इंसान घाटे में है
भाग 1 में आप ने देखा कि कैसे जुलमत यानी डेमोनिक या तमसिक ताकतें हर वह काम करने की ओर इंसान को प्रेरित करती हैं जिसको करने से नूर के नुमाईदों यानी अवतारों यानी रसूलों और डिवाईन किताबों में मना किया गया है और इस प्रकार मोक्ष प्राप्ति के लिए जो कुछ करने को कहा गया उससे दूर खींचने के लिए अपनी तमाम कोशिशें लगाए रहती हैं।
पुस्तिका के पहले ही पेज पर दी गई फोटो के माध्यम से, जिसमें ऐसा संदेश देने की कोशिश थी जैसे दी गई फोटो अवतार मौहम्मद की हो, हम ने दिखाया कि वह फोटो जिसमें अवतार मौहम्मद को हाथ में शराब का जाम लिए और पास में शराब की सुराही दिखाई गई है झूठ पर आधारित है क्योंकि अवतार मौहम्मद ने अपनी तमाम ज़िंदगी में कभी भी शराब को हाथ नहीं लगाया।
अब आगे बढ़ते हैं और पुस्तिका में दिया गया संक्षिप्त परिचय थोड़ा-थोड़ा पढ़ते हैं। वह लिखते हैंः
‘दुनिया भर में पिछले 25 सालों में हज़ारों मुसलमान आतंकवादी हमले हो चुके हैं, इन हमलों में लाखों निर्दोष गैर-मुसलमानों और मुसलमानों की जान ली गई है। मनुष्यों का क़त्लेआम करने वाले कोई जंगली जानवर या राक्षस नहीं थे बल्कि इन्हें मुसलमान धर्म के मानने वाले जाहिल, ज़ालिम इंसान रूपी जानवरों के नाम से जाना जाता है, जिन्होंने इस तरह के नरसंहार किए।’
इसमें तो शक नहीं कि आतंकवाद एक बड़ी समस्या है। इसमें भी कोई शक नहीं कि पिछले 2 या 3 दशकों में आतंकवाद का शब्द मुसलमानों से जुड़ गया है। दुनिया भर में हुई अनेक आतंकवादी वारदातों में मुसलमानों का रोल सामने आया है। आतंकवाद को कुरान और अवतार मौहम्मद से जोड़ने वाले भूल जाते हैं कि कुरान साफ शब्दों में कह रहा है कि जो कोई भी किसी निर्दोष इंसान को क़त्ल करता है उसका यह कर्म पूरी इंसानियत को क़त्ल करने के बराबर है।
Quran.5.32:
Whosoever kills a human being without (any reason like) killing in lieu of murder, or corruption on earth, it is as though he had killed all mankind...
साफ है कि जो कोई भी निर्दोष इंसानों को मारता है, उसका धर्म से कोई रिश्ता नाता नहीं हो सकता पर ये इंसानों का नरसंहार करने वाले ऐसे हैं जो अपने को मुसलमान कहते हैं।
हमको समझना होगा कि धर्म वह नहीं हो सकता जो मारकाट सिखलाए या बेगुनाहों को क़त्ल करना बतलाए। धर्म तो अपनी इंद्रियों को अन्दर की ओर समेटना सिखाता है। धर्म तो दुनियावी चाहतों से कट कर रूहानी तरक्क़़ी की राहों पर इंसान को डालता है। धर्म तो सत्य, इंसाफ और हक़ की राह में कुरबानी देना सिखलाता है। फिर कोई तो कारण है कि धर्म के नाम पर आज हिंसा में बढ़ौतरी होती जा रही है।
आज हम कलियुग में जी रहे हैं जब अधिकांश आत्माओं को किसी न किसी बीमारी ने जकड़ रखा है, जिसके कारण वे निजात यानी मोक्ष पाने के लेवल तक पहुंचने से कोसों दूर हैं। किसी में गुस्सा है, किसी में लालच है, किसी में ईष्र्या है, किसी में कुर्सी का मोह तो किसी की आंखों में दौलत का नशा है। कोई नशे का आदी है तो कोई वासना का भूखा है। यदि यह सब नहीं भी है, तो केवल कुछ रस्मों को निभा लेने को धर्म समझते हैं। मंदिर का घंटा बजाना है, पूरी सब्ज़ी का भोग सजाना है, रोज़े के नाम पर दिन भर भूखा रहना है, या लंबी दाढ़ी और सिर पर टोपी लगा कर घूमना है। कोई हिन्दु होने पर गौरान्वित है तो कोई मुसलमान होना फख़र की बात समझता है। लेकिन अधिकांश रूहानी तरक़्क़ी की राह से कोसों दूर हैं। रूह पस्ती की दलदल में फंसी है। जुलमत या शैतानी वस्वसों का शिकार है। इस सब का क्या लाभ यदि रूह पाकीज़गी के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ रही। यदि कैरैक्टर की बुराईयां अच्छाईयों में नहीं बदल रहीं।
मोक्ष यानी निजात पाने के लिए दो चीज़ें आवश्यक हैं, एक तो उस मार्ग की सही पहचान जिस पर चलकर मोक्ष यानी निजात मिल सकती है, उस पथ का मार्गदर्शन करने वाले पथ प्रदर्शकों की पहचान, और अंतः उस मार्ग पर चलना, आगे ही बढ़ते जाना। रूह को पाक करते हुए नूरानी रूहों यानी दिव्यात्माओं से क़रीब करते जाना, आत्मा को परमात्मा के करीब करते जाना।
दिल पर हाथ रख कर बताईए, हिन्दु हो या मुसलमान, ईसाई हो या यहूदी, कितने लोग इस मार्ग पर चल रहे हैं। गांव में फल सब्ज़ी बेच कर अपना पेट भरने की कोशिश करने आए व्यक्ति की आईडी देख कर उसको गांव में दाखि़ले पर पाबंदी लगाने से धर्म तो साबित नहीं होता, पीट पीट कर किसी को मौत के घाट उतार देने से भी धर्म साबित नहीं होता, अल्लाहो अकबर कहते हुए किसी का गला काट देने से या किसी को गोली मार देने से भी धर्म के मार्ग पर कोई आगे नहीं बढ़ता, बल्कि धर्म रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ना और चलना सिखलाता है, धर्म अपने को खुदा के आगे नत्मस्तक होने के साथ उसके क्रिएशन जिसमें, इंसान, पशु, पेड़ पौधे शामिल हैं, उनके हित की कोशिश में लगे रहना सिखलाता है।
इस्लाम हर व्यस्क मुसलमान पर फर्ज़ करता है कि वह दिन में पांच बार अपने रब की पूजा अर्चना करे। अवतार मौहम्मद ने नमाज़ को मुसलमान की मेराज बताया यानी वह कर्म जिससे इंसान की रूह आसमानों की मंज़िलों तक पहुंच कर उसके रब से मिल जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि तुम देखना चाहते हो कि तुम्हारी नमाज़ कुबूल हुई तो यह देखो कि नमाज़ के बाद तुम में कोई अच्छाई पैदा हुई कि नहीं। यानी इस्लाम चाहता है कि दिन की हर नमाज़ के बाद मुसलमान में अच्छाई में बढ़ौतरी होती रहे।
नमाज़ के कारण अच्छाई कब और कैसे पैदा होगी? तब जब आत्मा का उस परमात्मा से जुड़ाव बनेगा। जैसे यह जुड़ाव बना, तुम्हारी आत्मा पाकीज़गी की मंज़िल पर कुछ आगे बढ़ेगी। आत्मा पाकीज़गी की मंज़िल पर कुछ आगे बढ़ी तो तुम स्वयं अपने चरित्र में अच्छाई उजागर होते देखोगे। ऐसे ही हर नमाज़ में यदि तुम्हारी आत्मा पाकीज़गी के लेवल पर आगे बढ़ती रही तो तुम बेहतर और बेहतर इंसान बनते जाओगे। दो नमाज़ों के दरमियान जब तुम अन्य इंसानों से मेल जोल रखोगे तो एक बेहतर इंसान बन कर।
ग़ौर कीजिए, कुरान अहललबैत यानी दिव्यात्माओं को perfectly pure बता रहा है; उपनिषद भी उनको पाक तत्वों से बना बता रहे हैं। यह रूहानी पाकीज़गी की वह मंज़िल है जहां बुराई पहुंच नहीं सकती। ऐसी पाक हस्तियों के चरित्र को यदि कोई बुराई के साथ पेश करे तो उसकी आत्मा के तार कहां से जुड़े हैं, आप स्वयं आकलन कर सकते हैं।
आज यदि मुसलमानों के चरित्र पर उंगली उठ रही है तो हमें समझना होगा कि उनका अपने रब से जुड़ाव नहीं बन पा रहा; वे भले ही नमाज़े पढ़ रहे हैं लेकिन उनकी आत्मा का परमात्मा से संबंध नहीं बन पा रहा, तमस यानी जुलमत उनकी आत्मा को ऐसे वश में किए है कि वह आगे नहीं बढ़ पा रही। यदि मुसलमान बुराईयों में घिरे दिखाई दे रहे हैं तो इसका अर्थ साफ है कि उन्होंने उन perfectly pure हस्तियों से नाता नहीं जोड़ा जो उनकी बेहतरी का मार्ग बताने हेतु आई थीं। वे अवतार मौहम्मद का नाम तो ले रहे हैं लेकिन उनके दीन से कोसों दूर हैं।
मुसलमान भी कलियुग में उतना ही धर्म से दूर हैं जितना अन्य। शायद ज़्यादा, क्योंकि मारकाट करते तो यही दिखाई देते हैं। यह होना भी था। क्योंकि अवतार मौहम्मद ने अपनी जिंदगी में ही बतला दिया था कि मैं तुम्हारे दरमियान दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक अल्लाह की ओर से आई किताब और दूसरे अहललबैत यानी वेद की दिव्यात्माएं, यदि तुम इन से जुड़ाओ बनाए रखोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे।
Sahih Muslim. Hadith 2408:
I am leaving behind two things the book of Allah and the Ahlulbayt, you will never go astray as long as you hold fast onto them.
अहललबैत के बिना कुरान समझना भी मुमकिन नहीं था। मुसलमानों ने कुरान को तो पकड़ा लेकिन अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के पश्चात अहललबैत से ऐसी दूरी बनाई कि 30 साल के भीतर न सिर्फ अहललबैत को हर मस्जिद से बुरा भला कहने की प्रथा शुरू हो गई बल्कि अहललबैत से मिलने वालों को, रिश्ता नाता रखने वालों को प्रताड़ित करना भी प्रारंभ हो गया था। अहललबैत के दोस्तों को न केवल क़त्ल किया जाता था बल्कि उनके बीवी बच्चों को गुलाम बना लिया जाता था, उनका माल सरकारी ख़ज़ाने मे जमा करा दिया जाता था। अवतार मौहम्मद के जाने के 50 साल होते होते जुल्म इस इंतेहा तक पहुंचा कि अहललबैत हुसैन को उनके साथियों सहित तीन दिन का प्यासा शहीद कर दिया गया। अहललबैत का दामन छोड़कर मुसलमान रूहानियत के मार्ग से दुनिया परस्ती के मार्ग पर लग गए थे।
फिर यह कहना कि मुसलमान अवतार मौहम्मद के दीन पर हैं कहां तक सही है? ये उतने ही दुनियापरस्त हैं जितने कि दूसरे। यदि कुछ लोग दीन पर चल भी रहे हैं तो उनके ऊपर ऐसे लोग हाकिम बैठे हैं जो इस्लाम की गलत छवि दुनिया में फैला रहे हैं। इन लोगों के दीन पर चलने से उनका निजी हित तो हो रहा है लेकिन इस्लाम की छवि पर कोई असर नहीं पड़ रहा। इनको इस्लाम की छवि की चिंता भी नहीं; इन्होंने यह ग़लत धारणा बना रखी है कि हमें उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं, अल्लाह बड़ा कारसाज़ है। यह भूल जाते हैं कि अल्लाह ने हिदायत दी तो भी किसी इंसान के माध्यम से, दीन फैला तो भी अनेक इंसानों ने कुरबानियां दीं, और यदि इस्लाम की छवि बेहतर बनाना है तो भी मुसलमानों को ही उसके लिए कोशिश करना होगी।
इस सब का एक और पहलू भी है। हिलैरी क्लिंटन का वक्तव्य सब के सामने है कि अलक़ाएदा को खड़ा करने में हमारा हाथ है। सब को पता है कि ओसामा को किस ने इतना ताक़तवर बनाया कि वह अपने आक़ाओं के ही खि़लाफ युद्ध पर उतर आया। मिडिल ईस्ट में तेल के ज़ख़ीरों पर क़ब्जा करने में पश्चिमी देशों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आज भी कितने मुस्लिम देश हैं जिनमें तेल के कुओं पर विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा है और लाभ के नाम पर उन देशों को थोड़ी बहुत रायलटी मिलती है। इन देशों पर अपना कब्ज़ा जमाने या जो देश इनके आगे नतमस्तक नहीं हो रहा, उसको झुकाने के लिए इन्होंने न जाने कितने खूनी खेल खेले। आज आतंकवादी घटनाएं इसलिए भी अधिक हो रही हैं क्योंकि आईडी और गोरिल्ला वारफेयर के दौर में कमज़ोर को बम फोड़ देने या छिप कर हमला करने के अतिरिक्त सामने आकर लड़ने की हिम्मत नहीं। हालांकि इस्लाम इस प्रकार के वारफेयर की इजाज़त नहीं देता जिसमें निर्दाेष लोग मारे जाएं, या नान-कामबेटेंट की मौत हो।
सवाल ये उठता है कि यदि यहूदी या ईसाई देश किसी दूसरे देश के रिसोर्सेज़ पर कबजा करने के लिए कोई कारवाई करते हैं तो क्या उन्हें ईसाई या यहूदियों का युद्ध नाम दिया जाता है? लेकिन यदि उस अलक़ाएदा या ओसामा बिन लादेन से, जिसको इन्होंने ही लड़ने के काबिल बनाया, उससे लड़ने कुछ मुस्लिम संगठन खड़े हो जाते हैं तो यह धर्म युद्ध ठहराया जाता है।
1788 में जब पहली बार यूरोपियन सैटलर्स ने आस्ट्रेलिया की धरती पर क़दम रखा तो वहां लाखों एबोरिजीन्स रह रहे थे। यूरोपियन ईसाई वहां पहुंचे तो उन्होंने ऐसे हालात पैदा किए कि हज़ारों बीमारियों से मारे गए, अन्य हज़ारों को इन्होंने बड़ी बेदर्दी से मार डाला। 1920 में जब ये मारकाट रूकी तो आस्टेªेलिया में कुल 60000 एबोरिजीन्स रह गए थे। आज तक़रीबन पूरा आस्ट्रेलिया ईसाई है। तो क्या हम इसको ईसाई टैरररिज़्म कहने का साहस कर सकते हैं?
इसी प्रकार जब यूरोपियनस ने पहली बार अमरीका की धरती पर कदम रखा तो एक एस्टीमेट के अनुसार 1491 में 145 मिलियन रेड इंडियंस अमरीका की धरती पर रहते थे। बीमारी, गुलामी, रेप और युद्ध से झूझने के बाद 1691 तक, मात्र 200 वर्षों में, इनकी संख्या 90 से 95 प्रतिशत घट चुकी थी, और करीब 130 मिलियन लोग घट चुके थे। यदि यूरोपियंस सारी दुनिया पर राज करने में कामयाब हुए तो उसका बड़ा कारण अमरीका के रेड इंडियंस का क़त्ल करके वहां के resources पर क़ब्जा करना था। यदि 200 वर्षों में जनसंख्या में 130 मिलियन रेड इंडियंस की कमी आई तो इसका यह अर्थ नहीं कि 130 मिलियन ही मारे गए। इस दौरान जितने नए बच्चे पैदा हुए होंगे, उनकी संख्या का विवरण किसी के पास नहीं है। आज पूरे अमरीका में ईसाईयत का बोलबाला है। यदि रेड इंडियंस इस हालत में बचे होते कि इतिहास लिखने पर उनका वश होता तो इससे बड़ा आतंकवाद क्या हो सकता था?
अंग्रेज़ों की गुलामी के क़रीब 200 वर्षों में और आज़ादी मिलने तक ब्रिटिश पालिसीज़ के तहत भारत में बीमारियों, भुखमरी और गरीबी से कितने लोगों की जानें गईं, कोई नहीं बता सकता। यह भी किसी से छिपा नहीं कि युरोपियन ईसाई भारत में अपना धर्म फैलाने में लगे थे। फिर भी हम इसको आतंकवाद का नाम नहीं देते। कोई सिरफिरा मुसलमान यदि अपनी जान देकर दूसरों को मार देता है तो इसका दोष इस्लाम पर रख देते हैं। जबकि मुसलमानों में भी हर प्रवृत्ति के लोग है। ठीक वैसे जैसे दूसरे धर्मों में हैं। अधिकतर लोगों तक सही धर्म छू कर भी नहीं गया है।
पुस्तिका का लेखक यदि इतनी समझ रखता तो इन बातों पर विचार करता। अन्यथा कुछ लोगों से विमर्श करता। पर वह ऐसा क्यों करने लगा? वह आगे लिखता हैः
‘मुस्लिम आतंकवाद एक जटिल समस्या है। जिसका समाधान सिर्फ और सिर्फ इनके घिनौने और डरावने ज़ालिमाना विचारों को बदल कर और इंसानियत का पाठ पढा कर ही किया जा सकता है। और इसके लिए इन्हें अल्लाह, रसूल और कुरान-ए-मजीद से दूर करना होगा, छोटे मुसलमान बच्चों को मदरसों की शिक्षा से दूर करना होगा, कुरान में दी गई शिक्षा के कारण मुसलमान अपनी सफलता को आतंकवाद के हथियार से नापता है।’
लेखक न जाने किन लोगों के बीच रहता है कि वह कह रहा है कि मुसलमान अपनी सफलता को आतंकवाद के हथियार से नापता है। अधिकांश मुसलमान भी औरों की तरह मेहनत मज़दूरी करके अपने परिवार के लालन पालन में व्यस्त है। क्या कारण हैं इसमे हम नहीं जा रहे लेकिन सच्चर कमिशन और अन्य रिपोर्टस बता रही हैं कि मुसलमान औरों से अधिक ज़्यादा छोटे कामकाज में लगा है। उसकी आमदनी देश की per capita income से ख़ासी नीचे है और उसका रहन सहन, खर्च करने की कैपैसिटी भी औरों से कम है।
मुसलमान के लिए यदि सफलता का कोई पैमाना है तो वह यह कि उसने अपनी अगली जिं़दगी के लिए क्या कुछ कर्म जमा किया है। और इसमें सबसे आवश्यक है कि वह इस सृष्टि के एकमैव क्रिएटर को माने, उसकी इबादत करे और उसकी याद दिल में रखते हुए अच्छे कर्म करे। यही कुरान की शिक्षा है और ऐसी अच्छी कर्म प्रधान ज़िन्दगी जीने की कुरान हर मुसलमान से अपेक्षा रखता है। हमें समझना होगा कि खुदाई मार्ग का हर परस्तार कर्म प्रधान जिंदगी जीने की बात करता है।
देखिए, केवल कुछ आयतें कुरान से।
Quran.Surah Al Kahf.18.107:
Indeed, those who have believed and done righteous deeds, they will have the Gardens of Paradise for their entertainment
उस सारी सृष्टि के एक क्रिएटर पर ईमान लाना और अच्छे कर्म करना, इसी के फलस्वरूप इनाम के रूप में उन्हें स्वर्ग के बाग़ों में स्थान मिलेगा।
और यह इनाम हर किसी के लिए है जो एक खुदा में विश्वास रखता है और उसकी याद में अच्छे कर्म करता है। कृष्ण भी यही कह रहे हैं जब वह गीता में सात्विक, रजसिक और तमसिक गुणों में किए गए कर्माें का अंतर समझा रहे हैं। सात्विक कर्म ही righteous deeds हैं, अमेलुस सालेहात हैं, जिनकी कुरान जगह जगह बात कर रहा है।
Quran.Surah Al Baqarah.2.82:
And those who believe (in the Oneness of Allah) and do righteous deeds, they are dwellers of Paradise, they will dwell therein forever.
एक और आयत देखिए! एक खुदा के मार्ग को जानने वाला ही सात्विक कर्म करेगा। जो उस सत्य मार्ग को नहीं पहचानता, उसके कर्म सात्विक नहीं हो सकते, यह गीता से साबित है। यह ईमान रखते हुए यदि कोई अच्छे कर्म कर रहा है, तो वही स्वर्ग में जगह पाएगा, जहां वह हमेशा हमेशा के लिए स्थान पाएगा।
हमेशा के लिए स्वर्ग में वही रहेगा, जिस ने मोक्ष यानी निजात यानी salvation को पाया। क्योंकि जिसने मोक्ष यानी निजात यानी salvation को नहीं पाया, वह तो गीता के अनुसार फिर से वापिस दुनिया में भेज दिया जाएगा।
Gita.IX.29:
I (regard) all beings equally. To Me there is none hateful or dear. They however who worship with devotion, they are in Me and I too am in them.
Gita.IX.30:
Even if one of very evil actions should worship Me with a devotion exclusive of all else, he should be accounted to be good all the same merely by the fact that he has a properly settled determination.
इबादत ऐसी कि उसमें कोई और शरीक न हो (a devotion exclusive of all else)] यही तो तौहीद है जिसको मुसलमान मानते हैं। भले ही उस व्यक्ति के अन्य कर्म कितने ही खराब क्यों न हों, यदि वह केवल और केवल उस एक रब की इबादत कर रहा है तो वह हमेशा का जीवन पाएगा।
जो उस रब की इबादत में किसी और को शरीक कर रहा है, उसको ही मुसलमान मुश्रिक कहते हैं। गीता भी मुश्रिकों की बात कर रही है और कहती है कि बस एक खुदा की याद और इबादत में रमे रहने वाला व्यक्ति ही हमेशा की ज़िन्दगी पाएगा; ऐसे व्यक्ति के कर्म बुरे क्योंकर हो सकते हैं?
यदि आप अपने जीवन में सात्विक मूल्य रखते हैं, यदि आप ने अपनी आत्मा को जुलमत यानी तमस के हवाले नहीं कर दिया है तो कम से कम खुदा की इबादत करने वालों की इबादत में अवरोध तो न डालें, भले ही वह उस खुदा को किसी भी नाम से क्यों न याद कर रहा हो। बल्कि आप को चाहिए कि आप स्वयं, अपने अपने तरीक़े से, उस एक खुदा की इबादत और भक्ति में अपने को लीन कर दें।
Gita.IX.31:
Instantaneously he becomes established in his own right nature and enters into eternal peace. Believe Me in all confidence, O Son of Kunti (Arjuna), that one affiliated to me with fidelity knows no destruction.
Eternal peace की बात हो रही है यानी हमेशा हमेशा के लिए शांति, ठीक वैसे जैसे कुरान स्वर्ग में हमेशा हमेशा के लिए रहने की बात कर रहा है।
Gita.IX.20-21:
Knowers of the three (Vedas), soma-drinkers, purified from sin, worshipping by sacrifices, pray of Me the way to heaven; they, attaining the holy world of Indra (Lord of devatas) enjoy divine feasts in heaven.
They, having enjoyed that expansive heaven-world, then on their merit exhausted, they enter the world of mortality, thus conforming to the righteous notions implied in the three (Vedas), desiring desirable objects they obtain values which come and go.
ज़रा गौर करें, गीता भी जहां एक ओर कुछ लोगों के लिए eternal peace की बात कर रही है, यानी स्वर्ग में हमेशा की ज़िंदगी की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ दूसरों के लिए कह रही है कि इन्हें इंद्र के स्वर्ग में पहुंचाया तो जाएगा, वहां की ज़िन्दगी भी उनको मिलेगी, वहां बेहतरीन दावतें भी उनके सामने पड़ौसी जाएंगी, पर जब उनके कर्मों का फल समाप्त हो जाएगा, तो उनको फिर से इस दुनिया में एक बार फिर परीक्षा के लिए भेज दिया जाएगा।
गीता के मानने वालों के लिए आवश्यक है कि इस अंतर को समझें। एक ओर स्वर्ग में जा कर अगली दुनिया में फिर से वापसी की बात हो रही है तो दूसरी ओर हमेशा की शांति यानी स्वर्ग में हमेशा की रिहाईश की बात हो रही है। अन्तर आप स्वयं समझ लेंगे!
भले ही कोई व्यक्ति हमारी नज़र में बहुत बुरा है, यदि उसने Divine Creation Plan को समझते हुए एक रब की भक्ति और इबादत की, और उस एक रब की इबादत में किसी दूसरे को शरीक नहीं किया, तो वह हमेशा के लिए स्वर्ग में शांति का जीवन व्यतीत करेगा। लेकिन यदि कोई तीनों वेदों को जानता है, यानी देवताओं को पहचानता है जिनका उल्लेख वेदों में किया गया है, अपने को गुनाहों से बचाए रखता है, पूजा भी करता है, स्वर्ग में जाने की न केवल कामना रखता है बल्कि दुआ भी यही मांगता है, लेकिन देवताओं से आगे बढ़ कर अपनी इबादतों को एक खुदा तक नहीं पहुंचाया, या उस एक के बराबर अन्यों को शरीक किया, तो उसको इंद्र के स्वर्ग में भेजा तो जाएगा क्योंकि उसने अच्छे कर्म किए हैं, वहां की तमाम एनजाएमेंट और डिवाईन भोज भी उसके सामने पड़ौसे जाएंगे, पर जब उसको उसके कर्मों का हिसाब मिल चुकेगा तो उसे वापिस अगली दुनिया में भेज दिया जाएगा।
आप ने देखा, गीता भी इंद्र के स्वर्ग का उल्लेख कर रही है जहां हमको वह शांति मिलेगी जो हमेशा के लिए होगी और हदीसें अवतार मौहम्मद के स्वर्ग की बात करते उसे स्वर्ग में सब से बेहतरीन स्थान बता रही हैं। इंद्र ही मौहम्मद हैं, ऐसा मैंने अनेक सबूतों से दिखाया है।
आईए, कुछ और आयतें देखते हैं कि जिसमें कुरान अच्छे कर्म करने की बात कर रहा है।
Quran.Surah Al Imran.3.57:
And as for those who believe (in the oneness of Allah) and do righteous deeds, Allah will pay them their reward in full. And Allah does not like the Zalemeen.
साफ कहा जा रहा है कि जो ईमान रखता है और अच्छे कर्म करता है, अल्लाह की ओर से उनको पूरा इनाम मिलेगा। शर्त यह है कि एक खुदा पर यक़ीन रखते हुए कर्म करे। ठीक यही गीता भी कह रही है। और कहा जा रहा है कि अल्लाह जुल्म करने वालों को पसंन्द नहीं करता। जो इस सृष्टि के एक रब के साथ दूसरों को जोड़ते है या बुरे कर्म करते हैं वे ज़ालिम हैं।
जुल्म की असली परिभाषा होती है किसी चीज़ को उसके अस्ल स्थान से हटाना। किसी चीज़ का असली स्थान कुछ है और आप उसको कहीं और रख दें तो यह उसके साथ जुल्म है। इस दुनिया के क्रिएटर के लिए यह आवश्यक है कि वह अदालत करने वाला हो, और जो कोई भी अदालत नहीं करेगा, वही ज़ालिम होगा। कुरान भी साफ शब्दों में कह रहा है कि तुम देखोगे कि हर किसी को उसके कर्मों का बिलकुल ठीक ठीक हिसाब देना होगा, क्योंकि अल्लाह ज़ालिम नहीं है। उसने हर जगह सिस्टमस बनाए हैं तो यहां भी सिस्टमस है।। जो भी उसकी याद मन में रखते हुए कोई कर्म करेगा, भले ही किसी भी सोच का मानने वाला हो, उसकी आत्मा पाकीज़गी के मार्ग पर आगे अवश्य बढ़ेगी और जिस किसी को भी डेमोनिक यानी तमसिक ताकतें अपने वश में ले लेंगी, वह दुनिया में गर्क होते हुए बुराई की राहों पर गिरा चला जाएगा, भले ही वह किसी मंदिर का पुजारी हो या मस्जिद का इमाम हो।
जिस प्रकार गीता ने एक खुदा की याद रखते हुए कर्म करने को स्वर्ग में हमेशा रहने से जोड़ा ठीक वैसे ही कुरान भी एक खुदा पर ईमान रखते हुए अच्छे कर्म करने को स्वर्ग में हमेशा रहने से जोड़ रहा है। कहा जा रहा है कि अल्लाह ने जो वादा कर लिया वह सच्चा है और किस का वक्तव्य अल्लाह से अधिक सच्चा हो सकता है?
Quran.Surah An Nisa.4.122:
But those who believe (in the Oneness of Allah-Monotheism) and do deeds of righteousness, We shall admit them to the Gardens under which rivers flow (i.e. in Paradise) to dwell therein forever. Allah’s Promise is the Truth; and whose words can be truer than those of Allah? (of course, none).
सूरह 103 की तीसरी आयत भी अच्छे कर्म को यक़ीन के साथ जोड़ रही है। यह यक़ीन होगा एक क्रिएटर पर और उसके क्रिएशन प्लान पर जिसमें उसके द्वारा हिदायत के लिए भेजे गए नुमाईंदे और उस तक पहुंचने के पथ की पहचान भी शामिल है। इसपर यक़ीन रखते हुए अच्छे कर्म करने की बात हो रही है। एक दूसरे को अच्छाई के मार्ग की सिफारिश करने, बुराई के मार्ग से बचने और उसके मार्ग पर चलने वालों से सब्र करने की नसीहत दी जा रही है।
Quran.103.3:
Except those who believe and do good, righteous deeds, and exhort one another to truth, and exhort one another to steadfast patience (in the face of misfortunes, and suffering in God’s way, and in doing good deeds, and not committing sins).
शब्द ‘सब्र’ के उर्दू में जो मायनी समझे जाते हैं वह यह कि इंसान रोए नहीं और आंसू न बहाएं। लेकिन सब्र के अस्ल मायनी यह हंै कि मुझे किसी को धोका दे कर दौलत मिल रही हो, और मैं उसको लेने से बचूँ, मुझे कोई औरत बड़ी हसीन लग रही हो और मैं इसलिए उसकी ओर निगाह न करूँ कि वह रिश्ता जाएज नहीं, मुझे सत्यमार्ग पर चलने में कठिनाई दिख रही हो लेकिन मैं फिर भी उस मार्ग पर चलूँ। सब्र यह भी हो सकता है कि यदि सत्यमार्ग पर चलने से मुझ पर कुछ परेशानियां आएं, कोई मुझे तकलीफ दे या ज़ख़्म दे, तो भी सत्यमार्ग पर चलते रहने में ही बेहतरी समझूं और उस मार्ग पर अडिग रहूँ।
एक और आयत कहती हैः
Quran.Surah Al Kahf.18.110:
Say (O Mohammad):” “I am only a man like you. It has been revealed to me that your Illah (God) is One Illah (The God –i.e. Allah). So whoever hopes for the meeting with his Lord let him work righteousness and associate none as a partner in the worship of his Lord.”
साफ कहा जा रहा है कि जो कोई भी अपने रब से मिलने का इच्छुक है उसे अच्छे कर्म करते रहना चाहिए और सृष्टि के रचयिता के बराबर किसी और को नहीं ठहराना चाहिए।
यदि आप ने इतिहास पढ़ा है तो आपने देखा होगा कि कितने ही लोग ऐसे गुज़रे हैं जो गुरूर और घमंड में इस हद तक बढ़ गए कि खुदा की इबादत ही त्याग दी। कितने ही लोग जिनको थोड़ी बहुत ताक़त मिल गई वे अपने को खुदा ही समझने लगे, यहां तक कि दूसरों को मौत और जिंदगी तक देना अपने हाथ में समझ बैठे। जो लोग अवतार मौहम्मद पर आरोप लगाते हैं कि कुरान उनकी अपनी लेखनी है वे देखें कि कुरान में मौहम्मद से खिताब हो रहा है कि ‘कहो कि मैं तो तुम्हारी तरह ही आम इंसान हूँ। और मुझे ये पैगाम दिया गया है कि तुम्हारा खुदा ही एकमात्र खुदा है जिसको हम अल्लाह कहते हैं।’ यानी जिस को तुम स्वयं अवतार मौहम्मद की किताब बोलते हो, उसी किताब में अनेक स्थानों पर उनके अल्लाह का बंदा और रसूल होने की बात हो रही है; कहीं पर तो उनके रोज़ाना के किए गए कर्मों पर सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी भी हो रही है। यदि कुरान स्वयं उनकी लिखी पुस्तक होती तो क्या वह अपने किसी कर्म पर नकारात्मक टिप्पणी करते?
उदाहरण के लिए यह आयत देखेंः
Quran.33.37:
(Remember) when you (O Messenger) said to him whom God has favored (with guidance to Islam and close companionship with the Prophet), and whom you have favored (with kind treatment, special consideration, and emancipation): “Retain your wife in marriage and fear God (concerning your treatment of her). “ You were hiding within yourself what God (had already decreed and) would certainly bring to light: you were feeling apprehensive of people (that they might react in a way harmful to their faith), while God has a greater right that you should fear Him (lest you err in the implementation of His commands). So, when Zayd had come to the end of his union with her (and she had completed her period of waiting after the divorce), We united you with her in marriage, so that there should be no blame (or legal impediment) for the believers in respect of (their marrying) the wives of those whom they called their sons (though they really were not), when the latter have come to the end of their union with them. And God’s command must be fulfilled.
आयत 18.110 से साफ है कि यदि तुम किसी एक खुदा के कानसैप्ट में यकीन रखते हो, जो तमाम सृष्टि की रचना करने वाला है, उसको किसी भी नाम से पुकारते हो, वही मुसलमानों का अल्लाह है। यह है कुरान का मैसेज! यदि मदरसे में पढ़ रहे मुसलमान अल्लाह को ऐसे पेश करने लगें कि हम मुसलमानों का अल्लाह ही सच्चा खुदा है, तो यह उन मुसलमानों की गलती हुई, क्योंकि कुरान तो साफ कह रहा है कि जिस एक को तुम खुदा कह रहे हो, वही हमारा अल्लाह है। शर्त यह है कि सृष्टि के रचियता को एक जानो और उसके बराबर किसी को न ठहराओ।
इंसान के मार्गदर्शन के लिए आसमान से अवतरित होने वाली पहली किताबें वेद हैं; इनमें भी एक सर्वशक्तिमान का वैसे ही उल्लेख है जैसे कुरान में दिया गया है। अफसोस कि इन वेदों के मानने वालों ने उनको बताई जा रही हक़ीक़तों को भी ठीक ठीक नहीं समझा और इस तरह दो किताबों की दूरियां और अधिक बढ़ती चली गईं।
वेद revealed scriptures हैं यह साबित करने के लिए डाक्टर राधाकृष्ण लिखते हैंः “The Vedas were composed by the seers when they were in a state of inspiration. He who inspires them is God. Truth is impersonal, apauruseya and eternal, nitya. Inspiration is a joint activity, of which man’s contemplation and God’s revelation are two sides. The Svetasvatara Upanishad says that the sage Svetasvatara saw the truth owing to his power of contemplation, tapah-prabhava, and the grace of devata, deva-prasada. The dual significance of revelation, its subjective and objective character, is suggested here.”
आप ने देखा, यदि ऋषियों तक वेद पहुंचे तो उसके पीछे दो कारण थेः तप प्रभाव और देव प्रसाद। तप के माध्यम से जिन ऋषियों ने अपनी आत्मा को पाक किया, इस लेवल तक कि आत्मा पाकीज़की की ऊंचाई तक पहुंच गई, प्रसाद के रूप में देवताओें ने उनके दिमाग़ तक वह ईश्वरीय राज़ पहुंचा दिए जो वे नहीं जानते थे। यह है वेदों के हम तक पहुंचने का राज़। कुरान भी एकदम यही बात करता दिखाई देता है। कहा जाता हैः मौहम्मद कह दो कि मैं केवल तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ। मुझे यह रेविलेशन हुआ है कि तुम्हारा खुदा एक खुदा है। यदि किसी को उस खुदा से मुलाक़ात की इच्छा है तो उसे अच्छे कर्म करने होंगे और उसके बराबर किसी को शरीक नहीं करना होगा।
दिल पर हाथ रखकर बताईए, क्या हर ज़माने में यही सत्यमार्ग नहीं रहा है?
एक लम्हे रूक कर जरा गौर करें! जो लोग गुरूग्राम में या अन्य स्थानों पर उस एक खुदा की उपासना और भक्ति के रास्ते में अड़चन पैदा कर रहे हैं वे दरअस्ल अपने ग्रन्थों में बताए गए खुदा की भक्ति और इबादत में अड़चन पैदा कर रहे हैं जिसकी समझ से और जिसकी इबादत से वे लोग स्वयं बहुत दूर आ चुके हैं।
वेदों के अवतरण का राज़ समझाते हुए ऋषि स्वेतास्वतर ने कहा था कि तप प्रभाव से आत्मा पाक होती है तो देवतागण प्रसाद के रूप में आसमानी राज़ उस आत्मा तक पहुंचा देते हैं। तप प्रभाव और देव प्रसाद के कारण रेविलेशन आए, यानी वह ज्ञान आया जो ईश्वरीय था। और कुरान क्या कह रहा है, ज़रा देखिएः
Quran.Surah Ash-Shura.42.52:
Thus, have We revealed to you O Muhammad, a Spirit (Rooh or Prana or Atma) by Our command: while you did not know what is The Book and what is the Iman (faith)? But We have made it (Spirit or Rooh or Atma) a light [noor] whereby We guide those of Our servants whom We please; and surely you are guiding mankind to the Right Way.
मौहम्मद को न तो किताब की जानकारी थी और न ईमान ही था जब तक कि हमने उनकी ओर स्प्रिट को यानी रूह को यानी आत्मा को नहीं भेजा। हमने इस रूह को नूर बनाया है, जिससे हम हिदायत देते हैं अपने बंदों को, जिनसे हम राज़ी हों, और हे मौहम्मद तुम यकीनन इंसानियत को सही मार्ग पर हिदायत दे रहे हो।
ज़रा ग़ौर कीजिए! कुरान कह रहा है कि रूह को खुदा ने नूर बनाया। यानी वह नूरानी रूह है। नूर है यानी दिव्य है जो शब्द ‘देवता’ का मूल शब्द है। कुरान से भी साफ हो रहा है कि देव-प्रसाद के कारण ही अवतार मौहम्मद पर कुरान अवतरित हुआ और ईमान का मार्ग मिला।
मैं जो जानकारी आप के सामने पेश कर रहा हूँ, क्या आज से पहले किसी ने आप को बताई है, फिर यह इल्ज़ाम कैसे लग सकता है कि अवतार मौहम्मद ने कुरान को लिखा, या अवतार मौहम्मद का खुदा से कोई रिश्ता नहीं था। अनेक राज़ हैं जो अभी खुलना बाक़ी हैं।
वेद और उपनिषद ने इसको देवात्मा शक्ति नाम दिया है। यानी जो दिव्य रूपी यानी नूर भी है और आत्मा यानी रूह भी है। यही कारण है कि मैं देवात्मा शक्ति का अनुवाद नूरानी रूह करता हूँ, जिसको जब अवतार मौहम्मद की ओर भेजा गया, तो उनको किताब का ज्ञान भी हो गया और ईमान भी हो गया। इस से पहले यही नूरानी रूह विभिन्न स्थानों पर तप से पाक किए गए अन्य शरीरों के माध्यम से काम करती रही। क्या ये राज़ आज से पहले कोई भी हिन्दु या मुसलमान जानता था कि जिस दिव्यात्मा शक्ति की बात उपनिषद और वेद कर रहे हैं, जो दिव्य रूपी भी है और आत्मा रूपी भी, उसके बारे में ही कुरान कह रहा है कि वह रूह भी है और नूर भी।
यही बात करते हुए कुरान एक दूसरे स्थान पर आसमानी आयतों के अवतरित होने का विवरण देते हुए कह रहा हैः
Quran.16.102:
Say, “The holy spirit has brought it down from your Lord with the truth to reassure the believers, and as a guide and good news for those who submit to Allah.”
होली स्प्रिट के माध्यम से आयतें आईं जो कि नूर है। यही देवप्रसाद है जिसकी बात उपनिषद कर रहा था। यह आयतें आईं हिदायत और अच्छी ख़बर के रूप में उनके लिए जो अल्लाह के आगे अपने को समर्पित करते हैं यानी उनके लिए जो तप करते हैं ताकि आत्मा बेहतरी के मार्ग पर अग्रसर हो।
इसी तप की बात गीता कह रही है जब कहा जाता हैः
Gita.IX.32:
They too who resort to Me for refuge, O Partha (Arjuna), whoever they might be, (whether) women, workers (sudras) as well as farmer-merchants (vaisyas), (all) of sinful origin, they too attain to the supreme goal.
Gita.IX.33:
How much more then the pure brahmanas as also the devoted royal sages. Having reached this transient joyless world do you worship Me.
अवतार मौहम्मद अपने रब की कुछ ऐसी ही इबादत यानी तप किया करते थे कि कुरान को कहना पड़ा कि अपने रब की इबादत में इस हद तक न जाएं कि अपना ख़्याल भी न रहे। अफसोस कि ऐसे पैग़म्बर का चित्रण करते हुए डेमोनिक ताकतें हाथ में शराब का जाम और सामने अर्धनग्न युवती को फोटो में दिखा रही हैं।
कितने अफसोस की बात है कि पुस्तिका के लेखक ने अवतार मौहम्मद का एक गुफा में इबादत के लिए जाने को भी जिन शब्दों में उल्लेख किया है उसमें निगेटिविटी पेश करने की कोशिश की है जिससे साफ होता है कि यह डेमोनिक ताकतों का एजेंडा है जो इस किताब के माध्यम से पेश किया गया। कोई आम आदमी गुफा में जाकर इबादत करने को तप का नाम देता। वे अवतार थे तभी ऐसा भीषण तप करते थे जिसके फलस्वरूप उन पर रेविलेशन आए। यह ठीक वैसा ही था जैसा कि पहले के ज़माने में वेद के साथ हुआ था, जो तप के नतीजे में नूरानी रूहों यानी देवताओं ने प्रसाद के रूप मे ऋषियों को दिए थे। ये वेद और कुरान का एक ही सोर्स से होने का एक और सबूत है जो आज से पहले किसी दूसरे ने आप तक नहीं पहुंचाया होगा। हर जमाने में ईश्वरीय किताबों में यह राज़ मौजूद थे ताकि आखि़री ज़माने में उन पर से पर्दा उठ सके।
आप ने देखा, केवल इस सृष्टि के एकमैव रब के आगे समर्पण ही नहीं बल्कि उसकी याद को दिल में बसा कर किए जा रहे अच्छे कर्म ही हर इंसान के लिए आवश्यक हैं, चाहे वो हिन्दु हो या मुसलमान। इसी पर कुरान और गीता दोनों का जोर है।
एक और स्थान पर कुरान कह रहा हैः
Quran.Surah Al-Asar.103.3:
Who believe and do righteous good deeds, order recommend one another to the truth [i.e. order one another to perform all kinds of good deeds (Al-Ma’ruf) which Allah has ordained, and abstain from all kinds of sins and evil (Al-Munkar) which Allah has forbidden], and recommend one another to patience.
कुछ पहले मैंने आप से कहा था कि कुरान केवल मुसलमान की बात नहीं कर रहा बल्कि जो कोई भी खुदा को एक मानते हुए अच्छे कर्म करे, उसके लिए कुरान हमेशा हमेशा के लिए स्वर्ग में रहने की बात कर रहा है। गीता भी एक खुदा की इबादत को स्वर्ग की हमेशा की ज़िन्दगी से जोड़ रही है। कुरान में दो स्थानों पर बिलकुल साफ शब्दों में कह दिया गया कि ऐसा करने वाला व्यक्ति किसी भी धर्म का मानने वाला हो, लेकिन उसे उसके सात्विक कर्माें का फल अवश्य मिलेगा। 'Whoever' का शब्द बता रहा है कोई भी। यहूदी हो या ईसाई, सितारापरस्त हो या कोई भी हो, जो भी मन से अल्लाह को मानता है, और मैं बता चुका हूँ कि अल्लाह मुसलमानों के खुदा का नाम नहीं है, बल्कि जो भी इस सृष्टि के एक रचियता में विश्वास रखता है, उस अंतिम दिन में विश्वास रखता है जिसमें कर्मों का फैसला होगा, और अच्छे कर्म करता है, उसको उसके रब की ओर से इनाम मिलेगा, न तो उनको कोई डर होगा और न अफसोस।
गीता यदि कह रही है कि कुछ लोगों को स्वर्ग में हमेशा के लिए रखा जाएगा और कुछ के लिए कह रही है कि जब उन लोगों के कर्मों का इनाम उनको मिल चुकेगा तो उन्हें फिर से दुनिया में भेज दिया जाएगा, तो इसका अर्थ साफ है कि कोई न कोई समय तो होगा जब यह फैसला लिया जाएगा कि किस को स्वर्ग में हमेशा के लिए रखना है और किसके अच्छे कर्म कितने हैं। जब तक ये फैसले का दिन न आए, कैसे पता चलेगा कि उसके अच्छे कर्मों का पूरा पूरा इनाम उसे मिल चुका है कि नहीं। चाहे कोई अपने को किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न कहता हो, स्वर्ग में हमेशा की जिंदगी पाने का सब के लिए एक ही रास्ता है। और हर डिवाईन स्क्रिपचर का यही संदेश है।
Quran.2.62 and Quran.5.69:
Verily those who believe, and those who are Jewish and Christians and Sabians, whoever believes in Allah and the last day, and work righteousness, shall have their reward with their Lord; on them shall be no fear, nor shall they grieve.
ऐसी अनेक दूसरी आयतें हम पेश कर सकते हैं जिनमें अच्छे कर्म या रूह को बेहतरी की तरफ ले जाने या गरीबों, यतीमों, मोहताजों के लिए और खुदा की राह में यानी उसकी याद बसाए हुए खर्च करने की बात हुई है। लेकिन इस सिलसिले को यहीं समाप्त करते हुए कुरान के सब से छोटे सूरह वल अस्र का अनुवाद आप के सामने पेश करते हुए आगे बढ़ते हैं।
कहा जा रहा हैः
By time,
Indeed, mankind is in loss,
Except for those who have believed and done righteous dees and advised each other to truth and advised each other to patience.
ज़माने की क़सम, यानी हर ज़माने में बस यही सत्य है कि इंसान घाटे में है, सिवाए उसके जो ईमान लाया और जिसने अच्छे कर्म किए, और जिसने एक दूसरे को सत्य के मार्ग की बातें बताईं और जिसने सब्र किया।
इसमें बेगुनाहों को क़त्ल करना, अल्लाह की मख़लूक पर जुल्म करना या आतंकवाद कहां से आ गया। बल्कि जुल्म तुम पर हो रहा है तो भी सब्र करने की बात हो रही है। दिल पर हाथ रख कर बताईए कि इन आयतों की रौशनी में मुसलमान कुरान की शिक्षा पर चलकर अच्छे कर्म अधिक करेगा या उससे दूर होकर। जो लोग कहते हैं कि मुसलमानों का समाधान यह है कि उन्हें कुरान से दूर कर दिया जाए, वे नहीं जानते कि कुरान ही अधिकतर मुसलमानों को सीधी राह पर रखे है। दुनिया के 2 बिलियन लोगों को उनके ग्रन्थ से दूर करने का अर्थ होगा उन्हें अपनी जाएज़ नाजाएज़ ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए निरंकुश छोड़ दिया जाए। मुसलमान में यदि सुधार होगा तो कुरान से दूर करके नहीं बल्कि कुरान की अस्ली शिक्षा की समझ उसको देकर।
गीता में आतताईना का उल्लेख है। अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं कि क्या यह लोग जो लड़ने आए हैं यह आतताईना हैं कि इनसे युद्ध करके इनका वध करना आवश्यक है। अब आज कोई यदि किसी को आतताईना कहते हुए उसको कत्ल कर दे तो इसमें गीता का क्या दोष? दोष है तो यह कि वह गीता की शिक्षा पर चला ही नहीं, उसने गीता को समझा ही नहीं या समझना नहीं चाहता।
पैग़म्बर मौहम्मद के रास्ते को समझते हुए जिहाद करने वाला केवल वह सकता है जो मोक्ष यानी salvation के मार्ग पर आगे बढ़ता ही जा रहा है। कोई जिहाद के नाम पर बेगुनाहों को क़त्ल करना या ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना या आतंकवाद फैलाना मतलब निकाले तो इसका आरोप कुरान या पैग़म्बर मौहम्मद की शिक्षा पर कैसे लग सकता है?
मुसलमान हो या हिन्दु, यहूदी हो या ईसाई, हर किसी को वह एक मार्ग समझना होगा जो हर डिवाईन किताब में दिया गया है, और एकदम एक जैसा दिया है, चाहे वेद हों या गीता, कुरान हो या बाईबिल। आज हिन्दु यदि गीता और वेद की शिक्षा पर पूरी तरह चलने लगे, मुसलमान यदि कुरान की शिक्षा पर पूरी तरह समझते हुए चलने लगे, तो दोनों पाएंगे कि वह एक ही मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। क्योंकि जैसा सैयद हैदर बार बार कहता है, एक ही पैग़ाम है जो विभिन्न ज़मानों में, भिन्न इलाक़ों में और भिन्न भाषा बोलने वालों में दिया जा रहा था, जब हमने सही सही नहीं समझा तो धर्म और पंथ की दीवारें खड़ी होती गईं।
एक खुदा एक पैगाम, सुन ले काश ये इंसान।
हां ये सही है कि यह पैमाना गड़बड़ा गया है! मुसलमानों की अस्ल समस्या कुरान पर चलना नहीं है बल्कि यह है कि वे कुरान और अवतार मौहम्मद की शिक्षा से कोसों दूर आ गए हैं लेकिन अपने को मुसलमान कहते हैं। आज मुसलमान भले ही अपने को करोड़ों अरबों की संख्या में गिनते हों, यदि कुरान की शिक्षा के अनुसार गिनती होगी तो बहुत कम लोग मुसलमान निकलेंगे। ठीक वैसे जैसे कृष्ण से जो लोग लड़ने आए, उनमें असंख्य ब्रहमिण थे, धर्मगुरू भी थे, अपने को ऋषि कहलवाने वाले भी थे, सब अपने को वेद की शिक्षा पर चलने वाला मानते थे, पर कृष्ण के अनुसार वह क़त्ल कर दिए जाने के लाएक़ थे ताकि आतताईनों का दुनिया से सफाया हो सके। क्या कृष्ण के सामने लड़ने आना वाला वेदों पर चलने वाला हो सकता है?
इसमें कोई शक नहीं है कि मुस्लिम आतंकवाद एक जटिल समस्या है। आतंकवाद के पीछे घिनौने और डरावने ज़ालिमाना विचार हैं। आज के कलियुग में हर किसी को, चाहे किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हो, उसे इंसानियत का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज का दुनियापरस्त इंसान अपने दुनियावी संबंधों को निभाने हेतु दूसरों का माल हड़प कर अपने और अपनों तक पहुंचाने में लगा है और इस कोशिश में हक़ और इंसाफ का दामन छोड़े है। लेकिन इसके लिए अल्लाह, रसूल और कुरान से दूर करना होगा, ऐसा कहना गलत है। अल्लाह, रसूल और कुरान से मुसलमान दूर हैं तभी तो आतंकवाद में गिरफतार है।
एक प्रश्न है! बुद्ध को बहुत अधिक अहिंसा प्रिय माना जाता है। बौद्धों का देश समझे जाने वाले मयांमार की सेना और पब्लिक ने रोहिंगया का नरसंहार इस पैमाने पर किया वे मयंामार छोड़ कर भागने पर मजबूर हो गए। मणिपुर में आतंकवादी हमला करके आर्मी कर्नल, उसकी पत्नी, बच्चे सहित कई आर्मी जवानों को मारते हैं तो उन आतंकवादियों के तार भी मयांमार से जुडे़ नज़र आते हैं। ऐसे में यदि कोई कहे बुद्ध की शिक्षा से जनता को दूर करना होगा तो यह वैसे ही बचकाना बात होगी जैसे ये कहना कि मुसलमान को अल्लाह, रसूल और कुरान से दूर करना होगा।
अली की खि़लाफत का वाक़्या सुनाते हैं जो शायद आप पहले भी सुन चुके होंगे। अली मदीना में ख़लीफा चुने गए तो दूसरी ओर माविया ने डेमेस्कस में अपने को ख़लीफा होने का एलान कर दिया। माविया गुरिल्ला वारफेयर पर उतर आया। माविया के फोैजी अली के जेरेहुक्मरानी आने वाले गांवों पर हमला करते थे, मारकाट और लूटमार करते थे और फिर कुछ ऐसा बोलते हुए जाते थे जिससे लगे कि वे अली के भेजे हुए सिपाही हैं। दूसरी ओर अली का यह उसूल था कि जो युद्व में लड़ने नहीं आया, या जो युद्ध में पीठ दिखा कर भागा, या जो निहत्ता हो या जो नग्न अवस्था में हो, उसपर हमला नहीं करते थे। कितने ही लोगों ने यह तरीक़ा बना लिया था कि जब अली की तलवार के सामने आते तो अपने कपड़े उतार कर नग्न खड़े हो जाते थे। वे जानते थे कि अली इतना उसूल के पक्के हैं कि किसी भी हालत में उस ओर निगाह उठा कर नहीं देखेंगे। यह है मौहम्मद, अली और कुरान के इस्लाम और बहके हुए मुसलमानों के इस्लाम में अंतर। आज भी ऐसे मुसलमान मिल जाएंगे जो माविया को अच्छी नज़र से देखते हैं। इनको कुरान और मौहम्मद की शिक्षा से दूर करने से तो और अधिक हानि होगी क्योंकि यह उसको अच्छा समझ रहे हैं जो स्वयं कुरान और मौहम्मद की शिक्षा को छोड़े हुए था। आज यदि कोई आतंकवाद जैसे कुकर्म में डूबा है, तो दरअस्ल वह कुरान और अवतार मौहम्मद की शिक्षा को समझा ही नहीं।
एक और वाक़िया बताता हूँ। नहरवान वह युद्ध था जिसमें अली ने उन लोगों से युद्ध लड़ा जो अपने को मुसलमान कह रहे थे लेकिन अस्ल इस्लाम से दूर थे। अली की फौज से लड़ने वाले ऐसे थे कि हर समय कुरान पढ़ा करते थे, रोज़े रखते थे और खूब नमाज़ें पढ़ते थे। परन्तु एक वाक़िया मिलता है कि एक ग़रीब व्यक्ति अपनी गर्भवती पत्नी के साथ गुज़र रहा था। उस को पकड़ कर उन लोगों के सामने पेश किया गया। बातचीत में उनको अंदाज़ा हुआ कि यह अली का मानने वाला है। उन्होंने उस व्यक्ति को क़त्ल कर दिया और उसकी पत्नी का पेट फाड़ कर उसके बच्चे को निकाल कर उसे भी मार डाला। क्या कहीं भी मिलता है कि मौहम्मद या अली के साथियों ने ऐसा कुछ किया हो। हां, जिन्होंने ऐसा किया वे भी अपने को मुसलमान कह रहे थे। पर ऐसे लोग अली, हसन या हुसैन या दूसरे अहललबैत के खिलाफ लड़ने भी आ गए, यहां तक कि उनको क़त्ल करने की कोशिश में लगे रहे। अली को नहरवानियों से युद्ध करना पड़ा तो यज़ीद ने हुसैन को शहीद किया और यह यज़ीद की ही फौज थी जिसने जब मदीना पर हमला किया तो तीन दिन तक फौज को खुली छूट दे दी गई कि मदीना में जिस को चाहें कत्ल करें और जिस महिला से चाहें बलात्कार करें। यहां तक कि मस्जिदे नबवी में श्रणन लेने वाली महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया। यदि यज़ीद और उसके फौजी अपने को मुसलमान कह रहे हों, तो इसमें कुरान और अवतार मौहम्मद का क्या दोष? जो अवतार मौहम्मद के खानदान के कातिल हों, और उनकी शिक्षा का उपहास उड़ाने वाले हों, वह भले ही अपने को मुसलमान कहें, वह कुरान और अवतार मौहम्मद की असली शिक्षा से कोसों दूर हैं।
इतिहास गवाह है कि ऐसे ही गुमराह मुसलमानों ने दूर इलाक़ों तक फौजें भेज कर क़ब्जे़ करने, वहां से लूट का माल और गुलाम मर्द और औरतें लाने में कोई कमी नहीं की। आज भी ऐसे ही मुसलमान आतंकवाद में डूबे और बेगुनाहों को क़त्ल करते नज़र आते हैं। इन्होंने यदि कुरान की हक़ीक़ी शिक्षा को समझ लिया होता और उस पर चल रहे होते, तो ऐसा कभी न करते। इनको कुरान की असली शिक्षा और असली इस्लाम की शिक्षा पहुंचाने की ज़रूरत है, इनके मदरसों में रिवायती शिक्षा के साथ माडर्न एजुकेशन की ज़रूरत है, और इनको वह इस्लाम बताने की ज़रूरत है जो आत्मिक उत्थान की बात करता है, जो इस सृष्टि के एक रब के आगे अपने को सुपुर्द करने और उसकी खुशी के लिए उसकी मख़लूक़ की सेवा करने की सीख देता है।
मैं अपनी पुस्तकों में दिखाता आया हूँ कि वेद, गीता और कुरान की शिक्षा में कोई अन्तर नहीं। कुरान अद्दीनलक़य्यिम की बात करता है तो वेद सनातन होने का दावा करते हैं। दोनों का अर्थ एक ही है। वेद और गीता की सही समझ जब पहुंचेगी तो कुरान को समझने की राहें खुलेंगी और जो मुसलमान कुरान की शिक्षा को पूरी तरह ग्रहण कर लेगा, वे वेदों का भी आदर करेगा क्योंकि सत्यमार्ग तो वेद और गीता भी बता रहे हैं। वेद और गीता की सही समझ पैदा करने के लिए आवश्यक है कि संस्कृत आम हो, और वेदों का सही सही अनुवाद फिर से किया जाए ताकि हिन्दु हों या मुसलमान, सब उस सच्चे मार्ग को पहचान सकें जो वेद, गीता, कुरान और हर अन्य डिवाईन किताब में दिया गया है।
Quran.2.136:
Say (O Muslims), “We believe in Allah and that which has been sent down to us and that which has been sent down to Ibrahim (Abraham), Isma’il (Ishmael), Ishaque (Isaac), Ya’qub (Jacob), and to Al-Asbat [the twelve sons of Ya’qub (Jacob)], and that which has been given to Musa (Moses) and ‘Iesa (Jesus), and that which has been given to the Prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and to Him we have submitted (in Islam).”
आप कहेंगे ऐसा कैसे! यदि मुसलमानों के विभिन्न गुट अवतार मौहम्मद द्वारा पेश किए गए इस्लाम को भिन्न भिन्न प्रकार से समझ रहे हों, जुलमत ने ऐसा खेल खेला हो कि अवतार मौहम्मद की दी गई शिक्षा की ऐसी भिन्न समझ बनी कि विभिन्न फिरकों को देखें तो लगता ही नहीं कि एक ही रसूल की शिक्षा के मानने वाले हैं, तो यह फैसला कैसे होगा, कि किस का रास्ता सही है, किसका ग़लत? यदि मैं आप से कह रहा हूँ कि वेदों के इंद्रदेव मौहम्मद हैं तो और भी अनेक राज़ हैं जो वेदों से सामने आएंगे, जब उनका फिर से अनुवाद होगा। जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन वे हक़ीक़तें सामने आएंगी जिससे हर कोई मौहम्मद और अन्य अहललबैत को पहचान लेगा, हर कोई नूर और जुलमत के अन्तर को समझ लेगा, हर कोई कृष्ण और राम को अपना कहेगा फिर हक़ की राह को समझते हुए उस पर चलने की कोशिश करेगा। ऐसा ही होगा, बहुत जल्द। इंशाअल्लाह!
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