आसमान की बादशाही - Part 3
जैसा पहले आ चुका है क़ुरआन में फरिश्तों और ख़ुदा के कलाम से ज़ाहिर है कि आदम की खि़लक़त से पहले भी खि़लक़तें थीं जो आपसी खूँरेज़ी के सबब फना हो गईं। ये बात अली के क़ौल से भी जो पहले दिया जा चुका है साबित है। ज़ाहिर है इब्लीस उस वक़्त तक शैतान नहीं बना था। उसको न ख़ुदा से इंकार था न आलीन यानी बड़े लोगों की मौजूदगी से। वो शैतान तो तब बना जब उसने अपनी अना की वजह से अल्लाह के हुक्म को न माना।
अगर इब्लीस उस वक़्त तक शैतान नहीं बना था तो सवाल उठता है कि उन पहले की मख़लूकात़ को किस ने बहकाया? किस के वरग़लाने पर इस आदम से पहले के लोगों ने खूँरेज़ी की और हलाक हुए। अगर कोई ताक़त नहीं थी जिसने इस आदम के पहले की खि़लक़तों को बहकाया तो कौन था जिस ने इब्लीस को बहकाया? क्या हमारे पास कोई जवाब है?
अली की 1000 आदमों वाली रिवायत के जवाज़ में पुराणों में ज़िक्र है कि अल्लाह इसी तरह खि़लक़त पैदा करता है और यके बाद दीगरे हर 1000 आदमों की खि़लक़त के बाद तमाम कायनात क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा की ताक़त में समा जाती है। ये 1000 खि़लक़तें ख़ुदा का एक दिन है और इस के बाद इसी दिन के बराबर रात होती है जिसके बाद ख़ुदा फिर कायनात की खि़लक़त करता है। पुराण के हिसाब से ये इस दिन की 994वीं खि़लक़त है जिसमें हम साँस ले रहे हैं और इस के पहले की 993 खि़लक़तों में भी यही नूरानी हस्तियाँ थीं जो कायनात के कामकाज को अंजाम दे रही थीं।
ऐसा महसूस होता है कि न साईंस ने गल्ती की न आसमानी किताबों ने। जो ग़ल्ती थी वो हमारी समझ की थी। हज़ार आदम वाली रिवायत मज़हब व साईंस की दूरियाँ कम करने के लिए काफी है। बाईबल में आदम से इब्राहीम तक हर एक का पुश्त दर पुश्त ज़िक्र है और हर फर्द की उम्र भी बताई गई है। इब्राहीम से यसूअ तक का शजरा भी किताबों में मौजूद है। यसूअ के बाद के 2011 साल भी जोड़ लें तो आदम से अब तक 12-14,000 साल का ही वक़फा गुज़रा है। इसके बरअक्स साईंस ने carbon dating और human fossils के ज़रिए कई लाख साल पहले तक के इंसान की न सिर्फ ख़बर दी है बल्कि अलग अलग ज़माने के इंसान का फर्क़ भी ब्यान किया है। इससे ज़ाहिर होता है कि हल्की फुल्की तब्दीलियों के साथ इंसान आदम की शक्ल में पैदा किया जाता रहा और अपनी खूँरेज़ी के सबब हलाक किया जाता रहा। अगर पुराण की मानें तो कम से कम 994 बार इस ज़मीन पर ऐसा हो चुका है और अभी 6 खिलक़तें मज़ीद आएँगी जिसके बाद तमाम कायनात समेट दी जाएगी और बक़ौल कुरआन अल्लाह के चेहरे के अलावा हर शय फना हो जाएगी।
जैसा कहा गया कि नूर का ज़िक्र कुरआन और अहादीस में भरा पड़ा है। नूर के मायनी हैं कोई रौशन शय। हिन्दू आलिमों का मानना है कि वेदों में मौजूद लफ्ज़ ‘देवता’ दिव्य से बना है जिसके मायने भी किसी रौशन चीज़ के हैं। हिन्दुओं ने वेदों में मौजूद देवताओं के तज़किरे को क्या मायने पहनाए और पहले ज़माने के हिन्दुओं ने देवताओं के बारे में क्या क्या कहानियाँ गढ़ीं उस पर न जाईए, ये देखिए कि एैन इसी क़िस्म के तज़किरे न सिर्फ क़दीमी हिन्दू किताबों में बल्कि यूनानी, बौध और मिस्री किताबों में भी मिलते हैं। अगर हम अली से मरबूत रिवायत, जिसके मुताबिक़ उनका नूर आदम से 4000 साल पहले ख़ल्क़ किया गया था, को सही मान लें तो सवाल उठता है कि जब से अब तक ये नूर क्या कर रहा था? क्या ये साकित था और तब ज़ाहिर हुआ जब अली के काबे में पैदा होने का वक़्त आया या इसकी कुछ फआलियत थी। इस रिवायत को न मानें तो भी रसूल की हदीस साफ कह रही है कि उनका नूर आदम से पहले ख़ल्क़ किया गया। क़ुरआन की आयत भी कुछ बड़े लोगों की मौजूदगी बता रही है। रसूल की हदीस तो कई मुस्तनद किताबों में मौजूद है। तो फिर आदम के पैदा होने से भी पहले ख़ल्क़ होने से लेकर अब्दुल्लाह के बेटे के तौर पर पैदा होने तक नूरे मौहम्मद क्या कर रहा था? वो ‘बड़े लोग’ क्या करते रहे जो क़ुरआन और Old Testament दोनों के हिसाब से मौजूद थे? क्या ख़ुदा ने नूर को पैदा किया और ख़ाली छोड़ दिया जब तक मौहम्मद के पैदा होने का वक़्त न आया? मानना पड़ेगा कि नूर का रोल बतौर नूर कहीं बड़ा है उस रोल से जो इंसानी शक्ल में दुनिया में आने पर उसने निभाया। जो मुसलमान जानते और मानते हैं कि नूर से मुराद अहलेबैत हैं वो भी इनकी जिस्मानी ज़िन्दगी पर ज़्यादा तवज्जो देते हैं। जब कि अस्ल तो नूरे ज़ाती है जिसके नूर ने
मुख़्तलिफ जिस्मों में पैदा होकर हिदायत के अपने काम को आगे बढ़ाया और भेजे गए अहकाम पर अमल कर के दिखलाया। ये नूरे ज़ाती ही था जो हर ज़माने के नबी और पैग़म्बर को guide कर रहा था, किताबें भेज रहा था, बदलते वक्त़ के हिसाब से अहकाम बना रहा था और क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदाए यकता की इबादत करवाने के लिए कोशिशें कर रहा था। मानना पड़ेगा कि हक़ीक़त में अल्लाह ने नूर को बेइंतेहा क़ुदरत बख़्शी है और ये उसके ख़ास बन्दों पर अल्लाह की अता है। लेकिन एक तरफ जहाँ नूर हिदायत का काम कर रहा था, ज़ुलमत की ताक़त गुमराह करने में लगी थी।
तमाम हिदायत इसी नूर के ज़रिए है जब्कि गुमराह करने की कोशिशें ज़ुलमत की ताक़त के ज़रिए। यही वजह है कि क़ुरआन में जगह जगह नूर और ज़ुलमत का ज़िक्र है। बारिश और रिज़्क़ अता करना इसी नूर के ज़रिए है। इसी वजह से क़ुरआन ने जब ईसा और मरयम की हक़ीक़त ज़ाहिर करनी चाही जिन को ईसाई ख़ुदा से मंसूब करते हैं तो उसने क्हा कि ये तो खाना खाते हैं यानी आम इंसान हैं जिन को हिदायत मिली जब्कि जब क़ुरआन ने अहलेबैत का ज़िक्र किया तो क्हा कि ये खिलाते हैं। क्या अहलेबैत दुनिया में खाना नहीं खाते थे? लेकिन कुरआन ने उनका ज़िक्र किया बतौर नूर जो तमाम कायनात को रिज़्क़ अता करते हैं।
यही बात उपनिषद और वेदों में खुले तौर पर क्ही गई है। क्हा गया है कि यह 7 नाम जो 14 हैं न सिर्फ बारिश, बल्कि तमाम रिज़्क़ के लिए ज़िम्मेदार हैं। यही दरअसल ज़िन्दगी हैं। नूरे ज़ाती इनके ज़रिए सीधे रास्ते की हिदायत करता है और तमाम अवतारों से भी इनका ख़ास रिश्ता है। एक ज़माने में जब इन सब को एक साथ किसी ख़ास जगह पैदा होना था उसे secret place क्हा गया और उनके आने के बाद के वाक़ेयात की पेशिंगोई की गई ताकि लोग उन्हें पहचान लें।
ईसा भी बख़ूबी जानते थे कि उनका मददगार एली यानी नूरे अली है। जो ईसाई यह कहते हैं कि एली पहले ज़माने के पैग़म्बर थे उनको जानना चाहिए कि मदद उससे माँगी जाती है जो उस वक़्त मौजूद हो और मदद करने की क़ुव्वत रखता हो। मत्ती 27: 46 कहती है कि जब ईसा को सलेब पर चढ़ा दिया गया और दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक तमाम मुल्क में अँधेरा छाया रहा तो तीसरे पहर के क़रीब ईसा ने बड़ी आवाज़ से चिल्ला कर क्हा ‘एली एली लम्मा शबक़तनी’। इसका तर्जुमा बाईबल में किया है कि ‘ऐ मेरे खुदा! ऐ मेरे खुदा, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया’। ज़रा सोचिए! ईसा को अगर अल्लाह को पुकारना होता तो कोई ऐसे नाम से क्यों पुकारते जो अल्लाह के लिए कभी इस्तेमाल न हुआ हो। बल्कि साबित है कि साबक़ा पैग़म्बरों जैसे नूह, सुलेमान और बुद्ध ने भी एली का ज़िक्र किया और उनके आने की पेशिंगोई की। ईसा के वक्त के लोग भी शायद जानते थे कि एली ख़ुदा नहीं है इसलिए उन्होंने क्हा कि ‘ये एलया को पुकारता है, ठहर जाओ, देखें तो एलया उसे बचाने आता है या नहीं।’
New
Testament में मत्ती की इंजीलः 4-17 आसमान की बादशाही का ज़िक्र करते हुए कहती हैः
उस वक़्त से यसूअ (ईसा) ने मुनादी करना और ये कहना शुरू किया कि तौबा करो क्योंकि आसमान की बादशाही नज़दीक आ गई है।
साफ ज़ाहिर है कि आसमान की बादशाही उस वक़्त तक नहीं आई थी बल्कि आने वाले वक़्त में आसमान की बादशाही को आना था।
मत्ती की इंजील में ही 5:3-10 न सिर्फ आसमान की बादशाही का ज़िक्र करती है बल्कि साफ तौर पर बताती है कि ईसा को ख़ुदा का बेटा क्यों क्हा गया।
मुबारक हैं वो जो दिल के ग़रीब हैं क्योंकि आसमान की बादशाही उन ही की है।
मुबारक हैं वो जो ग़मग़ीन हैं क्योंकि वो तसल्ली पाएँगे।
मुबारक हैं वो जो हलीम हैं क्योंकि वो ज़मीन के वारिस होंगे।
मुबारक हैं वो जो रास्तबाज़ी के भूखे और प्यासे हैं क्योंकि वो आसूदा होंगे।
मुबारक हैं वो जो रहम दिल हैं क्योंकि उन पर रहम किया जाएगा।
मुबारक हैं वो जो पाक दिल हैं क्योंकि वो खुदा को देखेंगे।
मुबारक हैं वो जो सुलह कराते हैं क्योंकि वो खुदा के बेटे कहलाएँगे।
मुबारक हैं वो जो रास्तबाज़ी के सबब से सताए गए हैं क्योंकि आसमान की बादशाही उन ही की है।
यहाँ भी साफ लफज़ों में आसमान की बादशाही की पेशिंगोई की जा रही है। यानी ये कि ये बादशाही ईसा के दुनिया में बतौर पैग़म्बर पैदा होने पर नहीं आई बल्कि ये आने वाले वक़्त की ख़बर थी। न सिर्फ लफ्ज़ ‘ख़ुदा के बेटे’ दूसरे आम इंसानों के लिए इस्तेमाल किया गया है बल्कि जो आसमान पर है उसे आम लोगों का बाप कह कर भी मुख़ातिब किया है। ज़ाहिर है कि ये नूरे ज़ाती या परमात्मा का ज़िक्र है जिस से वो सात नाम पैदा हुए जो 14 अहलेबैत की शक्ल में दुनिया में आए। यही वजह है कि ईसा ने आसमानी बाप को तमाम रास्तबाज़ों का बाप कह कर पुकारा। ये साबित हो चुका है कि नूरे ज़ाती यानी परमात्मा ही तमाम हिदायत और राह दिखाने के लिए ज़िम्मेदार है। ऐसे में वो ही रास्तबाज़ों का बाप हो सकता है। मरते वक़्त भी एली को पुकारना साबित करता है कि नूरे ज़ाती से पैदा हुए इसी नूर जिसे अली या शिव या रूद्र या एलया कहा गया, को ही ईसा मदद के लिए पुकारते हैं। देखिए मत्ती 23:9:
और ज़मीन पर किसी को अपना बाप न कहो क्योंकि तुम्हारा बाप एक ही है जो आसमानी है।
अगर ये मानें की एलया की बात नहीं बल्कि आसमान पर मौजूद ख़ुदा की बात हो रही है तो भी किसी भी सूरत में ईसा अल्लाह के बेटे साबित नहीं होते। ऐसा इसलिए कि ये क्हा जा रहा है कि आसमान पर जो है वो सब इंसानों का बाप है। और तमाम रास्तबाज़ इंसानों को ख़ुदा का बेटा क्हा जा रहा है। जिस तरह वो सब इंसानों का बाप है उसी तरह वो ईसा का भी बाप हुआ। फिर ईसाईयों ने क्यों ईसा को ख़ुदा का बेटा मान लिया ये समझ से बाहर है?
हम में से हर एक में अपने अंदर नूरानियत को बढ़ा कर आसमानी नूर से मुलहक़ हो जाने की सलाहियत है। इसी तरह हम में से हर एक में ज़ुलमत से मुलहक़ होने की भी सलाहियत है। जो रास्तबाज़ हैं और नूर से अपने को जोड़ लेते हैं वही दरअस्ल ख़ुदा के बेटे हैं। लेकिन अगर हम उस नूर को हासिल न करें तो हम किस काम के। इंजील कह रही है कि जब हम नेक काम करेंगे तो दूसरे हमारे बाप की जो आसमान पर है तमजीद करेंगे। देखिए मत्ती 5:13:17:
तुम ज़मीन के नमक हो लेकिन अगर नमक का मज़ा जाता रहे तो वो किस चीज़ से नमकीन किया जाएगा? फिर वो किसी काम का नहीं सिवा इसके कि बाहर फेंका जाए और आदमियों के पाँव के नीचे रौंदा जाए। तुम दुनिया के नूर हो। जो शहर पहाड़ पर बसा है वो छिप नहीं सकता। और चिराग़ जला कर पैमाने के नीचे नहीं बल्कि चिराग़दान पर रखते हैं तो उससे घर के सब लोगों को रोशनी पहुँचती है। इसी तरह तुम्हारी रौशनी आदमियों के सामने चमके ताकि वो तुम्हारे नेक कामों को देख कर तुम्हारे बाप की जो आसमान पर है तमजीद करें।
पहाड़ पर बसा हुआ शहर कौन सा है ये तो ईसा ही जानें लेकिन इससे आगे बोलते हुए ईसा एक बार फिर साफ कर देते हैं कि वो जिस आसमान की बादशाही की बात कर रहे हैं वो आने वाले वक़्त की बात है और न कि उस वक़्त की जब वो दुनिया में थे। 5:17-20 से साफ ज़ाहिर है कि ये पेशिंगोई है। ईसा का ये कहना कि उनके आने का मक़सद तौरैत और नबियों की किताबों को पूरा करना था जो तब तक मुमकिन न था जब तक वो आगे आने वाली आसमान की बादशाही को वाज़ेह तौर पर ब्यान न कर दें इस बात की साफ दलील है। देखिए मत्तीः5:17-20:
ये ने समझो कि मैं तौरैत या नबियों की किताबों को मँसूख करने आया हूँ। मँसूख करने नहीं बल्कि पूरा करने आया हूँ। क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक आसमान और ज़मीन टल न जाएँ एक नुक़ता या एक शोशा तौरैत से हरगिज़ न टलेगा जब तक सब कुछ पूरा न हो जाए। पस जो कोई इन छोटे से छोटे हुकमों में से भी किसी को तोड़ेगा और यही आदमियों को सिखाएगा वो आसमान की बादशाही में सबसे छोटा कहलाएगा लेकिन जो उन पर अमल करेगा और उनकी तालीम देगा वो आसमान की बादशाही में बड़ा कहलाएगा। क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ कि अगर तुम्हारी रास्तबाज़ी फक़ीहों और फरीसियों की रास्तबाज़ी से ज़्यादा न होगी तो तुम आसमान की बादशाही में हरगिज़ दाखिल न होगे।
आप ने देखा, तौरैत और नबियों की किताबें तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक आसमान की बादशाही की ख़बर न दे दी जाए। ये इल्म इतना ही अहम है। ये इसी तरह है जैसे आखि़री रसूल मौहम्मद की तालीम जब तक पूरी नहीं हो सकी थी जब तक ग़दीर के मैदान में अली की विलायत का एलान नहीं किया गया। जहाँ एलान हुआ वहीं कुरआन की आयत नाज़िल हो गई कि आज के दिन दीन कामिल हुआ और नेयमतें मुकम्मल हो गईं।
अल्लाह हर जगह है, अल्लाह हर एक के पास है। लेकिन अल्लाह जब तक नहीं मिल सकता जब तक हम नूरे ज़ाती के दुनिया में नुमाईंदों को पहचान न लें। इसीलिए क़ुरआन ने कहा कि अगर अल्लाह को पाना चाहते हो तो मौहम्मद को वसीला बनाओ। छठे इमाम का क़ौल है कि अक़्ल उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं हो सकती जब तक वो हक़ की पैरवी न करे। यही वजह है कि जैसे जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है मौहम्मद की ज़रूरत बढ़ती जा रही है। शायद इसीलिए मशीअत ने क़ुरआन और creation plan के कई राज़ों को अब तक छिपा कर रखा था। अब जब हर आसमानी मज़हब की किताबों से हक़ ज़ाहिर हो रहा है, आसमान की बादशाही आ जाने की पेशिंगोई भी क़रीब है।
ईसा साफ लफ्ज़ों में कह रहे हैं कि आखि़री दौर में आसमान की बादशाही में दाखि़ले के लिए एक भी हुक्म का न तोड़ना और फक़ीहों और फरीसियों से ज़्यादा रास्तबाज़ होना ज़रूरी है। जो छोटे से छोटे हुक्म पर भी अमल करेगा वही इस बादशाही में अफज़ल समझा जाएगा। साफ है कि आसमान की बादशाही सीधे रास्ते का इल्म आ जाने के बाद हमारे आपके नेक आमाल पर मुनहसिर होगी।
कैसे हम समझ लेते हैं कि कुछ अमल बजा लेने से हम इमाम मेहदी या ईसा के दुनिया मंे दुबारा आने पर उनके साथ हो जाएँगे। इमाम मेहदी या ईसा मसीह दुबारा सामने आएँगे ही नहीं जब तक हम में से एक जमाअत अल्लाह की इस खि़लक़त में उनके अस्ल रोल और मरतबे को पहचान न ले और फक़ीहों से ज़्यादा रास्तबाज़ न हो जाए। ये जमाअत तक़वे और इबादत की मंज़िल में इतनी बुलन्द होगी कि छोटे से छोटे हुक्म पर अमल करेगी और छोटे से छोटे हुक्म को तोड़ना भी बड़ा गुनाह समझेगी।
मत्ती 26:29 में भी ईसा वाज़ेह तौर पर ज़ाहिर कर रहे हैं कि आसमान की बादशाही आने वाले वक़्त में आएगी। जब बाप की बादशाही आएगी तो ईसा भी मौजूद होंगे लेकिन बादशाही का सबब कोई और होगा। देखिएः
मैं तुम से कहता हूँ कि अंगूर का ये शीरा कभी न पीयूँगा। उस दिन तक कि तुम्हारे साथ अपने बाप की बादशाही में नया न पियूँ।
मत्ती 26:64 बहुत अहम है जिसमें ईसा कहते हैंः
मैं तुम से कहता हूँ कि इसके बाद तुम इब्ने आदम को क़ादिरे मुतलक़ की दाहिनी तरफ बैठे और आसमान के बादलों पर आते देखोगे।
ईसाई यक़ीनन क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा को जिस्म-ओ-जिसमानियात से मुबररा समझते हैं। सिर्फ का़दिरे मुतलक़ के दाहिनी तरफ बैठे कहा होता तो समझा जा सकता था कि मुहावरतन अल्लाह से क़ुरबत की बात हो रही है। लेकिन क़ादिरे मुतलक़ के दाहिनी तरफ बैठ कर आसमान के बादलों पर आते देखने की बात से ज़ाहिर है कि अल्लाह की बात नहीं हो रही है बल्कि क़ादिरे मुतलक़ अल्लाह के ख़ल्क़कर्दा नूरे ज़ाती से ख़ल्क़़ हुए नूर यानी बक़ियातुल्लाह या इमाम मेहदी की बात हो रही है जिस के ज़ाहिर होने के बाद आसमान की बादशाही क़ायम होगी। अगर दुआओं में 14 में से बचे एक को बक़ियातुल्लाह यानी ‘अल्लाह का बाक़ी’ क्हा जा सकता है तो 14 का एक के बाद एक दुनिया में आना spirit of God का आना क्यों नहीं कहा जा सकता। ईसा की पेशिंगोईयों में एक पेशिंगोई इसी spirit of God यानी अल्लाह की रूह के दुनिया मंे आने की बात कर रही है।
मत्तीः5:43-50 में फिर आसमानी बाप को आम लोगों का बाप कह कर मुख़ातिब किया गया है और उसे कामिल बताया गया है। साफ ज़ाहिर है कि आसमानी बाप जो सूरज को नेकों और बदों दोनों पर चमकाता है और रास्तबाज़ों और नारास्तों दोनों पर बारिश करता है ईसा का वैसे ही बाप है जैसे कि हमारा। उसी को आसमानी बाप कह कर ईसा मुख़ातिब कर रहे हैं। देखिएः
तुम सुन चुके हो कि कहा गया था कि अपने पड़ोसी से मौहब्बत रख और अपने दुश्मन से अदावत। लेकिन मैं तुम से ये कहता हूँ कि अपने दुश्मनों से मौहब्बत रखो और अपने सताने वालों के लिए दुआ करो। ताकि तुम अपने बाप के जो आसमान पर है बेटे ठहरो क्योंकि वो अपने सूरज को बदों और नेकों दोनों पर चमकाता है और रास्तबाज़ों और नारास्तों दोनों पर मेंह बरसाता है। क्योंकि अगर तुम अपने मौहब्बत रखने वालों ही से मौहब्बत रखो तो तुम्हारे लिए क्या अज्र है? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा नहीं करते? और अगर तुम फक़त अपने भाईयों ही को सलाम करो तो क्या ज़्यादा करते हो? क्या ग़ैर क़ौमों के लोग भी ऐसा नहीं करते? पस चाहिए कि तुम कामिल हो जैसा तुम्हारा आसमानी बाप कामिल है?
आगे देखिए, जिस तरह आसमानी बाप की आसमान पर हुकूमत है उसी तरह ज़मीन पर आने की दुआ की जा रही है। क्या कभी क़ादिरे मुतलक़ खुदा ज़मीन पर आएगा? नहीं, साफ ज़ाहिर है कि ये आने वाले दौर में उस वक़्त की पेशिंगोई हो रही है जब ख़ुदा के छोटे से छोटे हुक्म पर अमल होगा और उसकी बादशाही क़ायम होगी।
ये पेशिंगोई वैसे ही है जैसे गीता में कृष्ण एक ऐसे पेड़ का ज़िक्र करते हैं जिस की जड़ें जन्नत में और जिस की शाखें ज़मीन पर आ रही हों। कृष्ण के गीता में दिए गए जुमले को न समझ पाने की वजह से लोगों ने कहा कि ये उस उलटे उगे पेड़ की बात हो रही है जो कुएँ के किनारे उगा और उसकी शाखें कुएँ के अन्दर चली गईं। जी नहीं, बल्कि ये नूर के आसमान पर रहने और किसी ख़ास वक़्त हमारी हिदायत की ख़ातिर ज़मीन पर इंसान की शक्ल में आने की बात हो रही थी जिसे लोग समझ न पाए।
ईसा का आसमानी बाप दर असल उपनिषद और गीता का परमात्मा और क़ुरआन का नूरे ज़ाती या अल्लाह का चेहरा है जिससे वजूद में आए 14 नूर आसमान पर इबादत करते हैं और वक़्त आने पर इंसान की शक्ल में ज़मीन पर आए और 14 मासूम या अहलेबैत कहलाए। आप देख चुके हैं कि वेदांे
उपनिषदों के ये मनू या progenitors of mankind हैं। यही दरअस्ल ज़िन्दगी हैं और इन ही के सबब इंसान वजूद में आया। अगर progenitors of mankind को बाप न कहा जाए तो किसे कहा जाए? देखिए मत्ती 6:1-11:
खबरदार अपने रास्तबाज़ी के काम आदमियों के सामने दिखाने के लिए न करो नहीं तो तुम्हारे बाप के पास जो आसमान पर है तुम्हारे लिए कुछ अज्र नहीं है।
पस जब तू ख़ैरात करे तो अपने आगे नरसिंगा न बजवा जैसे रियाकार इबादत खानों और कूचों में करते हैं ताकि लोग उनकी बड़ाई करें। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वो अपना अज्र पा चुके। बल्कि जब तू ख़ैरात करे तो जो तेरा दाहिना हाथ करता है उसे तेरा बायाँ हाथ न जाने। ताकि तेरी ख़ैरात पोशीदा रहे। इस सूरत में तेरा बाप जो पोशीदगी में देखता है तुझे बदला देगा।
और जब तुम दुआ करो तो रियाकारों की मानिंद न हो क्योंकि वो इबादतख़ानों में और बाज़ारों के मोड़ों पर खड़े होकर दुआ करना पसन्द करते हैं ताकि लोग उनको देखें। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वो अपना अज्र पा चुके। बल्कि जब तू दुआ करे तो अपनी कोठरी मंे जा और दरवाज़ा बन्द करके अपने बाप से जो पोशीदगी में है दुआ कर। इस सूरत में तेरा बाप जो पोशीदगी में देखता है तुझे बदला देगा। और दुआ करते वक्त ग़ैर क़ौमों के लोगों की तरह बक बक न करो क्योंकि वो समझते हैं कि हमारे बहुत बोलने के सबब से हमारी सुनी जाएगी। पस उनकी मानिंद न बनो क्योंकि तुम्हारा बाप तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है कि तुम किन किन चीज़ों के मोहताज हो। पस तुम इस तरह दुआ किया करो कि ऐ हमारे बाप तू जो आसमान पर है तेरा नाम पाक माना जाए, तेरी बादशाही आए, तेरी मर्ज़ी जैसी आसमान पर पूरी होती है ज़मीन पर भी हो।
क्या ऐसा नहीं लग रहा कि ईसा की तमाम तालीमात का मक़सद उसी बादशाही की पेशिंगोई करना है? ईसा आसमानी बाप के लिए दुआ कर रहे हैं कि उसका नाम ज़मीन पर पाक माना जाए और अल्लाह क़ुरआन में साफ लफ्ज़ों में एलान कर रहा है कि ‘अल्लाह का इरादा है कि ऐ अहलेबैत तुम को पाक रखे’। उसी आसमानी बाप की ज़मीन पर बादशाही को आसमानी बादशाही क्हा गया है। 14 अहलेबैत में से आखि़री फर्द को अल्लाह का बाक़ी यानी बक़ियातुल्लाह के लक़ब से दुआओं में इसी लिए याद किया़ गया क्योंकि अल्लाह जानता था कि हम उनके आने से पहले खि़लक़त के प्लान को जान लेंगे और उसमें नूरे ज़ाती के रोल को पहचानते हुए आखि़री नूर मेहदी का इस्तेक़बाल करें। “Muslims & The Straight Path” में आप ने पढ़ा है कि कैसे हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी अपनी अपनी किताबों में दी गई पेशिंगोईयों की बिना पर किसी आने वाले मसीहा का इंतेज़ार कर रहे हैं। आप ने ये भी देखा कि क़दीमी ज़माने में अम्रीका की एज़टेक हुकूमत के बाशिंदे भी किसी मसीहा के इंतेज़ार में थे। ये तो समझा जा सकता है कि हिन्दूओं, यहूदीयों, ईसाईयों और मुसलमानों ने एक दूसरे की किताबों से मिलती जुलती बातें ले लीं लेकिन अगर वही मिलती जुलती बातें अम्रीका की एज़टैक हुकूमत के दौर की किताबों में पाई जाएँ या Dead Sea से निकले Scrolls में पाई जाएँ तो आप को मानना पड़ेगा कि इन सब मज़हबों की नींव या source एक ही है। अम्रीका को कोलम्बस ने 15वीं सदी के आखिर में ढूँढा और एज़टैक लोगों की किताबें उन्नीसवीं सदी तक decode नहीं हो पाईं थीं। वहीं Dead Sea Scrolls पिछली सदी में ही समुंद्र के नीचे से निकाले गए हैं। इन सब किताबों में साफ तौर पर ब्यान किया गया है कि जिस शख़्स का सब मज़ाहिब के मानने वाले इंतेज़ार कर रहे हैं उसका अल्लाह की क़ुदरत में क्या रोल है। उसकी बादशाही आने को है, ये हर मज़हब की पेशिंगोई से साबित है। इसी बादशाही के आने पर नूरे ज़ाती की मर्ज़ी जैसी आसमान पर पूरी होती है वैसी ही ज़मीन पर पूरी होगी। यानी ज़मीन पर भी छोटे से छोटा गुनाह बड़ा माना जाएगा और हर हर लम्हे उसी नूरे ज़ाती की मंशा पूरी होगी जो अल्लाह की इबादत के अलावा कुछ और नहीं है।
मत्तीः7:14-15 कहती हैः
इसलिए कि अगर तुम आदमियों के क़ुसूर माफ करोगे तो तुम्हारा आसमानी बाप भी तुम को माफ करेगा। और अगर तुम आदमियों के क़ुसूर माफ न करोगे तो तुम्हारा बाप भी तुम्हारे क़ुसूर माफ न करेगा।
ईसा के अल्फाज़ से बार बार साबित हो रहा है कि हर इंसान को वो आसमानी बाप का बेटा कह रहे हैं। पहली बात तो ये कि साफ ज़ाहिर है कि हक़ीक़ी बाप का ज़िक्र नहीं हो रहा है। दूसरे ये कि जिस रिश्ते से आसमान पर कोई हम रास्तबाज़ों का बाप है उसी रिश्ते से वो ईसा का बाप है। तीसरे कहीं भी ईसा ने ये नहीं कहा कि उनका बाप ख़ुदा है। उन्होंने आसमानी बाप का ज़िक्र किया है। उपनिषद और गीता से मिली नई रौशनी के बाद कोई भी शक नहीं रह जाता कि आसमानी बाप नूरे ज़ाती या परमात्मा है और उसकी बादशाही उसके इंसानियत को ख़ल्क़ करने के मक़सद का पूरा हो जाना है।
आसमानी बाप वो है जिसने हर हर खि़त्ते में पैग़म्बर भेजे और जिसके 14 नूर बाद में इंसान की शक्ल में दुनिया में ज़ाहिर हुए, जिन की हिदायत का आम हो जाना ही आसमानी बादशाही कहलाएगी। 18वीं आयत में भी यही कहा गया है कि ‘तेरा बाप जो पोशीदगी में देखता है तुझे बदला देगा।’ 25-26 में भी इसी तरह की बात कही गयी हैः ‘मैं तुम से कहता हूँ कि अपनी जान की फिक्र न करना कि हम क्या खाएँगे और क्या पियेंगे? और न अपने बदन की कि क्या पहनेंगे? क्या जान ख़ूराक से और बदन पोशाक से बढ़ कर नहीं? हवा के परिंदों को देखो कि न बोते हैं न काटते। न कोठियों में जमा करते हैं फिर भी तुम्हारा आसमानी बाप उन को खिलाता है। क्या तुम उन से ज़्यादा क़द्र नहीं रखते?’ आगे क्हा है कि ‘इसलिए फिक्रमंद हो कर ये न कहो कि हम क्या खाएँगे या क्या पियेंगे या क्या पहनेंगे? क्यों कि इन सब चीज़ों की तलाश में गै़र क़ौमें रहती हैं और तुम्हारा आसमानी बाप जानता है कि तुम इन सब चीज़ों के मोहताज हो। बल्कि तुम पहले उस की बादशाही और उस की रास्तबाज़ी की तलाश करो तो ये सब चीज़ें तुम को मिल जायेंगी’। क्या अल्लाह की रास्तबाज़ी तलाश की जा सकती है? ज़ाहिर है आसमानी बाप नूरे ज़ाती है जिसे अल्लाह ने न सिर्फ मुतलक़न पाक बल्कि मुतलक़न रास्तबाज़ बनाया है।
देखिए मत्तीः7:7-11:
माँगो तो तुम को दिया जाएगा। ढूँढों तो पाओगे। दरवाज़ा खटखटाओ तो तुम्हारे वास्ते खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई माँगता है उसे मिलता है और जो ढूँढता है वो पाता है और जो खटखटाता है उसके वास्ते खोला जाएगा। तुम में ऐसा कौन सा आदमी है कि अगर उस का बेटा उस से रोटी माँगे तो वो उसे पत्थर दे? या अगर मछली माँगे तो उसे साँप दे? पस जब कि तुम बुरे हो कर अपने बच्चों को अच्छी चीज़ें देना जानते हो तो तुम्हारा बाप जो आसमान पर है अपने माँगने वालों को अच्छी चीज़ें क्यों न देगा?
ये भी क्हा जा रहा है कि ईसा की मर्ज़ी पर चलने वाला आसमानी बादशाही में दाखिल हो ये ज़रूरी नहीं। मज़े की बात ये कि ईसा साफ कह रहे हैं कि मेरी तालीम पर चलने वाला भी अगर आसमानी बाप को नहीं पहचानेगा तो ईसा के लिए उसकी कोई अहमियत नहीं। ज़रूरी है कि ईसा का हर मानने वाला ईसा के और अपने आसमानी बाप को पहचानने की कोशिश करे। यहाँ भी साफ ज़ाहिर है कि आसमानी बादशाही ईसा के सबब न आएगी। हाँ ईसा उस वक्त मौजूद ज़रूर होंगे अपने मानने वालों से अपने को जुदा करने और उन्हें बदकार कहने के लिए। देखिए मत्तीः 7:21-27:
जो मुझ से ऐ ख़ुदावंद ऐ ख़ुदावंद कहते हैं उन में से हर एक आसमान की बादशाही में दाखि़ल न होगा मगर वही जो मेरे आसमानी बाप की मर्ज़ी पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे ऐ ख़ुदावंद ऐ ख़ुदावंद! क्या हम ने तेरे नाम से नुबूवत नहीं की और तेरे नाम से बदरूहों को नहीं निकाला और तेरे नाम से बहुत से मोजिज़े नहीं दिखाए। उस वक़्त मैं उनसे साफ कह दूँगा कि मेरी कभी तुम से वाक़फियत न थी ऐ बदकारो मेरे पास से चले जाओ। पस जो कोई मेरी ये बातें सुनता और उन पर अमल करता है वो उस अक़लमंद आदमी की मानिंद ठहरेगा जिस ने चट्टान पर अपना घर बनाया। और मेंह बरसा और पानी चढ़ा और आँधियाँ चलीं और उस घर पर टककरें लगीं लेकिन वो न गिरा क्योंकि उस की बुनियाद चट्टान पर डाली गई थी। और जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर अमल नहीं करता वो उस बेवक़ूफ आदमी की मानिंद ठहरेगा जिस ने अपना घर रेत पर बनाया। और मेंह बरसा और पानी चढ़ा और आँधियाँ चलीं और उस घर को सदमा पहुँचाया और वो गिर गया और बिलकुल बरबाद हो गया।
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