Absolute Unmanifest God in Sanatan (Hindu) Scriptures
‘ला इलाहा इलल्लाह’ यानी कोई खुदा नहीं है सिवाय उस एक खुदा के। इस कलमे पर जो यक़ीन रखता है वही मुसलमान है। पहले जो किताबें आईं उनमें भी एक खुदा का कानसैप्ट मौजूद है, हां ये ज़रूर है कि बाद में ये कानसैप्ट धीरे धीरे डेवेलप होते हुए एकदम वाज़ेह तौर पर सामने आता चला गया। शायद आखिर के ज़माने के इंसान के लिए, जिसके लिए समझा जा सकता था कि वो ज्यादा अकलमंद है और एक । Abstract न दिखने वाले खुदा जो हर जगह मौजूद है ज्यादा अच्छे तौर पर पहचान सकता है, ये कानसैप्ट और ज़्यादा डेवेलप होता चला गया।
आप खुदा और उसके पैगम्बरों की ओर से आई किताबें और अवतार यानी रसूलों को देखेंगे तो आप पाएंगे कि एक खुदा को पहचनवाने का एक खास पैटर्न है जो हमें दुनिया के हर इलाक़े में देखने को मिलता है। पहले देवताओं को पहचनवाया गया, देवताओं के बाद बहुत सी जगहों पर मैनिफैस्ट सैल्फ यानी परमात्मा यानी अर्श पर मुकीम एक वजहुल्लाह को पहचनवाया गया, फिर सारी दुनिया में तकरीबन एक ही समय में आपको देखने को मिलता है कि मुख्तलिफ रसूल यानी अवतार फिलासफीकल डिस्कशंस करते नज़र आते हैं, ये आप एक ही समय में अलग अलग स्थानों ंपर पाएंगे चाहे, हिन्दुस्तान में देखिए, चाईना या रोमन एम्पायर देखें, लोग शायद उस वक्त इतना तैयार हो गये थे कि फिलासफीकल डिबेटस को समझ सकें। और जब पैगम्बर मौहम्मद दीन की शिक्षा को एक लेवल पर लाए, तो एक खुदा का कानसैप्ट इतनी फोर्स के साथ reinforce करके पेश किया गया कि अब किसी और चीज़ की गुंजाईश नहीं बची।
लेकिन ऐसा नहीं कि जब देवताओं को पहचनवाया जा रहा था तो उस समय एक खुदा का कानसैप्ट मौजूद नहीं था। और ऐसा भी नहीं कि जब एक खुदा के कानसैप्ट को पूरी शिद्दत के साथ पहचनवाया जा रहा था तो देवताओं की हकीकत खत्म हो गई। उनकी इस सृष्टि में और खुदा के डिवाईन क्रिएशन प्लान में जो हकीकत उस समय थी वो आज भी वैसे की वैसी है, हम उसको समझें कि न समझें। उस वक्त परमात्मा को जैसा पहचनवाया गया उस परमात्मा को हम आज भी नहीं नकार सकते अगर हम किताबों को दोबारा से पढ़ें।
उदाहरण के रूप में अगर आप समझते हैं कि कुरान एक खुदा की बात कर रहा है तो आप यदि हमारे साथ बने रहेंगे तो हम दिखाएंगे कि कुरान भी परमात्मा को नकार नहीं रहा और अगर आप को लगता है कि वेद देवताओं की बात कर रहे हैं तो हमारे साथ रहने पर आप पाएंगे कि वेद भी एक खुदा को वैसे ही पहचनवा रहे हैं जैसे कुरान। इसी तरह देवताओं का जो रोल सृष्टि के प्रारंभ में था या जो वेदों में बताया गया, आप मेरे साथ रहते हुए पाएंगे कि एकदम वही रोल बाईबल और कुरान भी बता रहे हैं, सिर्फ ज़बान यानी भाषा बदली है, इलाका और रहन सहन बदला है और जमाने के हिसाब से फोकस बदला है।
बाईबल में देखते हैंः
The Bible, NT, MK 12.29
And Jesus answered him, The first of all the commandments is clear, Hear O Israel; The Lord our God is One Lord
और ईसा ने उत्तर दियाः सब से महत्वपूर्ण पैग़ाम साफ है, सुनो हे इस्रायल; केवल हमारा रब ही एकमात्र रब है।
यानी अगर हम बाईबल में देखें तो ला इलाहा इल्ललाह से अलग कोई बात नहीं हो रही; एक खुदा की बात हो रही है।
ब्रहम सूत्र, जो वेदों का मूल मंत्र कहा जा रहा है, वो देखिए क्या कह रहा हैः
Brahm Sutra, saar of Vedas:
Ekam brahm dvitiya naste, neh, na, naste, kinchan
[The Brahm is One, there is none other, nay, none, not the least]
वो एक है, और एक भी ऐसा है कि कोई दूसरा नहीं है, यानी एक नहीं एकमैव है।
हम आज देखेंगे कि हिन्दु स्क्रिपचर्स में एक खुदा की बात किस लेवल पर हो रही है। उसको एक Imperishable Absolute God कादिरे मुतलक खुदा के तौर पर पहचनवाया जा रहा है।
Brhad-aranyaka Upanishad.III.8.10
Whoever, O Gargi, in this world, without knowing this Imperishable performs sacrifices, worships, performs austerities for a thousand years, his work will have no end; whosoever O Gargi, without knowledge of this Imperishable departs from this world, is pitiable. But O Gargi, he who knowing the Imperishable departs from this world is a Brahmana.
ऋषि इस उपनिषद में गर्गी को समझा रहे हैं और कह रहे हैं कि कोई भी, इस हमेशा हमेशा रहने वाले को जाने बिना कुछ भी त्याग देता है, पूजा अर्चना या इबादत करता है, 1000 वर्षों तक तपस्या करता है, उसका कोई अंत नहीं है यानी कोई मकसद नहीं है, और जो कोई भी इस हमेशा हमेशा रहने वाले के बारे में जाने बिना इस दुनिया को छोड़ता है, उसपर अफसोस है, वो काबिले रहम है। लेकिन हे गर्गी, जो इस हमेशा हमेशा रहने वाले को पहचानते हुए इस दुनिया से गया वही ब्रहमण है।
ब्रहमण की डेफिनिशन अगर हम ब्रहद अराण्यका उपनिषद में देखते हैं तो उसके अनुसार जो कोई इस इम्पेरिशेबल को पहचाने हुए दुनिया छोड़े बस वही ब्रहमण है। इसी प्रकार सैलवेशन यानी मोक्ष भी उसी के लिए है जिसकी आत्मा जब शरीर से निकले तो वो इस इम्पेरिशेबल को पहचान रहा हो।
इसी प्रकार सुबाला उपनिषद देखते हैंः
Subala Upanishad.IV.I
In the beginning this was non-existent, unestablished (in anything else), devoid of sound, devoid of touch, devoid of form, devoid of taste, devoid of smell, imperishable, not dense, not prodigious, originless, as one’s own self (he), sorrows not. That which is lifeless, mouthless, earless, speechless, mindless, splendourless, devoid of name and clan, headless, devoid of glowing redness (like fire), immeasurable, not short, not long, not gross, not minute, not small, not great, not definable, not obscure, not demonstrable, not manifest, not shrouded, not obscure, not demonstrable, not manifest, not shrouded, without an interior, without an exterior. It does not feed on anything, nor does anything feed on it. One should attain this (Brahman) by recourse to the six means of truthfulness, charity, austerity, fasting, chastity (of mind and body) and complete indifference to worldly objects.
One should also attend to the following three, self-control, charity and compassion. The pranas (vital breaths) of this (knower of Brahman) do not go out, even where He is they get merged. He who knows thus, becoming Brahman remains Brahman alone.
उस निराकार परम परमेश्वर को पहचानना या उसकी समझ बनाना आसान नहीं है। किताब नहजुल बलागा में अली का एक खुतबा है वो इससे बहुत मिलता जुलता है जिसमें अली इसी प्रकार वो ऐसा नहीं है, ऐसा भी नहीं है, बताते बताते पहचनवा रहे हैं कि उसको पहचानना कितना मुश्किल है।
इस एक खुदा को जो कादिरे मुतलक है, जो हर समझ से जुदा है, जिसको डिफाईन नहीं किया जा सकता, न उसके पहले कोई है न उसके बाद कोई है, आदि उस ब्रहमन की समझ बनाने और हक की प्राप्ति के छह तरीके हैं जो बताए गये हैं। और फिर तीन और तरीके बताए गये, इन तरीकों को अपनाते हुए ब्रहमण को पहचानने वाले के प्राण जब निकलते हैं तो वो बस उस ब्रहमण में ही एक हो जाते हैं, वो स्वयं ब्रहमण बन जाता है और उसमें ही बस रहता है।
इसी ब्रहमण को गीता में Absolute कह कर मुखातिब किया जा रहा है। उपनिषद में भी उसको थर्ड पर्सन में He कहकर सम्बोधित किया जा रहा है तो कुरान भे भी जहां जहां एबसोलूट गाड का वर्णन आया उसको थर्ड पर्सन मे He के साथ ही मुखातिब किया जा रहा है और आप देखेंगे कि गीता भी, जिसमें परमात्मा फस्र्ट पर्सन में I या Me के साथ बात कर रहा है, वो एबसोलूट गाड की जब बात होती है तो थर्ड पर्सन में He कह कर ही उसको मुखातिब करता है।
Gita.VIII.I
Arjuna said: What is that Absolute? What (is) the Principle of the Self (Paramatma ka adhaar kya hai)? What (is) action (karma)?
गीता में देवताओं का एबसोलूट से क्या रिशता है, परमात्मा का एबसोलूट से क्या रिश्ता है, इनका आपस में क्या रिश्ता है, इस सब को बहुत विस्तार से समझाने की कोशिश की है।
हम को समझना होगा, और हमने ब्रहद अराण्यका आदि उपनिषदों से भी समझाया है, कि परमात्मा वो साकार क्रिएशन है जो निराकार एबसोलूट गाड ने क्रिएट की, जब उसने चाहा कि पहचाना जाए। परमात्मा जब गीता में क्रिएशन के मुख से बात कर रहा है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि वो अर्श पर अपनी कुर्सी से उतर कर पृथ्वी पर मानव शरीर में उतर आया। हमने अपने लेखों में इस प्रोसैस को विस्तार से बताया है।
परमात्मा ने क्रिएट होते ही निराकार एबसोलूट की इबादत और वंदना शुरू कर दी और जब उसने चाहा कि इबादत करने वाले और हों तो उसने अपने में से एक देवात्मा शक्ति बनी जो 7 दिव्यात्माओं में विभाजित हो गई। इनमें से कोई दिव्यात्मा जब पृथ्वी पर जन्में किसी मानव के शरीर को अपने आफिस के रूप में इस्तेमाल करती है तो वो मानव परमात्मा का अवतार कहलाता है। ये दिव्यात्मा दरअस्ल माध्यम बनती है कि परमात्मा उस शरीर के मुख से अपनी दीक्षा दे सके।
गीता कहती हैः
O Highest Spirit? What is said to be the principle of existence (saari srishti kis par tiki hai) and what is spoken of as the principle of divinity (devataon ka mulya adhaar kya hai).
परमात्मा से सवाल है कि सारी सृष्टि किस पर टिकी है, देवताओं का मूल आधार क्या है और इस परमात्मा का आधार क्या है?
आप गीता पढ़ते जाईए, इन सब सवालों के जवाब सामने आते चले जा रहे हैं।
Gita.VIII.2
Here in this body, what and how is (to be understood) the principle of sacrifice, O Madhusudana (Krishna)? Again, how are You to be known by self-controlled persons at the time of going forth from the body?
देवताओं के दो रूप बताए गये हैेः एक बतौर नूर है, ये नूरानी रोल भी परमात्मा ने उनका बनाया है जिसमें वो तमाम सृष्टि को चला रहे होते हैं लेकिन उनका एक रोल ये भी है कि ये नूरानी रूहें यानी दिव्यात्माएं इंसानी शरीर को अपना आफिस बना कर उस शरीर के माध्यम से परमात्मा का मैसेज इंसानों तक पहुंचाती हैं। जब ये इंसानी शरीर में आती हैं तो सैरिफाईसेस देते हैं, लोग इंतेजार कर रहे थे कि जब वो आएंगे तो उनके रास्ते में कुर्बानियां देंगे, अपनी जानों की आहूति देंगे।
Gita.VIII.3
Sribhagwan said: Perennial, the Absolute, supreme – (its) own nature, principle of Self is called Brahm. The creative urge, the cause of the origin of existent beings, is designed action.
कितने ही उपनिषदों मे इस इस ब्रहम को पहचनवाने की कोशिश हो रही है जो हमेशा हमेशा के लिए है, सब से आलातरीन ताकत है, और परमात्मा यानी मैनिफैस्ट सैल्फ का भी क्रिएटर है, अफसोस कि अपने को सनातन धर्मी कहने वाले इतने साफ शब्दों में निराकार एबसोलूट गाड का जगह जगह वर्णन होने के बावजूद उसको नहीं पहचान पाए।
Gita.VIII.4
The principle of existence is the transient aspect, and spirit is the principle of divinity... (devataon ka mulya aadhar paramatma hai).
अगर महेश, विष्णु, ब्रहमा का रिश्ता अब तक नहीं समझे तो गीता में देख लीजिए। एबसोलूट गाड यानी ब्रहम की बात हो रही है, जो परम परमेश्वर और तमाम ईश्वरों में सब से महान यानी महेश है। फिर बताया गया कि परमात्मा यानी मैनिफैस्ट सैल्फ का आधार ब्रहम यानी महेश है। ब्रहम यानी महेश जो निराकार है उसने जब मैनिफैस्ट रूप क्रिएट किया तो वो ही तो विश्व का नुमायां चेहरा यानी वजहुल्लाह कहलाया। इसके बाद अगला स्टेज आता है जब मैनिफैस्ट सैल्फ ने चाहा कि इबादत करने वाले और अधिक हों तो उसने दिव्यात्मा शक्ति क्रिएट की, जो ब्रहमा कहलाई और इस ब्रहमा नामी नूर के विभाजन से 7 दिव्यात्माएं क्रिएट हुईं जिनमें एक देवी है। महेश, विष्णु, ब्रहमा तीन बराबर खड़ी ताकतें नहीं बल्कि एक के बाद एक क्रिएशन के प्रोसैस के विभिन्न स्टेजेज़ हैं।
गीता साफ कह रही है कि देवताओं का आधार मैनिफैस्ट सैल्फ यानी परमात्मा है और परमात्मा यानी मैनिफैस्ट सैल्फ का आधार ब्रहम यानी एबसोलूट गाड यानी अल्लाह है। और गीता ये भी कह रही है कि 7 दिव्यात्माएं किसी आने वाले समय में मानव शरीर में आकर sacrifices यानी कुर्बानियां देंगे।
Gita.VIII.4
...what pertains to sacrifice is Myself here in the body (paramatma, sprit, when it comes here in the body, gives sacrifices), O Most Superior Bearer of the Body (Arjuna).
अब एक जगह नवें और दस्वें मंत्र को देखिएः
Gita.VIII.9-10
He who meditates on the Poet-seer, the Ancient, the Ordainer, minuter than the atom, the Dispenser of all, of unthinkable nature, sun-coloured, beyond the darkness – who meditates at the time of departure with a steady mind possessed of devotion, as also of the strength that comes from yoga, well-fixing the life-breath betwixt the eyebrows, he reaches that supreme divine person.
जो ताकत सब से कदीम, एटम से भी छोटी है, जिसके बारे में सोचा नहीं जा सकता, जो जुलमत यानी तमस से भी आगे है, जो उसकी साधना करता है, उस पर मेडिटेट करता है, वो उसी तक पहुंच जाता है। ये है कानसैप्ट मोक्ष का।
Gita.VIII.13
Uttering the one syllable word Aum which is the absolute, while constantly remembering Me, he who departs abandoning the body, he it is who treads the highest path.
आप को रिश्ता समझना होगा। परमात्मा को याद रखते हुए परमात्मा की इबादत नहीं करनी। बल्कि परमात्मा यानी मैनिफैस्ट सैल्फ को याद रखते हुए ओम के माध्यम से एबसोलूट यानी कादिरे मुतलक खुदा के नाम का जाप करना है, उसकी इबादत करनी है। ऐसा करते हुए जो भी आत्मा शरीर को छोड़ती है, वो सब से बेहतरीन मकाम तक पहुंचती है। यही मोक्ष यानी सैलवेशन है। दरअस्ल ओम वह एक सिलेबल है जो इंसान की आत्मा का दिव्यात्माओं और परमात्मा के मार्ग से एबसोलूट गाड तक पहुंचने को दर्शाता है।
Gita.VIII.18
From the unmanifested all the manifested proceed at the coming of day; at the coming of night they merge in that same, name and unmanifested.
कादिरे मुतलक खुदा यानी एबसोलूट गाड अनमैनिफैस्टेड यानी निराकार है। उसको देखा नहीं जा सकता। उस अनमैनिफैस्टेड यानी निराकार से सारी साकार दुनिया वुजूद में आती है इस ब्रहमा दिन के प्रारंभ में और जब ब्रहमा दिन का अंत होता है तो वो तमाम साकार दुनिया निराकार में फिर से समा जाती है।
मैंने किताब ‘वन गाड वन रिलीजन’ में ब्रहद अराण्यका उपनिषद से दिखाया है कि कैसे निराकार ब्रहम यानी महेश यानी अल्लाह ने साकार ताकत क्रिएट की जिसको विष्णु कहा जाता है और कुरान ने साकार रूप को वजहुल्लाह कहा, यानी अल्लाह का चेहरा। ब्रहद अराण्यका उपनिषद बताता है कि साकार ताकत यानी विष्णु ने क्रिएट होते ही निराकार की पूजा और इबादत शुरू कर दी और फिर जब उसने चाहा कि इबादत करने वाले और हों, तो आगे का क्रिएशन वुजूद में आया, जिसमें सबसे पहले दिव्यात्मा शक्ति क्रिएट हुई जिसको ब्रहमा कहते हैं जो एक नूर था और साथ ही रूह भी थी, यानी दिव्यात्मा यानी नूरानी रूह थी, जो 7 में बंटी जिनमें एक देवी है। इन 7 दिव्यात्माओं का काम इंसान को निराकार ब्रहम यानी अल्लाह की पूजा और इबादत की ओर लाना है और पहले दिन से ये इसी काम में लगी हैं। बतौर नूरानी रूह भी ये हम को गाईड करती हैं और समय समय पर ये 7 नूरानी रूहें तप से पाक किए गये शरीर को आफिस बना कर उससे हिदायत देने का काम करती है।
अवतार वही होता है जिस व्यक्ति के शरीर को इन 7 नूरानी रूहों में से किसी एक ने अपने आफिस से चुन लिया और शरीर के माध्यम से इंसान को हिदायत देने का काम किया। मैं ये भी बताता आया हूं कि जहां जहां भी इंसान बसता था, वहां जब जब भी धर्म के उसूलों से लोग विमुख हो गये और अधर्म फैल गया, तब तब फिर से धर्म के उसूलों को स्थापित करने के लिए और अधर्मियों का नाश करने के लिए ये दिव्यात्माएं अवतार के रूप में आती रहीं।
अरब के रेगिस्तान के बीचों बीच यदि कुछ अलग हुआ तो ये कि 7 की 7 दिव्यात्माएं एक के बाद एक 14 मानव शरीर में अवतरित हुईं। जब ये खुदा के घर काबा के आस पास मानव शरीर में आईं, जिसको बैतुल्लाह कहा जाता है, तो इनको अहललबैत कहा गया।
किताब वन गाड वन रिलीजन में मैंने ऋग वेद से दिखाया है कि वो आने समय की भविष्यवाणी करते हुए कह रहा है कि जो मारूत तमाम सृष्टि के प्रारंभ में क्रिएट किए गये थे वो आने वाले समय में किसी छिपी हुई जगह पर, जिसको मकः बताया है एक बार फिर नवजात बच्चों के समान पैदा होंगे। क्या यही बात गीता में नहीं हो रही? निराकार महेश ने साकार विष्णू क्रिएट किया और फिर आगे की क्रिएशन फैलती चली गई और ब्रहमा दिन के अंत में यह तमाम साकार क्रिएशन फिर से वापिस विष्णु में सिमट दी जाएंगी और मैनिफैस्ट सैल्फ यानी विष्णु अनमैनिफैस्ट यानी एबसोलूट गाड में समा जाएगा।
See Quran.55.26-27
Every being on earth is bound to perish. Only the face of your Lord Himself, full of Majesty and Honour, will remain [forever]/
Quran.28.88 says:
And do not invoke any other god with Allah. There is no god except Him. Everything is bound to perish except his face…
कुरान और गीता ज़रा भी अलग बात नहीं कह रहे।
वेद और कुरान ब्रहमा के एक दिन की बात कर रहे हैं। कहा गया है कि ब्रहमा का एक दिन 1000 युनिटस का होता है यानी एक दिन में 1000 बार इंसान को दुनिया में भेजा जाता है और फिर इंसानियत नष्ट हो जाती है। उस एक दिन की शुरूआत में उस अनमैनिफैस्ट से, यानी जो दिखाई नहीं दे रहा, जो कादिरे मुतलक है, उससे हर वो चीज़ जो मैनिफैस्ट है वो वुजूद में आती है और पूरी सृष्टि, पूरी कायनात बनती है, और फिर उस दिन के खात्मे पर ये सब उसी में वापस समा जाते हैं।
जो अनमैनिफैस्ट है, जो कादिरे मुतलक है, वही इस सब को क्रिएट करता है और उसी में सब मैनिफैस्ट क्रिएशन वापिस समा जाती हैं। सब का ओरिजिन उसी से है और सब वापिस निराकार में समा जाती हैं।
इसी तरीके से गीता के बारहवें चैप्टर में अर्जुन फिर से सवाल पूछते हैंः
Gita.XII.1
Arjuna said: Those devotees who worship You, ever unitively, and those again (who meditated on) the Imperishable and the Unmanifested; of them which excels in yoga-knowledge.
हम को एक और बात समझना होगी। जो योग आज हम जानते हैं, वो कृष्ण का योग नहीं है, वो पतंजली का योग है। गीता के अनुसार हर वो एक्टिविटी जो ईश्वर के करीब कर दे वो योग है। कोई व्यक्ति अकल लगाए और अकल से ईश्वर के करीब हो जाए, वो योग है। कोई मैडिटेशन करे और ईश्वर के करीब हो जाए, वो योग है। वो रोए और रो कर ईश्वर के करीब हो जाए तो वो योग है। हम कोई कर्म करें और सिर्फ ईश्वर के लिए कर्म करें और उससे करीब होते चले जाएं तो ये योग है।
हम आज पतंजली के योग पर तो चल रहे हैं लेकिन कृष्ण के योग से बहुत दूर आ गये हैं।
अर्जुन जान रहे थे कि कृष्ण के मुख से परमात्मा यानी विष्णु यानी मैनिफैस्ट सैल्फ बोल रहा है। इसलिए पूछते हैं कि जो सिर्फ आप की इबादत करता है, यानी परमात्मा अर्थात मैनिफैस्ट सैल्फ से एक होने की नियत से इबादत करता है, वो बेहतर है कि जो अनमैनिफैस्टेड यानी निराकार एबसोलूट की इबादत करता है, वो बेहतर है।
इसका जवाब सुनिएः
Gita.XII.3-4
But those who mediate upon the Imperishable, the Undefinable, the Unmanifested, the All-Pervasive and the Thought-transcending, the Firmly-established, the Immobile, the Constant,
Gita.XII.5
The difficulty of those whose relational minds are set on the Unmanifested is greater, for the way of the Unmanifested is very hard for the embodied to reach.
कृष्ण के मुख से परमात्मा कह रहा है कि बेहतर ये है कि उस निराकार की इबादत की जाए जो इमपेरिशेबल है, यानी फना होने वाला नहीं है, अनडिफाईनेबल है, यानी जिसको वर्णित नहीं किया जा सकता, अनमैनिफैस्टेड है यानी निराकार है, आल परवेसिव है यानी सर्वव्यापि है और थाट ट्ांसेंडिंग है यानी हमारी समझ से परे है, आदि और फिर कहते हैं कि ये आसान नहीं है क्योकि भौतिक दुनिया में रची बसी हमारी सोच उस निराकार को आसानी से नहीं समझ सकती।
आप ने देखाः गीता भी उसी कादिरे मुतलक एबसोलूट गाड की पूजा और इबादत की बात कर रही है जिसको मुसलमान अल्लाह कहते हैं। साथ ही ये भी कह रही है कि अगर निराकार की समझ बना पाने में असक्षम रहो तो साकार की भी इबादत कर सकते हो क्योंकि निराकार की समझ बना पाना आसान नहीं है। कुरान में अल्लाह को निराकार, हर जगह मौजूद, जिस्म ओ जिस्मानियात से मुबररा भी बताया गया और विष्णु यानी वजहुल्लाह का जिक्र आया तो अर्श और कुर्सी की भी बात हुई, लेकिन मुसलमान इस अन्तर को समझ पाने में असक्षम हैं। वो दोनों को ही अल्लाह कहते हैं, भले ही वो निराकार है, और भले ही अर्श और कुर्सी की बात हो रही हो। जैसा मैं कहता आया हूं, वेद और गीता को समझे बिना मुसलमान अपने कुरान को भी नहीं समझ सकते।
अब आप समझे क्यों इस सृष्टि में पहले देवताओं को पहचनवाया गया, फिर परमात्मा को पहचनवाया गया और आखिर में निराकार अल्लाह को क्यों पहचनवाया गया। मैटिरियल वसवसों में गिरफतार इंसान के लिए आसान नहीं है कि वो अनमैनिफैस्टेड ताकत को समझ सके। लेकिन बेहतर यही है कि हम निराकार की समझ तक पहुंचे।
जब साकार को पहचनवाया जा रहा था वह वो जमाना था जब इंसान के लिए ये समझ पाना मुश्किल था कि कोई संदेश कैसे किसी वाहन के बिना कहीं दूर पहुंच सकता है। संदेश भेजने का मतलब था कि कोई घुड़सवार संदेश लेकर जाए या फिर कम से कम कबूतर के माध्यम से संदेश पहुंचे। आज किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है अगर आप कहें कि दो सैकंड में आप का संदेश कहीं हजारों मील दूर पहुंच गया। यही कारण है कि उस दौर के मुसलमानों को भी कुरान लाने के लिए जिब्रील को समझना पड़ा, उसके बिना उनको समझना मुश्किल हो जाता कि अल्लाह की ओर की आयतें कैसे पैगम्बर मौहम्मद तक पहुंच गईं। जबकि वेद कह रहा था कि वो ऋषियों के मस्तिष्क में अवतरित हुए। अफसोस कि निराकार की इतनी गहरी समझ रखने वाले सनातनी समय के साथ वेद और गीता में बताए गये डिवाईन क्रिएशन प्लान को ही भुला बैठे और भटक कर हिन्दू हो गये।
दिमाग उस लेवल पर तैयार नहीं थे कि न दिखने वाली ताकतों को पहचान सकते। यही कारण बना कि देवताओं की आवश्यकता थी कि जो एक ओर परमात्मा से जुड़े हुए हैं और दूसरी ओर इंसान से जुड़े हुए हैं।
इसी प्रकार एक और जगह गीता कहती हैः
Gita.XIII.12
I shall declare that which is to be known, which being known one gains immortality, the beginningless, having Me as its supreme culminating factor, the Absolute which is said to be neither existence nor existence.
यहां फिर एबसोलूट की बात हो रही है। एबसोलूट की बात परमात्मा थर्ड पर्सन में कर रहा है। ‘वह’ या ‘He’ करके बात कर रहा है। और जब परमात्मा बात कर रहा है तो फस्र्ट पर्सन में बात कर रहा है। ‘मैं तुम्हें समझाता हूं’। और परमात्मा ही हमें एबसोलूट को पहचनवा रहा है।
गीता कह रही हैः
Gita.XIII.17
The Light even of lights, That is said to be beyond darkness; knowledge, the knowable and what is to be reached through knowledge; particularly located in the hearts of everyone.
उस समय की सब से बड़ी समस्या यह थी कि लोग देवताओं को खुदा मान रहे थे और देवताओं के बड़ा किसी ताकत को समझने को तैयार नहीं थे। देवता का मूल शब्द ‘दिव्य’ यानी लाईट है।
गीता कह रही है कि वो खुदा इन नूरों का भी नूर है, यानी तमाम नूरानी रूहों की चमक दमक उसके कारण है। कुरान में भी अल्लाह को नूरों का नूर बताया गया है।
जुलमत तो जब बनी जब नूर क्रिएट हुआ। जिस खुदा को परमात्मा कृष्ण के मुख से पहचनवा रहा है वो जुलमत से भी परे है। जुलमत का वुजूद भी नहीं था जिस समय से वो मौजूद है।
एक खुदा की बात सिर्फ कृष्ण नहीं कर रहे। राम की बहुत अधिक शिक्षा हम तक नहीं पहुंची लेकिन मुक्तिका उपनिषद में राम भी हनुमान से बात करते हुए उसी निराकार एबसोलूट की पूजा और इबादत करने की जरूरत बता रहे हैं।
Muktika Upanishad (II.II.72-77)
O son of Vayu! Always worship My Reality that is destructive of pains, without sound, touch, form, decay, taste, destruction or smell, and without name and Gotra (clan). I am that non-dual One (Brahman) that is of the nature of the visible (Jnana), like unto the Akas, supreme, always shining, without birth, non-dual, without destruction, without attachment and pervading all.
क्योंकि परमात्मा के एक अवतार राम भी थे इसलिए राम के मुख से परमात्मा बात कर रहा है और कह रहा है कि मेरी उस हकीकत की हमेशा पूजा करो जो निराकार है, यानी एकमैव ब्रहमन है और फिर निराकार एबसोलूट को समझाने की कोशिश करते हैं। याद रखने की बात ये है कि वो सूफी जिन्होंने अन अल-हक का नारा लगाया, वो जान रहे थे कि जो कुछ साकार क्रिएशन है वो परमात्मा की ताकत के अन्दर है और एक दिन उसी में सिमट जाना है। उससे जुदा कुछ भी नहीं। राम के शरीर को कोई न कोई दिव्यात्मा आफिस बनाए होगी तब तो उनके मुख से परमात्मा बात कर रहा था लेकिन परमात्मा भी यदि इबादत औरर पूजा की बात करता है तो निराकार ब्रहमन की ही इबादत करने का संदेश देता है।
ये वैसे ही था जैसे कृष्ण के मुख से पररमात्मा बात कर रहा था।
ये समझने के लिए आप को कुरान का सहारा लेना पड़ेगा। पैगम्बर मौहम्मद के मुख से कुरान के शब्द निकल रहे हैं। लेकिन बोल कौन रहा है। मौहम्मद के मुख से फस्र्ट पर्सन में परमात्मा बात कर रहा है और कुरान में तो मौहम्मद के मुख से जो आयतें निकल रही हैं वो मौहम्मद को ‘तुम’ कह कर सैकंड पर्सन में मुखातिब कर रही हैं। कुरान में भी एबसोलूट गाड की बात थर्ड पर्सन में हुई है और गीता में भी परमात्मा फस्र्ट पर्सन में बात कर रहा है और एबसोलूट गाड की बात थर्ड पर्सन में हो रही है। आगे जब हम आप को परमात्मा का अस्ल रोल बताएंगे तो आपको तमाम बात और साफ समझ में आने लगेगी।
Svetasvatara Upanishad.II.14
Even as a mirror stained by dust shines brightly when it has been cleaned, so the embodied one when he has seen the nature o fthe self becomes integrated, of fulfilled purpose and freed from sorrow.
Svetasvatara Upanishad.II.15
When by means of the nature of his self he sees as by a lamp here the nature of Brahman, by knowing God who is unborn, steadfast, free from all natures, he is released from all fetters.
जब कोई व्यक्ति उस ब्रहमन का नेचर समझ पाता है जो अनबार्न है, यानी जो अजन्मा है, जो नेचर की तमाम कैद से परे है, तो उसकी तमाम अज्ञानता दूर हो जाती है और वो मोक्ष की राह पर आगे बढ़ने लगता है।
Svetasvatara Upanishad.II.16
He indeed, is the God who pervades all regions, He is the first-born and he is within the womb. He has been born and he will be born. He stands opposite all persons, having his face in all directions.
साफ कहा जा रहा है कि यही गाड, जो एबसोलूट यानी कादिरे मुतलक है, निराकार है, सृष्टि के हर कण में वो मौजूद है,
Svetasvatara Upanishad.II.17
The God who is in the fire, who is in the water, who has entered into the whole world, who is in plants, who is in trees, to that God be adoration, yea, be adoration.
तमाम तारीफें, तमाम प्रशंसाएं उस ब्रहमन के लिए है जो अग्नि में भी है और जल में भी, जो तमाम सृष्टि में मौजूद है, यहां तक कि पौधों और पेड़ों में भी।
आप देख रहे हैं कि एक खुदा की बात कितने साफ तौर पर हर जगह हो रही है।
Gita.II.59
Objective interests revert without the relish for them on starving the embodied (of them). Even the (residual) relish reverts on the One Beyond being sighted.
कृष्ण को जो लोग स्वयं भगवान माने बैठे हैं वो भी गौर करें कि कृष्ण के मुख से परमात्मा थर्ड पर्सन में किसी और निराकार एबसोलूट गाड की बात कर रहा है जो नज़रों से दिखाई देने से परे है। मोक्ष यानी सैलवेशन की राह पर गामज़न मुजाफिर की नजर हर समय सिर्फ महेश यानी ब्रहम तक पहुंचने की होती है, जो तमाम दिखाई देने वाली ताकतों से परे है, और वो बस उसकी चाहत में निरंतर कोशां रहता है।
क्या अब समय नहीं है कि हम अकल की रौशनी में अपनी समझ को सुधारें और हर एक को वही मक़ाम दें जो इस डिवाईन क्रिएशन प्लान में रब ने बना रखा है?
आगे देखिए गीता क्या कह रही हैः
Gita.II.72
This is the state of being in the Absolute (Brahman) O Partha (Arjuna), on reaching which one suffers from delusion no more. Established in this at the very last moments of life, one reaches that final state of pure being (nirvana) in the Absolute (Brahman).
साफ कहा जा रहा है कि जब जिंदगी के अंतिम पल आ जाएं, यानी मौत एकदम करीब हो, उस समय जो केवल और केवल एबसोलूट यानी परम परमेश्वर ब्रहमन में अपनी अपनी आत्मा को रमे हुए हो, तो वो तमाम भ्रम से निजात पा जाता है और मरने के बाद ऐसा व्यक्ति ही निर्वाण यानी पाकीजगी के उस अंतिम चरण तक पहुंच पाता है जहां हमेशा हमेशा की जिंदगी है।
यहां याद दिलाना आवश्यक है कि वेद दिव्यात्माओं के लिए परफैक्ट प्यूरिटी यानी मुकम्मल सम्पूर्ण पाकीजगी की बात करते हैं और यही दिव्यात्माएं जब अरब के रेगिस्तान में नवजात बच्चों के शरीर में आईं और फिर उन्हे अहललबैत कहा गया तो कुरान की आयत भी उनकी परफैक्ट प्यूरिटी की गारंटी लेती हुई उतरी।
7 दिव्यात्माओं की बात करते हुए जिन में एक देवी है मुंडक उपनिषद कहता है कि जब ये दिव्यात्माएं हमारे बीच चमक दमक रही होंगी, यानी जब ये मानव शरीर में हमारे बीच आएंगी, और ऐसा किसी खास समय पर होगा, तब जो कोई भी कर्म करेगा और इनके मार्ग पर कुर्बानियां देगा तो ये उसको वहां ले जाएंगी जहां इनका एक रब मौजूद है।
Mundaka Upanishad..I.2.5
Whosoever performs works, makes offerings, when these are shining and at the proper time, these in the form of the rays of the sun lead him to that where the one lord of the gods (read Devas) abide.
आप ने देखा, इन 7 दिव्यात्माओं को खुदा नहीं कहा जा रहा जिनमें एक देवी है बल्कि इनका भी कोई आका और रब है और इनका जिम्मा इनकी राह पर आ जाने वालों को वहां ले जाना है जहां इनका रब विराजमान है। साफ है, इनके दिखाए और बताए मार्ग पर चलकर ही मोक्ष यानी निजात यानी निर्वाण यानी सैलवेशन है।
जो कोई अपनी जिंदगी के अंतिम पलों में उस निराकार तक पहुंच जाता है या पहुंचने के बाद अंतिम पलों तक उस मकाम पर ठहरा रहता है, उसके लिए ही मोक्ष यानी निजात यानी निर्वाण यानी सैलवेशन है। परमात्मा और देवताओं को न नकारते हुए, उनकी पोज़ीशन को बरकरार रखते हुए, गीता एबसोलूट गाड की ओर ले जाने की बात कर रही है, उन लोगों के सामने जो देवताओं की पूजा करने लगे थे, और देवताओं के आगे यज्ञ आदि के दौरान हवन में जलती आग में तेल आदि डालकर कुछ मंत्र पढ़ने को ही सैकरीफाईसेज़ मानते थे और ऐसा करने को ही धर्म समझते थे।
इसी प्रकार गीता के तीसरे चैप्टर का 42वां और 43वां मंत्र क्या कह रहा है देखिएः
Gita.III.42
It is taught (in ancient tradition) that the senses are beyond (transcendental); beyond the senses is the mind, beyond the mind is reason and beyond reason is He (the Absolute).
Gita.III.43
Thus knowing Him to be beyond reason, immobilizing the atma by the atma, O Mighty-Armed (Arjuna), kill that enemy in the form of desire (so) difficult to encounter.
उसको अकल से समझना भी मुमकिन नहीं! गीता कह रही है कि तमाम इंद्रियों से परे मस्तिष्क है और मस्तिष्क से परे अकल है और अकल से भी परे वो एबसोलूट ब्रहमन है। अपनी आत्मा को परमात्मा की सीधी राह पर लगाना होगा ताकि इंद्रियां और मैटिरियल दुनिया की खींचतान हमें विचलित न कर सके और हमारी अच्छाएं हमें भटका न सकें, जिन से लड़ना सब से कठिन कार्य है।
समझे आप, अपनी आत्मा को पाकीजगी की राह पर लगा कर, दिव्यात्माओं के मार्ग पर आगे अग्रसर होते हुए, परमात्मा के करीब करने की कोशिश करो, और अंतिम ध्यय उस निराकार एबसोलूट तक पहुंचना होना चाहिए जो परमात्मा यानी विष्णु यानी साकार ताकत का भी क्रिएट करने वाला है।
एक और उपनिषद देखिएः
Mandalabrahmana-Upanishad (Brahmana II) describes the same
in following words:
He who knows Brhaman and who is the sole enjoyer of brahmic bliss which is eternal and has dawned upon (for all in him) – that man becomes one with Brahman. He in whom sankalpa perishes has got mukti in his hand. Therefore one becomes an emancipated person through the contemplation of Paramatma. Having given up both bhava and abhava, one becomes a jivanmukta (attains salvation) by leaving off again and again in all states jnana (wisdom) and jneya (object of wisdom), dhyana (meditation) and dhyeya (object of meditation), lakshya (the aim) and alakshya (non-aim), drsya (the visible) and adrsya (the non-vsible) and uha (reasoning) and apoha (negative reasoning). He who knows this knows all.
Gita.IV.11
As each chooses to approach Me even accordingly do I have regard for him. My very path it is, O Bharata (Arjuna), that all men do tread from every (possible) approach.
इसमें उपनिषद ब्रहमन और परमात्मा दोनों से करीब होने की बात कर रहा है। ब्रहमन से करीब जाकर जब कोई व्यक्ति उसमें समा जाता है, वो सब से बड़ी खुशी, bliss की स्टेज कहलाती है। यानी वो स्टेज जो खुशी की चरम सीमा होती है। कई सूफी भी खुदा के जुड़ाव के इस स्टेज तक पहुंचकर कहने लगते थे कि मैं ही हक हूं, इस हद तक कि हाथ पैर काट दिए गये, आंखें फोड़ दी गईं, आग में जला दिया गया और सूली पर लटका दिया गया, लेकिन उनके लिए अब वहां से वापसी क्हां मुमकिन थी। क्योंकि वो तक ब्रहमन में पहले ही एक हो चुका था, अब दुनिया में क्या वापिस आता?
आप ने देखा कि ब्रहमन के लिए कहा जा रहा है कि वो अकल से परे है और परमात्मा के लिए चिंतन और मनन की बात हो रही है, अवलोकन की बात हो रही है। परमात्मा के बारे में ध्यान लगाना है, अकल लगाना है, उसके मार्ग को अकल की कसौटी पर पहचानना है।
फिर गीता की तरफ पलटते हैंः
Gita.IV.24
(For him) the Absolute is the act of offering, the Absolute is the substance offered into the Absolute which is the fire offered by (him) the Absolute, the end to be reached by him being even the Absolute by means of his peace supreme of absolutist action.
यहां उन लोगों से बात हो रही है जो यज्ञ के दौरान आग को तेल अर्पित करके समझ रहे थे बस यही कर्म है, भले ही उनकी आत्मा का लेवल कुछ भी क्यों न हो। हर हर कर्म एबसोलूट के लिए करने की बात हो रही है। उस निराकार परम परमेश्वर को याद रखते हुए कर्म करने की बात हो रही है जो निराकार है, सारी सृष्टि का एकमैव क्रिएटर और मालिक है और परमात्मा यानी विष्णु यानी वजहुल्लाह और देवता, जिनमें भले ही देवताओं के राजा इंद्र हों, या महादेव हों, सब के सब उसी एबसोलूट की ओर इंसानियत को लाने की कोशिश मे ंनिरंतर लगे है।
साफ कहा जा रहा है कि जो कुछ देेना है उसी एबसोलूट को देना है, उसी के आगे अपने को और अपने कर्म को अर्पित करना है। तुम को फिज़िकल अग्नि जलाने की जरूरत नहीं है, उसी की अग्नि में तप करो और कर्म करो, यही तुम्हारा मकसद होना चाहिए।
इसके अगले मंत्र में गीता वेद के उन देवताओं की बात कर रही है जिनके आगे कुछ योगी बलि या आहूति़ पेश करते हैं लेकिन अस्ल बलि या आहूति केवल और केवल एबसोलूट ब्रहमन के आगे होनी चाहिए।
Gita.IV.25
As referring to the gods (of the Vedas) is (the nature of) the sacrifice of some yogis (men of unitive discipline); others offer into the fire of the Absolute by sacrifice itself.
आप ने देखा इस हद तक उपनिषद और गीता आदि एक निराकार एबसोलूट की पूजा और इबादत की ओर इंसान को लाने के लिए कोशिश करते नज़र आते हैं। आज जो नजरया आम है, जैसे आप किसी आम मुसलमान से बात करें, तो वो यही कहेगा कि हिन्दु अनेक खुदाओं को मानते हैं, और उनमें एक खुदा का कानसैप्ट मौजूद नहीं है। आम हिन्दू भी नहीं जानते उनकी अपनी किताबें क्या बात कर रही हैं। बल्कि जो कृष्ण सारे कर्मों को एक निराकार एबसोलूट को समर्पित करने की शिक्षा दे रहे थे, और थर्ड पर्सन में उसकी बात करके साफ कर रहे थे कि वो मैं नहीं हूं, अनेक हिन्दुओं ने उन कृष्ण को ही खुदा मान लिया।
अफसोस की बात ये है कि मुसलमानों ने सनातन धर्म की किताबों को अपना समझा ही नहीं, और दूसरों की किताबें समझते हुए उनको नकार दिया।
गीता के पांचवे चैप्टर का दसवां मंत्र कह रहा हैः
Gita.V.10
Placing all actions in the Absolute, having given up attachment, he who acts is not affected by sin, like a lotus leaf by water.
अपने सब कर्मों को बस उस एबसोलूट के लिए करते जाए, इस दुनिया की तमाम चीजों से कोई मोह बरकरार न रखते हुए। ऐसा व्यक्ति जो कर्म करता है उसको गुनाह नहीं छूता जैसे कमल के फूल की पत्ती को पानी दूषित नहीं करता।
Gita.V.15
The all-pervading One takes cognizance neither of the sinful nor of the meritorious actions of anyone; wisdom is veiled by unwisdom; beings are deluded thereby.
मुसलमान बताएं कि The all-pervading One क्या अल्लाह के अलावा किसी और के लिए प्रयोग हो सकता है जिसको वो अपनी गर्दन की रग से भी करीब मानते हैं।
ये मंत्र साफ कह रहा अकल को भटकाने और गुमराह करने के तरीके भी इसी दुनिया में मौजूद हैं, जिसके कारण लोग सत्य मार्ग की समझ से भटक जाते हैं और तरह तरह की सोच बना लेते हैं।
अली ने इस बारे में क्या कहा सुनिएः
Nahjul Balaghah, Sermon 87
Although, his outward appearance is like a human being but his heart is like an animal heart. He does not recognize the path of guidance so that he could follow it, and does not know the path of deviation so that he could avoid it. Such a person is indeed a dead one living among the alives.
Those however in whom that unwisdom in the Self has been destroyed, to those wisdom shines sunlike as the Ultimate (the Absolute).
Gita.V.17
Those having That (Absolute) for reasoning, That for the Self, That for finalized discipline, That for supreme goal, they go to a state of final non-return, all their (relativistic) dross being cancelled-out by wisdom.
जिन्होंने अपनी अकल से मार्ग को पहचान लिया और उस लेवल तक पहुंच गये जिसकी उनसे उम्मीद है तो यदि उन्होंने कुछ गुनाह भी किए हैं तो वो भी धुल जाते हैं और अकल से ढूंढा मार्ग ही उनको एबसोलूट तक पहुंचा देता है।
हम गीता, वेद और उपनिषद से ऐसे अनगिनत उदाहरण और दे सकते हैं जिनमें आप देखेंगे कि कैसे एक निराकार एबसोलूट गाड को जिसको ब्रहमन कहा गया, उसको जगह जगह पहचनवाया जा रहा है। अवाम क्या समझ रही है और क्या मायनी पहनाए हैं, उससे हमें कोई सरोकार नहीं, हम तो आपको दिखा रहे हैं कि ये ग्रंथ क्या बात कर रहे हैं। हम तो खुदा की ओर आए उन स्क्रिपचर्स से बात कर रहे हैं जिनके कारण सनातन धर्म बना। सनातन यानी हमेशा से कायम रहने वाला धर्म आप स्वयं देख रहे हैं कि एक खुदा की बात कर रहा है।
हिन्दुओं के लिए भी लाजमी हो जाता है कि वो इन स्क्रिपचर्स को फिर से पढ़ें और देखें की क्या बात हो रही है। जैसा मैं बताता आ रहा हूं, बहुत सारे वाईटल लिंकस को न समझ पाने के कारण हम नहीं समझ पाए कि क्या बात हो रही है। हम को फिर से अपने स्क्रिपचर्स को पढ़ना होगा।
जैसा मैं ने बताया, काव्य महाभारत की रौशनी में जब हमने गीता को पढ़ा तो हम कन्फयूज हो गये कि क्या बात हो रही है। महाभारत तो एक आम आदमी की लिखी किताब थी जिसके लेखक को कितना सत्य मार्ग स्वयं समझ में आया था, कितना नही ंहम टिप्पणी नहीं कर सकते। उसने उस युद्ध को जैसा देखा वैसा ही समझाने की कोशिश की। यदि उसको यही समझ आया कि युद्ध हस्तिनापुर पर कब्जे के लिए था तो उसने वैसा दिखाने की कोशिश की। जो धर्म गुरू उस समय इतने आदर से देखे जाते थे कि उनके आहवान पर अनगिनत राजा अपनी अपनी फौजें लेकर कृष्ण से लड़ने आ गये, वो उन्हें कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता था हालांकि कृष्ण उन लोगों के लिए कह रहे हैं कि ये तो पहले से मरे हुए हैं, यानी इनकी आत्मा मर चुकी है। कृष्ण जिन लोगों के लिए कह रहे हैं उनमें समय के धर्म गुरू भी थे। क्योंकि महाभारत का लेखक एक आम व्यक्ति था, वो कृष्ण के कथन के मायनी को नहीं समझ सका। कृष्ण क्योंकि हक के नुमाईंदे थे उनके लिए महत्व उस व्यक्ति का है जिसने हक को पहचान लिया और उस मार्ग पर आगे बढ़ा, भले ही ऐसे लोग कम संख्या में हों।
हम बार बार देख रहे हैं कि गीता एबसोलूट खुदा की बात कर रही है और कृष्ण का उपदेश उन लोगों के सामने दिया जा रहा है जिन्होंने देवताओं की पूजा प्रारंभ कर दी थी, यहां तक कि कुल देवता बना लिए थे और हर परिवार अलग देवता की पूजा करता था और ऐसा करने को ही धर्म समझते थे।
गीता में साफ कहा जा रहा है कि अवतार तब आता है जब अधिक संख्या में लोग धर्म से विमुख हो जाते हैं। हम को अकल की रौशनी में समझना होगा कि कृष्ण जब आए तो भी ऐसे ही हालात थे भले ही उस समय के ब्राहमण और क्षत्रिय बड़े बड़े अनुष्ठान कर रहे थे और देवताओं के आगे बलियां चढ़ा रहे थे या यज्ञ आदि करने मे लगे थे।
गीता साफ कह रही है कि सारी इबादतों को केवल एबसोलूट के लिए ही करना है जैसा कि पांचवे चैप्टर के 17वें मंत्र में आप ने देखा। एबसोलूट खुदा के मार्ग पर अपने को समर्पित कर देने वाले ही उस मकाम तक पहुंचते हैं जो मोक्ष यानी निजात यानी निर्वाण यानी सैलवेशन का मकाम है जहां से कोई वापसी नहीं है।
Gita.V.19
Even here creative urges are conquered by those whose minds are balanced in sameness; free from blemish and unitively balanced is indeed the Absolute; therefore such (persons) become grounded in the Absolute.
Gita.V.20
He may not rejoice on good befalling him nor be disturbed on a mishap; stabilized in reason, delusion-free, as knower of the Absolute, firmly established is he in the Absolute.
Gita.V.21
That (same) joy which is felt by one in his own Self when he is unattached to outer contacts (such as touch), he whose Self has established unity with the Absolute experiences also never-decreasingly.
Gita.V.25
Seers, their evils weakened, cutting themselves away from conflicting pairs of interests, who are self-controlled, who are ever kindly disposed to all beings, attain to self-effacement (nirvana) in the Absolute (Brahman).
समझिए, आप को निर्वाण चाहिए तो आपको वेद, गीता और उपनिषदों के मार्ग को समझना होगा।
Amrtabindu Upanishad says:
A wise man having known that Brahman, that is without fancy, without end, without cause, or example, beyond inference and without beginning, is emancipated. There is (for him then) no destruction, no creation, no person in bondage, no devotee, no aspirant for salvation, no emancipated person. This is the truth.
निजात उस व्यक्ति के लिए ही है जो ब्रहमन को पहचान ले। ब्रहमन के लिए क्या क्या विशेषण प्रयोग हुए हैं आप स्वयं देख सकते हैं।
एक और उपनिषद देखिएः
Naradaparivrajaka-Upanishad:
One (fit to reach salvation), after leaving all meritorious actions to those dear to him and all sins to those not dear, attains the eternal Brahman through dhyana-yoga. Such a man, through ordinances, gives up little by little all associations, and being freed from all pairs of opposites, remains in Brahman alone.
उस तक पहुंचने के बहुत तरीके बताए गये हैं और हर वो तरीका जिससे खुदा तक पहुंचा जा सकता है वही वेद है। ध्यान के माध्यम से एबसोलूट तक पहुंचा जा सकता है, और वो भी योग है। गीता का पन्द्रवां चैप्टर एक उल्टे पेड़ की बात कर रहा है, जिसकी जड़े स्वर्ग में हैं और उसकी शाखें इस दुनिया में आई हुई हैं। हम किसी लैक्चर में उस उल्टे पेड़ की बात करेंगे। इस समय जो बात समझनी है वो ये कि वहां भी यही कहा जा रहा है कि इस उल्टे पेड़ की शाखों से जड़ों तक पहुंचना, पेड़ का महत्व है लेकिन उसको पकड़ कर चिपक नहीं जाना है, उसका महत्व होते हुए उससे आगे निकल जाना है, और एबसोलूट तक पहुंचना है।
Gita.IV.24
(For him) the Absolute is the act of offering, the Absolute is the substance offered into the Absolute which is the fire offered by (him) the Absolute, the end to be reached by him being even the Absolute by means of his peace supreme of absolutist action.
वेद में उपनिषद में गीता में एक राज़ समझने की बात बार बार हो रही है। उस राज को समझना है। राज़ है ये रिश्ता। वो रिश्ता है हम कैसे जुड़े हैं एबसोलूट से। हम क्या डायरैक्ट जुड़े हैं या बीच में और भी ताकतें हैं जो अपना अपना काम कर रही हैं। उस राज को समझना है। गीता के आखिरी चैप्टर में तो ये तक कहा जा रहा है कि जो इस राज को समझ ले और दूसरों को बता दे उसके लिए मोक्ष यानी निजात गारंटीड है।
वेद और गीता की शिक्षा को जो भी ध्यान लगा कर समझने की कोशिश करे और अंत उसके बताए मार्ग को समझ ले और उस पर चले, वही उस इंतेहाई मंज़िल तक पहुंच जाता है जिस मंजिल को मोक्ष यानी निजात यानी निर्वाण यानी सैलवेशन कहते हैं और जिस मंजिल को हम पहचान कर हम उस मार्ग पर चलें, इसी मकसद से इंसान को इस दुनिया में भेजा गया है।
Gita.VIII.28
Whatever meritorious result is found implied in the Vedas, in sacrifices, austerities and offerings (gifts), the contemplative who is unitively established, having understood this (teaching here) transcends all these and attains to the supreme primal state.
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