Thursday, 3 September 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-O: सच्चा काफिर और आतंकवादी कौन?

सच्चा काफिर और आतंकवादी कौन?

अब हम पुस्तिका के अंतिम 3 पैराग्राफ तक पहुंच गए। तीनों में एक ही क़िस्म की बातें की गई हैं। इसलिए तीनों पैराग्राफ एक साथ पेश कर रहे हैं। पढ़िएः

‘मौहम्मद को जानना इसलिए भी बहुत ज़रूरी है कि दुनिया के करोड़ो मुसलमान मौहम्मद बनने की कोशिश करते हैं। जो मौहम्मद किया करते थे उसे सुन्नत कहकर अपने जीवन में शामिल करने की कोशिश करते हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मुसलमानों में पगलपन धर्म के नाम पर ज़्यादा पैदा हो रहा है। मानवता यह ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है। दुनिया में रहने वालों में से हर एक पांचवां मनुष्य एक मानसिक बीमार व्यक्ति को अल्लाह का संदेशवाहक यानी कि पैग़म्बर मानकर पूज रहा है। आत्मघाती हमले कर रहा है। अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरे मनुष्य की हत्या कर रहा है। खुद मरता है तो अपने को शहीद मानता है और दूसरे गैर मुसलमान को मारता है तो अपने को अल्लाह और रसूल का नेक बंदा समझता है। जब तक मुसलमान मौहम्मद और मौहम्मद द्वारा बनाए गए अल्लाह पर विश्वास रखेंगे, मौहम्मद द्वारा अल्लाह के संदेशों के माध्यम से बनाई गई पुस्तक कुराने मजीद को अल्लाह की किताब मानकर पढ़ेंगे तब तक इस दुनिया में हर मनुष्य के लिए जो किसी दूसरे धर्म को मानता है ख़तरा बना रहेगा।

मुसलमानों और गैर मुसलमानों दोनों के लिए मौहम्मद के चरित्र को समझना बहुत ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी गई है। ताकि ग़लत सही का फैसला मुसलमान और गैर-मुसलमान खुद करें। हो सकता है आज या 200 साल बाद अपने को मुसलमान कहने वाला व्यक्ति अपने अंदर झांक कर मानवता को ढूंढे और मौहम्मद द्वारा स्थापित किए गए क्रूर इस्लाम को छोड़कर इंसानियत का धर्म धारण करें।

मैंने इस पुस्तक को ख़ास करके मुसलमानों के लिए लिखा है। मौहम्मद एक लुटेरे गिरोह के सरदार थे। सामूहिक नरसंहार करने वाला बच्चों के साथ यौन संबंध स्थापित करने वाले थे। अनेक महिलाओं के साथ यौन संबंध स्थापित करने वाले औरतख़ोर थे और काफी कुछ मौहम्मद को कहा जा सकता है लेकिन मुसलमान बिना समझे इस तरह की बातों को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं और बिना सवाल किए इस्लाम की हर इस तरह की बकवास पर भरोसा करते हैं।’

इसमें तो शक नहीं कि दुनिया में लाखों करोड़ों इंसान हैं जो अवतार मौहम्मद के मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं। या कम से कम मुख से इक़रार करते हैं कि वे उनके मार्ग पर चल रहे हैं। कितने चल रहे हैं खुदा जाने! क्योंकि यदि अधिक संख्या में मुसलमान उस मार्ग पर चल पा रहे होते तो आज दुनिया में इतनी हिंसा, इतनी मारकाट नहीं होती। 

शायद कुछ ऐसा ही है जैसे अपने को वेद के मार्ग पर चलने वाला समझने वाले समय के अवतार से युद्ध पर उतारू हो गए। जबकि यह सब से धर्म भ्रष्ट लोग थे जिनके बारे में कृष्ण के मुख से परमात्मा कहता है कि ये धर्म के नाम पर कुछ रस्में निभाने के अतिरिक्त केवल मनोरंजन में गर्क़ है। और खुले शब्दों में कहता है कि ये मरे हुए हैं, यानी इनकी आत्मा का कवच मर चुका है, अब केवल शरीर है जो हिल डुल रहा है; यदि अर्जुन इस शरीर को शांत कर देते हैं तो यह महज़ एक औपचारिकता होगी। 

ज़रा सोचिए! जो धर्म के नाम पर हाथ में तीर कमान, तलवारें और गदाएं लेकर कृष्ण और उनके साथियों के खि़लाफ मरने मारने पर उतारू थे, वे सब से गुमराह लोग थे लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था। 

इसलिए कहता हूँ कि किसी की लंबी दाढ़ी से, घुटनों तक झूलते कुर्तों और टख़नों से ऊपर पाएजामों से या हाथ में कुरान से यह अंदाज़ा न लगा बैठना कि वे अवतार मौहम्मद के सब से बड़े अनुयायी होंगे। सिफ्फीन के युद्ध की याद दिलाता हूँ जिसमें अली के खि़लाफ लड़ते हुए माविया ने देखा कि अब मौत निश्चित है तो बड़े बड़े कुरान नेज़ों पर उठा लिए। या ख़्वारिज का उदाहरण सामने है कि जो हर समय बस नमाज़ें पढ़ने, रोज़े रखने और कुरान पढ़ने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया करते थे लेकिन नहरवान के युद्ध में अली ने उन्हें वाजिबुल क़त्ल समझते हुए उनके खि़लाफ ऐसी तलवार चलाई कि बस कुछ ही बच कर भाग सके। 

अली जानते थे कि यदि ये नमाज़े पढ़ रहे हैं, कुरान पढ़ रहे हैं, रोज़े रख रहे हैं परन्तु किसी औरत के पेट को तलवार से फाड़ कर पेट का बच्चा तक निकाल कर मारे दे रहे हैं तो इनका इस्लाम से कोई संबंध नहीं हो सकता। अली ऐसे ही मुसलमानों के खि़लाफ युद्ध करते हुए उन्हें समाप्त कर देने को निकले थे जो अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के बाद के 26 वर्षों में पैदा हो गए थे, लेकिन अफसोस कि किसी ख़्वारिजी ने अली पर नमाज़ की हालत में ऐसे घात लगा कर हमला किया कि अली मस्जिद में ही लहूलुहान हो गए और तीसरे दिन शहादत पाई। अली की शहादत के क़रीब दस वर्ष बाद उनके बड़े पुत्र हसन को भी माविया ने ज़हर दिलवा कर मरवा डाला। इस के बाद भी क़रीब दस वर्ष ही गुज़रे थे कि अली के दूसरे पुत्र और हसन के छोटे भाई हुसैन को माविया के पुत्र यज़ीद के हुक्म पर तीन दिन का भूखा प्यासा खंजर से ज़बह कर दिया गया। 

यदि आज के आतंकवादी बेगुनाहों के सिर धड़ से अलग कर रहे हैं तो इसकी जड़े उन गुमराह मुसलमानों तक जाती हैं जिन्होंने इस्लाम का लबादा पहन कर इस्लामी ख़लीफा की गद्दी पर क़ब्ज़ा जमा लिया और अवतार मौहम्मद के इस्लाम को पथभ्रष्ट करने का काम किया।

यही खुदसाख़्ता self-proclaimed ख़लीफा थे जिनके हित में था कि मुसलमानों को तलवार से लड़ने वाला जिहाद ही समझाएं; उन्हें आत्मिक उत्थान और हक़ के लिए अडिग रहते हुए ज़िन्दगी गुज़ारने वाले उस इस्लाम से दूर रखें जो जिहादे अकबर यानी बड़े जिहाद की बात करता है। आज इनका मार्ग आखि़र कोई क्योंकर अपनाएगा जबकि इन्होंने दुनिया के सबसे बड़े ज़ालिम पैदा किए जिन्हें ज़रा भी झिझक नहीं होती किसी बच्चे की ओर बंदूक़ करके गोली चला देने में या किसी पत्रकार का सिर खंजर से काट देने में। यह इस्लाम के वे खुदसाख़्ता प्रचारक हैं जिन्होंने इस्लाम की छवि को ख़राब करने में सबसे बड़ा रोल निभाया है। इन्होंने न केवल दूसरों का जीना दूभर कर दिया है बल्कि आम सीधे साधे मुसलमानों की राह में भी परेशानियां खड़ी कर दी हैं।

हालांकि क़तर, कुवेत और सऊदी अरब जैसे देशों ने इन आतंकवादियों से दूरी बना ली है और इनकी निंदा करते नज़र आते हैं लेकिन कितने ही वीडियो ऐसे देखने को मिल जाते हैं कि कोई शेख इन आतंकवादियों को फंड करता नज़र आ रहा है या इनकी हिमायत में खड़ा है। अधिकांश मुसलमान इन आतंकवादियों के आचरण और किरदार को सही नहीं ठहराते पर इनके पास क्योंकि बंदूक़ और दौलत का बल है, इससे अन्य डर कर चुप्पी साध लेते हैं। अवतार मौहम्मद और अन्य अहलेबैत के मार्ग पर ये चुप्पी साधने वाले मुसलमान भी पूरी तरह से नहीं चल रहे क्योंकि हुसैन ने साफ शब्दों में कहा कि जुल्म के खि़लाफ आवाज़ नहीं उठाना या कम से कम उससे बेज़ारी यानी दूरी न दिखाना, स्वयं जुल्म करने के बराबर है। यदि मुसलमान हक़ीक़त में सिर्फ अल्लाह से डरते होते और उसकी मौहब्बत में अपने कर्म कर रहे होते, जैसा कि अवतार मौहम्मद ने बताया और सिखलाया था, तो दुनिया में हो रहे हर जुल्म और नाइंसाफी के खि़लाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करते दिखाई देते, चाहे वह हिन्दु पर हो रहा हो या मुसलमान पर, यहूदी पर हो रहा हो या ईसाई पर।

कड़वा सच यह है कि हज़ारों बेगुनाह इंसान, चाहे वे मुसलमान हों या ईसाई या किसी अन्य धर्म के मानने वाले हों, आईएसआईएस, अलक़ाएदा और ऐसी अनेक दूसरी आतंकवादी संगठनों के हाथों बेदर्दी से मारे जा चुके हैं। यह सब कुछ किया जा रहा है इस्लाम और अवतार मौहम्मद के नाम पर। इन संगठनों ने जुल्म और बरबरियत का जो नंगा नाच रचाया है, वह भी एक अहम सबब है कि पश्चिमी देशों ने इस्लाम और अवतार मौहम्मद को ही बुरा कहना और समझना शुरू कर दिया है।

क्या यह सब कहने का मक़सद यह है कि मुसलमानों के कुछ गुटों द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद और बरबरता का कोई समाधान नहीं है? क्या सारा इल्ज़ाम अवतार मौहम्मद और उनके दीन पर आना सही है? हम आपको अवतार मौहम्मद की एक और भविष्यवाणी सुनाते हैं जो बताती है कि इस सारी बरबरता और क्रूरता के पीछे क्या गुमराही है?

अपनी ज़िन्दगी में अवतार मौहम्मद ने कई बार कहाः मैं तुम्हारे बीच दो वज़नी चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक अल्लाह की किताब और दूसरे अहललबैत; यदि इनसे जुड़ाव बनाए रखोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे, यहां तक कि मुझ से हौज़े कौसर पर - स्वर्ग में - न आ मिलो’। उन्होंने कहाः ‘अली और मैं एक नूर के दो टुकड़े हैं।’ कहीं पर उन्होंने कहा कि ‘अली कुरान के साथ है और कुरान अली के साथ।’ कभी कहा कि ‘फातिमा स्वर्ग की औरतों की सरदार हैं’ और कभी कहा कि ‘अली स्वर्ग के मर्दों के सरदार हैं।’ हसन और हुसैन के लिए कहा कि यह दोनों स्वर्ग के जवानों के सरदार हैं। 

यहां पर याद दिलाते चलें कि मौहम्मद, अली, फातिमा, हसन और हुसैन को मुसलमान पंजेतन पाक के नाम से याद करते हैं यानी वे पांच हस्तियां जो पाक हैं, जिन का बड़ा रूतबा है। आगे बढ़ने से पहले आप को छंदोग्या उपनिषद का एक अंश दिखाते हैं जो पांच हस्तियों की बात कर रहा है और इन्हें स्वर्ग में हमारे दाखि़ले का ज़िम्मेदार बता रहा हैः

Chhandogya Upanishad, III.13.6:

They indeed, who are these five persons of Brahman (the Absolute God), are the door-keepers of the heavenly world. He who thus knows these five persons of Brahman, as the door-keepers of the heavenly world, a hero is born in his family. He who knows thus these five persons of Brahman, as the door-keepers of the heavenly world, attains the heavenly world.

क्या आज हिन्दु किन्हीं पांच हस्तियों को जानते हैं जिनके बिना स्वर्ग में जाना मुमकिन नहीं?

अवतार मौहम्मद के उपरोक्त कथन से साफ है कि यदि मुसलमान इन दोनों वज़नी चीज़ों में से एक को भी छोड़ देंगे तो वे गुमराह हो जाएंगे। ऐसा इसलिए था कि ये अहललबैत ही कुरान की सही समझ रखते थे। केवल इनके दर से ही मुसलमान हक़ के रास्ते को समझ सकते थे। लेकिन मुसलमानों ने अहललबैत का दामन ऐसा छोड़ा कि हर सप्ताह, तमाम इस्लामी दुनिया की प्रत्येक मस्जिद से, हर जुमे के ख़ुतबे में, उन्हें बुरा कहा जाता था और मुसलमान यह सब सुनते थे या सुनने पर विवश थे। 

समय के हुकमरानों ने हर मुमकिन कोशिश की कि अहललबैत को मुसलमानों से काट दिया जाए, मुसलमान उनसे न मिलें और न ही उनसे शिक्षा ग्रहण करें। उन्हें कै़द में या नज़रबंद रखा और जहां मौक़ा मिला उन्हें शहीद करवा दिया। 

इतिहास ने हज्जाज जैसे ज़ालिम का नाम भी अपने पन्नों में दर्ज किया जो अहललबैत के चाहने वालों को क़त्ल करने पर घमंड करता था। कहते हैं कि उसने स्वयं अपने हाथों से अहललबैत के 70000 चाहने वालों का गला काटा। यही हज्जाज था जिसने अपने दामाद मौहम्मद बिन क़ासिम को भारत पर हमला करने के लिए भेजा। न हजजाज का कोई धर्म था और न उसके दामाद का जो अपने ससुर के कुकृत्यों पर भी आंखे बंद किए था। इन गुमराह मुसलमानों और उनकी फौजों के कारण भारत में भी अनगिनत हिन्दुओं को बेवक़्त मौत का सामना करना पड़ा।

इतिहास ने देखा कि ज़माने के सबसे क्रूर, सब से ज़ालिम इंसान जो मुसलमानों ने दिए वह वे थे जो अहललबैत का दामन छोड़े हुए थे। आज भी विश्व के तमाम मुसलमान जानते हैं कि उनमें केवल एक ही पंथ ऐसा है जिसने तमाम आतंकवादी दिए हैं। आप को यह जानकर हैरत नहीं होनी चाहिए कि मुसलमानों का केवल यही पंथ ऐसा है जो अहललबैत के रोल और अहमियत को ज़रा भी मानता। बल्कि खुलकर उनका विरोध करता है, जो लोग अहललबैत का नाम लेते हैं उनको बुरा भला कहता है बावजूद इसके कि कुरान इनका उल्लेख कर रहा है और इन्हें पाक और गुनाहों से दूर बता रहा है। 

Quran.33.33:

Verily, verily God intendeth but to keep off (not allowed even to approach) from you (every kind of) uncleanliness O ye Ahlulbayt, and purify you with a thorough purification.

साफ है कि मुसलमानों ने यदि आतंकवाद की राह पकड़ी है तो वह अवतार मौहम्मद और कुरान का मार्ग त्याग कर पकड़ी है। 

प्रश्न यह उठता है कि अहललबैत से इस दुश्मनी का क्या कारण है? जबकि हम अपने लेखों में दिखाते आ रहे हैं कि खुदा तक पहुंचने का एक ही सीधा मार्ग है। अवतार मौहम्मद के कथनुसार अहललबैत ही अल्लाह की वह रस्सी है जिसे मज़बूती से थामना है ताकि मोक्ष यानी निजात का मार्ग प्रशस्त हो सके। उपनिषदों में भी रस्सी का शब्द विभिन्न स्थानों पर आया है पर हिन्दुओं के लिए समझना मुश्किल था कि वह रस्सी कौन सी है और किस की ओर इशारा करती है।

अब आप समझे अहललबैत से दुश्मनी क्यों? अहललबैत मोक्ष का मार्ग प्रदान करने वाले हैं। यही वेद के देवता हैं। यही मारूत, यही रूद्र, यही अश्विन, यही मनु हैं। यही नूरानी या रूहानी रूप में बाईबल के कपअपदपजपमे हैं; वे 7 नूरानी रूह हैं जो मानव कल्याण हेतु उसका मार्गदर्शन करती हैं। यही अपने दिव्य रूप में गीता के सप्तऋषि हैं। इनको ही सत्यमार्ग की ओर हिदायत करने की ज़िम्मेदारी दी गई है। 

अहललबैत की जीवनी पढ़े तो साफ है कि जिन ऊंचाईयों तक इंसान और इंसानियत पहुंच सकते हैं वे उसके चरमबिन्दु हैं। यदि नूरानी हस्तियां हर ज़माने में हिदायत देने की ज़िम्मेदार रहीं तो जुलमत ने हर ज़माने में इंसान को पथ से भ्रमित किया। हर ज़माने में जुलमत को ख़तरा है तो इस बात का कि लोग नूर के मार्ग को पहचान कर हिदायत न पा जाएं और अधिकाधिक लोग मोक्ष के मार्ग को न अपनाने लगें। इसलिए जुलमत ने हर ज़माने में अपने कारिंदों को छोड़ दिया इन हस्तियों को बदनाम करने के लिए। इंद्र देव, जो हक़ीक़त में मौहम्मद ही हैं, उन्हें भी ऐसे दिखाया जैसे मदिरा पिए बस राग रंग की महफिलों में अपसराओं में डूबे रहते हैं। अवतार मौहम्मद की जो तस्वीर पुस्तिका के लेखक ने पेश की है वह उससे ज़रा भी भिन्न नहीं जो तमस यानी जुलमत ने इंद्रदेव की तस्वीर पेश कर रखी है। तमस यानी जुलमत के पास एक समान हथ्यार रहे हैं हर ज़माने मेें। वह इस बात को बखूबी जान रही है, आप और हम नहीं जानते!

क्या आप को आज तक किसी ने बताया है कि अवतार मौहम्मद ने जहां आने वाले समय के लिए बहुत सी अन्य भविष्यवाणियां की हैं वहीं उन्होंने इन आतंकी संगठनों के बारे में भी अनेक भविष्यवाणियां कर दी थीं जो 1200 साल पहले छपी मुसलमानों की किताबों में आज भी मौजूद हैं। यह आतंकी संगठन भले ही खुद को कितना ही इस्लाम से जोड़ पर पेश करें परन्तु अवतार मौहम्मद ने इनको ख़्वारिजी या ख़ारजी कहा है, यानी वे लोग जो इस्लाम से बाहर निकल गए और इनको मार डालने तक का हुक्म दिया है। गौरतलब है कि यह सारी भविष्यवाणियां आखि़री समय में इमाम मेहदी अर्थात कलकी अवतार के आने से पहले के हालात बताते हुए की गईं।

आईए, पहले पढ़ें कि अवतार मौहम्मद ने ख़ारजी लोगों के बारे में क्या भविष्यवाणी की हैंः-

सहीह बुख़ारी की किताब इस्तेनबातुल मुरतदीन वल मुआनेदीन व कतआलोहुम, चैप्टर ‘कतलुल ख़वारिज वल मुलहेदीन बाद इकामतुल हुज्जत’ 6ः 2539 में और सही मुस्लिम, किताबुज़ ज़कात, चैप्टर ‘अल-तहरीज अलल कत्लुल ख़वारिज, 2ः746’ में पैग़म्बर मौहम्मद ने ख़ारजियों यानी ख़्वारिज के बारे में भविष्यवाणी की है कि ‘यह कमसिन लड़के होंगे।’ इससे साफ है कि जोशीले नवजवानों को जिन्हें दीन और       धर्म की कोई समझ नहीं, उन्हें गुमराह किया जाएगा इस्लाम के नाम पर।

यही हदीस इन ख़्वारिज के बारे में लिखती है कि यह ‘दिमागी तौर पर नापुख़्ता होंगे’ यानी यह अक़ल नहीं रखते होंगे। 

सहीह बुख़ारी की किताबुल मग़ाजी 4ः1581 और सहीह मुस्लिम की किताबुज़ ज़कात के चैप्टर ‘जिकरूज़ ख़वारिज व सिफातेहिम’  2ः742 में इनके बारे में लिखा है कि ये ‘घनी दाढ़ी रखेंगे।’ इसी हदीस में इनके बारे में लिखा है कि ये ‘बहुत ऊंचा तह बंद बांधने वाले होंगें’ अर्थात टख़नों से ऊपर पैजामे पहनेंगे।  

इसी तरह सहीह बुखारी की किताबुत तौहीद में है कि ‘‘यह ख़ारजी लोग पूरब की जानिब से निकलेंगे।’’

जो लोग यह समझते हैं कि इनको मार कर ख़त्म किया जा सकता है उनके लिये भी भविष्यवाणी है। सुनन निसाई में पैग़म्बर मौहम्मद की भविष्यवाणी है कि ‘‘ये हमेशा निकलते ही रहेंगे यहां तक कि इनका आखि़री गिरोह दज्जाल के साथ निकलेगा।’’ इससे साफ हो जाता है कि यह सबसे ख़राब लोग होंगे जो इमाम मेहदी यानी कलकी अवतार के विरूद्ध भी लड़ने को निकलेंगे। इनसे लड़ने और इनको मार डालने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं क्यों कि यह अक़ल रखने वाले लोग नहीं होंगे। लेकिन प्रश्न होता है कि इनसे लड़ेगा कौन? उसी को तो लड़ना चाहिए जो रूहानियत के मार्ग पर चलते हुए कुरबानियां देने को तैयार हो? या वह लड़ेगा जिसका रूहानी लेवल इन जैसा ही पस्त है? 

सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में इन ख़्वारिज के बारे में लिखा है कि ‘‘ईमान इन के हलक़ - गले - से नीचे नहीं उतरेगा।’’ इसी तरह किताब अबू मसनद में है कि ‘‘वह इबादत और दीन में बहुत मुतशद्दिद और इंतेहापसन्द होेंगे।’’ यानी इबादत बहुत करेंगे लेकिन इबादत का मक़सद नहीं समझेंगे इसलिए गुमराह होंगे।

सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की एक और हदीस बताती है कि हालांकि हम उन्हें इस्लाम के उसूलों पर चलता हुआ समझेंगे लेकिन इनका इस्लाम से कोई नाता नहीं होगा। लिखा हैः ‘‘तुम में से हर एक इनकी नमाज़ों के मुक़ाबले में अपनी नमाज़ों को हक़ीर - तुच्छ - जानेगा और इनके रोज़ों के मुकाबले में अपने रोज़ों को हक़ीर जानेगा।’’ 

सहीह मुस्लिम में है कि पैग़म्बर मौहम्मद ने कहा कि ‘‘नमाज़ इनके हलक़ से नीचे नहीं उतरेगी।’’ 

सहीह मुस्लिम यह भी लिखती है कि ‘‘वे कुरान मजीद की ऐसे तिलावत करेंगे कि उनकी तिलावते कुरान - कुरान पढ़ने के तरीक़े -  के सामने तुम्हें अपनी तिलावत की कोई हैसियत दिखाई न देगी।’’ 

सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम यह भी लिखती है कि ‘‘इनकी तिलावत - कुरान पढ़ना - इनके हलक़ - गले - से नीचे नहीं उतरेगी।’’ यानी कुरान में क्या लिखा है यह समझ भी न पाएंगे। 

सहीह मुस्लिम कहती है कि ‘‘वे यह समझ कर कुरान पढ़ेंगे कि उसके अहकाम उनके हक में हैं लेकिन दरहकीकत वही कुरान उनके खि़लाफ हुज्जत होगा।’’ यानी कुरान ही उनके ग़लत राह पर होने की दलील देगा। 

किताब सुनन इब्ने दाऊद में भविष्यवाणी है कि ‘‘वे लोगों को किताबुल्लाह - अल्लाह की किताब यानी कुरान - की तरफ बुलाएंगे लेकिन कुरान के साथ उनका कोई ताल्लुक़ - संबंध - नहीं होगा।’’

सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम कहती है कि ‘‘वे - देखने में - बड़ी अच्छी बातें करेंगे।’’ 

इसी तरह तिबरानी में लिखा है कि ‘‘उनके नारे और दिखावटी बातें दूसरे लोगों से अच्छी होंगी और मुतास्सिर करने वाली होंगी।’’ 

लेकिन सुनन इब्ने दाऊद उनके बारे में लिखती है किः ‘‘मगर वे किरदार - चरित्र - के लिहाज से बड़े ज़ालिम, खूंख्वार और घिनौने लोग होंगे।’’ 

सहीह मुस्लिम भी उनके बारे में पैग़म्बर मौहम्मद की भविष्यवाणी करती है कि ‘‘वे तमाम मख़लूक - जीवों - से बदतरीन - सब से ख़राब - लोग होंगे।’’

ख़्वारिज यानी ख़ारजियों के बारे में भविष्यवाणी करते हुए किताब सुनन इब्ने अबी आसिम में लिखा है कि ‘‘वे हुकूमते वक़्त ;अपने ज़माने की हुकूमतोंद्ध या हुक्मरानों के खि़लाफ खूब तानाज़नी करेंगे और उन पर गुमराही व ज़लालत का फतवा लगाएंगे।’’ क्या यह सही नहीं है कि ये ख़्वारिज दुनिया की विभिन्न हुकूमतों के खि़लाफ गुमराही के फतवे लगाते हैं?

सहीह बुख़ारी की किताबुल मनाक़िब और सहीह मुस्लिम कि किताबुज़ जकात इन ख़्वारिज के बारे में बताती है कि ‘‘वे उस वक़्त मंज़रे आम पर - यानी हमारे सामने - आएंगे जब लोगों में तफरेक़ा और इख़्तेलाफ पैदा हो जायेगा।’’ 

सहीह मुस्लिम और सहीह बुख़ारी यह भी कहती है कि ‘‘वे मुसलमानों को क़त्ल करेंगे और बुत परस्तों को छोड़ देंगे।’’ यह भविष्यवाणी भी सही हो चुकी है क्योंकि इन्होंने सीरिया, इराक़, पाकिस्तान आदि हर देश में अधिकतर मुसलमानों को ही क़त्ल किया है। अम्नपसन्द मुसलमानों का खून बहाना ये जाएज़ समझते हैं और उनके काफिर होने का फतवा लगाते हैं यहां तक कि मस्जिदों में भी खून बहाने से नहीं चूकते जबकि कुरान में साफ आयतें मौजूद हैं उन लोगों के बारे में जो अल्लाह की इबादत करने वालों के मार्ग में रूकावटें पैदा करें। 

सहीह मुस्लिम यह भी कहती है कि ‘‘वे नाहक़ खून बहाएंगे’’ यानी बेगुनाहों का खून बहाएंगे।

आयशा ने अवतार मौहम्मद से सुन कर ख़्वारिज के बारे में हदीस ब्यान की है जो किताब मुस्तदरक में आज भी मौजूद है कि ‘‘वे राहज़न - लुटेरे - होंगे, नाहक़ - बेगुनाहों का - खून बहाएंगे जिस का अल्लाह तआला ने हुक्म नहीं दिया और ग़ैर मुस्लिम अक़लियतों - दूसरे धर्म पर चलने वाले अल्पसंख्यकों - के क़त्ल को हलाल समझेंगे।’’ जिस तरह इन आतंकवादियों ने दूसरे धर्म पर चलने वालों का बेरहमी से क़त्ल किया है और इनके आतंकवाद की जड़े भारत तक में आ गई हैं इससे यह बात साबित हो जाती है कि अवतार मौहम्मद को 1400 वर्ष पहले इनकी करतूतों की जानकारी थी और पता था कि इनकी करतूतों को इस्लाम से जोड़कर देखा जाएगा इसलिए उन्होंने उसी समय इनके बारे में भविष्यवाणी कर दी थी।

किताब तबरी में इब्ने अब्बास अवतार मौहम्मद की ख़्वारिजों के बारे में हदीस यानी कथन बताते हैं कि ‘‘वे कुरान की मोहकम आयात पर ईमान लाएंगे जबकि उसकी मुश्तबेहात के सबब हलाक होंगे।’’ ‘मुश्तबेहात’ यानी वे आयतें जिनके लोग अनेक मायनी निकालते हैं; बहुत से लोग इन आयतों से अपने कुकर्मों को जाएज़ ठहराने की कोशिश करते हैं। यह वही करेगा जिसके पास अस्ल कुरान की समझ नहीं है यानी वह जिसने उन हस्तियों का दामन छोड़ दिया है जिनको कुरान की सही समझ थी। कुरान में हलाक होने का अर्थ रूह यानी आत्मा का उस पस्ती तक गिरना है जहां पहुंच कर इंसान भले ही ज़िन्दा हो पर मरे हुओं के बराबर हो जाता है। इसी हलाक होने की बात गीता में कृष्ण के मुख से हो रही है जब सामने युद्ध में लड़ने आने वालों के लिए वह कहते हैं कि ये तो पहले से मरे हुए लोग हैं, यदि अर्जुन उनका वध करेंगे तो महज़ एक औपचारिकता होगी। 

अली का कथन भी सहीह मुस्लिम में दर्ज है जिसके अनुसार ‘‘वे ज़बानी कलामी हक़ बात कहेंगे, मगर वह उनके हलक़ से नीचे नहीं उतरेगी।’’ इसके मायनी यह हुए कि वे भले ही अच्छी बातें बोलते दिखाई देंगे लेकिन वे स्वयं उन पर नहीं चल रहे होंगे।

अवतार मौहम्मद की एक और हदीस भी सहीह बुख़ारी में मौजूद है जिसके अनुसार ‘‘वे कुफ्फार के हक़ में नाज़िल होने वाली आयात को मुसलमानों पर नाफिज़ करेंगे। इस तरह वे दूसरे मुसलमानों को गुमराह, काफिर और मुश्रिक क़रार देंगे ताकि उनका नाजायज़ कत्ल कर सकें।’’ यह तो जगज़ाहिर है कि ये ख़ारजी लोग मुसलमानों के दूसरे फिरक़ों जैसे कुर्द, शियों, सुन्नियों आदि का क़त्ल करना जाएज़ क़रार देते हैं। 

अफसोस की बात यह है कि इन आतंकवादियों के बारे में अवतार मौहम्मद की हदीसें और भविष्यवाणियां मुसलमानों की सबसे भरोसेमंद समझी जाने वाली किताबों में भरी होने के बावजूद अधिकतर मुसलमान इन आतंकवादियों को बुरा नहीं कहते शायद इसलिए कि मारे जाने वाले उनके अपने नहीं है या इसलिए कि इनके बारे में बोलने से डरते हैं। ऐसे मुसलमानों के बारे में भी अहललबैत का कथन है कि यदि तुम किसी भी बेगुनाह पर जुल्म होते देखो और जुल्म के खि़लाफ आवाज़ नहीं उठाओ तो तुम मुसलमान नहीं हो। अवतार मौहम्मद ने यह नहीं कहा कि मुसलमान के खि़लाफ जुल्म होते देखो तो आवाज़ उठाओ बल्कि बेगुनाह इंसान कहा है। 

लिखते लिखते शब्द ‘काफिर’ आ गया तो कहीं यह न समझने लग जाईएगा कि यह हिन्दुओं या यहूदियों या ईसाईयों में से किसी की बात हो रही है। आगे हम बताएंगे कि ‘काफिर’ दरअस्ल कौन है। लेकिन अभी अवतार मौहम्मद की इस संदर्भ में और भविष्यवाणियां देखते हैं।

ख़्वारिज के बारे में सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम दोनों किताबें अवतार मौहम्मद का कथन लिखती हैं कि ‘‘वह दीन से यूं ख़़ारिज हो चुके होंगे जैसे तीर शिकार से ख़ारिज हो जाता है।’’ इससे भी साफ हो जाता है कि ये आतंकवादी पथभ्रष्ट होंगे और इस्लाम से इनका कोई रिश्ता नहीं होगा भले ही ये चिल्ला चिल्ला कर अपने आप को मुसलमान कहें। 

आगे देखिए पैग़म्बर मौहम्मद क्या कहते हैं! इनसे लड़ना भी तुम्हारे लिये अच्छा है, इन्हें क़त्ल करना भी अच्छा है और इनके हाथों यदि क़त्ल हो गए तो वह भी तुम्हारे लिये अच्छा है क्योंकि इनके हाथों मरने वाला शहीद होगा। किताब सहीह मुस्लिम कहती है कि ‘‘इनके क़त्ल करने वाले को अजरे अज़ीम मिलेगा’’ यानी जो इन्हें कत्ल करेगा उसको अल्लाह की तरफ से इनाम मिलेगा। 

सुनने तिरमीज़ी कहती है कि ‘‘वह शख़्स - आदमी - बेहतरीन मक़तूल - शहीद - होगा जिसे वे क़त्ल कर देंगे।’’ 

किताब सुनन तिरमीज़ी ख़ारजियों के बारे में कहती है कि ‘‘वे आसमान के नीचे बदतरीन मकतूल होंगे’’ यानी सब से ख़राब जीव जिनको क़त्ल किया जाना चाहिए। सुनन तिरमीज़ी यह भी लिखती है कि ‘‘बेशक वे - ख़्वारिज - जहन्नुम के कुत्ते होंगे।’’

कुरान कहता है कि अल्लाह अपने बन्दों के लिए साफ साफ शब्दों में आयतें नाज़िल करता है। अल्लाह के रसूल मौहम्मद ने भी साफ साफ शब्दों में भविष्यवाणी कर दी कि तुम इन आतंकवादियों के बारे में किसी तरह के शक या मुग़ालते में न गिरफतार हो भले ही ये तुमको बड़े नमाज़ पढ़ने वाले, कुरान पढ़ने वाले और रोज़ा रखने वाले दिखाई दें। 

अवतार मौहम्मद यह भी जानते थे कि तुम इनकी करतूत को इस्लाम और उसकी शिक्षा व तालीम से जोड़ने की कोशिश करोगे इसलिए उन्होंने आखि़री ज़माने तक के लिए यह साफ कर दिया कि इनका इस्लाम से और अवतार मौहम्मद की शिक्षा व तालीम से कोई संबंध नहीं है। 

इन भविष्यवाणियों से एक और बात जो साबित होती है वह यह कि अवतार मौहम्मद का अल्लाह यानी ईश्वर से कोई न कोई संबंध अवश्य था तभी तो ऐसी सटीक भविष्यवाणियां कर पाए। यदि यह भविष्यवाणियां आज से 1200 वर्ष पहले लिखी गई किताबों में मौजूद न होतीं तो आसानी से यक़ीन नहीं होता कि कोई आने वाले समय के कुछ लोगों के आचरण और हरकतों के बारे में इतना विस्तार से बात कर सकता है। जिस तरह उनकी अनेक दूसरी भविष्यवाणियां साबित हो गईं उसी तरह यह भविष्यवाणियां भी हमारे लिये साफ साफ निर्देश हैं। 

End Times के बारे में अवतार मौहम्मद की और भी अनके भविष्यवाणियां हैं। एक रिवायत के अनुसार उन्होंने कहा कि एक समय आएगा जब इस्लाम केवल नाम का रह जाएगा और कुरान केवल एक रस्म बन जाएगा। वे अपनी मस्जिदों को विभिन्न प्रकार से सजाएंगे लेकिन इस्लाम को नहीं पेश कर सकेंगे, उनके उलमा आसमान के नीचे रहने वाले लोगों में से बदतरीन लोग होंगे। बुराई इन उलमा से निकलेगी और इन पर ही लौटेगी। 

इब्ने अब्बास द्वारा ब्यान की गई एक और रिवायत के अनुसार अवतार मौहम्मद ने कहाः ऐ मुसलमानों, तुम यक़ीनन अपनी मस्जिदों को ऐसे सजाओगे जिस तर्ज पर यहूदी और ईसाई अपनी इबादतगाहों को सजाते हैं। यही हो रहा है। मस्जिदों को ऐसा आलीशान बनाया जा रहा है और सजावट से भर दिया गया है कि उन्हें केवल नमाज़ के समय ही खोला जाता है। 

जबकि मेहदी के आने को लेकर भविष्यवाणी हैं कि वह जब आएंगे तो मस्जिदों से सजावट का साज़-ओ-सामान निकाल दिया जाएगा। शायद इसलिए कि वह जगह जहां इंसान अपने अन्दर से अल्लाह से रिश्ता जोड़ने जाता है वहां बाहर की सजावट की आवश्यकता नहीं है। यह इशारा है कि अपने को खुदा की राह का मुसाफिर कहने वाला मुसलमान बाहरी साज़ सजावट का मोहताज हो गया है। ठीक वैसे जैसे अन्य धर्म के मानने वाले भी दुनिया में ग़र्क हैं। 

उपनिषद भी यही बात करते हैं जब वे अपने को आत्मिक उत्थान के मार्ग पर लगाने वाले के लिए कहते हैं कि वह अपनी इंद्रियों को अन्दर की ओर समेटता जाता है, यानी भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा हो कि उसकी इंद्रियां दुनिया से जुड़ी हैं लेकिन वह दुनिया के जुड़ाव से इंद्रियों के मोह को काट कर उन्हें आत्मा से जोड़ देता है। हर इबादत का यही मक़सद है कि इंसान दुनियावी मोह से अपनी आत्मा को समेटते हुए उसे इस सृष्टि के एक रचियता से क़रीब होने के मार्ग पर लगाए। 

एक और रिवायत के अनुसार जब तुम अपनी मस्जिदों को सजाने लगो और कुरान सिर्फ नाम के लिए रह जाए तब तुम अस्ली शिक्षा से दूर पहुंच चुकोगे। 

एक रिवायत कहती है कि जब मस्जिदों में दुनियावी बातों पर बातचीत होने लगे न कि रूहानी मार्ग पर चलने की कोशिशें तो एक मुस्लिम को ऐसे नमाज़ियों के साथ नहीं बैठना चाहिए। 

एक बहुत ही मशहूर रिवायत के अनुसार एक समय ऐसा आएगा जब इस्लाम की अस्ली शिक्षा पर चलना ऐसा होगा जैसे हाथ में आग पकड़ना। 

एक अन्य भविष्यवाणी के अनुसार एक समय ऐसा आएगा कि एक मुसलमान के पास सब से क़ीमती वस्तु उसकी बकरियां होंगी जिनको वह पहाड़ों पर ले जाएगा। इससे भी साफ है कि क़ीमती चीज़ उसका धर्म या ईमान नहीं होंगे बल्कि दुनिया का माल होगा जैसे बकरियां जिनकी उसे अधिक चिंता होगी। 

एक और भविष्यवाणी करते हुए अवतार मौहम्मद ने कहा कि आने वाले समय में बुराईयां ऐसी फैल जाएंगी कि जो बैठा है वह उससे बेहतर होगा कि जो खड़ा है, और जो खड़ा है वह उससे बेहतर होगा कि जो चल रहा है और जो चल रहा है वह उससे बेहतर होगा कि जो दौड़ रहा है। कोई भी जो अपनी नज़रें उठाएगा इन बुराईयों की ओर, बुराईयां उसे पकड़ लेंगी। उन्होंने कहा कि उस ख़राब समय में सब से बेहतरीन कर्म खुदा की इबादत के सिवा कुछ नहीं होगा। 

उन्होंने तो यहां तक कहा कि एक समय ऐसा आएगा जब धर्म के दुश्मन एकजुट हो कर जमा होंगे ताकि मुसलमानों को क़त्ल करें ऐसे जैसे खाने के गिर्द जमा होते हैं। किसी ने पूछा कि क्या हम संख्या में कम होंगे उस समय? उन्होंने उत्तर दिया कि तुम बहुत अधिक संख्या में होगे लेकिन उस घास की तरह होगे जो हवा में उड़ जाती है। यह भविष्यवाणी भी सही साबित होती नज़र आ रही है जब हम देखते हैं कि विभिन्न धर्मों के मानने वाले मुसलमानों को ज़मीन पर सब से हिंसक और बुरे लोगों में देखते हैं। उनके द्वारा की जा रही रब की इबादत पर पाबंदी लगाने के लिए लोग इकट्ठा होते हैं और अन्य ख़ामोश तमाशाई बने बैठे रहते हैं। यह हम उस समय से कितना दूर आ गए जब दूसरे धर्म के मानने वाले दिल में यह ख़्वाहिश रखते थे कि मुसलमान फौज आकर उनके देश की हाकिम बन जाए ताकि उन्हें बेहतर ज़िन्दगी जीना नसीब हो। 

एक अन्य भविष्यवाणी में अवतार मौहम्मद कहते हैं कि अंतिम समय में ज्ञान घट जाएगा, अज्ञानता फैल जाएगी, अवैध रिश्तों में बढ़ौतरी हो जाएगी और औरतों की संख्या मर्दों से अधिक हो जाएगी। 

एक अन्य जगह कहा कि अंतिम समय में समय बहुत तेज़ी से गुज़रेगा, सूदख़ोरी फैल जाएगी और जाएज़ और नाजाएज़ आमदनी का अन्तर समाप्त हो जाएगा।

एक अन्य प्रख्यात भविष्यवाणी के अनुसार एक समय आएगा जब मस्जिदों के मिम्बरों पर बंदर बैठेंगे, यानी अज्ञानी नक़लची लोग धर्मगुरू बन जाएंगे। 

अवतार मौहम्मद ने अल्लाह की क़सम खाते हुए कहा कि दुनिया उस समय तक समाप्त नहीं होगी जब तक ऐसा समय नहीं आ जाए कि क़ातिल नहीं जान रहा होगा कि क्यों क़त्ल कर रहा है और क़त्ल होने वाला नहीं जान रहा होगा कि क्यों क़त्ल हो रहा है। किसी ने पूछा ऐसा क्योंकर होगा। उत्तर दिया कि क़त्ल बढ़ जाएंगे क्योंकि अधर्म या बुराई बढ़ जाएगी। क़ातिल और मक़तूल दोनों ग़ल्ती पर होंगे। यह बताता है कि लोग ग़लत कारणों से लड़ेंगे, शायद धर्म के नाम पर, ज़मीन जाएदाद या अन्य दुनियावी लोभ के कारण, जबकि हर कोई अपने को अम्न का सौदागर समझेगा। 

एक अन्य मशहूर भविष्यवाणी के अनुसार उन्होंने कहा कि अंतिम समय में तुम देखोगे कि भेड़ों के चरवाहे ऊंची इमारतों पर फ£र यानी गर्व करते दिखाई देंगे। आज दुनिया की सब से ऊंची इमारतें अरब के उन रेगिस्तानों में बनाई जा रही हैं जहां कभी बद्दू अरब भेड़ें चराया करते थे।

उन्होंने यह भी कहा कि End Times तब आएगा जब नंगे पैर चलने वाले हाकिम बन जाएंगे।

एक स्थान पर उन्होंने कहा कि गूंगे और बहरे हुकमरानी करेंगे यानी हुकमरानों को सच्चाई, इंसाफ और धार्मिकता की ज़रा भी चिंता नहीं होगी। 

एक अन्य स्थान पर कहा कि End Times तब आएंगे जब तुम्हारी क़यादत उनके सुपुर्द होगी जो उसके लिए उपयुक्त नहीं हैं। 

और कहा कि End Times में अच्छे लोग नहीं बचेंगे; केवल बदतरीन लोग रह जाएंगे कूड़े कड़कट के समान और खुदा उनकी चिंता नहीं करेगा। 

एक अन्य रिवायत के अनुसार उन्होंने कहा कि End Times में औरतें नंगी होंगी बावजूद इसके कि उन्होंने कपड़े पहन रखे होंगे। 

उन्होंने उन लोगों की भी भविष्यवाणी की जिन्होंने हाथ में कोड़े ले रखे होंगें और उससे इंसानों को पीटेंगे, जिसका अर्थ हुआ कि लोग अपने हथ्यारों से बेगुनाहों को नुक़सान पहुंचाएंगे। 

अवतार मौहम्मद ने यह भी भविष्यवाणी की कि अंतिम मसियाह मेहदी के आने पर इंसाफ और अम्न का बोलबाला होगा और दुनिया ऐसी नेयमतें देखेगी जैसी कभी भी नहीं देखीं। ज़मीन अपने ख़ज़ाने उगल देगी, हर ओर हरयाली और खुशहाली होगी। 

मेंहदी और कलकी अवतार एक ही शख़्सियत के दो नाम हैं। 

यह तमाम भविष्यवाणियां दिखाती हैं कि अवतार मौहम्मद जानते थे कि उनके मानने वाले गुमराह हो जाएंगे। जो लोग मुस्लमानों की बुराई देखकर इस्लाम पर उंगली उठाते हैं उन्हें जानना चाहिए इस्लाम वह सीधा मार्ग है जो हर ज़माने से है - जो सनातन है - और आवश्यक नहीं कि अपने को मुसलमान कहने वाले उस मार्ग पर चल रहे हों, ठीक वैसे जैसे अपने को वेद की शिक्षा पर चलने वाला समझने वाले गुरू द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और कौरव समय के अवतार से युद्ध पर आ गए, अपने को सबसे बड़ा शिवभक्त मानने वाला रावण राम के सामने युद्ध पर आ गया और अंत में राम के हाथों मारा गया। 

उम्मीद है कि पुस्तिका के लेखक द्वारा उठाए गए तमाम प्रश्नों के उत्तर हम दे पाए। 

एक विषय पर विस्तार से बात करने को हमने कहा था और वह विषय है ‘काफिर’ का। अंत में इस पर बात करना आवश्यक इसलिए है क्योंकि अनेक हिन्दु समझते हैं कि जहां जहां कुरान में शब्द ‘काफिर’ आया है यह उनकी बात हो रही है। बहुतेरे मुसलमान भी आज तक नहीं जानते कि इस शब्द के असली मायनी क्या हैं।

शब्द ‘काफिर’ आते ही हिन्दु आगबगूला हो जाते हैं। उन्हें ऐसे ही समझाया गया है जैसे यह शब्द हिन्दुओं के लिए बनाई गई कोई गाली है। जाहिल मुसलमान हर किसी पर काफिर होने का लेबल थोप देते हैं। हिन्दुओं को तो छोडिए, बड़ी बड़ी दाढ़ी वाले अनेक मुसलमानों की मानें तो वे वह सैक्ट जिसमें यह पैदा हुए हैं उसके बाहर तमाम दूसरे सैक्टस को काफिर कहते हैं। इतनी आसानी से ये जाहिल मुसलमान दूसरों पर काफिर होने का टर्म लागू कर देते हैं। यह इस हद तक है कि बहुत से मुसलमान दूसरे किसी सैक्ट के मुसलमान के घर मंे पानी पीना भी पसंद नहीं करते; किसी दूसरे सैक्ट से जुड़ी मस्जिद में जाना भी पसन्द नहीं करते। मस्जिद अल्लाह की इबादत का घर था; इन्होंने एक दूसरे के मस्जिद में दाखि़ले तक पर पाबंदी लगा दी है।

हक़ीक़त तो यह है कि हमने काफिर शब्द भी गलत समझा है। आज जो सब से बड़ी समस्या है, जैसा कि मुसलमानों के लिए कहा जाता है कि वे दूसरों के लिए ‘काफिर’ शब्द का प्रयोग करते हैं, यह अस्ल में उन मुसलमानों की गलत समझ पर आधारित धारणा के कारण है। इन मुसलमानों ने शब्द ‘काफिर’ को इस्म यानी noun यानी संज्ञा समझा, जबकि हक़ीक़त यह थी कि शब्द ‘काफिर’ विशेषण यानी adjective है, ठीक वैसे जैसे शब्द ‘अल्लाह’ विशेषण यानी adjective है, इस्म यानी  यानी nounसंज्ञा नहीं है। 

जिस किसी में भी वह विशेषता पाई जाए जो काफिर में होनी चाहिए, वही काफिर है। 

मुसलमानों के सामने जब कुरान की आयतें पेश की जाती हैं जिनमें काफिरों को कत्ल करने की बात हो रही है तो वे उन आयतों को समझा पाने मे असक्षम रहते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत सी बातों को सही सही नहीं समझा। अस्ल में कुरान में जब काफिरों को मारने की बात आई है तो वहां भी हमको देखना होगा कि किस संदर्भ में वे आयतें आई हैं। जब हम जान ही नहीं रहे कि काफिर कौन हैं तो फिर किस को मारेंगे?

कुरान क्या कह रहा है हमको देखना होगा। 

Quran.86.15:

They (used for ‘Kafirs’, who disbelieve or reject) are busy making schemes;

बेशक वो (काफिर) पुरफरेब तदबीरों में लगे हुए हैं। 

और 16वीं आयतः

Quran.86.16:

And I am making a scheme.

मैं अपनी तदबीर बना रहा हूँ। 

Quran.86.17:

Let, then, the deniers of the truth (Kafirs) have their will: let them have their will for a little while

पस आप काफिरों को (ज़रा) मोहलत दे दीजिए; (ज़्यादा नहीं बस) उन्हें थोड़ी सी ढील (और) दे दीजिए

यानी इस आयत से शब्द काफिर का जो मतलब निकल रहा है उसके अनुसार काफिर वह है जो तदबीर कर रहा है, आपको फरेब देने की तदबीर, आपको नीचा दिखाने की तदबीर, आप को झूठा साबित करने की तदबीर। जो प्लानिंग कर रहा है आपके खि़लाफ। काफिर हर कोई नहीं हो सकता। जो आप के विरूद्ध तदबीर कर रहा है, स्कीमें बना रहा है, आपको नुक़सान पहुंचाने के लिए।

और तदबीर कौन करेगा? जो जान रहा है कि हक़ क्या है और झुठला रहा है वह काफिर है। शब्द काफिर का जो मैं मतलब समझ पाया हूँ, जो हर जगह जहां काफिर शब्द आया है वहां फिट हो रहा है वह यह कि जिसने हक़ को पहचान लिया और हक़ को पहचानने के बाद उसने उसे झुटलाया, या उसने हक़ के नुमाईंदों के खि़लाफ साज़िशें कीं और या उनसे लड़ने को आ गया, वह कुरान की नज़र में काफिर है। यदि यह अर्थ नहीं है तो बस यह है कि जो भी समय के अवतार के सामने, जो हक़ का सबसे बड़ा नुमाईदा है, युद्ध को आ जाए। ज़ाहिर है जो ऐसा करेगा वह तमस यानी जुलमत का मोहरा होगा और उसके लिए काम कर रहा होगा। 

अब ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाएगा। जो पुर फरेब तदबीरें कर रहा है, और आप को नेस्त-ओ-नाबूद करने की तदबीरें कर रहा है, यानी आप का नाम-ओ-निशान मिटाने पर तुला हो? क्या आप ये चाहते हैं कि अल्लाह मुसलमानों से कहे कि जो तुम्हारे खिलाफ तदबीरें कर रहा है, स्कीम्स बना रहा है, तुम सिर झुका लो और सब कुछ अल्लाह या क़िसमत पर छोड़ दो।  

Quran.47.4:

So when you meet those who are who disbelieve (Kafirs) in war, smite at their necks (without giving them the opportunity to defeat you). At length when you have sufficiently suppressed them (without continuing fighting), bind a firm bond of captivity on them. Then set them free either as a favour without demanding anything in return, or for ransom (which may consist of a reciprocal exchange of prisoners of war), so that the war may lay down its burdens (and come to an end). That (is God’s command). Had God so willed, He would certainly exact retribution from them (Himself), but (He orders you to fight) in order to try you by means of one another. As for those who are killed in God’s cause, He will never render their deeds vain.

जो आयतें युद्ध को लेकर कुरान में आई हैं वे भी चीख़ चीख़कर कह रही हैं कि कुरान अम्न और सलामती का मज़हब है। उपरोक्त आयत भी एकदम साफ अम्न और शांति की ही बात कर रही है, हालांकि यह वो आयत है जो काफिरों की गर्दन काट देने की बात कर रही है। 

ज़रा ध्यान से देखिएः जो लोग तुम्हारे खि़लाफ साज़िशें कर रहे हैं, तुम्हें कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं, और तुम उन पर हमलावर नहीं हुए बल्कि वे लश्कर ले कर युद्ध में लड़ने आ गए, तो तुम क्या चाहते हो कि कुरान कहता कि जब उन से युद्ध में मिलो, तो मुसल्ले बिछा कर नमाज़ पढ़ो क्योंकि अल्लाह की इबादत से बड़ी कोई इबादत नहीं है, या तुम यह चाहते हो कि कुरान कहता कि जब वे जो तुम्हारे खि़लाफ साज़िशें कर रहे हैं और तुम पर हमलावर हुए हैं तो तुम दुआ मांगो और अल्लाह फरिश्ते भेज देगा लड़ने के लिए। या यह कहता कि वहां से भाग जाओ? क्या तब तुम को लगता कि इस्लाम अम्न की बात कर रहा है? 

तुम उस समय भी इस्लाम पर यह कहते हुए आरोप लगाते कि इस्लाम कायरता का मज़हब है और देखो गीता में कि कैसे कृष्ण अर्जुन को धर्मयुद्ध में लड़ने की शिक्षा दे रहे हैं, मर जाओ या मारे जाओ तुम्हारे लिए कामयाबी है। 

कृष्ण अर्जुन के लिए साफ कह रहे हैं कि यदि तुम मारे जाओ तो यह तुम्हारे लिए सीधे स्वर्ग में दाखि़ले की ज़मानत है, लेकिन कुरान यदि धर्म युद्ध में मारे जाने पर स्वर्ग में जाने की बात करता है तो तुम कहते हो कि अल्लाह लड़ाई का लोभ दे रहा है। 

आओ देखो गीता के कुछ अंश जिसमें कृष्ण अर्जुन को तैयार कर रहे हैं सामने मौजूद फौज को क़त्ल देने के लिए, जिसमें न सिर्फ अर्जुन के क़रीबी रिश्तेदार और दोस्त थे बल्कि हज़ारों ब्राहमिण और कुछ बहुत ही नामवर धर्मगुरू थे।

Gita.II.2:

Sribhagavan uvacha [Krishna said]: 

In (the midst of this) difficulty whence comes to you this dejection, typical of non-Aryans (anarya), heaven-barring and disreputable, O Arjuna?

Gita.II.3:

Give not yourself to impotence, O Partha (Arjuna). It does not befit you. Cast off this base faintheartedness; arise, O Terror of Foes!

Gita.II.31:

Further, looking to your own duty you should not waver, because there is nothing more welcome to a Kshatriya than righteous war. 

Gita.II.32:

Happy the Kshatriyas who obtain such a fight that comes unsought as an open door to Heaven. 

Gita.II.35:

But if you will not wage this righteous warfare, then casting away your duty and honour, you will incur sin. 

Gita.II.34:

People will ever recount your infamy, to one highly esteemed dishonour is surely worse than death. 

Gita.II.37:

Slain, you will obtain heaven; victorious, you will enjoy the earth. Therefore stand up, O son of Kunti, resolved to fight. 

Gita.II.38:

Taking as equal pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat, engage yourself in battle. Thus you will incur no sin. 

Gita.II.11:

Krishna said:

You are sorry for those with whom sorrow is unreasonable. You speak in terms of reason too. Veritable philosophers (pandits) are not affected in regard to those whose breath has gone and those whose breath has not gone.

Gita.II.19:

He who thinks This as the killer and he who thinks This as killed – both these know not. This does not kill; is not killed.

Gita.II.20:

This is neither born nor does This die, nor having once come into being, cease to become any more: Unborn, perpetual, eternal is This Ancient One. It is not killed on the killing of the body.

Gita.II.21:

About him who knows This as the indestructible, the ever-lasting, the unborn, never-decreasing one (of) such a person how could (the questions) ‘whose death he causes’, ‘whom he kills’ (arise) O Partha (Arjuna)?

Gita.II.22:

As a man casting off his worn-out garments assumes others that are new, likewise casting off bodies that are worn-out, the embodied one takes to others that are new.

Gita.II.23:

Weapons do not cut This, fire does not burn This and water does not wet This; wind does not dry This:

Gita.II.24:

Indeed It is uncleavable; It is non-inflammable; It is unwettable and non-dryable also; everlasting, all-pervading, stable, immobile; It is eternal. 

Gita.II.25:

Undefined is It, unthinkable is It, as non-subject to change is It spoken of: therefore, knowing It as such, there is no reason for you to feel sorry for It.

Gita.II.26:

Or again if you should hold This to be constantly-ever-born or as constantly-ever-dying, even then O Mighty-Armed (Arjuna) you have no reason to regret it.

Gita.II.27:

In respect of anyone born, death is certain, and certain is birth likewise for anyone dead; therefore regarding something inevitable, you have no reason to feel any regret.

Gita.II.28:

Beings have an unmanifested origin and manifested middle states, O Bharata (Arjuna), and again unmanifested terminations. Where is room for plaint herein?

Gita.II.30:

This embodied One within the bodies of all is ever immune to killing. O Bharata (Arjuna). Therefore in respect of any being you have no reason for regretting. 

Gita.II.31:

Further having regard also for the pattern of behaviour natural to you (svadharma) there is no reason for vacillation, for there could be nothing more meritorious than war that is right for a true fighter (kshattriya).

Gita.II.32:

True warriors (kshattriyas) have reason to be happy too, O Partha (Arjuna) to have the chance of such a war presenting itself unsought before them as an open door to heaven.

Gita.II.33:

If, on the other hand, you will not take to this battle which conforms to the requirements of righteousness, then thwarting what is consistent with your own nature and your good repute you will become involved in evil.

Gita.II.34:

Living beings will also pronounce a never-ending verdict of calumny on you, and to one used to honour, dishonour is worse than death.

Gita.II.35:

The great car-generals will look upon you as quitting the battle from fear and having been honourably looked upon by them you will be held in derision.

Gita.II.36:

Those against you will speak of you in unspeakable terms, scorning your ability; what pain could there be keener than this?

Gita.II.37:

Dying you will attain heaven or winning you will have the enjoyment of the earth. Therefore arise, O Kaunteya (Arjuna), making up your mind to fight.

Gita.II.38:

Equalizing both pleasure and pain, both gain and loss, both victory and defeat, enter wholly into battle. Thus you will avoid sin.

आप ने देखा कि कैसे कृष्ण तरह तरह से अर्जुन को समझा रहे हैं कि क्यों सामने वालों को मारना आवश्यक है जबकि गीता के प्रारंभ में अर्जुन अनेक कारण बताते हैं कि क्यों उनका लड़ना ग़लत है। कृष्ण ने अर्जुन को ऐसे कारण बताए कि अर्जुन लड़ने को तैयार हो गए।

बाईबल में भी जगह जगह दाऊद और सुलेमान जैसे नबियों के युद्ध करने और मारने काटने के क़िस्से मौजूद हैं। जैसा मैं दिखा रहा हूँ परमात्मा का अवतार आता ही है धर्म को स्थापित करने और अधर्म का नाश करने। यदि इस्लाम पर हिंसक होने के आरोप लगते हैं तो इसके ज़िम्मेदार वे मुस्लिम शासक भी हैं जो अपने को मुसलमानों का ख़लीफा कहते थे और जिहाद और काफिर के मायनी को अपने हित में इंटरप्रेट करके दूसरों की ज़मीनों और दौलत पर कब्ज़ा करने की नीयत से युद्ध करते थे। इन ख़लीफाओं ने अपने हित के कारण कुरान की शिक्षा को इंटरप्रेट करवाया जिसके कारण आज दुनिया भर में मुसलमान ज़लील और रूस्वा हो रहे हैं। मुसलमानों को कुरान की अस्ली समझ पर आना होगा, यदि वे चाहते हैं कि दुनिया वाले उन्हें इज़्ज़त की नज़र से देखें, नहीं तो वे दिन दूर नहीं कि मुसलमानों का दाना पानी कम हो जाएगा। 

कुरान की उपरोक्त आयत (47:4) कह रही है कि जब युद्ध के मैदान में तुम्हारा मुकाब़ला काफिरों से हो, यानी उनसे हो जो कुरान की शिक्षा को झुटलाते हैं, और तुम्हारे खि़लाफ साज़िशें करने में लगे हैं तो उनकी गर्दनें उड़ा दो, और उनके सामने कमज़ोर न पड़ो। यहां तक कि जब तुम युद्ध में हालात पर काबू पा लो, और जिन लोगों को तुम क़ैदी बनाने में कामयाब हुए हो, उनको पूरी तरह जकड़ लो यानी उन्हें मज़बूती से कैद कर लो। 

मैं ने आप से कहा था न कि कुरान की जो आयत गर्दन मारने की बात कर रही है वो दरअस्ल अम्न और शांति की सबसे बड़ी संदेशवाहक है। जो लोग कै़दी बना लिए गए हैं उनके लिए आयत यह नहीं कहती कि उनको क़त्ल कर दो या ज़बरदस्ती मुसलमान बना लो बल्कि कहती है कि ‘‘उन्हें छोड़ दो, या तो एहसान करके बिना कुछ भी बदले में मांगते हुए या कुछ मुआवज़ा ले कर, यहां तक कि युद्ध करने वाली मुख़ालिफ फौज अपने हथ्यार रख दे, यानी सुलह और अम्न का एलान कर दे, या अपनी हार मान ले। यही हुक्म है। और अगर अल्लाह चाहता तो उनसे बिना युद्ध के इंतेक़ाम ले लेता, मगर उसने ऐसा नहीं किया, ताकि हम में से बाज़ को बाज़ के माध्यम से आज़माए। और जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल कर दिए गए, तो वह उनके इस कर्म को हरगिज़ बेकार नहीं जाने देगा।’’ 

अब आप स्वयं आंकलन कीजिए कि ये आयत अम्न और इंसाफ की बात कर रही है या हिंसा की। जो तुम से लड़ने के लिए आ गए, उनसे लड़ो और उनकी गर्दनें काट दो। आप कहेंगे कि ये कहां कहा जा रहा है कि वह लड़ने को आए हैं, केवल लड़ाई की बात हो रही है। लेकिन इसी आयत का अगला हिस्सा देखिए जिसमें कहा जा रहा है कि ‘‘अगर अल्लाह चाहता तो उनसे बिना युद्ध के इंतेक़ाम ले लेता। मगर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह चाहता है कि कुकर्मियों को अच्छे कर्म करने वालों से आज़माए।’’ 

कुरान की आयत में ‘इंतेक़ाम’ का शब्द आया है। ‘इंतेक़ाम’ का शब्द हमला करते समय तो नहीं प्रयोग होता। ‘इंतेक़ाम’ का शब्द माल-ओ-दौलत की लालच में दूसरे देशों पर क़ब्ज़ा करने के लिए भी प्रयोग नहीं होता। ‘इंतेक़ाम’ का शब्द वहीं प्रयोग होता है जहां तुम्हारे खि़लाफ किसी ने बहुत बुरा किया हो। किसी ने तुम पर जुल्म किया हो। लेकिन जब तुम पर जुल्म और ज़बरदस्ती हुई है और तुम युद्ध के मैदान में उन लोगों के आमने सामने आ जाओ जिन्होंने तुम पर जुल्म और ज़बरदस्ती की है, तो अब कमज़ोर पड़ जाने की शिक्षा नहीं दी जा रही, बल्कि ऐसा भीष्ण युद्ध लड़ने की नसीहत हो रही है कि तुम उनकी गरदनों पर वार करो, अपनी मौत की परवाह किए बिना, लेकिन यहां भी प्रतिशोध मे, इंतेक़ाम में हद से पार जाने की बात नहीं हो रही, बल्कि कहा जा रहा है कि जब तुम युद्ध में जीत प्राप्त कर लो, और उनमें से कुछ को कै़दी बना लो, तो उन्हें छोड़ दो। 

क्या गीता भी यही बात नहीं कर रही थी जब कह रही थी कि तुम मर जाओ या मारे जाओ, इस युद्ध में तुम्हारे लिए बेहतरी है, क्यांेकि मरने पर यह सीधा तुम को स्वर्ग में दाखि़ला देगा और यदि तुम को जीत मिली तो यह तुम्हें गौरव प्रदान करेगा? 

कृष्ण भी परमात्मा के अवतार थे, वह यदि चाहते तो उन्हें अर्जुन की आवश्यकता ही नहीं थी। सुदर्शन चक्र चलाते और वह कौरवों की सेना के तमाम कमांडरों की गर्दनें काटता हुआ वापिस आ जाता, लेकिन कृष्ण अर्जुन को इस प्रकार का युद्ध लड़ने के लाभ बता रहे हैं और लड़ने को तैयार कर रहे हैं, और वहां भी ऐसी ही दलीलें दी जा रही हैं जैसी कुरान ने दी कि यदि तुम लड़ोगे तो यह तुम्हारे लिए बेहतर होगा, अन्यथा परमात्मा चाहता तो उन्हें कभी का मार देता। ऐसा इसलिए कि परमात्मा चाहता है कि कुकर्मियों को अच्छे कर्म करने वालों से आज़माए। एक ही बात हो रही है गीता और कुरान में, केवल भाषा का अंतर है। 

काफिर के लिए, जिससे लड़ने के लिए कहा जा रहा है, इंतेक़ाम में, यानी वे पहले ही साज़िश के़ द्वारा तुम्हें बहुत नुक़सान पहुंचा चुका, उससे जब तुम लड़ो, हार जाओ तो तुम क्या करोगे, काफिर की जो समझ में आएगा करेगा, यदि तुम जीत जाओ तो अल्लाह कह रहा है कि उन्हें छोड़ दो। यानी ये नहीं कि जो prisoners of war है उन पर किसी प्रकार का जुल्म करो, या उन्हें मारो या क़त्ल करो। छोड़ दो या तो एहसान के तौर पर, कुछ भी मांगे बिना उन्हें छोड़ दो, या उनसे बदले में कुछ ले कर, जैसे बदले में अपने कैदियों को वापिस मांग लो, या कोई और मुआवज़ा ले लो इसकी तुम्हें इजाज़त है। ताकि युद्ध का ख़ात्मा हो सके। 

उन्होंने साज़िशें भले ही की थीं, लेकिन तुम अल्लाह की ख़ातिर बस तब तक ही लड़ सकते हो जब तक दुश्मन तुम से लड़े, और ये लड़ाई भी इसलिए ही है कि शांति स्थापित हो सके। War for Peace!

अब यह देखना है कि कै़दियों को छोड़ने के बदले में अवतार मौहम्मद क्या मुआवज़ा लेते थे? जिन लोगों ने मक्का की ज़िंदगी में अवतार मौहम्मद और उनके साथियों पर हर प्रकार के जुल्म किए थे, और वे मदीना में भी चैन से नहीं बैठने दे रहे थे बल्कि साज़िशें कर रहे थे और हमलावर हो रहे थे, अब जब वे क़ैदी बना लिए गए तो अवतार मौहम्मद का उनके साथ क्या सलूक था? वह कहते थे कि यदि तुम पढ़े लिखे हो तो मुसलमानों में से किसी एक को पढ़ा दो और तुम आज़ाद हो। 

अगर कुरान कह रहा है कि उनसे मुआवज़ा भी ले सकते हो तो वह ऐसे मुआवज़ा लिया करते थे। कुरान में जब कहा जा रहा है कि ‘यह अल्लाह की तरफ से हुक्म है तुम्हारे लिए’ तो उस हुक्म की पासदारी वह ऐसे किया करते थे। 

यह है इस्लाम की शिक्षा! मुसलमान का अर्थ है complete surrender to the will of God और इस्लाम युद्ध में भी अपने जज़बात पर काबू रखने की बात कर रहा है। युद्ध में तो कमांडर्स अपने फौजियों का गुस्सा बढ़ाते हैं, उनको जोश दिलाने के लिए। यदि दिल में नफरत नहीं भी है तो नफरतें बढाते हैं।

यही कारण है कि इस्लाम आने से पहले भी और बाद में भी हम देखते हैं कि कितने ही ज़ालिम बादशाह prisoners of war को क़त्ल कर दिया करते थे क्योंकि युद्ध के दौरान ऐसा ही गुस्सा भर दिया जाता था सिपाहियों में। अवाम पर डर बैठाने के लिए बहुत सारे जुल्म किया करते थे। 

जब फौजें घोड़ों पर चल रही हों तो उस समय कैदियों को साथ लेकर चलने का अर्थ था कि उन्हें खाना, पिलाना, उनकी चैकसी करना। मंगोल तो जिस क़िले वाले भी उनके आने पर क़िले का दरवाज़ा नहीं खोलते थे और उन्हें युद्ध लड़कर क़िले पर अपना क़ब्ज़ा जमाना पड़ता था, वहां मार काट, लूट मार, औरतों की बेहुरमती करना अपना हक़ समझते थे। ऐसे भी उदाहरण मिलते है कि किसी शहर पर क़ब्ज़ा करने पर 100 साल के बूढे़ से लेकर पैदा हुए बच्चों और औरतों तक को मार दिया जाता था। 

मंगोल हुकमरान तैमूर के लिए मिलता है कि जब उसने इस्फेहान का घेराव किया और अंत में उस पर कब्ज़ा करने में कामयाब हुआ तो हुक्म दे दिया कि किसी को भी ज़िंदा न छोड़ा जाए। कहते हैं कि नए पैदा हुए बच्चों से लेकर गर्भवती औरतों को भी क़त्ल करने के लिए फौजें शहर में घुस गईं। जब किसी औरत का पेट फाड़ा जाता था तो उनके पेट से हरी खाई हुई पत्तियां निकलती थीं क्योंकि शहर पर घेराव के दौरान ये लोग पत्तियां खाने पर मजबूर हो गए थे। 

तैमूर भी कहने को मुसलमान था, जिनको क़त्ल कर रहा था वे भी मुसलमान ही थे। मुग़ल हुकमरान अपने को इसी तैमूर का वंशज होने पर गर्व करते हैं; यही इस बात का सुबूत है कि उनका इस्लाम से जुड़ाव किस हद तक था? 

हिन्दु स्कालर्स जो ग़ल्ती करते हैं वह यह कि जब वे तैमूर को भारत पर हमला करते देखते है तो उसे इस्लामिक हमला नाम देते हैं और भूल जाते हैं कि इसी तैमूर ने जब इस्फेहान पर क़ब्ज़ा किया तो वहां के मुसलमानों को भी वैसे ही काटा गया जैसे दूसरों को और रास्ते में मस्जिद आ गई तो उसकी दीवारें भी गिरा दी गईं। आज के पाकिस्तानी मुसलमान भी इस्लाम की अस्ल समझ से दूर हैं; इसका एक सुबूत यह भी है कि ये तैमूर और नादिर शाह जैसे ज़ालिम बादशाहों को अच्छी नज़र से देखते हैं। 

बाबर ने भारत पर हमला किया तो किसी हिन्दु राजा से लड़ने नहीं आया बल्कि इब्राहीम लोधी से, और भारत आने से पहले बाबर जिनसे लड़ रहा था वे भी मुस्लिम ही थे, उज़बेकिस्तान में जिस रियासत का हाकिम उसका बाप था, और बाप के मरने पर उसके भाईयों ने हुकूमत पर कब्ज़ा कर लिया, वह सब भी मुसलमान थे। इन सब का कुरान और अवतार मौहम्मद की शिक्षा से कोई नाता नहीं था। ये तो दरअस्ल कुरान और अवतार मौहम्मद की रूस्वाई का कारण बने और आज तक बन रहे हैं।

कुरान की शिक्षा हमला करने और निर्दोश को क़त्ल करने की तो हरगिज़ नहीं है। बल्कि यदि तुम पर जुल्म हुआ भी है और उस जुल्म करने वाले से युद्ध की नौबत आ जाए तो तुम उस समय तक ही उससे लड़ सकते हो जब तक वे सामने लड़ रहे हैं। वे हथ्यार डाल दें तो तुम उन्हें कत्ल नहीं कर सकते, तुम उन पर खाना पानी बंद नहीं कर सकते, वे यदि पीठ दिखाएं और भागने लगें तो भी तुम उन भागते हुओं पर हमला नहीं कर सकते, तुम जो युद्ध में मारे गए उनके शरीर के साथ कोई बेहुरमती नहीं कर सकते और यदि युद्ध में तुम्हारी जीत हो तो तुमसे कहा जा रहा है कि जब तुम्हें लगे कि अब जंग अंजाम को पहुंची तो युद्ध बंदियों को आज़ाद कर दो। कुरान तो यह भी नहीं कह रहा कि तुम उन्हें मुसलमान बना लो, तब आज़ाद करो। ऐसे मुसलमान किस काम के जो ज़ोर जबरदस्ती से इस्लाम में लाए गए हों। बस अब आज़ाद कर दो। यदि तुम्हारे दिल में ये डर है कि आज़ाद करोगे तो ये फिर से तुम्हारे खि़लाफ फौजकशी करने आ जाएंगे तो भी तुम उन्हें गुलाम बना कर रख सकते हो, जैसे रखने का अवतार मौहम्मद ने हुक्म दिया है और जिस की बात हम पहले कर चुके हैं, क़त्ल नहीं कर सकते सिवाय उनके जिनके बहुत बड़े गुनाह हैं। 

इस्लाम को सैबोटेज करने में जिन लोगों ने सब से बड़ा काम किया, यह वे थे जिन्होंने फतहे मक्का के समय, जब उनके पास कोई चारा नहीं था और देख रहे थे कि अब मुसलमान संख्या में इतने हो गए हैं कि उनको समाप्त नहीं किया जा सकता, तो चातुर्यपूर्ण नीति अपनाते हुए इस्लाम में दाखि़ल होने का एलान कर दिया। इन्होंने पिछले 20-22 वर्षों में हर मुमकिन कोशिश की थी इस्लाम का गला घोंट देने की, हर प्रकार से नए मुसलमानों पर जुल्म किए थे, कितनों को मार ही डाला था, लेकिन जब अवतार मौहम्मद की ओर से आम माफी का एलान हो गया और इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मनों को भी आज़ाद छोड़ दिया गया तो इन्होंने इस्लाम अपना लेने में ही बेहतरी समझी। 

वह इसलिए कि अवतार मौहम्मद की शिक्षा भी कृष्ण के समान यही थी, जीतना आवश्यक नहीं है, उस सत्य मार्ग पर चलते रहना आवश्यक है, फिर तुम युद्ध में जीतो या हार जाओ और मारे जाओ, दोनों ही सूरत में तुम्हारे लिए बेहतरी है। 

जिन लोगों ने अपनी रजसिक या तमसिक सोच के कारण, भले ही मुसलमानो मेें से हों या गैरमुस्लिमों में से, कुरान और अवतार मौहम्मद की शिक्षा को सही सही नहीं समझा उन्होंने जिहाद, मुश्रिक और काफिर आदि टर्मस के अपनी समझ से मायनी पहना लिए। जबकि ‘कफर’ शब्द, जिससे शब्द ‘काफिर’ बना है, उसका अर्थ होता है ‘जिसने कोई चीज़ छिपा ली’, या, ‘जो झुठला दे’। छिपाएगा कब, जब वह चीज़ किसी समय खुल्लम खुल्ला तुम्हारे हाथ में हो। और झुठलाएगा कब, जब सच जान रहा हो तब ही तो झुठलाएगा। आप देखेंगे कि ‘कफर’ या ‘काफिर’ का शब्द जहां भी आया है यह इसी मायनी में आया है कि जो किसी चीज़ को छिपा दे या झुठला दे, कमदल कर दे। 

Quran.14.32-34:

Allah (is) the One who created the heavens and the earth,  and sent down from the sky water, then brought forth from it of the fruits (as) a provision for you, and subjected for you the ships, so that they may sail in the sea by His command, and subjected for you the rivers,

And He subjected for you the sun and the moon, both constantly pursuing their courses, and subjected for you the night and the day.

And He has granted you all that you asked Him for. If you tried to count Allah’s blessings, you would be able to number them. Indeed humankind is truly unfair, totally ungrateful.

हर वह कुछ जो उसने दिया है तुम को, उसकी बात हो रही है, ये हमारे आस पास की चीजें हंै जो तुम रोज़ देखते हो, जैसे उसने सूरज दिया, चांद दिया, रात और दिन दिए, यदि इन को कोई झुठलाए, तो उसके लिए शब्द ‘कुफफार’, जो ‘काफिर’ का बहुसंख्यक है, प्रयोग हुआ है। जिसका अंग्रेज़ी में अनुवाद ungrateful किया गया है जबकि अरबी आयत में शब्द ‘कुफफार’ आया है।

साफ है कि जो तुम देख रहे हो और जान रहे हो और फिर उसको झुठला रहे हो, उसके लिए शब्द ‘काफिर’ प्रयोग हुआ है। 

यहूदियों को तो मुसलमान अहललकिताब समझते हैं, काफिर नहीं समझते, लेकिन एक जगह उनके लिए भी कुरान में ‘काफिर’ शब्द प्रयोग हुआ है।

Quran.17.2-8:

And We gave Moses the scripture, and made it a guide for the Children of Israel: Take none for protector other than Me. The descendents of those we carried with Noah. He was an appreciative servant. And we conveyed to the Children of Israel in the scripture: You will commit evil on earth twice, and you will rise to a great height.

जब यहूदियों को सत्य और असत्य की शिक्षा दे दी गई और अल्लाह ने मूसा की ओर किताब भेजी जो कि बनू इस्रायल की रहनुमाई की ख़ातिर आई थी, जिसमें लिखा था कि हमारे अलावा किसी को अपना संरक्षक न जानो, और उन्हें बता दिया कि तुम जमीन पर दो बार बड़ी बुराईयों में डूब जाओगे, और तुम बड़ी ऊंचाईयों तक पहुंचोगे; उसके बाद 8वीं आयत कह रही हैः

Perhaps your Lord will have mercy on you. But if you revert, We will revert. We have made hell a prison for the disbelievers (Kafirs).

और अगर तुम ने फिर वही तर्जे़ अमल इख़्तेयार किया यानी सब कुछ बता देने के बाद तुम फिर पलट गए तो हम भी वही अज़ाब दोबारा करेंगे और हमने दोज़ख को, नर्क को काफिरों के लिए कैदख़ाना बना दिया है।

यानी जो नेयमतें उसने उनको दे रखी हैं, जिन के बारे में उन्हें बता दिया गया था, उन नेयमतों को देखते और जानते हुए यदि कोई झुटला रहा है तो वह कुरान के हिसाब से काफिर है। 

एक जगह तो कुरान का भेजने वाला अल्लाह अपने लिए ही ‘कफर’ का शब्द प्रयोग करता है जो साबित करता है कि यह विशेषण हैं। इसके बावजूद उन लोगों का क्या किया जाए जो ‘काफिर’ शब्द को निगेटिव शब्द के रूप में या संज्ञा के रूप में पेश करते हैं। 

Quran.21.94:

Whoever does any deed of good and righteousness, being a true believer, his endeavour will not be left unrewarded in ingratitude. We are keeping the record of every good deed of his in his favour (without the least

कुरान का भेजने वाला अपने साथ जोड़कर ‘कुफ्र’ का शब्द प्रयोग कर रहा है। कहा जा रहा हैः पस जो कोई नेक कर्म करे और वो मोमिन भी हो तो उसकी कोशिशों का कुफरान नहीं किया जाएगा और बेशक हम उसके सब कर्म को लिख रहे हैं।

यानी साफ है कि ‘कफर’ का शब्द इस ही मायनी में प्रयोग हुआ है कि जो कर्म तुम कर रहे हो, उसकी जानकारी उसे है और वह छिपाई नहीं जाएगी। आप ने देखा, ‘काफिर’ शब्द संज्ञा नहीं है जो किसी धर्म विशेष के मानने वालों पर लगा दिया जाए, बल्कि विशेषण है। 

एक जगह गुनाहों को माफ करने के लिए ‘कफर’ का शब्द आया है। वह तुम्हारे गुनाहों को छिपा देगा, यानी वह जान रहा है कि तुमने गुनाह किए हैं लेकिन फिर भी छिपा देगा, माफ कर देगा, इसके लिए ‘कफर’ शब्द आया है। ‘कफर’ route word है और ‘काफिर’ विशेषण यानी adjective है।

Quran.29.7:

And those who believe and do righteous (deeds), We will remove from them their evil deeds, and we Will surely reward them (the) best (of) what they used (to) do

और जो लोग ईमान लाए और नेक कर्म करते रहे हम उनके गुनाहों को, यहां पर ‘कफर’ का शब्द आया है, जिन गुनाहों को हम जान रहे हैं छिपा लेंगे, यानी गुनाहों को माफ कर देंगे, और उनको उनके कर्मों का बहुत अच्छा बदला देंगे।

Quran.4.150-151:

Indeed those who disbelieve (yakforoon) in Allah and His messengers, they wish that they differentiate between Allah and His messengers and they say, “We believe in some and we disbelieve (kaforo) in others.” And they wish that they take between that a way.

बिला शुबह जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कफर करते हैं और चाहते हैं कि अल्लाह और उसके रसूलों के दरमियां फर्क़ करें और कहते हैं कि हम उनमें से कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते और चाहते हैं कि हम इस ईमान और कुफ्र के दरमियान कोई राह निकाल लें यानी ये जानते हुए कि सच क्या है, वे खुल कर मानना नहीं चाहते और कोई बीच की राह निकालना चाहते हैं; फिर अर्थ वही सामने आया, कि जो कोई सच को जानते हुए छिपा ले।

जो अल्लाह या उसके अवतारों को पहचानते हुए झुटला दे यानी जान रहा हो कि वह अल्लाह की ओर से है लेकिन झुटला दे।

लोग ‘कफर’ का शब्द किसान के लिए भी प्रयोग करते हैं जो बीज को ज़मीन में छिपा देता है। बीज का छिपाना कफर है। अब हम unbeliever या disbeliever अर्थ नहीं ले सकते। जो नहीं मानता, ये अर्थ ‘कफर’ का नहीं हो सकता। लेकिन हमने यही अर्थ समझ रखा है कि जो नहीं मानता वह काफिर है। बहुत से लोग नहीं मानते, अवतार मौहम्मद को ईसाई भी नहीं मानते, मुसलमानों के अतिरिक्त कोई भी, अहललकिताब वाला भी नहीं मानता, लेकिन उसके लिए ‘कफर’ का शब्द प्रयोग नहीं हुआ बल्कि कहा जा रहा है कि अहललकिताब में से कुछ लोग काफिर हो जाते हैं। यानी सब अहललकिताब काफिर नहीं हैं। 

हम idol worshipper बुत परस्त भी काफिर का अर्थ नहीं ले सकते। क्योंकि जो लोग मरयम का या ईसा का बुत बनाए हैं वे भी एक तरह से बुत परस्ती ही तो हुई। लेकिन हो सकता है कि वे एक खुदा को पहचान रहे हों। यदि वे उन बुतों को खुदा के रूप में नहीं पूज रहे तो वे मुश्रिक भी नहीं हुए, और काफिर तो यक़ीनी नहीं हुए। 

पर कुछ जाहिल मुसलमान इन सब को काफिर कहते हैं। बहुत से आर्य समाजी हैं जो बुत परस्ती नहीं करते और एक खुदा के कानसेप्ट को मानने की बात करते हैं। इसका मतलब कि सारे हिन्दुओं को हम एक साथ काफिर नहीं कह सकते। 

कुरान की 4ः150 और 151 आयत में भी वही मतलब निकलते हैं, कि काफिर वह है जो कुछ तथ्यों को जान रहा है और छिपा रहा है। 

तो क्या इस्लाम के कानून का इंकार कर देना ‘कफर’ है? नहीं ये भी नहीं हो सकता क्योंकि कुरान खुद कह रहा है कि ‘लकुम दीनोकुम वलियादीन’। ‘तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन, मेरे लिए मेरा दीन’। जो तुम्हारे दीन पर नहीं आ रहा वो काफिर नहीं हो सकता। यदि तुम्हारे दीन का मैसेज उस तक नहीं पहुंचा और वह हक़ीक़त को पहचाना ही नहीं तो वह काफिर कैसे हुआ। तुम अपनी मर्जी के मालिक हो कि जो दीन चाहो अपनाओ, मै अपनी मर्ज़ी का मालिक हूँ। हां तुम से यह उम्मीद अवश्य की जाती है कि तुम हक़ और हक़ीक़त को पहचानने की कोशिश ज़रूर करोगे और अपनी जिंदगी को यूं ही व्यर्थ नहीं गंवा दोगे। जो हक़ तुम ने अपनी अक़ल लगा कर समझा, यदि उसको झुटलाओगे तो काफिर कहलाओगे। 

इसी प्रकार सूरह बकरा में 30वीं आयत से आगे पढ़ंे तो वहां भी हम पाएंगे कि ‘कफर’ शब्द आ रहा है। 

Quran.2.30-35:

(Recollect, O our prophet Mohammad) Why said thy Lord unto the angels: “Verily I (intend to) appoint a vicegerent in the earth”, they said. “Wilt Thou (O our Lord) appoint therein one who will cause mischief and shed blood, while we celebrate by Thy praise and hallow Thee alone?” Said (the Lord to the angels) “Verily, I know what ye know not. “ And He taught Adam the Names, all of them, and then set them unto the angels and said, “Declare ye unto Me the names of these if ye be truthful.” They said: “Glory be to Thee (O Lord!) we have no knowledge save what Thou hast taught us; Verily, Thou, Thou (alone) art the All-Knowing, All Wise.” Said He “O Adam! Inform thou unto them their names,” and when he had informed them their names; said (the Lord): “Said I not unto you that verily, I know the secrets of the heavens and the earth and know that which ye declare and that which ye conceal?”

और (वो समय याद करें) जब आप के रब ने फरिश्तों से फरमाया कि मैं ज़मीन में अपना नाएब बनाने वाला हूँ, उन्होंने अर्ज़ किया क्या तू ज़मीन में किसी ऐसे व्यक्ति को (नाएब) बनाएगा जो उसमें ख़राबियां करे और खूंरेज़ी करता फिरे, हालांकि हम तेरी प्रशंसा के साथ तेरी माला जपते हैं, और हर समय तेरी पाकी ब्यान करते हैं। (अल्लाह ने) फरमायाः मै वो कुछ जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।

और अल्लाह ने आदम को तमाम नाम सिखा दिए फिर उन्हें फरिश्तों के सामने पेश किया और फरमायाः अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ।

फरिश्तों ने कहाः तू पाक है, जितना ज्ञान तू ने हमें बख़्शा है, उसके सिवा हमें कुछ मालूम नहीं, बेशक तू बडा ज्ञानी और हिकमत वाला है।

अल्लाह ने (आदम को) हुक्म दिया कि आदम तुम इनको इनके नाम बताओ। जब उन्होंने उनको उनके नाम बताए तो (फरिश्तों से) फरमाया क्यों (तब) मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मै आसमानों और ज़मीनों की (सब) छिपी हुई बातें जानता हूँ और जो तुम ज़ाहिर करते हो और छिपाते हो (सब) मुझ को मालूम है। 

और जब हमने फरिश्तों को हुक्म दिया कि आदम के आगे सिजदा करो तो वो सिजदे में गिर पडे़ मगर शैतान ने इंकार किया और गुरूर में आकर काफिर बन गया।

यानी शैतान उस समय तक काफिर नहीं था। उस समय तक तो फरिश्ते उसको बड़ा इबादतगुज़ार समझते थे। अल्लाह ने दिखा दिया कि आदम ने वे नाम बता दिए जो फरिश्ते नहीं बता पाए। ये शैतान ने भी देखा। लेकिन फिर गुरूर के कारण, ego के कारण, उसने सिजदा करने से इंकार कर दिया। हक़ को देख रहा था और मानने से इंकार कर दिया और इस प्रकार काफिर हो गया।

Quran.2.75:

Do you believers still expect them to be true to you, though a group of them would hear the word of Allah then knowingly corrupt it after understanding it?

हिन्दी अनुवाद देखिएः

क्या तुम उम्मीद रखते हो कि ये लोग तुम्हारे ;दीन केद्ध क़ायल हो जाएंगे, ;हालांकिद्ध उनमें से कुछ लोग कलामे खुदा ;यानी तौरैतद्ध को सुनते हैं, फिर उसको समझने के बाद उसको जानबूझ कर बदल रहे थे। 

इस आयत में काफिर का शब्द तो नहीं आया लेकिन साफ कहा जा रहा है कि कुछ लोग जान रहे हैं कि उनकी किताब क्या बात कर रही है लेकिन जानते बूझते उसका अनुवाद या समझ बदल रहे हैं। ऐसे ही लोग काफिर की डेफिनिशन में आते हैं।

एक स्थान पर तो मुसलमानों के लिए कहा जा रहा है कि उनमें के कुछ काफिरों ने मौहम्मद द्वारा बताए जा रहे पथ को सैबोटेज करने, हाईजैक करने की उम्मीदें खो दी हैं। यह उन लोगों के लिए कहा जा रहा है जिन के सामने अवतार मौहम्मद ने ग़दीर का पैग़ाम पेश किया था कि ‘जिस का मैं मौला हूँ उसका अली मौला है।’

Quran.5.3:

Today, the kafirs have given up all hope of undermining your faith. So do not fear them; fear Me! Today I have perfected your faith for you, completed My favour upon you, and chosen Islam as your way. 

ग़दीर वह स्थान था जहां दूर दूर तक जमा लोगों में बस मुसलमान ही थे जो हज से पलट रहे थे।

आप ने ‘काफिर’ के अर्थ कुरान से समझ लिए। सवाल ये उठता है कि यदि एक ही रास्ता हर जमाने में बताया जाता रहा तो ऐसे भी तो लोग रहे होंगे जो वेद को सुनते होंगे और उसका अनुवाद या समझ बदल देते होंगे। यानी संस्कृत स्क्रिपचर्स में भी शब्द ‘काफिर’ का कोई parallel word तो अवश्य होगा। 

संस्कृत में भी ये शब्द मौजूद है। और वहां भी संज्ञा नहीं है। ‘आतताईना’ के नाम से शब्द प्रयोग हुआ है। जो धर्म को जानते हुए उससे अलग हो जाए। जो धर्म पर चल रहा है और धर्म को छोड़ दे। वो ‘आतताईना’ है। ये parallel word है ‘काफिर’ का यदि आप सनातन स्क्रिपचर्स को देखें। 

मनुस्मृति कहती हैः Kill the aatayinah at sight.

आतताईना को देखते ही मार डालो।

यानी सत्य को पहचानते हुए झुठलाना अल्लाह की नजर में बड़ा गुनाह है। अगर कोई व्यक्ति हक़ को जानते हुए छिपाए वह आतताईना है। लेकिन अवतार मौहम्मद बता रहे हैं कि ‘काफिर’ या ‘आतताईना’ केवल वह नहीं है जो सच को जानते हुए छिपाए। यदि कोई केवल सत्य को जानते हुए छिपा रहा है तो उसे क़त्ल नहीं किया जा सकता। हमने आपको उस व्यक्ति का हाल बताया है जो मुसलमान हुआ, अवतार मौहम्मद ने उसे हदीसें लिखने पर लगाया, लेकिन वह वापिस पलट गया। उसको क़त्ल करने का अवतार मौहम्मद ने हुक्म नहीं दिया हालांकि वह कहा करता था कि मौहम्मद कुछ नहीं जानते, जो कुछ मैं लिख दिया करता था वही कुरान समझा जाता था। क़त्ल जब ही किया जा सकता है जब वे साज़िशें करे और तुम से लड़ने को आ जाएं। 

आतताईना का शब्द गीता में भी प्रयोग हुआ है। और साफ दिख रहा है कि अर्जुन को भी पता था कि सामने जो लोग लड़ने आए हैं वे आतताईना हैं। कौरवों के लिए, जो कृष्ण से लड़ने आए थे, उनके लिए अर्जुन पूछते हैं कि इन आतताईना को मार कर हमें क्या मिलेगा?

Gita.I.36:

Having killed the sons of Dhritarashra, what delight can there be for us, O Janardana, (Krishna)? Only sin would come to us for killing this aatayinah (marauding rabble, desperate men, desperadoes, felons). 

हे जनार्दन! धृतराष्ट् के पुत्रों की हत्या करके हमें क्या प्रसन्नता होगी इन आतताईनों को मार कर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।

अनुवादक ने marauding rabble, desperate men, desperadoes, felons ब्रैकिट में लिखा है। 

लेकिन आगे चलने पर कृष्ण ने न केवल सामने वालों को मारने की नसीहत करी बल्कि जो बीच में खड़े तमाशा देख रहे थे, उनसे भी कहा कि बीच का कोई रास्ता नहीं, या इधर आ जाओ या फिर तुम उधर के हो। 

कृष्ण उस समय परमात्मा का जमीन पर अवतार थे; ये लोग कृष्ण से लड़ने आ गए थे और कृष्ण उनको क़त्ल करने का हुक्म देते हैं। यदि मैं जो ‘काफिर’ की परिभाषा बता रहा हूँ वह नहीं है तो, जैसा मैंने कहा, ‘काफिर’ की परिभाषा यह होगी कि जो अपने समय के अवतार के खि़लाफ साज़िशें करे या उससे लड़ने आ जाए।

गीता भी कह रही है कि सामने वाले मारे जाने लाएक़ हैं और कुरान भी कुछ लोगों के लिए कह रहा है कि ये अंधे, गूंगे, बहरे हैं, ये मरे हुए हैं और अब इन तक हिदायत नहीं पहुंच सकती। यानी उनकी आत्मा इस लेवल तक नीचे गिर चुकी है कि अब उसकी वापसी मुमकिन नहीं। ऐसे लोगों के लिए गीता भी कहती है कि उनको मारना बस ऐसा है जैसे एक फारमेलिटी निभाई गई हो, और कुरान भी कुछ लोगों से लड़ने को कह रहा है। 

ग़ौर करने की बात यह है कि क्या वह व्यक्ति काफिर यानी आतताईना है जिसकी आत्मा इस लेवल तक गिर जाए यानी जुलमत के वश में पहुंच जाए कि अब वापसी मुमकिन न हो और वह तुम्हारे खि़लाफ साज़िशें करते हुए तुम से लड़ने को आ जाए। पर यह कौन बताएगा कि अमूक व्यक्ति की आत्मा इस लेवल पर है कि नहीं। केवल वही बताएगा जो अपने समय का अवतार हो। जब तक हमारे बीच कोई अवतार न हो, हम मौत देने के क़ानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते। 









पुस्तिका के अंत में लेखक ने फिर एक फोटो द्वारा वही दिखाने की कोशिश की है जो प्रारंभ में दी गई फोटो के माध्यम से कोशिश कर रहे थे। इस फोटो में एक अरब वेशभूषा में एक वृद्ध व्यक्ति ऊंट पर सवार है और उसके इर्द गिर्द नंगी तलवार या भाला लिए कुछ व्यक्ति चल रहे हैं। यहां भी यही दिखाने की कोशिश है कि इस्लाम तलवार से फैलने वाला धर्म है। लेकिन लेखक को पता होना चाहिए कि अंगरक्षक भी तलवार या बंदूक़ लेकर चलते हैं। यदि साज़िशों का बाज़ार गर्म हो तो अंगरक्षक नंगी तलवारें लेकर ही तो चलेंगे। यदि आतंकवादियों का डर हो तो प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले भी सब से आधूनिक हथ्यार ले कर उनके साथ चलेंगे। 

यहीं पर अपनी बात को विणाम देते हैं। आशा है कि हम अपनी बात समझा पाने में कामयाब रहे होंगे।


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