Thursday, 27 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-A: प्राकथन और प्रस्तावना

प्राकथन

दुनिया एक कठिन दौर से गुज़र रही है। 21वीं सदी के तीसरे दशक के प्रारंभ होने पर, जब से कोविड ने दस्तक दी है, दुनिया ने देखा कि कैसे तेज़ी से भागती दौड़ती इंसानियत पर कुछ ही समय में ब्रेक लग सकते हैं। जो लोग यह समझते थे कि तेज़ी से तरक़्क़ी की ओर बढ़ती इंसानियत को रोकना किसी के वश में नहीं, वे सोचने पर मजबूर हैं कि न केवल हर इंसान बल्कि तमाम इंसानियत को एक न एक दिन समाप्त हो जाना है। 

भागती दौड़ती दुनिया को ब्रेक लगे तो बहुतेरे लोगों ने आध्यात्म और रूहानियत की राह पकड़ी। लेकिन घुप अंधेरे में एकदम से रौशनी का दामन कहां से मिलता। जिन किताबों और अवतारों के माध्यम से हमें सच्चे सीधे मार्ग की राह दिखाई गई थी, उसको हम छोड़ कर इतना दूर आ चुके हैं कि हम को उस मार्ग के पद्यचिह्न तो दिखते हैं लेकिन घटाटोप अंधेरे में वह चिह्न फिर गुम हो जाते हैं और हम दुनिया में लिप्त ज़िन्दगी की ओर पलटने लगते हैं।

नए बदलते ज़माने में यह भी देखने को मिल रहा है कि हम अपना आंकलन करने के स्थान पर दूसरों में खोट और बुराईयां देखने में लगे हैं। यदि आज कोई हिन्दु अपने धर्म पर चलने वाला बता रहा है तो इसलिए कि वह उसको सच्चा और सनातन मार्ग समझ रहा है। आज यदि कोई मुसलमान अल्लाह के आगे समर्पण और इबादत की बात करता है तो इसलिए कि वह जानता है कि इसी राह पर चलने में उसकी बेहतरी है। यदि कोई ईसाई है, कोई यहूदी है, या आगे बढ़ें कि यदि कोई प्रोटेस्टेंट है, या कैथोलिक है, या और्थोडाक्स है, या सुन्नी है, या शिया है, बहाई है, या अहमदी है, तो इसी लिए तो कि वह उसको ही सच्चा मार्ग मान रहा है। जबकि इनमें से अधिकांश वह हैं जो केवल उस धर्म या मत को सच्चा मान रहे हैं जिसमें उन्होंने जन्म लिया है।

तमाम दुनिया गुमराही का शिकार है और हर कोई दूसरे में खोट या बुराई निकालने में लगा है। कोई यह नहीं सोचता कि खोट धर्म में नहीं बल्कि उसको लेकर हमारी समझ और स्थिर क़दमों से उस पर चलने मे हमारी दष्ढ़ता की कमी है। 

समय है कि हम गुमराही का यह लबादा उतार फेंकें। अपने हक़ीक़ी दुश्मन की पहचान करें जो कभी नहीं चाहता कि मानवता सत्य मार्ग की समझ बना कर उस मार्ग पर आए। इंसान को सबसे बेहतर यदि कोई उपहार दिया गया है तो वह मस्तिष्क है और उससे मिलने वाली अक़ल है। इस अक़ल को लगाएं समझने कि हमारे लिए क्या बेहतर है क्या नहीं। दुनिया भले ही अभी चलती रहे, शीघ्र ही हमें इस दुनिया से गुज़र जाना है। ऐसा दिन आने से पहले हमने अपनी बेहतरी की राह यदि पा ली, तब ही शायद गुमराही के अंधेरे मिटेंगे और हमारे उद्धार का मार्ग कुछ साफ होगा।

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प्रस्तावना

जब ‘मौहम्मद’ नाम की एक पुस्तिका व्हाट्सएप के माध्यम से मुझ तक पहुंची और मैंने अनेक उलमा और धर्मगुरूओं को इस पर चर्चा करते पाया तो मुझे उम्मीद दी कि कोई न कोई धर्म का ज्ञानी इसके उत्तर में कुछ लिखेगा। हालांकि जो कुछ इस पुस्तिका में कहा जा रहा था उसमें कुछ भी नया नहीं था और इस्लाम और उसके आखि़री पैग़म्बर के दुनिया भर में फैले आलोचक वही कुछ पुरानी बातें नए शब्दों में करते आए हैं और यह किताब भी उसकी ही हिन्दी में एक कड़ी थी।

इस बार क्योंकि यह पुस्तिका हिन्दी में थी और एक मोबाईल से दूसरे मोबाईल पर घूम रही थी, अनेक उलमा और धर्मगुरू इसकी बात कर रहे थे, इसलिए इस बार तो मुझे यक़ीन था कि कोई न कोई तो इस पुस्तिका में कही गई बातों का उत्तर देने की कोशिश करेगा। 

मेरा मानना यह है कि जिस माध्यम से कोई आरोप लगाए, उसी माध्यम से उसका खंडन भी करना चाहिए। पुस्तिका के माध्यम से यदि आरोपों का पुलिंदा पेश किया जा रहा था तो कहीं न कहीं ये दिखाने की कोशिश थी कि हम पदजमससमबजनंस और सभ्य दायरे में बात कर रहे हैं और हमारे उलमा और धर्मगुरूओं से उम्मीद थी कि उसी पदजमससमबजनंस और सभ्यता के दायरे में रहते हुए किताब के ही माध्यम से इस पुस्तिका का कोई उत्तर आएगा। हालांकि पुस्तिका में जिस प्रकार के आरोप हैं वे किसी भी मायने में सभ्यता के दायरे में नहीं आते; विशेषकर तब जब दुनिया के करोड़ो लोग मौहम्मद को न केवल अवतार और इस्लाम का आखि़री पैग़म्बर मानते हैं बल्कि उनके चरित्र, उनकी जीवनी और उनकी बातों से अपनी ज़िन्दगी को सुधारने और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। 

मैं ने अनेक उलमा और धर्मगुरूओं से बात की; उनसे कहा कि इसका उत्तर देना आवश्यक है। उनका कहना था कि ऐसे व्यक्ति की बातों का क्या उत्तर दिया जाए। मैंने कहा कि यदि कोई अपने को शैतान का कारिंदा बनाए हो, तो उसको उत्तर देकर हक़ की बात करने का कोई लाभ नहीं, यह तो ठीक है, पर असंख्य ऐसे सीधे-साधे लोग हैं जो इस पुस्तिका को पढ़ कर भ्रमित हुए होंगे, या आने वाले समय में हो सकते हैं। यदि कोई पुस्तिका पढ़ता है तो उसे यह तो पता होना चाहिए कि इसका उत्तर भी लिखा गया, ताकि वे दोनों पक्षों के विचार जानते हुए किसी निर्णय तक पहुंचे। 

जुमे की नमाज़ के बाद हो रहे विभिन्न प्रदर्शनों में, जिनमें जो व्यक्ति इस पुस्तिका का कथित रूप से लेखक है, उसके पुतले जलाने और उसके खि़लाफ नारे लगाने का काम बहुत स्थानों पर हुआ। मैंने कुछ उलमा और धर्मगुरूओं से कहा कि ऐसा करके तो हम वही कर रहे हैं जो कुछ लोग चाहते हैं कि हम करें। वे दिखाना चाहते हैं कि ये मुसलमान एक ऐसे व्यक्ति को अपना रहनुमा मानते हैं जिसका चरित्र इतना ख़राब था और यदि किसी ने पुस्तक के माध्यम से उस ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की तो ये पदजमससमबजनंस और सभ्य दायरे में उसका उत्तर देने की जगह सड़कों पर उतर आए। 

इस पर एक आलिम ने कहा कि क्या किया जाए, नवजवानों का गुस्सा है जो कुछ किए बिना शांत नहीं होगा; इसलिए आवश्यक है कि प्रदर्शन किया जाए। इस पर मैं क्या कहता? ऐसे नवजवान जो यह भी नहीं समझते कि समय की क्या ज़रूरत है, जो अपने उलमा के क़ाबू से बाहर हैं, और जिनको शांत करने के लिए ये धर्मगुरू और उलमा अपना पथ निर्धारित करते हैं, ऐसे ही लोग तो अपने आचरण के कारण ज़िम्मेदार हैं कि मुसलमानों के चरित्र पर हमले होते होते उनके पैग़म्बर, उनकी किताब और उनके दीन पर होने लगे हैं। तमाम इस्लामी इतिहास का जाएज़ा लीजिए; राह से भटके हुए मुसलमानों के कारण ही हमेशा इस्लाम और कुरान पर उंगलियां उठती रहीं और आज भी ऐसा ही हो रहा है।

बहरहाल, ‘मौहम्मद’ नामी पुस्तिका का उत्तर आप के सामने पेश है। यह तो एक छोटी सी पुस्तिका है जिसका उत्तर लिखने की कोशिश की गई है। सुना है पूरी पुस्तक भी कुछ लोगों के हाथ में पहुंच गई है। उसको अभी तक मैंने नहीं पढ़ा है।

मुझे यक़ीन है कि मेरी इस कोशिश पर अनेक लोग अनेक प्रकार से टिप्पणी करेंगे। हो सकता है कि कुछ इसमें से कुछ प्वाईंट्स पर मेरे साथ न हों, ये कहें कि ऐसा क्यों लिख दिया, वैसा नहीं लिखना चाहिए था। जो लोग यक़ीन रखते हैं कि उनका रब दिलों की नियतों का जानने वाला है, वे भी सम्य और पदजमससमबजनंस दायरे में अपनी बात कहने के स्थान पर असभ्य या बाज़ारू रास्तों पर चलने लगते हैं। ऐसे लोगों के कारण कितने धर्मगुरूओं और उलमा ने, जो लिखने की सलाहियत रखते थे, अपने क़लम तोड़ कर रख दिए।

यह किताब उनके लिए नहीं है जो अवतार मौहम्मद को हर गुनाह से पाक यानी मासूम और बेहतरीन चरित्र वाला व्यक्ति जानते और मानते हैं। यह उनके लिए है जो उनके बारे में अधिक नहीं जानते या भ्रमित करने वाली किताबों के कारण जिनको उनके सही व्यक्तित्व की जानकारी नहीं। वे समझते हैं कि जब इतना कुछ कहा जा रहा है तो कुछ न कुछ तो सच्चाई होगी ही। उनको यह जानना आवश्यक है कि इस सब के पीछे कौन एजेंडा कार्यरत है और अवतार मौहम्मद और उनके बताए मार्ग से विचलित करने के लिए कौन ताक़त काम कर रही है। साथ ही पुस्तिका में लगाए गए बेबुनियाद आरोपों का तर्कपूर्ण उत्तर देने की कोशिश की गई है ताकि अवतार मौहम्मद की सच्ची छवि दुनिया के सामने आ सके।

बड़ी प्रतीक्षा के बाद कि शायद कोई अधिक ज्ञानी एवं जानकार इसका तहरीरी उत्तर दे, और जुलमत यानी तमस द्वारा राह में अड़चनें डालने की तमाम कोशिशों के बावजूद यह किताब पूरी कर पाने में कामयाब हो पाया। हो सकता है कि आने वाले समय में अधिक जानकार और ज्ञानी लोग इससे बेहतर कोशिश करें। 


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