आसमान की बादशाही - Part 1
उन दिनों में युहन्ना बपतिस्मा देने वाला आया और यहूदिया के ब्याबान में ये मुनादी करने लगा किः तौबा करो क्योंकि आसमान की बादशाही नज़दीक आ गई है। ये वही है जिसका ज़िक्र यसियाह नबी की मारेफत यूँ हुआ किः
ब्याबान में पुकारने वाले की आवाज़ आती है
खुदा वंद की राह तैयार करो
उस के रास्ते सीधे बनाओ।
अल्लाह के सीधे रास्ते बनाने की ताबीर अधूरी रह जाती अगर आखि़री नबी मौहम्मद सीधे रास्ते यानी सिराते मुस्तक़ीम को पेश न करते। अपने 23 साला ज़ाहिरी रिसालत के दौर में मौहम्मद ने उस सीधे रास्ते को वाज़ेह तौर पर ब्यान किया और बताया कि सिराते मुस्तक़ीम के तहत क्या-क्या आता है; यहाँ तक कि ग़दीर के मैदान में आखि़री आयत नाज़िल हुई जिस के बाद दीन कामिल हो गया और नेयमतें मुकम्मल हो गईं। ग़दीर का दिन अहम है इसलिए कि आखि़री बार मौहम्मद ने अपने लम्बे ख़ुतबे में सिराते मुस्तक़ीम के तमाम अजज़ा को ब्यान किया ताकि मुसलमान भटकाव भरे रास्तों को छोड़ कर सीधे रास्ते पर चलें।
हर नमाज़ में दो बार सूरः हम्द का पढ़ना वाजिब कर दिया गया जिसमें दुआ है कि ‘ऐ ख़ुदा, साबित कदम रख हमको सीधे रास्ते पर, उनके रास्ते पर जिन पर तूने नेयमतें नाज़िल कीं, न कि उनके रास्ते पर जिन पर तेरा अज़ाब है।’
अफसोस कि मुसलमानों का एक बड़ा तब्क़ा ज़ोर शोर से कहने लग गया कि इस्लाम में किसी के वसीले से अल्लाह से दुआ माँगना हराम है। क्या करें अल्लाह की तदबीर को कि ये किसी भी हाल में अपनी पाँच वक़्त की नमाज़ों से सूरः हम्द नहीं निकाल सकते जिसमें रोज़ वो कुछ ऐसी शख़्सियतों का ज़िक्र करते हैं जिन पर अल्लाह ने नेयमतें नाज़िल कीं और जिनके रास्ते पर चलने की दुआ करते हैं। ये वसीला नहीं तो और क्या है? हाँ ये ज़रूर है कि वसीला वो नहीं बन सकता जिस को हम पाकदामन और पाककिरदार समझते हैं या जिसे हम मुनतखि़ब करते हैं बल्कि वसीला वो जिस पर अल्लाह अपनी नेयमतें नाज़िल करे या जिस को अल्लाह पाकदामन और पाककिरदार कहे। जिन्होंने तारीख पढ़ी है वो भली भाँति पहचानते हैं उस वक़्त को जब सूरः हम्द की तफसीर सामने आ गई और किसी ख़ास शख़्स की पहचान करवाने पर कुरआन ने, जो किसी और वक़्त अहलेबैत की पाकीज़गी की गवाही दे चुका था, एलान कर दिया कि आज के दिन नेयमतें मुकम्मल हो गईं और मौहम्मद का दीन कामिल हो गया।
ग़दीर में जिस शख़्स की पहचान मौहम्मद ने इन अलफाज़ से कराई कि ‘जिस का मैं मौला उसका ये अली मौला’ उस अली को मौहम्मद के पैग़म्बरी का दावा करने से कई साल पहले अल्लाह ने बमोजिज़ा खाने काबा यानी अल्लाह के घर में पैदा करके दिखा दिया था कि अल्लाह के नज़दीक अहलेबैत यानी घर के लोगों में कम से कम अली तो यक़ीनी हैं। चादरे किसा में दाखि़ल करके या ईसाईयों से मुबाहिले के मौक़े पर और ऐसे कई दूसरे मौक़ों पर रसूल ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी कि अहलेबैत को पहचनवायें। यहाँ तक कि वक़्ते आखि़र भी काग़ज़ क़लम माँग रहे थे कि लिख दें ताकि मुसलमान गुमराह न हों मगर मुसलमानों को ये तो गवारा था कि कहें कि रसूल हालते बीमारी में हिज़यान बक रहे हैं मगर ये गवारा न था कि काग़ज़ क़लम दे दें और देखें कि उनका रसूल आखि़री वक़्त क्या लिख कर जाता है। शायद जानते थे कि क्या लिखेंगे!
रसूल ने इतनी बार पहचनवाया था कि बेचारे मुसलमान नकार तो न पाए। जब तारीख़ की हर किताब में मौजूद था कि अहलेबैत यानी घर के लोग कौन हैं तो कैसे कहते ये नहीं हैं। हाँ ये ज़रूर क्हा कि अहलेबैत से मुराद मौहम्मद के घर के लोग हैं। चलिए मौहम्मद के घर के लोग ही मान लें लेकिन मौहम्मद के घर के ये लोग ऐसे थे कि इनकी फज़ीलत और पाकीज़गी की गवाही कुरआन ने ही दे दी।
मगर मुसलमान अपने ही जाल में फंस गए! कुरआन के लिखने वाले तो मौहम्मद न थे? कुरआन में मौहम्मद को ‘तुम’ कह कर खिताब करना बताता है कि मौहम्मद तो सिर्फ बन्दे हैं उसके जिस ने कुरआन को नाज़िल किया। कुरआन का
नाज़िल करने वाला जब इन अहलेबैत का ज़िक्र करता है तो उन्हें मौहम्मद के घर वाला न कह कर सिर्फ घर वाला कहता है। जहाँ ये ‘घर वाले’ रह रहे थे वहीं पास में अल्लाह का घर ख़ाने काबा मौजूद था फिर भी मुसलमानों को ये बात समझ न आई कि ये मौहम्मद के घर की नहीं बल्कि किसी आसमानी घर की बात हो रही है जिस के सब से अहम फर्द मौहम्मद हैं। ये इस से भी ज़ाहिर है कि जब ‘ऐ घर वालो’ कह कर कुरआन ने मुख़ातिब किया तो उस में मौहम्मद को भी शामिल किया; ये बताता है कि मौहम्मद के घर की नहीं बल्कि उसके घर की बात हो रही है जो कुरआन का भेजने वाला है और जिसके घर वालों के नाम मौहम्मद, अली, फातमा, हसन, हुसैन, मूसा और जाफर हैं। यही 7 नाम सब से अफज़ल हैं जो 14 मासूम या 14 अहलेबैत की शक्ल में आए।
ये घर वाले वो हैं जिन्हें पहचाने बग़ैर निजात नामुमकिन है। इन्ही मख़्सूस बन्दों पर अल्लाह ने अपनी नेयमतें नाज़िल कीं और इन्ही के रास्ते पर चलने की दुआ हर मुसलमान दिन में कम से कम दस मरतबा करता है। इन्ही का रास्ता सिराते मुस्तक़ीम यानी सीधा रास्ता है जिस पर चल कर मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा जा सकता है।
एक मुसलमान की मंज़िल क्या है? क्या दुिनया में माल-व-दौलत हासिल करना और यहाँ खुशियों का अंबार लगा लेना ही मंज़िले मक़सूद है। कुरआन खुद ही कह रहा है कि दुनिया की तमाम आराईशें खुदा ने इंसान के भले के लिए बनाईं। तो क्या यही मंज़िल भी हो सकती है? नहीं! इसलिए नहीं क्योंकि कोई भी चीज़ अपने से अफज़ल के लिए बनाई जाती है। अगर दुनिया की आराईशें इंसान के लिए बनी हैं तो वो इंसान से कमतर हुईं। इंसान इनकी मदद अपनी मंज़िल को पाने में तो ले सकता है लेकिन मंज़िल यक़ीनन कुछ और होगी जो इस इंसान से अफज़ल होगी।
सीधा रास्ता उसी मंज़िल तक पहुँचने का सब से छोटा रास्ता है। तमाम उम्र अहलेबैत इसी रास्ते पर चलकर दिखाते रहे ताकि हमारे लिए मंज़िले मक़सूद तक पहुँचना आसान हो जाए। कुरआन भी बार बार पुकार कर कह रहा है कि अक़्ल इस्तेमाल करो, तदब्बुर करो और जो निशानियाँ तुम को दी गई हैं उन्हें अगर झुटलाओगे तो जल्द हिसाब होगा। कुरआन और अहलेबैत ने इतनी रौशन हक़ीक़तें बताई हैं कि उनको झुटला पाना नामुमकिन है। लेकिन कभी कभी जो चीज़ सामने है वो दिखाई नहीं देती। इसी वजह से अल्लाह हमसे उम्मीद रखता है कि हम अक़्ल से हक़ीक़त को पहचानें और तब मानें। जो हम मानते हैं वो इस्लाम नहीं है बल्कि इस्लाम नाम है अक़्ल से हक़ीक़त को पहचानने का और एक बार अक़्ल से जो पहचाना वही इस्लाम है। अफसोस कि हम जो मानते हैं और जो हमने अपने बुजुर्गों से सुना उसे इस्लाम समझते हैं।
आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई चीज़ सामने हो और हम न समझ पाएं। आईए, मिसाल से समझते हैं! कम से कम मजलिसों में जाने वाले लोग तो आसानी से इसे समझ लेंगे। आप ने अनगिनत बार करबला के शहीदों के मसाएब सुने होंगे। आप ने हुसैन की शुजाअत और सब्र की रूदाद सुनी होगी, शहीदों की कुरबानियों का तज़किरा सुना होगा, सुना होगा कि कैसे सब कुरबानियाँ पेश कर चुकने के बाद और सैकड़ों ज़ख्मों से चूर, भूखा और प्यासा इमाम तनोतनहा हज़ारों की फौज से लड़ा और लड़ते लड़ते आसमान की तरफ देखते जाता, यहाँ तक कि एक निदाए ग़ैबी आई कि ‘बस, अल्लाह तुम से राज़ी हो गया’ और हुसैन ने तलवार म्यान में रख ली। भागी हुई फौजें पलट आईं, हर तरफ से हमले शुरू हो गए, यहाँ तक कि इमाम घोड़े से ज़मीन पर तशरीफ ले आए। ज़मीन पर आकर आप ने अस्र की नमाज़ शुरू कर दी और नमाज़ में ही सिजदे की हालत में शिम्र ने आप का सिर तन से जुदा कर लिया।
सब सही है? आप कहेंगें हाँ हम ने ऐसा ही सुना है। अब आईए, अक़ल की रौशनी में देखें। सब कुछ सही है सिवाए एक बात के। करबला से क़रीब दो साल पहले इमाम हुसैन का ख़ुतबै मिना देखिए। इमाम कहते हैं:
बारे इलाहा! तू जानता है कि जो कुछ हमारी जानिब से हुआ (बनी उमय्या और मुआविया की हुकूमत की मुख़ालेफत में) वो न तो हुसूले इक़तेदार के सिलसिले में रस्साकशी है और न ही ये माले दुनिया की अफज़ूँ तलबी के लिए है बल्कि ये सिर्फ इसलिए है कि हम चाहते हैं कि तेरे दीन की निशानियों को आशकारा कर दें और तेरी ममलेकत में इस्लाह करें, तेरे मज़लूम बंदों को अमान मयस्सर हो और जो फराएज़, क़वानीन और अहकाम तूने मौअय्यन किए हैं उन पर अमल हो।
इस ख़ुतबे में इमाम हुसैन ने अपने मक़सद को ब्यान किया है। जैसे जैसे आप आगे पढ़ेंगे, आप पाएँगे कि नूर की खि़लक़त का मक़सद ही यही है। शायद इमाम यही वाज़ेह करना चाहते थे क्योंकि इस ख़ुतबे में वो अपनी शहादत को नूर के बुझा देने से ताबीर करते हैं।
इमाम हुसैन से पहले हज़रत अली की ज़िन्दगी का मुतालेआ करिए। जंग हो रही है, तीर बरस रहे हैं कि अली मुसल्ला बिछा कर नमाज़ पढ़ने खड़े हो जाते हैं। इब्ने अब्बास कहते हैं मौला इस वक़्त आप नमाज़ पढ़ रहे हैं तो अली कहते हैं कि इसी नमाज़ की ख़ातिर तो जंग हो रही है। ज़ाहिर है अली अल्लाह के दीन के मौअय्यन करदा फराएज़, क़वानीन और अहकाम पर अमल करके दिखा रहे थे कि देखो कैसे शदीद जंग के दौरान जब मौत सिर पर हो तब भी इनको फरामोश नहीं किया जा सकता।
अली के लिए मशहूर था कि वो हमेशा अव्वले वक़्त नमाज़ पढ़ते थे और ज़रा भी ताख़ीर नहीं करते थे। अली के लिए ये भी मशहूर था कि वो किसी सवाली का सवाल रद्द नहीं करते थे। चुनाँचे वाक़ेया मौजूद है कि कुछ लोगों को शरारत सूझी कि चूँकि अली किसी सवाली का सवाल रद्द नहीं करते, उनसे ऐसे वक्त कोई मुश्किल सवाल किया जाए जब वो नमाज़ पढ़ने जा रहे हों ताकि हम देख सकें कि अली जवाब देते हैं या अव्वले वक़्त नमाज़ पढ़ते हैं। ऐसे वक़्त में जब अली वुज़ू कर रहे थे सवाली ने पूछा कि मौला ये बताएँ कि कौन से जानवर अंडे देते हैं और कौन से बच्चे। सवाली ने सोचा होगा कि अली तमाम जानवरों के नाम गिनवाने में लग जाएँगे और नमाज़ का अव्वल वक्त निकल जाएगा। या ये कि अली सवाली का सवाल रद्द कर देंगे और नमाज़ को तरजीह देंगे। लेकिन वो जानता नहीं था कि अल्लाह ने नूर को तमाम काएनात का इल्म अता किया है। अली ने ऐसा जवाब दिया जो आज तक साईंसदानों की जुस्तुजू का मरकज़ बना हुआ है। उन्होंने क्हा कि जिन जानवरों के कान बाहर हैं वो बच्चे देते हैं और जिन के कान अंदर हैं वो अंडे देते हैं।
आप ने ये वाक़ेया बारहा सुना होगा! लेकिन इससे जो नतीजा निकलता है वो ये कि आम इंसान भी जानते थे कि किसी भी हालत में अली की नमाज़ में ताख़ीर नहीं होती। अली रात रात भर मस्जिद में इबादत करते थे यहाँ तक कि लोग फातमा के दरवाज़े पर आकर कहा करते थे कि अली नमाज़ की हालत में दुनिया से रूख़्सत हो गए और फातमा कहा करती थीं कि ऐसी हालत उनकी अकसर इबादत करते में हो जाती है। ये वो हस्तियाँ थीं जिनकी पूरी ज़िन्दगी में ख़ुदा के सिवा कुछ याद नहीं था। यही वजह है कि जब अली के पैर में तीर लगा और ऐसा दर्द था कि अली बेहाल थे तो रसूल ने राय दी कि जब अली नमाज़ में मशग़ूल हों तो उनके पैर से तीर निकाला जाए। यही हुआ कि जिस तीर को छूने से भी अली तड़प उठते थे उसे जब नमाज़ की हालत में निकाला गया तो अली को पता भी नहीं चला।
इसकी आला तरीन मिसाल देखना हो तो 19 रमज़ान की सुबह मस्जिदे कूफा में देखिए। अली सुबह की नमाज़ पढ़ा रहे हैं। सिजदे की हालत में ज़हर में बुझी तलवार सिर को शिगाफता कर देती है। अली ख़ूनम ख़ून हो जाते हैं। नमाज़ पढ़ाने की ताक़त नहीं। वहीं गिर जाते हैं। बेटे हसन को इशारा करते हैं कि नमाज़ पूरी कराए। बेटा भी तो नूर ही से था। तड़पते बाप के इशारे पर नमाज़ पूरी कराता है। इतनी देर अली ज़ख़्मी पड़े अपनी नमाज़ पूरी कर रहे होंगे। जब अल्लाह की वाजिबकर्दा नमाज़ पूरी हो गई तब ही ज़ख्मी बाप को कंबल में उठा कर घर लाया गया।
यही बात हुसैन ने ख़ुतबै मिना में कही जो काबे में हज के दौरान दिया गया थाः
ये वो जगह है जहाँ हर क़िस्म के इमतियाज़ात से दस्तबरदार होकर ख़ुदा के सिवा हर चीज़ को भुला दिया जाता है। ये वो मक़ाम है जहाँ इंसान शैतान और ताग़ूतों पर कंकर बरसा के निदाए हक़ पर लब्बैक कहता है और राहे खुदा में कुरबानी और ईमान और इस्लाम के रास्ते में तन, मन, धन की बाज़ी लगाने को तैयार होता है।
अली, उनके बेटे हसन और हुसैन की कोशिशों का नतीजा था कि करबला का वाक़ेया होते होते जहाँ हर तरफ बनी उमय्या का जुल्मो सितम फैल चुका था वहीं ऐसे 72 तैयार हो गए थे जो इमाम को भली भाँति पहचानते थे। यही वजह है कि जब एक सहाबी ने जंग के दौरान हुसैन से कहा कि ‘मौला, अव्वले वक्ते ज़ोहर आ रहा है, हम चाहते हैं कि आखि़री नमाज़ आप के पीछे पढं़े’ तो हुसैन ने उसको दुआ दी कि अल्लाह तुम्हें नमाज़ गुज़ारों में शामिल करे। अल्लाह की इबादत की एक और आला तरीन मिसाल जो इमाम हुसैन के करबला में मौक़िफ की दलालत करती है देखने को मिलती है जब बरसते तीरों के साए में हुसैन और उनके सहाबी नमाज़ पढ़ते हैं जब्कि दो सहाबी आगे खड़े हो कर हर तीर को अपने सीनों पर रोकते हैं ताकि इबादतगुज़ारों तक तीर न पहुँच सके। क्या इससे बड़ी कुरबानी की मिसाल किसी ने देखी है?
शबे आशूर जब हमला हुआ था तो हुसैन ने एक रात की मोहलत यही कहकर तो माँगी थी कि मुझे नमाज़ बहुत पसन्द है। अब आईए, हुसैन की जंग की तरफ। हुसैन जंग कर रहे हैं; ऐसी कि तीन हमले कर चुके हैं और दुश्मन की फौज तितर बितर हो चुकी है। नज़र आसमान पर है। करबला में जो रावी थे जिन्होंने वहाँ के वाक़ेयात ब्यान किए, वो भी तो दुश्मन की फौज में ही गए थे। बाद में भले ही उनके दिल तबदील हो गए हों लेकिन अगर अपनी माद्दीयत पसन्दी के आगे उन्होंने हुसैन के मक़सद को अहमियत दी होती तो पाला बदल कर हुर की तरह हुसैन के साथियों से आ मिले होते। ऐसे रावी कैसे समझ पाते कि हुसैन बार बार आसमान को क्यों देख रहे हैं। कौन सोच सकता था कि शदीद जंग की हालत में भी हुसैन अव्वले वक्ते नमाज़ को नहीं भूल सकते। थोड़ी देर पहले जब ज़ोहर की नमाज़ की मोहलत माँगी गई थी तो दुश्मन के लश्कर में से किसी ने कहा था कि हुसैन की नमाज़ कुबूल नहीं। इस जुमले को सुनकर हुसैन के बचपन के दोस्त हबीब को गुस्सा आ गया था। वो ये कहते हुए उस शख़्स से लड़ने निकल गए थे कि ‘रसूल के नवासे की नमाज़ कुबूल न होगी और तुम ज़ालिमों की नमाज़ कुबूल होगी?’ अब जब हुसैन तनहा हैं क्योंकर नमाज़ की इजाज़त मिलती। हुसैन की आसमान की तरफ बार बार उठती निगाह देख रावी समझा कि हुसैन किसी आसमानी आवाज़ का इंतेज़ार कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद जब हुसैन को तलवार म्यान में रखते देखा तो रावी समझा आसमानी इशारा मिल गया। वरना अगर आसमान से कोई आवाज़ आई तो क्या रावी ने सुनी? क्या यज़ीद के लशकर में किसी ने भी ऐसी कोई आवाज़ सुनी? क्या हुसैन या किसी दूसरे इमाम ने बताया कि ऐसी कोई निदाए ग़ैब आई थी? सिर्फ माद्दी ज़हन रखने वाले रावी ने ऐसा समझा सो लिख दिया। दरअस्ल सूरज की गर्दिश पर निगाह डालते हुए हुसैन ने देखा अव्वल वक्ते अस्र है तो उन्होंने तलवार म्यान में रख ली। भागी हुई फौज पलट आई। वार पर वार होने लगे। हुसैन तो वैसे ही ज़मीन पर आकर नमाज़ पढ़ना चाहते थे। घोड़े से ज़मीन पर गिर पड़े। सिजदे में गए ही थे कि शिम्र टूटा हुआ खंजर लेकर आगे बढ़ा और नमाज़ की हालत में हुसैन का सिर काट कर धड़ से अलग कर लिया।
जो फराएज़, क़वानीन और अहकाम अल्लाह ने मौअय्यन किए हैं उन पर इतना शिद्दत से अमल सिर्फ अल्लाह की तरफ से मुनतख़बकर्दा इमाम ही कर सकता है। क्या आप इंकार कर सकते हैं कि हुसैन ने तलवार म्यान में नमाज़ की ख़ातिर नहीं रखी होगी? हमारे आपके मौला को अल्लाह की इबादत इतनी पसन्द है कि अव्वले वक़्त हमारा मौला कुछ नहीं कर सकता सिवाय नमाज़ पढ़ने के। ज़रा सोचिए, हम बिना नमाज़ पढ़े ही मौला की जमाअत में शामिल होने का दावा करते हैं!
आप ने देखा कि सामने की बात भी कभी समझ नहीं आती है जब तक अक़ल इस्तेमाल न की जाए। जो भी अल्लाह का हक़ीक़ी नुमाईंदा होगा वो कभी भी अक़ल से दूर जाने को नहीं कहेगा। अफसोस कि हम हर जगह अक़ल इस्तेमाल करते हैं लेकिन अल्लाह के सीधे रास्ते को पाने के लिए अक़ल इस्तेमाल करने से डरते हैं जब्कि सीधा रास्ता जब ही मिलेगा जब हम अक़ल से उसे पहचानने की कोशिश करें और फिर अक़ल से जो रास्ता पाएँ उसे ही मानें, वही इस्लाम है।
आईए, एक और सामने की मिसाल देखें! कुरआन में मौहम्मद से पहले ज़माने के पैग़म्बरों के वाक़ेयात भरे पड़े हैं। सुलेमान व दाउद, नूह व इब्राहीम और मूसा व ईसा को मुसलमानों ने कुरआन से ही तो पहचाना। उलमा कहते हैं कि ये इसलिए था क्योंकि अरब और उस खि़त्ते के लोग इन नामों से मानूस थे और उन पहले के पैग़म्बरों की ज़िन्दगी के वाक़ेयात बता कर उनके मानने वालों को जोड़ना मक़सूद था। मिसाल के तौर पर कुरआन 40:78 देखिए जिस के मुताबिक़ बहुत से पैग़म्बर भेजे गए जिन में से कुछ पैग़म्बरों के क़िस्से बताए गए और कुछ के नहीं। आयत 35:24 भी बताती है कि कोई भी लोग ऐसे नहीं गुज़रे जिन के दरमियान कोई डराने वाला न रहा हो। आयत 26:208-209 भी इसी तरफ इशारा कर रही है। आयत 2:136 पहले के भेजे गए सब पैग़म्बरों जैसे इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब, मूसा और ईसा पर ईमान रखने को ज़रूरी क़रार दे रही है और कह रही है कि उनमें से एक दूसरे में कोई फर्क़ नहीं है। 4:163 में भी रसूल पर वही नाज़िल होने का ज़िक्र है वैसे ही जैसे नूह और उनके बाद के दूसरे पैग़म्बरों पर वही नाज़िल हुई।
इस सब के बावजूद नतीजा क्या हुआ? उन पर ईमान रखने की बात कह कर क़ुरआन का पैग़ाम मुसलमानों को उन पहले के पैग़म्बरों से जोड़ना था। अफसोस कि मुसलमानों ने पहले के पैग़म्बरों को सिर्फ बराए नाम याद रखा और उनकी तालीमात को समझने की कोशिश नहीं की। क़ुरआन को ही काफी समझने वाले मुसलमानों से ये उम्मीद कैसे की जा सकती थी कि वो ये जानने की कोशिश करते कि पहले के लोगों ने क्या कहा और उन में से कौन पैग़म्बर हो सकते हैं? आज मुसलमान कहते हैं कि ये कुरआन कहता है और ये ईसाई कहते हैं। ये हम मानते हैं और ये यहूदी मानते हैं। क्यों नहीं कोई कहता कि यहूदियों और ईसाईयों की तालीमात जो तहरीफ नहीं हुईं, वो हमारी ही तालीमात हैं। क्यों नहीं वो मुसलमान जिनके आबा-ओ-अजदाद यहूदी और ईसाई किताबों से आखि़री रसूल को पहचान कर मुसलमान हुए थे, बिना तहरीफ शुदा किताबें पेश कर सकने की हालत में हैं?
पहले भेजी गई किताबों को छोड़ देना ही वजह है कि
सीधे रास्ते की तालीमात सामने आ जाने के बाद भी मुसलमान सब से ज़्यादा गुमराही में मुबतिला हैं। ‘अ, आ, इ, ई’ तो उन पहले के पैग़म्बरों को ही बताया गया था और अब ‘अ से अल्लाह’ बताया जा रहा था। अगर ‘अ’ नहीं पहचाना तो अल्लाह कैसे पहचानते? पहले के पैग़म्बरों के हाथों पहुँचाई गई बुनियादी तालीमात को फरामोश करकेे उन आला तालीमात को कैसे पहचान सकते थे जब उनकी तकमील हो रही थी?
आज ये कह देना बड़ा आसान है कि ईसाईयों, यहूदियों और दूसरी क़ौमों ने इलाही किताबों में तरमीम कर दी। कुछ जगह ऐसा हुआ भी है! लेकिन क्या जवाब देंगे मुसलमान इस बात का कि जब अनगिनत यहूदी और ईसाई दीने मौहम्मदी के आ जाने के बाद अपनी अपनी किताबों से मौहम्मद को पहचान कर इस्लाम के दामन में दाखि़ल हुए तो उन्होंने क्यों नहीं अपनी पुरानी किताबों को संभाल कर रखा? सलमान फारसी पहले आतिशपरस्त थे, फिर हक़ पाने की कोशिश की तो ईसाई मज़हब इख़्तेयार किया और जब ईसाई मज़हब की किताबों में देखा कि कोई रसूल आने वाला है तो उसकी तलाश में लग गए और मौहम्मद के आगे पेश होकर इस्लाम को क़ुबूल किया। ऐसे अनगिनत ईसाईयों और यहूदियों ने इस्लाम को इख़्तेयार किया। फिर उन मुसलमानों ने अपनी किताबों को संभालकर क्यों नहीं रखा जिन से उन्होंने हक़ को पहचाना था? अगर मुसलमानों ने ऐसा किया होता तो आज हमको ये कहने का मौक़ा न मिलता कि ईसाईयों और यहूदियों ने अपनी किताबों में फेर बदल कर लिया है जिसकी वजह से वो हक़ तक पहुँचने से क़ासिर हैं।
ये सही है कि मौहम्मद और अहलेबैत के दर से वाबस्तगी
के बाद कुछ और की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन उन अहलेबैत को कितना मौक़ा दिया गया अपनी बात को कहने का।
हक़ीक़त ये है कि हम ने इन किताबों को दूसरे मज़हब की किताबें समझ कर छोड़ दिया और जिन पिछले रसूलों और पैग़म्बरों को क़ुरआन पहचनवा रहा था उन ही की तालीमात को नहीं माना। अहलेबैत के दामन को छोड़ कर हम ने जो इस्लाम समझा था उसका मवाज़ना हम ने इन पहले की किताबों से करना शुरू कर दिया और नतीजा ये हुआ कि जहाँ भी हमें फर्क़ दिखाई दिया वहीं अपने ज़हन से अख़्ज़कर्दा नताएज को साबित करने की ख़ातिर अनगिनत दलीलों से इन पहले की किताबों के मानने वालों पर हमला शुरू कर दिया, इस उम्मीद पर कि वो हक़ को तसलीम कर लेंगे। नतीजा ये हुआ कि दूरियाँ बढ़ती चली गईं!
क्या हम ने कभी सोचा कि अगर अल्लाह एक है और उसने हर खि़त्ते में पैग़म्बर भेजे तो ऐसा तो मुमकिन ही नहीं कि एक ही अल्लाह के भेजे दो पैग़म्बर अलग अलग तालीमात पेश कर रहे हों। ये तो मुमकिन है कि किसी पैग़म्बर ने वक़्त के तक़ाज़ों के तहत किन्ही बातों पर ज़ोर दिया हो और किसी दूसरे ने किन्हीं और बातों पर। लेकिन ये कैसे मुमकिन है कि ये मुतज़ाद बातें कर रहे हों। अगर ऐसा है तो या तो हम ने समझने में चूक की या उन में से एक या दोनों हक़ीक़ी पैग़म्बर नहीं। ज़रूरत थी कि अक़ल को सब से आला समझकर उससे हक़ीक़त को पहचानने की कोशिश करते।
अक़ल न इस्तेमाल करना ही वजह है कि आज हम ऐसे मक़ाम पर पहुँच गए हैं कि रसूलों और उनके वलियों के रास्ते पर चलने की जगह उनकी याद को रसमों और रिवाजों में जकड़ लिया। समाज ज़ईफुलएतक़ादी और तवहहुमपरस्ती का शिकार है। हम भूल गए कि जिस वक़्त अरब झूठ और लालच में डूबा था उस वक्त रसूल ने अपनी सच्चाई और ईमानदारी की बिना पर सादिक़-व-अमीन के लक़ब हासिल किए। जिस वक्त बिज़नेस की बुनियाद सूद और मुनाफाख़ोरी पर रखी जाती थी उस वक़्त रसूल ने खदीजा के बिज़नेस मैनेजर के रोल में काम करते हुए अपनी मेहनत और ईमानदारी से उनके नफे को कई गुना कर दिया। जहाँ लड़कियों को ज़िन्दा ज़मीन मेें गाड़ दिया जाता था उस माहौल में रसूल ने इस दुनिया की तारीख़ में पहली बार औरत को बराबरी का मक़ाम दिया। क़बाएली ख़ानाजंगी को खत्म करने के लिए आपसी भाईचारे का पैग़ाम दिया और मुसलमानों को एक उम्मत क़रार दिया; शराबख़ोरी, ज़िना, जुआ और तमाम समाजी बुराईयों को दूर करने के लिए क़वानीन बनाए। लेकिन इस सब से पहले रसूल ने एक खुदा के आगे अपने को सुपुर्द कर देने की तालीम दी। उन्होंने ज़िन्दगी के हर हर गोशे में अंजाम पज़ीर होने वाले हर हर काम को अल्लाह के लिए करने की तालीम दी। रसूल का मज़हब सड़कों और गली कूचों में अपने अक़ायद साबित करने और कुछ रसूमात पर अमल पैरा होने का नाम नहीं है। रसूल का मज़हब अक़्ल से ख़ुदा को पहचान कर उससे एक अन्दरूनी रिश्ते को बनाए रखने का नाम है।
नमाज़ ज़कात वग़ैरा के अंजाम देने से, खुदा की राह को दिल-व-दिमाग़ में बसाए रहने से और उसकी ख़ुशनूदी के लिए काम करने से रूह, बक़ौल क़ुरआन, उस मुश्किल चढ़ाई पर चढ़ती है जिस पर निजात है। बुरे ख़्यालात, गुनाह और दुनिया की चाह रूह को नीचे की तरफ ढकेल देते हैं। रिवायतों में इसे काले धब्बे से भी ताबीर किया गया है जो अच्छे आमाल के साथ धीरे-धीरे मिटता जाता है। जो इंसान अपनी काविशों के तहत चढ़ाई के मुश्किल रास्ते पर गामज़न होकर एक ख़ास मंज़िल तक पहुँचता है और साथ में ख़ुदा के creation plan का इल्म रखता है, जब तरक़्क़ी की इस मंज़िल पर रहते हुए मौत को पहुँचता है, वही शहीद कहलाता है। उसी के लिए निजात यानी मोक्ष है। ख़ुदा के creation plan को जानने का मतलब है ख़ुदा की अव्वलीन खि़लक़त यानी नूरे ज़ाती, उसके ख़ल्क़ किए हुए 7 नाम जो 14 अहलेबैत हैं और उनके इंसानी जिस्मों में दुनिया में आने का इल्म रखना और ये जानना कि सब हिदायात, अतियात, राहनुमाई, सज़ा व जज़ा इन्ही के हाथों है।
हम से यही उम्मीद की जाती है कि मौत के वक़्त रूह कमाल के दर्जे पर हो। जो नीचे फिसल गया वो निजात क्हाँ से पाएगा? जिन रूहों ने इरतेक़ा की कोशिश छोड़ दी उनकी ताबीर कुरआन ने सुम्मुन बुकमुन उमयुन यानि बहरे, गूँगे और अँधे लोगों से की है। हम को समझ लेना चाहिए कि सब रस्में और सब रिवाज बेकार हैं जब तक वो रूह को इरतेक़ा की मंज़िलों की तरफ नहीं ले जा रहे। यही बात रसूल ने कही जब उन्होंने क्हा कि अगर तुम जानना चाहते हो कि तुम्हारी नमाज़ कुबूल हुई तो ये देखो कि क्या नमाज़ के बाद तुम में कोई नई अच्छाई पैदा हुई। अगर नही ंतो समझ लो कि तुम्हारी नमाज़ महज़ एक रस्म की अदाएगी थी और ख़ुदा की क़ुरबत हासिल करने की नीयत के बावजूद तुम्हारी क़ुरबत में इज़ाफा नहीं हुआ। यही सीधा रास्ता है और इस से जुदा तमाम रास्ते भटकाव के रास्ते हैं।
भटकाने वाले रास्ते मंज़िल तक पहुँचना दूभर कर देते हैं। सीधे रास्ते पर चल कर ही मंज़िल पर पहुँचना आसान होता है। दूसरी सूरत में मुमकिन है कि आदमी अपनी मुख़्तसर सी ज़िन्दगी में भटकता ही रहे और मंज़िले मक़सूद तक न पहुँच सके। सीधे रास्ते को ढूँढना और उस पर चलते रहना इस लिए भी ज़रूरी है कि जुलमत और अंधेरे की ताकत जो इब्लीस या शैतान की सूरत में ज़ाहिर हुई इंसान की खिल्क़त के लम्हे ही एलान कर चुकी है कि वो सीधे रास्ते पर बैठ जाएगी और इंसान को उस से इधर उधर भटकाएगी। भटकता इंसान जब गुनाह करता है तो धब्बा मज़ीद काला होता जाता है। साथ ही निजात भी उतनी ही मुश्किल होती जाती है।
जो लोग ज़ुलमत की इस ताकत को कोई छोटी मोटी ताक़त समझते हैं वो खुद अंधेरे में हैं। दुश्मन से महफूज़ रहने की पहली कुंजी होती है उसकी ताक़त को समझना और उसके सामने अपनी कम्ज़ोरियों को पहचानते हुए ये जानने की कोशिश करना कि दुश्मन किस किस तरफ से हमला कर सकता है। जो लोग दुश्मन की ताक़त को पहचानते हैं वही उस से अपने को महफूज़ रखने का बन्दोबस्त भी करते हैं।
हमने देखा है कि अवाम उस सब से बड़े दुश्मन का ज़िक्र करना भी गवारा नहीं करते हैं कि शायद उसके ज़िक्र से शैतान उनकी तरफ नज़र करने लगेगा। हम सब दरअसल अपने नेचर के हिसाब से ही ज़िन्दगी गुज़र करते हैं। ये नेचर दर हक़ीक़त पैदाईश के पहले और बाद के कुछ सालों के हालात के सबब बनता है। यानी अगर हमारे नेचर में गुस्सा है तो हम गुस्सेवर होंगे, अगर लालच है तो हम लालची होंगे। अगर नहीं है तो नहीं होंगे! नेचर में मौजूद कमियों से मुस्तक़िल लड़ते रहने की कोशिश ही दरअसल हर मज़हब की तालीमात का मक़सदे अव्वल है। अक़ल से ख़ुदा के वजूद को पहचानने और उसके creation plan को जान लेने के बाद अपने organs of action & senses को ख़ुदा की ख़ातिर ख़ुदा के हवाले कर देना ही इस्लाम है। यही तालीम ईसा मसीह ने दी, यही तालीम उपनिषद ने दी, यही दुनिया में आए बाक़ी सब पैग़म्बरों का मक़सद था।
हक़ीक़त ये है कि सब से बड़ा दुश्मन शैतान उस वक़्त तक हमारी तरफ मुतवज्जे नहीं होगा जब तक हम ख़ुदा के सीधे रास्ते से दूर भटकाव में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं। ज्यों ही उस को एहसास होगा कि हम अपनी कोशिशों के तहत सीधे रास्ते की तरफ बढ़ रहे हैं या उस पर चल रहे हैं वो अपनी तमामतर ताक़तों को लगा देगा कि हम उस रास्ते से दूर हो जाएँ। इब्लीस के पास हज़ारों हरबें हैं जिस से वो हमला कर सकता है और हज़ारों सालों के कामयाब तजरुबे से वो मंझ गया है और बख़ूबी जानता है कि किस इंसान के लिए किस राह से हमले का प्लान बनाए।
क्या ये सच नहीं कि जु़लमत की ये ताक़त इतनी ताक़तवर है कि एक ही वक़्त में अम्रीका से हिन्दुस्तान में इंसानों और जिनों, सब को बहकाने में जुटी है। इंजील और क़ुरआन में आदम के ज़िक्र से साबित है कि बहिश्त के बाशिन्दों तक भी इसकी पहुँच है। इसके कारनामों का ज़िक्र फरिश्तों ने भी किया जब उन्होंने ख़ुदा से क्हा कि क्या तू उसे पैदा करेगा जो ज़मीन पर ख़ूँरेज़ी करे। क्या ये अदालत का तक़ाज़ा नहीं था कि अगर ज़ुलमत की ताक़त को इतना ताक़तवर बनाया जा रहा था जिस का काम गुमराह करना, बहकाना और माद्दीयत की तरफ हमें मायल करना है तो उसके बरखि़लाफ कम से कम उतनी ही ताक़तवर या उससे ज्यादा क़ुव्वत रखने वाली हिदायत की ताक़त होना भी लाज़मी था। ख़ुदा ने इस ताक़त को कुरआन में नूर से ताबीर किया और नूर व ज़ुलमत दोनों का ज़िक्र कुरआन में करके बता दिया कि दोनों ख़ुदा की ही खिलक़त हैं और उसके creation plan का हिस्सा हैं।
हम सब जानते हैं कि जिस वक़्त आदम की खि़लक़त हुई उस वक्त इब्लीस, जो बाद में शैतान कहलाया, फरिश्तों के बीच इबादत में मसरूफ था और तब तक उसकी शैतानियत ज़ाहिर नहीं हुई थी। सादालौह फरिश्ते भी उस वक़्त तक नहीं पहचान पाए थे कि इब्लीस शैतान है। फिर फरिश्तों का ये कहना कि ‘क्या तू उसे पैदा करेगा जो ज़मीन पर ख़ूँरेज़ी करे’ बताता है कि इस आदम से पहले भी ज़मीन पर इंसान था जिस की ख़ूँरेज़ी के सबब इंसानियत तबाह हो गई। अगर इब्लीस उस वक़्त तक शैतान नहीं बना था तो उस पहले के इंसान को किस ने बहकाया? आपको मानना पड़ेगा कि इब्लीस ज़ुलमत का एक मोहरा था जो उस वक़्त ज़ाहिर हुआ जब अल्लाह ने सिजदे का हुक्म दिया। वरना ज़ुलमत इस से पहले की तमाम खि़लक़तों को वरग़ला कर खूँरेज़ी और मार काट में मुब्तिला कर चुकी थी।
एक और बात भी ज़ेहन में आती है! ये बात इंजील और कुरआन से साबित है कि आदम की खि़लक़त के वक़्त इब्लीस आसमान पर ख़ुदा की इबादत में मशग़ूल था। आदम की खि़लक़त के वक़्त क़ुरआन में लफ्ज़ ‘आलीन’ से ज़ाहिर है कि कुछ बड़े या ऊँचे लोग उस वक़्त मौजूद थे जिन के नाम आदम को सिखाए गए। इंजील में भी मौजूद है कि सबसे पहले Light यानी नूर की खि़लक़त हुई। किताब One God, One Religion में साफ तौर पर साबित किया गया है कि उपनिषद और गीता में जिन 14 मनू या देवता का ज़िक्र है वो दरअस्ल 14 नूर हैं जो अहलेबैत के तौर पर दुनिया में वारिद हुए। रसूल की कई हदीसें इस बात की गवाही देती हैं कि उनका नूर सब से पहले पैदा किया गया। एक रिवायत में आया है कि इस नूर की खि़लक़त आदम की खि़लक़त से चार हज़ार साल पहले हुई। ऐसी कई हदीसें मौजूद हैं जिन को ब्यान करके हम इस किताब को ज़खीम नहीं करना चाहते। अगर गीता, उपनिषद और कुरआन में मौजूद इनके तज़किरे को पढ़ना चाहते हैं तो किताब One God, One Religion या God Rediscovered को पढ़ें।
ये तो साबित है कि इब्लीस ख़ुदा की वहदानियत का क़ायल था और उस ही की इबादत में मशग़ूल था। कुरआन में ख़ुदा का इब्लीस से कलाम कि ‘क्या तू आलीन में से हो गया’ साबित करता है कि इब्लीस उन बड़े और ऊँचे लोगों को भी बख़ूबी जानता था और उनको जानते हुए ख़ुदा की इबादत करता था। इब्लीस अगर किसी का वजूद बरदाश्त नहीं कर पाया तो वो हज़रते इंसान था। उसने इसकी वजह भी ब्यान की है जो क़ुरआन में आई है। उसने क्हा कि ‘मैं आग से बना हूँ और इंसान मिट्टी से और आग मिट्टी से अफज़ल है, इस लिए वो इंसान को ख़ुदा के हुक्म के मुताबिक़ सजदा नहीं कर सकता।’
सवाल उठता है कि क्या ये इतना बड़ा गुनाह था? इब्लीस को ख़ुदा की वहदानियत से इंकार नहीं था। इब्लीस को उन बड़े और ऊँचे लोगों की मौजूदगी से भी इंकार नहीं था जिन की खि़लक़त नूर से बनी है और जिन को हम आज आसानी से नकार देते हैं। इब्लीस इबादत में भी इतना अफज़ल था कि फरिश्तों के बीच भी अपनी साख़ बना चुका था। फिर एक सज्दे से इंकार क्या इतना बड़ा गुनाह हो सकता है? हक़ीक़त में ये बड़ा गुनाह था! सज्दा दरअसल आदम को नहीं था बल्कि ख़ुदा को था, क्योंकि ख़ुदा के हुक्म से सज्दा करना था। एैन इस तरह जैसे काबे के सामने सज्दा ख़ुदा को सज्दा है, क्योंकि ख़ुदा के हुक्म से है। ख़ुदा के एक हुक्म का इंकार किसी फर्द को काफिर की फेहरिस्त में खड़ा कर देता है और ख़ुदा के गुस्से का सबब बनता है। ज़ुलमत की ताक़त इस बात को बख़ूबी जानती थी इसलिए उसने इंसानों को बार बार ख़ुदा के एहकाम के बारे में शक में डालना चाहा या उन अहकाम का इंकार करने पर मजबूर किया। रसूल ने ग़दीर के ख़ुत्बे में कुछ भी कहा हो हम तो न मानेंगे! आखि़र मौसीक़ी के सुनने पर रोक क्यों? हमारा फाएदा है तो हम इसकी मुख़ालिफत क्यों न करें? इबादत से क्या होता है, दिल में ईमान होना चाहिए? क्या ऐसे अनगिनत सवालों से हम ख़ुदा के अहकाम का इंकार करने की कोशिश नहीं करते? ज़रा सोचिए, अगर इबादत में फरिश्तों से अफज़ल इब्लीस एक सज्दे का इंकार कर के काफिर हो सकता है तो बार बार ख़ुदा के अहकाम का इंकार करके कहीं हम उसी इब्लीस के वादे को पूरा करने में मददगार तो नहीं बन रहे?
एक और बात जो कहना ज़रूरी है वो ये है कि दूसरे सूरे की 31वीं से 33वीं आयत में साफ तौर पर कहा गया है कि जब अल्लाह ने आदम को नाम सिखलाए और फिर उन शख़्सियतों को फरिश्तों के सामने किया तो क्हा कि अगर तुम सही हो तो इनके नाम बतलाओ; फरिश्तों ने अल्लाह से क्हा कि हमें नहीं मालूम सिवाय जो तूने हमें बतलाया है। फिर अल्लाह ने आदम से क्हा कि उनके नाम बतला दो। जब आदम ने उन्हें उनके नाम बतला दिए तो अल्लाह ने क्हा कि क्या मैं ने तुम्हें नहीं बतलाया कि मैं यक़ीनी जानता हूँ जो ग़ैब है जन्नत और ज़मीन पर और मैं जानता हूँ तुम जो ज़ाहिर करते हो और जो छिपाते हो।
आप ने देखा, आदम की बदौलत फरिश्तों को इन शानदार नूरानी शख़्सियतों की शान से वाक़फियत हुई। दुररे मनसूर में जलालुद्दीन सुयूती रसूले ख़ुदा से रिवायत करते हैं कि उन्होंने कहा कि फरिश्तों को जो दिखलाया गया था वो पाँच नूर थे। अल्लाह ने हर नूर की तरफ इशारा करते हुए फरिश्तों को बतलाया कि ‘ये मौहम्मद हैं जिन की सब से ज़्यादा तारीफ है, ये अली हैं सब से बुलन्द, ये फातिमा हैं, ये हसन हैं और ये हुसैन हैं; ऐ फरिश्तों! इन पाँच की मौहब्बत में ही मैं ने तमाम कायनात खल्क़ की।’ एैन यही बात बार बार दुहराना शायद अल्लाह की मंशा थी; इसीलिए जब ये नूरानी हस्तियाँ दुनिया में आईं तो कभी इन्हें चादरे किसा में जमा किया गया और हदीसे किसा नाज़िल हुई, कभी मुबाहिला के मौक़े पर पहचनवाया गया और कभी रूकूअ में अंगूठी दे देने पर आयत नाज़िल हुई।
मुण्डक उपनिषद भी आदम की खि़लक़त से पहले इन्ही पाँच नूर की खि़लक़त की बात कर रहा है जब वो कहता है कि प्रजापति या ब्रहमा ने अपने को पाँच बार तक़सीम किया और उन्हें प्राण, अपान, सामान, उदान और व्यान कहते हैं। आप को बता दें कि अल्लाह यानी महेश ने Manifest Self यानी नूरे ज़ाती या परमात्मा जिसे विष्णू भी क्हा गया है को जब खल्क़ किया तो उस ने नूर और ज़ुलमत की खि़लक़त की। प्रजापति या ब्रहमा वो पहला नूर था जिसे आप नूरे मौहम्मदी कह सकते हैं जो पाँच हिस्सों में तक़सीम हो गया ऐसे कि वो पाँच नूर उस पहले नूर जैसे थे जो तक़सीम हुआ। इनमें से 9 नूर और ख़ल्क़ हुए तो कुल 14 नूर हो गए। इन्हीं 14 नूर को वेदों में मनू या progenitors of mankind कहा गया। यही देवता भी कहलाते हैं। जहाँ भी 14 देवताओं का ज़िक्र होता है, उनमें एक देवी है। एैन ऐसे जैसे 14 अहलेबेत यानी 14 नूर में एक फातमा हैं। वेदों में बतलाए गए इनके आपस में रिश्ते भी वही हैं जिन रिश्तों के साथ ये 14 नूर दुनिया में पैदा हुए। इन 14 के 7 ही नाम हैं।
पाँच से 14 नूर की खि़लक़त कैसे हुई ये पेंगल उपनिषद और ब्रहद अराण्यका उपनिषद में पढ़ा जा सकता है। मैत्री उपनिषद 4:6 कहता है कि ये उस अल्लाह की बेहतरीन खि़लक़त हैं जो हमेशा रहेगा और जिसका कोई जिस्म नहीं है। मुण्डक उपनिषद 1:2:5 साफ कर देता है कि ये शख़्सियतें एक ख़ास वक़्त पर इस दुनिया में चमकेंगी और उस वक़्त जो ऐसे काम करेगा जो उनके लिए हों तो ये उसे वहाँ ले जाएँगी जहाँ इन देवताओं का रब यानी नूरे ज़ाती का अर्श व कुर्सी है। यानी उस जगह जहाँ हमेशा की ज़िन्दगी है। आप जानते हैं कि इन 14 मासूम के दरअस्ल 7 ही नाम थेः मौहम्मद, अली, फातमा, हसन, हुसैन, अली, मौहम्मद, जाफर, मूसा, अली, मौहम्मद, अली, हसन, मौहम्मद। मनडूकया उपनिषद 2:1:8 इस राज़ को फाश कर रहा है जब वो 14 की जगह ‘सात और सात’ कहकर इन्हें मुख़ातिब करता है और कहता है कि ये 14 एक छिपी हुई जगह में रहेंगे। अरब के रेगिस्तान से ज़्यादा छिपी हुई जगह कौन हो सकती थी जो उस वक़्त की तमाम civilized आबादी जिसमें हिन्दुस्तान, चीन, फारस, मेसोपोटेमिया, रोम और मिस्र शामिल हैं के बीच में ऐसी छिपी हुई जगह थी जहाँ कोई भी जाना पसन्द नहीं करता था। कौसितकी उपनिषद साफ लफज़ों में कह रहा है कि इन ख़ास शख़्सियतों का ख़ालिक़ अल्लाह है और सारी इबादत उसी के लिए है।
राधाकृष्ण के तर्जुमे के मुताबिक़ ईसा उपनिषद इसी राज़ की तरफ इशारा कर रहा है जब वो कहता हैः
I.6:
And he who sees all (14 who have 7 names) beings in his own self and his own
self in all (14 who have 7 names) beings, he does not feel any revulsion by
reason of such a view.
I.7:
When, to one who knows, all (14) beings have, verily, become one with his own
self, then what delusion and what sorrow can be to him who has seen the
oneness?
आप ने देखा, इन 14 शख़्सियतों से अपने को जोड़ लेने पर ही उस एक अल्लाह से जुड़ा जा सकता है जो लामकान और लाफानी है। यही बात अगली आयत कर रही हैः
I.8:
He has filled all; He is radiant, bodiless, invulnerable, devoid of sinews,
pure, untouched by evil. He, the seer, thinker, all-pervading, self-existent
has duly distributed through endless years the objects according to their
natures.
अफसोस कि नूरे ज़ाती का ज़िक्र अल्लाह के चेहरे के तौर पर बारहा क़ुरान में किया गया लेकिन मुसलमान पहचान न पाए। कभी कहा गया कि हर शय हलाक हो जाएगी और सिर्फ अल्लाह का चेहरा बाक़ी रह जाएगा। कभी अर्श और कुर्सी का ज़िक्र किया गया। कभी मौहम्मद को मेराज में आसमान पर बुलाया गया और कहा गया कि दोनों में दो कमान का फासला रह गया या उससे भी कम। ईसा उपनिषद क़ादिरे मुतलक़ खुदाए वाहिद का ज़िक्र भी करता है और उसके ख़ल्क़कर्दा नूरे ज़ाती का भी ज़िक्र करता है और साफ लफज़ों में दोनों का फर्क़ वाज़ेह करते हुए कहता है कि जो अल्लाह को पहचानता है लेकिन उसके चेहरे को नहीं पहचानता जो 14 नूर की शक्ल में ज़ाहिर हुआ वो अंधेरे में है और जो इस चेहरे को पहचानता है लेकिन उस अल्लाह को नहीं पहचानता जिसकी अव्वलीन खि़लक़त ये चेहरा है जो 14 नूर के तौर पर ज़ाहिर हुआ तो वो और ज़्यादा अंधेरे में है। निजात सिर्फ उसके लिए है जिस को लामकान ताक़त अल्लाह और उसके चेहरे के तौर पर नूरे ज़ाती जो अर्श पर मुक़ीम है और जिससे खल्क़कर्दा 14 नूर हैं, इसका इल्म हो। इसी नूरे ज़ाती या अल्लाह के चेहरे को वेदों ने परमात्मा क्हा और इससे ख़ल्क़ किए हुए 14 नूर को मनू या देवता क्हा।
I.12:
Into blinding darkness enter those who worship the Unmanifest and into still
greater darkness, as it were, those who delight in the manifest.
I.14:
He who understands the manifest and the Unmanifest both together, crosses death
through the manifest and attains life eternal through the manifest.
14 नूर का नूरे ज़ाती या अल्लाह के चेहरे से रिश्ता बताते हुए ब्रहदअराण्यका उपनिषद कहता हैः
This
(Manifest) Self, verily, is the lord of all beings, the king of all (14)
beings. As all the spokes are held together in the hub and felly of a wheel,
just so, in thyself, all (14) beings, all Devatas, all worlds, all breathing
creatures, all these (14) Selves are held together.
मुण्डक उपनिषद साफ तौर पर कह रहा है कि किसी ख़ास वक़्त पर ये चमकेंगे और उस वक़्त जो इनके लिए कुरबानियां देगा उसे ये 14 नूर वहाँ ले जाएँगें जहाँ इनका रब नूरे ज़ाती यानी परमात्मा मुक़ीम है।
I.2.5:
Whosoever performs works, makes offerings, when these are shining and at the
proper time, these in the form of the rays of the sun lead him to that where
the one lord of the Devatas abide.
Rig Veda में उस जगह को जहाँ ये आएँगे Middle Country कहा गया है। मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह ने जब ज़मीन बनाई तो काबा वो जगह थी जहाँ से ज़मीन जमना शुरू हुई। इसी वेद में उस जगह को ‘मखा’ कहा गया है जहाँ इनको ज़ाहिर होना था। ग़ौर करने की बात है कि ये नहीं कहा जाता कि वो 14 हैं बल्कि ये कि वो 7 और 7 हैं। साफ है कि 14 होंगे लेकिन नाम के हिसाब से वो 7 ही होंगे। देखिए अथर्व वेद का मंडूकया उपनिषदः
From
him come forth the seven life-breaths (seven pranas or lives), the seven
flames, their fuel, the seven oblations, these seven worlds in which move the
live-breaths, seven and seven (14) which dwell in the secret place.
इन सात शख़्सियतों को ब्रहदअराण्यका उपनिषद ने “The Seven Imperishable Ones” कहा है।
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