आसमान की बादशाही - Part 5
एक और तमसील में ईसा कह रहे हैं कि रूहें अलग अलग वक़्त में निजात हासिल करेंगी। कोई पहले निजात पाएगा, कोई बाद में। जो निजात पा जाए, सब के लिए बराबर अज्र है। जो जितना जल्द निजात पाए उतना ही बेहतर। देखिए मत्ती 20:1-16:
क्योंकि आसमान की बादशाही उस घर के मालिक की मानिंद है जो सवेरे निकला ताकि अपने ताकिस्तान में मज़दूर लगाए। और उस ने मज़दूरों से एक दीनार रोज़ ठहरा कर उन्हें अपने ताकिस्तान में भेज दिया। फिर पहर दिन चढ़े के क़रीब निकल कर उसने औरों को बाज़ार में बेकार खड़े देखा। और उनसे कहा तुम भी ताकिस्तान में चले जाओ। जो वाजिब है तुम को दूँगा। पस वो चले गए। फिर उस ने दोपहर और तीसरे पहर के क़रीब निकल कर वैसा ही किया। और कोई एक घंटा दिन रहे फिर निकल कर औरों को खड़े पाया और उन से क्हा तुम क्यों यहाँ तमाम दिन बेकार खड़े रहे? उन्होंने उससे क्हा इसलिए कि किसी ने हम को मज़दूरी पर नहीं लगाया। उस ने उन से क्हा तुम भी ताकिस्तान में चले जाओ। जब शाम हुई तो ताकिस्तान के मालिक ने अपने कारिंदे से क्हा कि मज़दूरों को बुला और पिछलों से लेकर पहलों तक उनकी मज़दूरी दे दे। जब वो आए जो घंटा भर दिन रहे लगाए गए थे तो उनको एक एक दीनार मिला। जब पहले मज़दूर आए तो उन्होंने ये समझा कि हम को ज़्यादा मिलेगा और उनको भी एक ही एक दीनार मिला। जब मिला तो घर के मालिक से ये कह कर शिकायत करने लगे कि इन पिछलों ने एक ही घंटा काम किया है और तूने इन को हमारे बराबर कर दिया जिन्होंने दिन भर का बोझ उठाया और सख़्त धूप सही। उसने जवाब देकर उन में से एक से क्हा मियाँ मैं तेरे साथ बेइंसाफी नहीं करता। क्या तेरा मुझ से एक दीनार नहीं ठहरा था। जो तेरा है उठा ले और चला जा। मेरी मर्ज़ी ये है कि जितना तुझे देता हूँ इस पिछले को भी उतना ही दूँ। क्या मुझे रवा नहीं कि अपने माल से जो चाहूँ सो करूँ? या तू इस लिए कि मैं नेक हूँ बुरी नज़र से देखता है। इसी तरह आखिर अव्वल हो जायेंगे और अव्वल आखिर।
मत्तीः17:10-12 से ज़ाहिर है फक़ीह मानते थे कि एलया उस वक्त तक नहीं आया है और उसका आना ज़रूरी है।
शागिरदों ने उससे पूछा कि फिर फक़ीह क्यों कहते हैं कि एलया का - इब्ने आदम से - पहले आना ज़रूर है।
ईसा ने इसका इंकार नहीं किया और कहाः ‘एलया अल्बत्ता आएगा और सब कुछ बहाल करेगा।’ इससे साबित है कि एलया किसी पुराने पैग़म्बर का ज़िक्र नहीं बल्कि आने वाले वक़्त में नूरे अली के दुनिया में आने का ज़िक्र है।
लेकिन मैं तुम से कहता हूँ कि एलया तो आ चुका और उन्होंने उसे नहीं पहचाना बल्कि जो चाहा उसके साथ किया। इसी तरह इब्ने आदम भी उनके हाथ से दुख उठाएगा।
इस क़िस्म के जुमलों से लगता है कि नूर के अजज़ा अलग अलग वक़्त पर दुनिया में हिदायत का काम करते रहे। युहन्ना और ईसा का भी उनसे कोई न कोई रिश्ता था। एक ख़ास वक्त ऐसा आने वाला था जब सब को एक के बाद एक दुनिया में आना था। सारी तैयारियाँ उस वक़्त के लिए थीं जब वो सब यके बाद दीगरे आएँगें। इसको ईसा ने ख़ुदा की रूह का ज़मीन पर आना क्हा है। उसी रूह की आखि़री फर्द मेहदी को हम बक़ियातुल्लाह कह कर पुकारते हैं क्योंकि वो अल्लाह के नूरे ज़ाती का खल्क़कर्दा आखि़री फर्द है। यही बात मत्ती 23:39 में कहते हैं किः
मैं तुम से कहता हूँ कि अब से मुझे फिर हरगिज़ न देखोगे जब तक न कहोगे कि मुबारक है वो जो ख़ुदावंद के नाम से आता है।
आज कोई कहे कि इन सब दलीलों के ज़रिए हम किसी ख़ास मकतबे फिक्र के अक़ीदे को प्रोमोट करने की कोशिश कर रहे हैं तो ये सिर्फ एक बुहतान होगा। ख़ुदा का ये मंसूबा था कि सीधा रास्ता उस वक़्त अयान किया जाए जब हर मज़हब और हर फिरक़ा गुमराही में गर्क़ हों। ऐसे में वो सब अपनी अपनी आसमानी किताबों से ख़ुद ही सीधे रास्ते को पहचान लें और किसी को भी ये कहने का मौक़ा न हो कि उसका मज़हब या उसकी फिक्र ग़ालिब आई।
जिस तरह सब मज़ाहिब और फिरक़े सीधे रास्ते से भटक गए, उसी तरह शिया मसलक के मानने वाले भी आज उन मक़ासिद से कोसों दूर हैं जिन को नूरे ज़ाती ने हमारी ज़िन्दगी का मक़सद क़रार दिया और जिन पर चल कर हम निजात हासिल कर सकते हैं।
अफसोस की बात ये है कि जिन बातों को मनवाने के लिए शिया मौलवी लंबी दलीलें देते हैं, जब वो उन ही दलीलों में फेल होने लगते हैं तो फिर अक़्ल और दलील से गुरेज़ करने लगते हैं और अ़कीदे और ईमान की बात करने लगते हैं। हक़ीक़त ये है कि अक़्ल और दलील से किनाराकश हो कर बनाया गया अक़ीदा और ईमान बाप दादा का रास्ता तो हो सकता है लेकिन सीधा रास्ता जिसे इस्लाम कहते हैं कभी नहीं हो सकता।
मिसाल के तौर पर आप इस अक़ीदे को देखें जिस कि बिना पर ज़मीन कभी भी हुजजते ख़ुदा से ख़ाली नहीं हो सकती। शिया मसलक का मानना है कि मौहम्मद और अहलेबैत ही हुजजते ख़ुदा हैं और एक पल के लिए भी ऐसा मुमकिन नहीं कि ज़मीन पर अल्लाह की हुजजत न रहे। इसी दलील की बिना पर वो साबित करते हैं कि 12वें इमाम यानी 14वें अहलेबैत मौहम्मद ‘मेहदी’ पैदा हो चुके हैं और हमारी नज़रों से ओझल हैं। इसी अक़ीदे की बुनियाद पर हदीसों में आया है कि मेहदी जो कि आने वाली दुनिया में आएँगे, उनकी शहादत होेते ही तमाम दुनिया तबाह हो जाएगी। इसी अक़ीदे की बुनियाद पर शिया उलमा ने उन रिवायतों को ख़ारिज कर दिया जिन के मुताबिक़ किसी इमाम की पैदाईश गुज़शता इमाम की रेहलत से कुछ माह बाद हुई थी।
नौबख़्ती ने शिया फिरक़ों में से बारहवें फिरक़े, यानी इमामिया के बारे में बहस करते हुए उन बुनियादों की तरफ इस तरतीब से इशारा किया हैः
1-ज़मीन हुजजते ख़ुदा से ख़ाली नहीं हो सकती।
2-इमाम हसन और इमाम हुसैन के बाद दो भाईयों की इमामत मुमकिन नहीं है।
3-अगर ज़मीन पर सिर्फ दो अफराद बसते हों, तो लाज़मन उन में से एक हुजजते ख़ुदा होगा।
4-जिस की इमामत साबित न हुई हो, उस की औलाद की इमामत भी जाएज़ नहीं है। मसलन इमाम जाफर सादिक़ के फरज़न्द इस्माईल क्योंकि अपने वालिद की ज़िन्दगी में ही बग़ैर इमाम बने वफात पा चुके थे, इसलिए उनका बेटा मौहम्मद भी मक़ामे इमामत का हक़दार नहीं हो सकता।
इसके बाद वो मज़ीद कहते हैं: ‘मज़कूरा बाला बुनियादें इमाम मौहम्मद और इमाम जाफर सादिक़ की रिवायत से अख़्ज़ की गई हैं, और किसी शिया ने उन्हें रद्द या उनका इनकार नहीं किया है और उनके तरीक़ और उनकी इसनाद के इस्बात और इस्तेहकाम के बारे में किसी क़िस्म का शक व शुबह नहीं पाया जाता। शियों की नज़र में ज़मीन एक लम्हे के लिए भी हुजजते ख़ुदा से ख़ाली नहीं रह सकती, क्योंकि उस सूरत में ज़मीन और जो कुछ उस पर है, वो सब यकलख़्त तबाह व बरबाद हो जाएगा। हम गुज़श्ता इमाम - इमाम हसन असकरी - की वफात के वक़्त तक उनकी इमामत पर अक़ीदा रखने के साथ साथ ये एतक़ाद रखते और ये एतराफ करते हैं कि उनके जानशीन उनके सुल्ब से हैं और आप के बाद उम्मत की इमामत की ज़िम्मेदारी उन्ही को सौंपी गई है। वो हुक्मे ख़ुदा से एक दिन परदै गै़बत से बाहर आएँगे और अपने अम्र को आशकार करेंगे, क्योंकि उनकी ग़़ैबत और ज़हूर का इख़्तेयार ख़ुदा के हाथों में है। जैसा कि अमीरूलमोमीनीन हज़रत अली ने फरमाया हैः
बारेइलाहा! बेशक तू अपनी ज़मीन को मख़लूक़ के लिए अपनी हुजजत से खाली नहीं रखता, चाहे वो ज़ाहिर और मारूफ हो या खाएफ व पिनहाँ, ताकि तेरी हुजजतें और निशानियाँ महो न होने पाएँ।’
हम भी मानते हैं कि ज़मीन किसी भी लम्हे हुजजते ख़ुदा से ख़ाली नहीं हो सकती और ऐसा होने की सूरत में तमाम ज़मीन तबाह हो जाएगी। लेकिन अगर ऐसा है तो जब नूरे मौहम्मद और नूरे अली इंसानी जिस्मों में अरब की सरज़मीन पर पैदा नहीं हुए थे तो फिर ये ज़मीन कैसे क़ायम थी? कोई कहेगा कि ये नूर किसी न किसी सूरत में ज़मीन पर रहा और सुल्बे आदम से लेकर ये नस्ल दर नस्ल मुनतक़िल होता रहा यहाँ तक कि अब्दुलमुत्तलिब की औलाद अब्दुल्लाह और अबु तालिब के ज़रिए मौहम्मद और अली में दाखि़ल हुआ। यानी आप को ये मानने में एतराज़ नहीं है कि नूरे मौहम्मद और नूरे अली दूसरे जिस्मों में इसी दुनिया में रहा। हम खुद ये कहते हैं और मानते हैं कि नूर का काम हिदायत है और वो हर हर लम्हे इसी दुनिया में रहा और रह रहा है। लेकिन हम ये नहीं मानते कि नूर सुल्ब के ज़रिए जिस्म से दूसरे जिस्म में transfer होता है। इसकी वाज़ेह मिसाल ईसा हैं जिन में ये सुल्ब से दाखि़ल हुए बिना पहुँचा। बिहारूल अनवार में अईम्मा की कई अहादीस इस तरफ इशारा करती हैं कि एक ख़ास क़िस्म की रूह अईम्मा में होती है जो ईमामे वक़्त की रेहलत के बाद दूसरे जिस्म में मुनतक़िल हो जाती है।
अब तक शियों की जो सोच है उसे अगर क़ुबूल कर लें तो हमें ये मानना पड़ेगा कि ऐसे वक़्त आए जब ये नूर बज़ाहिर आम इंसानों के जिस्मों में मौजूद था। दूसरे लफज़ों में कहें तो ये dormant था। ऐसी उम्मीद नूरे ज़ाती से वजूद में आए अनवार से जिन का काम हिदायत और सीधे रास्ते की तरफ guide करना है नहीं की जा सकती। क्योंकि इसके बरखि़लाफ ज़ुलमत की ताक़त हर वक्त misguide करने और दुनिया को भटकाव की तरफ ले जाने की कोशिश में मसरूफ थी।
शिया मान रहे हैं कि कम से कम अली और मौहम्मद का नूर इससे पहले भी मुख़्तलिफ जिस्मों में रह चुका है। हम ये तो मान ही नहीं सकते कि ये नूर किसी जिस्म में मौजूद हो और वो बाज़ाब्ता तौर पर हिदायत का काम न करे। अब अक़ल से जो बात साबित होती है वो ये है कि ये नूर जो ज़ुलमत के मुक़ाबले में हिदायत का काम करता रहा वो आदम के जिस्म में मौजूद था, जिस के बाद शीस के जिस्म में आया। लेकिन बज़ाहिर आम इंसानों के जिस्मों में मुनतक़िल होने की जगह ये दुनिया के मुख़्तलिफ खि़त्तों में बतौर पैग़म्बर चमका। ये या तो उन पैग़म्बरों के जिस्मों में पैदाईश से ही मौजूद था या उनकी पाकदामिनी की बिना पर जिस्मों में दाखि़ल हुआ। बुद्ध का वा़के़या सामने है कि वो सारी रियाज़त इसलिए कर रहे थे कि enlightenment हासिल हो और एक वक़्त ऐसा भी मिलता है कि उन्होंने अपना खाना नदी में फेंक दिया इस नीयत के साथ कि अगर उनको enlightenment हासिल होना है तो ये खाना बहाव से उल्टी तरफ जाए और ऐसा ही हुआ। लफ्ज़ enlightenment भी किसी नूरानी हिदायत की गवाही देता है। यही वजह है कि मुख़्तलिफ पैग़म्बरों के वाक़ियात से ज़ाहिर है कि उन्हें एलया और मौहम्मद का नूर हिदायत देता रहा। एक ज़माना ऐसा आना था जब नूर के ये सब अजज़ा सिमट कर एक के बाद एक अरब के रेगिस्तान में पैदा होने थे जिस को ईसा ने इन लफ्जों में ताबीर कियाः “When the spirit of God will come”. यक़ीनन सब नूर मिल कर spirit of God बनाते हैं। ये spirit यानी परमात्मा के अजज़ा कभी हिन्दुस्तान में, कभी अम्रीका में जो उस वक़्त तक दरयाफत भी नहीं हुआ था, कभी ईरान, मिस्र, चीन या यूरोप में पैग़म्बर की शक्ल में ज़ाहिर हुए और जब ये सब अजज़ा सिमट कर एक ही जगह एक के बाद एक पैदा हुए तो उसे spirit of God कहा गया।
ईसा के जिस्म में भी इन्हीं 14 में किसी का नूर था, बुद्ध और कृष्ण के जिस्म में भी इन्हीं में से कोई एक था और मूसा और दाउद के जिस्म में भी इन्हीं में से कोई नूर था लेकिन जब वो सिमट कर एक के बाद एक अरब की सरज़मीन पर अवतरित हुए तो ज़ुलमत की ताकतों ने अपनी तमामतर क़ुव्वतों को समेट कर इनके मुक़ाबिल खड़ा कर दिया कि ये कामयाब न हो पाएँ। लेकिन क्या किया जाए ख़ुदा के वायदे का जिसके मुताबिक़ नूर को ग़ालिब आना है और ज़ुलमत की ताक़त को शिकस्त खाना तय है।
यही वजह है कि कुरआन सूरः सफ आयत 8 में कहता है कि ‘और अल्लाह अपने नूर को मुकम्मल करने वाला है, चाहे ये बात कुफ्फार को कितनी ही नागवार क्यों न हो।’
अब आप समझे मेहदी को बक़ियातुल्लाह क्यों कहा गया?
तारीख गवाह है कि ऐसे वक़्त भी आए जब कोई इमाम महज़ 5 या 8 साल की उम्र में ही इमामत के मनसब पर फाएज़ हो गया था। इसके बावजूद हर इमाम अपने वक़्त का सब से बड़ा आलिम रहा। यही वजह काफी होना चाहिए थी मुसलमानों को उनका नूरानी ताल्लुक़ पहचान लेने के लिए। लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ!
सन 203 हिजरी में जब आठवें इमाम अली रज़ा की शहादत हुई और इमाम मौहम्मद तक़ी नवें इमाम के तौर पर फाएज़ हुए तो आपकी उम्र सिर्फ 8 साल थी। उस वक़्त शिया हल्कों में इमामत से ताल्लुक़ रखने वाली इल्मी और कलामी महाफिल में ये मसला संजीदगी के साथ ज़ेरे बहस आने लगा कि क्या कोई शख़्स बालिग़ होने से पहले मक़ामे इमामत पर फाएज़ हो सकता है? हालाँकि इमाम मौहम्मद तक़ी की कमसिनी में जानशीनी के बारे में इमाम अली रज़ा पहले से आगाह करते रहे थे और आप ने हज़रत ईसा की कमसिनी में नबी बनाए जाने की जानिब इशारा करते हुए फरमायाः ‘जब ईसा को नुबूवत अता की गई, तो उस वक़्त उनकी उम्र मेरे फरज़न्द से भी कम थी।’ बाद में सन 220 हिजरी में इमाम अली नक़ी और उनके बाद इमाम मेहदी की इमामत के बारे में भी इस मसले पर बहस जारी रही।
अईम्मा अहलेबैत की इमामत पर अक़ीदा रखने वाले शिया एक तरफ तो इमामत को उसके इलाही पहलू से देखते थे, उसीलिए इमाम की कमसिनी उनके अक़ीदे में कोई खलल नहीं डाल सकती थी, लेकिन दूसरी तरफ जो बात अहमियत की हामिल थी वो उस इलाही पहलू का अईम्मा के इल्मो दानिश के ज़रिए ज़हूर था। दरहक़ीक़त अईम्मा शियों के तमाम सवालात के जवाब देने वाले होते थे। इसीलिए शिया तमाम अईम्मा के बारे में इस उसूल को ध्यान में रखते थे और उनसे तरह तरह के सवाल किया करते थे। इमाम मौहम्मद तक़ी की कमसिनी के पेशेनज़र शियों की जानिब से आप की आज़माईश की ज़रूरत ने शिद्दत इख़्तेयार कर ली थी। इस बुनियाद पर तारीख़ में मिलता है कि दूर दूर से उल्मा आते थे और इल्मी मैदान में आपकी आज़माईश करते और उसके बाद इमामत क़ुबूल करते।
हर हर ज़माने में नूर का काम हिदायत और राह दिखाना रहा है। पहले ये काम पैग़म्बरों ने दुनिया के मुख़्तलिफ हिस्सों में किया। वक़्त पड़ने पर कुरआन को भी एक मुकम्मल हिदायत के तौर पर नाज़िल किया गया और 14 अहलेबैत ने इंसानी जिस्म में आकर दिखा दिया कि अल्लाह के छोटे से छोटे हुक्म पर कैसे अमल किया जा सकता है। इनकी हिदायत का सिलसिला जारी है और आसमान की बादशाही आने पर ही तकमील पाएगा।
मत्ती 18:23-35 में एक और तमसील के ज़रिए ईसा ने आसमान की बादशाही की ज़रूरत ब्यान की है। वो कहते हैं:
पस आसमान की बादशाही उस बादशाह की मानिंद है जिस ने अपने नौकरों से हिसाब लेना चाहा। और जब हिसाब लेने लगा तो उस के सामने एक क़र्ज़दार हाज़िर किया गया जिस पर उस के दस हज़ार तोड़े आते थे। मगर चूँकि उस के पास अदा करने को कुछ न था इस लिए उस के मालिक ने हुक्म दिया कि ये और इस की बीवी बच्चे और जो कुछ इस का है सब बेचा जाए और कर्ज़ वुसूल कर लिया जाए। पस नौकर ने गिर कर उसे सिजदा किया और कहा ऐ ख़ुदावंद मुझे मोहलत दे। मैं तेरा सारा कर्ज़ अदा करूँगा। उस नौकर के मालिक ने तरस खाकर उसे छोड़ दिया और उस का कर्ज़ बख़्श दिया। जब वो नौकर बाहर निकला तो उस के हमखि़दमतों में से एक उस को मिला जिस पर उस के सौ दीनार आते थे। उस ने उस को पकड़ कर उस का गला घूँटा और कहा जो मेरा आता है अदा कर दे। पस उसके हमखि़दमत ने उस के सामने गिरकर उस की मिन्नत की और कहा मुझे मोहलत दे। मैं तुझे अदा कर दूँगा। उसने न माना बल्कि जाकर उसे क़ैदखाने मेें डाल दिया कि जब तक कर्ज़ अदा न कर दे क़ैद रहे। पस उसके हमखि़दमत ये हाल देखकर बहुत ग़मग़ीन हुए और आकर अपने मालिक को सब कुछ जो हुआ था सुना दिया। इस पर उसके मालिक ने उस को पास बुलाकर उससे कहा ऐ शरीर नौकर! मैं ने वो सारा क़र्ज तुझे इसलिए बख़्श दिया कि तू ने मेरी मिन्नत की थी। क्या तुझे लाज़िम न था कि जैसा मैंने तुझ पर रहम किया तू भी अपने हमखि़दमत पर रहम करता? और उसके मालिक ने ख़फा होकर उस को जल्लादों के हवाले किया कि जब तक तमाम कर्ज़ अदा न कर दे क़ैद रहे। मेरा आसमानी बाप भी तुम्हारे साथ इसी तरह करेगा अगर तुम में से हर एक अपने भाई को दिल से माफ न करे।
देखिए, मोहलत के बावजूद आम इंसानों के जो फराएज़ थे वो अगर अदा न किए गए तो सज़ा तो मिलनी है। ये सज़ा आसमानी बाप देगा क्योंकि आसमानी बाप के मालिक अल्लाह का जो कर्ज़ था वो अदा नहीं किया गया।
एक और तमसील में ताकिस्तान का मालिक नूर को कहा है। बाग़बान आम इंसान हैं जिन के पास मालिक अपने पैग़म्बरों और नबियों को भेजता है ताकि हिसाब लें। लेकिन आम इंसानों ने किसी नबी को पीटा और किसी को क़त्ल कर दिया और किसी को संगसार किया। उन्होंने ईसा को भी क़त्ल कर दिया। जब ताकिस्तान का मालिक ‘नूर’ इंसान की शक्ल में नई दुनिया में यानी आखि़री दौर में आएगा तो वो बाग़बानों यानी इंसानों के साथ बुरी तरह पेश आएगा और उन्हें क़त्ल करेगा। ताकिस्तान के मालिक का आना बताता है कि अल्लाह की बात नहीं हो रही बल्कि उसके नूर की जो इंसान की शक्ल में आएगा। और फिर वो पत्थर जो रद्द किया जाता रहा वही इबादत का पत्थर बन जाएगा। ये अजीब ज़रूर है मगर ऐसा ख़ुदावंद की तरफ से होगा। देखिए तमसील मत्ती 21:33-45:
एक और तमसील सुनो। एक घर का मालिक था जिस ने ताकिस्तान लगाया और उसकी चारों तरफ अहाता घेरा और उस में हौज़ खोदा और बुर्ज बनाया और उसे बाग़बानों को ठेके पर देकर परदेस चला गया। और जब फल का मौसम क़रीब आया तो उसने अपने नौकरों को पकड़ कर किसी को पीटा और किसी को क़त्ल किया और किसी को संगसार किया। फिर उसने और नौकरों को भेजा जो पहलों से ज़्यादा थे और उन्होंने इनके साथ भी वही सुलूक किया। आखि़र उस ने अपने बेटे को उनके पास ये कह कर भेजा कि वो मेरे बेटे का तो लिहाज़ करेंगे। जब बाग़बानों ने बेटे को देखा तो आपस में क्हा यही वारिस है। आओ इसे क़त्ल करके इसकी मीरास पर क़ब्ज़ा कर लें। और उसे पकड़ कर ताकिस्तान से बाहर निकाला और क़त्ल कर दिया। पस जब ताकिस्तान का मालिक आएगा तो उन बाग़बानों के साथ क्या करेगा? उन्होंने उससे क्हा उन बदकारों को बुरी तरह हलाक करेगा और ताकिस्तान का ठेका दूसरे बाग़बानों को देगा जो मौसम पर उसको फल दें। यसूअ ने उनसे कहा क्या तुम ने किताबे मुक़द्दस में कभी नहीं पढ़ा कि
जिस पत्थर को मेमारों ने रद्द किया
वो ही कोने के सिरे का पत्थर हो गया
ये ख़ुदावंद की तरफ से हुआ
और हमारी नज़र में अजीब है?
इसलिए तुमसे कहता हूँ कि ख़ुदा की बादशाही तुम से ले ली जाएगी और उस क़ौम को जो उसके फल लाए दे दी जाएगी। और जो इस पत्थर पर गिरेगा टुकड़े टुकड़े हो जाएगा लेकिन जिस पर वो गिरेगा उसे पीस डालेगा।
आप देख चुके हैं ये इसलिए होगा कि आसमानी फरिश्ते उसकी हिफाज़त कर रहे होंगे।
नूर की आखि़री फर्द के आने के वक़्त को ब्यान करते हुए ईसा मत्ती 24:15-51 में कहते हैं:
पस जब तुम उस उजाड़ने वाली मकरूह चीज़ को जिस का ज़िक्र दानीयाल नबी की मारेफत हुआ मुकद्दस मक़ाम पर खड़ा हुआ देखो - पढ़ने वाला समझ ले - तो जो यहूदिया में हों वो पहाड़ों पर भाग जाएँ। जो कोठे पर हो वो अपने घर का असबाब लेने को नीचे न उतरे। जो खेत में हो वो अपना कपड़ा लेने को पीछे न लौटे। मगर अफसोस उन पर जो उन दिनों में हामिला हों और जो दूध पिलाती हों! पस दुआ करो कि तुम को जाड़ों में या सब्बत के दिन भागना न पड़े। क्योंकि उस वक़्त ऐसी बड़ी मुसीबत होगी कि दुनिया के शुरू से न अब तक हुई न कभी होगी। और अगर वो दिन घटाए न जाते तो कोई बशर न बचता। मगर बरगज़ीदों की ख़ातिर वो दिन घटाए जाएँगे। उस वक्त अगर कोई तुम से कहे कि देखो मसीह यहाँ है या वहाँ है तो यक़ीन न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे नबी उठ खड़े होंगे और ऐसे बड़े निशान और अजीब काम दिखाएँगे कि अगर मुमकिन हो तो बरगुज़ीदों को भी गुमराह कर लें। देखो मैं ने पहले ही तुम से कह दिया है। पस अगर वो तुम से कहें कि देखो वो ब्याबान में है तो बाहर न जाना या देखो वो कोठरियों में है तो यक़ीन न करना। क्योंकि जैसे बिजली पूरब से कौंद कर पश्चिम तक दिखाई देती है वैसे ही इब्ने आदम का आना होगा। जहाँ मुरदार है वहाँ ग़िद्ध जमा हो जाएँगे।
और फौरन उन दिनों की मुसीबत के बाद सूरज तारीक हो जाएगा और चाँद अपनी रौशनी न देगा और सितारे आसमान से गिरेंगे और आसमानों की कुव्वतें हिलाई जाएँगी। और उस वक़्त इब्ने आदम का निशान आसमान पर दिखाई देगा। और उस वक़्त ज़मीन की सब कुव्वतें छाती पीटेंगी और इब्ने आदम को बड़ी क़ुदरत और जलाल के साथ आसमान के बादलों पर आते देखेंगे। और वो नरसिंगे की बड़ी आवाज़ के साथ अपने फरिश्तों को भेजेगा और वो उसके बरगुज़ीदों को चारों तरफ से आसमान के इस किनारे से उस किनारे तक जमा करेंगे।
अब इंजीर के दरख़्त से एक तमसील सीखो। ज्यों ही उसकी डाली नरम होती और पत्ते निकलते हैं तुम जान लेते हो कि गर्मी नज़दीक है। इसी तरह जब तुम इन सब बातों को देखो तो जान लो कि वो नज़दीक बल्कि दरवाज़े पर है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक ये सब बातें न हो लें ये नस्ल हरगिज़ तमाम न होगी। आसमान और ज़मीन टल जाएँगे लेकिन मेरी बातें हरगिज़ न टलेंगी। लेकिन उस दिन और उस घड़ी की बाबत कोई नहीं जानता। न आसमान के फरिश्ते न बेटा मगर सिर्फ बाप। जैसा नूह के दिनों में हुआ वैसा ही इब्ने आदम के आने के वक़्त होगा। क्योंकि जिस तरह तूफान से पहले के दिनों में लोग खाते पीते और ब्याह शादी करते थे उस दिन तक कि नूह किश्ती में दाखिल हुआ। और जब तक तूफान आकर उन सब को बहा न ले गया उन को ख़बर न हुई उसी तरह इब्ने आदम का आना होगा। उस वक़्त दो आदमी खेत में होंगे एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो औरतें चक्की पीसती होंगी। एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी। पस जागते रहो क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा ख़ुदावंद किस दिन आएगा। लेकिन ये जान रखो कि अगर घर के मालिक को मालूम होता कि चोर रात के कौन से पहर आएगा तो जागता रहता और अपने घर में नक़ब न लगाने देता। इसलिए तुम भी तैयार रहो क्योंकि जिस घड़ी तुम को गुमान भी न होगा इब्ने आदम आ जाएगा। पस वो दयानतदार और अक़लमंद नौकर कौन सा है जिसे मालिक ने अपने नौकर चाकरों पर मुक़़ररर किया ताकि वक़्त पर उनको खाना दे। मुबारक है वो नौकर जिसे उसका मालिक आकर ऐसा ही करते पाए। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वो उसे अपने सारे माल का मुख़्तार कर देगा। लेकिन अगर वो ख़राब नौकर अपने दिल में ये कह कर कि मेरे मालिक के आने में देर है अपने हमखि़दमतों को मारना शुरू करे और शराबियों के साथ खाए पिए तो उस नौकर का मालिक ऐसे दिन कि वो उस की राह न देखता हो और ऐसी घड़ी कि वो न जानता हो आ मौजूद होगा। और ख़ूब कोड़े लगाकर उसको रियाकारों में शामिल करेगा। वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा।
इस तमसील से ज़ाहिर है इब्ने आदम यानी मेहदी के आने से पहले तौबा के दरवाज़े बन्द हो जाएँगे। अभी भी वक़्त है कि हम रास्तबाज़ी इख़्तेयार करें, कहीं ऐसा न हो कि जब मसीहा आए तो हमें सज़ा का हक़दार पाएँ।
मत्ती 25:1-46 भी ऐसा ही कुछ कह रही हैः
उस वक्त आसमान की बादशाही उन दस कुँनवारियों की मानिंद होगी जो अपनी मशअलें लेकर दूलहा के इस्तेक़बाल को निकलीं। उनमें पाँच बेवक़ूफ और पाँच अक़लमंद थीं। जो बेवक़ूफ थीं उन्होंने अपनी मशअलें तो ले लीं मगर तेल अपने साथ न लिया। मगर अक़लमंदों ने अपनी मशअलों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी ले लिया। और जब दूलहा ने देर लगाई तो सब ऊँघने लगीं और सो गईं। आधी रात को धूम मची कि देखो दूलहा आ गया। उस के इस्तेक़बाल को निकलो। उस वक़्त वो सब कुंवारियाँ उठ कर अपनी अपनी मशअल दुरूस्त करने लगीं। और बेवक़ूफों ने अकलमंदों से कहा कि अपने तेल में से कुछ हम को भी दे दो क्योंकि हमारी मशअलें बुझी जाती हैं। अक़लमंदों ने जवाब दिया कि शायद हमारे तुम्हारे दोनों के लिए काफी न हो। बेहतर ये है कि बेचने वालों के पास जाकर अपने वास्ते मोल ले लो। जब वो मोल लेने जा रही थीं तो दूलहा आ पहुँचा। और जो तैयार थीं वो उसके साथ शादी के जश्न में अन्दर चली गईं और दरवाज़ा बँद हो गया। फिर वो बाक़ी कुंवारियाँ भी आईं और कहने लगीं ऐ खुदावंद! ऐ खुदावंद! हमारे लिए दरवाज़ा खोल दे। उसने जवाब में क्हा मैं तुम से सच कहता हूँ कि मैं तुम को नहीं जानता। पस जागते रहो क्योंकि तुम न उस दिन को जानते हो न उस घड़ी को।
क्योंकि ये उस आदमी का सा हाल है जिस ने परदेस जाते वक़्त अपने घर के नौकरों को बुला कर अपना माल उनके सुपुर्द किया। और एक को पाँच तोड़े दिए। दूसरे को दो और तीसरे को एक यानी हर एक को उसकी लियाक़त के मुताबिक़ दिया और परदेस चला गया। जिस को पाँच तोड़े मिले थे उसने फौरन जाकर उनसे लेनदेन किया और पाँच तोड़े और पैदा कर लिए। इसी तरह जिसे दो मिले थे उसने भी दो और कमाए। मगर जिस को एक मिला था उसने जाकर ज़मीन खोदी और अपने मालिक का रूप्या छिपा दिया। बड़ी मुद्दत के बाद उन नौकरों का मालिक आया और उनसे हिसाब लेने लगा। जिस को पाँच तोड़े मिले थे वो पाँच तोड़े और लेकर आया और क्हा ऐ खुदावंद! तूने पाँच तोड़े मुझे सुपुर्द किए थे। देख मैं ने पाँच तोड़े और कमाए। उसके मालिक ने उससे कहा ऐ अच्छे और दयानतदार नौकर शाबाश! तू थोड़े में दयानतदार रहा। मैं तुझे बहुत चीज़ों का मुख्तार बनाऊँगा। अपने मालिक की खुशी में शरीक हो। और जिस को एक तोड़ा मिला था वो भी पास आकर कहने लगा ऐ खुदावंद मैं तुझे जानता था कि तू सख़्त आदमी है और जहाँ नहीं बोया वहाँ से काटता है और जहाँ नहीं बिखेरा वहाँ से जमा करता है। पस मैं डरा और जाकर तेरा तोड़ा जम़ीन में छिपा दिया। देख जो तेरा है वो मौजूद है। उसके मालिक ने जवाब में उससे क्हा ऐ शरीर और सुस्त नौकर! तू जानता था कि जहाँ मैं ने नहीं बोया वहाँ से काटता हूँ और जहाँ मैं ने नहीं बिखेरा वहाँ से जमा करता हूँ। पस तुझे लाज़िम था कि मेरा रूप्या साहूकार को देता तो मैं आकर अपना माल सूद समैत ले लेता। पस इससे वो तोड़ा ले लो और जिस के पास दस तोड़े हैं उसे दे दो। क्योंकि जिस किसी के पास है उसे दिया जाएगा और उसके पास ज़्यादा हो जाएगा मगर जिस के पास नहीं है उससे वो भी जो उस के पास है ले लिया जाएगा। और इस निकम्मे को बाहर अँधेरे में डाल दो। वहाँ रोना ओर दाँत पीसना होगा।
जब इब्ने आदम अपने जलाल में आएगा और सब फरिश्ते उसके साथ आएँगे तब वो अपने जलाल के तख़्त पर बैठेगा। और सब क़ौमें उसके सामने जमा की जाएँगी और वो एक को दूसरे से जुदा करेगा जैसे चरवाहा भेड़ों को बकरियों से जुदा करता है। और भेड़ों को अपने दाहिने और बकरियों को बाएँं खड़ा करेगा। उस वक्त बादशाह अपने दाहिनी तरफ वालों से कहेगा आओ मेरे बाप के मुबारक लोगो जो बादशाही बिनाए आलम तुम्हारे लिए तैयार की गई है उसे मीरास में लो। क्योंकि मैं भूखा था। तुम ने मुझे खाना खिलाया। मैं प्यासा था। तुम ने मुझे पानी पिलाया। मैं परदेसी था। तुम ने मुझे अपने घर में उतारा। नंगा था। तुम ने मुझे कपड़ा पहनाया। बीमार था। तुम ने मेरी ख़बर ली। क़ैद में था। तुम मेरे पास आए। तब रास्तबाज़ जवाब में उससे कहेंगे ऐ खुदावंद! हम ने कब तुझे भूखा देख कर खाना खिलाया या प्यासा देख कर पानी पिलाया? हम ने कब तुझे परदेसी देखकर घर में उतारा? या नंगा देखकर कपड़ा पहनाया? हम कब तुझे बीमार या कैद में देख कर तेरे पास आए? बादशाह जवाब में उनसे कहेगा मैं तुम से सच कहता हूँ चूँकि तुम ने मेरे इन सब से छोटे भाईयों में से किसी एक के साथ ये सुलूक किया इस लिए मेरे ही साथ किया। फिर वो बाईं तरफ वालों से कहेगा ऐ मलऊनों मेरे सामने से उस हमेशा की आग में चले जाओ जो इब्लीस और उसके फरिश्तों के लिए तैयार की गई है। क्योंकि मैं भूखा था। तुम ने मुझे खाना न खिलाया। प्यासा था। तुम ने मुझे पानी न पिलाया। परदेसी था। तुम ने मुझे घर में न उतारा। नंगा था। तुम ने मुझे कपड़ा न पहनाया। बीमार और कैद में था। तुम ने मेरी ख़बर न ली। तब वो भी जवाब में कहेंगे ऐ ख़ुदावंद! हम ने कब तुझे भूखा या प्यासा या परदेसी या नंगा या बीमार या कैद में देख कर तेरी खि़दमत न की? उस वक़्त वो उनसे जवाब में कहेगा मैं तुम से सच कहता हूँ चूँकि तुमने इन सब से छोटों में से किसी एक के साथ ये सुलूक न किया इस लिए मेरे साथ न किया। और ये हमेशा की सज़ा पाएँगे मगर रास्तबाज़ हमेशा की ज़िन्दगी।
यक़ीनन ये आने वाले वक़्त की बात हो रही है जब ख़ुदा का मसीहा आएगा और हमें ग़ाफिल और गुमराह पाएगा। हमेशा की ज़िन्दगी निजात या मोक्ष पाना है तो जल्दी करें। ऐसा न हो कि हम तैयार न हों यानी बाईं तरफ खड़े किए जाने वालों में हों और तौबा के दरवाज़े बन्द हो जाएँ।
अब तक आप मत्ती की इंजील से देख रहे थे कि कैसे ईसा सारी ज़िन्दगी आने वाले ज़माने की पेशिंगोई करते रहे। इंजील को तो सिर्फ ईसाई मानते हैं। आईए अब उन किताबों को देखें जिन को यहूदी और ईसाई दोनों तसलीम करते हैं। आप इस किताब में पहले क़ुरआन से देख चुके हैं कि अल्लाह ने आदम की खि़लक़त के वक़्त इब्लीस से बातचीत में कुछ बड़े लोगों की बात की जिन्हें इब्लीस भी पहचानता था। Old Testament में Genesis:3:2-5 से साबित है कि कुछ “divine beings: मौजूद थे जो अच्छे और बुरे में फर्क़ पहचानते थे। ये ऐसे divine beings थे कि serpent यानी इब्लीस भी उनकी मौजूदगी से वाक़िफ था और Eve यानी हव्वा उन जैसा बनने की ख़्वाहिश रखती थीं और यही ख़्वाहिश सबब बनी उनके बहक जाने का। ये भी ज़ाहिर है कि ये एक नहीं हैं बल्कि एक से ज़्यादा हैं। देखिए Genesis:3:2:
The woman said to the
serpent, “We may eat of the fruit from the trees of the orchard; 3:3 but
concerning the fruit of the tree that is in the middle of the orchard God said,
‘You must not eat from it, and you must not touch it, or else you will die.’”
3:4 The serpent said to the woman, “Surely you will not die, 3:5 for God knows
that when you eat from it your eyes will open and you will be like divine beings
who know good and evil.”
क्या कोई यहूदी या ईसाई बता सकता है कि ये Divine Beings (in plural) कौन हैं?
आईए अब देखें कैसे ज़ुलमत की शैतानी ताक़त ने सच को छिपाने के लिए इन किताबों में तबदीली करा दी। मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह ने इब्राहीम को ख़्वाब में दिखाया था कि वो अपने बेटे इस्माईल की कुरबानी कर रहे हैं। तीन दिन मुसलसल ये ख़्वाब देखने पर इब्राहीम समझ गए कि ये अल्लाह का हुक्म है और अपने बेटे इस्माईल को लेकर क़ुरबानगाह लाए। अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर उन्होंने इस्माईल के गले पर छुरी चलाना चाही लेकिन अल्लाह ने आखि़री लम्हे इस्माईल की जगह एक भेड़ को बदल दिया और आसमानी आवाज़ आई कि अल्लाह ने इस क़ुरबानी को किसी और अज़ीम क़ुरबानी से बदल दिया।
Old
Testament में ये क़ुरबानी इब्राहीम के बेटे इस्हाक़ के नाम से लिखी गई है। देखिए Genesis:22:1 से आगेः
22:1 Some time after
these things God tested Abraham. He said to him, “Abraham!” “Here I am!”
Abraham replied. 22:2 God said, “Take your son – your only son, whom you love,
Isaac – and go to the
22:3 Early in the
morning Abraham got up and saddled his donkey. He took two of his young
servants with him, along with his son Isaac. When he had cut the wood for the
burnt offering, he started out for the place God had spoken to him about.
22:4 On the third day
Abraham caught sight of the place in the distance. 22:5 So he said to his
servants, “You two stay here with the donkey while the boy and I go up there.
We will worship and then return to you.”
22:6 Abraham took the
wood for the burnt offering and put it on his son Isaac. Then he took the fire
and the knife in his hand, and the two of them walked on together. 22:7 Isaac
said to his father Abraham, “My father?” “What is it, my son?” he replied.
“Here is the fire and the wood,” Isaac said, “but where is the lamb for the
burnt offering?” 22:8 “God will provide for himself the lamb for the burnt
offering, my son,” Abraham replied. The two of them continued on together.
22:9 When they came to
the place God had told him about, Abraham built the altar there and arranged
the wood on it. Next he tied up his son Isaac and placed him on the altar on
top of the wood. 22:10 Then Abraham reached out his hand, took the knife, and
prepared to slaughter his son. 22:11 But the Lord’s angel called to him from
heaven, “Abraham! Abraham!” “Here I am!” he answered. 22:12 “Do not harm the
boy!” the angel said. “Do not do anything to him, for now I know that you fear
God because you did not withhold your son, your only son, from me.”
22:13 Abraham looked up
and saw behind him a ram caught in the bushes by its horns. So he went over and
got the ram and offered it up as a burnt offering instead of his son. 22:14 And
Abraham called the name of that place “The Lord provides.” It is said to this
day, “In the mountain of the Lord provision will be made.”
22:15 The Lord’s angel called to Abraham a second time from heaven 22:16 and said, “‘I solemnly swear by my own name,’ decrees the Lord, ‘that because you have done this and have not withheld your son, your only son, 22:17 I will indeed bless you, and I will greatly multiply your descendants so that they will be as countless as the stars in the sky or the grains of sand on the seashore. Your descendants will take possession of the strongholds of their enemies. 22:18 Because you have obeyed me, all the nations of the earth will pronounce blessings on one another using the name of your descendants.’”
22:19
Then Abraham returned to his servants, and they set out together for Beer
क़ुरआन कहता है कि इब्राहीम अपने बेटे इस्माईल को क़ुरबानी के लिए ले गए और Old Testament कहती है कि इब्राहीम अपने बेटे इस्हाक़ को क़ुरबानी के लिए ले गए। इस्माईल की दुआ भी क़ुरआन में मौजूद है जिस के मुताबिक़ उन्होंने अपनी नस्ल के बढ़ने और उसमें इमामत के बाक़ी रहने की दुआ की थी। Old Testament में इब्राहीम अपने बेटे इस्हाक़ के लिए दुआ करते नज़र आते हैं। ये फैसला कैसे होगा कि कौन सच्चा है और किस ने अपनी किताबों में अपनी फौक़ियत साबित करने के लिए तब्दीली की? ये इसलिए भी अहम है क्योंकि इस्माईल की नस्ल में मौहम्मद और बाक़ी अहलेबैत पैदा हुए और इस्हाक़ की नस्ल में याकूब, दाउद, लूत, यहया, अय्यूब, मूसा, युहन्ना और ईसा जैसे पैग़म्बर पैदा हुए जो यहूदीयों और ईसाईयों दोनों के लिए मुक़द्दस हैं और जिन्हें कुरआन ने भी उसी source से पैग़म्बर माना जिस से इब्राहीम, इस्माईल और मौहम्मद थे।
हम तीन दलीलों से साबित करेंगे कि ज़ुलमत की ताक़त, जिसे ईसा ने ‘शरीर’ क्हा है और इक़रार किया है कि ये ताक़त गुमराह करती रहती है, ने Old Testament में तब्दीली करा दी ताकि जब बाद के पैग़म्बर मौहम्मद हक़ीक़त को ब्यान करें तो उसमें और पहले की किताबों में फर्क़ हो और लोगों को सच के पहचानने में मुश्किल पेश आए।
आप से गुज़ारिश है कि Old Testament में इब्राहीम और इस्हाक़ की कुरबानी की दास्तान को दोबारा पढ़ें। बार बार ज़ोर देकर इस्हाक़ को “Only Son” कह कर मुख़ातिब किया जा रहा है जब्कि इसी किताब से साबित है कि इस्माईल बड़े भाई थे जिन्हें उनकी माँ हाजिरा के साथ ले जाकर इब्राहीम कहीं दूर छोड़ आए थे। फिर “Only Son” पर क्यों ज़ोर दिया जा रहा है?
आईए, अक़्ल से इसे समझें! इब्राहीम और हाजिरा के घर इस्माईल की विलादत के वक़्त इब्राहीम की उम्र 86 साल थी। ये Old Testament में Genesis से साबित है।
16:15 So Hagar gave
birth to Abram’s son, whom Abram named Ishmael. 16:16 (Now Abram was 86 years
old when Hagar gave birth to Ishmael.)
इब्राहीम जब 99 साल के थे उस वक़्त ख़त्ने का हुक्म आया। ळमदमेपे 17:24 बताती है कि उस वक़्त इस्माईल की उम्र 13 साल थी। उसी साल फरिश्तों ने इस्हाक़ की पैदाईश की ख़ुशख़बरी दी और सारा से क्हा कि अगले साल वो जब आएँगे तो सारा के घर बेटा पैदा हो चुका होगा। इस से ज़ाहिर है कि इस्हाक़ के पैदा होने के वक़्त इस्माईल 14 साल के थे। चूँकि ये मुमकिन नहीं था कि पूरी Old Testament
बदली जाए इसलिए सिर्फ इस्माईल के नाम की जगह इस्हाक़ बदल दिया गया और बार बार आने वाले लफ्ज़ “only son” को नहीं बदला गया। ज़ाहिर है ये क़ुरबानी उस वक़्त पेश की गई जब इब्राहीम के एक ही बेटा पैदा हुआ था और इसलिए “only son” कह कर मुख़ातिब किया गया।
अब दूसरी दलील देखें। बीयर शीबा वो जगह थी जहाँ इब्राहीम ने हाजिरा और उनके बेटे इस्माईल को छोड़ा था। ये बात Genesis:21:14-16 से साबित है कि बीयर शीबा का वीराना वो जगह थी जहाँ हाजिरा अपने छोटे से बेटे के साथ अकेली छोड़ी गई थीं और जहाँ पर बच्चे के पैरों के पास से पानी का चश्मा बरामद हुआ था। इससे ज़ाहिर होता है कि बीयर शीबा वो वीरान जगह थी जिसको बाद में मक्का क्हा गया। देखिएः
21:14 Early in the
morning Abraham took some food and a skin of water and gave them to Hagar. He
put them on her shoulders, gave her the child, and sent her away. So she went
wandering aimlessly through the wilderness of Beer
Genesis कुरबानी की रूदाद बताते हुए कहती है कि जब इब्राहीम ने क़ुरबानी का इरादा किया तो अपने दो नौकरों और इस्हाक़ को ले कर चले और तीन दिन की मसाफत तय करके वहाँ पहुँचे जिस जगह पर ख़ुदा ने कुरबानी करने को कहा था। पहाड़ी के नीचे अपने नौकरों को छोड़ कर इब्राहीम और इस्हाक़ पहाड़ पर गए। फिर जो हुआ वो आपने पढ़ा और उसके बाद लिखा है कि इब्राहीम पहाड़ से नीचे उतर आए और फिर वो और उनके नौकर बीयर शीबा के लिए चल दिए जहाँ इब्राहीम रूके हुए थे।
अगर इस्हाक़ का तज़किरा होता तो इब्राहीम उन्हें लेकर बीयर शीबा न लौटते। इस्हाक़ तो फिलिस्तीन या आज के इस्राईल में कहीं अपनी माँ सारा के साथ रहते थे जहाँ से किसी भी हाल में 3 दिन में बीयर शीबा नहीं पहुँचा जा सकता था। बीयर शीबा में तो इस्माईल रहते थे। वापस बीयर शीबा लौटने के तज़किरे से ज़ाहिर है कि इब्राहीम बीयर शीबा से ही इस्माईल को ले कर गए थे और इस्माईल और दोनों नौकरों के साथ वहीं लौट आए। ज़ुलमत की ताक़त ने इस्माईल के नाम से इस्हाक़ का नाम बदल दिया ताकि इसके रास्ते हम हक़ तक न पहुँच सकें। लेकिन क्या किया जाए अल्लाह की कुदरत का कि बीयर शीबा का ज़िक्र न हटा पाई।
तीसरी दलील भी अक़्ल से साबित है! ये वाक़िया बीयर शीबा के पास ही और इस्माईल के ही साथ पेश आया इससे भी साबित है कि इसकी याद इस्हाक़ की नस्ल में नहीं बल्कि अरब में इस्माईल की नस्ल में बाक़ी रह गई। मौहम्मद के आने से पहले भी अरब क़बीलों में इस्माईल की क़ुरबानी की याद में क़ुरबानी पेश करने की रस्म आम थी जिसको मौहम्मद के बाद भी जारी रखा गया।
इससे साबित है कि Old Testament को कुछ राज़ छिपाने की ख़ातिर बदला गया और जो दुआ इस्हाक़ के हक़ में लिखी है वो दरअस्ल इस्माईल के लिए की गई थी। तबदीली क्या छिपाने के लिए की गई और क्यों की गई ये भी साफ ज़ाहिर है। अफसोस की बात ये है कि इब्राहीम, इस्माईल और इस्हाक़ तीनों एक ही source से वाबस्ता पैग़म्बर थे जो एक ही तालीम ले कर आए थे। लेकिन उनके मानने वालों ने अपने मफाद की ख़ातिर उनकी तालीमात में तब्दीली कर दी।
बनरबास की इंजील में अहमद और मौहम्मद दोनों नाम मौजूद हैं और उनके आने की पेशिंगोई करते हुए क्हा गया है कि तुम्हारा फर्ज़ है कि उनके आने पर उन्हें ढँूढो और उनके रास्ते पर चलो। अफसोस ये इंजील New Testament
में शामिल नहीं की गई। ये एैन वैसे ही है जैसे वेदों में ये पेशिंगोईयाँ मौजूद हैं। किताब “One God, One Religion” में Rig Veda से ब्यान किया गया है कि जब सूरज डूब जाए और फिर निकल कर आ जाए तो वो वक़्त पूजा पाठ में डूबने का नहीं होगा बल्कि आसपास घूम कर मालूम करना कि उसकी वजह क्या है। ज़ाहिर है ये मौहम्मद और अली के सूरज पलटाने का तज़किरा था।
अब आइए, आखि़री दलील देखें! The Apocryphal New Testament [published
by Chase, Nichols & Hills (1860)] bZlk, ईसा और उनके हवारियों से मंसूब उन माख़ज़ को यकजा करता है जिनको पादरियों ने New Testament में जगह नहीं दी। इस में बेशुमार ऐसे सबूत हैं जो नई रौशनी दे सकते है, उन में से एक ये हैः ये किताब कहती है कि Oxford और Cambridge से छपे ‘authorized versions’ में एक जुमला था जो अब मौजूद नहीं है। “For there are three that bear record in heaven, the
Father, the Word and the Holy Ghost; and these three are one.” इसके मतलब ये हुए कि बाप यानी खुदा, लफ्ज़ यानी उम्मुल किताब और रूह यानी परमात्मा जो अल्लाह का चेहरा भी है, नूरे ज़ाती और Manifest Self of God भी है। अफसोस कि जब कुरआन ने रूह और फरिश्तों के एक सफ में खड़े होने का तज़किरा किया तो मुफस्सेरीन ने क्हा कि ये जिबरील की बात हो रही है। क्या जिबरील फरिश्ता नहीं थे; फिर क्यों रूह से मुराद जिबरील ली गई? रूह और Holy Ghost से मुराद नूरे ज़ाती यानी परमात्मा ही है जिसे अब तक किसी ने नहीं पहचाना।
क़ादिरे मुतलक़ ज़ाते यक्ता अल्लाह से दुआ है कि वो हमें उसके Manifest Self को समझने की तौफीक़ दे, नूर और ज़ुलमत का फर्क़ जान पाने की अक़ल दे और Spirit of God के अरब के रेगिस्तान में अवतरित होने और नूरे ज़ाती की हुज्जत के तौर पर रास्ता दिखाने और हिदायत पहुँचाने का इल्म दे, तौबा के दरवाज़े बन्द हो जाने से पहले रास्तबाज़ बनने के इरादे को पूरा कर और रूह को पाकीज़गी के आलातरीन मक़ाम पर पहुँचा कर निजात हासिल कर पाने की क़ुव्वत दे ताकि आने वाली आसमान की बादशाही में हम सिराते मुस्तक़ीम की राह पर गामज़न रहने के सबब बाइज्ज़त मक़ाम और हमेशा की ज़िन्दगी पा सकें।
Part 5 of 5
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