आसमान की बादशाही - Part 2
मानना पड़ेगा क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदाए यकता ने जब चाहा कि वो पहचाना जाए तो उसने क्हा ‘कुन’ और नूरे ज़ाती या अल्लाह का चेहरा वजूद में आया। इस रूहे अफज़ल को नूरे ज़ाती या परमात्मा या Manifest Self of the Absolute God भी कहा जाता है। इस नूरे ज़ाती की अर्श पर कुर्सी है। इसने ख़ल्क़ होते ही क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदाए यकता की इबादत शूरू कर दी। चूँकि इसके ज़रिए अल्लाह ख़ुद अपने आप को पहचनवाना चाहता था इसलिए अल्लाह ने इसे बेइन्तेहा ताक़त बख़्शी। नूरे ज़ाती ने खुद तो अल्लाह की इबादत की ही मगर इस ख़्वाहिश के तहत कि अल्लाह की इबादत करने वालों में इज़ाफा हो उसने मज़ीद खि़लक़त को अंजाम दिया। पेंगल उपनिषद और ब्रहद अराणयका उपनिषद में मौजूद खि़लक़त की रूदाद से ज़ाहिर है कि सब से पहले एक नूर ख़ल्क़ हुआ जो दो में बंट गया जो पहले ख़ल्क़ हुए नूर जैसे थे। इन दो नूर में से एक का टुकड़ा या हिस्सा जिसे अदिती कहा गया दूसरे नूर के साथ जुड़ कर एक हो गए। इसे Golden Germ क्हा गया है और राधाकृष्ण कहते हैं यहाँ पर अज़दवाजी रिश्ते की बात हो रही है। इस अदिती को देवताओं की माँ कह कर पुकारा गया है। अदिती का ज़िक्र वेदों में भरा पड़ा है और ये आदित्य की बीवी है। आदित्य के मायनी सूरज हैं और किताबों में है कि कुल 12 आदित्य हैं। स्वेतास्वतर उपनिषद ने शुरूआती तख़लीक़ का ज़िक्र करते हुए हिरण्यगर्भ यानी Golden Germ की बात करते हुए वाज़ेह तौर पर ब्यान किया है कि रूद्र यानी शिव वो देवता है जो तमाम देवताओं का बाप है और इसे हर चीज़ का हाकिम बताया गया है। शिव ही आदित्य हैं। देखिए III.4 Svetasvatara Upanishad:
He who is the source and origin of devatas (powers), the ruler of all, Rudra, the great seer, who of old gave birth to the golden germ. (Hiranya-garbha), may he endow us with clear understanding.
अब इसे अहलेबैत यानी नूर से मिलाईए। मौहम्मद कहते हैं कि ‘सब से पहले मेरा नूर खल्क़ हुआ’। दूसरी जगह कहते हैं कि ‘अली और मैं एक ही नूर के दो हिस्से हैं’। ज़िन्दगी में कई बार कहते सुनाई देते हैं कि ‘फातमा मेरा टुकड़ा या हिस्सा है’। यही टुकड़ा अदिती था जो एक नूर से दो हुए नूरे अली से मिला तो नूरे हसन और नूरे हुसैन पैदा हुआ और Golden Chain की शुरूआत हुई। उपनिषद कह रहा है कि सब उस एक पहले जैसे थे और मौहम्मद कहते हैं कि ‘हम में से पहला मौहम्मद है, आखि़री मौहम्मद है, बीच वाला मौहम्मद है, सब मौहम्मद हैं’। यानी सब उस पहले एक जैसे हैं। मशहूर आलिम ताहिरूल क़ादिरी ने अपनी किताब ‘अस-सैफुलजली अला मुनकिरे विलायते अली’ में अहलेबैत का ज़िक्र करते हुए ‘सिलसलतुल ज़हद’ यानी Golden Germ का तज़किरा किया है जब्कि उपनिषद इसको Golden Germ कहता है।
उपनिषद ने खिलक़त के इस प्लान को बहुत ही पाक यानी sanctified कहा है और इस खि़लक़त के प्लान का इल्म होने को निजात यानी salvation से जोड़ा है। कुरआन अहलेबैत की पाकीज़गी की गवाही दे रहा है जब कहता है कि ‘अल्लाह का वादा है कि अहलेबैत को पाक रखे जैसा पाक रखने का तक़ाज़ा है’ और मौहम्मद की हदीस कह रही है कि अहलेबैत की किश्ती पर सवार हो कर ही निजात यानी salvation है।
उपनिषद से मज़ीद साबित है कि इस Golden Germ से दो नूर पैदा हुए और ये पाँच हो गए। एैन यही रिश्ते मौहम्मद, अली, फातिमा, हसन और हुसैन के बीच हैं। ब्रहदअराण्यका उपनिषद दो क़िस्म की कुरबानियों की बात करता दिखाई देता है तो हसन और हुसैन भी दो क़िस्म से शहीद किए जाते हैं। किताब “One God, One Religion” में साबित किया गया है कि अश्विन दरअस्ल हसनैन हैं। हसन और हुसैन को एक साथ हसनैन कह कर मुख़ातिब किया जाता है। चूँकि इन्हें अश्विन कहा गया इस हक़ीक़त को न समझ सकने की बिना पर राधाकृष्ण ने इन दो तरह की कुरबानियों को horse sacrifice कहा।
उपनिषद कहते हैं कि पाँच नूर की खि़ल्क़त के बाद एक नूर से यके बाद दीगरे दूसरे नूर ख़ल्क़ हुए जिसके बाद ख़ुदा ने इनको कायनात के 14 खि़त्तों का हाकिम बना दिया। इस जुमले से ज़ाहिर है कि कुल 14 मनू या देवता बने। एक जगह लिखा है कि ये हमारे आज़ाअ के हाकिम हैं। हिदायत और रास्ता दिखाने का काम इनका है; तमाम कायनात को चलाने की ज़िम्मेदारी भी इनकी है।
एैन यही अहलेबैत के यहाँ भी देखने को मिलता है। पाँच पंजेतन मौहम्मद, अली, फातमा, हसन और हुसैन में से पाँचवें हुसैन की औलाद में 9 और नूर पैदा हुए तो ये 14 अहलेबैत हुए। दूसरे लफज़ांे में मौहम्मद, उनकी बेटी फातमा और 12 इमाम 14 अहलेबैत यानी 14 नूर बनते हैं। इन बारह इमामों के सरदार अली हैं जिनकी फातिमा से शादी से हसन और हुसैन पैदा हुए। फातिमा ही माँ है, अली सब इमामों के बाप हैं।
आप वेद और उपनिषद पढ़ते जाईए। 5 या 5 और 9 यानी 14, या 7 और 7 यानी 14 या 12 की ही बात हो रही है। 12 आदित्य के अलावा हर लिस्ट देखिए तो उसमें एक देवी यानी female character जिसको कहीं अदिति कहीं किसी और नाम से मुख़ातिब किया गया है आपको ज़रूर मिलेगी। मत्स्य पुराण ने 100 से ज़्यादा नाम गिनाय हैं जिन से ये देवी हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ हिस्सों में जानी जाती थी। अफसोस कि हिन्दुओं ने इन सब को अलग अलग देवियों के तौर पर मानना शुरू कर दिया वैसे ही जैसे 14 मनू को उनके सैकड़ों नामों की वजह से अनगिनत देवता माना। यही देवी दरअस्ल नूरे फातमा है जिसके नूरे अली से मेल पर ‘सिलसलातुल ज़हद’ क़ायम हुआ और बाक़ी इमाम वजूद में आए। किताब “One God, One Religion” और “God Rediscovered” से साबित है इन 14 मनू या अहलेबैत का रास्ता ही निजात का रास्ता है। ये बतौर नूर तमाम इंसानों की हिदायत करते हैं
और ज़रूरत पड़ने पर ये अरब की सरज़मीन पर, जिसका रिग वेद में भी ज़िक्र है, इंसान की शक्ल में पैदा हुए ताकि सीधे रास्ते पर अमल करके भी दिखा सकें।
अब ज़रा दोबारा देखिएः अल्लाह या ईश्वर एक है। नूरे ज़ाती जिसे कुरआन में अल्लाह का चेहरा क्हा गया है परमात्मा या Manifest Self है। पाँच तन पंजेतन कहलाए तो पाँच से ही सारी कायनात की शुरूआत है। जो अग्नि, वायू वग़ैरा को आग और हवा समझते हैं वो बतलाएँ कि अग्नि देव और वायू देव कौन हैं? आदित्य 12 हैं तो इमाम भी 12 हैं। अहलेबैत 14 हैं तो मनू 14 हैं। उपनिषद के हिसाब से 7 नाम हैं जिनकी बदौलत सारी ज़िन्दगी है तो इन 14 अहलेबैत के भी 7 ही नाम हैं। इनके आपस में रिश्ते भी एक ही हैं।
क्या पंजेतन पाँच, इमाम बारह और 14 नूर जो दरहक़ीक़त चैदह अहलेबैत हैं का ज़िक्र हम रोज़ नहीं करते। ब्रहदअराण्यका उपनिषद 1:5:13 साफ कहता है कि ये सब एक जैसे हैं:
These are all alike,
all endless. Verily, he who meditates on them as finite, wins a finite world.
But he who meditates on them as infinite wins an infinite world.
और चैदह अहलेबैत का ज़िक्र करते हुए मौहम्मद ने भी वाज़ेह किया कि सब एक जैसे हैंः
हम में से पहला मौहम्मद है, आखि़री मौहम्मद है, बीच का मौहम्मद है, सब मौहम्मद हैं।
यही इमाम रज़ा का मक़सद था जब वो अपने जद और वो रसूलल्लाह और वो अल्लाह से रिवायत करते हैं:
कलमे ला इलाहा इल्लललाह मेरा क़िला है, तो जो मेरे क़िले में दाखि़ल हो गया, वो मेरे अज़ाब से महफूज़ हो गया। फिर इमाम ने फरमायाः इस की कुछ शराएत हैं और मैं उन शराएत में शामिल हूँ।
बिहारूल अनवार में 14 अहलेबैत से ऐसी हदीसें मौजूद हैं जिन के मुताबिक़ ये अहलेबैत ने तय किया कि नमाज़ के अरकान कितने होने चाहिए, उस में क्या शामिल होना चाहिए, वग़ैरा। हज़रत अली का बसरा का ख़ुतबा अहम है जिस को पढ़ने से ऐसा लगता है कि तमाम कायनात में जो हो रहा है वो उनकी ही बदौलत है।
उपनिषद ने खि़लक़त के इस इल्म को ख़ुदाई राज़ के तौर पर ब्यान किया है; इस को जानने वाला ही निजात हासिल कर सकता है। गीता ने भी इस राज़ को ब्यान करने का बहुत सवाब बताया है एैन वैसे ही जैसे हदीसे किसा जो इन अहलेबैत को पहचनवा रही है इस हदीस को दूसरों तक पहुँचाने का सवाब बताती है। इनको पाक और कायनात की तमाम खि़लक़त का सबब बताया गया है; गीता ने क्हा है कि जो शख़्स इन देवताओं को खाना नज़र किए बिना खाए वो चोर है क्योंकि तमाम रिज़्क़ इनकी बदौलत है। ये बुराई से दूर हैं, मौत और ग़म इनको छू नहीं सकता, यही हर शय के हाकिम और निजातदहिन्दा हैं, यही पुले सिरात – determining
bridge (pul-e-siraat in arabic) - हैं, यही रूह हैं, यही हर शय में दाखिल हैं।
ब्रहदअराणयका उपनिषद कहता है कि मौत उस तक नहीं पहुँच सकती जो इन से मुनसलिक हो जाए।:
He
overcomes repeated death, death cannot get hold of him, death becomes his body,
and he becomes one with these divinities.
ये पढ़कर जो मुसलमान बहुत खुश हो रहे हैं उनको बता दें कि क़ुरआन की हक़ीक़ी तफसीर उस वक़्त तक समझ नहीं आ सकती जब तक हम वेद और गीता को न पढ़ें। ठीक उसी तरह जैसे वेद क्या कह रहे हैं वो उस वक़्त तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन अहलेबैत की ज़िन्दगी को न देखें। कुरआन से मुसलमान कभी भी आवागमन यानी rebirth के हक़ीक़ी तसव्वुर को नहीं समझ सकते। हिन्दू किताबों में जो आवागमन का तसव्वुर पेश किया गया है वो एक हक़ीक़त है लेकिन इस दुनिया में rebirth उसके लिए नहीं है जिस ने इन अहलेबैत की अस्ल हक़ीक़त को पहचान लिया।
क़ुरआन से आज तक मुसलमान नूरे ज़ाती को भी नहीं पहचान पाए हालँाकि कुरआन में कई जगह अल्लाह के चेहरे का ज़िक्र है। ये तक कहा गया है कि क़यामत के रोज़ हर शय हलाक हो जाएगी सिवाए अल्लाह के चेहरे के। किताब “God Rediscovered” और “One God, One Religion” में क़ुरआन में आयतों के बदलते लहजे से भी साबित किया गया है कि यही नूरे ज़ाती तमाम हिदायत का ज़िम्मेदार है, यहाँ तक कि क़ुरआन और दूसरी आसमानी किताबें भी इसी नूरे ज़ाती ने अपने भेजे रसूलों पर उतारीं। मक़सद ये था कि नूरे ज़ाती चाहता है कि उसके ख़ालिक़ अल्लाह की इबादत करने वालों मे इज़ाफा हो। यही हमारी खि़लक़त का मक़सद है।
आप गीता में बातचीत के लहजे पर ग़ौर करें। कृष्ण के मूँह से बात हो रही है। नूरे ज़ाती यानी Manifest Self कृष्ण के मूँह से ऐसे बात कर रहा है जैसे तमाम कायनात का चलाने वाला और तमाम रिज़्क़ का देने वाला नूरे ज़ाती ही है। मौत और ज़िन्दगी भी अल्लाह ने उसके ही हवाले कर रखी है। गीता में नूरे ज़ाती ये सब बात मुतकल्लिम के तौर पर कर रहा है। यानी मैं तुम्हें रिज़्क़ देता हूँ, मैं मारता और जिलाता हूँ, मैं कहां पैदा करना है तय करता हूँ, मैं हिदायत देता हूँ लेकिन मुतकल्लिम के तौर पर बात करते हुए जब क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा का ज़िक्र आया तो उसे ग़ायब के सीग़े से मुख़ातिब किया गया, यानी कहा जाता है कि ‘वह’ वो है जिसकी इबादत करनी चाहिए।
क़ुरआन का लहजा भी यही है। अफसोस कि आज तक हम अल्लाह के इस प्लान को समझ नहीं सके। पूरे कुरआन को पढ़ते जाईए। जहाँ जहाँ भी पैग़म्बर भेजने, हिदायत पहुँचाने, रास्ता दिखाने, अज़ाब और सज़ा देने की बात हो रही है तो मुतकल्लिम का सीग़ा इस्तेमाल हुआ है कि ‘हम’ ऐसा करते हैं। लेकिन जहाँ जहाँ भी इबादत करने और सिर झुकाने की बात हो रही है ग़ायब का सीग़ा इस्तेमाल हुआ है। क्हा जाता है अल्लाह वो है जो सब पर हाकिम है, उसी की इबादत करो, उसी के आगे सिर झुकाओ। अल्लाह के इस प्लान को समझ न पाने की वजह से कुरआन के जानने वाले कहने लगे कि अपनी बात पर ज़ोर देने के लिए ये तरकीब इस्तेमाल की गई है। ज़रा सोचिए, क्या कोई ‘हम’ से बात बात करते करते महज़ अपनी बात पर जोर देने के लिए ‘वो’ और ‘उस’ से बात करने लगेगा? क्या माज़अल्लाह खुदा भूल गया कि उसने कहीं पर ‘हम’ से बात की और कहीं पर ‘उस’ और ‘वो’ से। ऐसा भी नहीं है कि ये तरकीब अलग अलग जगहों पर इस्तेमाल की गई हो। ‘हम’ और ‘उस’ और ‘वो’ में मुस्तक़िल तब्दीली होती रहती है, यहाँ तक कि एक ही आयत में कभी ‘हम’ क्हा जाता है और कभी ‘वो’ और ‘उस’। ऐसी भी आयतें हैं कि जिस में कहा जाता है उस अल्लाह की इबादत करो और कहना मानो और अगर नहीं मानोगे तो हम तुम्हें सज़ा देंगे। क्हा जाता है कि हम ने पैग़म्बर भेजे ताकि तुम उस ख़ुदा की इबादत करो जो क़ादिरे मुतलक़ है। क्हा जाता है कि हम रास्ता दिखाते हैं और जो उस अल्लाह के आगे सिर नहीं झुकाते उन पर हम अज़ाब भेजते हैं। कुरआन ने अल्लाह के लिए कहा है कि क़यामत के रोज़ यक़ीनन वो जजों का जज होगा। साफ ज़ाहिर है कि जज कोई दूसरे होंगे। ऐसी बेशुमार आयतों के ज़रिए किताब “Muslims & The Straight Path” में साबित किया गया है कि क़ुरआन और दूसरी इलाही किताबों को भेजने वाला, हिदायत देने वाला, रिज़्क़ देने वाला, सज़ा देने वाला नूरे ज़ाती है जब्कि तमाम इबादतों और कामों का मरकज़ सिर्फ क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा है जिसने नूरे ज़ाती को ख़ल्क़ किया।
नूरे ज़ाती ने जो नूरे मौहम्मदी ख़ल्क़ किया था उसके चैदह टुकड़े हुए। ये दरअसल टुकड़े इस लिए नहीं कहे जा सकते क्योंकि ये सब के सब एक जैसे थे और उस पहले जैसे थे जिस से ये टुकड़े वुजूद में आए थे। यह 14 नूरानी शख़्सियतें पंजेतन पाक और हुसैन की नस्ल में नौ बेटों के तौर पर दुनिया में आए। इस अम्र की पेशिंगोई न सिर्फ मौहम्मद ने अपनी ज़िन्दगी में कर दी थी बल्कि साबिक़ के पैग़म्बरों ने इसका ज़िक्र किया था। चैदह में से आखि़री को मुसलमान मेहदी के लक़ब से जानते हैं जो मौहम्मद की हदीसों के मुताबिक़ आखि़री दौर में ज़ाहिर होगा और हर मज़हब के मानने वाले उसे अपनी ही किताबों से पहचान कर अपना मसीहा तसलीम कर लेगें।
नूरे ज़ाती को Manifest Self या परमात्मा कहने से ज़ाहिर है कि कोई चमकदार शय होने के साथ साथ ये नूरे ज़ाती कोई ख़ास रूह या आत्मा भी है। हमारी रूहें इसी नूरे ज़ाती के ज़रिए खल्क़ हुई हैं। ये 14 नूर भी जिन को नूरे ज़ाती ने तमाम काएनात के ख़ल्क़ होने से पहले ख़ल्क़ किया था ग़ालिबन रूह की शक्ल में हैं। यही वजह है कि जब इन 14 नूर को इंसान की शक्ल में दुनिया में पैदा होना था उसकी पेशिंगोई करते हुए ईसा ने कहा कि जब spirit of God यानी अल्लाह की रूह ज़मीन पर आएगी। 14 अहलेबैत में से आखि़री यानी मौहम्मद मेहदी को इसी रिश्ते की वजह से बक़ियातुल्लाह कहा गया। आने वाले वक़्त में जब बहुतेरे लोग अल्लाह के creation plan को जानते हुए उसकी इबादत की तरफ मायल हो जाएँगे उस वक्त़ का ज़िक्र करते हुए ईसा ने आसमान की बादशाही से ताबीर किया है। अपनी सारी उम्र ईसा सिर्फ इसी बादशाही की ख़बर देते रहे।
आसमान की बादशाही को समझने के लिए हमें अपनी अक़्ल के साथ वापिस आदम की खि़लक़त के ज़िक्र की तरफ पलटना होगा! आदम की खि़ल्क़त के वक़्त नूर की मौजूदगी जिनको नामों से आदम ने पहचाना बताती है कि इब्लीस को इन नूरानी हस्तियों से कोई शिकायत नहीं थी बल्कि शिकवा था तो वो आदम की ज़ात से था। ज़ाहिर है उस वक़्त नूरानी शख़्सियतें आदम से जुदा थीं और आदम को सजदे का हुक्म दिया जा रहा था। ऐसे में ख़ुदा का इस आदम के बारे में ये कहना कि ‘जो मैं जानता हँू वो तुम नहीं जानते’ बताता है कि ख़ुदा को इस आदम और उसकी औलाद से ख़ास उम्मीद है। अगर ये आदम नूरानी शख़्सियतों से उम्मीद करे जैसा कि ईसाई इंतेज़ार में हैं कि ईसा आकर दुनिया से जुल्म और बेदीनी को ख़त्म कर देंगे या मुसलमान मेहदी के इंतेज़ार में हैं कि वो आकर सब तरफ सही रास्ते को फैला देंगे तो ये किस हद तक सही है? ख़ुदा को तो इस इंसान से उम्मीदें हैं न कि नूर की ताक़त से जो पहले से ही पाकीज़गी की इंतेहाई मंज़िलों पर फाएज़ है और जिसका काम ही हिदायत पहुँचाना है। ये इंसान अगर हक़ और इंसाफ की तरफ आने की तमाम कोशिशें छोड़ दे इसलिए कि मेहदी या ईसा आ कर अपनी नूरानी ताक़त से सब तरफ हक़ और इंसाफ फैला देंगे तो क्या ये ख़ुदा के भरोसे के मुताबिक़ हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं कि ख़ुदा इंतेज़ार में है कि इंसान अपनी काविश और कोशिशों से सीधे रास्ते को पा ले और उस पर आ जाए तब उस सीधे रास्ते का बादशाह ज़ाहिर हो और हम बेगाने रास्तों पर गुमराही में पड़े सीधे रास्ते के बादशाह को ढूँढ रहे हैं जो जब ही मिलेगा जब कम से कम कुछ इंसान सच्चे दिल से उस
सीधे रास्ते को पहचान लें और उस पर चलना शुरू कर दें। जो मुसलमान ये समझते हैं कि मेहदी आकर सब तरफ दीन का परचम बुलंद कर देंगे, ग़ल्ती पर हैं। ये बात मुसलमानों से कहीं ज़्यादा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं में रासिख़ है कि आखि़री ज़माने में कोई मसीहा आएगा जो उनके मज़हब को सब पर ग़ालिब कर देगा। तो क्या बाक़ी सब झूठे हैं और हम सच्चे? मैं आपको बता दूँ कि सब सच्चे हैं लेकिन सब बहके हुए। जिस तरह मौहम्मद तमाम आलमीन का रसूल था उसी तरह आखि़री मसीहा तमाम आलमीन के इमाम के तौर पर आएगा। ये तब होगा जब तमाम मज़ाहिब अपनी अपनी आसमानी किताबों से उस एक सीधे रास्ते को ऐसे पहचान लेंगे जैसे हम सूरज को देखते और पहचानते हैं। तमाम मज़हबों के मानने वालों में से कुछ अफराद जब अपनी अपनी किताबों से पहचान कर सीधे रास्ते पर आ जाएँगे तो उस
सीधे रास्ते को मुनव्वर करने वाला नूर ज़ाहिर हो जाएगा।
किसी की मंज़िल दिल्ली से कोलकता है और वो जीटी रोड के रास्ते अपनी मंज़िल के लिए चला है। क्या मुम्बई या चैन्नई में बैठा इंसान उस शख़्स को पा सकता है? हम भूल जाते हैं कि इमामे ज़माना सिराते मुस्तक़ीम पर चलकर ही मिलेंगे। शैतानी वस्वसों में फंसा इंसान जब गुमराही की हालत में पुकारता है कि ‘या इमामे ज़माना सामने आएँ’, ‘या इमामे ज़माना ज़हूर करें’ तो वो भूल जाता है कि इमाम तक पहुँचना है तो उसे सिराते मुस्तक़ीम को तलाशना और उस राह पर आना होगा। इमाम ग़ायब नहीं हैं बल्कि यहीं मौजूद हैं। उनको पाने के लिए हम को उस रास्ते पर आना होगा जिस पर वो मौजूद हैं। यही बात ईसाईयों पर भी लागू होती है जो मसीह के आने के इंतेज़ार में हैं जिस के आने पर आसमान की बादशाही क़ायम होगी और यहूदियों पर भी जो मैसियैश का इंतेज़ार बेसब्री से कर रहे हैं या हिन्दू जो कलकी अवतार की आमद की राह देख रहे हैं। एक तरफ तो हिन्दू कलकी अवतार के इंतेज़ार में हैं वहीं जयपुर और कोटा के बीच एक मंदिर है जिस के लिए कहा जाता है कि शिव या रूद्र का 12वां अवतार इस जगह पर आएगा। इससे मालूम होता है कि शिव का 12वां अवतार ही कलकी अवतार होगा। ब्रहद अराण्यका उपनिषद ने 7 लाफना नामों का ज़िक्र किया है तो उनमें एक रूद्र भी है। मैत्री उपनिषद ने अल्लाह की बेहतरीन मख़लूक़ का ज़िक्र किया तो उसमें रूद्र भी है। स्वेतास्वतर उपनिषद 3ः4 कहता है कि रूद्र न सिर्फ देवताओं के बानी और सिलसिले की शुरूआत करने वाले बल्कि सरदार हैं जिन्होंने पुराने ज़माने में हिरण्यागर्भ यानी सुनहरे अण्डे को पैदा किया जो मुसलमानों के सिलसलातुल ज़हद यानी सुनहरे सिलसिले की ही बात है। ज़ाहिर है रूद्र यानी शिव कोई और नहीं नूरे अली है जो इमामत के बानी और सरदार हैं। कुल 12 इमाम हैं जिनमें से 12वें जो अहलेबैत के 14वें फर्द मेहदी हैं उनका इंतेज़ार तमाम मुसलमान कर रहे हैं। शिव के 12वें अवतार का इंतेज़ार हिन्दू भी कर रहे हैं।
अल्लाह के इस creation plan के इल्म को पाक इल्म क्हा गया है और ब्रहद अराण्यका उपनिषद 2ः7 में क्हा गया है कि ये इल्म रखने वाला बार बार दुनिया में पैदा होने से निजात हासिल कर लेता है और इन शख़्सियतों से ही जाकर मिल जाता है। अगर इस्लाम में आवागमन का तसव्वुर पेश नहीं किया गया तो इसलिए क्योंकि वो शख़्सियतें सामने पेश हो गई थीं जिन का इल्म इस दुनिया में बार बार पैदा होने से निजात का सबब है। निजात अगर रूह के जिस्मों में क़्याम से छुटकारा नहीं है तो मुसलमान बताएँ कि किस चीज़ से छुटकारा है? उपनिषदों में रूह के लिए रिज़्क़ की ज़रूरत पर ज़ोर है और इसीलिए जो रूहें निजात हासिल नहीं कर पातीं वो बार बार इंसानी जिस्म पाती हैं। एक उपनिषद में ब्यान किया गया है कि कैसे निजात पाई हुई रूहें इन नूरानी हस्तियांे के साथ रिज़्क़ पाती है। क़ुरआन ने भी शहीदों के सिलसिले में रिज़्क़ की फराहमी की गारंटी ली है और कहता है कि उन्हें मुर्दा न समझो बल्कि वो ज़िन्दा हैं और किसी खुदाई ज़रिए से रिज़्क़ हासिल करते हैं।
अगर कोई बहुत बड़ा राज़ नहीं बताया जा रहा था तो क्यों हर उपनिषद बार बार कह रहा है कि ये इल्म राज़ है और जो इसे जानता है वो कामयाब है। बार बार ‘इस इल्म’ को जानने पर ज़ोर है। यक़ीनन ये सिर्फ आग, पानी, आसमान वग़ैरा का इल्म नहीं हो सकता। क्या सिर्फ आग, पानी, आसमान वग़ैरा का जानना मोक्ष का सबब हो सकता है? रसूल बार बार वही दोहरा रहे थे जो उपनिषद ने बार बार क्हा है; ये कि जो अहलेबैत की किश्ती पर सवार हो गया उसने निजात पाई।
इस बातचीत से साफ है निजात के लिए जहाँ एक तरफ रूह की एक ख़ास मक़ाम तक तरक़्क़ी ज़रूरी है वहीं अल्लाह से हमारे बीच जो रिश्ता है वो जानना ज़रूरी है। दूसरे लफज़ों में उसकी खि़लक़त के प्लान का इल्म होना ज़रूरी है जिसके बिना निजात नामुमकिन है। इस खि़लक़त के प्लान के तहत अल्लाह की अहमतरीन और अव्वलतरीन खि़लक़त यानी नूरे ज़ाती जिसे क़ुरआन ने अल्लाह के चेहरे से ताबीर किया है, उसके ख़ल्क़ किए हुए 14 नूर और ये 14 नूर जब इंसानी जिस्मों में दुनिया में आए, इसको जानना ज़रूरी है। सब से अहम है अपने दौर के इमाम को जानना और उसके रास्ते को पहचानना। यही वजह है कि मरने के बाद तलक़ीन की शक्ल में उन शख़्सियतों के नाम गिनाए जाते हैं जिन का रोल खि़लकत के प्लान में साबित है और जिनकी मौहब्बत में अल्लाह तमाम ख़िलकत़ को वजूद में लाया। मरने वाले इंसान की रूह इरतेक़ा के किस मक़ाम पर थी ये तो ख़ुदा ही जानता है; ये नाम इस उम्मीद से बताए जाते हैं कि अगर रूह पाकीज़गी के उस मक़ाम तक पहुँच गई है जहाँ से वो निजात की दावेदार हो सकती है तो इन नामों के न जानने के सबब उस इंसान की निजात ख़तरे में न पड़ जाए। रसूल का ग़दीर का आखि़री ख़ुतबा इसलिए और अहम हो जाता है क्योंकि इस ख़ुतबे में भी उन नामों को पहचनवाया गया जिन को अल्लाह की खि़लक़त में उनके अस्ल रोल के साथ पहचान लेना निजात पाने के लिए ज़रूरी है।
ये है हमारी खि़लक़त का मक़सद। सब रूहें यानी आत्माएँ नूरे ज़ाती यानी परमात्मा ने ख़ल्क़ कीं कि अल्लाह की इबादत करने वालों में इज़ाफा हो। अपनी खि़लक़त के मक़सद को जानते हुए जो रूहें पाकीज़गी की एक ख़ास मंज़िल पर पहुँचती हैं वो निजात या मोक्ष की हासिल करती हैं और इसके इनाम के तौर पर बहिश्त में हमेशा हमेशा की ज़िन्दगी पाती हैं; यही हर इंसान की मंज़िले मक़सूद है।
दूसरे लफ्ज़ों में कहें तो सीधा रास्ता अल्लाह की ख़ुशनूदी है। उसकी मर्ज़ी पर चलने वाला देखना है तो इब्राहीम को देखें। ख़ुदा ने इब्राहीम से क्हा कि अपने बीवी बच्चे को सहरा के वीराने में छोड़ आएँ। खुदा के हुक्म के आगे इब्राहीम ने ये नहीं पूछा कि या अल्लाह तूने बुढ़ापे में औलाद दी और अब उसे वीरान में छोड़ने को कहता है। क्या ये सच नहीं कि दुनिया की मिलकियत में सब से क़ीमती चीज़ औलाद होती है? ख़ुदा ने इब्राहीम को हुक्म भी नहीं दिया, सिर्फ दिखाया कि वो अपने बेटे को अपने ही हाथ से ज़बह कर रहे हैं। और इब्राहीम अपने बेटे को ले कर चल दिए ज़बह करने। क्योंकि जानते थे कि सब चीज़ का मालिक ख़ुदा है। अगर आखि़री वक़्त पर ख़ुदा इब्राहीम की क़ुरबानी भेड़ से न बदल देता तो इब्राहीम ने अपने ही हाथों अपने बेटे को ज़बह कर दिया होता। यह अफसोस का मक़ाम है कि मुसलमानों ने इब्राहीम की क़ुरबानी की याद बक़रीद के तौर पर तो क़ायम रखी लेकिन उसे सिर्फ एक रस्म बना दिया और भूल गए कि यह दिन ख़ुदा के हुक्म के आगे हर चीज़ यहाँ तक कि अपनी सब से क़ीमती चीज़ को भी कुरबान कर देने की याद दिलाता है।
सूरः असर बहुत अहम है क्योंकि वो हर ज़माने के इंसान के लिए साफ लफ्ज़ों में निजात का रास्ता ब्यान कर रहा है। ज़माने की क़स्म खा कर क़ुरआन कहता है कि इंसान खसारे यानी नुक़सान में है सिवाय उसके जो ईमान लाया (अल्लाह और उसकी खि़ल्क़त के प्लान पर) और जिसने अच्छे काम किए, जिसने हक़ यानी सीधे रास्ते को पहचाना और जिस ने सब्र किया। ये सब ज़रूरी हैं उस मुश्किल चढ़ाई पर आगे बढ़ने के लिए जिसके आगे मोक्ष या निजात है।
अगर हम महाभारत के मैदान में देखें तो कृष्ण ने भी यही किया। अर्जुन के लिए लड़ाई एक मुश्किल अम्र था क्योंकि सामने उनके बचपन के साथी, भाई, रिश्तेदार और गुरू थे। अपनों से लड़ने की सकत अर्जुन में न थी और इस वजह से उन्होंने अपने तीर कमान फेंक दिए थे। कृष्ण ने उन्हें हक़ और बातिल का फर्क़ बताया, क्हा कि हम सब को ख़ुदा की तरफ लौटना है और वहाँ रिश्तेदार नातेदार काम न आएँगे बल्कि ये कि हम ने किस हद तक उसके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश की। और जब अर्जुन को उस ख़ुदा तक पहुँचा दिया तो कहा कि अब तीर कमान उठाओ और लड़ो, फिर फर्क़ नहीं पड़ता कि मौत तुम को आ जाए या तुम दूसरों को मौत के घाट उतार दो। जो लोग कहते हैं महाभारत की लड़ाई हस्तिनापुर पर क़ब्ज़े की थी ये भूल जाते हैं कि कृष्ण की तरफ लड़ने वाले दुश्मन के मुक़ाबले में बहुत कम थे। कृष्ण का ये कहना कि तुम मार दो या मर जाओ दोनों ही सूरत में तुम्हारी जीत है बताता है कि ये लड़ाई दरअसल ख़ुदा की राह में लड़ाई थी। यही असल जेहाद है।
अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए अपनी ज़िन्दगी का हर पल गुज़ारना ही इमामों की ज़िन्दगी का मक़सद था। अली की ज़िन्दगी को पढ़ते जाईए और आप पर ये बात उजागर होती जाएगी। करबला में हुसैन बख़ूबी जानते थे कि मौत सामने खड़ी है। ज़रा सोचिए, क्या उन्होंने इस लिए अपने सब चहितों को कुरबान करना पसन्द किया कि हम उनके मरने के बाद उन पर रोयें या इसलिए कि हम खुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी का हर हर पल गुज़ारना शुरू करें, यहाँ तक कि हम उसकी ख़ुशनूदी की ख़ातिर अपनी सब से पसन्दतरीन चीज़ों को क़ुरबान करने के लिए भी तैयार रहें।
अफसोस कि हम हज को जाते हैं तो शोर मचाते हुए कि हम हाज़िर हैं और फिर भी भूल जाते हैं कि इसका मतलब है अपने को अल्लाह के आगे सुपुर्द कर देने और अपने organs of action & senses का हाकिम नूर को तसलीम करने का।
ज़िन्दगी और मौत ख़ुदा की तरफ से है। क़ुरआन की आयत वाज़ेह तौर पर कहती है कि हम ख़ुदा के हैं और हमें उसी की तरफ लौटना है। कर्बला में हुसैन ने इसमें एक और जुमला जोड़ दिया। जब हम ख़ुदा की तरफ से हैं और उसी की तरफ लौटना है तो हम हर हाल में राज़ी हैं चाहे क़ज़ा का कोई भी फैसला हो। क्या ये कृष्ण के जुमले की वज़ाहत नहीं है कि चाहे तुम मारे जाओ या मार दो, तुम कामयाब हो। कृष्ण ने तो अर्जुन से कहा ही था, अली और हुसैन वग़ैरा ने तो कर के दिखा दिया। कौन भूल सकता है बिना ज़िराह पहने अली का बढ़ चढ़ के हमले करना और ये कहना कि मैं अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए लड़ रहा हूँ फिर कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि मैं मौत पर जा पड़ूँ या मौत मुझ पर आ पड़े।
इब्राहीम को ख़ुदा ने ख़्वाब में ही सही अपनी मर्ज़ी से आगाह कर दिया था। हुसैन को तो हुक्म की शक्ल में ख़ुदा का पैग़ाम बताने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी। वो भली भाँति जानते थे कि सीधे रास्ते को पहचनवाने में अहलेबैत का क्या रोल और कोशिशें रही हैं। यज़ीद उल्मा और रावियों को ख़रीद कर हर मुमकिन कोशिश कर रहा था कि अस्ल इस्लाम की तालीमात को मस्ख़ कर दे ताकि क़यामत तक लोग अस्ल और नक़्ल में फर्क़ न कर पायें। हुसैन ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की क़ुरबानी देकर मस्ख़ होती इस्लामी तालीमात में से अस्ल इस्लाम को क़यामत तक के लिए वाज़ेह कर दिया ताकि जो भी सीधे रास्ते पर आना चाहे उसे रास्ता ढूँढने में कोई मुश्किल पेश न आए। हुसैन की कुरबानी की याद को बाक़ी रखना लेकिन उस रास्ते पर न चलना जिसकी तालीम को महफूज़ रखने के लिए हुसैन ने अपने सब से क़रीबी लोगों को क़ुरबान कर दिया कहाँ तक अक़लमंदी होगी।
क्या ये सच नहीं कि यज़ीद कुल्ली तौर पर ज़ुलमत के कब्ज़े में था जो ये समझता था कि वो अपनी ताक़त के आगे हुसैन को झुकने पर मजबूर कर देगा। हुसैन की खि़लक़त नूर से थी। क़ुरआन में नूर का ज़िक्र बार बार आया है और कहीं पर भी इस से मुराद दिन या सूरज नहीं है। आप देख चुके हैं कि कुरआन गवाही दे रहा है कि जब आदम की खि़लक़त हुई उस वक़्त कुछ बड़े लोग मौजूद थे जिनकी मौजूदगी से इब्लीस भी वाक़िफ था। रसूल की कई अहादीस इन नूरानी हस्तियों को पहचनवाती हैं और न सिर्फ खि़लक़त में बल्कि क़यामत के दिन जज के तौर पर इनका रोल वाज़ेह करती हैं। कुरआन भी क़यामत के रोज़ खुदा को जजों का जज बता कर साबित करता है कि जज कुछ और बड़े लोग होंगे जो इतने बड़े हैं कि हमारी समझ से बाहर हैं। लेकिन हमको ये नहीं भूलना चाहिए कि बतौर नूर उनको अता की गई ये बड़ाई ख़ुदा की अता की हुई बड़ाई है और ख़ुदाए यकता के आगे ये नूरानी शख़्सियतें भी सिर्फ उसके ख़ास बन्दों के अलावा कुछ नहीं है। इनकी ख़ासियत ये है कि ख़ुदा ने इनको अपनी कुव्वतें बख़्शीं ताकि इनकी ताक़त को समझ कर हम समझने की कोशिश करें कि इनका ख़ालिक़ कितना ताक़तवर होगा।
अगर पैग़म्बर ने सूरज को न पलटाया होता तो हम कैसे जान पाते कि सूरज की गर्दिश अचानक हुए किसी धमाके के सबब नहीं हैं बल्कि कोई ताक़त है जो इसे control करती है। अगर मौहम्मद या इमाम अली रज़ा ने दुआ करके बारिश न कराई होती तो हम कैसे जान पाते कि बारिश गर्मी से पानी के भाप बनकर पानी के ठंडे होकर बरसने के सबब से ही नहीं होती बल्कि कोई ताक़त है जिसके हाथ में है कि कहाँ बारिश हो और कहाँ न हो। ईसा ने अगर बीमारों को सहतमन्द न किया होता और मुर्दों में जान न फूँकी होती, इब्राहीम के लिए अगर आग फूल न बन गई होती, मौहम्मद ने अगर चाँद के दो टुकड़े न किए होते, अली ने अगर ज़मीन में जज़्ब हो गए पानी को वापिस कूज़े में न पलटाया होता, फातमा और इमाम अली बिन हुसैन ने अगर मुर्दों को ज़िन्दा न किया होता, हुसैन ने अगर किसी बेऔलाद को सात औलादें न अता की होतीं, इमाम जाफर सादिक़ ने अगर अपने किसी सहाबी को दहकते तन्दूर से सही सलामत बाहर न निकाला होता और इस क़िस्म के अनगिनत वाके़यात जो पैग़म्बरों और इमामों के हाथों सरज़द हुए वो नहीं किए गए होते तो हम कैसे जान पाते कि वो जिसको ये ख़ालिक़ कहते हैं और जिसका अदना गु़लाम अपने को बताते हैं वो ख़ुद कितना कु़व्वतवर है।
यही बात इल्म के लिए भी लागू होती है। अगर पैग़म्बरों और आइम्मा ने आने वाले वाके़यात के बारे में सही सही पेशिनगोईयाँ न की होतीं तो यक़ीन करना मुश्किल होता कि अल्लाह क़यामत तक होने वाली हर बात से वाक़िफ है और जो कुछ होता है वो महज़ इसलिए नहीं होता कि हो गया बल्कि ख़ुदा को पहले से उस वाक़िये का इल्म होता है।
मिसाल के तौर पर अगर हम किसी क़ाबिल शख़्स से मिलते हैं और कोई हमें बताता है कि फलाँ शख़्स इस क़ाबिल शख़्स का टीचर है तो टीचर को न जानते हुए उस के लिए हमारे दिल में इज़्ज़त बैठ जाएगी। इस के बरखि़लाफ अगर हम किसी ऐसे को देखें कि जैसा हम ने कभी न देखा हो और उसके इल्म की बराबरी करने वाला कोई न हो और वो शख़्स ख़ुद कहे कि मैं तो महज़ अदना सा गुलाम हूँ और नाचीज़ हूँं बरमुक़ाबले उस उस्ताद के इल्म के जिस ने मुझे तालीम दी तब उस उस्ताद के इल्म की कितनी गहरी छाप हमारे दिल पर पड़ेगी? इसीलिए जब अल्लाह ने आखि़री रसूल के तौर पर मौहम्मद को रसूल बना कर भेजा तो किसी बशर से उन्होंने तालीम हासिल नहीं की ताकि जब मौहम्मद क़ुरआन की शक्ल में क़यामत तक के लिए नुमायाँ मोजिज़ा छोडं़े तो उससे हम अल्लाह की क़ुव्वत और क़ुदरत को पहचानें। यही वजह है कि क़ुरआन मौहम्मद के उम्मी होने पर इफतेख़ार करता है और कहता है कि वो वह है जिसने भेजा उम्मीयीन में रसूल। इसके मतलब ये हुए कि रसूल भले ही तुम्हारी नज़रों में किसी से इल्म हासिल करता नज़र न आया हो लेकिन जब तुम उसकी लाई हुई किताब के सब से छोटे सूरे का भी जवाब लाने से क़ासिर रहोगे तो तुम को मानना पड़ेगा कि ये जिस का रसूल है उसके इल्म की कोई थाह नहीं।
इससे ज़ाहिर होता है कि ग़ायब के लिए हमारी इज़्ज़त इस बात पर मबनी होगी कि उसके नुमाइंदे के लिए हम कैसी इज़्ज़त रखते हैं। इसीलिए क़ादिरे मुतलक़ खु़दा ने जो यकता है जब नूरे ज़ाती ख़ल्क़ किया तो उसे इस क़द्र क़ुदरत अता कर दी कि बावजूद इसके कि नूरे ज़ाती मख़लूक़ थी और बक़ौल एक उपनिषद उसने ख़ल्क़ होते ही अपने ख़ालिक़ की इबादत शुरू कर दी थी, जब उस नूरे ज़ाती के वजूद से वजूद में आए अनवार को हमने देखा तो हम अचंभे में पड़ गए। कुछ सतहई ज़हनों ने यहाँ तक कहा कि अगर नूरे ज़ाती को मारते और जिलाते साबित किया जाए और उसका तमाम मख़लूक़ की बक़ा में कोई रोल साबित किया जाए जैसा कि उपनिषद वग़ैरा में नूरे ज़ाती जिसे परमात्मा कहा गया है के तज़किरे से ज़ाहिर है तो अल्लाह की यकताई पर हर्फ आता है। ये तो जब मुमकिन होता जब ये नूरे ज़ाती या उससे पैदा हुए अनवार किसी मक़ाम पर अपने को अल्लाह की बन्दगी से जुदा दिखा रहे होते। इनका इतना ताक़तवर होना बताता है कि क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा जो इस नूरे ज़ाती और तमाम अनवार का भी ख़ालिक़ है कितना ताक़तवर है।
जब हम मलकुलमौत के बारे में सुनते हैं कि वो मारता है और एक ही वक़्त में सैकड़ों इंसानों की रूह क़ब्ज़ करता है
तो ये नहीं कहते कि उससे अल्लाह की यकताई पर हर्फ आता है क्योंकि मारने वाला तो बस अल्लाह है। बल्कि होता इसके बरअक्स है; हम कहते हैं कि जब कारिंदे इतनी ताक़त रखते हैं तो उनके ख़ालिक़ का क्या कहना।
लेकिन जब हम कहते हैं कि तमाम कायनात के चलाने का ज़िम्मा अल्लाह ने नूर से पैदा 14 शख़्सियतों को दे दिया - जिन्हें हिन्दू 14 मनू के नाम से जानते हैं और जिन्हें तमाम इंसानियत का मूरिसेआला मानते हैं - तो हम कहने लगते हैं कि इससे ख़ुदा की यकताई ख़तरे में है। हालाँकि उपनिषद खु़द कह रहा है कि क़ादिरे मुतलक़ न दिखाई देने वाले ख़ुदा ने सब से पहले जिस दिखाई देने वाली ताक़त को पैदा किया उस ताक़त ने पैदा होते ही अपने ख़ालिक़ की इबादत शुरू कर दी। ये भी लिखा है कि उस ख़ल्क़शुदा ताक़त, जिसे अंग्रेज़ी में Manifest Self कहा गया है, ने जब चाहा कि उसके ख़ालिक़ की इबादत करने वाले ज़्यादा हों तो 14 मनू की खि़लक़त हुई जिसके काफी बाद इंसान वजूद में आया। मानो या न मानो तमाम इंसानियत की बक़ा इसी नूर में पेवस्त है और जब इंसानी रूह इरतेक़ा के एक ख़ास मक़ाम तक पहुँचती है तो इसी नूर से मुलहक़ हो जाती है। यही साबित करने के लिए कुरआन ने सूरः यासीन में कहा कि हर चीज़ को उसने इमामुल मुबीन में मुक़ीद कर रखा है।
जब मेराज का ज़िक्र क़ुरआन ने किया तो कहा कि वो ले गया अपने बन्दे को मस्जिद से मस्जिद तक। मुफस्सेरीन तरजुमा करते हैं कि ये ज़मीन पर मौजूद मस्जिद से आसमान पर मौजूद मस्जिद तक जाने का ज़िक्र है। सवाल उठता है कि मस्जिद जब ही वजूद में आती है जब किसी ने मस्जिद की नीयत करके वहाँ नमाज़ अदा की हो। आसमान के उस मुक़ाम पर जहाँ जिबरील जैसे फरिश्ते ने भी जा पाने से माज़ूरी ब्यान की किस ने नमाज़ अदा की और कब?
इस नूरे ज़ाती की मौजूदगी को मान लेने से हमारे बहुत से अनसुलझे सवालों का जवाब मिलता है। अगर ख़ुदा दिखाई न देने वाली हक़ीक़त है तो मेराज की रात रसूल को आसमान पर एक ख़ास मक़ाम पर जाने की क्या ज़रूरत थी? कुरआन में एक ख़ास बाग़ और पेड़ के ज़िक्र से साबित है कि वो कोई माद्दी मक़ाम था। इस ज़िम्न में हदीसे क़ुदसी मज़ीद उस मक़ाम की वज़ाहत करती है औैर कुरआन कहता है कि दोनों के दरमियान दो कमान से भी कम का फासला रह गया। अगर रसूल अपने अल्लाह से दो कमान या उस से कम के फासले पर थे तो दुनिया में रहते हुए कितने फासले पर थे? क्या अल्लाह आसमान पर किसी ख़ास जगह मुक़ीम है?
कुरआन में आई आयतों और मुस्तनद किताबों में मौजूद बेशुमार हदीसों की बिना पर इब्ने तैमिया जो वहाबी सोच का बानी है इस नतीजे पर पहुँचा कि आसमान पर किसी ख़ास जगह खु़दा की कुरसी है और वो वहाँ मुक़ीम है। अपनी इसी सोच की बिना पर इब्ने तैमिया को उस वक़्त के मुसलमानों ने काफिर क़रार दिया और उसे अपनी बेशतर ज़िन्दगी कै़द में गुज़ारना पड़ी। कुरआन की आयतों और बेशुमार हदीसों, जिससे महसूस होता है कि ख़ुदा जिस्म रखता है और किसी ख़ास मक़ाम पर कुर्सी नशीन है, की मौजूदगी में मुसलमानों के पास कोई जवाज़ नहीं रह जाता सिवाय ये कहने के कि जुमलों के अस्ल मायनी नहीं बल्कि मजाज़ी मायनी को समझना चाहिए। ऐसा सोचना है उल्मा का बावजूद इसके कि क़ुरआन और अहादीस में बेशुमार जगह पर नूर का ज़िक्र मौजूद है और वाज़ेह तौर पर कहा गया है कि नूर ज़मीन पर उतरता है। इस से साबित होता है कि नूर आसमान पर किसी ख़ास मक़ाम पर मौजूद है और ज़रूरत पड़ने पर ज़मीन पर इंसानी जिस्म में उतरता है। इसी को हिन्दुओं ने अवतरित होना क्हा। यही हक़ीक़त न समझ पाने की वजह से ईसाईयों ने ईसा (यसूअ) को ख़ुदा का बेटा क़रार दिया।
मौहम्मद का कहना कि उनका नूर सब से पहले ख़ल्क़ हुआ था ज़ाहिर करता है कि उसके बाद मज़ीद दूसरे नूर भी ख़ल्क़ हुए होंगे। जब मौहम्मद ने कहा कि अली और मैं एक ही नूर के दो टुकड़े हैं तो भी हमें हक़ीक़त समझ में न आई। एक जगह पर अली ने कहा कि मेरा नूर आदम से 4000 साल पहले खल्क़ हुआ और दूसरे मक़ाम पर जब किसी ने पूछा कि आदम से पहले कौन था तो क्हा आदम, पूछा उससे पहले, तो क्हा आदम और यहाँ तक क्हा हज़ार आदम।
नूरे ज़ाती आसमान में एक ख़ास मक़ाम पर मुक़ीम है, ऐसा मक़ाम जहाँ जिबरील भी जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। जब अल्लाह से इब्लीस का मुकालमा हुआ तो अल्लाह ने इन्ही बड़े और ऊँचे लोगों का ज़िक्र किया। इबादत करने के अलावा अर्श पर मौजूद कुर्सी से नूरे ज़ाती यानी परमात्मा कायनात के कामकाज की निगेहबानी करता है। इसी नूरे ज़ाती से जुदा हो कर नूरे मौहम्मद बतौर इंसान ज़मीन पर आया और इस नूर की नूरे ज़ाती से मुलाक़ात सबब बनी मेराज के होने का। मानिये कि जब नूरे ज़ाती को ख़ुदाए यकता ने इतनी क़ुव्वत बख़्शी तो इस नूरे ज़ाती का ख़ालिक़ जिस का वजूद हर चीज़ से जुदा है और जिसको ब्यान नहीं किया जा सकता कितनी क़ुव्वत रखता होगा।
क़ुरआन में नूर का ज़िक्र कई मक़ामात पर मौजूद है। इसके साथ क़ुरआन में ज़ुलमत का भी बारहा ज़िक्र है। अरबी ज़बान का जानने वाला हर आलिम जानता है कि क़ुरआन में लफ्ज़ नूर दिन के लिए नहीं इस्तेमाल किया गया और न ही लफ्ज़ ज़ुल्मत रात के लिए। रात और दिन के लिए लैल-व-नहार का ज़िक्र है और सूरज को शम्स कहा गया है। नूर की वज़ाहत के लिए रसूल की अहादीस से भी हम न समझ पाए कि इससे क्या मुराद है? दूसरी तरफ हम ज़ुलमत के मायनी भी समझ पाने से अब तक क़ासिर रहे हैं।
क्या इब्लीस खुदा का बन्दा नहीं है? हम मानते हैं कि इब्लीस इतनी ताक़त रखता है कि वो एक ही लम्हे में दुनिया भर के इंसानों को वरग़ला और बहका रहा है। न सिर्फ ये बल्कि इसकी पहुँच जन्नत तक भी, जिसमें आदम मुक़ीम थे, साबित है। मुसलमान पैग़म्बर अय्यूब का जो क़िस्सा ब्यान करते हैं उसके मुताबिक़ ये अल्लाह से हमकलाम होता है और इसी ने अल्लाह से माँगा था कि अय्यूब की दौलत और औलाद छीन ली जाए और उन्हें बीमारी में मुब्तिला कर दिया जाए। अल्लाह से नहीं तो नूरे ज़ाती से तो ये हमकलाम होता ही है। इसके बरखिलाफ नूर का काम हिदायत पहुँचाना और सीधा रास्ता दिखाना है। जब इब्लीस इतनी क़ुव्वत रख सकता है तो हम क्योंकर ताज्जुब करते हैं कि नूर से रिश्ता रखने वाले अली एक ही वक़्त में चालीस जगह दिखाई देते हैं या जैसा एक रिवायत में मौजूद है अबूबक्र और उमर को हवा के रास्ते असहाबे कहफ के ग़ार की ज़ियारत को ले जाते हैं।
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