Sunday, 30 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-J: अल्लाह का कलाम

अल्लाह का कलाम

आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि पुस्तिका का लेखक झूठे आरोपों के पुलिन्दे में कौन से नए झूठ गढ़ कर लिख रहा है। वह लिखता हैः ‘दरअस्ल इस्लाम मौहम्मद के दिमाग़ की उपज है। मुसलमान कुरान व हदीसों में मौहम्मद के शब्दों को पढ़ते हैं और उनके जीवन की हर एक चीज़ पर अमल करने की कोशिश करते हैं। मुसलमान मानते हैं कि अगर मौहम्मद ने कुछ किया है भले ही वह भयानक हो लेकिन उसे उचित समझना चाहिए इसके लिए किसी सवाल की कोई गुंजाइश नहीं होती और किसी को इसे परखने का अधिकार नहीं है। मौहम्मद बहुत सी मानसिक बीमारियों से ग्रस्थ थे। वह अन्य मानसिक विचारों का भी शिकार थे लेकिन उनकी शारिरिक व मानसिक अवस्था ने इस्लाम को एक परिघटना बना दिया जिसे मौहम्मद के रूप में जाना जाता है।’

हर ज़माने में अवतार आए तो दुनिया के मोह में लिप्त मनुष्य उनको नहीं पहचान सके। जहां अवतार एक खुदा और उसके रास्ते की शिक्षा दे रहे थे तो वहीं दुनियापरस्त लोग उन्हें अपने जैसा आम आदमी समझ रहे थे। यह हर ज़माने में होता आया है। रावण अपने को बड़ा शिव भक्त समझता था पर अहंकार ऐसा था कि समय के अवतार राम को पहचान नहीं पाया। इसी प्रकार बड़े बड़े धर्म गुरू भी कृष्ण के नूरानी या रूहानी रोल को नहीं पहचान पाए और उनके विरूद्ध कौरवों को ला खड़ा किया। ऐसा ही मूसा और ईसा के साथ हुआ और कुछ ऐसा ही अवतार मौहम्मद के साथ हुआ। 

परमात्मा भी जान रहा था कि जब अवतार मौहम्मद पहले आई तमाम शिक्षा का सार कुरान की शकल में पेश करेंगे तो दुनिया के मोह में घिरे लोग इसको मौहम्मद के दिमाग़ की उपज बता सकते हैं। इसलिए जिस मौहम्मद की ओर परमात्मा ने दिव्यात्मा को भेजा ताकि उनके शरीर को अपने आफिस के रूप में प्रयोग करे, उस मौहम्मद को दुनिया के किसी भी व्यक्ति ने पढ़ना लिखना नहीं सिखाया था। अचानक मौहम्मद के मुख से वे बातें सुनने में आने लगीं जिस के आगे बड़े बड़े ज्ञानी भी फेल थे। 

अतीत की बातों से लेकर भविष्य का हाल, रूहानियत की शिक्षा से लेकर भाषा पर ज़बरदस्त पकड़, ऐसी कि जब कुरान ने दावा किया कि यदि तुम इसको किसी आम इंसान का कलाम समझते हो तो इसके सब से छोटे सूरह के बदले में कुछ लिख लाओ, तो अरबी भाषा के बड़े बड़े जानकार भी यह मानने पर मजबूर हो गए कि यह इंसान का कथन नहीं हो सकता। कुरान ने भी पुष्टि की कि मौहम्मद को न तो किताब यानी कुरान का ज्ञान था और न ईमान, जब तक कि ;नूरानीद्ध रूह यानी दिव्यात्मा को उन पर नहीं भेज दिया गया। 

आईए देखते हैं कुरान से ही कुछ सबूत जो दिखाते हैं कि कुरान मौहम्मद का कलाम नहीं हो सकता!

कुरान का चमत्कार ऐसा ही है कि वह न केवल अपने ज़माने के लिए एक literary masterpiece था बल्कि हर ज़माने में अरबी ज़बान में उस जैसा कलाम कोई नहीं रहा। यह चमत्कार कुछ ऐसा भी है कि हर ज़माने के लोगों को उनकी समझ के अनुसार संतुष्टी प्रदान करता है। 

आज जब सैयद हैदर ‘एक खुदा एक पैग़ाम, सुन ले काश ये इंसान!’ का नारा लगाते हुए साबित करता है कि तमाम डिवाईन स्क्रिपचर्स एकदम एक ही बात कर रहे हैं, तो कुरान हर डिवाईन किताब में मौजूद रास्ते की पुष्टि करता नज़र आता है। 21वीं शताब्दी प्रारंभ होने तक कोई भी व्यक्ति यह दावा करता नज़र नहीं आ रहा था जो सैयद हैदर करता है। कुरान और पहले की अन्य पुस्तकों में कुछ भिन्न बात कही गई होती तो यह दावा फेल हो जाता। रोचक बात यह है कि तमाम डिवाईन स्क्रिपचर्स, जैसा दिखाया जा रहा है, चाहे वेद हों या गीता, या ओल्ड टेस्टामेंट, सब एक ही राह दिखाते हुए साबित हो रहे हैं तो कुरान तमाम पहले आए स्क्रिपचर्स के सार के रूप में पहले की गई हर बात की पुष्टी करता नज़र आ रहा है। वेद और गीता भी फेल होते नहीं दिखाई देते। बल्कि सब के सब डिवाईन स्क्रिपचर्स एक दूसरे का समर्थन करते नज़र आ रहे हैं। यह वह हक़ीक़त है जिसका दावा 21वीं शताब्दी से पहले किसी ने नहीं किया लेकिन जैसे जैसे दिन आगे बढ़ेंगे आप पाएंगे कि एक खुदा और एक पैग़ाम का रास्ता अधिक साफ और उजला होता दिखाई देगा। हिन्दु को मुस्लिम या मुस्लिम को हिन्दु की पुस्तक से हक़ को समझने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हर कोई अपने पास मौजूद डिवाईन ग्रन्थ से हक़ और हक़ीक़तों को जान जाएगा, जो हर ज़माने में केवल एक ही रही हैं।  

कुरान कोई एक साथ अवतरित हुई किताब नहीं है। 23 वर्ष के लंबे अंतराल में आई आयतें विभिन्न परिस्थितियों में आईं। कभी युद्ध के हालात थे तो कभी अम्न के, कभी अवतार मौहम्मद और उनके साथियों को कष्ट और यंत्रणा से गुज़रना पड़ रहा था तो कभी वे फतेहयाब होकर खुशी मना रहे थे। कभी भूख से पेट पर पत्थर बांधे थे तो कभी मस्जिदे नबवी में आए नजरानी पादरियों से बात कर रहे थे। इतने लम्बे अंतराल में और विपरीत परिस्थितियों में अवतरित होने के बावजूद कुरान की लय में, शब्दों के पिरोने में, बातचीत के लहजे में या कही गई बातों में कुछ भी बेतरतीबी, फालतुपन, विरोधाभास या त्रुटियां देखने को नहीं मिलते। 

जबकि यह तो तमाम मक्का वासी जानते थे और कुरान भी पुष्टि कर रहा है कि अवतार मौहम्मद को पढ़ना और लिखना नहीं सिखाया गया था।

Quran.7.157:

Those who follow the Messenger, the unlettered prophet, whom they find written in what they have of the Torah and the Gospel…

यदि अवतार मौहम्मद ने स्वयं कुरान लिख दिया तो रोतों रात किस ने उन्हें ऐसी ज़बान सिखा दी कि कुरान की भाषा सुन कर अरबी के बड़े जानकार बोल उठे कि यह किसी इंसान का कलाम नहीं हो सकता। आज अरबी की अलिफ, बे भी न जानने वाला कोई यदि कह दे कि मौहम्मद ने अपने ईसाई और यहूदी दोस्तों की संगत में जो बातें तौरैत और ज़ुबूर आदि की सुनी थीं, वे कुरान में दर्ज कर दीं तो उनसे बड़ा जाहिल कोई और नहीं हो सकता। क्योंकि जो literary genius कुरान में देखने को मिलती है उसकी बराबरी न तो उस समय कोई कर पाया और न आज।

फिर कुरान ने ऐसे वाक़ये बताए जो और किसी ने नहीं बताए थे या जिनको ज़माना भूल चुका था। अस्हाबे कहफ का वाक़ेया ऐसा ही एक उदाहरण है। कुरान वह सब भी बताता दिखता है जो यहूदी या ईसाई नहीं मान रहे थे। मिसाल के तौर पर Genesis में इब्राहीम द्वारा दी गई कुरबानी का उल्लेख तो अवश्य है लेकिन यह कुरबानी इब्राहीम के छोटे पुत्र इस्हाक़ के नाम से लिखी है जबकि कुरान पुष्टि कर रहा है कि यह कुरबानी इब्राहीम के बड़े पुत्र इस्माईल से जुड़ी है। मैंने अपने एक लैक्चर में Genesis से ही सबूत दिए हैं यह दिखाने के लिए कि इब्राहीम अपने पुत्र इस्माईल को ले कर गए थे, कुरबानी देने के लिए, न कि इस्हाक़ को। आज 21वीं शताब्दी में यदि यह सबूत सामने आ रहे हैं तो वे कुरान की सच्चाई के गवाह हैं। 

यदि कोई भाषा पर ऐसी महारथ रखता हो कि बड़े ज्ञानी भी उसकी महारथ का लोहा मानें, तो निजी ज़िन्दगी में आवश्यक है कि वह उसी लेवल की भाषा का उपयोग करे। जबकि अवतार मौहम्मद के साथ ऐसा नहीं था। अवतार मौहम्मद को शायरी या कविता पसंद नहीं थी और साफ कहते थे कि मैं न तो कवि हूँ और न कविता मुझे सुनाई गई। हक़ीक़त तो यह है कि यदि कभी वह कविता पढ़ने की कोशिश भी करते तो शब्दों को आगे पीछे कर देते थे। किसी को यदि भाषा पर इतनी महारथ है जैसी कुरान में पढ़ने को मिलती है तो कैसे मुमकिन है कि वह शब्दों को आगे पीछे कर दे? आयशा से जुड़ी एक रिवायत से हमको इसके सुबूत मिलते हैं। 

Qatadah narrated, Aisha was asked: “Did the Prophet, may the peace and blessings of Allah be upon him, use to relate anything from poetry?” She said: It was most detestable thing to him except that (at times) he used to relate a verse from the person of Banu Qays and he jumbed it up. Abu Bakr told him it was not like that. So the Prophet of Allah said, “By Allah I am not a poet and neither is it appropriate for me.”

कुरान का भेजने वाला जो कोई भी है, वह न केवल तमाम इंसानों से बल्कि जिन्नात को भी यह चैलेंज दे रहा है कि वे मिलकर भी कुरान जैसा कुछ सामने नहीं ला सकते।

Quran.17.88:

Say, “If mankind and the jinn gathered in order to produce the like of this Quran, they could not produce the like of it, even if they were to each other assistants.” 

अरबी भाषा में 28 अक्षर होते हैं। केवल इन 28 अक्षरों को जोड़ कर तमाम शब्द बनते हैं जो कुरान में प्रयोग हुए हैं। यदि कुरान किसी इंसान का कलाम होता तो किसी ज़माने में तो कोई इंसान उस जैसा कुछ बनाने के क़ाबिल पैदा होता। बहुतों ने कोशिश की पर सब नाकाम हो गए। जबकि कुरान सब के सामने मौजूद था। 

जैसा हमने बताया, कुरान की बहुत सी आयतें तो on the spot आई थीं, जब कोई विशेष परिस्तिथी सामने आई या किसी आगंतुक ने कोई प्रश्न पूछा। इसके बावजूद इसमें कुछ भी विरोधाभास नहीं है और कुरान का भेजने वाला स्वयं इस तथ्य को जानता है और उसे इस बात का यक़ीन है कि कोई इंसान या जिन्न, या दोनों मिल कर इस जैसा कुछ नहीं ला सकते तभी तो दावा कर रहा है कि यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त कहीं और से होता तो इसमें तुम्हें बड़ा अन्तर्विरोध दिखाई पड़ता। 

क्योंकि वह न भूलता है और न भ्रमित होता है। 

Quran.4.82:

Then do they not reflect upon the Quran? If it had been from (any) other than Allah, they would have found within it much contradiction.

जो लोग कहते हैं कि मौहम्मद केवल ताक़त के पीछे भागता मानसिक रोगों से पीड़ित कोई अहंकारोन्मादी व्यक्ति था और कुरान मौहम्मद ने स्वयं अल्लाह के नाम से पेश कर दिया उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि अहंकारोन्मादी व्यक्ति अपने को सबसे बेहतर दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं। वे अपने बराबर किसी और को नहीं खड़ा करना चाहते। 

अवतार मौहम्मद की शिक्षा का कुरैश के बाद यदि किसी ने विरोध किया तो वे यहूदी और ईसाई थे। अवतार मौहम्मद कह सकते थे कि खुदा का पैगम्बर मैं हूँ, इब्राहीम या मूसा या ईसा का उस खुदा से कोई नाता नहीं था। लेकिन कुरान तो उनको भी अवतार बता रहा है और उनका उल्लेख अवतार मौहम्मद के नाम से कहीं अधिक बार कर रहा है। कुरान न केवल अवतार मौहम्मद द्वारा पेश की गई किताब पर बल्कि उससे पहले आई तमाम डिवाईन किताबों और किताबचों पर न केवल ईमान रखने की बात कर रहा है बल्कि मुसलमानों को उन में और इस किताब में कोई अंतर न करने को भी कह रहा है। 

Quran.2.136:

Say (O Muslims): We believe in Allah and that which has been sent down to us and that which has been sent down to Ibrahim (Abraham), Ismail (Ishmael), Ishaq (Isaac), Yaqub (Jacob), and to Al-Asbat (the offspring of the twelve sons of Yaqub), and that which has been given to Musa (Moses) and Isa (Jesus), and  which has been given to Musa (Moses) and Isa (Jesus), and that which has been given to the Prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and to Him we have submitted (in Islam). 

कुरान तो अवतार मौहम्मद से यहां तक कह रहा है कि यदि उन्होंने भी शिर्क किया तो उनके सारे कर्म व्यर्थ हो जाएंगे और वह नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएंगे। क्या कभी कोई अपनी लिखी पुस्तक में ऐसा लिख सकता है?

Quran.39.65:

It has already been to you – and to those prophets before you – that if you associate others with Allah, your deeds will certainly be void and you will truly be one of the losers.  

चलिए मान लिया कुरान में कुछ भी विरोधाभासी नहीं है। यदि वे किताबें किसी और सोर्स से और यह किसी अन्य सोर्स से थीं तब तो इनमें विरोधाभास होना चाहिए था। ऐसे में बेहतर यही होता कि कुरान में लिख दिया जाता कि वे पहले की किताबें रद्द की जाती हैं और अब कुरान ही एकमात्र किताब है। 

दुनिया भर में विभिन्न ज़मानों और इलाक़ों में, विभिन्न भाषा बोलने वालों के बीच आई किताबों और सहीफों यानी किताबचों के लिए कुरान कह रहा है कि मुसलमान वही है जो इन सब पर ईमान रखता है और उन में अन्तर नहीं करता। क्योंकि कोई विरोधाभास है ही नहीं, जैसा मैं साबित कर रहा हूँ कि आपस में विरोध करती कोई बात है ही नहीं। अन्यथा, विभिन्न ज़मानों और इलाक़ों में विभिन्न लोगों द्वारा रचित किताबों में ऐसा मुमकिन नहीं है!

एक और हक़ीक़त जो कुरान पढ़ने पर सामने आती है वह यह कि कुरान अपने समय के रीति रिवाजों और गलत प्रथाओं को भी नकारता नज़र आता है। 

कुरान ने मर्द और औरत को एक दूसरे का ज़न यानी एक दूसरे को पूरा करने वाला उस समय बताया जब अरब में पैदा हुई लड़कियों को ज़िन्दा मिट्टी में दबा दिया जाता था।

Quran.16.8-9:

And when one of them is informed of [the birth of] a female, his face becomes dark, and he suppresses grief. He hides himself from the people because of the ill of which he has been informed. Should he keep it in humiliation or bury it in the ground? Unquestionably, evil is what they decide.

यह वह समय था जब औरत को गुलामों या प्रापर्टी के समान रखा जाता था। उनकी मर्ज़ी की कोई अहमियत नहीं थी, इस हद तक कि शादी में भी उनकी मर्जी़ की किसी को परवाह नहीं होती थी। वह अपने पति का मालिकाना हक़ समझी जाती थी। ऐसे में कुरान ने जबरन किसी महिला से शादी करने को हराम किया। बाप से बढ़ कर मां का रूतबा क़रार दिया, यहां तक कि उनके बुरा भला कहने पर ‘उफ’ तक करने की मनाही कर दी।

Quran.4.19:

O you who have believed, it is not lawful for you to inherit women by compulsion…

पगान अरबों की पत्नियों की कोई संख्या नहीं होती थी। वे औरत को इस्तेमाल करके उसे त्याग देते थे। ऐसे में कुरान तमाम धर्मों की किताबों में अकेली किताब है जो अधिकतर पत्नियों को 4 तक सीमित करता है, वह भी इस शर्त के साथ कि तुम सब के साथ इंसाफ कर सको। 

Quran.4.3:

And if you fear that you will not deal justly with the orphan girls, then marry those that please you of (other) women, two or three or four. But if you fear that you will not be just, then (marry only) one…

क्या औरत और मर्द की बराबरी, पत्नियोें से इंसाफ की बात या मां का ऐसा रूतबा जैसा कुरान ने दिया आप को कहीं और देखने को मिलता है?

इस्लाम से पहले औरत आज़ाद नहीं समझी जाती थी, वह ज़मीन जाएदाद नहीं रख सकती थी और न ही बाप के हिस्से में उसका कोई हक़ होता था। यहां यह बताना आवश्यक है कि कुरान से पहले आई आखि़री डिवाईन समझी जाने वाली किताब बाईबल में औरत को विरासत में जाएदाद जब ही मिल सकती थी जब उसका कोई भाई न हो। इस्लाम ने पहली बार औरत को विरासत में शरीक किया।

Quran.4.7:

For men is a share of what the parents and close relatives leave, and for womenis the share of what the parents and close relatives leave, be it little or much – an obligatory share.

यहां तक कि अपने को बहुत तरक़्क़ीयाफता दिखाने वाले युरोपीय देशों में भी 19वीं शताब्दी तक औरतों को जाएदाद रखने का हक़ नहीं था। शादी पर या तो जाएदाद पति के नाम हस्तांत्रित हो जाती थी या उसको अपनी मर्ज़ी से जाएदाद बेचने का हक़ नहीं था। ब्रिटेन पहला युरोपीय देश था जहां औरतों के जाएदाद संबंधी कानून बने जब 1860 में ‘Married Women Property Act’ लाया गया। इससे 1200 वर्ष पहले कुरान उन सब मुद्दों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा था और इंसानियत के लिए बेहतरीन क़ानून दे रहा था जब दुनिया अंधेरे में सो रही थी।

ग़ौर करने की बात यह है कि यदि कुरान मौहम्मद का कलाम होता जो तमाम इलाक़ों पर राज करना चाहते थे तो दौलतमंदों और ताक़त रखने वालों का समर्थन देता दिखाई देता। लेकिन हम देखते हैं कि कुरान दबे कुचले, भूखे और मज़लूम इंसानों के समर्थन में खड़ा नज़र आता है। यदि कुरैश ने बढ़ चढ़ कर मुसलमानों पर हमले किए तो उसके पीछे एक बड़ा कारण यह था।

एक और सबूत जो कुरान को खुदा की किताब साबित करता है वह हैं इसमें मौजूद अनगिनत भविष्यवाणियां जो आज तक साबित हो रही हैं। कुरान ने अस्हाबे कहफ के किस्से को उस समय बताया जब सब उसके बारे में भूल चुके थे और उनके आने वाले समय में उठ खड़े होने की भविष्यवाणी कर दी, जो अभी पूरी होना बाक़ी है। कुरान ने फिरऔन की लाश का उल्लेख किया जो अभी कुछ ही दशकों पहले समुद्र में से ढूंढ निकाली गई। कुरान ने Persian और Roman हुकूमतों के गिरने तक की भविष्यवाणी कर दी। 

एक और बात जो पुस्तिका का लेखक अवतार मौहम्मद के बारे में लिखता है, वह यह हैः ‘मुसलमान मानते हैं कि अगर मौहम्मद ने कुछ किया है भले ही वह भयानक हो लेकिन उसे उचित समझना चाहिए इसके लिए किसी सवाल की कोई गुंजाइश नहीं होती और किसी को इसे परखने का अधिकार नहीं है।’

यहां पर समझने की बात यह है कि इस्लाम अक़ल को बंद करने को नहीं कहता बल्कि अक़ल को जगाने की बात करता है। सच्चाई तो यह है कि हक़ के नुमाईंदों ने, चाहे वह कृष्ण ही क्यों न हों, हर हर समय अक़ल के प्रयोग पर बल दिया। कुरान कितने ही स्थानों पर उसके पढ़ने वालों को ग़ौर करने या अक़ल लगाने के लिए कह रहा है। जिन लोगों ने भी अक़ल के दरवाज़े बंद करने की बात की, वे दरअस्ल बहके हुए लोग थे। फिर इस्लाम कैसे आंख बंद करके मौहम्मद के मार्ग पर चलने को कह सकता है? 

लेकिन यह भी सच है कि इस्लाम मौहम्मद के बताए मार्ग पर आंख बंद करके चलने को कहता है। जब मैं इस पर विस्तार से बात करूंगा तो आप पाएंगे कि आंख बंद करके मौहम्मद के बताए मार्ग पर चलना भी अक़ल का उपयोग करने के कारण ही है। 

इस्लामी शिक्षा के अनुसार कुछ बातें ऐसी हैं जो अक़ल का प्रयोग किए बिना मानना जाएज़ नहीं। इसमें पहली है सारी सृष्टि के एक क्रिएटर को पहचानना। हर डिवाईन किताब में उसको पहचनवाया जा रहा है। दूसरी है कि वह अदल और इंसाफ करने वाला है, किसी पर भी ज़ुल्म नहीं कर सकता। यदि वह अदालत करने वाला न हो तो फिर हम कैसे समझ सकते हैं कि हमारे कर्मों का एकदम ठीक ठीक इनाम मिलेगा। फिर कोई क्यों दुनिया में सब्र करेगा, अपना माल किसी अनाथ, विधवा, बेसहारा, यात्री या क़ैदी पर ख़र्च करेगा और क्यों खुदा की राह में कुरबानियां देगा, जिसमें जान की कुरबानी भी शामिल है? कुरान कह रहा है कि हिसाब के दिन तुम देखोगे कि किसी के साथ ज़र्रा बराबर भी नाइंसाफी नहीं हुई। 

एक और बात जो अक़ल से समझनी है वह यह कि उसने इंसान की हिदायत के लिए हर ज़माने में अवतार भेजे, और मौहम्मद उनमें से आखि़री रसूल हैं। मैंने दिखाया है कि गीता भी कह रही है कि Divine Creation Plan को समझते हुए कर्म किए तो यदि कुछ गुनाह भी किए हैं तो वे माफ हो जाएंगे लेकिन यदि Divine Creation Plan को नहीं पहचाना और बहुत अच्छे कर्म किए तो तुम्हारे अच्छे कर्म तुम्हें मोक्ष यानी निजात की मंज़िलों तक नहीं ले जाएंगे। यह उन कुछ बातों में से हैं जिन्हें अकल प्रयोग किए बिना मानना नहीं है। किसी अंतिम हिसाब के दिन को भी अक़ल से मानना है क्योंकि यदि अच्छे और बुरे का लेखा जोखा न रखा जाए और उसका हिसाब न हो तो अच्छे कर्म करने का क्या लाभ?

यदि किसी ने अक़ल का प्रयोग करके यह मान लिया कि सारी सृष्टि का - कुरान ने आलमीन का शब्द प्रयोग किया है, यानी सारी दुनियाओं का - रब एक ही है और यह मान लिया कि वह कभी भी अपनी किसी क्रिएशन के साथ ज़रा सी भी नाइंसाफी नहीं करता और फिर यह मान लिया कि सारी दुनियाओं के मालिक ने इंसान को तन्हा नहीं छोड़ा बल्कि उसकी हिदायत के लिए अवतार भेजता रहा जिनमें के आखि़री रसूल मौहम्मद हैं जो तमाम दुनियाओं के लिए रहमत हैं, उनके शरीर में जो नूर काम कर रहा था वह एक ओर परमात्मा से तो दूसरी ओर मानव शरीर से जुड़ा है, वह ऐसे पाक हैं कि उनसे कोई बुराई नहीं हो सकती, जिसे इस्लाम में मासूम कहा गया है, उनको नूरानी रूप में इंसान को रिज़्क़ और पानी, दौलत और सेहत आदि देने का जिम्मेदार बनाया गया, वह सच्चे हैं और बस वही बोलते हैं जो उनके रब की ओर से हो, तो अब तुम उनकी आंख बंद करके पैरवी क्यों न करोगे? इतना कुछ अक़ल से जानने और मानने के बाद यदि अब तुम आंख बंद करके उनकी बात न मानो तब तुम्हारे आचरण पर प्रश्नचिह्न लग सकता है, मानने पर नहीं। 

यदि तुम्हारा कोई हाकिम है जो तुमसे कुछ करने को कहे तो तुम उसके हुक्म की अंदेखी तभी तो कर सकते हो जब या तो तुम उसकी हुकूमत की हद से बाहर निकल जाओ या तुम को यक़ीन हो कि तुम्हारे हाकिम को तुम्हारी नाफरमानी की ख़बर न होगी। मौहम्मद के शरीर में जो नूरानी रूह थी उसके कारण वह तमाम दुनियाओं के लिए रहमत बन कर आए थे, न तो हमारे लिए मुमकिन है कि उस रहमत के साये से बाहर निकल जाएं और न ही कोई पल हो सकता है जब हम उनसे छिप कर कुछ कर सकें। फिर अक़ल यही कहेगी कि उन्होंने जैसा कुछ करने को कहा, वैसा ही करें। 

जहां अकल लगानी है वहां अवतार मौहम्मद ने भी अक़ल लगाने को कहा। यहां तक कहा कि यदि तुम्हें मेरी कोई हदीस कुरान के खिलाफ दिखाई दे तो उसको नकार देना। पुस्तिका का लेखक ऐसी ही हदीसों पर अपनी पुस्तक की बुनियाद रखता दिखाई दे रहा है। कुरान तो उसका कलाम है जो हर वो कुछ जानता है जो हम नहीं जानते। 


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