Lecture 003: True Concept of Vedas and Gita
मैंने वेद, गीता और बहुत सारी अन्य किताबें काफी विस्तार से पढ़ीं। यदि आप मेरे साथ रहेंगे और आगे चलेंगे तो आप पाएंगे कि किसी भी तरीक़े से आप इसे खुदाई कलाम मानने से इंकार नहीं कर पाएंगे। सब किताबें एक रास्ता बता रही हैं जिस पर चलना था उस समय के लोगों को भी और आने वाले समय में जो लोग उन किताबों को अपना समझ और मान रहे हैं उन्हें भी।
लेकिन हर ज़माने में ऐसे लोग रहे जो इन हक़ीक़तों को, इन सच्चाईयों को झुठलाते रहे, बहुत सारे ऐसे भी थे जो इनको समझ ही नहीं पाए या इनकी शिक्षा का मज़ाक/उपहास उड़ाते रहे। जो नहीं समझ पाए कि क्या बात हो रही है उन्होंने ये मानने की जगह कि वो नहीं समझ पाए, अपने अपने मायनी पहना दिए। ये सब से बड़ा अंधेर था।
यदि हम वेदों को विस्तार पूर्वक देखें तो सब से पहले हम पाते हैं कि वो देवताओं की बात कर रहे हैं। थोड़ी बहुत नहीं बल्कि तमाम वेद देवताओं के उल्लेख से भरे पड़े हैं। ऐसे जैसे मानो वेद भेजने का कारण ही देवताओं को पहचनवाना हो।
कहीं पर अग्नि देव की बात हो रही है, कहीं इंद्र देव की बात हो रही है, कहीं देवी की बात हो रही है। यहां पर बहुत से लोग कन्फयूज़ हो जाते हैं। क्यों इन सब को अनुवादकों ने छोटे ‘जी’ के साथ गाड कह कर अनुवाद किया हुआ है। खास तौर पर इंग्लिश के अनुवादकों नेः देव का कोई समानांतर शब्द इंग्लिश में नहीं मिला उन्हें तो छोटे ‘जी’ के साथ गाड अनुवाद कर दिया। यानी एक गाड वो जो कैपिटल ‘जी’ के साथ लिखते हैं और एक स्माल ‘जी’ के साथ गाड अनुवाद में लिख दिया।
समझने की बात ये है कि अगर वेद और गीता दोनों में देवताओं की बात हो रही है तो इसका कुछ न कुछ महत्व तो होगा। देवताओं के बारे में आम लोग जो बात करते हैं उनके अनुसार देवता असंख्य हैं, करोड़ोें में हैं। बहुत सी ऐसी कहानियां प्रचलित हैं जिनको बताया भी नहीं जा सकता। हम ने अनेक ऐसी कहानियां टीवी सीरियल्स और फेसबुक/इंस्टाग्राम/यूटयूब रील्स के ज़रिए सुनीं और हम समझते हैं कि वो कहानियां सही हैं।
मैक्स म्यूलर, ग्रिफिथ आदि अंग्रेज़ स्कालर्स ने जब यहां कर वेदों, उपनिषदों आदि का अनुवाद करने की कोशिश की तो उसके पीछे उनका अस्ल मक़सद मिशनरी था; यानी वो यहां के हिन्दुओं को अधिकाधिक ईसाईयत में कन्वर्ट करना चाहते थे। उन्होंने वेद की बहुत सारी बनी बनाई समझ पर उंगली भी उठाई। जैसे उन्होंने कहा कि वेद किसी प्राचीन ज़माने की बात कर रहे हैं जब देवताओं की असुरों से लड़ाई हुई थी और आज के माडर्न ज़माने में अब वेदों का कोई महत्व नहीं रह जाता। इसका जवाब देने कुछ हिन्दु स्कालर्स सामने आए तो उन्होंने देवताओं को बीच से ही हटा डाला। उन्होंने कहा कि देवताओं की तो बात ही नहीं हो रही वेदों में बल्कि एक गाड और उसकी विभिन्न विशेषताओं की बात हो रही है। जहां पर एक खुदा की बात होते समझाना मुश्किल था तो कहीं पर कहा कि स्टीम इंजन की बात हो रही है, कहीं पर समझाया कि आग और पानी से मिलकर बनने वाली भाप की बात हो रही है, मैडम क्यूरी के रेडिएशन एक्सपेरिमेंट की बात हो रही है और इस प्रकार के अन्य मायनी पहनाने की कोशिश की। सवाल ये है कि क्या स्टीम इंजिन की बात वेदों में हो रही थी और आज के डीज़ल और बिजली से चलने वाले इंजिनों की बात नहीं हो रही?
अस्ल में वेद का मक़सद ही ये सब बातें करना नहीं था। हम कहते हैं कि वेद बहुत सारी लेटेस्ट साईंस की बातें कर रहे है; वेद रेडियम और यूरेनियम की बात कर रहे हैं। हम को समझना होगा कि खुदा की तरफ से यदि कोई किताब आई है तो वो भौतिक यानी माद्दी यानी मैटिरियल दुनिया की तरक्की के बारे में नहीं बताएगी जितना स्प्रिटुअल यानी रूहानी तरक्की के रास्तों की बात करेगी और उस राह की तरफ चलने की बात करेगी जो हमारी बेहतरी की राह है।
जब हम ने इस प्रकार के मायनी पहना लिए तो आज हम समझ ही नहीं पाते कि वेद क्या बात कर रहे हैं। आधे लोग कहते हैं कि देवता हैं और आधे लोग कहते हैं कि देवता होते ही नहीं, बल्कि अल्लाह और उसकी विभिन्न विशेषताओं की बातें वेद कर रहे हैं। या फिर साईटिफिक तरक्की की बातें वेद कर रहे हैं।
बहुत सारी कमेंटरीज़ अलग अलग तरीकों से वेदों को समझाने की कोशिश करती हैं।
लेकिन हकीकत ये है कि वेदों में से देवताओं को हटा कर हमें अल्लाह यानी खुदा साबित करने की ज़रूरत नहीं है। वेद में एक खुदा की बात हो रही है लेकिन देवताओं की भी बात हो रही है। इस सृष्टि में देवताओं का कुछ महत्व है जो हमें समझना पड़ेगा।
जिस तरीके से कुरान में यदि पैगम्बर मौहम्मद का उल्लेख आया है तो उसको हटा कर अल्लाह को पहचानने की ज़रूरत थोड़ी है। पैगम्बर मौहम्मद से आप अल्लाह तक ही पहुंचेंगे। अहलेबैत को हटा कर अल्लाह को पहचनवाने की ज़रूरत नहीं है जबकि हम पाते हैं कि अहलेबैत केवल और केवल अल्लाह को पहचनवाने के ही काम में लगे हैं।
हमें इन्हीं किताबों में और डूब कर और दूसरी किताबों में दी गई जानकारी की रौशनी में समझना होगा कि क्या बात हो रही है।
मनुस्मृति कहती हैः
The Veda is the source of all Dharma i.e. religion, morality, righteousness and good conduct.
Manusmriti.2-6
सारे धर्म की उपज वेद से है। तो साफ है कि हमेें वेद में धर्म ढूंढना होगा, न कि साईंटिफिक डिस्कवरीज़ नहीं ढूंढनी होंगी।
डाक्टर राधा कृष्णन ने लिखा हैः
Dr. Radhakrishnan: “The Vedas were composed by the seers when they were
in a state of inspiration. He who inspires them is God. Truth is impersonal,
apauruseya and eternal, nitya. Inspiration is a joint activity, of which man’s
contemplation and God’s revelation are two sides. The Svetasvatara Upanishad
says that the sage Svetasvatara saw the truth owing to his power of
contemplation, tapah-prabhava, and (the grace of god) deva-prasada. The dual significance
of revelation, its subjective and objective character, is suggested here.”
वेदों को उन ऋषियों ने लिखा जिन पर वही होती थी, यानी जिनका अल्लाह यानी महेश से कोई कनैक्ट था। उसके दो कारण थे कि वो कनैक्ट बन पायाः एक था तप प्रभाव और दूसरा देव प्रसाद। यानी ऋषि तपस्या के माध्यम से रूहानियत के उन लेवेल्स पर चले गये थे कि उनकी आत्मा परमात्मा के करीब पहुंच गई थे; ऐसे लेवल पर पहुंचे तो देवताओं ने प्रसन्न होकर प्रसाद के रूप में वेद उनके मस्तिष्क में उतार दिए/अवतरित कर दिए/नाज़िल कर दिए।
डिवाईन इंस्पिरेशन और मदद किसी को भी मिल सकती है। हमारे सामने अनेक उदाहरण मौजूद हैं। सूफियों में भी बहुतेरे उदाहरण मिल जाएंगे। जैसे शाह नेयमतुल्लाह वली कि उन्होंने आने वाले समय के समूचे हालात बता दिए थे। जो भविष्यवाणियां पिछले कई सौ सालों से सही होती चली आ रही हैं। इस तरीके से हम निजामुददीन औलया या अजमेर के ख्वाचा मोईनुददीन चिश्ती का उदाहरण दे सकते हैं। ये लोग तपस्या में आगे थे, रूहानियत में आगे थे, इसलिए देवतागण इनसे खुश होकर देव प्रसाद के रूप में इनको बहुत सारा ज्ञान और चमत्कार अर्पित कर रहे थे।
Mahatma Buddha: Sutta Nipata, 292:
He who attains true knowledge of
Dharma or righteousness through the Vedas, attains a steady position. He does
not waver.
महात्मा बुद्ध के लिए कहा जाता है कि वो खुदा को मानते ही नहीं। लेकिन वो सूत निपत में कह रहे हैं कि वेद से जिसने सही ज्ञान ले लिया, धर्म का, सत्य मार्ग का, वो रास्ते से डगमगाएगा नहीं।
अब बताईए, बुद्ध यदि वेद के ज्ञान को सही ठहरा रहे हैं तो फिर वेद में वर्णित देवताओं, परमात्मा और ब्रहमण को भी तो सही ठहरा रहे हैं। बुद्ध को जब उनके मानने वालों ने वेदों से काट कर अलग धर्म बनाया तो जिस शिक्षा को मानते हुए बुद्ध अवतार बने थे और जो पहले से मौजूद थी इसलिए बुद्ध ने उसको दोबारा बताने की कोशिश नहीं की, उसको ही नकार दिया। बुद्ध तो उनके बीच आए थे जिनके बीच वेद आ चुके थे और वे वेद की समझ से भटक गये थे।
यजुर वेद की बात करते हुए महर्षी पतंजली ने लिखा है कि 101 स्कूल्स आफ थाट थे जिनमें से 6 बचे हुए थे। यानी लोगों ने वेद को समझने के लिए 101 मायनी पहना रखे थे जिनमें से महर्षी पतंजली के समय तक केवल 6 शेष रह गये थे।
यजुर वेद में तो सिर्फ 1984 मंत्र हैं। ऋग वेद में 10522 मंत्र बचे हुए हैं आज भी। ऋग वेद को कितने मायनी में समझा गया और कितनी समझें आज शेष रह गईं हम को नहीं पता। जैसा हमने कहा, एक व्यक्ति ने ये अर्थ निकाले कि देवता होते हैं और उनका बड़ा महत्व है और दूसरे ने ये अर्थ निकाले कि देवताओं की बात नहीं हो रही बल्कि केवल एक खुदा और उसकी विभिन्न विशेषताओं की बात हो रही है तो दोनों सही तो नहीं हो सकते। अर्थ निकाले गये कि देवता कुछ नहीं हैं जबकि इंद्र देव को लेकर इतनी सारी कहानियां प्रचलित हैं, अग्नि देव को लेकर इतनी कहानियां प्रचलित हैं, रामायण और महाभारत में लोगों ने उन्हें देखा है, उनसे अस्त्र और आशीर्वाद लिया है, रूद्र, महादेव आदि को लेकर इतनी कहानियां मौजूद हैं। दूसरी तरफ कुछ दूसरों ने इन देवताओं को भगवान बना कर इनकी पूजा प्रारंभ कर दी। हर परिवार ने किसी देवता को अपना कुल देवता मान लिया और अन्य को किनारे कर दिया।
गीता की बात करें तो हम पाएंगे कि वेद के जो देवता थे, जिनकी अपने को सनातन धर्मी कहने वाले पूजा करने लगे थे, कृष्ण ने आकर कहा कि देवताओं का महत्व तो बहुत है लेकिन उनके ऊपर परमात्मा है और परमात्मा से ऊपर एक एबसोलूट गाड है जो कि कादिरे मुतलक खुदा है। हमको इस एबसोलूट गाड यानी कादिरे मुतलक खुदा तक अपनी इबादतों को लेकर जाना है। ये कृष्ण से मिली शिक्षा है जो गीता में मौजूद है।
जब ये शिक्षा कृष्ण ने दी तो उस समय के धर्म गुरू जिनकी दुकानें चल रही थीं, इन देवताओं के नाम पर, उनको आपत्ती होना लाज़मी थी। जिसमें भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे धर्मगुरू थे, जो अकेले नहीं थे, बल्कि उनके पीछे बहुत से अनुयायी थे। इन्होंने कृष्ण की शिक्षा की मुखालेफत की। क्योंकि उस समय का तरीका ये था, जो वो बाप दादाओं के समय से करते चले आ रहे थे, कि वे लोग वेद के देवताओं की पूजा करते थे और विभिन्न यज्ञों तथा दूसरी रस्मों के माध्यम से जनता को अपने से जोड़ रखा था।
अस्ल में महाभारत का कारण ही यह है। अब समझिए समय का फेर। वो समय था जब देवताओं की पूजा होती थी और आज वो समय है कि हम जानते ही नहीं देवता कौन हैं और उनका परमात्मा से क्या रिश्ता है, खुदा से क्या रिश्ता है, और आपस में क्या रिश्ता है। या वे खुद भगवान हैं कि नहीं।
गीता उस समय आई जब इन देवताओं की पूजा हो रही थी और कृष्ण ने आकर न केवल इन देवताओं की अहमियत को समझाने की कोशिश की बल्कि इन देवताओं का सृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण रोल होने के बावजूद इनसे बड़ा रोल परमात्मा यानी मैनिफैस्ट सैल्फ का और सबसे बड़ा रोल एबसोलूट गाड यानी ब्रहम यानी महेश का बता रहे हैं, जिसको मुसलमान अल्लाह कहते हैं। कृष्ण जिस एबसोलूट गाड की बात कर रहे हैं वो न दिखने वाला, सर्व व्यापि, हर तरफ मौजूद, कादिरे मुतलक खुदा है।
उस जमाने से अब तक इतना ज्यादा फर्क आ गया है कि अब जब हम गीता पढ़ने बैठते हैं तो हम नहीं समझ पाते कि कृष्ण क्या बात कर रहे हैं। क्योंकि कृष्ण उन लोगों के बीच वार्तालाप कर रहे हैं जो देवताओं की भगवान के रूप में पूजा कर रहे थे और उनसे बड़ी किसी शक्ति की समझ खो चुके थे।
युद्ध के बीचोंबीच जाकर समझा रहे हैं कि सत्य मार्ग क्या हैः देवताओं की पोज़िशन साफ साफ बता रहे हैं, परमात्मा के रोल को बता रहे हैं जो देवताओं से बड़ा है लेकिन साथ ही साथ एबसोलूट गाड यानी ब्रहमण यानी महेश यानी अल्लाह तक पहुंचने की भी आवश्यकता बता रहे हैं। कृष्ण ने देवताओं को नकारा नहीं है बल्कि हर प्रकार से उनके रोल और उनकी अहमियत को बरकरार रखा है। लेकिन कहा कि अब देवताओं से आगे बढ़ने की ज़रूरत है।
यदि हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि देवताओं को हर जगह पहचनवाया गया है। चाहे आप ग्रीक सिविलाईजेशन देखें, रोमन सिविलाईजेशन देखें, इजिप्शियन सिविलाईजेशन देखें, भारत और चाईना में देखेंः शायद ये डिवाईन प्लान का हिस्सा था कि हर इलाके में पहले इनको पहचनवाया गया। शायद उस समय के दिमाग़ इस लेवल पर तैयार नहीं थे कि वो एक न दिखाई देने वाले खुदा को पहचान सकते।
देवताओं का रोल नकारा नहीं जा सकता और न गीता नकार रही है। लेकिन क्यूंकि उस समय देवताओं के माध्यम से ही खुदा तक पहुंचने के मार्ग को बताया गया था और लोगों ने उन्हीं देवताओं के नाम पर कुर्बानियां देना शुंरू कर दी थीं, हवन आग तेल आदि का प्रयोग करके यज्ञ आदि की रस्में बना ली थीं, और अस्ली धर्म को भुला दिया था, इसलिए कृष्ण को एक बार फिर अवतार के रूप में आकर पुनः सही शिक्षा को पहुंचाना जरूरी हो गया था।
गीता कह रही है कि तुम धर्म के नाम पर कुछ रस्में निभाने के अलावा सिर्फ एन्टरटेनमेंट में गिरफतार हो। यानी हम पूजा के नाम पर बहुत सी रस्में कर रहे थे लेकिन उनका असर हमारी आत्मा पर नहीं पड़ रहा था। आत्म शुद्धि, अन्दर से आत्मा को जो पाकीजगी के मार्ग पर लगाना होता है, स्प्रिटुअल एलीवेशन होता है, उसकी बात खत्म हो चुकी थी।
एन्टरटेनमेंट में गर्क थे और बस रस्में निभा रहे थे। दिख भी रहा था कि एन्टरटेनमेंट में ऐसे गर्क थे कि केवल चैसर के एक खेल पर अपने घर की औरतों को भी देने को तैयार थे। दूसरे एन्टरटेनमेंट के तरीकों में भी गर्क थे जैसा कि हम पुराणों में उल्लेख पाते हैं, जिनमें सैक्स एक बड़ा एन्टरटेनमेंट था। लेकिन धर्म के नाम पर वेद के श्रलोकों को पढ़ते हुए कुछ रस्मों को निभाने को धर्म समझे बैठे थे।
कृष्ण इससे बाहर निकाल कर लाते हैं। देवताओं की पोज़ीशन समझाते हैं, बताते हैं कि तुम को अपने अन्दर क्या बदलाव लाना है। ये भी कि कोई भी काम तुम तामसिक गुण में कर सकते हो, रजसिक गुण में कर सकते हो और सात्विक गुण में कर सकते हो। यानी कोई भी काम तुम शैतान के लिए कर सकते हो, दुनिया के लिए कर सकते हो और खुदा के लिए कर सकते हो। खुदा के लिए अपने कर्मों को करते चले जाओ और तुम उससे करीब होते चले जाओगे।
महाभारत की लड़ाई इस मकसद के लिए थी् कृष्ण अवतार थे, वो हक का पैगाम ले कर आए थे। जो बुराईयां फैल चुकी थीं उनको वो दूर करना चाह रहे थे लेकिन उसी समाज में जो धर्म गुरू थे उनको ये सब समझ में नहीं आया। जो बाप दादा का धर्म वो मान रहे थे उन्होंने कहा हम उसी को मानेंगे। और उन्होंने कृष्ण के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी।
आमतौर पर हम समझते हैं कि पूरी लड़ाई हस्तिनापुर पर कब्जे को लेकर थी। लेकिन कृष्ण तो अर्जुन से कह रहे हैं कि तुम मर जाओ या मार दो, दोनों हाल में तुम्हारी बेहतरी है। जरा बताईए, मर कर हस्तिनापुर के सिंहासन पर कब्जे का क्या लाभ?
जब हम काव्य महाभारत पढ़ते हैं तो हम इस निष्कर्श पर पहुंचते हैं कि ये लड़ाई हस्तिनापुर के सिंहासन पर कब्ज़े को लेकर थी। मैंने कुछ किताबों में पढ़ा है कि महाभारत एक काव्य था, जो किसी आम धार्मिक व्यक्ति ने, जिसने उस लड़ाई से जुड़ी कहानियों को सुन रखा था, उसने उन्हें काव्य की शकल में लिख दिया। और गीता एक अलग किताब थी जो कृष्ण का डायलाग था।
दूसरी शताब्दी ईसवीं में, बहुत बाद में, किन्हीं कारणों से गीता को महाभारत के बीच में 18वें चैप्टर से इंसर्ट कर दिया गया। वो किस कारण हुआ मालूम नहीं। लेकिन उसके कारण सारा का सारा पर्सपैक्टिव बदल गया। आज जब हम महाभारत के किस्से पढ़ते हुए 18वें चैप्टर तक पहुंच जाते हैं तो हम उसी नजरये से गीता को भी समझना शुरू कर देते हैं। जिस व्यक्ति ने इस युद्ध को ऐसे देखा कि जैसे वो हस्तिनापुर पर कब्जे के लिए लड़ाई थी, हम भी उसी के नजरये से गीता को पढ़ना शुरू कर देते हैं।
दरअस्ल जो लड़ाई का एंड रिजल्ट हुआ, यानी लड़ाई का जो नतीजा निकला, वो समझा कि वही इस युद्ध का मकसद था। लड़ाई का रिजल्ट ये हुआ कि हस्तिनापुर पर पांडवों का कब्जा हो गया। लेकिन इस लिए तो लड़ाई नहीं थी।
यानी पैगम्बर मोहम्मद के लिए कोई ये समझे कि उनका मकसद था मक्का को फतेह करना तो उसकी समझ भटकी हुई है। पैगम्बर मौहम्मद भटके हुए लोगों को सत्य मार्ग की शिक्षा देने को ही आए थे लेकिन जब वही भटके हुए लोग हमलावर हो कर आ गये और उनसे युद्ध हुए तो उन युद्धों का नतीजा ये हुआ कि मक्का पर मुसलमानों की फतेह हो गई।
गीता का पहला ही शब्द बता रहा है कि ये धर्म युद्ध था लेकिन महाभारत के लेखक ने उस लड़ाई को ऐसे देखा कि जैसे वो हस्तिनापुर पर कब्जे के लिए थी। महाभारत का लेखक द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह को हीरो के रूप में पेश करता दिखाई देता है। क्योंकि वो गुरू थे। जिस प्रकार कौरव उनको देख रहे थे वैसे ही वो भी उनको देखता है जबकि कृष्ण के मुख से परमात्मा तो कहता है कि वो भटके हुए लोग हैं, जो मरे हुए हैं और यदि अर्जुन उनका वध करेंगे तो वो महज एक औपचारिकता होगी।
महाभारत का लेखक समझ ही नहीं पा रहा कि इस लड़ाई का मकसद क्या था। कृष्ण को क्योंकि अवतार मान रहा है इसलिए उनको भी अच्छे से पेश करता है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि दो हीरोज़ के दरमियान युद्ध की दास्तान बता रहा है। वो अंत में कौरवों को स्वर्ग में दिखा देता है। गीता में कृष्ण की शिक्षा की रौशनी में तो कृष्ण छल कर ही नहीं सकते लेकिन महाभारत उनको छल करता दिखाती है। गीता को शिक्षा तो यहां तक कह रही है कि मार्ग से विचलित ही नहीं होना है भले ही हम नुकसान उठा लें, और जो लोग बीच में तमाशाई बने खड़े थे उनके लिए कह रही है कि बीच का रास्ता कोई नहीं, या इधर आओ या तुम उधर के हो। कृष्ण को इससे भी फर्क नहीं पड़ रहा कि उधर लोग बढ़ जाएंगे, क्योंकि वो हक के नुमाईंदे थे। खुदा की ओर का अवतार हक से कम्प्रोमाईज़ नहीं कर सकता। अर्जुन भी पूरी तरह से कृष्ण के रोल और शिक्षा को नहीं समझ पा रहे थे, तो समझना चाह रहे थे। और जो सामने लोग देवताओं की पूजा कर रहे थे, अर्जुन भी ऐसा ही करते बड़े हुए थे और देवताओं के रोल को लेकर कन्फयूज थे। एक जगह कहते भी हैं कि मैं तो कृष्ण की शिक्षा का उपहास उड़ाया करता था। लेकिन पांडवों ने हक कुबूल किया और कृष्ण के मार्ग पर आ गये।
मेरी स्टडी सिर्फ और सिर्फ उन किताबों पर केंद्रित है जिनको हम खुदाई किताब मानते हैं। क्योंकि जब हम महाभारत की रौशनी में गीता को पढ़ते हैं तो हम अस्ली शिक्षा से ही बहक जाएंगे। उस समय की जितनी कहानियां और किस्से प्रचलित थे, उनको लेखक ने महाभारत में डाल दिया। उनमें कुछ सच्ची भी हो सकती हैं और कुछ ऐसी भी हो सकती हैं कि लेखक ने उनको जैसा सुना या समझा वैसा उसने लिख दिया।
सब से बड़ी समस्या जो सनातन धर्म की असली समझ तक पहुंचने में हो रही है, जिसके चलते हम सत्य मार्ग से विचलित हो गये हैं, उसका अस्ल कारण ही यही हैः कि हम उन सब किताबों को सेकरेड माने बैठे हैं जो आम आदमियों ने लिखी जैसे मनुस्मृति, रामायण या महाभारत और जो ईश्वर की ओर से आईं या उसके अवतारों से सम्बंधित हैं जैसे वेद और गीता या फिर जो सत्य मार्ग की राह को समझने वाले ऋषियों ने लिखीं जैसे उपनिषद।
पैगम्बर मौहम्मद के बाद के 1400 वर्षों में लोगों ने किस किस प्रकार उनकी शिक्षा से हमें भटकाने की कोशिश की तो क्या उस समय नहीं की गई होगी। हक और बातिल की, अच्छाई और बुराई की लड़ाई तो हर जमाने में रही है। उस समय भी लोगों ने भटकी हुई शिक्षा को फैलाने की कोशिश की जो पुराण में बहुत सारी किताबों में दिखाई भी रहा है कि कैसे उल्टे सीधे ख्यालात को लोग अपनी अपनी समझ अनुसार धर्म के नाम पर प्रचारित कर रहे थे।
यहां तक कि बुद्ध के समय में भी हम पाते हैं कि तरह तरह के ख्यालात को फिलासफी के नाम पर अनेक लोग फैला रहे थे। उस सब को हम सेकरेड तो नहीं मान सकते। लेकिन प्राब्लम यह हुई कि हम ने ईश्वर की ओर से आई किताबों और आम आदमियों द्वारा लिखी गई किताबों को, जो उस समय की हम तक आईं, उन सब को बराबर कर दिया। कहीं दिखाई देता है कि इंद्र देव शराब के नशे में है, कहीं हमें दिखाई देता है कि देवता पृथ्वी पर आकर अविवाहित स्त्रियों से या कहीं कहीं विवाहित स्त्रियों से रिश्ता बना कर बच्चे पैदा कर रहे हैं। ये हकीकते नहीं है।
लोगों ने जब हकीकतों को नहीं समझा तो उन्होंने अनेक कहानियां बना लीं। आज हम समझते हैं कि उस समय के लोग बड़े अकलमंद और ज्ञानी थे, ऐसा नहीं है। आज भी अवाम का जो मेंटल लेवल है उस समय का मेंटल लेवल शायद और पीछे रहा होगा। लेकिन हमको ये समझना होगा कि वेद आदि इन देवताओं के अस्ल रोल को भी समझा रहे हैंः
Shatapath 1.1.1.2-5:
Agni is the Protector of the vows of the enlightened.
शतपथ कह रही है कि अग्नि उन लोगों की कस्मों की भी लाज रखने वाला है जिनको हक दिखाई दे गया है।
और ऋग वेद कह रहा हैः
Rig Veda.3.29.5
Make manifest Agni, the excellent sage, immortal versifier, with illuminated body… You will lead mankind in the act of Yagya…Make him manifest in the beginning.
अग्नि देव से सब से बेहतरीन ऋषि बता रहा है ऋग वेद और आहवान कर रहा है कि आ जाओ ओ अग्नि, तुम अमर हो और हर जमाने में हक की राह दिखाने के मंत्र पढ़ते रहे। तुम्हारा शरीर एलूमिनेटेड है यानी नूर से बना हुआ है अग्नि, आ जाओ, तुम इंसानियत को यज्ञ यानी सैकरीफाईज़ की राह दिखाओगे, उस राह पर आगे ले कर जाओगे।
ऋग वेद कह रहा हैः
Rig Veda.3.5.6
Agini knows the actions of all beings
अग्नि हर इंसान के कर्मों को जानने वाला है। यहां अग्नि देव की बात हो रही है। यदि तुम अग्नि से आग मायनी लेते हो तो समझाओ की कैसे आग तमाम इंसानों के कर्मों को जानती है। हालांकि अपने को फिलासफर दिखलाने वाले कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो ये भी समझाने की कोशिश कर सकते हैं।
एक जगह वेद कह रहा है कि अग्नि तमाम ज्ञान से पुर हैं, वो सब से अकलमंद ऋषि है।
Rig Veda.3.55.10
Agni is full of all knowledge. He is the wisest seer.
और तुम लम्बे बखान करो कि पांच एलीमेंटस की बात हो रही है जिनमें एक अग्नि हैं।
समस्या यही हुई कि ये सब appellations थे देवताओं के लिए जिनको हमने खुदा बना लिया। देवम का अर्थ यदि मैं करूंगा तो मैं गाड नहीं करूंगा बल्कि करूंगा ‘My Lord’ ‘मेरे आका’। आप इन मायनों से वेद आदि को समझें तो आप पाएंगे कि मायने साफ होते चले जाएंगे। आप मेरे लैक्चर्स सुनें तो साफ हो जाएगा कि इन देवताओं का सृष्टि में क्या रोल है, खुदा कौन है, ब्रहमा, विष्णु, महेश कौन हैं, परमात्मा कौन है और खुदा की सृष्टि में इन सब का क्या रोल है। देवताओं का परमात्मा से क्या रिश्ता है। देवता कितने हैं, अभी तो ये भी नहीं पता, कोई कहता है कि गाय के अन्दर इतने लाख देवता हैं, कोई कहता है कि हर तरफ असंख्य देवता हैं। ये सब आपको बिलकुल साफ साफ समझ आ जाएगा।
एक जगह कहा जा रहा है कि देवता हमको consciousness देने वालों में से हैं। लेकिन क्या हम देवताओं को समझ पा रहे हैं। दूसरी तरफ गीता जो बड़ा काम कर रही है कि एक खुदा तक पहुंचने के लिए जो आत्मा को परमात्मा से करीब करना है, जो रूहानियत डेवेलप करना है उसको बता रही है कि कैसे होगा।