Wednesday, 23 September 2026

Lecture 002. Muslim sees no difference between Quran and Vedas

Lecture 002. Muslim sees no difference between Quran and Vedas

अल्लाह या ईश्वर या खुदा या गाड - वो एक है। और ये दुनिया बहुत छोटी सी है उसकी कायनात यानी सृष्टि के सामने। इस छोटी सी दुनिया में भी हमने दीवारें खड़ी कर दीं हैं कि यहां पर अगर उसने कोई अवतार भेजा तो हम समझते हैं कि कहीं और नहीं भेज सकता। या अगर उसने अरब में कोई रसूल या पैगम्बर भेजा तो हिन्दुस्तान में नहीं भेज सकता। इतनी छोटी छोटी सोचों के साथ हम दीवारें खड़ी किए बैठे हैं।

हर जगह उसने मैसेंजर्स भेजे रास्ता दिखाने को। मैं आपको दिखाउंगा कि कुरान और गीता दोनों ही इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जहां जहां भी अधर्म बढ़ा, जहां भी लोग दीन से दूर हुए, सीधे रास्ते से दूर हुए, वहां वहां उसने अवतार भेजे और राह दिखाने वाले भी भेजे।

लेकिन आईरनी ये है कि सब कुछ एक होने के बावजूद भी हम खुदा के ही नाम पर लड़ते हैं, उसके पैग़ाम के नाम पर लड़ते हैं, उसकी किताब के नाम पर लड़ते हैं। उसके पैग़ाम में फेर नहीं है, बल्कि हमारे नेचर में लड़ाई है जिसके चलते हम उस धर्म के नाम पर जो सब को एक करने आया था उस पर भी लड़ने लगते हैं। लेकिन ये भी हकीकत है कि बहुत सारी हकीकतें हम को समझना बाक़ी हैं।

जैसे ब्रहमा, विष्णु, महेश - हम ने जो सोच बना रखी है उसके अनुसार एक creator है, एक sustainer है और एक destroyer है। क्या ये सोच सही है? परमात्मा कौन है; क्या वही खुदा है जिसको परमात्मा कहते हैं? या परमात्मा का खुदा से क्या रिश्ता है? या ब्रहमा, विष्णु, महेश का खुदा से क्या रिश्ता है? या परमात्मा से क्या रिश्ता है? या देवता कौन हैं?

आम तौर पर लोग नहीं जानते इन सवालों के जवाब। और बहुत से जो समझते हैं कि वो जानते हैं, वो जानते भी ग़लत हैं। मिथालोजी और प्रचलित कहानियों की बुनियाद पर उन्होंने कुछ मायनी पहना लिए हैं और उन मायनी से वो समझने की कोशिश करते हैं।

समस्या सब से बड़ी ये है कि हर हर जगह मैसेज एक ही आया, लेकिन हमारे स्कालर्स ने, थिंकर्स ने, उस मैसेज को इंटरप्रेट अलग अलग ढंग से किया, कुछ बार जानते बूझते और अनेक बार अनजाने में। हम को आप को दिखाएंगे कि लोगों ने कैसे इंटरप्रेटेशंस किए और दीवारें खड़ी करते गये धर्मों के बीच। जब वो एक पैग़ाम सब किताबों में से दिखाई दे जाएगा, तो धर्मों की बीच खड़ी की गई दीवारें गिर जाएंगी। यही कारण है कि मैंने अपनी किताब का नाम ‘वन गाड, वन रिलीजन’ दिया है। आप खुद अपनी अक़ल के मेयार पर उन दीवारों को गिरते देखेंगे।

विस्डम की बुनियाद पर आप देखेंगे कि जो दीवारें हमने खड़ी कीं, क्योंकि हम बहुत सारी बातों को नहीं समझ पाए, उन दीवारों को गिरना है, ये अल्लाह का वादा है। हर किताब में वादा है।

मैं कहीं पढ़ रहा था कि यहूदियों के यहां वादा है कि हर तरफ हक़ को फैल जाना है, सच्चे मज़हब को फैल जाना है। वो मसीहा आएगा जिसका वो इंतेज़ार कर रहे हैं। यहां तक कि कई जगह लिखा है कि दो मसीहा होंगे; ज्यादातर लोग एक ही मसीहा का इंतेज़ार कर रहे हैं। वो मसीहा आएगा तो धर्म सब ओर फैल जाएगा।

सनातन धर्म की किताबों में साफ लिखा है कि धर्म को फैलना है। जब वो आखिरी अवतार आएगा तो धर्म सब ओर फैल जाएगा। हम बतौर मुसलमान मान रहे हैं कि हर तरफ हक़ को फैल जाना है। ईसाई मान रहे हैं कि हर तरफ हक़ को फैल जाना है, धर्म को फैल जाना है।

ये ठीक है कि वो कहते हैं कि क्रिस्चिएनिटी फैल जाएगी, हिन्दू कहते हैं कि सनातन धर्म की शिक्षा फैल जाएगी, और हम समझते हैं कि हर तरफ इस्लाम फैल जाएगा। लेकिन आप देखेंगे कि जो सनातन धर्म की शिक्षा है वही इस्लाम की शिक्षा है, वहीं क्रिस्चिएनिटी की शिक्षा है। जबकि सामने इतने मतभेद दिखाई देते हैं उसके बावजूद मैं इतने कांफिडेंस के साथ ये बात कह पा रहा हूं।

यानी ब्रहमा, विष्णु, महेश, तीन का कान्सैप्ट हिन्दू मानते हैं और फिर मैं कह रहा हूं कि शिक्षा एक है। ट्नििटी का कानसैप्ट ईसाई मानते हैं जिसको मुसलमान सिरे से नकार देते हैं और फिर मैं कह रहा हूं कि शिक्षा एक है। हम ने विभिन्न शिक्षाओं को अपनी अपनी अकल से समझा, हमने उसको अलग अलग मायनी पहनाए और ये दीवारें खड़ी होती चली गईं। आप सवाल कर सकते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है जबकि हिन्दू पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं और मुसलमान पुनर्जन्म को नहीं मानते हैं। लेकिन आप रहिए मेरे साथ इन डिस्कशंस में, आप देखेंगे कि वो दीवार भी गिर जाएगी। यानी जो दीवारें हमने धर्मों के बीच बना रखी हैं, आप देखेंगे कि वो गिर जाएंगी और एक समझ, एक रास्ता सामने दिखाई देने लगेगा।

और हिन्दुस्तान की बड़ी वैल्यू मुसलमानों के दरमियान भी है। रसूलअल्लाह की कितनी ही हदीसें हैं हिन्दुस्तान के बारे में। ये लोग गलत कहते हैं कि जो व्यापारी अरब से आठवीं दसवीं शताब्दी में भारत की तरफ आए उन्होंने सिंध की वजह से हिंद नाम रख दिया। ऐसा नहीं है। रसूलअल्लाह की कम से कम 18-19 हदीसें हैं जिनमें हिंद का ज़िक्र है। उन्होंने हिन्दुस्तान की तरफ से आ रही हवाओं तक में खुशबू आने की बात कही। इसका मतलब ये हुआ कि हिन्दुस्तान की बहुत ज्यादा वैल्यू रही है खुदा और उसके रसूलों के लिए, क्योंकि यहां पर हमेशा हक़ पसंद लोग रहे हैं, अमन पसंद लोग रहे हैं।

मुसलमानों को तो खासतौर पर हिन्दुस्तान से एक खास मौहब्बत रखनी चाहिए क्योंकि आदम जो पहले पैग़म्बर हैं वो यहीं पर आए। जब पहले पैगम्बर यहां आए, और अगर हम ये मानते हैं कि आदम पहले पैगम्बर थे जिनसे इस्लाम की शुरूआत हुई और आखिरी पैगम्बर मौहम्मद थे, तो इसका मतलब ये हुआ कि जिसको हम इस्लाम कहते हैं, जो सलामती का मार्ग है, जो सीधा रास्ता है, उसकी शुरूआत हिन्दुस्तान से हुई। बाद में जो इंटरनल कानफलिक्टस डेवेलप हुए, जैसे अरब सुप्रिमेसी का कान्सैप्ट, ये इस्लाम ने तो नहीं बताया। इस्लाम ने तो मसावात का कानसैप्ट दिया था, कि सब एक हैं, सब बराबर हैं, हर किसी के साथ इंसाफ से पेश आना है, एक बेगुनाह को कत्ल करने को तमाम इंसानियत के कत्ल के बराबर बताया था। जबकि आज हम उसी इस्लाम के नाम पर कितने बेगुनाहों को मार रहे हैं।

हम तो खुद बहुत दूर आ गये हैं अस्ल इस्लाम से, और हम ये उम्मीद करते हैं कि हम दूसरों को अपने इस इस्लाम में दाखिल कर लेंगे। अपने मज़हब में दाखिल करने की बात ही नहीं है; हर कोई अपनी किताब से हक़ को पहचान सकता है।

वो एक ही रास्ता हर किताब में मौजूद है। न तो मैं ये कहता हूं और न ही ये हो सकता है कि मैं हिन्दू से कहूं कि मुसलमान हो जाओ, या मुसलमान से कहूं कि कोई और मजहब इख़्तेयार कर लो, ईसाई से कहूं कि तुम हिन्दू हो जाओ। वो ईसाई अपनी किताब से हक़ को पहचानेगा। हिन्दू अपनी किताब से हक को पहचान सकता है, मुसलमान अपनी किताब से। और वो एक ही होगा, अलग अलग नहीं होगा।

लफज आदम खुद ‘आदिम’ से आया है। ‘आदिम’ अरबी का शब्द नहीं है। संस्कृत का शब्द है। जिससे ‘आदम’ शब्द आया। आदिम का अर्थ हुआ पहला, शुरूआती, जहां से प्रारंभ हुआ। अगर मुसलमानों के पहले प्रोफैट आदम थे, जो हिन्दुस्तान में आए थे, तो फिर कुछ हद तक मुसलमानों के लिए होली लैंड भारत को तो होना चाहिए था। नूह का डिस्क्रिपशन पुराण में भी मौजूद है। थोड़े मायनी अलग हैं, थोड़ी समझ अलग है, लेकिन नूह का डिस्क्रिपशन पुराण, ओल्ड टेस्टेमेंट और कुरान - तीनों जगह मौजूद है।

आखिरी ज़माने में एक मसीहा के आने का कानसैप्ट सनातन धर्म की किताबों में भी मौजूद है, कुरान और मौहम्मद की टीचिंगस में भी मौजूद है, यहूदियों और ईसाईयों की किताबों में भी मौजूद है। यहां तक कि साउथ अमेरिका में जो एज़टैक एमपायर थी, उनके यहा भी किसी क्वेटज़ाल्कोट्ल नामी मसीहा के आने का डिस्क्रिपशन मौजूद था।

आप मेरे साथ रहेंगे तो कुरान की आयतों की रौशनी में आप देखेंगे कि मुसलमानों को वेद को अपनी पहली किताब मानना पड़ेगा। पहली किताब हैं वेद, इसमें कोई दो राय है ही नहीं। पहली किताब जो नाज़िल हुई, अवतरित हुई, इस दुनिया में, वो इस हिन्दुस्तान में नाज़िल हुई। और मैं आप को आगे दिखाउंगा कि कुरान खुद हर उस किताब को जो अल्लाह की तरफ से आई हुई साबित हो रही है, उसको कुरान के बराबर रखने तक की बात कर रहा है।

हां ये ठीक है कि आप अपनी किताब से अपने मज़हब को पहचानेंगे। अगर आप ने विकीपीडिया देखा है, तो आप ने देखा होगा कि एक लिंक आता है, आप उस पर क्लिक करते हैं तो कहीं और पहुंच जाते हैं। अब आप पाएंगे कि ऐसा ही होगा। वेद पढ़ते हुए कोई लिंक से आप कुरान पर आ जाएंगे और कुरान पढ़ते हुए कुछ और समझ के लिए आप वेद तक पहुंच जाएंगे। ओल्ड टेस्टेमेंट पढ़ते हुए कहीं पर कोई लिंक आएगा तो आप वेद पर आ जाएंगे और वेद या गीता को पढ़ते हुए कोई लिंक आएगा तो आप फिर ओल्ड टेस्टेमेंट पर पहुंच जाएंगे।

लेकिन अपनी किताब को पढ़ना है, अपनी किताब को समझना है, जो गलत मायनी हमने पहना रखे हैं वो एक बार हट जाएंगे, तो वो सच्चा सीधा रास्ता सामने आ जाएगा।

कुरान कह रहा है कि ये दीन अल-क़य्यम है, ऐसा दीन जो हमेशा से स्थापित है, क़ायम है, कभी बदला नहीं। और सनातन धर्म, सनातन धर्म के मायनी हैं जो सदा से चला आ रहा है। जो हम कहते हैं हमें सिराते मुस्तकीम पर चला, सीधे रास्ते पर चला, वो सीधा रास्ता इन किताबों में मौजूद है। इन किताबो ंकी सही समझ से विचलित होकर हमने धर्म बनाए और जब हम अकल के साथ इन किताबों को दुबारा पढ़ेंगे और जो मिसिंग लिंक्स हैं उन्हें समझने की कोशिश करेंगे, तो वो दीवारे ंअपने आप खत्म हो जाएंगी।

वेद या उपनिषद में एक शब्द आया है ‘क्लिम’। ये मंत्र है अगर आप बोलने में एक्सपर्टाईज़ चाहते हैं। मुसलमान मानते हैं कि खुदा की सिफत यानी विशेषण है ‘कलीम’, यानी जो बोलने में सबसे बेहतरीन और आला हो। इस लेवल पर सिमिलैरिटीज़ हैं, कि वहां पर क्लिम बोलने को कहा जा रहा है तो यहां कलीम की बात हो रही है। और जैसे मैंने बताया कि आदिम शब्द संस्कृत का है, क्योंकि आदम सब से पहले आए ही यहां पर थे, जिससे आदम और आदमी बना।

गीता के चैथे चैप्टर का सातवां और आठवा मंत्र बहुत ही मशहूर है, उसे देखिएः

Gita.IV.7

Whenever there is decay of righteousness, O Bharata, And there is exaltation of unrighteousness, then I Myself come forth;

Another translation says:

Whenever and wherever there is a decline in religious practice, O descendent of Bharata, and a predominant rise of irreligion – at that time I descend Myself.

हे भरतवंशी अर्जुन, जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूं।

यानी जब जब और तब तब की बात हो रही है। भारत वर्ष की बात नहीं हो रही। किसी सीमा बंध कर अवतार आने की बात नहीं हो रही।

भारत वर्ष तो एक छोटा सा हिस्सा है परमात्मा की सृष्टि का। सारी इंसानियत उसकी है। आदम की नस्ल में आदमी जहां जहां भी बसता है, वहां यदि वो धर्म से दूर होगा, अधर्म फैल जाएगा, तो परमात्मा का कोई अवतार आएगा, ये परमात्मा का ही बनाया नियम है।

और मक़सद क्या हैः

Gita.IV.8

For the protection of the good, for the destruction of evil-doers, For the sake of firmly establishing righteousness, I am born from age to age.

Another translation says:

To deliver the pious and to annihilate the miscreants, as well as to re-establish the principles of religion, I Myself appear, millennium after millennium.

यानी अच्छों को, जो सही रास्ते पर हैं, उनकी हिफाज़त के लिए, और जो गलत पर हैं, उनका नाश करने के लिए, सही रास्ते को, अच्छाईयों को फैलाने के लिए, बार बार अवतार आता है। हम को समझना होगा कि ये मकसद है बार बार अवतारों के आने का।

और कुरान क्या कह रहा हैः

Quran.10.47

Every community has its Messengers; when their Messenger comes (some believe in him and the others not, and) it is judged between them with absolute justice, and they are not wronged.

और हर उम्मत के लिए एक रसूल आता रहा है। फिर जब उनका रसूल वाज़ेह निशानियों के साथ आ चुका और वो फिर भी न माने, तो उनमें इंसाफ के साथ फैसला कर दिया गया और कयामत के दिन इसी तरह होगा कि उनपर कोई जुल्म नहीं किया जाएगा।

यानी कुरान भी इस बात की गवाही दे रहा है कि हर हर उम्मत में रसूल आते रहे।

Quran.14.4

We have sent no Messenger save with the tongue of his people, that he might make (the Message) clear to them. Then God leads whomever He wills astray, and He guides whomever He wills. He is the All-Glorious, with irresistible might, the All-Wise.

और हमने किसी रसूल को नहीं भेजा, मगर अपनी क़ौम की ज़बान के साथ। ताकि वो उनके लिए पैग़ाम-ए-हक़ को वाज़ेह कर सके, फिर अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह ठहरा देता है, जिसे चाहता है हिदायत बख्शता है, और वो ग़ालिब, हिकमत वाला है।

यानी हर रसूल को, वो जिस इलाक़े में, जिन लोगों के दरमियान आया, उन्हीं की ज़बान में, बात करता हुआ, उन्हीं में से किसी को रसूल बनाया।

Quran.16.36

And certainly, We have raised within every community a Messenger (to convey the primordial Message): worship God alone, and keep away from false deities and powers of evil (who institute patterns of faith and rule in defiance of God). Among them (past generations) were people whom God guided, just as there were among them those for whom straying was just due. Go about, then, on the earth and look! How was the outcome for those who denied (God’s manifest signs and His Messengers).

आप देखिए तो राम भी यही करते नज़र आ रहे हैं, कृष्ण भी यही करते नज़र आ रहे हैं, पैगम्बर मौहम्मद और दूसरे मैसेंजर्स भी यही करते नज़र आ रहे हैं। और कुरान तो यहां तक कह रहा है कि अगर साबित हो जाए कि कोई किताबें एक ही सोर्स से हैं, तो फिर तुम उनमें कोई फर्क़ नहीं कर सकते।

Quran.2.136

(You) declare: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down to us, and which was sent down to Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the Prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses and Jesus, and that (knowledge, Wisdom, and Prophethood) which was given to all other Prophets from their Lord, We make no distinction between any of them and we are Muslims (submitted to Him wholly and exclusively).

तुम ये एलान कर दो कि जो जो भी पैगम्बर जिनके नाम कुरान में लिए गये हैं, या नहीं लिए गये हैं, उनपर जो किताब भेजी उसका नाम कुरान में हो या ना हो, हम उनमें कोई फर्क़ नहीं करते और हम मुसलमान है, यानी अल्लाह की मर्जी के आगे अपने को नतमस्तक किए हुए हैं। उसकी मर्जी है कि हम सब मैसेंजर्स को और सब किताबों पर यकीन रखें और उनमें फर्क़ नहीं करें, ये मुसलमान होने की पहचान है।

ऐसा कई जगह कुरान में आया है। जब फर्क न करने की बात है तो इसका मतलब कि जो इज्जत और एहतराम हम एक के लिए रखते हैं, वही हम दूसरे के लिए रखें, जितना रिसर्च और शोध हम एक के लिए करते हैं, उतनी ही दूसरे के लिए करें। अगर हम अपने को मुसलमान कहते हैं और कुरान की मानते हैं, तो पहले आई किताबों में जो जो कुछ लिखा है, उसको भी हम को अपने रब के कलाम के तौर पर मानना लाजमी होगा।

ये बात कुरान में बार बार अलग अलग अलफाज़ मे ंदोहराई जा रही हैः

Quran.3.84

Say: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down on us, and that which was sent down on Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses, Jesus, and all other Prophets from their Lord; we make no distinction between any of them (in believing), and we are Muslims (submitted to Him exclusively).

मुसलमान होने की दलील ये दी जा रही है कि पहले जो जो कुछ किताबें भेजी गईं, हम उनमें कोई भी फर्क नहीं करते। हमने इन आयतों की कमेंटरी में फर्क ये कर दिया कि हमने कहा कि हम इन किताबों पर ईमान लाने में फर्क नहीं करते। खुदा ये नहीं कह रहा कि तुम सिर्फ ईमान रखो उन किताबों पर, बल्कि साफ कहा जा रहा है कि हम उनमें कोई फर्क नहीं करते। यानी जो इज्ज़त, जो एहतराम हम कुरान का करते हैं, वही हमें पहले की किताबों को करना है जिनपर हम को यकीन है कि वो अल्लाह की ही तरफ से भेजी गईं। अगर हम कुरान को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो हमको इन किताबों को भी समझने की कोशिश करना होगा। जो लोग कहते हैं कि पहले की किताबों में तहरीफ हो गई, अगर हमने उनको समझने की कोशिश की होती अपना समझते हुए तो शायद तहरीफ न हुई होती। बहुत से लोग थे जो रसूल के दौर में अपनी अपनी किताबों से उनको पैगम्बर पहचानते हुए इस्लाम में दाखिल हुए थे, फिर हमने वो किताबें संभाल कर क्यों न रखीं।

सलमान फारसी के बारे में कहा जाता है कि पहले आतिशपरस्त थे, फिर उन्होंने हक को जानने की कोशिश की और किताबें पढ़ीं तो उन्होंने ईसाईयत कुबूल कर ली, और डेमेस्कस चले गये, और फिर वहां उन्होंने और शिक्षा ग्रहण करी और ईसाईयों की किताबों में पाया कि एक और पैगम्बर जिसको आना है, उसके आने का समय हो गया और ये तक उन्होंने ईसाई किताबों से जान लिया कि वो पैगम्बर मक्का में आएगा, तो मक्का के लिए सफर पर निकल पड़े। वो मक्का के सफर पर थे कि रास्ते में डाकुओं ने हमला किया और वो गुलाम बना लिए गये, और गुलाम बना कर मदीना में बेचे गये, और इधर रसूलअल्लाह भी हिजरत करके मदीना पहुंच गये।

कहने का मकसद ये है कि अगर सलमान फारसी अपनी किताबों में से देखकर ये पहचान पा रहे थे कि आने वाला रसूल कहां पर आएगा, और वहां के लिए रवाना हो गये, और बहुत से यहूदी और ईसाई अपनी अपनी किताबों में से पहचानते हुए आए थे, तो हमने वो किताबें पहचान कर क्यों नहीं रखीं।

अगर उस वक्त हम फर्क न करते, ये मायनी न निकाल लेते कि हमारे लिए बस कुरान काफी है, अगर उस वक्त के हालात जो बनी उमयया और बनी अब्बास के दौर में हुए थे, कि ये कुरान बचाना भी मुश्किल हो गया था, न हुए होते, तो हम पहले कि किताबों को भी स्टडी कर रहे होते। और फिर ये तहरीफ, जैसा हम कहते हैं कि तहरीफ हुई, आगे हम देखेंगे डिस्कशंस में कि तहरीफ कहां हुई और कितनी हुई, लेकिन मैं तो कहता हूं कि आज भी उन किताबों में हक वैसे ही मौजूद है। मैं तो यहां तक कहता हूं कि वेद में भी हक मौजूद है, गीता में भी हक मौजूद है, ओल्ड और न्यू टैस्टेमेंट - इन सब में हक वैसे ही मौजूद है, जैसा कि हम मानते हैं कि कुरान में मौजूद है।

कुरान में फर्क न करे, लेकिन हम इनको कुरान से अलग देखते है। इस्लाम आदम से शुरू हुआ और आखिरी पैगम्बर मौहम्मद थे।

हमको दुबारा से इन किताबों को पढ़ना होगा और अपना समझ कर करना होगा।

Quran.4.152

But as for those who believe in God and His Messengers and make no distinction between them (between God and His Messengers or between Messengers themselves), to them God will grant their rewards (in full). God is indeed All-Forgiving, All-Compassionate.

और जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए, और उन में किसी के दरमियान फर्क नहीं किया तो अनकरीब उन्हें इसका अर्ज अता फरमाएगा, और अल्लाह बड़ा बख्शने वाला, बहुत रहम करने वाला है।

पहले तो बात हो रही थी कि किताब में फर्क नहीं करते और यहां पर बात हो रही है कि खुदा में यकीन रखते हैं और उसके मैसेंजर्स में फर्क नहीं करते।

यानी अगर हमको ये यकीन हो जाए और मुतालये के बाद, और स्टडी के बाद, कि कृष्ण अल्लाह की तरफ के पैगम्बर यानी अवतार हैं, तो फिर हमको उनमें और मौहम्मद में भी फर्क नहीं करना है। अगर हम ईसा को अल्लाह की तरफ का पैगम्बर मानते हैं तो हमें उनको भी बराबर का दर्जा देना होगा। लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे। तो फिर हमको देखना होगा कि कुरान की शिक्षा पर हम कितना चल रहे हैं।

Quran.5.48

We have sent down to you (O Messenger) the Book with the truth, confirming whatever of the Book was revealed before it, and guarding over (all the true teachings in) it. Judge, then, between them by what God has sent down, and do not follow their desires and caprices away from the truth that has come to you. For each (community to which a Messenger was sent with a Book), have We appointed a clear way of life and a comprehensive system (containing the principles of that way and how to follow it). And if God had so willed, He would surely have made you a single community; but (He willed it otherwise) in order to test you by what He granted to you. Strive, then, together as if competing in good works. To God is the return of all you, and He will then make you understand about what you have differed on.

यहां कहा जा रहा है कि हमने हक के साथ किताब भेजी और ये कंफर्म कर रही है किताब में से जो कुछ पहले भेजा जा चुका। यानी अस्ल किताब आसमान पर है और उसके हिस्से पहले भेजे जाते रहे और ये कुरान कन्फर्म कर रही है जो कुछ पहले भेजा जा चुका। ये बहुत अहम आयत है जो कह रही है कि अगल खुदा चाहता तो वो तुम्हें एक ही कम्यूनिटी बना देता। फिर तुम में कोई डिफरेंस नहीं होता। लेकिन वो तुम में टेस्ट करना चाहता था। तुम्हारा इम्तेहान लेना चाहता था। और ये अल्लाह का ही सिस्टम है कि उसने अलग अलग भाषाओं में किताबें और पैगम्बर भेजे। अच्छे कर्म करने में एक दूसरे से सबकत लेने की कोशिश करो। तुम को खुदा की तरफ ही पलटना है। और वो जब चाहेगा, जब उसकी मंशा होगी, हक

यानी एक वक्त आएगा, खुदा का वादा है, कि हक को जाहिर होना है और ऐसा हो कर रहेगा। अगर कुछ फर्क तुम को दिखाई दे रहा है, तो तुम पर हक जाहिर हो जाएगा।

Quran.11.118

And if your Lord had willed surely He could have made the mankind one community but not they will cease to differ.

अगर तुम्हें एक ही कम्यूनिटी बना दिया गया होता, तो फिर भी तुम आपस में नाइत्तेफाकी करने से बाज़ नहीं आते। आप खुद देखिए, जो लोग एक ही कम्यूनिटी के अन्दर हैं, उनमें कितनी नाइत्तेफाकियां हैं। मुसलमानों में कितनी नाइत्तेफाकियां हैं। आपस में एक दूसरे को काफिर कह रहे हैं। ये तो 1400 साल में हुआ है’ कि एक दूसरे को मारने पर तुले हुए हैं, एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने पर तुले हुए हैं। जब कि ये सब के सब एक ही कुरान और एक ही रसूल के रास्ते पर चलने का दावा करते हैं।

खुदा कह रहा है कि अगर आप का रब चाहता तो तमाम लोगों को एक ही उम्मत बना देता, लेकिन तुम फिर भी ये लोग इख्तेलाफ करते रहते।

Quran.5.77

Say: “O People of the Book! Do not go beyond the bounds  in your religion, (straying towards) other than the truth, and do not follow the lusts and fancies of a people who went astray before, and led many others astray, and they strayed (as again others do now) from the right, even way.”

फरमा दीजिए ए अहले किताब, तुम अपने दीन में हक से तजावुज न किया करो और न उन लोगों के ख्वाहिशात की पैरवी किया करो जो पहले ही गुमराह हो चुके थे। और बहुत से और लोगों को भी गुमराह कर गये। सीधी राह से भटके रहे।

यही हुआ है। एक दूसरे को तो सीधी राह पर लाने की कोशिश में हम लगे रहे लेकिन खुद अस्ल राह से दूर आ गये। लेकिन सब के लिए एक ही पैगाम हैः

Quran.2.62

(The truth is not as they – the Jews – claim, but this:) Those who believe (i.e. professing to be Muslims), or those who declare Judaism, or the Christians, or the Sabaeans (or those of some other faith) – whoever truly believes in God and the Last Day, and does good righteous deeds, surely their reward is with their Lord, and they will have no fear, nor will they grieve.

यानी कुरान तो ये भी कह रहा है कि अगर आप यकीन रखते हैं भले ही आप यहूदी हैं, भले ही आप ईसाई हैं, भले ही सितारों की पूजा करते हैं, या आप मुसलमान हैं, जो खुदा और रोज़े कयामत पर ईमान लाएगा, और नेक अमल करेगा, तो ऐसे लोगों को उनका सिला खुदा के यहां मिलेगा, और उनको न किसी तरह का खौफ होगा और न वो गमनाक होंगे।

ये कुरान की आयत है। कि अगर वो वाकई हक पर चलने की कोशिश कर रहे हैं अपनी किताब से, तो उनको उसका सिला मिलेगा और न उनको किसी तरह का खौफ होगा। लेकिन जो लोग हक को समझने की कोशिश कर रहे हैं, भले ही किसी भी किताब से, तो उनको न किसी किस्म का खौफ होगा और न वो गमनाक होंगे।

Quran.5.69

Surely, be they of those who declare faith (the Community of Mohammad), or be they of those who are the Jews or the Sabaeans or the Christians (or of another faith) – whoever truly and sincerely believes in God and the Last Day, and does good, righteous deeds – they will have no fear, nor will they grieve.

यहां भी वही बात कही जा रही है कि चाहे वो साबियंस हों, चाहे यहूदी हों, चाहे ईसाई हों, चाहे किसी और फेथ पर हों, यानी हिन्दू हों, जो भी सच्चाई के साथ, दिल से, अल्लाह पर यकीन रखेगा, आखिरी दिन पर ईमान रखेगा, अच्छे कर्म करेगा, उसको न कभी कोई डर होगा और न ही अफसोस होगा।

Whoever का लफज़ इस्तेमाल हुआ है। कोई भी, जो भी। भले ही किसी भी धर्म का मानने वाला हो। अच्छे कर्म करना जरूरी है, रूहानियत की राह पर चलना जरूरी है। अगर मुसलमान अच्छे कर्म नहीं करते तो उनके लिए भी सजा है जज़ा नहीं है। कुरान कह रहा है कि हर मज़हब पर चलने वाले के लिए यही मामला है।

Quran.6.6

See they not how many a generations before them We have destroyed, whom We had established in the earth (to the extent to) which We had not got established you (till now), and We sent the clouds to rain abundantly upon them, and WE made the rivers flow beneath (their dwellings) and yea We destroyed them for their sins and raised up after them another generation. And had We sent down unto thee a book written on a paper, and they had touched it with their hands, surely those who disbelieved had said, “This is not but obvious sorcery.” And they say, “Why has not an angel been sent down unto him?” And had We sent down an angel the matter would certainly have been decided (once for all) and then they would not have been respited, And had We made him an Angel, We would have certainly made him a man, and We would certainly have made confused to them what they (now) make confused. And certainly were mocked (many) apostles before thee but that which they mocked at encompassed the scoffers among them.

कहा जा रहा है कि हम ने किताब भेजी और तुम्हारे बीच पैगम्बर भेजे, लेकिन तुम उनका मज़ाक उड़ाते रहे। हम चाहते तो किसी फरिश्ते को भी तुम्हारे बीच भेज सकते थे, लेकिन अगर फरिश्ता भी भेजते तो वो भी तो इंसान की ही शकल में भेजते। और हम उस समय भी तुम को कंफयूज ही रख छोड़ते क्योंकि हक को हमें तुम्हें नहीं पहचनवाना है बल्कि तुम को अपनी अकल से पहचानना है और जुलमत यानी तमस की तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी अकल से हक को पहचानना है।

Quran.6.20

Those whom We have given the Book recognize him (Mohammad) as they recognize their (own) sons; (yet) those who have lost their selves, they will not believe.

वो लोग जिन्हें हम ने किताब दी, उसको वैसे ही पहचानते हैं जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं।

हर किताब कह रही है कि हिदायत किसी और की तरफ है। हम को कोशिश करनी है, सच्चे दिल से, और राह दिखाने वाला वो है, वो हमें खींच लेगा।

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