ख़्याल सबसे कमज़ोर का
आप ने अब तक देखा कि कैसे पुस्तिका के लेखक जो कुछ लिख रहे हैं वह बेबुनियाद, बिना सबूत के और केवल झूठ और बोहतान पर आधारित है। इससे उनका क्या लाभ हो सकता है, आप स्वयं सोचने समझने के लिए आज़ाद हैं।
पुस्तिका आगे कहती हैः
‘मुसलमानों को और मुसलमानों के आचरण को समझने के लिए मुसलमानों के आखि़री पैगम्बर मौहम्मद को समझना बेहद जरूरी है। इस्लाम दरअस्ल मौहम्मदवाद है। और मौहम्मद को समझ कर ही इस्लाम को समझा जा सकता है।’
इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों को और मुसलमानों के आचरण को समझने के लिए मुसलमानों के आखि़री पैग़म्बर को समझना ज़रूरी है। लेकिन इस वक्तव्य को हमें और आगे बढ़ाना होगा। अवतार मौहम्मद के दुनिया से गुज़रने के 50 साल के भीतर अपने को तमाम मुस्लिम दुनिया का ख़लीफा कहने वाले यज़ीद की फौज ने अवतार मौहम्मद के प्यारे नवासे हुसैन को घेर कर बड़ी बेरहमी से तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया, उनकी औरतों और बच्चोें को बंदी बना लिया और शहीदोें के कटे सिर नैज़ों पर उठाए आज के ईराक़ में स्थित करबला से कूफा तक और फिर कूफा से आज के सीरिया में स्थित डेमेस्कस तक ले जाया गया, इस तरह की नेज़ों पर कटे सिर आगे आगे थे, औरतें और बच्चे रस्सियों में जकड़े हुए पीछे पीछे ले जाए जा रहे थे और यज़ीदी सिपाही उन बंदियों पर कोड़े बरसाते जा रहे थे। यह इसलिए था कि मुस्लिम दुनिया इनका हाल देखकर हर प्रकार के जुल्म और नाइंसाफी के खि़लाफ चुप्पी साधे रहना सीख ले।
एक और तथ्य देखिए! अवतार मौहम्मद ने ग़दीर में 70000 मुसलमानों के सामने पूछा था कि क्या मैं बतौर रसूल या अवतार तुम्हारी जानों पर तुम से अधिक अधिकार नहीं रखता। सबने कहा था कि हां ऐसा ही है। फिर अवतार मौहम्मद ने सब के सामने घोषणा की थी कि याद रखो, जिसका मैं मौला यानी आका हूँ, उसका अली भी मौला यानी आक़ा है। अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के मात्र 30 साल के भीतर जब हुकूमत अबू सूफियान के पुत्र और यज़ीद के पिता माविया के हाथों में आ गई तो एक नई प्रथा को जन्म दिया गया। वह यह कि तमाम मुस्लिम दुनिया में हर मस्जिद से हर शुक्रवार यानी जुमे की नमाज़ से पहले दिए जाने वाले खुतबे में अली को बुरा कहा जाता था। ज़रा ग़ौर करें। उस समय की मुस्लिम दुनिया में आज के कितने देश शामिल थे। आज का ईरान, ईराक, सीरिया, जारडन, यू ए ई, कुवेत, क़तर, बहरैन, अफग़ानिस्तान, इस्रायल, पैलेस्टीन, यमन, ओमान, ईजिप्ट और इसके साथ आज के टर्की, आर्मिनिया, आज़रबाईजान और तुर्कमेनिस्तान के कुछ इलाके इसमें शामिल थे, जो घटे नहीं समय के साथ बढ़ते ही गए।
इतने बड़े इलाके़ की हर मस्जिद का ईमाम जुमे के खुतबे में अली को बुरा कह रहा था। और इतने बड़े इलाक़े में जुमे की नमाज़ पढ़ने वाला हर मुसलमान अली के खि़लाफ अपशब्द सुन रहा था जबकि अवतार मौहम्मद ने अली को हर समय अपना सबसे क़रीबी और यहां तक कि अल्लाह का भी सब से क़रीबी बताने की कोशिश की थी। उन्होंने यहां तक कहा कि अली स्वर्ग के मर्दों के सरदार हैं, मुबाहिला में कुरान ने अली को अवतार मौहम्मद का सैल्फ यानी उनका जैसा बताया था। अवतार मौहम्मद ने कहा कि अली और मैं एक नूर के दो टुकड़े हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमान के ईमान की निशानी दिल में अली की मौहब्बत है जिससे साबित है कि जो लोग अली को बुरा कहलवा रहे थे या मस्जिदों के वे इमाम जो अली को बुरा कह रहे थे उनके दिलों से ईमान रूख़्सत हो चुका था। वे केवल ऐसे मुसलमान थे जो अपने को मुसलमान तो कह रहे थे लेकिन अस्ली इस्लाम से कोसों दूर निकल चुके थे। अली को बुरा कहने का यह सिलसिला एक दो सप्ताह नहीं चला बल्कि बनी उमय्या के दौर के अधिकांश हुक्मरानों ने दशकों तक इस सिलसिले को जारी रखा।
अब ज़रा दिल पर हाथ रख कर बताईए, क्या अली को बुरा कहने का तौर तरीक़ा अवतार मौहम्मद की शिक्षा के अनुसार था? क्या अवतार मौहम्मद के तमाम घर के लोगों को भूखा प्यासा शहीद कर देना अवतार मौहम्मद की शिक्षा के अनुरूप था? हक़ीक़त यही थी कि इस्लामिक शिक्षा पथभ्रष्ट होकर ऐसे हुकमरानों के हाथों में पहुंच चुकी थी जिनको अपने रास रंग और विलास के आगे कुछ नहीं दिखाई देता था।
जैसे अनेक आम हुकमरान डर का माहौल बिठा कर अवाम को ख़ामोश करने की कोशिश करते हैं, ऐसे ही इन हुकमरानों ने अली के चाहने वालों को प्रताड़ित कर ऐसा डर का माहौल बना दिया था कि अवाम मस्जिदों से भी सब कुछ सुनने पर मजबूर थी लेकिन बेबस थी। इस बेबसी ने कुछ आगे चल कर ऐसा माहौल बना दिया कि कुछ को छोड़ तमाम उम्मत गफ़लत का शिकार हो गई।
हक़ीक़त तो यह है कि ये भटके हुए लोग थे जिनके बाप दादाओं ने इस्लाम तो कुबूल किया था लेकिन जुलमत यानी तमस ने फिर से इन्हें अपनी ओर खींच लिया था। उनको मोहरा बना कर यह ताकतें नूर के नुमाईंदों के चारों ओर घेरा बनाने में हर समय लगी थीं, ताकि कहीं इनकी अस्ली शिक्षा को समझ कर लोग उस पर न आ जाएं और मोक्ष यानी salvation की राहें इंसानों पर खुल न जाएं। आज भी जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक ताकतें इसी कोशिश में लगी हैं। आज उनके मोहरे दूसरे हैं, उनके एजेंट नई नक़ाबें पहने हैं, पर एजेंडा वही पुराना है; किसी भी तरह इंसान हक़ और हक़ीक़त को पहचान न ले और जुलमत के शिकंजों से आज़ाद हो कर नूर के मार्ग पर चलना प्रारंभ न कर दे।
यही कारण है कि मुसलमानों को और मुसलमानों के आचरण को समझने के लिए मुसलमानों के आखि़री पैगम्बर मौहम्मद को समझना बेहद ज़रूरी तो है लेकिन मुसलमान जहां जहां अवतार मौहम्मद के कथन और बताए मार्ग से बहके हम को वह भी समझना होगा और देखना होगा कि क्या उनके आचरण का अनुमोदन अवतार मौहम्मद की कथनी या करनी में दिखता है कि नहीं।
यहां तक कि अवतार मौहम्मद से जोड़ कर अनेक हदीसें गढ़ी गईं तथा कुछ लोगों की पोज़ीशन को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने के लिए इन झूठी हदीसों का कारख़ाना सजाया गया। शायद अवतार मौहम्मद जानते थे कि ऐसा होगा, उन्होंने अपनी जिंदगी में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि यदि मेरा कोई कथन कुरान के विपरीत पाओ तो उसको दीवार पर मार दो, क्योंकि अवतार मौहम्मद की ज़िंदगी, करनी और कथनी कुरान से विपरीत नहीं हो सकती।
पुस्तिका के लेखक का यह कहना कि इस्लाम दरअस्ल मौहम्मदवाद है बहसतलब है। लेकिन यह लिखने से पहले वाली लाईन में ही लेखक ने अवतार मौहम्मद को मुसलमानों का आखि़री पैग़म्बर लिखा है। जब अवतार मौहम्मद मुसलमानों के अकेले पैग़म्बर नहीं हैं और आखि़री हैं तो फिर इस्लाम मौहम्मदवाद कैसे हो गया?
अवतार मौहम्म्द ने तो इस दुनिया के प्रारंभ से आए हर अवतार की शिक्षा का अनुमोदन किया। हर अवतार केवल एक ही मार्ग दिखा रहा था जो हर ज़माने में सनातन और सच्चा मार्ग था। इस्लाम के अनुसार कृष्ण अपने समय जो मार्ग दिखा रहे थे वह भी इस्लाम था, बुद्ध, मूसा और ईसा जो मार्ग दिखा रहे थे वह भी इस्लाम था। कुरान तो आदम के लिए भी कह रहा है कि उनको ज़मीन पर अल्लाह की ओर से ख़लीफा बनाया गया। वह भी इस्लाम के ही ख़लीफा थे।
यदि आदम भारत के दक्षिणी छोर पर Adam's Peak पर उतरे थे, जैसा कि आम मान्यता है, तो भारत ही इस्लाम का जन्मस्थल है। वेद और कुरान का मार्ग ही सनातन है। जुलमत यानी तमस के कारिंदों ने हर ज़माने में अवतारों की शिक्षा को सैबोटेज करने की कोशिश की; यही लोग गुमराह ठहराए।
कोई अवतार है तो उसका पिता या पुत्र या पत्नी भी उसी के मार्ग पर हो यह आवश्यक नहीं। कृष्ण यादवों में पले बढ़े थे लेकिन उन्हीं यादवों ने कृष्ण पर रत्न चोरी का इल्ज़ाम लगाया। समय के सबसे बड़े गुरू और ब्रहमिण कृष्ण के खिलाफ युद्ध पर आ गए। आंकलन करें और बताएं कि जो गुरू और ब्रहमिण समय के अवतार के खिलाफ लड़ने आ गए, वे पथभ्रष्ट थे कि हक़ पर थे? यदि वे कृष्ण के बताए मार्ग को मान रहे होते और उस पर चल रहे होते तो फिर लड़ने ही क्यों आए होते? वे सब अपने को वेद की शिक्षा पर चलने वाला बताते थे। आज कोई सिरफिरा ही होगा जो उनके कर्मों को वेदों या कृष्ण की शिक्षा से जोड़ने की कोशिश करेगा।
यदि ऐसा ही अवतार मौहम्मद के समय में हुआ कि जुलमत यानी तमस ने अपने एजेंटों को उनके खि़लाफ लगा दिया ताकि उनकी शिक्षा का असर कमज़ोर पड़ सके और उनके मानने वाले राह से भटक जाएं, तो यह तो हर ज़माने में और हर अवतार के साथ होता रहा।
One God One Religion में मैंने दिखाया है कि कैसे बुद्ध के गुजरने के बाद मात्र 14 दिनों के भीतर उनके मानने वालों ने बुद्ध की शिक्षा को भुला दिया। मैंने दिखाया है कि कैसे श्री राम का सीधा वंशज कृष्ण के विपरीत युद्ध करने आ गया और लड़ते हुए मारा गया। इब्राहीम अवतार थे लेकिन उनके पिता दुनिया के मोह में गिरफतार थे और एक खुदा की पूजा नहीं करते थे। नूह अवतार थे लेकिन उनका बेटा अल्लाह पर यकीन नहीं रखता था। लूत भी नबी थे लेकिन उनकी पत्नी गुनाह में गिरफतार थी। ऐसे ही अली के बेटे हसन की पत्नी ने दुनियावी मोह की ख़ातिर अपने पति को ज़हर दिया। क्या हसन की पत्नी जो कि अवतार मौहम्मद के घर मे ही ब्याह कर आई थी उस के आचरण को अवतार मौहम्मद की शिक्षा के अनुरूप माना जाएगा। फिर तमाम मुसलमानों के आचरण को कैसे अवतार मौहम्मद की शिक्षा के अनुरूप समझा जा सकता है?
इतिहास ने तो देखा कि अपने को मुसलमानों का ख़लीफा कहने वाले शासक जिहाद के नाम पर इलाक़े फतेह करते गए, वहां से आए माल-ओ-दौलत में डूब गए, गुलाम और दासियां पकड़ पकड़ कर लाई जाती थीं और ये उनसे सेवांए लिया करते थे, बात बात पर जिसको चाहे क़त्ल कर देते थे, यहां तक कि अपने भाईयों या बहनों को क़त्ल करा दिया करते थे। इस्लाम में तो एक बेगुनाह का क़त्ल करने वाले की सज़ा मौत है जब तक कि मरने वाले के वंशज माफ न कर दें। यक़ीनन अवतार मौहम्मद और कुरान को समझ कर ही समझा जा सकता है कि ये तमाम लोग कितना इस्लाम की शिक्षा पर चलने वाले थे?
पुस्तिका आगे लिखती हैः
‘इस ‘मौहम्मद’ नामी पुस्तक में मौहम्मद नामक व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक रहस्यों को उजागर करते हुए मौहम्मद को समझने की कोशिश की गई है। इतिहासकार बताते हैं कि मौहम्मद एक सुनसान गुफा में चले जाते थे और वहां घंटों बैठे रहते थे और बाद मेें आकर अपनी बीवी ख़दीजा जो कि अरब की एक बहुत ही अमीर औरत थी उन्हे यह समझाने की कोशिश करते थे कि वह अल्लाह के पैग़म्बर हो गए हैं और धीरे- धीरे मौहम्मद अपने रंग ढंग बदलने लगे। जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मान लिया उनको मौहम्मद ने अपने साथ ले लिया और जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मानने से इनकार कर दिया और उनकी आलोचना की तो उनकी हत्या कर दी गई। मौहम्मद ने एक इस्लामिक लश्कर बनाकर लूटपाट और नरसंहार करना शुरू कर दिया। मौहम्मद ने हज़ारों लोगों को बंदी बनाया और उनकी बेटियों और औरतों के साथ में बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वह बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं।’
यदि कोई झूठ और मनगढंत बातें ही फैलाने पर आ जाए और बिना तथ्यों के आधार पर कोई बात ज़ोर शोर से करने बैठ जाए तो उसका क्या इलाज है? यही कारण है कि बहुत से ज्ञानी लोग इन बातों का कोई उत्तर नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि ऊल जलूल निराधार बातों का क्या उत्तर दिया जा सकता है। लेकिन झूठ फैलाने वाले ये लोग नहीं जानते कि जितना अधिक यह जुलमत के कारिंदे बनकर मौहम्मद या पहले आए किसी भी अवतार के मार्ग से इंसानियत को भ्रमित करने की कोशिश करेंगे उतना ही लोग उनको पढ़ने और समझने में दिलचस्पी लेंगे और हक़ीक़तें उजागर होती चली जाएंगी। क्योंकि रेत के ढेर पर बनी इमारत अधिक दिनों क़ायम नहीं रह सकती।
जो लोग लिखना जानते हैं वे बखूबी जानते हैं कि यदि लिखने में महारथ हो तो सच्चे झूठे किसी भी तर्क को समझाने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन जो अक़ल रखता है वह भली भांति सत्य को असत्य में से ढूंढ लेता है। लेखक ने अवतार मौहम्मद का इबादत और बंदगी के लिए निरंतर गुफा में जाने का उल्लेख किया है। लेकिन शब्दों को ऐसे पिरोया है कि पढ़ने वाले उससे निगेटिव अर्थ निकालें। कहते हैंः ‘इस मौहम्मद नामी पुस्तक में मौहम्मद नामी व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक रहस्यों को उजागर करते हुए मौहम्मद को समझने की कोशिश की गई है।’ मनोवैज्ञानिक रहस्यों की बात करने के बाद कहते हैं कि ‘इतिहासकार बताते हैं कि मौहम्मद एक सुनसान गुफा में चले जाते थे और वहां घंटों बैठे रहते थे और बाद में आकर अपनी बीवी खदीजा जो कि अरब की एक बहुत ही अमीर औरत थीं उन्हें यह समझाने की कोशिश करते थे कि वह अल्लाह के पैगम्बर हो गए हैं और धीरे-धीरे मौहम्मद अपने रंग ढंग बदलने लगे।’
आप ने देखा कि सुनसान गुफा में चले जाना, वहां घंटों बैठे रहना, ख़दीजा का एक अमीर घर की औरत होना और मौहम्मद का ख़दीजा को यह समझाने की कोशिश करना कि वह अल्लाह के पैगम्बर हो गए हैं और रंग-ढंग बदलना, इन सब शब्दों को ऐसे लिखा है कि पढ़ने वाला निगेटिव यानी नकारात्मक नज़रया बना ले। गुफा में जाने को लेकर कहा है कि ‘इतिहासकार बताते हैं’ और इस प्रकार यह दिखाने की कोशिश की है कि जैसे तमाम लेखनी इतिहास पर आधारित है जबकि हक़ीक़त में अधिकांश लेखनी केवल झूठ के पुलिंदे के अतिरिक्त कुछ नहीं।
क्या पुस्तिका के लेखक नहीं जानते कि भारतवर्ष में पहाडों की गुफाओें में जाकर ध्यान और उपासना करना एक आम बात है। कितने ही ऋषि मुनि तप करने गुफाओं, पहाड़ों के ऊपर या जंगलों में जाया करते हैं। बुद्ध और महावीर तो ऐसा तप करने के लिए विख्यात हैं कि कई कई दिन बस ध्यान में लीन रहते थे; यहां तक कि जहरीले कीड़े मकौड़े भी पास से गुज़र जाते थे लेकिन उनको इसका अहसास नहीं होता था।
अवतार मौहम्मद भी मक्का की आबादी से थोड़ी दूर एक गुफा में ध्यान और तप की ख़ातिर ही जाया करते थे। कोई अरब का जाहिल इसका कारण न समझ पाता तो अक़ल में आता पर यदि भारतवर्ष में जन्मा यह लेखक स्प्रिटुएलिटी की राह में गुफा जाने वाले अवतार मौहम्मद के कर्म को ऐसे पेश करने की कोशिश करेगा जैसे यह कोई मानसिक बीमारी हो, तो फिर लेखक की अपनी मनोवृत्ति समझ में आती है। आखि़र किन ताक़तों के वश में वह गुफा में कई कई दिन रहने को निगेटिव अर्थ में पेश करने की कोशिश कर रहा है? यदि आप ग़ौर से पढेंगे तो पाएंगे कि बीवी ख़दीजा का अरब की बहुत अमीर औरत होना भी निगेटिव तौर पर पेश किया गया है और मौहम्मद का अपनी बीवी को यह समझाने की कोशिश करना कि वह अल्लाह के पैग़म्बर हो गए हैं, यह भी निगेटिव शब्दों में ही ब्यान किया गया है जिसका सबूत इसके बाद की लाईन है जिसमें लेखक कहता है कि ‘और धीरे-धीरे मौहम्मद अपने रंग ढंग बदलने लगे’।
प्रारंभ में मैंने आप को बताया था कि डाक्टर राधाकृष्ण ने वेदों के अवतरित होने का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वेद विभिन्न ऋषियों के दिमाग़ में तप प्रभाव और देव प्रसाद के कारण अवतरित हुए। उन्होनें तप किया और प्रसाद के रूप में देवताओं ने उनके दिमाग को वेद ज्ञान की रौशनी से भर दिया। यही तरीक़ा रहा है हर ज़माने में डिवाईन स्क्रिपचर्स के उतरने का। कुरान ने भी अवतार मौहम्मद के लिए कहा कि तुम को न तो किताब का ज्ञान था और न ईमान जब तक कि रूह को मौहम्मद की ओर न भेजा गया।
Quran.Ash-Shura.42.52:
Thus, have We revealed to you O Muhammad, a Spirit (Rooh or Prana or Atma) by Our command: while you did not know what is The Book and what is the Iman (faith)? But We have made it (Spirit or Rooh or Atma) a light [noor] whereby We guide those of Our servants whom We please; and surely you are guiding mankind to the Right Way.
इस रूह ने तप के माध्यम से पाक किए गए मौहम्मद के शरीर को आफिस बनाया और एक ऐसे व्यक्ति के मुख से जिस को किसी ने पढ़ना लिखना नहीं सिखाया था ज्ञान की वर्षा होने लगी। यही कारण है कि कुरान मौहम्मद का मोजिज़ा यानी miracle है। कुरान साफ तौर पर कह रहा है कि इसी माध्यम से परमात्मा जिस बंदे को चाहता है उसको हिदायत और ज्ञान अर्पित करता है। अवतार मौहम्मद भी यक़ीनन सत्यपथ की ओर ही इंसानियत को हिदायत देने के लिए आए थे।
अब ज़रा ग़ौर कीजिए। जब बुद्ध को एनलाईटेनमेंट मिली तो क्या दूसरों ने आकर बुद्ध और उनके आसपास के लोगों को बताया कि बुद्ध को एनलाईटेनमेंट मिल गई है। नहीं, बुद्ध ने स्वयं बताया, कुछ ने माना, बहुतेरों ने नहीं। जब मूसा आग की तलाश में पहाड़ी पर गए तो नीचे उतर कर क्या फरिश्तों ने आकर बताया कि मूसा को अल्लाह का पैग़म्बर चुन लिया गया है। नहीं! बल्कि मूसा ने स्वयं आकर जो कुछ पहाड़ पर उनके साथ हुआ था वह ब्यान किया। उस समय कुछ ने माना, बहुतेरों ने नहीं माना।
कृष्ण अवतार थे पर क्या जिन यादवों के दरमियान वह रह रहे थे उनमें गिनती के कुछ लोगों को छोड़ कर अन्य मान रहे थे कि वह अवतार हैं? बल्कि इतिहास बताता है कि वे लोग कृष्ण के मार्ग में रूकावटें डालने की भरपूर कोशिश करते थे। यहां तक कि एक बार कृष्ण के अपने भाई सत्रजीत और अन्यों ने कृष्ण पर अपने ही भाई को कत्ल करने का इल्ज़ाम लगा दिया। जुलमत कैसे कैसे खेल खेलती है, इस पर ग़ौर कीजिए। तमाम हालात ऐसे बने होंगे कि कृष्ण के अपने भाईयों ने उन पर क़त्ल का आरोप लगाया होगा। वह तो कृष्ण अवतार थे कि इस बेबुनियाद आरोप से बाहर आ गए। यदि कोई आम इंसान होता तो जुलमत उसे ऐसा रूस्वा और ज़लील करती कि उसकी बात सुनने वाला कोई न रहता।
अहललबैत मूसा काज़िम का वाक़ेया भी सुनाए देते हैं। वह लंबे समय से क़ैद में बंद थे। ऐसा तहख़ाना कि जहां धूप और हवा का भी गुज़र नहीं था। ख़लीफा ने सोचा इससे काम नहीं चलेगा। उसने अपने समय की सब से खूबसूरत तवाएफ को बुला भेजा और उसे समझाया कि तुम को रात में उनके साथ बंद कर दिया जाएगा। वह तुम्हारे साथ कुछ करें या न करें, सुबह तुम्हें सब के सामने बोलना होगा कि उन्होंने ऐसा ऐसा किया। वह राज़ी हो गई। उसको तहख़ाने में भेज दिया गया। जुलमत समझ रही थी कि उसने बेहतरीन प्लान तैयार किया है। वह अन्दर गई तो देखा कि यह अपने रब की इबादत में मसरूफ हैं। एक नूर है जो उनके सिर से निकल कर तहख़ाने के रौशनदान से आसमान की ओर जा रहा है। रात भर ऐसे ही बीत गई। सुबह उस तवाएफ को तलब किया गया। सबके सामने उससे पूछा गया कि बताओ रात में क्या हुआ। उस पर अहललबैत के आचरण का ऐसा असर था कि उसने स्वयं ही ख़लीफा का सारा राज़ उगल दिया। साज़िश फाश हो गई। लेकिन यदि सामने अहललबैत नहीं कोई आम आदमी होता? ज़लील-ओ-रूस्वा हो कर बाक़ी की ज़िन्दगी गुज़ारता; लोग न तो उसकी बातों की ओर ध्यान देते और न ही उन्हें परवाह होती कि क्योंकर क़ैद में रखा गया है?
ऐसा ही कितनी बार हुआ है और होता रहेगा! हक़ का काम कर रहे आम लोग जुलमत के हाथों रूस्वा होते रहेंगे। मुमकिन है वे बेगुनाह हों, मुमकिन है उन से गुनाह हुआ हो। पूरी तरह पाक हस्तियां केवल यह दिव्यात्माएं यानी अहललबैत हैं। केवल उनको पहचानना है और उनके बताए मार्ग पर आना है।
अवतारों के खि़लाफ भी हर मुमकिन साज़िशें की जाती रहीं। जिस पुस्तिका के उत्तर में हम यह सब कुछ लिख रहे हैं, वह भी इसी साज़िश का एक हिस्सा है।
वापिस कृष्ण पर लगे इल्ज़ाम की ओर पलटते हैं। सत्रजीत और अन्यों का कहना था कि एक बेशक़ीमती स्यामंतक रत्न प्राप्त करने के लिए कृष्ण ने अपने भाई प्रसन्न को मार डाला। अपने ऊपर लग रहे इल्ज़ामों से अपने को आज़ाद करने की ख़ातिर कृष्ण को अपने कुछ यादव मित्रों के साथ जंगल में जाना पड़ा। उन्होंने अपने भाई के पद्यचिह्नों का पीछा किया, फिर उस शेर के पैरों के निशानों का जिसने उनके भाई को मारा, फिर उस भालुओं के राजा के पैरों के निशानों का जिस ने शेर को मारा और पीछा करते करते एक गुफा के मुहाने पर पहुंचे। कृष्ण गुफा के अन्दर चले गए जबकि उनके मित्र अन्दर जाने की हिम्मत न कर पाए और बाहर खड़े रहे। गुफा के अन्दर कृष्ण का भालुओं के राजा जम्बावत से 21 दिन तक युद्ध चला। कृष्ण के यादव मित्रों को कृष्ण से ऐसी ही मौहब्बत थी कि कृष्ण को अकेले गुफा में जाने दिया और अन्दर जाने की हिम्मत नहीं कर पाए। जब कई दिनों तक कृष्ण बाहर नहीं आए तो इन्होंने वापिस द्वारका आकर सब में घोषणा कर दी कि कृष्ण मारे गए। क्या यह मित्र कृष्ण को अवतार मान रहे थे?
कृष्ण के परिजन भी क्या उनको अवतार मान रहे थे? यदि मान रहे होते तो एड़ी चोटी का जोर लगा देते उनको तलाश करने के लिए। लेकिन पुराण बताते हैं कि कृष्ण के मरने की ख़बर सुन कर उन्होंने तमाम रस्में निभा डालीं जो किसी के मरने पर की जाती हैं। यह सब कहानी बताने का कारण है कि कृष्ण के आसपास रहने वाले भी अधिकतर लोग उनको अवतार नहीं मान रहे थे। और यदि किसी ने बताया कि कृष्ण अवतार हैं तो वह कृष्ण स्वयं थे। यदि आप गीता की मेरी कमेंटरी पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि युद्ध में कृष्ण के साथ आकर, दोनों सेनाओं के बीच पहुंचकर, कृष्ण से बातचीत करने वाले अर्जुन को बड़े समय तक अंदाजा़ नहीं था कि वह जिस कृष्ण से बात कर रहे हैं उनके मुख से परमात्मा बोल रहा है।
इस बातचीत के दौरान एक स्टेज आता है जब अर्जुन पर इस हक़ीक़त का रहस्योदघाटन होता है कि कृष्ण के मुख से दरअस्ल परमात्मा बात कर रहा है। अन्यथा गीता के चैथे चैप्टर तक वार्तालाप पहुंचने तक अर्जुन नहीं समझ पा रहे थे कि कृष्ण का अवतार से क्या रिश्ता है। तब समझे जब कृष्ण के मुख से परमात्मा ने कहाः
Gita.IV.1:
Sribhagavan said
This perennial unitive wisdom (yoga) did I declare to Vivasvan; Vivasvan taught it to Manu (law-giver) and Manu told it to Ikshvaku (first king of the solar race).
Gita.IV.2:
Thus handed down the line in succession, this (wisdom) the king-sages (raja-rishis) understood; by great lapse of time here this unitive wisdom came to be lost, O Paramtapa. (Arjuna).
Gita.IV.3:
That very same ancient secret is being today declared to you by me, seeing that you are both my devotee and friend.
अर्जुन कृष्ण से पूछ रहे थे कि आप का जन्म तो बाद में हुआ है और विवास्वान का आप से बहुत पहले, फिर मैं कैसे समझूं कि आप ने सृष्टि के प्रारंभ में विवास्वान को सब कुछ बताया था।
Gita.IV.4:
Arjuna said:
Your birth it was posterior and the birth of Vivasvan that was anterior; how then have I to understand it that you declared it in the beginning?
साफ है कि कौरवों के विरूद्ध महाभारत के युद्ध में आ जाने के बाद, यहां तक कि गीता के इस स्टेज तक जहां दोनों फौजों के बीचों बीच कृष्ण रथ को ले गए ऐसे समय जब दोनों ओर से युद्ध के शंखनाद बज रहे थे, और कृष्ण और अर्जुन के बीच वार्तालाप होता है जिसमें अर्जुन पूछते हैं कि आप ने विवासवान को यह सारी हक़ीक़तें कैसे बताईं जबकि आप का जन्म बाद में हुआ और विवासवान का पहले; यहां तक अर्जुन को नहीं पता था कि कृष्ण अवतार हैं।
यदि किसी ने बताया कि कृष्ण अवतार हैं तो स्वयं कृष्ण ने। और बाद में जिन्होंने उनको अवतार माना उन्होंने अक़ल से, उनकी दी हुई शिक्षा के स्तर को देखते हुए या उनके द्वारा किए गए चमत्कारों से अचंभित होकर। जितनी सेना कृष्ण के सामने लड़ने आई थी वह भी उनको यदि अवतार मान रही होती तौ क्या युद्ध करने को आती? श्री राम का सीधा वंशज भी कौरवों की सेना में कृष्ण के विरूद्ध लड़ने आया हुआ था। वह कृष्ण के विरूद्ध लड़ता हुआ मारा गया। यह बताता है कि अपने को राम का वंशज कहने का भी कोई लाभ नहीं; आवश्यक है कि तुम राम की शिक्षा के वारिस बनो, कृष्ण की शिक्षा को अपनाओ और दूसरों के लिए उस मार्ग को प्रदर्शित करो।
कहने का सार यह है कि हर अवतार ने स्वयं घोषणा की कि वह अवतार है। किसी के लिए भी बादलों पर लिखा नहीं दिखा था कि उसको अवतार चुना गया है। इसके बावजूद उपरोक्त पुस्तिका के लेखक को किसी दूसरे अवतार पर शक नहीं। लेकिन भीषण तप करने के बाद यदि मौहम्मद भी वैसे ही अवतार बन गए जैसे उनसे पहले के अवतार बने थे और उन्होंने गुफा से वापिस आकर बताने की कोशिश की कि उनको अल्लाह का रसूल बना दिया गया है तो आलोचक इस को halucination, मानसिक बीमारी, आदि साबित करने की कोशिश करते हैं।
इतिहास यह भी बताता है कि जब अवतार मौहम्मद ने कुरैश को पहली बार जमा किया और एक पहाड़ी पर चढ़कर उनसे कहा कि यदि मैं तुम से कहूँ कि इस पहाड़ी के पीछे से एक बड़ा लश्कर तुम पर हमला करने को आ रहा है तो क्या मानोगे; सबने एक आवाज़ में कहा कि हां मानेंगे, क्योंकि हमने आपको हमेशा सच्चा पाया। ऐसा सच बोलने के लिए जाने जाते थे मौहम्मद। तब उन्होंने घोषणा कि वह अल्लाह के रसूल हैं और उन्हें हक़ का मार्ग बतलाने के लिए भेजा गया है। इस समय तक भी अवतार मौहम्मद का आचरण ऐसा ही था कि हर मौके़ पर, भले ही काबा के पत्थर को लगाने पर झगड़ा हो, उनको ही मार्गदर्शन के लिए बुलाया जाता था।
अबू जहल और अबू सूफियान आदि की समस्या ही यह थी कि अवतार मौहम्मद उनके 360 खुदाओं के आगे केवल एक खुदा की बात करते थे जो सारी सृष्टि का रचियता है। वर्ना यदि मौहम्मद और खुदाओं के साथ अल्लाह को मानने की बात करते तो जो 360 को मान रहे थे उनको एक और को मानने में क्या आपत्ति होती; कुरैश ने पहले लालच देकर चाहा कि अवतार मौहम्मद अपनी शिक्षा से बाज़ रहें यह कहते हुए कि यदि उन को दौलत चाहिए तो हम दौलत के अंबार लगा देंगे, यदि औरतें चाहिए तो हम कुरैश की सब से खूबसूरत औरतें सामने लाकर रख देंगे और यदि ताक़त चाहिए तो हम अपना सरदार बनाने को तैयार हैं। लेकिन मौहम्मद का उत्तर था कि यदि वे एक हाथ पर चांद और दूसरे पर सूर्य को भी लाकर रख दें तो भी मैं सत्य के इस पैगाम को पहुंचाने से बाज़ नहीं आऊंगा। जब लालच देने से कोई काम नहीं बना तो डराया, धमकाया, फिर जुल्म और सोशल एवं आर्थिक बायकाट किया और फिर क़त्ल करने का इरादा कर बैठे।
पुस्तिका के लेखक ने हर स्थान पर सिवाय झूठ गढ़ने के कोई दूसरा काम नहीं किया। वह आगे लिखते हैंः
‘जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मान लिया उनको मौहम्मद ने अपने साथ ले लिया और जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मानने से इनकार कर दिया और उनकी आलोचना की तो उनकी हत्या कर दी गई। मौहम्मद ने एक इस्लामिक लश्कर बनाकर लूटपाट और नरसंहार करना शुरू कर दिया। मौहम्मद ने हज़ारों लोगों को बंदी बनाया और उनकी बेटियों और औरतों के साथ में बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वह बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं।’
यह इतिहास की किसी किताब से साबित नहीं है बल्कि निरा झूठ है और कुछ नहीं। पुस्तिका का लेखक कह रहा है कि जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मानने से इनकार कर दिया और उनकी आलोचना की तो उनकी हत्या कर दी गई। केवल झूठ लिखने के स्थान पर यह लेखक इतिहास की किसी जानी मानी किताब से कोई एक भी उदाहरण ऐसा दिखाए कि ऐसा कुछ भी हुआ हो। उनके कथन के विपरीत अपने रसूल होने की घोषणा के बाद मक्का के 13 वर्ष के दौरान हम देखते हैं कि अवतार मौहम्मद और उनके साथियो पर तरह तरह के जुल्म किए जाते रहे।
परमात्मा का अवतार होने की घोषणा के बाद करीब 13 वर्ष अवतार मौहम्मद ने मक्का में गुज़ारे और 10 वर्ष मदीना में गुज़ारे। अवतार होने की घोषणा के बाद पहले तीन वर्ष मौहम्मद ने खामोशी से धर्म के प्रसार में गुज़ारे लेकिन जब उन्होंने अपनी शिक्षा को सार्वजनिक करने की घोषणा की तो अधिकांश कुरैश उनसे दुश्मनी पर उतर आए।
अबू जहल जो कि बद्र में युद्ध करने आए कुरैश का कमांडर था उसने अपने गुलामों सुमय्या बिन्ते खब्बाब और उनके पति यासिर इब्ने आमिर पर इतनी यातनांए कीं कि दोनों की मौत हो गई। इसी प्रकार हारिस इब्ने यासिर और अब्दुल्लाह इब्ने यासिर पर अबू जहल ने इतने जुल्म ढाए कि उनकी भी मौत हो गई।
सब से पहले अवतार मौहम्मद की शिक्षा को अपनाने वालों में अम्मार इब्ने यासिर थे। जब उनके माता पिता को इस बात का पता चला तो उन्हें बड़ी चिंता होने लगी। लेकिन जब उन्होंने अवतार मौहम्मद की शिक्षा को सुना तो उन्होंने भी उनके रास्ते को अपना लिया। अबू जहल को जब यह पता चला तो उसने इनको हर प्रकार की यातनाएं देना प्रारंभ कर दिया। उनको कई कई दिन तक रस्सियों से बांध कर छोड़ दिया जाता। अवतार मौहम्मद वहां से गुज़रते तो रोते जाते और कहते जाते ‘सब्र करो यासिर के घर वालों, तुम को स्वर्ग में फिर से एक कर दिया जाएगा।’ एक दिन सुमैय्या ने अबू जहल से कहा कि तुम जो भी करो, हम इस्लाम को नहीं तर्क करेंगे। अबू जहल का गुस्सा चरम सीमा पर पहुंच गया और उसने एक भाला उठा कर सुमैय्या के पेट में घुसा दिया जिससे पति और बेटे के सामने उसकी मौत हो गई। फिर अबू जहल ने यासिर इब्ने आमिर को ऐसी लात मारी की उनकी भी मौत हो गई। यह थी जुल्म की इंतेहा जिसके बावजूद अवतार मौहम्मद अपने मानने वालों को केवल सब्र की नसीहत देते थे।
अनेक अन्य गुलामों जिसमें बिलाल इब्ने रबाह अल-हबशी भी शामिल थे उन पर जुल्म की हदें पार कर दी गईं। बिलाल को अबू जहल रात भर कोड़े मारता था यहां तक कि वह स्वयं थक कर चूर हो जाता। जब दिन की गर्मी अपनी चरम सीमा पर होती तो बिलाल को जलती हुई रेत पर लिटा देता और उनके सीने पर बड़ा सा पत्थर रख देता कि हिल डुल न पाएं। कभी उस भीषण गर्मी में बिलाल को गाय की चमड़ी में लपेट दिया जाता। गलते हुए चमड़े की गंध के कारण बिलाल को सांस लेना मुश्किल हो जाता। बिलाल के गले में रस्सी बांध कर उसको घोड़े से बांध दिया जाता और घोड़े को सड़कों पर दौड़ाया जाता। लेकिन इस सब के बावजूद बिलाल केवल अहद, अहद, यानी एक खुदा, एक खुदा बोलते रहते।
अनेक औरतें जो कनीज़ थीं, उनपर भी तरह तरह से जुल्म किए गए। लुबैनाह कनीज थी जिसको बेइन्तेहा पीटा गया, वहीं जुनैराह को इतना पीटा गया कि उसकी आंखों की रौशनी चली गई। उसको नींद, खाने और पानी से दूर रखा जाता, यहां तक कि इस सब की कमी से वह अंधी हो गई। अबू जहल उसका उपहास उड़ाता की अल-लात और अल-उज़्ज़ा खुदाओ ने उसकी आंखों की रौशनी ले ली। वह कहती थी कि अल्लाह ने ऐसा किया और वह जब चाहे उसकी आंखों की रौशनी लौटा देगा। अगले दिन चमत्कारी तौर पर उसकी आंखों की रौशनी पलट आई।
साद इब्ने उबैदाह पर इतना जुल्म किया गया कि वह मौत के करीब पहुंच गए। मुआब इब्ने उमैर अपनी जवानी, दौलत और शक्ल-ओ-सूरत के कारण मक्का में बड़े मशहूर थे। जब उन्होंने इस्लाम कुबूल किया तो उनकी मां ने उनको रस्सियों से बांधकर उन पर जुल्म किए ताकि वह उस रास्ते को छोड़ कर बाप दादा के रास्ते पर वापिस आ जाएं। आखि़र में सारे कपड़े उतार कर उनको सड़क पर फिंकवा दिया गया। अवतार मौहम्मद ने उनके नग्न शरीर को ढांपा।
जब अवतार मौहम्मद के रास्ते को अपनाने वालों के साथ ऐसा जुल्म हो रहा था तो स्वयं उनको कैसे छोड़ दिया जाता। अबू लहब की पत्नी उम्मे जमील रोज़ाना घर की सारी गंदगी अवतार मौहम्मद के दरवाज़े के बाहर फेंक देती थी। एक मरतबा अवतार मौहम्मद काबा के क़रीब अपने रब के आगे सिजदे में सिर झुकाए थे कि उक़बा बिन अबी मुअैत ऊंट की आंतरिड़ां उठा लाया और अवतार मौहम्मद की पीठ पर फेंक दीं। अवतार मौहम्मद ने सिजदे से सिर नहीं उठाया जब तक कि उनकी बेटी फातिमा ने आकर आंतरिड़ां नहीं हटाईं।
मौहम्मद गुज़रते तो अबू लहब उन पर पत्थर मारता। लोग अवतार मौहम्मद पर थूकते या उन पर कूड़ा या मिट्टी फेंकते थे।
जिस अवतार मौहम्मद ने अल्लाह की याद में इस प्रकार के जुल्म पर सब्र किया उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि उन्होंने स्वयं जुल्म किया होगा। बल्कि जब कुरैश के जुल्म बढ़ने लगे तो हिजरत से 7 वर्ष पहले, 614-615 ईस्वीं में, मौहम्मद के दीन को कुबूल करने वाले 11 मर्द और 4 औरतें मक्का छोड़ कर आज के इथियोपिया और एरिटरिया में जहां अकसुम नामी ईसाई हुकूमत थी, वहां के लिए हिजरत कर गए।
एक वर्ष बाद करीब 100 मुसलमानों ने मक्का से निकल कर उधर का ही रूख़ किया जहां ईसाई राजा नजाशी, जिसका असली नाम अशामा इब्ने अबज़ार था, उसने इन मुसलमानों को पनाह दी। कुरैश ने इन मुसलमानों का पीछा वहां तक न छोड़ा। अबू सूफियान नजाशी के सामने गया और उससे कहा कि यह लोग बाग़ी हैं और इन्हें उसके हवाले कर देना चाहिए। नज्जाशी ने उन लोगों को तलब किया लेकिन उनकी बातें सुनकर उन्हें अबू सूफियान के हवाले करने से इंकार कर दिया।
वर्ष था 617 ईस्वी जब कुरैश ने तमाम बनी हाशिम का, जिस कबीले से अवतार मौहम्म्द का संबंध था, पब्लिक बायकाॅट कर दिया। बायकाॅट इस लिए था कि क़बीला बनी हाशिम पर दबाव डालें कि वे मौहम्मद का साथ देना छोड़ दें। तीन वर्ष तक चले इस बायकाॅट में तमाम कुरैश ने बनी हाशिम से कोई भी सौदा या लेन देन तर्क कर दिया। कई कई दिन बनी हाशिम पहाड़ों पर भूखे रहते। कोई पेड़ की छाल खाने पर मजबूर था तो कोई अपने पेट पर पत्थर बांधता था कि भूख की शिद्दत न सताए। इस सोशल बायकाॅट में उठाई कठिनाईयों के कारण अवतार मौहम्मद के चाचा अबू तालिब और पत्नी खदीजा का देहांत हो गया।
अवतार मौहम्मद मक्का के करीब ताएफ नामी जगह पर अपनी शिक्षा के प्रसार हेतु गए तो वहां के लोगों ने बच्चों को लगा दिया कि वे हर ओर से उन को पत्थर मारें। अवतार मौहम्मद लहु लुहान हो कर ताएफ से वापिस आए।
ज़रा बताईए, जिन लोगों ने मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मानने से इंकार कर दिया या उनकी आलोचना की, उनकी हत्या अवतार मौहम्मद ने करवाई जैसा कि पुस्तिका के लेखक कह रहे हैं या अवतार मौहम्म्द के रास्ते को अपनाने वालों पर जुल्म और उनकी हत्याएं कुरैश ने करवाईं, जैसा कि मैं दिखा रहा हूँ।
मदीना पहुंचने के बाद भी मैं आप को जंगे बद्र, गज़वै तबूक और सुलह हुदैबिया का हाल बता चुका हूँ। यह कितना बड़ा झूठ है कि एक इस्लामिक लश्कर बना कर अवतार मौहम्म्द ने लूटपाट और नरसंहार करना शुरू कर दिया। किसी तर्क पर या ऐतिहासिक हक़ीक़त की बुनियाद पर आरोप लगाया जाए तो समझ में आता है, यहां तो पुस्तिका के लेखक निरा झूठ फैला रहे हैं।
अब आईए, अगले आरोप को देखते हैं। पुस्तिका के लेखक का आरोप है कि ‘मौहम्मद ने हजारों लोगों को बंदी बनाया और उनकी बेटियों और औरतों के साथ में बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वह बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं।’
यदि आप ने इतिहास पढ़ा है तो आप अनेक उदाहरण देख सकते हैं जहां युद्ध में पकड़े गए कैदियों पर हर प्रकार के जुल्म किए जाते थे। कितने उदाहरण तो ऐसे मिलते हैं कि युद्ध में पकड़े गए कैदियों को इसलिए क़त्ल कर दिया जाता था क्योंकि उनको ज़िंदा रखने का अर्थ था उनके खान-पान की व्यवस्था करना और हर समय डरते रहना कि कहीं कै़दी भाग न जाएं। उनको आज़ाद इसलिए नहीं किया जा सकता था कि वे फिर से जाकर दुश्मन से मिल सकते थे या एक बार फिर हमलावर हो सकते थे। ऐसे में कितने ही शासक क़ैदियों को क़त्ल कर देना उचित समझते थे।
जो शासक युद्ध-बंदियों को क़त्ल नहीं करते थे वे तरह तरह की यातनाएं देते थे। औरतों के पकड़े जाने पर उनके साथ बलात्कार किया जाना तो आम बात थी। एक नहीं बल्कि कई कई लोग बलात्कार किया करते थे। युद्ध-बंदी तो जाने दीजिए, किसी शहर पर क़ब्ज़ा कर लेने के बाद भी लूटमार करना, मर्दों को क़त्ल कर देना और बच्चों और औरतों को बंदी बना लेना और औरतों का बलात्कार करना यह आम बात थी। यह इसलिए भी किया जाता था कि दिमाग़ों पर ऐसा डर बिठा दिया जाए कि कोई बग़ावत करने की सोच भी न सके।
यज़ीद की फौज ने मदीना पर हमला किया तो सिर्फ मदीना में फतेहयाब होकर दाखिल होने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि फौजियों को आज्ञा दे दी कि खुल कर लूटमार और क़त्लेआम करें। तीन दिनों तक यज़ीदी फौज के सिपाही खुले आम औरतों का बलात्कार करते रहे। यहां तक कि मस्जिदे नब्वी में पनाह लेने वाली औरतों को भी नहीं छोड़ा गया। दिल्ली ने भी यह मंज़र देखा है कि नादिर शाह ने जब दिल्ली पर कब्ज़ा किया तो कई दिनों तक लूटमार, कत्ल-ओ-ग़ारत और औरतों का बलात्कार चलता रहा। मंगोलों के लिए तो ये आम बात थी कि जिस शहर पर भी हमला करते थे वहां के तमाम मर्दों और बूढ़ी औरतों को कत्ल कर देते थे। केवल जवान युवतियों और बच्चों को छोड़ते थे।
पुराने ज़माने की बातें तो जाने दीजिए। हाल के दिनों में देखिए। ग्वांतानामो बे की जेल में अमरीकी फौजियों द्वारा ईराक़ी और अफग़ानी कैदियों को दी जाने वाली यातनाएं सारी दुनिया ने देखीं। यह तो वे यातनाएं थीं जो तमाम पर्दों में से किसी प्रकार बाहर निकल आईं। ऐसा भी सुनने में आया कि अफग़ानिस्तान में क़ैदियों को लोहे के बड़े कंटेनर्स में भूखा प्यासा बंद कर दिया गया। तपती धूप में लोहे के कंटेनर्स भी तपने लगे। अन्दर प्यास और गर्मी से कैदियों की हालत यह थी कि एक दूसरे का पसीना चाट रहे थे और इसी हालत में सब की मौत हो गई।
यह तो हाल है अमरीका की सिविलाईज़्ड समझी जाने वाली सोसाएटी का। मयांमार में अपने को बुद्ध का अनुयायी मानने वालों के हाथों रोहिंग्या के साथ जो कुछ हुआ किसी से छिपा नहीं। बल्कि एक सरकारी अफसर ने तो भारत के किसी बड़े शहर के बारे में मुझे यहां तक बताया कि यह आम बात थी कि किसी बंगलादेशी युवती को पकड़ कर उसके साथ पुलिस की जीप में या थाने में ज़्यादती की हदें पार हो जाती थीं जबकि उसका पति या पिता या भाई उसी जीप या थाने के बाहर बेबस खड़ा उसके बाहर आने की प्रतीक्षा किया करता था। भारत में और हर देश में जब भी किसी बड़े स्तर पर दंगे हुए हैं, औरतें सब से पहले उत्पीड़ना का शिकार बनती हैं।
ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि इस्लाम ने युद्ध-बंदियों के साथ कैसा सुलूक करने का आदेश दिया है। कैदियों को भूखा रखने या उन पर जुल्म करने की बात तो दूर, कुरान जब धार्मिक या सच्चे इंसान की विशेषताएं बताता है तो कहता है कि अपने रब की खुशी के लिए खाना खिलाते हैं ग़रीबों को, अनाथ को और कैदियों को। और वे ऐसा किसी इनाम या बदले की लालच में नहीं, बल्कि केवल और केवल अपने रब की खुशी के लिए करते हैं।
Quran.Surah al-Insaan.76.8-9:
And they give food, in spite of their love for it (or for the love of Him), to the Miskeen (the poor), the orphan, and the captive,
(Saying): ‘We feed you seeking Allah’s Countenance only. We wish for no reward, nor thanks from you’
कुरान यदि मुसलमानों तक पहुंचा तो अवतार मौहम्मद के माध्यम से ही पहुंचा। न कुरान, न अवतार मौहम्मद और न मुसलमानों का खुदा कै़दियों से बुरा सलूक करने की शिक्षा दे रहे हैं।
इतिहासकार इब्ने कसीर के अनुसार उपरोक्त आयत बद्र के युद्ध के बाद आई जिसमें हमलावर कुरैश में के क़रीब 70 कैदी मुसलमानों के हाथ लगे थे। इब्ने अब्बास से रिवायत करते हुए इब्ने कसीर ने लिखा है कि यह आयत आने के बाद मुसलमान अपने सामने का पसंदीदा खाना उठा कर इन क़ैदियों के सामने रख देते थे।
इसी प्रकार इब्ने इस्हाक, जो उन लोगों में हैं जिन्होंने सबसे पहले अवतार मौहम्मद की जीवनी लिखी, एक क़ैदी की ज़बानी लिखते हैंः
“When they ate their morning and evening meals they gave me the bread and ate the dates themselves in accordance with the orders that the Prophet had given about us. If anyone had a morsel of bread he gave it to me,” Ibn Ishaq, an early biographer of the Prophet (peace be upon him), wrote quoting a prisoner of war.
जब वे सुबह या शाम का खाना खाते, तो अवतार मौहम्मद के हुक्म का अनुसरण करते हुए मुसलमान अपनी रोटी क़ैदियों को दे देते और स्वयं खजूर ही खाते। यदि किसी के पास रोटी का एक टुकड़ा भी होता तो वे उसे किसी कै़दी को दे देता।
अरब के रेगिस्तान में रोटी के टुकड़े की क्या अहमियत होती थी, आप अंदाज़ा कर सकते हैं।
कुरान का बड़ा ज़ोर गुस्से पर काबू पाने या दूसरों को माफ कर देने पर है। ज़रा सोचिए, माफ तो उसी को करने को कहा जाएगा जिसने आप के साथ बिना कारण कोई जुल्म या नाइंसाफी की है। माफ करने की बात यदि कुरान कर रहा है जो साबित है कि वे लोग ज़ालिम थे जिन्होंने मुसलमानों पर अनेक जुल्म ढाए थे लेकिन इस युद्ध के बाद वे पकड़े गए और मुसलमानों के हाथों क़ैद हुए। कुरान कहता हैः
Quran.Surah Aal-e-Imran.3.134:
Those who spend (freely), whether in prosperity, or in adversity; who restrain anger, and pardon (all) men:- for Allah loves those who do good;-
कुरान ने कैदियों को मुआवज़े के बदले या ऐसे ही आज़ाद कर देने की शिक्षा उस समय दी जब अरब सरहद से सटी रोमन एमपायर और उससे पहले assyrians और pharoahs के यहां ये आम प्रथा थी कि गर्म सलाख़ों से कैदियों की आंखें निकाल ली जाती थीं, उनको जिं़दा आग मेें डाल दिया जाता था या उनको खूंख़्वार कुत्तों के सामने छोड़ दिया जाता था। ऐसे सभी हालात में वे कैदी मौत को ज़िन्दा रहने से बेहतर समझते थे।
जहां यह धारणा आज तक सुनने को मिलती है कि युद्ध और मौहब्बत में सब कुछ जाएज़ है, कुरान ने न तो युद्ध में और न ही मौहब्बत में सब कुछ जाएज़ किया। बल्कि दोनों ही हालात में इंसान को हैवान बनने से रोका। अवतार मौहम्मद की कितनी ही हदीसें हैं जो मुसलमानों को किसी भी दूसरे को क़त्ल करने से रोकती हैं। युद्ध में जाने से पहले अवतार मौहम्मद लड़ने आए अपने साथियों से साफ शब्दों में कहा करते थे कि किसी बच्चे, औरत, बूढ़े या बीमार व्यक्ति को नहीं मारना। वह कहते थे कि युद्ध में भी धोकेबाज़ी जाएज़ नहीं, यानी तुम रात को हमला नहीं कर सकते, तुम किसी का खाना पानी नहीं बंद कर सकते और न ही किसी पर पीछे से वार कर सकते हो। वह कहते थे कि तुम किसी के अंग नहीं काट सकते। तुम खजूर या अन्य फल देने वाले पेड़ पौधे न तो काट सकते हो न जला सकते हो। तुम भेड़, गाय या ऊंट को भी नहीं मार सकते, सिवाय खाने के लिए। न किसी मंदिर या गिरजा में पुजारी या पादरी को मार सकते हो और न किसी ऐसे को क़त्ल कर सकते हो जिसने मंदिर, मस्जिद, चर्च, सिनेगाग आदि में पनाह ले ली हो या इबादत के लिए वहां गया हो। तुम गांव और शहरों को तबाह नहीं कर सकते, तुम खेतों और बाग़ों की फस्ल को तबाह नहीं कर सकते, और न ही मवेशियों को मार सकते हो। दुश्मन से युद्ध की कामना भी न करो बल्कि अल्लाह से इबादत करने के बाद दुआ मांगो कि तुम्हारी रक्षा करे। इसके बावजूद यदि युद्ध में तुम्हारा उनसे सामना हो जाए तो सब्र से काम लो।
Islam gives great emphasis on manners during a battle. There are many other Hadiths that urge Muslims not to kill others. Before engaging in a battle, the Prophet Mohammad used to instruct his soldiers:
· Do not kill any child, any woman, or any elderly or sick person” (Sunan Abu Dawud)
· Do not practice treachery or mutilation. Do not uproot or burn palms or cut down fruitful trees. Do not slaughter a sheep or a cow or a camel, except for food.” (Al-Muwatta)
· Do not kill the monks in monasteries, and do not kill those sitting in places of worship.” (Musnad Ahmad ibn Hanbal)
· Do not destroy the villages and towns, do not spoil the cultivated fields and gardens, and do not slaughter the cattle.” (Sahih Bukhari; Sunan Abu Dawud)
· Do not wish for an encounter with the enemy. Pray to God to grant you security, but when you (are forced to) encounter them, exercise patience.” (Sahih Muslim)
The Prophet had also issued clear instructions for good treatment of prisoners of war (PoWs).
A prisoner should not be coerced into renouncing his religion. He should be invited to Islam and given the choice to accept or reject the call.
अवतार मौहम्मद ने यहां तक हुक्म दिया कि किसी कैदी को भी ज़बरदस्ती मुसलमान बनने को नहीं कहा जा सकता। उसको इस्लाम में आमंत्रित ज़रूर किया जा सकता है पर यह उस पर है कि वह आमंत्रण को क़ुबूल करे कि न करे। आमंत्रण क़ुबूल न करने पर न तो उस पर जुल्म ज़बरदस्ती की जा सकती है और न ही उसको क़त्ल किया जा सकता है।
सूरह अन्फाल की आयत 70 देखिए जिसमें कुरान कै़दियों से नर्मदिली से पेश आने को कह रहा है और उनके साथ की गई तुम्हारी अच्छाई के बदले तुम्हारे गुनाह माफ करने को कह रहा है। यहां तक कहा जा रहा है कि यदि उन्हें माफ कर दो अल्लाह की ख़ातिर तो वह सब से बड़ा माफ करने वाला और रहम करने वाला है, वह भी तुम्हें माफ करेगा। क्या युद्ध-बंदियों के साथ ऐसे सुलूक का कोई और उदाहरण आप को कहीं और मिलता है?
Quran.Surah Anfal.70:
O Prophet! Say to those who are captives in your hands: “If Allah finds any good in your hearts, He will give you something better than what has been taken from you and He will forgive you. For Allah is Oft Forgiving, Most Merciful.
यही कारण है कि अवतार मौहम्म्द ने बुतों की पूजा करने वाले समामाह अल-हनफी को आज़ाद कर दिया। एक रिवायत के अनुसार समामाह अल-हनफी को गिरफतार करके मस्जिदे नबवी में अवतार मौहम्मद के सामने पेश किया गया। वह अपने पुराने विचारों पर क़ायम था। उसने अवतार मौहम्मद से कहाः यदि तुम ने मुझे क़त्ल कर दिया, तुम उसे मारोगे जिसके हाथ में खून लगा है, यानी जो बेगुनाहों के क़त्ल का ज़िम्मेदार है। यदि तुम बड़े दिल का नमूना पेश करते हुए मुझे आज़ाद कर देते हो, तो यह तुम उस व्यक्ति के साथ करोगे जो एहसान का बदला देना जानता है। यदि तुम दौलत के ख़्वाहिशमंद हो, तो मुझे बताओ तुम को जो कुछ भी चाहिए। दो दिनों तक अवतार मौहम्मद ने अल-हनफी के लिए कोई फैसला नहीं सुनाया। तीसरे दिन उन्होंने अपने साथियों से कहा कि उसको आज़ाद कर दो।
समामाह मस्जिद के क़रीब ही एक खजूरों के बाग़ में गया जहां उसने गुस्ल किया यानी नहा कर अपने को पाक किया, फिर वह दोबारा लौट कर अवतार मौहम्मद के पास आया और कहाः मैं गवाही देता हूँ कि कोई खुदा नहीं है सिवाय उस एक खुदा के, और मौहम्मद उस के बन्दे और रसूल यानी अवतार हैं। फिर उसने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, अल्लाह की क़सम, दुनिया में कोई चेहरा ऐसा नहीं था जिससे मैं आप के चेहरे से ज़्यादा नफरत करता था, लेकिन अब आप का चेहरा मेरे लिए सब से प्यारा चेहरा है। अल्लाह की क़सम, किसी भी धर्म से मैं आपके धर्म से ज़्यादा नफरत नहीं करता था, लेकिन अब आप का धर्म मेरे लिए सब से ज़्यादा प्यारा धर्म हो गया है। अल्लाह की क़सम, किसी ज़मीन से मैं आपकी ज़मीन से अधिक नफरत नहीं करता था, लेकिन अब आप की ज़मीन सब से अधिक प्यारी ज़मीन बन गई है।
बद्र के युद्ध में अवतार मौहम्मद ने यह भी दिखाया कि क़ैदी के भी कुछ हुकूक़ होते हैं। तन पर कपड़ा होना भी हर क़ैदी का हक़ है, ठीक वैसे जैसे आज़ाद इंसानों का हक़ है। सहीह बुखारी के अनुसार जब बद्र के युद्ध की समाप्ति पर क़ैदियों को लाया गया तो उस में अल अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब भी थे। उसके ऊपरी बदन पर कपड़ा नहीं था। अवतार मौहम्मद ने उसके लिए वस्त्र तलाश करना शुरू किया। अब्दुल्लाह बिन उबैय का वस्त्र उसके माप का था। अवतार मौहम्मद ने वह वस्त्र अल-अब्बास को दिया और अब्दुल्लाह को अपना एक वस्त्र बदले में भेंट के रूप में दिया।
इतिहासकार इब्ने कसीर के अनुसार अवतार मौहम्मद ने तमाम कै़दियों को अपने साथियों में बांट दिया और उन्हें हिदायत की कि वे उनसे नर्मी का बरताव करें। जैसा कि उस समय होता था, अंधेरे तहख़ाने, जिसमें धूप या हवा भी नहीं जाती थी, या ऊंची दीवारें जहां बरसात से लेकर धूप किसी से भी बचाव नहीं होता था, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि क़ैदी भी वही खाते थे जो वे लोग खाते थे जिनके सुपुर्द उन्हें किया गया था।
इस्लाम के जो आलोचक इसको दास और दासी प्रथा बताते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि इस्लाम ने सबसे पहले दास या दासी को आज़ाद करने पर बेइंतेहा सवाब यानी पुण्य रखा। इस पर इतना ज़ोर दिया कि कुछ ही दिनों में ये प्रथा एकदम समाप्त हो गई जबकि अमरीका और युरोप में यह प्रथा कब तक चल रही थी यह सब को पता है। क्या अमरीका और युरोप में कैदियों या दास दासियों के हुकूक का कोई कानसेप्ट था? नहीं था! आज क़ानून की किताबों में यह हुकूक अवश्य जगह पा गए हैं लेकिन ग्वानतानामो बे से बाहर आए वीडियो बताते हैं कि मर्द कैदी हों या औरत, हुकूक की बात केवल काग़जों पर रह जाती है। जब मन में नफरतें इतनी हों और हाथ में ताक़त हो, तो जुल्म होने से यदि कोई चीज़ रोक सकती है तो अपने रसूल या रब का हुक्म; यही सिखाता है कि इन हालात में भी कैसे अपने नफस पर काबू रखना है।
यहां पर एक बात साफ करना आवश्यक है। जिस समय अवतार मौहम्मद ने अपनी शिक्षा फैलाना प्रारंभ की, दुनिया के हर हिस्से में गुलाम प्रथा आम थी। इस्लाम द्वारा दिए गए बराबरी के संदेश के कारण ही अनेक गुलामों ने अवतार मौहम्मद का दीन अपनाया था। यह उनके मालिकों का इस्लाम के विरूद्ध मोर्चाबंदी करने का सब से बड़ा कारण बना। फिर इस्लाम पर गुलाम प्रथा को चालू रखने का इल्ज़ाम कैसे लगाया जा सकता है? कई आलोचक शायद इसलिए कंफयूज हो जाते हैं क्योंकि वो पाते हैं कि अवतार मौहम्मद युद्ध में हाथ आए कै़दियों को अपने साथियों को सौंप दिया करते थे। ज़रा बताएं, यह उन कैदियों के साथ बेहतर सुलूक था या उन्हें बड़ी बड़ी दीवारों के पीछे या तहख़ानों के नीचे रखना? अपनी सरज़मीन की रक्षा करना है तो उन्हंे फिर से छोड़ा भी नहीं जा सकता था।
जहां तक गुलाम प्रथा की बात है, हम पाते हैं कि इस्लाम चाहता है कि मुसलमान अपने गुलामों के साथ भी नर्मी से पेश आएं।
Quran.4.37:
And worship Allah and associate naught with Him, and show kindness to parents, and to kindred, and orphans, and the needy, and to the neighbour that is a kinsman and the neighbour that is a stranger, and the companion by your side, and the wayfarer, and those whom your right hands possess. Surely, Allah loves not the proud and the boastful.
अवतार मौहम्मद का एक क़ौल इस्लाम की इसी शिक्षा को विस्तारपूर्वक ब्यान कर रहा है जिसमें वह कहते हैं कि तुम्हारे गुलाम तुम्हारे भाई जैसे हैं जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे हाथ में दिया है, इसलिए उन्हें वही खाना खिलाओ जैसा तुम खाते हो, वही कपड़े पहनाओ जैसे तुम पहनते हो, उनपर ऐसा बोझ न डालो कि परेशान हो जाएं, यदि बोझ डाल रहे हो तो उनकी सहायता करो। क्या ऐसे सुलूक के बाद कोई गुलाम रहेगा या घर का हिस्सा बन जाएगा?
Sunan Ibn Majah, Book of Etiquette, Chapter: Beneficence towards slaves; Book 33, Hadith 34:
Slaves are your brothers whom Allah has put under your control, so feed them with the same food that you eat, clothe them with the same clothes you wear, and do not burden them with so much that they are overwhelmed; if you do burden them, then help them.
अली और फातिमा की ज़िंदगी का हाल बताते हैं। अली ने दो पहनावे ख़रीदे, एक सादा और सस्ता और दूसरा क़ीमती और अच्छे रंगों का। उनका गुलाम क़म्बर उनके साथ था। क़ीमती वाला उन्होंने क़म्बर को दे दिया। क़म्बर ने कहा कि मौला, ये वाला आप पहनें तो अली ने कहा कि क़म्बर तुम जवान हो, यह तुम पर ज़्यादा अच्छा लगेगा। फातिमा के घर फिज़्ज़ा काम अवश्य करती थीं लेकिन फातिमा का उसूल था कि एक दिन घर के काम वह स्वयं करती थीं और दूसरे दिन फिज़्ज़ा करती थीं।
जो लोग गुलाम प्रथा का आरोप लगाते हैं वे भूल जाते हैं कि यह प्रथा आज भी किसी न किसी शक्ल में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी है। शायद ये समाज की मजबूरी है कि इस प्रकार ग़रीब और बेसहारा लोगों का पेट भर जाता है। यदि इस्लाम ने और विशेषकर मौहम्मद, फातिमा और अली ने हमको नहीं दिखाया होता कि गुलामों के साथ कैसा सुलूक करना चाहिए तो शायद आज तक हम जान भी न पाते कि उनके हुकूक़ क्या हैं और उन्हें कैसे निभाया जाता है।
कुरान ने कितने ही स्थानों पर गुलामों को आज़ाद करने की बात की है।
Quran.90.13-14:
And what should make thee know what the ascent is? It is the freeing of a slave.
यह अवतार मौहम्मद की शिक्षा ही थी कि हम देखते हैं कि उनके साथी गुलामों को आज़ाद करने में एक से बढ़कर एक होड़ लगाते दिखाई देते हैं। अवतार मौहम्मद के कितने साथी बाज़ार से जहां गुलामों की ख़रीद और फरोख़्त हो रही होती, किसी गुलाम को ख़रीदते और आज़ाद कर देते। यहां तक कि अब्दुर रहमान बिन औफ जैसे लोग भी मिलते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 30000 गुलाम आज़ाद किए। क्या विश्व के किसी और हिस्से में आपको ऐसा होता नज़र आता है? यदि अब्दुर रहमान बिन औफ अपनी कमाई दौलत गुलामों को ख़रीद कर उन्हें आज़ाद करने पर ख़र्च कर रहे थे तो केवल अपने रब और रसूल की खुशी के कारण।
यहां कुछ लोग प्रश्न उठा सकते हैं कि इस्लाम ने एक बार में ही गुलाम प्रथा को समाप्त कर देने का हुक्म क्यों नहीं दिया। यह वह समय था जब गुलाम की ख़रीद और फरोख़्त आम थी। तमाम अरब दुनिया में, ईरान से लेकर मिस्र तक, युरोप और अफ्रीका में, गुलाम और कनीज़ की ख़रीद और फरोख़्त का काम चलता था। गुलाम या कनीज़ से पैदा पुत्र या पुत्री भी गुलाम या कनीज़ समझी जाती थी। इस्लाम को हर ज़माने के लिए दिखाना था कि गुलाम या कनीज़ के साथ कैसा सुलूक करना चाहिए। यहां तक कि इनकी शारिरिक आवश्यकताओं तक का ख्याल कैसे रखना चाहिए। कहा कि गुलामों या कनीज़ों की शादी कर दिया करो, यहां तक कहा कि यदि किसी कनीज़ से तुम्हारा कोई बच्चा पैदा हो जाए तो वह कनीज़ आज़ाद हो जाएगी और तुम्हारी पत्नी समझी जाएगी तथा उससे हुआ बच्चा तुम्हारा बच्चा समझा जाएगा।
जिन लोगों ने भारत में कोरोना के बाद हुए पहले लाकडाउन का दृश्य टीवी पर या अपनी आंखों से देखा है वह जानते हैं कि एकदम से लाकडाउन का हुक्म दे देने से आम जनता पर क्या क़हर टूटा। गुलाम प्रथा सदियों से चली आ रही थी। यह गुलाम अपने खाने पीने, कपड़े, छत आदि के लिए पूरी तरह अपने मालिकों पर आश्रित थे। यदि इस्लाम एक बार में यह हुक्म लागू कर देता तो वह सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क जो बना हुआ था वह अचानक टूट जाता और एक ऐसी सामाजिक विपदा खड़ी हो जाती जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है। ब्रिटेन और अमरीका ने 19वी शताब्दी में गुलाम प्रथा समाप्ति की ओर कदम बढ़ाए और इसी कारणवश अमरीका को एक बड़े गृह युद्ध से गुज़रना पड़ा जबकि इस्लाम ने सातवीं शताब्दी में ही गुलाम प्रथा समाप्त करने के लिए रास्ते तैयार करना प्रारंभ कर दिए थे।
इस्लाम के समय तक एक प्रथा यह भी थी कि किसी आज़ाद मर्द या औरत को जबरन पकड़ कर गुलाम के रूप में बेच दिया जाता था। ऐसे डाकू थे जो बस यही काम करते थे। गांवों या क़ाफिलों पर हमला करके बच्चों या बच्चियों को उठा लेते थे। जवान मर्द और औरतों को भी अग़वा करके बेच देते थे। जो लोग इस्लाम में दाखि़ल नहीं हुए थे, वे भी बहुतेरे इस काम में लिप्त थे। यदि इस्लाम गुलाम या कनीज़ की ख़रीद और फरोख़्त पर पाबंदी भी लगा देता तो भी यह व्यापार तो चलता ही रहता।
सलमान फारसी एक बड़े ख्याति पूर्ण आतिशपरस्त ईरानी ख़ानदान से थे। जब उनमें अधिक शिक्षा की ललक जागी तो ईसाई धर्म अपना लिया और ईरान से डैमैस्कस चले गए। जब वहां उन्होंने ईसाईयों की किताबों मंे पढ़ा कि आखि़री अवतार के आने का समय हो गया और मक्का में एक व्यक्ति ने अपने अवतार होने की घोषणा की है तो वह एक क़ाफिले में डैमैस्कस से मक्का में अवतार मौहम्मद से मुलाक़ात की ख़ातिर चले। रास्ते में उनके क़ाफिले पर हमला हो गया और उनको गुलाम बना कर बेच दिया गया।
इसके सैकड़ों वर्षो बाद तक हमला करके बच्चों या युवतियों को उठा कर गुलाम बनाकर बेच देने की प्रथा जारी रही। अमरीका में आज भी जितने अश्वेत लोग हैं उनके दादा परदादा किसी समय कहीं और से गुलाम बना कर इस धरती पर लाए गए थे। एक समय था जब दौलत की ख़ातिर युरोपियन व्यापारियों का यह पसंदीदा व्यापार बन गया था।
छठी-सातवीं शताब्दी में इस्लाम ने इस प्रथा को भी समाप्त किया कि किसी भी आज़ाद मर्द या औरत को गुलाम नहीं बनाया जा सकता। अवतार मौहम्मद ने ऐसा करने वाले के लिए अल्लाह की सख़्त नाराज़गी बताई। साथ ही मज़दूर की पूरी मज़दूरी देने को कहा।
Prophet Mohammad said, “Allah says, ‘I will be displeased with three persons on the Day of Resurrection: (1) One who makes a covenant in My Name, but does not fulfill it; (2) One who sells a free person (as a slave) and personally usurps the sale-proceeds; (3) and one who employs a laborer and gets the full work done by him but does not pay him his wages”.
जो लोग पहले से गुलाम हैं उनको आज़ाद कराने के लिए दो रास्ते बताए गए। या तो मुसलमान अगली जिंदगी के इनाम की ख़ातिर स्वयं ही गुलाम को आज़ाद कर देते या फिर एक सिस्टम बनाया गया जिसको मुकातबात कहते हैं जिसके अनुसार गुलाम स्वयं अपने को आज़ाद करने की रकम इस प्रकार मालिक को देता कि आज़ादी के बदले पहले से तय किए हुए घंटों के लिए मालिक के लिए काम करता। इस सिस्टम के तहत यदि गुलाम शर्तों को पूरा कर देता तो मालिक को उसको आज़ाद करना पड़ता।
कुरान कहता हैः
Quran.24.34:
And such as desire a deed of manumission in writing from among those whom your right hands possess, write it for them if you know any good in them; and give them out of the wealth of Allah which He has bestowed upon you.
यहां कुरान साफ शब्दों में कह रहा है कि यदि कोई गुलाम अपनी आज़ादी खरीदना चाहे, तो मालिक के लिए आवश्यक है कि गुलाम की मर्ज़ी के तहत उसको इतनी मोहलत दे कि गुलाम अपनी आज़ादी ख़रीद सके। बल्कि मालिक से कहा जा रहा है कि वह उस रक़म में से जो गुलाम ने दी है कुछ उसको वापिस दे दे ताकि आज़ाद होने पर उसे समस्या से जुझना न पड़े। यह मौहम्मद और उनके रब की मौहब्बत ही थी कि उनके मानने वाले गुलाम आज़ाद करने की होड़ में लग गए।
इस प्रथा के कुछ लाभ भी थे। जिस प्रकार आज बड़ी कारपोरेशंस चाहती हैं कि उनके नौकर लंबे समय तक कंपनी से जुड़े रहें और छोड़ कर न भागें। इसके लिए वे अपने नौकरों के मनोरंजन का ख़्याल रखते हैं, उन्हें घर देते हैं, उनके बच्चों की शिक्षा का और परिवार के इलाज का खर्चा बरदाश्त करते हैं। फिर भी जिसे जाना होता है छोड़ कर चल देता है।
हर व्यापारी चाहता है कि कुछ नौकर ऐसे हों जो निष्ठावान हों और उसके हित की सोचें। ऐसे में यदि गुलाम प्रथा की बुराईयां दूर कर दी जाएं तो इसमें भी अनेक लाभ ढूंढे जा सकते हैं। मुस्लिम इतिहास ने दिखाया कि कितने ही सुलतानों के गुलाम आगे चल कर फौज के कमानदार, यहां तक कि शासक ही बन गए। भारत में भी slave dynasty ने बड़े समय तक राज किया। यह सब इस्लाम द्वारा गुलामों के साथ बेहतरीन सुलूक करने की नसीहत का ही नतीजा था।
हक़ीक़त तो यह है कि दास प्रथा आज भी किसी न किसी शकल में जारी है। किसी भी शहर में चले जाइए, वहां के बड़े चैराहे पर रोज़ाना सैकड़ों मज़दूर इकट्ठा होते हैं, जो अपनी दिन भर की मज़दूरी के बदले थोड़ी सी रक़म चाहते हैं ताकि अपने घरवालों का पेट भर सकें। इनसे दिन भर आप दासता का ही तो काम लेते हैं? परन्तु यदि कोई मज़दूर बीमार पड़ जाए और चैराहे पर खड़ा होने को न आए, तो आप किसी और मज़दूर को घर ले जाएंगे। उस बेचारे मज़दूर का अब कौन ख्याल रखेगा जो घर पर बीमार पड़ा है।
कितनी ही फैक्ट्रियां हैं जहां 16-16 घंटे लोग काम करते हैं। सरकारें कानून बनाती हैं कि किसी मज़दूर की प्रताड़ना न हो लेकिन कितने ही उदाहरण हैं जहां मालिक मज़दूरों के हक़ को रौंदते नज़र आते हैं। सरकारें bonded labour के खिलाफ कानून बनाती हैं, child labour के खिलाफ सख़्ती करती हैं लेकिन समस्या आज भी ज्यों की त्यों है।
इस्लाम इनके हुकूक की भी अनदेखी नहीं करता। कभी कहता है कि मज़दूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मज़दूरी दे दो, कभी कहता है कि काम की जो भी मज़दूरी है पहले तय किया करो, और बाद में कटौती न किया करो, कभी अली अपने गुलाम क़नबर को पहनने का जो कपड़ा दिलाते हैं वह यह कहते हुए अपने से महंगा और बेहतर दिलाते हैं कि ‘क़नबर तुम अभी जवान हो, यह रंगीन कपड़ा तुम पर ज्यादा अच्छा लगेगा’, कभी फातिमा अपनी कनीज़ फिज़्ज़ा से एक दिन घर का काम करवाती नज़र आती है तो दूसरे दिन उसको आराम देती हैं और घर का काम स्वयं करती हैं। हसन के दस्तरख़्वान पर यदि किसी गुलाम के हाथ से डिश छूट कर गिर जाती है और वह डर की नज़र से हसन की ओर देखता है तो हसन बस इसी बात पर उसे आज़ाद कर देते हैं।
जहां तक युद्ध-बंदियो की बात है, कुरान साफ कह रहा है कि युद्ध-बंदी केवल वही हो सकते हैं जो आमने सामने के युद्ध मे विजय के बाद पकड़े गए। किसी क़बीले या देश पर या सफर करते क़ाफिले पर हमला करके लोगों को बंदी बनाना जाएज़ नहीं। किसी शहर पर क़ब्ज़ा करने पर वहां के निवासियों को क़ैदी बनाने की भी इस्लाम अनुमति नहीं देता।
Quran.8.68:
It does not behove a Prophet that he should have captives until he engages in regular fighting in the land. You desire the goods of the world, while Allah desires for you the Hereafter. And Allah is Mighty, Wise.
मैं तो आपको दिखा चुका हूँ कि कुरान तो अपने मानने वालों को युद्ध की समाप्ति पर बंदियों को आज़ाद कर देने तक की नसीहत दे रहा है।
Quran.47.5:
…[after the battle] either release them as a favour or by taking ransom — until the war lays down its burdens.
बल्कि जो लोग तुम पर हमलावर हुए हैं, कुरान उनके साथ भी बस उतनी सज़ा देने की बात कर रहा है कि जितना उनका क़सूर है। याद रखिए, मुसलमानों को हमलावर होने को नहीं कहा जा रहा, यदि दूसरा कोई हमलावर हुआ है तब उनके साथ नर्मी बरतने की बात हो रही है। यहां भी मुसलमान को अपनी भावनाओं और गुस्से पर काबू रखने की नसीहत दी जा रही है और कहा जा रहा है कि यदि तुम सब्र से काम लो तो सब्र करने वालों के लिए ही बेहतरीन इनाम है।
Quran.16.127:
And if you desire to punish the oppressors, then punish them to the extent to which you have been wronged; but if you show patience, then, surely, that is best for those who are patient.
इस सब की रौशनी में हम पाते हैं कि कुरान के अनुसार युद्ध-बंदी की कै़द उस समय समाप्त हो जानी चाहिए जब युद्ध की समाप्ति हो गई, किसी क़ैदी को उसकी ताक़त से अधिक काम करने को नहीं कहा जा सकता, किसी कै़दी को मारना-पीटना जाएज़ नहीं और कैदियों के खान-पान, कपड़े और सिर पर छत तक का इंतेज़ाम करना मुसलमान की ज़िम्मेदारी है। यदि अपने को मुसलमान कहने वाले हुकमरानों ने या बाद में आतंकवाद से जुड़े गुटों ने युद्ध-बंदियों को गुलाम बनाने की प्रथा का चलन कर दिया तो इसके लिए इस्लामिक शिक्षा ज़िम्मेदार नहीं।
पुस्तिका के लेखक आगे लिखते हैं कि ‘मौहम्मद ने हज़ारों लोगों को बंदी बनाया और उनकी बेटियों और औरतों के साथ में बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वह बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं।’
युद्ध-बंदियों की बात हम कर चुके। आप ने देखा कि अवतार मौहम्मद का हज़ारों लोगों को बंदी बनाना एक झूठा और निराधार आरोप है। यदि अवतार मौहम्मद ने कुछ लोगों को बंदी बनाया तो वे वो लोग थे जो इस्लाम या उनसे अपनी दुश्मनी के कारण हमलावर हुए थे और युद्ध में पराजय के कारण बंदी बन गए। वे बंदी बने ही इसलिए कि पराजित हुए। यदि वे विजयी हो गए होते तो अवतार मौहम्मद को ही क्यों छोड़ते।
इतिहास गवाह है कि इन लोगों ने इस्लाम को अपनाने वाले निर्दोष व्यक्तियों के साथ क्या क्या जुल्म किए। अवतार मौहम्मद की आलोचना करने वाले लोग यह बात क्यों नहीं करते कि जब इधर के लोग दुश्मनों के हाथ लगते थे तो उनके साथ क्या सुलूक होता था?
एक और आरोप है कि अवतार मौहम्मद ने जिन लोगों को बंदी बनाया उनकी बेटियों और औरतों के साथ बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वे बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं।
यह तो आप देख चुके हैं कि अवतार मौहम्मद ने जो भी युद्ध लड़े वे उनके साथ जिन्होंने उन पर हमला किया था या उनके खि़लाफ साज़िशें कर रहे थे। केवल फतह मक्का का एक वाक़िया मिलता है जिसमें अवतार मौहम्मद के साथ मुसलमान मक्का में दाखि़ल हुए। इसके पीछे भी इतिहास है, कि कैसे उनके साथ एक सुलह का एग्रीमेंट हुआ था और कैसे मक्का वालों ने उस एग्रीमेंट को भी तोड़ते हुए अवतार मौहम्मद के साथियों पर रात के अंधेरे में हमला करके अनेक मर्दों को क़त्ल कर दिया।
मक्का की फतेह के बाद भी तमाम मर्दों को आम माफी दे दी गई थी तो फिर औरतों को युद्ध बन्दी बनाने का क्या मतलब हुआ। अन्य युद्धों में अवतार मौहम्मद ने किसी अन्य देश या शहर पर हमला किया होता तब तो यह आरोप लग भी सकता था कि उन्होंने वहां कि औरतों को बंदी बना लिया होगा। बंदियों के साथ भी इस्लाम का जो रूख़ है वह आप पढ़ चुके हैं।
फिर पुस्तिका का लेखक क्यों बेबुनियाद आरोप लगा रहा है कि जिन लोगों को अवतार मौहम्मद ने बंदी बनाया उनकी बेटियों और औरतों के साथ बलात्कार किए और अपनी फौज और अपने साथियों को भी अनुमति दी कि वह बंदी औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं?
पुस्तिका के लेखक ने इस्लाम के एक कानून को न समझते हुए उसके साथ अनेक झूठ गढ़ कर पाठकों के सामने रखने की कोशिश की है। ज़ाहिर है जब अवतार मौहम्मद ने कोई आक्रमक कार्यवाई की ही नहीं तो इसका अर्थ है कि जो भी महिलाएं बंदी बनाई गईं वे वो थीं जो हमलावर फौज के साथ युद्ध में आईं थीं। क्या इनकी इस्लाम और अवतार मौहम्मद से नफरत किसी भी तरह मर्दों से कम हो सकती थी? बल्कि यह तो मर्दों का हौसला बढ़ाने आई थीं। उनसे दिलेरी से लड़ने को कहती थीं, मर्द पलट कर आते थे तो उनका उपहास उड़ाती थीं, उनकी मर्दांगी पर प्रश्न करती थीं कि उत्तेजित होकर वे फिर से युद्ध में पलट जाएं।
यदि इनकी फौज को पराजय मिलने के बाद यह औरतें मुसलमान फौजों के हाथ लगें तो फिर उन्हें क्या सुलूक करना चाहिए? क्या उन्हें आज़ाद कर दिया जाए, ऐसे में जब मुमकिन था कि उनके मर्द युद्ध में मारे जा चुके हों। या उन्हें कैदखाने में बंद कर देना चाहिए जैसा कि आम तौर पर रिवाज है? यहां पर कुछ लोग कहते हैं कि उस समय state prison यानी कै़दखाने का कानसैप्ट नहीं था इसलिए क़ैदियों को मुसलमानों में बांट दिया जाता था। यह कहना ग़लत है! क्योंकि यदि अवतार मौहम्मद चाहते तो क्या मुश्किल था कि ऊंची दीवारों का कोई मकान इसी के लिए ख़ास कर दिया गया होता। लेकिन अवतार मौहम्मद ने ऐसा नहीं किया। क्योंकि वह जानते थे कि क़ैदखाने अपनी समस्याएं लेकर आते हैं।
वह उस सोर्स के अवतार थे जो इंसानी नेचर का बनाने वाला है। इंसानी फितरत बनाने वाला खुदा बखूबी जानता है कि इंसान की क्या आवश्यकताएं हो सकती हैं। उसको दूसरों के समान खाने पीने, कपड़े और छत की आवश्यकता हो सकती है, इस ओर तो आलोचक नज़र दौड़ाते हैं, और उन्हें दिखाई देता है कि अवतार मौहम्मद ने कै़दियों को भी समान खाना पीना, कपड़े और रहन सहन देने के लिए कहा। लेकिन उन क़ैदियों की और भी नेचरल ज़रूरतें होती हैं इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। जिन कैदियों को, मर्द हों या औरतें, महिनों या सालों तक क़ैद में रहना है, उन्हें सैक्स से वंचित करना उन्हें इंसान नहीं बल्कि और अधिक वहशी ही बनाएगा।
लेकिन इस टाॅपिक पर आगे बात करने से पहले देखते हैं कि इस बाबत इस्लामी कानून क्या हैंः
1) महिलांए जो युद्ध में हिस्सा लेने नहीं आईं उन्हें गिरफतार नहीं किया जा सकता। केवल वही महिलाएं और पुरूष युद्ध-बंदी बनाए जा सकते हैं जो खुले तौर पर युद्ध में हिस्सा लेने आए हैं।
2) जिन महिलाओं को युद्ध-बंदी बनाया जाता है उनके लिए यह रास्ते खुले हैंः
अ) किसी भी कैदी को मुआवज़ा लेकर छोड़ा जा सकता है
इ) यदि कोई कैदी मुआवज़ा नहीं दे सकता, या वह या उसके लोग या उसका देश मुआवज़ा नहीं दे सकता, तो मुस्लिम हुकूमत उसको बिना मुआवज़ा लिए सदभाव में छोड़ सकती है।
उ) यदि हुकूमत किन्हीं कारणों से उस बंदी को नहीं छोड़ सकती, तो ज़कात फंड से उसको छुड़ाया जा सकता है।
ए) यदि यह भी मुमकिन नहीं है तो कैदी मुकातबात के तहत अपनी आज़ादी स्वयं खरीद सकता है कुछ शर्तों को पूरा करके।
यदि किसी महिला कैदी ने यह पांचवा रास्ता भी नहीं चुना तो फिर उसको किसी मुसलमान के हवाले करने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता। आवश्यक नहीं कि वह महिला कैदी कोई हसीन तरीन युवती हो। जिस किसी मुसलमान को भी यह महिला कैदी सौंपी जाएगी, उस पर लाज़मी होगा कि उसकी तमाम आवश्यकताओं का ध्यान रखे, भले ही वह उससे शादी करने का ख्वाहिशमंद हो कि न हो। यदि उस औरत से कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह अपने आप ही आज़ाद हो जाती है। इन्हीं औरतों के लिए कुरान ने कहा "whom the right hand possesses"। यानी वह जो जाएज़ तरीक़े से आईं।
ग़ौरतलब बात यह है कि अवतार मौहम्मद ने एक महिला को केवल एक पुरूष के सुपुर्द किया। क्या यह शादी से किसी तरह कम था? कैदियों की औरतों से बलात्कार तो तब होता जब कई कई सिपाही एक ही औरत के साथ रिश्ता बनाते या उसके साथ दुर्वयव्हार करते। अवतार मौहम्मद ने तो उस औरत की इज़्ज़त रखते हुए उसको एक मर्द के सुपुर्द किया।
यहां पर ग़ौरतलब यह है कि इस्लाम ने मर्द और औरत के नेचरल ख़्वाहिशात पर कभी क़ाबू रखने की कोशिश नहीं की। बल्कि इंसान का नेचर बनाने वाले खुदा से अधिक कौन समझ सकता था कि इंसान की कुछ नेचरल जरूरतें हैं जिनका पूरा होना आवश्यक है। इस्लाम ने सैक्स को कभी भी टैबू नहीं समझा, न ही निषेध किया, बल्कि विनियमित किया और उसको सामाजिक स्वीकृति दी, साथ ही इस बात का ख़ास ध्यान रखा कि कौन बच्चा किस बाप से है।
इस्लाम में चार शादियों को स्वीकृति देने वाले भूल जाते हैं कि इस्लाम ने एक से बढ़ा कर चार शादियों की इजाज़त नहीं दी बल्कि जहां सैक्स के नाम पर अधिकाधिक औरतों से संबंध रखना, जाएज़ या नाजाएज़, आम बात थी, इस्लाम ने संख्या को कम करते हुए चार शादियों तक स्वीकृति दी और उसके बाद भी मुसलमान को ऐसे कानून में बांध दिया कि बहुत ही कम लोग एक के बाद दूसरी शादी की सोच पाते हैं। शादी के बाहर मुसलमान मर्द या औरत के लिए जाएज़ नहीं कि वे किसी भी ग़ैर औरत को छूना तो दूर उसकी ओर आंख उठा कर भी देखे। केवल कुछ क़रीबी रिशते हैं जिनकी ओर कोई मुस्लिम मर्द आंख उठा कर देख सकता है, वह भी जाएज़ हुदूद में रहते हुए।
जो लोग मुसलमानों पर लव जिहाद का आरोप लगाते हैं वे भूल जाते हैं कि इस्लाम तो उस औरत की ओर आंख उठा कर देखने से भी रोकता है जिस के लिए कहा जाता है कि मुसलमान नवजवान बहला फुसला कर उसे अपने धर्म में लाने के लिए फंसाते हैं। यदि मुसलमान इस्लाम पर चल रहे होते तो उन युवतियों की ओर देख भी नहीं रहे होते।
इस्लाम ने जिस हद तक उन युद्ध-बन्दियों का ख़्याल रखा है जो अपने तमाम गुस्से और नफरत को दिल में रखते हुए हमलावर हुए और पराजित होने की सूरत में गिरफतार हुए, ऐसा उदाहरण कहीं और देखने को नहीं मिलता। इसके बावजूद यदि कोई युद्ध-बन्दियों से बनाए गए शारिरिक रिश्ते को बलात्कार कहे तो उसकी अक़ल या नीयत किसी एक में खोट अवश्य है।
इन आलोचकों को यह नहीं दिखता कि इस्लाम इन महिला युद्ध-बन्दियों के साथ अच्छा बरताव हो इसके लिए किस हद तक जा रहा है। यदि उन्हें अकेले छोड़ दिया गया होता तो न केवल उनके सामने अनेक ख़तरे होते बल्कि समाज में या फौज में अनैतिक कुकृत्य फैलने का कारण बनता। ज़रा सोचिए, यदि ऐसी युद्ध-बन्दी औरतों को समाज में ऐसे ही आज़ाद घूमने दे दिया गया होता तो उससे समाज के ताने बाने पर क्या असर पैदा हो सकते थे?
यही नहीं, इन महिला युद्ध-बन्दियों से शादी करने की भी शर्तें थीं, जिनको मुसलमानों को मानना था। ज़रा दिल पर हाथ रखकर बताएं कि क्या कोई व्यक्ति किसी का बलात्कार कुछ शर्तों के अधीन रह कर करता है या केवल अपनी वासना या नफरत की पूर्ती के लिए?
यह शर्तें निम्नलिखित हैंः
1) उस महिला का पति उसके साथ गिरफतार नहीं किया गया हो। यदि वह गिरफतार किया गया है तो महिला अपने पति के साथ ही रहेगी।
2) यदि युद्ध-बन्दी बनने से पहले वह महिला शादीशुदा थी तो उसको इस्तिबरा यानी एक ख़ास समय तक किसी पुरूष को नहीं दिया जा सकता। यह इसलिए आवश्यक था ताकि मालूम हो सके कि महिला अपने पति से गर्भवती तो नहीं है, यानी यह बिलकुल साफ हो सके कि पैदा होने वाले बच्चे का बाप कौन है। क्या वासना या नफरत की पूर्ती के लिए किए जाने वाले बलात्कार में कोई मर्द इस सब का ध्यान रखता है?
3) किसी भी हाल में यह इजाज़त नहीं थी कि कोई औरत एक ही समय में दो मर्दों से रिश्ता रखे।
4) यदि कोई दूसरा मर्द किसी युद्ध-बन्दी महिला से विवाह करना चाहे तो वह महिला जिस पुरूष के पास है केवल उसकी इजाज़त से ही वह शादी कर सकता है। यह शादी करने के लिए भी महिला को जिस पुरूष के पास वह थी उससे इतने समय के लिए अलग रहना होगा कि यह साफ हो जाए कि वह उससे गर्भवती तो नहीं है।
5) यदि कोई पुरूष उसके पास जो युद्ध-बन्दी महिला थी उसका विवाह किसी दूसरे पुरूष से कर दे तो अब वह उस महिला से कोई भी रिश्ता नहीं बना सकता।
6) यदि कोई पुरूष किसी युद्ध-बन्दी महिला से शारिरिक रिश्ता बनाता है तो वह उस महिला की मां या बेटियों से कोई रिश्ता नहीं रख सकता।
7) किसी पुरूष के लिए जाएज़ नहीं कि वह एक साथ दो बहनों से रिश्ता बनाए, जो दोनों युद्ध-बन्दी हैं। इस्लाम किसी मर्द को एक ही समय में दो बहनों से शादी करने की भी इजाज़त नहीं देता।
ऐसा भी नहीं था कि कोई भी मुसलमान जिस औरत से चाहे रिश्ता बना ले। बल्कि केवल उसी को इजाज़त दी गई जिस की शरण में उस महिला युद्ध-बन्दी को रखा गया था। यहां यह याद रखना आवश्यक है कि वे युद्ध-बन्दी थीं; उनको उनकी मर्ज़ी के व्यक्ति के साथ रहने को नहीं दिया जा सकता था।
ग़दीर के मौक़े पर अवतार मौहम्मद के शब्द आप को याद दिलाते हैं जब उन्होंने हज से लौट रहे लोगों को जमा करके उनसे पूछा था कि क्या तुम्हारी जानों पर तुम से अधिक मेरा हक़ नहीं है। सब ने कहा था कि ऐसा ही है। अपनी जानों पर दूसरे को हक़ वही देगा जो उन्हें अल्लाह की ओर का अवतार मान रहा हो और जिसे यक़ीन हो कि वह स्वयं किसी भी हाल में अल्लाह की कुदरत से बाहर नहीं निकल सकता।
क्या यह एक तरह से शादी ही नहीं है? ज़रा गौर करें, शादी क्या होती है? शादी और अवैध रिश्ते में क्या अन्तर होता है? हिन्दुओं में शिव-शक्ति को साक्षी मान कर 7 फेरों या मुसलमानों में निकाह के सीग़ों के पढ़े जाने से ही तो वह रिश्ता जाएज़ हो जाता है जो अन्यथा नाजाएज़ होता है। कोर्ट मैरिएज में केवल एक मोहर से वही रिश्ता जाएज़ हो जाता है। यहां वह मोहर स्वयं अल्लाह के रसूल की थी।
इस्लामी क़ानून किस ने बनाकर मुसलमानों के सामने पेश किए थे? आप कहेंगे कि अवतार मौहम्मद ने। उन्होंने ही तो कहा कि निकाह के यह सीग़े पढ़ लेने से मर्द और औरत का आपस में बनने वाला रिश्ता जाएज़ हो जाएगा। यदि उन्ही अवतार मौहम्मद ने किसी युद्ध-बन्दी को, जिसको आज़ाद करना मुमकिन नहीं था, किसी मुसलमान के हवाले कर दिया, शायद ऐसे को कि जिस की शादी भी नहीं हुई थी, या जिसकी पत्नी का देहान्त हो गया था, या जिसको अवतार मौहम्मद ने देना ठीक समझा, तो यह रिश्ता भी इस्लाम की नज़र में जाएज़ है और इस रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चे न केवल जाएज़ औलाद समझे जाएंगे बल्कि बच्चे की पैदाईश पर वह महिला आज़ाद समझी जाएगी।
क़ैदी होने के कारण उसे पूर्ण आज़ादी तो नहीं मिल सकती थी लेकिन इस्लाम उसके बावजूद उस महिला को आज़ाद इंसानों की तरह रहने की अनुमति दे रहा है।
अवतार मौहम्मद से पहले और अब तक के तमाम इतिहास पर नज़र रखते हुए बताईए कि युद्ध-बन्दियों को लेकर कहीं और कोई क़ानून मिलते हैं। ऐसी शादियों से न केवल इन क़ैदी महिलाओं की ज़िन्दगी का स्तर ऊंचा होता, बल्कि उन्हें अपना परिवार बनाने में मदद मिलती। इसलिए यह उन महिलाओं के साथ बदसलूकी के तहत बना कानून नहीं बल्कि बावजूद इसके कि वे युद्ध में हमलावर फौज का हिस्सा थीं, यह उनको अनैतिक रास्तों से दूर रखते हुए उनकी मर्यादा और गरिमा को बचाए रखने का रास्ता था। इनमें अधिकतर वे महिलाएं थीं जिनके पति या पिता मारे गए थे और उन्हें छोड़ देने का अर्थ था उनके ही लिए अधिक परेशानियां।
बस एक प्रश्न उत्तर देने से रह गया! वह यह कि इस्लाम ने इन महिलाओं को इजाज़त क्यों नहीं दी कि वे अपना पति स्वयं चुन सकें?
यहां पर यह याद रखना आवश्यक है कि महिलाएं युद्ध-बन्दी थीं। आज भी युद्ध होते हैं तो अधिकतर महिलाएं घरों में रहती हैं। यदि ये महिलाएं युद्ध में किसी भी प्रकार हिस्सा लेने को आईं थीं तो साफ है कि इनके दिलों में ऐसी ही नफरत और गृणा रही होगी। ऐसे बन्दियों को अपनी मर्जी से चलने भी नहीं दिया जा सकता। वे पूरी इस्लामिक सोसायटी का ताना बाना नष्ट कर सकती थीं। वे यहां रहते हुए भी दुश्मन से सम्पर्क बना सकती थीं या उसके लिए जासूसी कर सकती थीं। यही तो डर हैं जिसके चलते लोग युद्ध-बन्दियों को कैदख़ाने मेें डाल देते थे, बांध कर रखते थे या क़त्ल कर देते थे।
फिर यदि इन महिलाओं को अपना स्वयंवर चुनने की इजाजत दे दी जाती तो यह केवल दौलतमंद और जवान मर्दों को ही चुनतीं जबकि युद्ध मेें दूसरों ने भी बराबर का हिस्सा लिया था। यदि उनमें से आधा दर्जन अवतार मौहम्मद को ही चुन लेतीं जैसे कि राजा के वध के बाद उसकी 16000 या 16100 पत्नियों ने अपने को कृष्ण के सुपुर्द कर दिया था तो भी तुम उस पर उंगली उठाते।
इस्लाम जहां इन महिलाओं की जरूरतों को पूरा होते देखना चाहता था वहीं इस्लामी समाज के ताने बाने को नष्ट होने से भी बचाना आवश्यक था। इसलिए महिला की उम्र आदि को देखते हुए उसकी ज़्यादा आवश्यकता किस व्यक्ति को हो सकती थी और कहां वह सकुशल लेकिन भागे बिना रह सकती थी, इसको देखते हुए फैसला लिया जाता था कि किस को किस के सुपुर्द करना है। यदि कोई मर्द किसी से शादी करना चाहता था तो वह भी इसके लिए आज़ाद था।
इस कानून पर ऐसे अम्ल होता था कि जब ईरान के बादशाह को युद्ध में शिकस्त हुई और उसकी पुत्री कै़दी बन कर आई तो अली ने राय दी कि उसको स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति दी जाए। उस युवती ने चारों ओर नज़र दौड़ाई तो उसकी नज़र अली के ही पुत्र पर ठहर गई। बाप किसी युद्ध-बंदी महिला के सम्मान को बनाए रखने के लिए उसकी शादी अपने पुत्र से करा दे तो कोई दिमाग़ी मरीज़ ही इसको बलात्कार का नाम देगा।
अवतार मौहम्मद के बाद मुसलमानों ने यदि अपने मनमाने तरीक़े से इन कानूनों में रद्दोबदल किया तो इसके लिए इस्लाम या अवतार मौहम्मद का क्या दोष?
No comments:
Post a Comment