Thursday, 27 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-B: हक़ और हक़ीक़तें

हक़ और हक़ीक़तें

‘मौहम्मद’ के शीर्षक से एक 9 पेजेज़ की पुस्तिका व्हाटसएप ग्रुप पर घूमते घूमते मुझ तक भी आ गई। बड़े दिनों तक मुझे पता नहीं था कि 192 पेजेज़ की किताब भी कुछ लोगों तक पहुंच गई है। जिस दिन मुझे ख़बर मिली कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस किताब पर पाबंदी लगाने के लिए दी गई याचिका को ख़ारिज कर दिया है उसी दिन मुझे पूरी किताब की जानकारी हुई। इस समय तक 9 पेजेज़ की पुस्तिका पर मेरे यह विचार एक पुस्तक की शक्ल ले चुके थे जो आप के सामने पेश है।

जिस 9 पेजेज़ की पुस्तिका के उत्तर पर मेरी यह किताब आधारित है, वही सब 192 पेजेज़ की अस्ल पुस्तक के प्रारंभ में ‘संक्षिप्त परिचय’ के शीर्षक के तहत दर्ज है। यानी यह कि मेरी यह कोशिश 192 पेजेज़ के उत्तर में नहीं है बल्कि 9 पेजेज़ की जो पुस्तिका मेरे हाथ लगी, उस पुस्तिका के उत्तर में है। हालांकि 9 पेजेज़ की पुस्तिका में सारांश में तमाम वही बातें कही गई हैं जो 192 पेजेज़ की पुस्तक में विस्तार से दी गई हैं। यदि कुछ बातें उत्तर देने से रह गई हैं और यदि आवश्यकता पड़ी तो उनका उत्तर किसी और समय किसी और पुस्तक की शकल में देने की कोशिश करूंगा। 

इस किताब में हम केवल 9 पेजेज़ की पुस्तिका में उठाए गए प्रश्नों पर बात करेंगे और देखेंगे कि इस पुस्तिका के लेखक ने जो कुछ लिखा है वह कितना तर्कपूर्ण और सत्य पर आधारित है।

पुस्तिका के प्रारंभ में लेखक के रूप में सय्यद वसीम रिज़वी का नाम तहरीर है और अंत में लेखक की तस्वीर भी पुष्टि करती है कि वही अपने को लेखक के रूप में पेश कर रहे हैं। सय्यद वसीम रिज़वी को जितना मैंने विभिन्न वीडियोज़ में देखा है, मुझे नहीं लगता कि यह उनका काम है क्योंकि जो बातें इस लेख में हैं वे हर ज़माने में इस्लाम और अवतार मौहम्मद पर हमला करने वाले लोग बोलते आए हैं। वही घिसी पिटी बातें जिनका कोई सिर पैर नहीं है, जो हक़ीक़त और इतिहास के बिलकुल विरूद्व हैं। सय्यद वसीम रिज़वी तो एक मोहरा है; यदि आप यूटयूब और दूसरे सोशल मीडिया चैनल्स पर नज़र दौड़ाएं तो आप पाएंगे कि एक एजेंडे के तहत कई लोग अवतार मौहम्मद, इस्लाम और मुसलमानों पर हमलावर होने में लगे हैं। इनमें ऐसे भी हैं जो अपने को बड़ा ज्ञानी ज़ाहिर करते हैं, जो कुरान और इतिहास पर रिसर्च करने का दावा करते हैं लेकिन जो कुछ बोलते या लिखते हैं, वह तथ्यों से बहुत दूर होता है। 

प्रश्न यह उठता है कि क्यों अनेक लोग एक एजेंडे के तहत अवतार मौहम्मद के चरित्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश में लगे हैं? क्यों इस काम के लिए करोड़ों रूप्ये ख़र्च किए जाते हैं और बड़ी प्रोपेगेंडा कैम्पेन चलाई जाती हैं ताकि अवतार मौहम्मद के चरित्र को बुराईयों से जोड़ कर पेश किया जाए? हम दिखाएंगे कि यह कोई नई बात नहीं है; यह अवतार मौहम्मद के दुनिया में आने से पहले भी होता आया और आज भी हो रहा है। यदि आप इसका कारण नहीं समझ पाए तो आप हक़ और हक़ीक़त की समझ तक नहीं पहुंच पाएंगे।

यह तो हर हिन्दु, मुसलमान, यहूदी और ईसाई मानता है कि हम कलियुग में जी रहे हैं। End Times को लेकर अवतार मौहम्मद की अनेक भविष्यवाणियां हैं जिनसे हमें पता चलता है कि अंतिम ज़माने में लोग हक़ और हक़ीक़त से कैसे गुमराह हो जाएंगे। हिन्दुओं की भी मान्यता है कि कलियुग में केवल 25 प्रतिशत पुण्य बचेगा और 75 प्रतिशत पाप हमें घेर लेंगे। यहूदी तो बड़ी शिद्दत से उस End Time Mashiach के आने की प्रतीक्षा में हैं जिसके आने पर खुदाई हक़ीक़तें उजागर हो जाएंगी और सत्य और असत्य का अंतर जगज़ाहिर हो जाएगा। Evangelical Christians ईसा के पुनः दुनिया में आने की बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे हैं जिनके आने पर हक़ और हक़ीक़तें दिन के उजाले के समान हमारे सामने होंगी। मुसलमान भी मेहदी नाम के मसीहा के आने की प्रतीक्षा में हैं जिनके आने पर केवल सुख और शांति का साम्राज्य होगा और तमाम लोग सृष्टी के एक रचियता की पूजा और इबादत की ओर आ जाएंगे।

बड़ा प्रश्न यह है कि यह हक़ीक़तें पर्दे में गई ही क्यों? धरती के किसी हिस्से में यदि कृष्ण ने खुदाई राह को बताया तो कहीं मूसा ने अपने मानने वालों के लिए 10 Commandments छोड़ीं, ईसा ने फिर से पथ को प्रदर्शित किया तो अवतार मौहम्मद के मानने वालों के अनुसार उन्होंने हक़ और हक़ीक़तों को ऐसे पेश किया कि अब उनकी समझ से दूरी बनाना मुमकिन नहीं था। इसके बावजूद तमाम धर्म इस पर सहमत हैं कि कलियुग में पापों का बोलबाला होगा और हक़ और हक़ीक़तें पर्दों के पीछे गुम हो जाएंगी। क्या इंसान इस लाएक़ नहीं बन पाया कि उसको दी गई ज्ञान की धरोहर को बचा कर रख पाता? क्या हैं इसके कारण और क्यों हम उन हक़ और हक़ीक़तों से इतना दूर आ चुके हैं कि किसी अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह आ कर हमारा मार्गदर्शन करेगा? 

मेरा मानना है कि कलियुग के अंतिम दौर में जब सत्य सामने आने को है, जब पर्दों के पीछे छिपा हक़ और हक़ीक़तें उजागर होने को हैं, तब जुलमत यानी शैतानी यानी तमसिक ताक़तों की यह अंतिम कोशिश है कि किसी प्रकार हक़ और हक़ीक़तों पर से पर्दा न उठने पाए। पर यह तो विधाता की मर्ज़ी है कि हक़ और हक़ीक़तें उजागर होंगी जब कलकी अवतार अर्थात मेहदी कलियुग के अंत में आएंगे। ऐसा जिस समय होगा, उस समय सत्यमार्ग एकदम साफ सामने आ जाएगा और उससे विचलित तमाम रास्ते पथभ्रष्ट ठहराएंगे। 

आज दुनिया जब कलियुग के अंत तक पहुंच रही है तो हम उस मोड़ पर आ चुके हैं कि मुसलमान शिया, सुन्नी, वहाबी और अनेक दूसरे मतों में बंटकर उस खु़दाई दीन से कोसों दूर आ चुके हैं जो हर ज़माने में सीधा रास्ता था। हिन्दु भी वेद द्वारा बताए गए सनातन मार्ग से दूर आ चुके हैं। हर अवतार ने इस सृष्टि के एकमात्र रचियता के आगे नतमस्तक होने के साथ मनुष्य से आहवान किया था कि वह अपनी आत्मा को पाकीज़गी की राहों पर लगाएगा। लेकिन विभिन्न धर्मों के मानने वाले अपने अपने धर्म का नाम जपते जपते दुनिया में ऐसे गर्क़ हो गए कि नूर या रूहानियत के मार्ग को भूल गए। हर किसी ने किसी अवतार को पकड़ कर उसकी मौहब्बत में उसके बताए गए पथ को एक नए धर्म का नाम दे दिया। 

दूसरी ओर अवतार मौहम्मद के मानने वालों ने तो एक ही पैग़म्बर की शिक्षा को इतने भिन्न प्रकार से समझा कि विभिन्न पंथ यानी फिरके़ बना लिए। इस सब के पीछे जु़लमत यानी तमसिक ताक़त थी जिसने हर जमाने में आए अवतारों की शिक्षा से लोगों को भ्रमित करने की हर मुमकिन कोशिश की। यही जुलमत का काम रहा है हर ज़माने में और तब तक जारी रहेगा जब तक अंतिम मसीहा आकर हक़ और हक़ीक़तों को दिन के उजाले के समान रौशन नहीं कर देगा। 

मैत्री उपनिषद के अनुसार वेद और दूसरे स्क्रिपचर्स की समझ से दूर करना जुलमत यानी तमसिक ताकतों का मक़सद है। हर जमाने में वे गुमराह ही करती रहीं। उपनिषद यहां तक कहता है कि जुलमत यानी तमसिक ताकत़ों को बिलकुल ही भिन्न राह दिखाई गई। कमअक़ली और ignorance की इस भूल भुलय्या को इंद्रदेव की हिफाज़त के लिए रचा गया क्योंकि असुर यानी शैतान यानी डेमंस जानते थे कि इंद्रदेव ही देवताओं के राजा हैं और यही देवता मोक्ष यानी निजात यानी salvation का पथ प्रदर्शित करने वालों के लीडर हैं। साफ कहा जा रहा है कि असुर यानी डेमंस यानी जुलमत यानी तमसिक यानी शैतानी ताक़तों के कारिंदे सत्य को असत्य, अशुभ को शुभ और शुभ को अशुभ के रूप में देखते हैं। उपनिषद कहता है जो भी शिक्षा इंद्रदेव के विरूद्व हो वो एक बांझ औरत के समान है और ग़लत है। जो कोई इंद्रदेव के विपरीत असुरों द्वारा फैलाई गई शिक्षा को गलत नहीं कहता या समझता वह गुमराह है क्योंकि यह भ्रमित कर देने वाली बातें वेदों और अन्य ग्रन्थों के भी विपरीत हैं। असुरों द्वारा फैलाई इस शिक्षा को जो अपनाता है वह सत्य मार्ग से पथभ्रमित हो गया। 

Maitri Upanishad.VII.9:

Verily, Brhaspati (the teacher of the Devas) became Sukra (the teacher of the demons) and for the security of Indra and for the destruction of demons created this ignorance. By this (they) declare the inauspicious to be auspicious and the auspicious to be inauspicious. They saw that there should be attention to the law which is destructive of the (teachings of the Vedas) and the other scriptures. Therefore one should not attend to this teaching. It is false. It is like a barren woman. Mere pleasure is the fruit there of as also of one who has fallen from the proper course. It should not be attempted. For this has it been said: Widely opposed and divergent are these two, the one known as ignorance, and the other as knowledge. I (Yama) think that Naciketas is desirous of obtaining knowledge and many desires do not rend you. He who knows at the same time knowledge and ignorance together, having crossed death by means of ignorance he wins the immortal by knowledge. Those who are wrapped up in the midst of ignorance, fancying themselves alone wise and learned, they wander, hard smitten and deluded like blind men led by one who is himself blind.

कहा जा रहा है कि “For the security of Indra and destruction of demons created this ignorance.” इस के बाद तो उपनिषद को प्रिय रखने वालों को चाहिए था कि सारी किताबें खंगाल डालते यह जानने के लिए कि इंद्रदेव कौन हैं और उनका सृष्टि में क्या रोल है जिनके लिए इतनी तैयारी की जा रही है कि तमसिक यानी शैतानी ताक़तों यानी जुलमत को ही किसी ज्ञान से अंधेरे में रखा जा रहा है। वह ज्ञान क्या है और किधर लेकर जाता है, यह भी जानने की कोशिश होनी चाहिए थी। लेकिन जुलमत यानी तमसिक ताक़तों के कारिंदों ने हमें उस पथ से ऐसा विचलित कर दिया कि हमें चिंता ही नहीं कि जानने की कोशिश करें कि इंद्रदेव कौन हैं और जिन किताबों को हम ईश्वरीय या आदरणीय मान रहे हैं वे हमारी बेहतरी का क्या मार्ग दिखा रही हैं? 

यहां पर ग़ौर करने का विषय यह है कि कलियुग का एक बड़ा दोष यह है कि हमने हक़ और हक़ीक़तें जानने की कोशिश ही त्याग दी है। अधिकांश लोग दुनिया के मोह में ऐसा गिरफ्तार हैं कि उन्हें परवाह नहीं कि जानें कि सत्यमार्ग क्या है। जो जिस धर्म और सोच के मानने वालों में पैदा हो गया है वह उसी धर्म और सोच को सत्य माने बैठा है और अपना आंक्लन करने के स्थान पर दूसरों के धर्म और सोच में खोट निकाल रहा है। मोक्ष यानी निजात यानी salvation की बस बातें ही रह गई हैं, उस मार्ग पर चलने वाले गिनती के दिखाई देते हैं।

मैत्री उपनिषद साफ शब्दों में कह रहा है कि जो भी सत्य मार्ग के ज्ञान और demons यानी जुलमत यानी तमसिक ताक़तों के कारिंदों द्वारा फैलाई जा रही गुमराहकुन बातों के अंतर को समझता है वही मौत के पार हमेशा की जिंदगी पाता है। और जो demons यानी जुलमत यानी तमसिक ताक़तों द्वारा फैलाई अज्ञानता में डूब जाता है, वह भले ही अपने को बड़ा अकलमंद और ज्ञानी जान रहा हो, वह गुमराही के मार्ग पर ऐसे अंधों के समान चलता है जिसको राह दिखाने वाला भी अंधा हो। यह उपनिषद का ब्यान है जो साफ कह रहे हैं कि इन जुलमत के कारिंदों यानी डेमोनिक ताक़तों की अंतः पराजय होगी और इंद्र देव, जिनकी सुरक्षा के लिए यह भुल भुलय्या बनाई गई थी, उनकी अंतः विजय होगी। यदि सच्चे मायनी में सनातन धर्मी हो तो पहचानो कौन हैं इंद्रदेव और क्या है उनका रोल इस सृष्टि में!

आगे देखिए मैत्री उपनिषद का अगला मंत्र क्या कह रहा हैः

इंद्रदेव देवताओं के राजा हैं और यहां साफ हो रहा है कि यह demons यानी जुलमत यानी तमसिक ताक़तें हर जमाने में इंद्रदेव और अन्य देवताओं के खि़लाफ अपनी त़ाक़तें लगाए रही हैं। कहा जा रहा है कि इन demons को, यानी जुलमत अर्थात तमस के कारिंदों को, एकदम विपरीत मार्ग बताया गया जिस पर वे लगे हैं। और कहा जा रहा है कि ये ताक़तें मोक्ष यानी निजात यानी salvation के मार्ग को तबाह करने में लगी हैं और इनको इसी काम पर लगाया गया है। यदि मोक्ष का मार्ग ही तबाह हो रहा था, फिर भी तुम ने चिंता नहीं की उस मार्ग को ढूंढने की। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम आहिस्ता आहिस्ता उस मार्ग से इतना दूर खिसक आए कि अब तुम्हें परवाह ही नहीं कि तुम्हें वह मार्ग मिले कि न मिले।

इधर मुस्लिम ग्रन्थों में भी कहा गया कि शैतान सिराते मुस्तकीम यानी सीधे मार्ग पर बैठ जाएगा और उस पर चलने वालों को इधर या उधर बहकाएगा। 

Quran.7.16:

He (Satan) said, “Now that You have led me astray, I will certainly sit for them (in ambush) on Your straight path. 

ऐसा ही वह करता आया है हर ज़माने में! कभी वेद के मानने वालों को ऐसा बहकाया कि समय के अवतार कृष्ण से युद्ध पर तैयार हो गए; अपने समय के सबसे बड़े शिव भक्तों में गिना जाने वाला रावण ऐसा अहंकार का शिकार हुआ कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम के विरूद्ध युद्ध पर आ गया। मूसा की राह पर चलने वालों ने ईसा की शिक्षा को समाप्त करने की हर मुमकिन कोशिश की। कुरान ने कुछ हस्तियों को पाक कहा था और गारण्टी ली थी कि उनको हर बुराई से दूर रखा गया है, इनको अहललबैत नाम दिया था, लेकिन मुसलमान ऐसे गुमराह हुए कि अनेक ने अहललबैत की समझ ही छोड़ दी, वहीं अनेक दूसरे अहललबैत की चाहत में ऐसा रस्मों में गिरफ्तार हुए कि उन रस्मों को निभाने की ख़ातिर अल्लाह की इबादत ही भूल गए। यही खेल जुलमत खेलती रही है हर ज़माने में। 

हमको समझना होगा कि यदि अवतार मौहम्मद उस सीधी राह पर हम को ले जाने के लिए अवतरित हुए थे तो जुलमत उनकी राह पर आने वालों को कन्फयूज़ करने के लिए हर मुमकिन कोशिश तो करेगी ही। 

जुलमत यानी तमस न केवल यह कोशिश करेगी कि पथप्रदर्शकों की पहचान गुम कर दे या उनकी शिक्षा की समझ से हमें भटका दे, बल्कि जो लोग उस मार्ग को अपनाने या समझाने की कोशिश में लगे हैं, उनकी राह में भी तरह तरह की अड़चनें डालेगी। यही कारण है कि अली ने कहा कि जो हमारे हक़ीक़ी चाहने वाले हैं, उन पर परेशानियाँ इतना तेज़ी से आएंगी जैसे आबशारों से यानी झरनों से पानी गिरता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि तुम सच्चे सीधे रास्ते पर हो, जो तुम को मोक्ष यानी निजात तक ले जा सकता है, तो जुलमत यानी तमस यक़ीनन अपने तमाम कारिंदों को लगा देगी कि किसी तरह तुम उस मार्ग से विचलित हो जाओ। यदि तुम उस मार्ग को उजागर करने या उस पथ को प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहे हो, और इस प्रकार जुलमत के प्लान को फेल करने की कोशिश में लगे हो, तो क्योंकर जुलमत तुम्हारे खि़लाफ अपने जाल बिनने की कोशिश नहीं करेगी? ज़माने के सामने वह तुम्हें ज़लील और रूस्वा करने की हर मुमकिन कोशिश करेगी।

आपने देखा कि मैत्री उपनिषद के अनुसार जुलमत यानी तमस को मार्ग ही ऐसा दिखाया गया कि वह मोक्ष यानी निजात यानी salvation के मार्ग से हमको खींच कर दुनिया मे गर्क़ कर देती है। यही बात अली कह रहे हैं, यदि तुम उस मार्ग के मुसाफिर हो तो तुम्हारी राह में अड़चनें पैदा करने की कोशिश तो होगी ही, तुम्हें उस राह से दूर खींचने या तुम्हारी छवि को ऐसा बना देने की कोशिश भी होगी कि तुम्हारी बातों का असर कम से कम हो जाए। यह वह ताक़त करेगी जिसके पास तुम को बहकाने, गुमराह या रूस्वा करने के बहुतेरे तरीक़े हैं और कलियुग में अनेक लोग अपने कर्मों के कारण उसके एजेंट बने बैठे हैं, जो यह सब करने में उसके सहायक बनते हैं। 

यहां याद रखने की बात यह है कि यही Divine Creation Plan है और यह खुदा का ही बनाया हुआ प्लान है कि नूर और जुलमत एक दूसरे के विपरीत शक्तियों के रूप में काम करती हैं। 

मैत्री उपनिषद इसी ओर इशारा कर रहा है। असुरों यानी शैतान यानी demons की बात कर रहा है। ये डेमोनिक ताक़तें जो कुछ झूठ है, जो ग़लत है, उसको ही सत्य माने पड़े हैं। ऐसा ही इनको बतलाया गया है। उपनिषद कह रहा है कि हक़ीक़ी सत्य वही है जो वेद बतला रहे हैं। और वेद साफ तौर पर केवल और केवल उन दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों को ही पहचनवाने में लगे हैं जिन्हें देवता कहते हैं।

याद रहे मैत्री उपनिषद ने यह भी कहा था कि इंद्रदेव की सुरक्षा के लिए ही असुरों यानी शैतान यानी demons को एक भिन्न मार्ग बतलाया गया था। सारे वेद यदि बात कर रहे हैं तो इंद्रदेव और अन्य देवताओं की। वेद में जो कुछ बतलाया गया है, अक़लमंद व्यक्ति उस पर ही अपनी जिंदगी गुज़ार देते हैं। वेदों में जो कुछ नहीं दिया गया है ब्रहमिण को उसे नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसा मैत्री उपनिषद का कहना है। 

Maitri Upanishad.VII.10: 

Verily, the Devatas and the demons, being desirous of (knowing) the self went into the presence of Brahma. Having bowed before him they said, Revered Sir, we are desirous of (knowing) the self, so do you tell us. Then, after having reflected a long while, he thought in himself. Verily, these demons are desirous of a self different (from the true one). Therefore a very different doctrine was told to them. On that these deluded (demons) here live their life, with intense attachment, destroying the means of salvation and praising what is false. They see the false, as if it were true, as in jugglery. Therefore what is set forth in the Vedas, that is the truth. On what is said in the Vedas, on that wise men live their life. Therefore a Brahman should not study what is not of the Veda. This should be the purpose.

आप ने देखा, वेदों में जो कुछ नहीं दिया गया है, ब्रहमिण को उसे नहीं पढ़ना चाहिए। दिखाईए मुझे वेद में कहां लिखा है कि इंद्रदेव रास रंग की महफिलें सजाते हैं, दिखाईए मुझे वेदों में कहां लिखा है कि इंद्रदेव हर समय नशे में रहते थे, जिस ‘सोमरस’ के पीने की बात हो रही है वह अरबी भाषा के शब्द ‘आबे कौसर’ का संस्कृत भाषा में अनुवाद है। ‘आबे कौसर’ स्वर्ग का वह पानी है जिसे पीने वाला हमेशा की जिंदगी प्राप्त कर लेता है, वही शहीद या निजात पाने वाला या मोक्ष पाने वाला होता है। 

मुझे वेद में दिखाईए, कहां पर लिखा है कि इंद्रदेव ज़मीन पर आ कर अविवाहित युवतियों से रिश्ते बनाते हैं। उपनिषद कह रहा है कि जहां यह सब लिखा है वह जुलमत के कारिंदों यानी डेमंस का काम है और ब्रहमिण को ऐसा कुछ नहीं पढ़ना चाहिए जो वेदों में नहीं है। आप ने क्यों नहीं सोचा कि जुलमत यानी तमस इंद्रदेव की छवि को ख़राब करने की हर मुमकिन कोशिश अवश्य करेगी। आप ने इंद्रदेव को भी नहीं पहचाना, सृष्टि में उनके रोल को भी नहीं पहचाना, अन्य देवताओं को भी नहीं पहचाना, न पहचानने की कोशिश कर रहे हैं।

खुदा का Divine Creation Plan

आईए, आपको खुदा का Divine Creation Plan बता देते हैं जो मैंने समझा है और जो हर अवतार की कथनी या डिवाईन स्क्रिपचर से साबित है और जिसको मैंने बड़े विस्तार से अपनी पुस्तकों One God One Religion और Gita Saar - A Muslim Perspective में दिखाया है। 

एक निराकार सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान ब्रहमण यानी जिस्म-ओ-जिस्मानियात से मुबर्रा, हर जगह मौजूद, सब कुछ जानने वाला क़ादिरे मुतलक़ खुदा यानी Formless, Omnipresent, All-Knowing, All-Powerful Absolute God ने एक साकार शक्ति क्रिएट की जिससे एक नूरानी रूह यानी दिव्यात्मा शक्ति उत्पन्न हुई जो ब्रहमा कहलाई जो Perfectly Pure यानी पाक तत्वों से बनी एक शक्ति थी। 

इधर मुसलमानों में हदीसें मौजूद हैं कि सबसे पहले नूरे मौहम्मदी ख़ल्क़ किया गया जिसका अर्थ यह हुआ कि अवतार मौहम्मद की हकीक़त अस्ल में नूर है। इसी समय नूर के विपरीत एक और शक्ति क्रिएट हुई जो जुलमत या dark या तमसिक ताक़त थी। इसके पश्चात इंसान की उत्पत्ती हुई जिस को दिमाग़ या मस्तिष्क दिया गया, ऐसा जैसा किसी भी क्रिएशन के पास नहीं था। लेकिन इस इंसान को नूर और जुलमत के बीच अपनी राह चुनने के लिए आज़ाद छोड दिया गया। 

एक नूरानी ताक़त जो रूह भी है और जिसको उपनिषदों ने दिव्यात्मा शक्ति कहा उसके के विभाजन से कई दिव्यात्माएं यानी नूरानी रूहें क्रिएट हुई जिनका काम हर ज़माने मे इंसान को हिदायत के सीधे मार्ग पर लाना था तो दूसरी ओर जुलमत ने भी अपने एजेंट पैदा किए जिन में एक एजेंट शैतान यानी Satan है। 

दिव्यात्माएं यानी नूरानी रूहें इंसानी जिस्मों में मानवता को हिदायत देने और रब की इबादत और इताअत का मार्ग दिखाने र्को आइं तो अवतार या रसूल कहलाए तो दूसरी ओर जुलमत और उसके कारिंदे हर ज़माने में उस राह से गुमराह करने की कोशिश में लगे रहे। यही मैत्री उपनिषद बता रहा है।

जुलमत यानी तमस के पास भी time-tested तरीक़े हैं जिनसे वह गुमराह करती है। किसी व्यक्ति का character assassination करना हो तो यही तो तरीके हैं, उसे शराब पीता, औरत बाज़ और लड़ाई आदि करता दिखा दो। क्या यही डैमोनिक यानी शैतानी ताक़तों ने इंद्रदेव के साथ नहीं किया? इंद्रदेव को हर समय शराब में धुत भी दिखाया, जंगल में विचरती युवतियों से रिश्ता बनाते - यहां तक कि उनके बच्चे पैदा हो गए - ऐसा भी दिखाया और पुराणों में कहानियां मौजूद हैं कि कैसे राजे महाराजे कहानियां प्रचलित करवाते थे कि उनको इंद्रदेव की ओर से अस्त्र-शस्त्र भेंट किए गए हैं। ऐसा वे इसलिए करते थे कि आसपास के राजा उनसे डर कर रहें या अवाम में से कोई बग़ावत न कर बैठे। 

जुलमत यानी डैमोनिक ताक़तों ने जो जो कहानियां इंद्रदेव के लिए प्रचलित करीं उसी प्रकार की कहानियां जब अरब में मौहम्मद आए तो उनके खि़लाफ प्रचलित कराईं। उपनिषद साफ कह रहा है कि जुलमत को भी पहचानना आवश्यक है, वह कैसे काम करती है यह भी जानना आवश्यक है, knowledge और ignorance दोनों को समझना है, और तब यदि कोई अपनी अक़ल का उपयोग करते हुए हक़ीक़तों को समझे, जिनसे वेद भरे पड़े हैं, तो ऐसा व्यक्ति ही मोक्ष के मार्ग का मुसाफिर है। यह मोक्ष उसे देवताओं के अतिरिक्त किसी अन्य के मार्ग पर चलकर नहीं मिलेगा। 

जैसा हमने बताया, उपनिषद के अनुसार ब्रहमा नामी एक नूरानी रूह यानी दिव्यात्मा के विभाजन से बनी 7 नूरानी रूहें यानी दिव्यात्माएं हर ज़माने में सत्य मार्ग को उजागर करने और अधर्म को मिटाने में लगी रहीं। इन्होंने ही ऋषियों और नबियों को राह दिखाई। हर क्षेत्र और हर ज़माने में यही दिवयात्माएं मानव शरीर मेें अवतरित होकर मानव कल्याण की राह प्रदर्शित करने मेें लगी थीं और यही 7 नूरानी रूहें यानी दिव्यात्माएं जब धरती पर 14 जिस्मों में एक ही भाषा बोलने वालों के बीच आईं तो वे अहललबैत कहलाए जिनके 7 ही नाम थे। 

यही कारण है कि मंडूक्या उपनिषद ने उन्हें 7 या 14 नहीं बताया बल्कि सात और सात कहा, seven and seven, और कहा कि वे किसी छिपे हुए स्थान पर जिंदगी गुजारेंगे। 

Mandukya Upanishad of the Atharva Veda.II.I.8:

From Him [the Absolute] come forth the seven pranas (7 roohs or spirits), the seven flames, their fuel, the seven oblations, these seven worlds in which move the pranas, seven and seven which dwell in the secret place [secret place will be the barren land of Arabia].

इधर मुसलमानों में सबाए मसानी यानी सात दोहराने वाली निशानियों की बात हो रही है जिसको वे अनेक अर्थों में लेते हैं लेकिन अस्ल में वह इन्हीं सात नूरानी रूहों की बात हो रही है जिसने 14 जिस्मों के माध्यम से काम किया।

मैसोपोटेमिया, ईजिप्ट, रोमन, परशियन, इंडियन और चाईनीज़ सभ्यताओं के बीचों बीच स्थित अरब वह छिपी हुई जगह थी, जिसकी ओर किसी की निगाह नहीं जाती थी। व्यापारिक कारवान उस रेगिस्तान से बच कर निकल जाते थे। यहां तक कि रोमन और परशियन एम्पायर्स के बीच जब युद्ध होते थे तो आज के सीरिया, इस्रायल, जारडन, ईराक़ आदि पर कब्ज़े के लिए तो लड़ाईयां होती थीं पर दक्षिण में स्थित अरब पेनिंसूला पर कब्ज़े की किसी को चिंता नहीं थी। दक्षिणी छोर पर यमन था जो इधर से कम और Red Sea के पार ईजिप्ट से अधिक जुड़ा था। Old Testament ने जब इब्राहीम का अपनी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माईल को लेकर यरूशलम से निकलने की बात लिखी तो केवल इतना लिखा कि वह अपनी पत्नी और बेटे को लेकर बीयर शीबा के आगे स्थित wilderness में ले गए। बीयरशीबा उस समय के इस्रायल की वह दक्षिणी सीमा थी जिसके आगे बस wilderness थी, रेगिस्तान और बंजर इलाक़ा था।

कुरान में भी इब्राहीम के शब्द मौजूद हैं जिनमें वह अपनी औलाद को एक बंजर वादी में बसाने की बात कर रहे हैं। ऐसा करने के पीछे कारण भी बता रहे हैंः ताकि वे अल्लाह की इबादत को क़ायम करें, लोगों के दिलों को उस रब के प्रेम और भक्ति की ओर लाएं ताकि वे उसका शुक्र अदा कर सकें। 

Quran.14.37:

Our Lord! I have made some of my offspring settle in a barren valley near Your Sacred House! Our Lord! I did so that they may establish Prayer. So make the hearts of people affectionately inclined to them, and provide them with fruits for their sustenance that they may give thanks. 

उपनिषद और कुरान एक ही क्षेत्र की ओर इशारा कर रहे हैं।

अरब के रेगिस्तान की ओर तो कोई देख भी नहीं रहा था कि वहां पर दिव्यात्माएं अवतरित हो सकती हैं। यहूदी किसी मसीहा की प्रतीक्षा में थे तो वे इस इंतेज़ार में थे कि वह मसीहा उनमें से होगा। ईसाईयों को भी Spirit of Truth के आने की भविष्यवाणी दी गई थी पर समय के साथ उन्होंने God, Holy Spirit and Jesus के कानसैप्ट को फैला दिया था और ईसा को खुदा का बेटा मानने लगे थे जिस के बाद उस होली स्प्रिट का किसी और शरीर को अपने आफिस के रूप में प्रयोग करना उनकी समझ से बाहर था। भारत के हिन्दु वेद और कृष्ण की शिक्षा से बहुत दूर आ चुके थे। बल्कि भारत में तो वह दौर तक़रीबन वैसी ही जाहिलियत का दौर था जैसा अरब में था। यदि कुछ ब्रहमिण इन देवताओं का अवतरण मान भी रहे होंगे तो केवल भारत वर्ष की सीमाओं के अन्दर किसी ब्रहमिण के घर में ही मान रहे होंगे। हालांकि ब्रहमिण कौन होता है, यह उपनिषद में साफ तौर पर बताया गया है, पर समय के साथ यह भी वंश में स्थानांत्रित होने वाला ओहदा बन गया था। 

आज आप उस क्षेत्र को मुसलमानों से जोड़ कर देखते हैं लेकिन वे दिव्यात्माएं यानी नूरानी रूहें जब अवतरित हुईं उस समय तो वहां जाहिल क़बीले रहते थे, जिनके अपने क़बाएली रस्म-ओ-रिवाज थे, जहां पानी पाया जाता था टिक जाते थे, और धर्म के नाम पर कुछ रस्में बची रह गईं थीं जो निभाते थे। उन्होंने बहुत से खुदा बना रखे थे और इन खुदाओं के दरमियान एक खुदा, एक क्रिएटर का कानसैप्ट धूमिल पड़ गया था। 

केवल मंडूक्या उपनिषद ही नहीं, हम ऋग वेद में भी पाते हैं कि देवता छिपे हुए स्थान पर नवजात बच्चों के समान पैदा होंगे। ऋग वेद ने ‘गुहा’ का शब्द प्रयोग किया जिसका अर्थ अनुवादकों ने ‘छिपी हुई जगह’ या 'middle country' लिखा है। यदि आप 'middle country' अर्थ लेते हैं तो आप को पता होना चाहिए कि अम्रीका की खोज होने तक इस क्षेत्र को 'middle country' ही कहा जाता था; अम्रीका की खोज के बाद से लोगों ने इस क्षेत्र को 'middle east' कहना प्रारंभ किया। 

यह साफ है कि मारूत या देवता जिनके लिए ऋग वेद में इससे पहले के मंत्र में कहा जा चुका था कि उनका क्रिएशन इस खुदाई दिन के एकदम प्रारंभ में हुआ, यानी जब सृष्टि बनाई जा रही थी उस समय हुआ, वे किसी छिपी हुई या बीच के स्थान पर फिर से, 'again' नए पैदा हुए बच्चों के रूप में आएंगे। 

जो लोग यह समझे कि देवता ऐसे ही आसमान से ज़मीन पर उतर आते थे, जैसे इंद्रदेव के लिए कहानियां प्रचलित थीं कि वह आए और कोई युवती उन्हें पसन्द आ गई, उनके लिए ऋग वेद साफ शब्दों में कह रहा है कि देवता 'new born babes' के समान आएंगे, यानी किसी ऐसे जिस्म में जिसका अन्य मानव बच्चों के समान जन्म हुआ है, उस शरीर को नूरानी रूहें यानी दिव्यात्माएं अपने आफिस के रूप में प्रयोग करेंगी। 

मैंने साबित किया है कि यह सृष्टि के प्रारंभ में क्रिएट की गई 7 दिव्यात्माओं की बात हो रही है जो जब एक छिपी हुई जगह या 'middle country' में 7 और 7 यानी 14 शरीर में आए तो अहललबैत कहलाए। 

Rig Veda.I.VI.4-5:

The Maruts according to their want assumed again the form of new born babes. 

Thou O Indra, with the Swift Maruts who break through the even strong hold, hast found even in this hidden place (guha or the hidden place) the bright (noorani) ones. 

(Prof. Max Muller, V.H. Page 14)

साफ शब्दों में इंद्रदेव और अन्य नूरानी देवताओं के ‘फिर से’ नवजात बच्चों के समान किसी छिपे हुए स्थान पर आने की बात हो रही है। अफसोस की बात यह है कि इंद्रदेव को लेकर भी जुलमत ने तरह तरह की कहानियां अनेक काव्यों और अन्य पुस्तकों में भरवा दीं। हम जो बड़ी ग़ल्ती करते हैं वह यह कि पिछले ज़माने से हम तक आई हर पुस्तक को धार्मिक समझने की ग़ल्ती करते हैं, यहां तक कि कामसूत्र को भी और चाण्यक्य के अर्थशास्त्र को भी। यही कारण है कि मैत्री उपनिषद को कहना पड़ा कि जो वेदों में नहीं है उस पर ध्यान नहीं दो। इधर अवतार मौहम्मद ने कहा कि हमारा कोई भी कथन यदि तुम तक पहुंचे जो कुरान से टकरा रहा हो या उसकी शिक्षा के विपरीत तो उसको दीवार पर मार दो। क्योंकि तुम ज़ुलमत की शक्ति को नहीं पहचानते, नहीं जानते कि वह कैसे कैसे काम करती है, उसके लिए मुश्किल नहीं कि अपने कारिंदों के माध्यम से कुछ हदीसें गढ़वा कर किताबों में शामिल करवा दे, जैसा कि उसने किया भी, ताकि तुम हर ज़माने में भ्रमित होते रहो, या हक़ को पहचानने की कोशिश करने वाले उनके कारण हक़ से दूरी बनाए रहें। 

ऐसी ही बेतुकी हदीसों को, जिनको मुसलमान स्वयं पढ़ते हैं तो हंसते हैं क्योंकि जानते हैं कि यह जुलमत यानी तमस की कारिस्तानी है, उन हदीसों के बल पर उपरोक्त पुस्तिका के लेखक ने अपनी पुस्तक को आधार बनाया है। 

एक उपनिषद कह रहा है कि देवता कहां हैं, किस ने देखा, कब आए, यानी साबित कर रहा है कि वे उपनिषद लिखे जाने के समय तक इंसानों के बीच नहीं आए थे। इंद्रदेव, जिनके बारे में उपनिषद कह रहे हैं कि वह देवताओं के सरदार हैं, सारी अच्छाईयां और बेहतरियां देने वाले भी देवता ही है, बुराईयों से हम को दूर करने की शक्ति रखने वाले भी वही हंै, मोक्ष और सत्य मार्ग की ओर हिदायत देने वाले भी देवता हैं, लेकिन इंद्रदेव को स्वयं बुराईयों में घिरा दिखाने का काम जुलमत कर रही है। 

यानी जो देवता हमको सत्य मार्ग पर चलाने और मोक्ष की ओर ले जाने के जिम्मेदार हैं, जो हमारे गुनाहों को माफ कर सकने और हमें अच्छाई और शुभ चीज़ें प्रदान करने के जिम्मेदार हैं, उनको जुलमत ने गुनाहों में और कुकर्मों में लिप्त दिखा दिया, और यह सब आज तक किताबों में मौजूद है। फिर यह कैसे सोचा जा सकता है कि उस जुलमत ने, जब वही नूरानी रूहें यानी दिव्यात्माएं अहललबैत की शकल में मानव शरीर में आईं - जिनके लीडर अवतार मौहम्मद थे - तब अपनी तमाम कोशिशें इस काम पर नहीं लगाई होंगी। 

आदम ज़मीन पर आए तो उन्हें चिंता थी कि पृथ्वी से कैसे वापिस स्वर्ग की उन मंज़िलों तक पहुंचा जा सकता है। आदम को बताया गया कि निजात या मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाले तुम्हारे बीच आएंगे। उनको पहचानते हुए यदि तुम उनके मार्ग पर चलोगे तो वही मार्ग तुम को स्वर्ग में हमेशा की खुशहाल ज़िन्दगी की ओर ले जाएगा। कहते हैं कि आसमान से नीचे आते एक पत्थर ने उस स्थान की निशानदही की जहां पर इन दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों को एक साथ इंसानी जिस्मों में अवतरित होना था। वह काला पत्थर आज भी काबा की दीवार में लगा है जिसको संगे असवद कहते हैं। आदम ने उस स्थान पर जो निशानी बनाई वह काबा या बैतुल्लाह कहलाया। 

'Baytullah' यानी अल्लाह का घर। यह manifest proof था ज़मीन पर जहां अल्लाह की manifest यानी नुमायां निशानियां Ahlulbayt(ullah) यानी ‘अल्लाह के घर के लोगों’ को अवतरित होना था। मेरी पुस्तकें पढ़ने वाले या लैक्चर सुनने वाले एक दो नहीं बल्कि दर्जनों सबूतों से बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि मौहम्मद ही वेदों के इंद्रदेव हैं, अपने नूरानी रोल में वह प्रजापति भी हैं। कृष्ण के मुख से भी प्रजापति की बात होती है। 

Gita.III.10:

In ancient times, having created the peoples, with sacrifice as pertaining to them (necessarily), Prajapati (the Lord of the peoples) said: “By this shall you grow and multiply: let this be to you the milch-cow of all desires.”

Gita.III.11:

With this do you gratify the devas and they the devas gratify you; thus gratifying reciprocally you shall reach to supreme merit.

कई आलोचकों का कहना है कि कृष्ण वेदों की शिक्षा के खि़लाफ थे। यह आलोचक दरअस्ल कृष्ण की शिक्षा को समझ ही नहीं पाए। कृष्ण भी देवताओं की बात कर रहे हैं, कहीं कहते हैं कि यदि उनको खाना अर्पित किए बिना खाया यानी अपने खाने में से कुछ उन्हें नज़र किए बिना खाया तो तुम चोर हो, लेकिन देवताओं को पहचानने के आगे की राहें और मंज़िलें भी बता रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि कृष्ण का नाम जपने वालों ने भी पहचानने की कोशिश नहीं की कि कृष्ण कहना क्या चाह रहे हैं। 

इंद्रदेव के अतिरिक्त अन्य अनेक नाम हैं जिनसे उनको वेदों में याद किया गया। लेकिन जुलमत यानी तमसिक ताकतों को इंद्रदेव से भी ख़तरा था क्योंकि जानती थीं कि देवताओं के लीडर के रूप में उनका असली रोल इंसानियत को मोक्ष की राह की ओर ले जाना है। यही कारण है कि उन ताकतों ने इंद्रदेव को भी नही छोड़ा। कहानियों में इंद्रदेव की ऐसी छवि बना दी जो असलियत से परे थी। 

ज़रा गौर कीजिए तो जुलमत ने जो कहानियां बनाई थीं इंद्रदेव को लेकर वही वो अवतार मौहम्मद के लिए गढ़ती नज़र आ रही है। ऐसी छवि के बाद आप क्योंकर इंद्रदेव को पहचानने कीे कोशिश करेंगे; आप क्यों कर अपने घर में, विशेषकर बच्चों से इंद्रदेव की बात करेंगे, क्योंकि आपने जो कुछ करते हुए उनकी छवि समझ ली, आप कभी नहीं चाहेंगे कि आपके बच्चे वे सब कुछ करें। 

जबकि वेद देवताओं के लिए क्या कह रहे हैं जिनके लीडर इंद्रदेव हैं आप स्वयं देखिएः

देवताओं से ही सारे गुनाहों और पापों का नाश करने, कैरैक्टर की बुराईयों और जीवन की परेशानियों को दूर करने की दुआ की जा रही है। देवताओं से ही वह सब कुछ जो लाभकारी या शुभ है वह प्रदान करने की दुआ की जा रही है। 

O All-creating Deva please sweep away from us all sins, vices and miseries and grant us all that is beneficial and auspicious.

मुंडक उपनिषद कहता है कि जब यह देवता हमारे बीच आएंगे, जो एक ख़ास समय पर होगा (when these are shining and at the proper time) तब उनकी तमामतर कोशिश इंसान को उस एक रब की ओर ले जाने की होगी जो इनका भी रब और परवरदिगार है। 

Mundaka Upanishad.I.2.5:

Whosoever performs works, makes offerings, when these are shining and at the proper time, these in the form of the rays of the sun lead him to that where the one lord of the Devas abide.

इन देवताओं के लिए तमाम यज्ञ किए जाते थे कि यह पृथ्वी पर मानव रूप में आएं (offerings invite him with the words, ‘come, come,’) और हमें मोक्ष का, यानी ब्रहमा के स्वर्ग में जाने का मार्ग प्रदर्शित करें। 

Mundaka Upanishad.I.2.6:

The radiant offerings invite him with the words, ‘come, come,’ and carry the sacrificer by the rays of the sun, honouring him and saluting him with pleasing words: ‘This is your holy world of Brahma won through good deeds.’

गीता भी साफ शब्दों में कह रही है कि तीन वेदों के जानकार, सोमरस यानी आबे कौसर पीने वाले, जो पाक किए गए हैं गुनाहों से, जो खुदा की राह में कुरबानियां देते हैं, वे भी जब परमात्मा की पूजा करके स्वर्ग आते हैं तो वे इंद्र के स्वर्ग में ही पहुंचते हैं जो तमाम देवताओं के लीडर यानी आक़ा यानी मौला है।

Gita.IX.20:

Knowers of the three (Vedas), soma-drinkers, purified from sin, worshipping by sacrifices, pray of Me the way to heaven; they, attaining the holy world of Indra (Lord of Devas) enjoy divine feasts in heaven.

इंद्र यानी मौहम्मद की स्वर्ग उनके लिए है जो गुनाहों से, पापों से दूर कर दिए गए हों, जो कुरबानियों के माध्यम से इबादत यानी पूजा करते हैं, और जो परमात्मा से दुआ मांगते हुए स्वर्ग पहुंचते हैं। जो लोग इंद्र यानी मौहम्मद को हर प्रकार के दुनियावी गुनाह से जोड़ते हैं वे जुलमत के कारिंदे हैं जो गुमराह करने में लगे हैं। 

इंद्र के कारण ही आसमान से पानी बरसता है तो अन्न उगता है। खुदा ने न केवल इनको हिदायत देने के लिए पैदा किया बल्कि पानी से लेकर अन्न तक यही हमें प्रदान करते हैं। यही कारण है कि गीता साफ शब्दों में कह रही है कि यदि तुम अपने खाने में से देवताओं को अर्पित किए बिना, उन्हें नज़र किए बिना खाते हो तो तुम चोर हो। जो कुछ है उनके ही कारण है, बल्कि यूँ कहूँ कि सब माल-ओ-दौलत, खान-पान के मालिक वे ही हैं, यदि यह खान-पान हमें मिल रहा है तो हमें उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए, उनके बताए मार्ग को समझने की कोशिश में निरंतर लगे रहना चाहिए और जिस रब की पूजा और परस्तिश करने तक ले जाने के लिए इन दिव्यात्माओं ने अपना कत्र्तव्य समझ लिया है, उस रब को पहचानते हुए उसकी पूजा और परस्तिश तक अपने को लाने की कोशिश करना ही सफलता की कुंजी है।

Gita.III.12:

Those devas shall bestow on you all gratifications you desire: one who eats what is given to them without giving in turn to them, he is a thief indeed.

आज भी अनेक हिन्दु गीता की मिली शिक्षा के तहत खाना खाने से पहले देवताओं को याद करते हैं, मुसलमानों में से कुछ में आज भी खाना नज़र करने का रिवाज पाया जाता है बल्कि हम पाते हैं कि आदम के समय भी लोग अपने खाने को खुदा के सामने पेश करते थे। उस समय तो यह भी मिलता है कि जिसकी नज़र या कुरबानी कुबूल होती थी, आसमान से एक अग्नि उतरती और उसकी भेंट को भस्म कर देती थी। हिन्दुओं में आज भी पूजा में दुआ की जाती है कि उनकी भेंट में अग्नि प्रविष्ट हो जाए। यह कैसे और क्यों होता था, इसकी समझ वे भूल चुके हैं।

यदि एक ओर वेद और उपनिषद बता रहे हैं कि ये दिव्यात्माएं यानी नूरानी रूहें पाक तत्वों से बनी हैं तो दूसरी ओर कुरान भी कन्फर्म कर रहा है कि अहललबैत को हर गुनाह से पाक किया गया है, और कोई बुराई उनके पास भी नहीं जा सकती। 

Quran.33.33:

Indeed Allah desires to repel all impurity from only you, O people of the [Prophet’s] household, and purify you with a thorough purification

ऐसा इसलिए कि इन अहललबैत के शरीर में वे नूरानी रूहें काम कर रही थीं, वे दिव्य आत्माएं इन शरीरों को अपना आफिस बनाए थीं, जो पाकीज़गी का मापदंड हैं, जिनसे हम अपनी आत्मा को जितना करीब करते जाते हैं वह उतना ही पाक होती जाती है, उतना ही मोक्ष यानी निजात की मंज़िलों से करीब होती जाती है। 

नूर और जुलमत की इस लड़ाई में मोहरा हमेशा इंसान बनते रहे जो आज भी हो रहा है। जब जब हक़ को दिखाने नूर के नुमाईंदे आए, जुलमत ने अपनी कोशिश तेज़ कर दी ताकि नूर द्वारा बताए जा रहे सत्य मार्ग पर कम से कम लोग आ सकें। जुलमत ने ऐसा कंफ्यूज़न पेश किया, भूल भुलईया तैयार की, ताकि हक़ीक़तें सामने न आ सकें, ताकि इंसान गुमराही की दलदल में फंसा रहे। क्योेंकि यदि इंसान सत्यमार्ग को समझकर उस पर आ जाए और उस मार्ग पर चलते हुए मोक्ष यानी निजात के लेवल तक पहुंच जाए तो यही तो जुलमत की हार है। लेकिन क्या किया जाए कि जब अंतिम ज़माने में जुलमत की हार होना है, हक़ को सामने आना है और अपनी अपनी गुमराही को त्याग कर हर धर्म के मानने वालों को वह सीधा और सरल रास्ता पकड़ना है जो उनको रूहानी पाकीज़गी की राह पर आगे बढाते हुए मोक्ष यानी निजात की मंज़िल तक ले जाएगा, तब जुलमत ने भी अपनी कोशिशें तेज़ कर दी हैं। 

जिन लोगों ने मेरी किताबें पढ़ी हैं या The True Voice यूट्यूब चैनल पर मेरे लैक्चर सुने हैं वे भली भांति जानते हैं कि यदि वेद हक़ की राह प्रशस्त करने वाली किताबें हैं तो कुरान भी उसी सोर्स से आई किताब है जिससे वेद आए। यदि राम और कृष्ण अवतार हैं तो मूसा, ईसा और अहललबैत जिनके लीडर मौहम्मद हैं, वे भी अवतार हैं। 

सय्यद वसीम रिजवी के नाम से जो लेख सरकुलेट हो रहा है वह इतना बेतुका और तथ्यों से परे है कि मेरे सामने एक धर्मगुरू ने इसको पढ़ने की कोशिश की लेकिन कुछ लाईंन्स के आगे न पढ़ सके। उनका कहना था कि झूठ और मनगढंत बातों का जहां अंबार लगा हो, उसको पढ़ने का भी क्या लाभ। जिन अवतार मौहम्मद को दुनिया के तमाम मुसलमान कैरैक्टर, इंसानियत, उदारता, सच्चाई, इंसाफ, अमानतदारी और ईमान की मिसाल मानते हैं, उनके कैरेक्टर को यह लेख झूठ और आरोपों की बुनियाद पर ख़राब करके पेश करने की कोशिश करता है।

जब झूठ और मनगढंत बातें ही करना किसी का मकसद हो, तो उस व्यक्ति को क्या समझाया जा सकता है? यह उत्तर मैं पुस्तिका के लेखक के लिए नहीं लिख रहा हूँ। बल्कि उन सीधे साधे लोगों के लिए लिख रहा हूँ जिनको उक्त पुस्तिका द्वारा भ्रमित करने की कोशिश की जा रही है। 

इस पुस्तिका द्वारा अवतार मौहम्मद पर किए जा रहे बेबुनियाद हमलों से मैं विचलित होने की जगह हक़ीक़तों को आप के सामने पेश करूंगा; यह भी पेश करूंगा कि पुस्तिका में क्या क्या कहा गया है ताकि आप स्वयं सत्य और असत्य का आंकलन कर सकें और जान सकें कि झूठ गढ़ने में कुछ लोग किस हद तक जा सकते हैं। 

आप को मैं मैत्री उपनिषद से दिखा चुका हूँ जो साफ तौर पर कह रहा है कि असुर यानी डेमोनिक ताकतें किस प्रकार काम करती हैं। मैत्री उपनिषद यह भी कह रहा है कि मोक्ष वही पाता है जो सही ज्ञान और डेमोनिक ताकतों द्वारा फैलाई गई अज्ञानता दोनों को जानता हो और फिर हक़ीक़तों को पहचाने। 

He who knows at the same time knowledge and ignorance together, having crossed death by means of ignorance he wins the immortal by knowledge. Those who are wrapped up in the midst of ignorance, fancying themselves alone wise and learned, they wander, hard smitten and deluded like blind men led by one who is himself blind.

शराब का जाम

आईए, पुस्तिका की ओर बढ़ते हैं जिसका शीर्षक हैः ‘मौहम्मद’ और जिसके लेखक हैं सय्यद वसीम रिज़वी। पुस्तिका के प्रथम पृष्ठ पर ‘मोहम्मद’ नाम के पीछे एक फोटो है जिसमें एक अरबी रंगढंग का व्यक्ति हाथ में जाम लिए गाव तकिया लगाए बैठा है, उसके पास में सुराही रखी है जिससे यह आभास देने की कोशिश है कि शराब है, पीछे एक तलवार टंगी है जो दिखाती है कि इस व्यक्ति का युद्ध से कोई न कोई संबंध है और उसके आगे एक अर्धनग्न जवान लड़की खड़ी है जिसकी ओर फोटो में बैठा व्यक्ति निहार रहा है।

इस फोटो पर यदि ‘मोहम्मद’ न लिखा होता तो शायद हमारी सोच आज के सऊदी अरब के किसी बिगड़े शहज़ादे तक सीमित रहती, लेकिन कहानीकार ने इस फोटो पर ‘मौहम्मद’ लिखकर पैगम्बर मौहम्मद की छवि को इस सब से जोड़ने की कोशिश की है। मैं आप को दिखा चुका हूँ कि मैत्री उपनिषद कह रहा है कि देवता, जो हमें मोक्ष के मार्ग पर ले चलने के ज़िम्मेदार हैं, उनके मार्ग से यदि कोई हमें खींचने की कोशिश करेगा तो वह डेमोनिक यानी शैतानी ताक़तों के शिकंजे में फंसा व्यक्ति होगा। पुस्तिका में अवतार मौहम्मद को लेकर एकदम वही छवि बनाने की कोशिश की जा रही है जो डेमोनिक यानी शैतानी ताक़तों ने इंद्रदेव के लिए बना रखी है। ऐसा इसलिए कि दोनों एक ही हैं! 

हमारे जिन पढ़ने वालों को इस बात पर यकीन नहीं है कि वेद में जिन देवता का बखान इंद्रदेव के रूप में हुआ है वे दरअस्ल मौहम्मद हैं, और जो आज तक हो रहे प्रोपेगेंडा के तहत यह मानते हैं कि इस्लाम तलवार से फैला और अवतार मौहम्मद औरतों में बेहद दिलचस्पी रखते थे, वे यह तो हर हाल में जानते हैं कि यदि कोई क़ौम शराब से सब से अधिक नफरत करती है तो वे मुसलमान हैं। जो मुसलमान शराब पीते भी हैं वे भी अच्छे से जानते और मानते हैं कि उनका धर्म शराब पीने को सख़्ती से मना करता है। कुरान 5ः90-91 साफ कर रहा है कि नशावर चीज़ें और क़िसमत वाले खेल शैतान द्वारा फैलाए जाते हैं। नूर के नुमाईंदे जिस काम से भी मना करें, उसको करने की प्रेरणा देना तमसिक शक्तियों का काम है। यही कारण है कि वे शराब पीने की ओर उकसाती हंै, नाजाएज़ रिश्ते बनाने की राह तैयार करती हैं, यहां तक कि मर्द औरत की जगह मर्द मर्द और औरत औरत के बीच रिश्ते बनाने को प्रोत्साहित करवाती हैं। 

हालांकि शराब पीने से वेद और उपनिषदों ने भी मना किया और इसके पीने को बड़ा गुनाह बताया है लेकिन आम तौर पर हिन्दु शराब पीने या न पीने को धर्म से जोड़ कर नहीं देखते। पेंगल उपनिषद का अध्याय चार अच्छे कर्म करते हुए मोक्ष पाने वाले की बात करते हुए कहता है किः

Paingala Upanishad.Adhyay 4:

Whoever recites this Upanishad becomes as immaculate as Agni(deva). He becomes as pure as Brahma. He becomes as pure as Vayu(deva). He becomes like one who has bathed in all the holy waters. He comes like one who has studied all the Vedas…. He becomes purified from the sins of the murder of Brahman, the drinking of alcohol, theft of gold, and sexual cohabitation with Guru’s wife, and from the sins of associating with those that commit such sins.

इस प्रकार के उल्लेख के बावजूद हिन्दु आमतौर पर शराब पीने की धार्मिक मनाई नहीं देखते। लेकिन शराब पीने वाला मुसलमान भी जानता है कि अवतार मौहम्मद ने इसके पीने पर सख़्ती से पाबंदी लगा दी थी। जिस समय अवतार मौहम्मद ने अपने पैग़म्बर होने की घोषणा की, उस समय अरबों में शराब पीना आम बात थी। युद्ध भी आम था। छोटी सी बात पर शुरू हुई लड़ाईयां वर्षों तक चलती थीं। और औरत का यदि कोई रोल था तो वह सिर्फ मर्द को खुश करने और बच्चे पैदा करने तक सीमित था, अन्यथा वह दासी से अधिक नहीं थी।

ऐसे समय में अवतार मौहम्मद ने इन सब क्षेत्रों में सुधार के लिए काम किया, पर पहले शराब की बात करते हैं। जब शराब पर पाबंदी का हुक्म आया तो रिवायतों में है कि अरबों ने बड़ी बेशक़ीमती पुरानी शराब तक गलियों में बहा दी। यहां तक लिखा है कि कुछ गलियों से उस बहाई हुई शराब की गंध बड़े समय बाद तक आती थी। 

एक सहाबी को लेकर रिवायत है कि वह डैमैस्कस से बेशक़ीमती शराब खरीद कर ला रहा था। उसने अपनी बड़ी दौलत इस शराब को ख़रीदने पर खर्च की थी। वह मदीना के अन्दर भी नहीं पहुंचा था कि किसी ने उसको ख़बर दी कि शराब पर पाबंदी का हुक्म आ गया है। उसने यह भी नहीं किया कि कोई ग्राहक ढूंढ कर उस शराब को औने पौने रेट पर बेच देता। उसने तमाम शराब को उसी जगह बहा दिया। 

जब अवतार मौहम्मद मक्का से हिजरत करके मदीना पहुंच चुके थे तब शराब पर पाबंदी का हुक्म आया। आप को मालूम होगा कि अवतार मौहम्मद की उम्र उस समय 53 साल थी जब उन्होंने मक्का से मदीना की ओर हिजरत की थी। यानी उनकी उम्र यकीनन 53 वर्ष से अधिक थी जब शराब की पाबंदी का हुक्म आया। शराब पर पाबंदी का हुक्म आने के बाद शराब पीना तो दूर की बात, एक भी झूठी से झूठी रिवायत नहीं बताती कि अवतार मौहम्मद ने मदीना हिजरत करने से पहले की 53 साल की जिंदगी में कभी एक बार भी शराब पी हो। 

यानी जुलमत के कारिंदों का झूठ इस पुस्तिका के शीर्षक से ही साफ दिखाई दे रहा है। यदि अवतार मौहम्मद ने जिं़दगी में किसी भी लम्हे शराब को हाथ नहीं लगाया और शीर्षक के नीचे दी गई फोटो हाथ में शराब का जाम और पास में सुराही दिखा रही है तो कहानी बनाने वालों का झूठ साफ दिखाई दे रहा है। आप समझ सकते हैं कि फोटो में अन्य दो बातें जो दिखाने की कोशिश की जा रही है, कि वह रास रंग में डूबे रहते थे और तलवार से इस्लाम फैला, यह दोनों बातें भी झूठी और किसी प्रोपेगेंडे का हिस्सा हो सकती हैं। 

ठीक वैसे जैसे जुलमत के कारिंदों ने, यानी डेमोनिक ताकतों ने, हर हिन्दु तक यह मैसेज पहुंचाने की कोशिश की कि इंद्रदेव हर समय शराब के नशे में डूबे रहते थे, जबकि पेंगल जैसे उपनिषद शराब पीने को चार बड़े गुनाह में बता रहे है और पांचवां गुनाह यदि बता रहे हैं तो वह यह कि जो यह चार गुनाह करे उससे कोई सम्पर्क रखना पांचवा सबसे बड़ा गुनाह है। 

Paingala.IV.24: 

He who studies this Upanishad everyday… becomes free from the sins of killing a Brahmana, drinking liquor, stealing gold, sharing the bed with the teacher’s wife and associating with those who have committed these sins!

यानी उपनिषद तो कहें कि शराब पीने वाले से कोई रिश्ता भी नहीं रखो और इंद्र देव, जिनको पाक तत्वों से बनी दिव्यात्माओ का सरदार कहा गया, वह यदि हर समय शराब पिए दिखलाए जाएं तो आप समझ सकते हैं कि जुलमत यानी डेमोनिक ताकतें सनातन धर्मियों के बीच भी अपना काम करने में लगी थीं। और हर ज़माने और हर इलाके़ में आए अवतारों के खिलाफ ऐसे ही अपनी कोशिशों में लगी रहीं।

‘मौहम्मद’ के शीर्षक के नीचे तस्वीर में शराब के गिलास से हम ने आप को यह तो दिखा ही दिया कि झूठ का पुलिंदा क्या कुछ कर सकता है। जिस मौहम्मद ने पूरी जिंदगी शराब नहीं पी और उस समय के अरबों से शराब की लत को ऐसे छुड़वाया कि उन्होंने सड़कों पर शराब बहा दी, उनको शराब का जाम हाथ में लिए दिखाया जा रहा है। आप स्वयं अंदाज़ा लगा सकते हैं कि झूठ के पुलिंदे ने और क्या कुछ पेश किया होगा।

लेकिन बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। उपरोक्त पुस्तिका में दिए गए एक एक पैराग्राफ पर हम बात करेंगे और दिखाएंगे कि जुलमत कैसे अवतार मौहम्मद के किरदार को भ्रमित करने की कोशिश कर रही है। मक़सद केवल यह है कि ऐसे किरदार के व्यक्ति की शिक्षा समझने आप क्योंकर आएंगे और यदि शिक्षा पढ़ने और समझने की कोशिश भी करेंगे तो पहले से दिमाग़ में बैठी छवि आपकी सत्य को समझने की शक्ति को प्रभावित करती रहेगी। 

मैत्री उपनिषद ने कहा कि ignorance और knowledge दोनों के बीच अंतर करने वाला ही मोक्ष यानी salvation के मार्ग पर आगे बढ़ता है। हम आप को दिखाएंगे कि पुस्तिका में आगे क्या कुछ अवतार मौहम्मद के बारे में लिखा है ताकि आप स्वयं अंदाज़ा लगा सकें कि इस अंतिम ज़माने में जुलमत यानी तमस क्या कुछ पाखंड रचा रही है। 


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