य देवताओं की उत्पत्ति हुई। एक दिव्यात्मा शक्ति अंतः 7 दिव्यात्माओं में बदल गई जो सब के सब उस पहली दिव्यात्मा शक्ति समान थी जिस से बंट कर एक शक्ति 7 में बदल गई, जिनमें एक देवी और अन्य 6 देव थे।
आप ने देखा कि आत्मा या self जो hiranyajyoti है यानी सुनहरा नूर है और जिसमें सारी सृष्टि सिमटी हुई है, उसके दो आत्माओं या spirits में बंटने की बात सुबाला उपनिषद कर रहा है।
The Atma (or the Self of Purusha i.e. Vishnu) is Hiranyajyotis (or golden or effulgent Light) into which all the universe is absorbed. He divided Atma (his Self) into two moieties (noor of Mohammad and Ali)
जब इन दोनों नूरानी शक्तियों ने मानव शरीर में जन्म लिया तो स्वेतास्वतर उपनिषद इन दो को एक ही ेमस.िेंउम जतमम से जुड़ा बता रहा है। मौहम्मद और अली, जिनके शरीर में एक ही दिव्यात्मा शक्ति यानी नूरानी रूह के दो हिस्से काम कर रहे थे, जो इंद्र देव और रूद्र यानी शिव थे, और जिनमें से एक को रसूल होने का फल खाने को दिया गया और दूसरे को नहीं, यदि इन दो की बात नहीं हो रही तो फिर किस की बात हो रही है?
Svetasvatara Upanishad.IV.6-7:
Two birds, companions (who are) always united, cling to the self-same tree. (Of these two) the one eats the sweet fruit, and the other looks on without eating.
On the self-same tree, a person immersed (in the sorrows of the world) is deluded and grieves on account of his helplessness. When he sees the other, the Lord who is worshipped and His greatness, he becomes freed from sorrow.
स्वेतास्वतर उपनिषद का यह छंद हम पहले भी पेश कर चुके हैं। हम इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण दे सकते हैं, जिनसे साबित होगा कि वेद के देवता ही अहललबैत हैं जिनके नवजात बच्चों के समान मानव शरीर में आने की भविष्यवाणी इंसानियत के प्रारंभिक दौर में ही वेदों द्वारा मनुष्य को दी जा रही थी।
किताब ‘बसाएरे दरजातल कुबरा फी फज़ाएले आले मौहम्मद’ जिसको अबू जाफर मौहम्मद बिन हसन बिन फरूख़ सिफार ने लिखा है जिनका देहान्त 290 हिजरी में हुआ, इसकी जिल्द 1 के पेज 22 पर हदीस है कि इन नूरानी हस्तियों की समझ बहुत सख़्त है यानी आसान नहीं है।
जाबिर कहते हैं कि अवतार मौहम्मद ने फरमाया कि आले मौहम्मद की हदीस अति मुश्किल है यानी आम व्यक्ति की समझ में आने वाली नहीं है।
बिहारूल अनवार जिल्द 72 पेज 83 कहती है कि एक स्थान पर अहललबैत कहते हैं कि हमारा अम्र छिपा हुआ है यानी हमारे राज़ समझना आसान नहीं है। इसको नहीं बरदाश्त कर सकता मगर वह फरिश्ता जो अल्लाह के क़रीब हो, या वह नबी जो कि रसूल हो या वह बंदा जिसके दिल की अल्लाह ने परीक्षा ले ली हो।
एक और स्थान पर अहललबैत ने कहा कि तुम हमारे बारे में जो बड़ाई सोच सकते हो, सोच लो, तुम हम को उससे बड़ा पाओगे, बस एक शर्त है कि हमें अल्लाह की बंदगी से बाहर न करना।
दूसरी ओर गीता भी इन देवताओं की बड़ाई तो बेइंतेहा बता रही है लेकिन परमात्मा के बाद इन देवताओं का स्थान बता रही है।
Gita.XI.38:
You are the first of the Devas and the Ancient Spirit; You are the Supreme Basis of the Universe; You are both the Knower and the Knowable; You are the (transcendent) Beyond and the (immanent) Receptacle (here); the universe is pervaded by You, O One (capable) of Limitless Form.
Gita.III.11:
With this do you gratify the devas and they the devas gratify you; thus gratifying reciprocally you shall reach to supreme merit.
Gita.III.12:
Those devas shall bestow on you all gratifications you desire: one who eats what is given to them without giving in turn to them, he is a thief indeed.
एक ओर गीता देवताओं के लिए कहती है कि यदि तुम अपने रिज़्क़ यानी खाने में से इन्हें दिए बिना खाओ तो तुम चोर हो तो दूसरी ओर हम किताबों में दर्ज पाते हैं कि एक अहललबैत कुछ लम्हे ख़्यालों में चले गए। उनसे किसी ने पूछा कि मौला, आप चंद लम्हे के लिए कहां चले गए थे, तो उन्होंने उत्तर दिया कि मैं तमाम सृष्टि को रिज़्क़ बांटने गया था, यानी साफ इशारा दे रहे थे कि हम ही हर किसी को रिज़्क़ देने के ज़िम्मेदार हैं।
गीता और उपनिषद से इन दिव्यात्माओं की जानकारी मिलने से पहले तक जो बातें हम बता रहे हैं ये मुस्लिम किताबों में दर्ज तो थीं लेकिन मुसलमान आम तौर पर यही समझते थे कि यह सब बातें अहललबैत के चाहने वालों ने बढ़ा चढ़ा कर उनके बारे में गढ़ ली हैं।
ये हस्तियां कभी इशारा करती दिखाई देती हैं तो क़ालीन पर बना शेर जीवित हो उठता है और जादूगरों को मार डालता है और कभी इन्हें भूखे शेरों के बीच डाल दिया जाए तो शेर इनके पैरों के पास ऐसे बैठे दिखाई देते हैं जैसे इनके इशारे पर चल रहे हों। ये दुआ करते हैं तो वर्षा होने लगती है, ये आंखों से दूर या आने वाले समय का हाल बताते दिखाई देते हैं और इनके दर से जुड़े लोग साईंस आदि में ऐसी तरक्क़ी करते नज़र आते हैं कि सारी दुनिया उनके ज्ञान का लोहा मान लेती है।
ऐसे अनेक इशारे अहललबैत ने विभिन्न अवसरों पर दिए जिनसे हमें वेद और उपनिषद के कथन पूरे होते दिखाई देते हैं। अपने को पहचनवाने से अधिक ये हर समय सृष्टि के एक रचियता को पहचनवाने में लगे रहे।
Brhad-aranyaka Upanishad.III.8.10:
Whoever, O Gargi, in this world, without knowing this Imperishable performs sacrifices, worships, performs austerities for a thousand years, his work will have no end; whosoever O Gargi, without knowledge of this Imperishable departs from this world, is pitiable. But, O Gargi, he who knowing the Imperishable departs from this world is a Brahmana.’
ऐसा इसलिए क्योंकि यही मक़सद है निराकार एबसोलूट द्वारा अपने साकार स्वरूप और इन दिव्यात्माओं के क्रिएशन का।
Brhad-aranyaka Upanishad.I.II.1:
There was nothing whatsoever, here in the beginning. By death indeed was this covered, or by hunger for hunger is death. He created the mind, thinking ‘let me have a self’. Then he (self) moved about, worshipping.
इस्लामी हदीसों के अनुसार नूरे मौहम्मदी जिसका क्रिएशन सृष्टि के बिलकुल प्रारंभ में हुआ जब कुछ भी नहीं था, उसने क्रिएट होते ही अपने रब की पूजा और इबादत प्रारंभ कर दी। दूसरा कोई भी क्रिएशन नहीं था और केवल यह पहला क्रिएशन हज़ारों वर्षों तक रब की पूजा और इबादत करता रहा जिसके बाद अन्य क्रिएशन वुजूद में आई। दूसरी ओर ऋग वेद कह रहा है कि ये हस्तियां इस सृष्टि के dawn के समय क्रिएट हुईं यानी सृष्टि की रचना के एकदम प्रारंभ में।
Rig Veda.I.VI.3:
Thou who createst light where there was no light and form. O men! Where there was no form, hast been born together with the dawns.
किताब ‘बसाएरे दरजातल कुबरा फी फज़ाएले आले मौहम्मद’ लिखती है कि अहललबैत की वे हदीसें जो तुम तक पहुंची हों, यानी उनके बारे में जो कुछ तुम तक पहुंचा है और तुम्हारा दिल उनकी ओर झुका हो, यानी उस हदीस को तुम ने पहचान लिया हो तो उसको मान लो और कोई हदीस सुनो और तुम्हारा दिल न माने और तुम्हारा दिल उसका इंकार कर दे तो उसे अल्लाह और उसके रसूल की ओर वापिस कर दो, हलाक होने वाला वह है जो ऐसी हदीस सुने और इंकार कर दे।
अबूज़र के लिए अवतार मौहम्मद ने कहा कि वह ईमान के 9वें दर्जे यानी लेवल पर थे तो सलमान के लिए कहा कि वह ईमान के 10वें दर्जे यानी लेवल पर थे। हदीस है कि यदि अबूज़र को पता चल जाए कि सलमान के दिल में क्या है तो वह उसे क़त्ल कर दें, क्योंकि अबूज़र वह सब कुछ बरदाश्त ही नहीं कर पाएंगे जो कुछ सलमान के दिल में है, हालांकि अवतार मौहम्मद ने दोनों को भाई बनाया था।
अबू हमज़ा सुमाली ने अहललबैत से प्रश्न किया कि ज़मीन का कौन सा टुकड़ा है जो सब से अफज़ल है। अहललबैत ने फरमायाः ज़मीन का टुकड़ा जो रूक्न और मक़ाम के दरमियान - यानी मक्का में काबा का एक हिस्सा - वह पूरी ज़मीन में सब से अफज़ल है। ;ऐ सुमालीद्ध, यदि कोई व्यक्ति नूह की उस ज़िन्दगी के बराबर ज़िन्दगी बसर करे जो आप ने अपनी क़ौम के दरमियान तबलीग़ में गुज़ारी - जो कि 950 वर्ष थी - वह व्यक्ति उस ज़िन्दगी में सारे दिन रोज़े रखे और सारी रातें खुदा की इबादत में गुज़ारे, उसकी रातें और दिन उस ;काबा मेंद्ध उस अफज़ल मक़ाम पर गुज़रें, फिर भी वह हमारी विलायत ;पहचानद्ध के बिना मर जाए तो उसकी इबादत उसको कोई लाभ नहीं पहुंचाएगी।
हदीसों में यह भी दर्ज है कि दो व्यक्तियों ने अहललबैत अली से कहा कि अपनी हक़ीक़त ब्यान करें। अली ने बताने से मना किया कि तुम बरदाश्त नहीं कर पाओगे। वे दोनों इस पर इसरार करते रहे। अली ने उन्हें बताना प्रारंभ किया तो वे दोनों ही बरदाश्त न कर पाए और दिमाग़ी संतुलन खो बैठे।
आप ने देखा कि कैसे वेद, उपनिषद, गीता भी उन दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों को पहचनवा रही हैं जिन्हें मुस्लिम किताबें भी पहचनवाती दिख रही हैं। लेकिन जुलमत ने कभी भी नहीं चाहा कि इंसान इन हस्तियों की असली पहचान बना पाए।
नूर के मार्ग पर बढ़ रहे लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए जुलमत अपने जाल बिनती है, रास्ते हमवार करती है, और डोरे डाल कर उसे अपनी ओर खींचने की हर मुमकिन कोशिश करती है। यदि तुम्हारी रूह को उसने नीचे खींच लिया तो अब तुम को नूरानी ताक़तों द्वारा प्रदान की जा रही हिदायत की रौशनी नहीं मिल सकती।
बुद्ध के अनुसार भी सत्य मार्ग की समझ जुलमत से निकल कर नूर के रास्ते से ज्ञान अर्जित करने और उस रास्ते पर चलने से ही मिलेगी। यही समझाने की कोशिश करते हुए उन्होंने कहाः
There are ways from light [Noor] into darkness [Zulmat] and from darkness [Zulmat] into light [Light]. There are ways, also, from gloom into deeper darkness [Zulmat], and from the dawn into brighter light [Noor]. The wise man will use the light [Noor] as he has to receive more light [Noor]. He will constantly advance to the knowledge of the truth.
यही कारण है कि अवतार मौहम्मद ने कहा कि अंतिम ज़माने में जब हालात बद से बदतर हो जाएं, और तुम्हारे बस में उनको बदलना मुमकिन न हो तो अपने को अल्लाह की इबादत में लगा देना। हालात सुधारने के लिए तुम कुछ न भी कर पाओ, कम से कम यह इबादत तुम्हें जुलमत की ओर खिंच जाने से रोके रखेगी। नूरानी ताक़तों को इतना शक्ति प्रदान करती रहेगी कि वे जुलमत द्वारा बिछाई गई बिसात को उलट सकें।
आईए पुस्तिका की ओर वापिस पलटते हैं और देखते हैं कि इसका लेखक आगे क्या कुछ लिखता हैः
‘अरब के रेगिस्तान में कबीलों की आपसी लड़ाई में मौहम्मद नामक मानसिक बीमार व्यक्ति ने एक शक्ति को अल्लाह का नाम देते हुए इस्लाम धर्म स्थापित किया और मौहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम के क्रूर ख़लीफाओं ने तलवार की नोक पर लोगों का गला काट कर जबरन पूरी दुनिया में इस्लाम को फैलाया जो आज दुनिया में एक बड़ा धर्म बन चुका है और दुनिया के लिए ही एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है।’
पुस्तिका का लेखक झूठ और मनघड़ंत बातों को जितना ज़ोर शोर से बोले, कहीं न कहीं हक़ीक़तें सामने आ ही जाती हैं। इस पैराग्राफ में लेखक ने मौहम्मद को मानसिक बीमार तो कहा पर यहां भी यह मानने से न बच सका कि एक ही शक्ति है जिसे मौहम्मद ने अल्लाह कहा। उस शक्ति से इंकार कर देता तो हिन्दु, यहूदी, ईसाई सब उसके सामने खड़े हो जाते क्योंकि सब ही एक शक्ति को मानते हैं।
लेखक को आपत्ती है तो इस बात पर कि अवतार मौहम्मद ने उस शक्ति को अल्लाह कहा। अब कोई लेखक को समझाए कि यदि कोई उस शक्ति को God या ब्रहमण या महेश कह रहा है, तो पूजा और अर्चना तो उसी शक्ति की कर रहा है न? फिर कोई उस शक्ति को अल्लाह कह रहा है तो क्यों आपत्ती है? अवतार मौहम्मद ने तो नहीं कहा कि उनके द्वारा जिस अल्लाह की इबादत करने की बात हो रही है वो़ उस एबसोलूट या सर्वशक्तिमान से भिन्न है जिसकी बात सनातन पुस्तकों में हुई है। हां यह अवश्य कहा कि उस क़ादिरे मुतलक़ सर्वशक्तिमान एबसोलूट के बराबर औरों को खड़ा न करो। यही तो एकेश्वरवाद है जिसकी शिक्षा पहले आए तमाम अवतार, यहां तक कि मूसा और ईसा भी, और कृष्ण भी हम को देते नज़र आ रहे हैं।
पुस्तिका का लेखक शायद मन में कहीं न कहीं जान रहा होगा कि अवतार मौहम्मद के दौर में तो केवल इस्लाम का रहमदिल, करम करने वाला और माफ करने वाला चेहरा ही सामने आया था इसलिए कहने पर मजबूर हो गया कि ‘मौहम्मद की मृत्यु के बाद इस्लाम के क्रूर ख़लीफाओं ने तलवार की नोक पर लोगों का गला काट कर जबरन पूरी दुनिया में इस्लाम को फैलाया जो आज दुनिया में एक बड़ा धर्म बन चुका है।’
अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के बाद इस्लाम का चेहरा बिगड़ा तो सही, इसमें दो राय नहीं है, परन्तु उसके बावजूद मंगोलों और युरोपियंस ने दुनिया पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए मौत का जो खेल खेला, मुसलमान उसके पास भी खड़े नज़र नहीं आते। यह कहना ज़्यादा दुरूस्त होगा कि इस्लाम और अवतार मौहम्मद का मार्ग छोड़ने के बाद मुसलमान भी उतने ही दुनियापरस्त और गुनाहों में लिप्त नज़र आते हैं जितना कि दूसरे।
केवल एक खुदा के आगे अपने को सुपुर्द करने ने उन्हें जो शक्ति दी थी और उनके दिलों में रहमदिली और इंसाफ का जो बीज बोया था, वह आहिस्ता आहिस्ता हल्का पड़ता गया, यहां तक कि उनमें और दूसरों में कोई अन्तर नहीं रहा।
ताक़त, दौलत, नाम, रूतबा, औरत, ज़िन्दगी और उसके मज़े - इसकी ख़्वाहिश उनके दिलों को भी सताने लगी। ईष्र्या, लालच, हसद, नफरत, गुस्सा, इंतेक़ाम, आदि बीमारियों ने उनकी रूह को भी जकड़ लिया। इन्हीं में से किसी को हथ्यार बना कर तमस यानी जुलमत अपने डोरे डालती है जिनकी ओर इंसान खिंचा चला जाता है।
जैसा मैं लिख चुका हूँ, इस्लाम ने एकेश्वरवाद को जितना ज़ोर शोर से पेश किया उसके बाद पुस्तिका का लेखक यह तो कह ही नहीं सकता था कि अवतार मौहम्मद एक से अधिक सृष्टि के रचियता की बात कर रहे थे। उस समय जब इंसान ने कई खुदा बना लिए थे, हर दिन का खुदा अलग था, उस समय अवतार मौहम्मद ने एक बार फिर से एक खुदा के कानसैप्ट पर इतना शिद्दत से ज़ोर दिया कि तमाम विश्व में भिन्न भिन्न समय में पेश किए गए एकेश्वरवाद के कानसैप्ट को इस्लामी शिक्षा से जोड़ कर देखा जाने लगा।
अवतार मौहम्मद पहले की डिवाईन किताबों के माध्यम से आए तमाम ईश्वीय ज्ञान की पुष्टी करते हैं। लेकिन याद रखने की बात यह है कि वह उस समय आए थे जब कलियुग फैल चुका था और दुनिया अंधेरे में डूब चुकी थी। इंसानी जिस्मों में क़ैद आत्माओं को जुलमत यानी तमस ने अपने वश में कर लिया था। एक खुदा की परस्तिश भुला दिए जाने की कगार पर थी। जुलमत यानी तमस प्रसन्न थी कि वह कामयाब हो गई। धरती उस ओर बढ़ रही थी कि एक खुदा की परस्तिश करने वाले न रहें। हर ओर जुल्म, बरबरियत और अफरातफरी थी। ऐसे में उन भटकी हुई आत्माओं को नूर ने रास्ता दिखाया। दुनिया में एक बार फिर एक खुदा की इबादत करने वाले तेज़ी से बढ़े। इन्होंने दूसरे धर्मों के मानने वालों को भी अपना आत्ममंथन करने पर विवश किया। दूसरे देश भी इस्लामी कानूनों की तर्ज़ पर ह्यूमन राईट्स आदि पर कानून बनाने लगे, औरतों के हितों की बात करने लगे, इंसानियत की बात करने लगे।
अवतार मौहम्मद के गुज़रने के बाद मुसलमानों को अधिक समय नहीं लगा उनकी शिक्षा से दूरी बनाने में। उन्होंने अक़ल और logic के मार्ग को छोड़ अपनी अपनी दीवारें खड़ी कर लीं, कोई वहाबी बन गया, कोई बरेलवी, कोई शिया तो कोई सुन्नी। अवतार मौहम्मद ने ऐसी कोई भी दीवार नहीं बनाई थी, केवल हक़ का मार्ग था और उसको समझना था। उस मार्ग से गुमराह करने वाला हर मार्ग शैतान का मार्ग था।
आज जो कोई भी अपने को सुन्नी या शिया या अहलेहदीस या बरेलवी आदी कह रहा है, दरअस्ल वह बिदअत कर रहा है क्योंकि अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी तक कोई भी इस शब्दावली से वाक़िफ नहीं था।
शैतानी ताक़तें वहीं तो काम करती हैं जहां लोग या तो हक़ और सत्य के मार्ग पर हों, उसकी समझ उन में पैदा हो रही हो या वे उस मार्ग की ओर अग्रसर हों। यह इसलिए कि जुलमत नहीं चाहती कि लोग नूर की हक़ीक़त को पहचानें, रूहानियत के मार्ग को समझें और उसको अपनाएं। इसलिए उसने ऐसी भूल भुलईया बना डाली कि सत्य को समझने की कोशिश करने वाले भी बस चक्कर काटते रहें और दिव्यात्माओं और उनके मार्ग को न पहचान सकें।
कभी उसने सत्य मार्ग की ओर खींचने वालों या पथ को प्रदर्शित करने वालों की छवि ऐसी बनाने की कोशिश की कि लोग भ्रमित हो जाएं और हक़ीक़तें छिपी की छिपी रहें। कभी उसने सब से बड़े ज्ञानी और गुरू समझे जाने वालों को समय के अवतार कृष्ण के सामने ऐसे ला खड़ा किया कि समझना मुश्किल हो गया कि सत्य इस ओर है या उस ओर।
हम पहले भी प्रश्न करते रहे हैं और फिर कर रहे हैं! यदि मयंमार के बौध रोहिंगया मुसलमानों पर जुल्म की हदें पार कर देते हैं या श्रीलंका के बौध तमिल शहरियों पर अत्याचार करते हैं, और आप इस सब को बुद्ध की शिक्षा से नहीं जोड़ते, यदि युरोपियन ईसाई माया सभ्यता का संहार करते हैं और उनकी ज़मीनों पर अपना क़ब्ज़ा बना लेते हैं, यदि ऐसे ही ईसाई आस्ट्रेलिया में लाखों एबोरिजींस का सफाया कर देते हैं, यदि ईसाई अम्रीका बौध जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी को मिटा देता है और ईसाई जर्मनी युरोप और एशिया के लाखों यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानोें की मौत का कारण बनता है और आप इस सब को ईसा की शिक्षा से नहीं जोड़ते तो फिर यदि उस्मानी खलीफा आसपास के देशों में मारकाट का बाज़ार गर्म करते हैं या आईसिस, दाएश और अल-क़ाएदा जैसी संगठनें यदि कुछ ईसाईयों का क़त्ल करती नज़र आती हैं तो उससे अधिक मुसलमानों का नरसंहार करती दिखाई देती हैं, आप उनके कुकर्मों को इस्लाम और अवतार मौहम्मद से जोड़ने में देर नहीं लगाते। ऐसा इसलिए कि आप ने न तो अवतार मौहम्मद की जीवनी पढ़ी और न ही अपने आप को सात्विक मार्ग पर लगाया कि इन बातों की समझ पैदा होती।
अब समय है एक बार पुनः प्रश्न करने का! क्या कारण है अवतार मौहम्मद और इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगेंडा को फैलाने के पीछे? इसका यह कारण नहीं है कि मुसलमान ताक़तवर हो रहे हैं और अपने हक़ की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। वे तो बेचारे और अधिक बदहाली में गिरते जा रहे हैं। यह भी कारण नहीं है कि कुछ मुसलमानों ने आतंकवाद को पकड़ा है और कुछ उनके हिमायती हैं। यदि अधिकांश लोग जो आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं वे मुसलमान हैं और यह आतंकवादी अधिकतर मुसलमानों को ही मार रहे हैं तो फिर मानना पड़ेगा कि कारण कुछ और है।
इसके पीछे मुख्य कारण छिपा है उन अनगिनत वीडियो और लेखों में जो यूटयूब और गूगल आदि पर मिल जाते हैं और जो End Times की भविष्यवाणी करते हैं। बाईबल और ईसाईयों और यहूदियों की अनेक पुस्तकें और साथ में अवतार मौहम्मद की भविष्यवाणियां End Times के हालात का विवरण विस्तार से देती दिखाई पड़ती हैं। एक बड़े युद्ध की भविष्यवाणी हर किताब ने की है जिसको ईसाईयोें ने Armageddon नाम दिया है तो मुसलमान उसे मलहमतुल कुबरा कहते हैं।
लेकिन बड़ी विरोधाभासी बात यह है कि हिन्दुओं का मानना है कि कलकी अवतार के आने पर हर ओर धर्म फैल जाएगा। इससे वे यह समझ बनाए हैं कि तमाम ओर हिन्दु धर्म के मानने वाले होंगे। यहूदी शिद्दत से Mashiach के आने की प्रतीक्षा में हैं और यह मानते है कि आसपास के मुस्लिम देश सबसे बड़ी बाधा हैं ग्रेटर इस्रायल के क़याम में, जिसके बाद ही Mashiach की आमद होगी। ईसाईयों का विचार है कि मसियाह की Second Coming के पश्चात हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा पर यह तब ही होगा जब मुसलमानों के विरूद्ध एक भीषण युद्ध होगा। मुसलमान यह मानते है कि हर ओर इस्लाम फैल जाएगा जब मेहदी आएंगे पर यह तभी होगा जब उनका यहूदियों के खिलाफ युद्ध होगा।
बहुतेरे मुसलमान जो आज लड़ रहे हैं वे समझते हैं कि वे आने वाले भविष्य में मेहदी की फौज का हिस्सा होंगे। मैंने अपने लेखों में दिखाया है कि माया सभ्यता के Red Indians भी किसी Quetzalcoatl की प्रतीक्षा में थे और जब केवल क़रीब 500 स्पेनी अम्रीका के तट पर उतरे, तो इन Red Indians ने समझा कि ये भिन्न वेश भूषा वाले लोग वहीं हैं जिनकी उन्हें प्रतीक्षा थी और बहुतेरों ने अपने हथ्यार डाल दिए। फलस्वरूप मात्र थोड़े से युरोपियंस ने तमाम एज़टेक एम्पायर को धराशाई कर दिया।
एक धर्म द्वारा दूसरे को अधीन कर लेने की यही सोच सारी समस्याओं की जड़ है। यही कारण है कि हर धर्म दूसरे धर्म के खिलाफ प्रोपेगेंडा में लगा है।
ज़रा सोचिए, क्या तमाम भविष्यवाणियां सच्ची साबित हो सकती हैं? उदाहरण के तौर पर यदि ईसाई अपनी किताबों में दिए गए ज्ञान के बल पर मानते हैं कि हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा, तो यह तो मुसलमानों को बताई गई भविष्यवाणियों से एकदम विपरीत बात है जिन के अनुसार मेहदी के आने पर हर ओर इस्लाम का बोलबाला होगा। अब ईसाई क्यों न मानें कि मौहम्मद एक false prophet थे।
इसी प्रकार यदि यहूदी और ईसाई किताबों में अनेक भविष्यवाणियां हैं कि उनका धर्म सब ओर फैल जाएगा, तो मुसलमान यह मानने पर विवश हैं कि उन्होंने झूठ गढ़ लिया है क्योकि मुसलमान मानते है कि सत्य तो उनके पास है और हर ओर इस्लाम को फैलना है।
हिन्दु भी मानते हैं कि कलकी अवतार के आने पर हर ओर धर्म फैल जाएगा पर वे इसकी अधिक बात करते नहीं दिखाई देते इसलिए कि उन्होंने यह ग़लत मान्यता बना रखी है कि कलकि अवतार के आने में अभी लाखों वर्षों का समय है। उन्हें डर है तो मुसलमानों की भविष्यवाणियों से जिनके अनुसार हर ओर इस्लाम फैल जाएगा। आईसिस, दाएश और अल-क़ाएदा जैसी संगठनें उनकी सोच को बल देती नज़र आती हैं और इस कारण उनमें से भी कुछ ने मुसलमानों के विरूद्ध मोर्चा खोल दिया है।
हमारा मानना है कि दुनिया इस समभ्रम में इसलिए गिरफतार है क्योंकि वह पहचान ही नहीं पाई कि असली दुश्मन कौन है। कौन है जो हम में से सब को पथभ्रष्ट किए हुए है? हिन्दु हो या मुसलमान, यहूदी हो या ईसाई, हर कोई दुनिया के रंगों में रंगा है और दूसरों की बुराईयां और कमियां ढूंढ रहा है। अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखता। हर कोई भूल गया है कि इंसान को क्रिएट करने के पीछे क्या अपेक्षा थी। पहले भी बता चुका हूँ और एक बार फिर बताए देता हूँ। शायद शब्द भिन्न हो जाएंः
एक निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी ब्रहमण ने जिसे मुसलमान क़ादिरे मुतलक़ खुदा यानी अल्लाह कहते हैं एक साकार शक्ति क्रिएट की। उपनिषद के अनुसार इस साकार ताक़त ने क्रिएट होते ही निराकार की पूजा अर्चना प्रारंभ शुरू कर दी।
मुसलमान अपनी किताबों में मौजूद हदीसों की बुनियाद पर इस पहली क्रिएशन को नूरे मौहम्मदी कहते हैं। सनातन किताबों में क्रिएशन के हर स्टेज को अलग नाम से याद किया गया है जबकि इस्लामिक ग्रन्थों में इसकी अधिक व्याख्या नहीं मिलती और इस पहली क्रिएट हुई शक्ति को ही नूरे मौहम्मदी कहते हैं। ज़्यादा व्याख्या शायद इसलिए भी नहीं मिलती क्योंकि सब कुछ तो पहले के ग्रन्थों में बता दिया गया था, कलियुग के अंत में तो अब केवल एक खुदा के आगे समर्पण और उसकी याद में ज़िन्दगी गुज़ारने का तरीक़ा बताना था, वह भी उस इंसान को जो गुमराह था और अपनी आत्मा को स्वयं अपनी कोशिश से सीधे मार्ग पर लगाने में असमर्थ था।
उपनिषदों के अनुसार निराकार एबसोलूट की पूजा अर्चना करने के बाद साकार शक्ति ने एक नूरानी रूह या दिव्यात्मा शक्ति क्रिएट की जो एक थी पर ऐसे विभाजित हुई कि अब 7 दिव्यात्मा शक्तियां थीं जो सब बिलकुल एक समान थीं और जिन में एक देवी थी। एक समान शक्यिां होने की बात अवतार मौहम्मद भी बताते हैं जब वह अहललबैत के लिए कहते हैं कि हम में से पहला भी मौहम्मद है, अंतिम भी मौहम्म्द है, बीच वाला भी मौहम्मद है, सब के सब मौहम्मद हैं। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि जैसा उपनिषदों ने बताया था कि पहली शक्ति जिससे विभाजन हुआ था, और जिसको मुसलमान नूरे मौहम्मदी कहते हैं, उसके विभाजन से बनी 7 दिव्यात्माएं उस पहली के बिलकुल समान थीं जिससे विभाजन हुआ।
इस दिव्यात्मा शक्ति के साथ ही एक अन्य विपरीत शक्ति क्रिएट हुई जिसको जुलमत या तमस कहते हैं जिसने डेमोनिक शक्तियों को जन्म दिया। नूर और जुलमत का क्रिएशन हो चुका था और अल्लाह ने ही किया था जिसकी गवाही कुरान ने भी दी। अब इंसान को क्रिएट किया जाना था। पहला इंसान क्रिएट किया गया जिस ने इन नूरानी हस्तियों को पहचाना तब कुरान के अनुसार आदम को ज़मीन पर अल्लाह के ख़लीफा का ओहदा मिला। लेकिन अभी आदम को एक और ट्रेनिंग से गुज़रना था।
आदम ने उन नूरानी हस्तियों को तो पहचान लिया था जो इंसान को हिदायत देने की जिम्मेदार हैं और जिनको क्रिएट करने का अस्ली मक़सद है कि इबादत करने वाले अधिक हों। लेकिन अभी उन्हें समझना था कि जुलमत भी उनके कितने क़रीब है और उन्हें कैसे गुमराह कर सकती है। जिस दिन आदम की यह टेªनिंग पूरी हो गई, उस दिन उन्हें ज़मीन पर भेज दिया गया क्योंकि इसी ज़मीन के लिए तो उन्हें पैदा किया गया था। शैतान को स्वर्ग से निकाला गया तो उसे भी इसी ज़मीन पर भेजा गया और 7 नूरानी रूहें भी आदम के साथ इसी ज़मीन पर आ गईं, जैसा कि हमें ईसा ने बताया। यह पृथ्वी ही कर्म भूमि है; इस पृथ्वी पर आई आत्मा को यहां से निकलने के लिए हिदायत करने वाली नूरानी रूहों को पहचानना होगा और उनके मार्ग पर आगे बढ़ना होगा। जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक शक्तियां कभी भी नहीं चाहेंगी कि ऐसा हो। उनका काम है इंसान के नूर के मार्ग पर आगे बढ़ते क़दमों को वापिस खींच लेना या उसे गुमराह कर देना।
हिन्दु, मुस्लिम, यहूदी, ईसाई - सब अपने अपने ढंग से गुमराही में फंसे हैं। रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश सब ने छोड़ दी है। एक दूसरे को ज़लील करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अपनी आत्मा की चिंता नहीं। दूसरों की चिंता छोड़ दो! उन नूरानी शक्तियों को पहचानते हुए जो हर ज़माने में सत्यमार्ग की ओर तुम्हें खींच लाने की कोशिश में लगी हैं, अपनी आत्मा को उस पथ पर लगाओ और पुल के पार हो जाओ। वह पुल जो स्वर्ग में हमेशा की ज़िन्दगी देने का मार्ग है और जिसका उल्लेख करते हुए मुस्लिम हदीसों एवं उपनिषदों ने उसे पुले सिरात या determining bridge कहा। जब तक अपने असली दुश्मन को नहीं पहचानोगे, तब तक तुम को राह मिलने से रही!
जब जब भी इन नूरानी रूहों में से किसी ने ज़मीन पर किसी पाक इंसान के शरीर को चुना कि उसके माध्यम से मानव कल्याण के मार्ग को प्रदर्शित किया जा सके, जुलमत यानी तमस ने अपनी तमाम शक्तियां लगा दीं, उस मार्ग से इंसान को भ्रमित करने के लिए। आज हिन्दु अपने को कृष्ण का मानने वाला भले ही बता रहे हों पर सत्य यही है कि कृष्ण के खिलाफ युद्ध करने जमा होने वाले हिन्दुओं की संख्या उससे अधिक थी जो उनके साथ थे। इसी जुलमत की ताक़त ने और उसके कारिंदों ने मूसा के मानने वालों को बार बार बहकाया, यहां तक कि जब 7 नूरानी रूहों में से एक ने ईसा के शरीर में अवतरण लिया तो मूसा के मानने वालों ने ईसा को अपनाने से इंकार कर दिया ठीक वैसे जैसे कृष्ण के मानने वालों को महावीर को मानने में और महावीर के मानने वालों को बुद्ध को मानने में कठिनाई हुई। मूसा और ईसा के मानने वालों ने मौहम्मद को नहीं पहचाना और मौहम्मद के बाद अपने को मुसलमान कहने वालों ने उन अहललबैत को जिनकी पाकीज़गी की गारंटी कुरान ले रहा था इतना सताया कि उन्हें क़ैद में बंद किया, उन्हें ज़लील करने की कोशिश की और अंतः उन्हें शहीद कर दिया।
जब तक ईसाई रोमन शहंशाहों के जुल्म से बाहर आए, God, Holy Spirit and Jesus के बीच अस्ली रिश्ते की समझ गड़बड़ा चुकी थी। जब तक इस्लाम उमवी और अब्बासी हुकमरानों की पकड़ से बाहर निकला, अहललबैत की असली समझ मुसलमान खो चुके थे। सनातन धर्मी ऐसे दौर से गुज़रे कि अशोक जैसे शहंशाह ने कथित तौर पर तीन बार भारत को बुद्ध के नाम पर विजय किया; ज़ाहिर है जब बुद्ध के नाम पर विजय प्राप्त हो रही हो तो ब्रहमिणों को अपनी किताबें छिपाना पड़ गईं। ऐसे में सनातन धर्म की किताबों की असली समझ लुप्त हो गई। बुद्ध के मानने वाले भी अपने को प्रताड़ना से नहीं बचा पाए। भारत में ऐसे हालात भी पैदा हुए कि बुद्ध मत के मानने वालों को पहाड़ों पार ही श्रण मिली या फिर वह जंगलों में पहाड़ी गुफाओं में छिप कर बुद्ध की शिक्षा को बचाए रखने के लिए दीवारों पर चित्र बना रहे थे जो आज भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। जुलमत यानी तमस द्वारा कराए गए हर ऐसे हमले में एक खुदा, परमात्मा और इन नूरानी हस्तियों की पहचान और रोल की समझ धूमिल पड़ती गई। जैसा मैंने बार बार कहा, हमारी आत्मा मोक्ष यानी निजात तब ही प्राप्त कर सकती है जब हम इन दिव्यात्माओं को पहचान लें और उनके बताए मार्ग पर आगे बढ़ें।
तुम कृष्ण के मार्ग को सही सही समझते हुए आगे बढ़ोगे तो भी वहीं पहुंचोंगे जहां ईसा के मार्ग को समझते हुए आगे बढ़ने पर पहुंचोगे। वेद यदि ठीक ठीक समझे तो वे तुम्हें कुरान और अहललबैत तक लाएंगे जिनमें अवतार मौहम्मद सब अहललबैत के लीडर हैं और कुरान यदि ठीक ठीक समझोगे तो वेद और गीता को अपने गले से ऐसे ही लगाओगे जैसे कुरान को लगाते हो। उन दिव्यात्माओं की समझ आवश्यक है जो मोक्ष यानी निजात की राह प्रदर्शित करने हेतु क्रिएट की गईं। जैसा मैं पहले लिख चुका हूँ कि गीता साफ शब्दों में कह रही है कि सत्य मार्ग को पहचानते हुए आगे बढ़ोगे तो यदि कुछ गुनाह किए हैं तो वे भी माफ हो जाएंगे और तुम स्वर्ग में हमेशा की ज़िन्दगी पाओगे परन्तु यदि उस मार्ग की समझ नहीं बना पाए तो तुम्हारे अच्छे कर्म भी कुछ काम नहीं आएंगे; जब तुम्हारे अच्छे कर्मों का फल तुम भुगत चुकोगे तो एक बार फिर तुम्हें इस दुनिया में परीक्षा हेतु भेज दिया जाएगा।
यही 7 दिव्यात्माएं जो अहललबैत के जिस्मों में कार्यरत थीं, हर ज़माने में विभिन्न स्थानों पर और भिन्न भाषा बोलने वालों के बीच पाक इंसानी जिस्मों को अपना आफिस बना कर उनसे हिदायत का काम करती रहीं। इन जिस्मों में किसी का नाम कृष्ण था, किसी का मूसा, किसी का ईसा और किसी का मौहम्मद। जिस शरीर को कोई दिव्यात्मा अपना आफिस बना ले, उस शरीर से परमात्मा अपना संदेश देने लगता है। जैसा कि मैंने बताया है कि कृष्ण और मौहम्मद के शरीर से एक समान अंदाज़ और लहजे में बात होती दिखाई देती है। जब हमने इन दिव्यात्माओं की ही समझ खो दी, जिन के बारे में हर अवतार हमें समझाने में लगा था, तो हम नाम के किसी धर्म से जुड़े तो हो सकते हैं लेकिन हमने उस अवतार की शिक्षा को नहीं समझा जिसको हम अपना कहते और समझते हैं। यह है हमारे अपने धर्म पर चलने की असलियत!
अब समझिए! End Times में नूर और जुलमत के बीच चल रही लड़ाई को एक बार फिर से अपनी चरम सीमा पर पहुंचना है। जैसा मैंने कहा, हम सब मोक्ष यानी निजात की सीधी राह से भटके हुए हैं। सारे डिवाईन समझे जाने वाले ग्रन्थ किसी न किसी अवतार द्वारा बताए गए थे। यदि हर ग्रन्थ कह रहा है कि इस ग्रन्थ में दी गई शिक्षा चारों ओर फैल जाएगी तो क्या ग़लत कह रहा है जबकि तमाम ग्रन्थ एक ही सोर्स से थे, उनकी शिक्षा भी एक ही थी। यह तो हम हैं जिन्होंने उस शिक्षा को समझने में ग़लती की। एक ही मार्ग बताया जा रहा था। उस मार्ग को जिस ने जैसा समझा उसको हमने धर्म का नाम दे दिया। यदि धर्म नहीं बना तो sect बन गया।
वेद तमाम इंसानियत के लिए हिदायत का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। अपने को हिन्दु कहने वालों ने उसे अलग अलग तरीक़े से समझा। किसी ने समझा कि देवता किसी ज़माने में रहते थे और किसी ने समझा कि देवता तो कुछ नहीं होते। क्या दोनों समझ सही हो सकती हैं? यह तो हो सकता है कि दोनों की समझ ग़लत हो, पर यह नहीं हो सकता कि दोनों सही हों। आज दोनों समझ रखने वालों में से किसी को भी चिंता नहीं कि अपने मोक्ष की चिंता करे।
कलकी अवतार, मसियाह, मेहदी, Mashiach, Soshiant, Quetzalcoatl ये सब अलग हस्तियां नहीं हैं बल्कि एक ही हस्ती के विभिन्न ग्रन्थों में दिए गए नाम हैं। ठीक वैसे जैसे आत्मा को किसी ने रूह कहा और किसी ने Spirit.
End Times में जो होना है वह समझिए! एक सीधा मार्ग जो हर ज़माने में बताया जा रहा था वह सामने आ जाएगा। अपनी अपनी किताबों की ग़लत समझ जो लोगों ने बना रखी है वह मिट जाएगी और सीधा रास्ता एकदम साफ हमारी नज़रों के सामने होगा। हमारे ऊपर निर्भर करेगा कि हम उस मार्ग को समझते हुए उस पर चलते हैं कि नहीं। वेद हों कि बाईबल, गीता हो कि कुरान, सब की शिक्षा एक समान समझ ली जाएगी, और उस पर चलने वाले लोग ही हक़ पर होंगे। गीता और वेद से लोग कुरान की ओर आएंगे और कुरान पढ़ कर वेद और गीता को अपना कहेंगे। उस मार्ग से विचलित हर मार्ग गुमराही का मार्ग होगा। लेकिन जुलमत ऐसा क्यों चाहेगी?
हमारा सब से बड़ा दुश्मन हमारे अन्दर विराजमान है और हमें खबर नहीं है। उसने अल्लाह से यही तो क्हा था कि मैं इंसानों को बहकाता ही रहूँगा और उसको जवाब मिला था कि जो नेक बन्दे हैं वे तेरे बहकावे में नहीं आएंगे। जब से आज तक जुलमत ने न जाने कितने परिवारों में कलह पैदा कर दी, भाई को भाई से, इंसान को इंसान से और इंसान को खुदा से जुदा कर दिया। अल्लाह हर बन्दे से चाहता है कि वह अपने अन्दर के शैतान के साथ एक आखि़री जेहाद करे, जिसे जेहादे अकबर कहा जाता है, और अपने अन्दर घुसपैठ बनाए बैठे शैतान को बाहर निकाले।
आदम जमीन पर आए तो उन्हें एक ही रास्ता बताया गया जिस पर चल कर वह वापिस स्वर्ग में पहुंच सकते थे पर आदम की औलाद को उस शैतान ने ऐसे बहकाया कि अनेक रास्ते बन गए जिन सब के बीच वह एक रास्ता जो मोक्ष या निजात का रास्ता था खो गया और इंसान इसी दुनिया का हो कर रह गया।
जुलमत की ताक़त नहीं चाहती कि हम असली धर्म की शिक्षा की ओर आएं, हक़ और हक़ीक़त को पहचानें। यह आखि़री समय वह है जब सत्य एक बार फिर सामने आएगा। दुनिया अब समापन की ओर बढ़ रही है। कलियुग के बाद कोई युग नहीं आना है। क़यामत से पहले ईश्वर एक बार फिर हक़ को बताना चाह रहा है। जो देवताओं यानी मौहम्मद और अन्य अहललबैत के मार्ग पर आ जाएगा वह अपना स्वयं का भला कर लेगा जबकि अन्य लोग गुमराही की दलदल में बह जाएंगे।
वेद के मानने वाले हो तो देवताओं को पहचानो, कुरान के मानने वाले हो तो अहललबैत को पहचानो। तुम पाओगे कि दोनों एक ही मार्ग के मुसाफिर हो!
जुलमत भी जान रही है कि वह दिन नज़दीक है जब यह होना है। नूर और जुलमत की हक़ीक़त सामने आना है। हक़ और बातिल उजागर होना है। इस आखि़री समय में हक़ को पहचानने का एक और अवसर दिया जा रहा है। यही कारण है कि जुलमत ने अपनी कोशिशें तेज़ कर दी हैं। नूर के रास्ते पर लोग न आएं इसलिए वह हर मुमकिन कोशिश करेगी, कुछ को ज़लील-ओ-रूसवा कराएगी, कुछ को क़त्ल, विभिन्न गुटों में दूरियां और अधिक बढ़ाएगी। लेकिन जो भविष्यवाणी कर दी गई है उसको कोई टाल नहीं सकता। सत्य तो सामने आ कर रहेगा; और यह सत्य यदि कुरान में है तो वेद और गीता में भी है, बाईबल और ओल्ड टेस्टामेंट में भी है। आवश्यकता है तो यह कि हम इन सब ग्रन्थों को अपना समझते हुए नए ज्ञान की रोशनी में फिर से अनुवाद करके पढ़ें।
आप विश्व भर में देखें नफरतें कितनी तेज़ी से फैल रही हैं। आज इंसान इंसान को मारने काटने से नहीं बच रहा। धर्म और जाति की बुनियादों पर हिंसा का खेल जारी है। जुलमत के कारिंदे फेसबुक, इंटरनेट और मोबाईल के माध्यम से नफरतों और द्वेष को फैलाने में जुटे हैं। हक़ को पहचानिए। सत्य, अहिंसा और इंसानियत के रास्ते पर आएं। शैतानी ताकत़ों की कोशिशों को नाकाम कर दें। अपने अन्दर के शैतान को मात दे दें जो हमसे गुनाह करा रहा है। जो घरों में भी नफरतों को बढ़ावा दे रहा है। जिसने भाई भाई में, पति पत्नी में और बाप बेटे में दूरी पैदा कर दी है और हम को नूर के रास्ते से विचलित कर materialistic चाहतों में गर्क़ कर दिया है। क्यों न करे, जुलमत की ताक़त स्वयं इन्हीं चीज़ों से बनी है। उसका काम ही रूहानियत से खींच कर हमको माद्दियत यानी दुनियावी चाहतों में डाल देना है।
रूहानियत को सामने आना है। यसूअ मसीह यानी ईसा इसी की ओर इशारा कर रहे थे जब वह भविष्यवाणी कर रहे थे ‘when the spirit of God will come’ के माध्यम से। आईये नूर के रास्ते पर। द्वेष और नफरत को मिटा फेंके। इंसानियत के मार्ग पर आएं, प्रेम के मार्ग पर आएं, रूहानियत के मार्ग पर आएं।
यही बात बार बार वेदों और उपनिषदों में कही गई। कभी कहा गया कि यह देवता जो दिव्य अथार्त नूर से बने हैं इनको अपनी इंद्रियों और दूसरे अंगों का हाकिम मान लो। जब तुम देवताओं को हाकिम मान लोगे तो गलत कार्य कैसे करोगे? कभी कहा गया कि अपनी इंद्रियों को अन्दर की तरफ समेट लो। कभी कहा गया कि हमारे अन्दर दिव्य अथार्त नूर का बसेरा है, केवल उसे जागरूक करने की आवश्यकता है।
तुम्हारे अन्दर की नूरानियत जब ही ज़ाहिर होगी जब अपने अन्दर की जुलमत को कोशिश करके हटा दोगे। हिन्दुस्तान के वासियो, समय आ गया है कि अब तुम अपने अन्दर के शैतान को कुचल कर नूर के क़रीब हो जाओ। खुदा हिन्दुस्तान को बेहतर दर्जा देना चाहता है, खुदा को खुश कर दो।