खुली हुई निशानियां
पुस्तिका ‘मौहम्मद’ पर मेरे विचार आप पढ़ रहे हैं। देखते है कि यह पुस्तिका आगे क्या कहती हैः
‘अरब के रेगिस्तान में जब इस्लाम अपने वजूद में आया और मौहम्मद मदीना शहर में दाखि़ल हुए तभी आतंक के अभियान की शुरूआत हुई और तब से लेकर आज तक मौहम्मद को रसूल मानने वाले मुसलमान जो कुरान को अल्लाह की किताब कहते हैं आतंकवादी अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।’
सब से पहले यह देखते हैं कि क्या कुरान अल्लाह की किताब है कि नहीं? आखि़र कैसे फैसला होगा कि यह किताब सृष्टि के एक रचियता की ओर से है, जैसा कि मुसलमान मानते हैं कि हर जमाने और भाषा बोलने वालों के बीच एक ही सोर्स से किताबें भेजी गईं, या सच यह है कि वेद और गीता ईश्वरीय सोर्स से हैं पर कुरान नहीं है?
आईए, सबसे पहले देखते हैं कि स्वयं कुरान क्या कह रहा है अपने बारे में। एकदम शुरू में, सूरह अल-बक़रा, आयत 2 कह रही हैः
Quran.Surah Al Baqarah.2.2:
This is the Book, whereof there is no doubt, a guidance to those who are al-Muttaqoon (the pious and righteous persons) who fear Allah much (abstain from all kinds of sins and evil deeds which He has forbidden) and love Allah much (perform all kinds of good deeds which He has ordained).
पिछले अध्याय में आप ने देखा था कि अच्छे कर्म करने पर कुरान का कितना ज़ोर है। अल्लाह की याद दिल में बसाए जो कोई भी अच्छे कर्म करते करते अपनी आत्मा को पाकीज़गी के अगले चरण में पहुंचा देता है वह अल-मुत्तकून हैं। कुरान ऐसे लोगों के लिए हिदायत है, ऐसा वह दावा कई स्थानों पर कर रहा है। जो लोग दुनिया में गर्क़ हैं, या उनकी आत्मा डेमोनिक या असुर ताकतों के वश में कर्म कर रही है, उनको यदि कुरान से कोई हिदायत नहीं मिलती, तो हम को शक नहीं होना चाहिए।
सात्विक या रूहानी मार्ग दुनिया के मोह में गर्क़ किसी व्यक्ति को कैसे समझ में आ सकता है? यह बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। उनको एक अल्लाह की शिक्षा दी गई और उसकी भक्ति और इबादत के लिए बताया गया। यदि वे अपने को रूहानी उत्थान की राह पर नहीं लगाते हैं तो उनको भी कुरान से हिदायत नहीं मिल सकती।
लेकिन ऐसा नहीं है कि कुरान केवल उनको हिदायत देने की बात करता है जो रूहानियत के मार्ग पर हों। अनेक जगह कुरान अपने को तमाम इंसानों के लिए (हुदल मिन नास) हिदायत देने वाला भी बता रहा है।
Quran.2.185:
It was the month of Ramadan which the Quran was (first) bestowed from on high as a guidance unto man and a self-evident proof of that guidance, and as the standard by which to discern the true from the false.
लेकिन उपरोक्त आयत में कुरान ‘मुत्तकून’ यानी ‘तक़वा रखने वालों को हिदायत देने की बात कर रहा है। ऐसा एक प्रश्न एक गुरू ने पूछा था जिसका उत्तर मैं अपने एक लैक्चर जिसका शीर्षक था ‘Why Quran guides only those with faith कुरान ईमान वालों के लिए हिदायत क्यों’ जो 14 मार्च 2018 को The True Voice चैनल पर अपलोड हुआ था, उसमें दे चुका हूँ। मैंने उसमें दिखाया था कि कैसे हर डिवाईन किताब केवल उनको हिदायत देने की बात करती है जो अपनी इंद्रियों को वश में करते हुए रूहानी राह पर आगे बढ़ने की कोशिश में लगे हैं। गीता तो अंत में यहां तक कहती है कि इस को अमुक अमुक लोगों के सामने नहीं सुनाना चाहिए।
Gita.XVIII.67:
This is never to be spoken about by you to one (spiritually) undisciplined, nor to one devoid of devotion, nor to one indisposed to listen, nor again to one who denies Me.
गीता साफ शब्दों में कह रही है कि जो अपनी आत्मा को रूहानी तरक्क़़ी की राह पर लगाने में कामयाब नहीं हो पाया उसको गीता का संदेश नहीं सुनाना चाहिए। उसको भी नहीं जिसमें भक्ति की कमी है, जो सुनने के लिए तैयार नहीं, चाहे किन्ही कारणों से सही और जो उस सोर्स को ही नहीं मानता जिससे गीता है।
और यदि कुरान कह रहा है कि यह किताबे हिदायत है मुत्तकून के लिए, righteous लोगों के लिए, जिन्होंने अच्छे कर्मों द्वारा अपनी आत्मा को सीधे सच्चे मार्ग पर लगाया तो गीता भी बिलकुल यही कहती नजर आ रही हैः
Gita.XVIII.70:
And he who will study this dialogue of ours conducive to righteousness, by him (in effect) I shall have been worshipped through the wisdom-sacrifice; so I hold.
कुरान और गीता का संदेश और audience बिलकुल एक है। क्या यह सबूत ही काफी नहीं यह साबित करने के लिए कुरान भी उसी सोर्स से आई किताब है जहां से हर ज़माने और हर इलाक़े में अवतार और स्क्रिपचर्स आते रहे? मैं पहले भी बता चुका हूँ कि इंसान को अक़्ल सब से बड़ी नेयमत के रूप में दी गई है और फिर उसको एक परीक्षा में डाला गया है जिसमें एक ओर नूरानी रूहें हैं जो हिदायत का काम करती हैं तो दूसरी ओर डेमोनिक या तमसिक ताक़तें हैं जो गुमराही के काम में लगी हैं। तमसिक ताक़तों के वश में फंसी कोई आत्मा कैसे रूहानियत और मार्ग दर्शन का पैग़ाम प्राप्त कर सकती है? वह आत्मा तो ऐसी दलदल में लिप्त है कि पहले उसे कोशिश करके वहां से निकलना होगा, अपनी इंद्रियों और मस्तिष्क को रूहानी राहों पर अग्रसर होने के मार्ग पर लगाना होगा, तब डिवाईन स्क्रिपचर्स या अवतार जिनके माध्यम से स्क्रिपचर्स हम तक पहुंचे, हमारा मार्गदर्शन और हिदायत करते दिखाई देंगे।
कुरान की एक और आयत देखते हैं जिसमें साफ शब्दों में कहा जा रहा है कि यह किताब किसी और सोर्स से हो ही नहीं सकती।
Quran.Surah Younus.10.37:
And this Quran is not such as could ever be produced by other than Allah (Lord of the heavens and the earth), but it is a confirmation of (the revelation) which was before it and a full explanation of the book (i.e. laws, decreed for mankind) – wherein there is no doubt – from he Lord of the Alamin (all the worlds that exist).
यहां कहा जा रहा है कि यह कुरान पहले आए स्क्रिपचर्स को कंफर्म करता है। समस्या यह है कि जब हमने हर स्क्रिपचर का अपनी अपनी समझ से अनुवाद कर लिया तो फिर एक किताब दूसरे को कन्फर्म करती कहाँ से नज़र आएगी? जिस दिन आप मेरे साथ वेद, उपनिषद, गीता और कुरान पढ़ेंगे, आप पाएंगे कि डिवाईन मैसेज हर ज़माने में केवल एक रहा है और हमने उस एक मैसेज को विभिन्न तरह से इंटरप्रेट करके धर्म की दीवारें खड़ी कर लीं।
जिस दिन आप समझ जाएंगे कि वेद, उपनिषद, गीता और कुरान बिलकुल एक ही मैसेज दे रहे हैं, उस दिन आप इन सब किताबों को एक ही सोर्स से आई किताबें मानने लगेंगे। पर इसके लिए पहले आपको एक रब पर यक़ीन रखते हुए अपने आप को आत्मिक उत्थान के मार्ग पर लगाने की आवश्यकता है और फिर अपनी अक़ल का प्रयोग करते हुए इन डिवाईन किताबों को पढ़ना और समझना होगा।
कुरान की एक और आयत देखिए जो कह रही है कि यह सत्य मार्ग की राह दिखाने वाली किताब है जो कि तमाम इंसानियत के लिए हिदायत है।
Quran.Surah Al-Zumar.41:
Verily, We have sent down to you (O Mohammad) the Book for mankind in Truth. So whosoever accepts the guidance, it is only for his own self, and whosoever goes astray, he goes astray only for his (own) loss. And you (O Mohammad) are not a Wakeel (trustee or disposer of affairs, or keeper) over them.
कहा जा रहा है कि यह इंसानियत के लिए सत्य की राह प्रदर्शित करने वाली किताब है। जो भी इस किताब से हिदायत पाया, उसने अपना भला किया और जो गुमराह हो गया, उसने अपना ही नुकसान किया। और तुम ऐ मौहम्मद कोई वकील तो हो नहीं उन पर।
यहां पर हिन्दु या मुसलमान, यहूदी या ईसाई होने की शर्त नहीं। जिस किसी ने भी हिदायत कुबूल की उसने राह पाई जो उसके अपने भले के लिए है और जो इस राह से भटका उसने अपना ही नुक़सान किया। कोई दूसरा जो कुरान पर यक़ीन नहीं रखता वह क्योंकर कुरान को पढ़ेगा। उसके पास भी उसी एक सोर्स से आए स्क्रिपचर्स हैं जिन से वह हिदायत के मार्ग पर आ सकता है। वेद और गीता में देवताओं या सप्तऋषि का उल्लेख है तो यह उन्हें कुरान के अहललबैत तक ही लाएगा और इन अहललबैत के जिस्म में जो नूर काम कर रहा था उसको समझना हो तो तुम्हें वेद और उपनिषद तक जाना ही होगा।
कुरान को अधिकांश वही लोग पढ़ेंगे जो अपने को मुसलमान कहते हंै। आवश्यक नहीं कि वे भी इस किताब से हिदायत पा जाएं क्योंकि जैसे पहले कहा जा चुका है, यह किताबे हिदायत है मुत्तकून के लिए। जो लोग कुरान से आतंकवाद, जुल्म और ज़बरदस्ती की शिक्षा लेते हैं या जो कुरान को ऐसी शिक्षा देता हुआ पाते हैं, उन्होनंे दरअस्ल कुरान और अन्य तमाम ईश्वरीय किताबों के संदेश को समझा ही नहीं। या यूँ कहें कि वे मुत्तक़ून के लेवल तक पहुंचे ही नहीं कि कुरान से हिंसा और मारकाट का संदेश ले रहे हैं।
Quran.Surah Ar-Rad.13.1:
These are the verses of the Book (the Quran), and that which has been revealed unto you (Mohammad) from your Lord is the truth, but most men believe not.
बिलकुल साफ कहा जा रहा है कि अधिकांश इंसान यक़ीन नहीं करते कि कुरान सत्यमार्ग का पथ प्रदर्शित करता है। यह वे लोग हैं जो तमसिक ताक़तों या असुरों को अपनी आत्मा सौंपे बैठे हैं। जब आप जा ही रहे हों किसी दूसरे मार्ग पर तो फिर सीघे मार्ग की हिदायत दी भी जाए आपको क्योंकर समझ में आएगी। दिल्ली में इंडिया गेट पर विचरते कोई आपको मुम्बई के गेट वे आफ इंडिया तक पहुंचने का मार्ग समझाए तो आप और अधिक भ्रमित ही हो जाएंगे। सत्यमार्ग की हिदायत पाने के लिए उस मार्ग पर अपने को लगाने की कोशिश तो आपको ही करना होगी। कुरान समझने के लिए न सही, गीता भी तब तक समझ नहीं आएगी जब तक अपने को रूहानी तरक़्क़ी की राह पर नहीं लगाएंगे।
Quran.Surah Al-Anbiya.21.10:
Indeed, We have sent down for you (O mankind) a book (the Quran) in which there is Dhikrukum (your reminder or an honor for you i.e. honor for the one who follows the teaching of the Quran and acts on its teaching). Will you not then understand?
हर प्रकार से कुरान ये बताने की कोशिश कर रहा है कि ये किताब है खुदा की ओर से। मैंने अपने लैक्चर्स में और गीता की कमेंटरी में भी दिखाया है कि कैसे बातचीत का जो पैटर्न गीता में है एकदम वही पैटर्न हमें कुरान में नज़र आता है। गीता में कृष्ण के मुख से बात हो रही है तो कुरान की आयतें हमें अवतार मौहम्मद के मुख से सुनने को मिलती थीं। अवतार मौहम्मद के मुख से बात करने वाला जब मुख़ातिब करता है तो सैकंड पर्सन में ‘तुम’ या ‘आप’ या 'You' कह कर। बड़ी देर तक अर्जुन कृष्ण को एक आम गुरू समझते हुए बात करते नज़र आते हैं, इधर कुरान की आयतें नाजिल होती थीं तो अवतार मौहम्मद भी विभिन्न हालात में होते थे, उनके सामने कभी कोई होता था, कभी कोई।
Quran.Surah al-Isra.17.89:
And indeed We have fully explained to mankind, in this Quran, every kind of similitude, but most mankind refuse (the truth and accept nothing) but disbelief.
कृष्ण के साथ भी गिनती के लोग थे जबकि उनसे लड़ने एक बड़ी सेना जमा हुई थी। मैंने किताब Gita Saar - A Muslim Perspective में दिखाया है कि कैसे कृष्ण के रिश्तेदार भी उनको अवतार नहीं समझते थे और अधिकतर उनको तरह तरह से परेशान करते थे। महाभारत के युद्ध में जो फौज पांडवों से लड़ने को आई वह भी यदि कृष्ण को अवतार समझ रही होती तो लड़ने को ही क्यों आती।
यही बात कुरान भी कह रहा है जब वह कहता है कि हमने इस कुरान के माध्यम से इंसान को सब कुछ पूरी तरह समझा दिया, विभिन्न मिसालों के माध्यम से, लेकिन अधिकांश इंसान हक़ का इंकार कर देते हैं। यह तमसिक या जुलमत की ताक़त है जो उसको हक़ और हक़ीक़तों की समझ से रोके हुई है। उसे इन ताक़तों के शिकंजे से अपने को आज़ाद करना होगा, सात्विक कर्मों द्वारा, righteousness का मार्ग अपना कर, आत्मिक उत्थान यानी रूहानी तरक़्क़ी की राह पर अपने को लगाना होगा, तब ही यह राज़ उसकी समझ में आ सकेंगे।
सूरह इब्राहीम की पहली आयत देखिए, जिसमें साफ कहा जा रहा है कि वही है जो अपनी खुली हुई निशानियंा भेजता है अपने बन्दे मौहम्मद पर ताकि वह तुमको जुलमत से नूर की तरफ ले आए।
Quran.14.1:
Alif-Lam-Ra. (this is) a Book which We have revealed unto you (O Mohammad) in order that you might lead mankind out of darkness into light by their Lord’s leave to the path of the Almighty, the Praised.
ईसाई किताबें भी इसी नूर और जुलमत की जगह जगह बात कर रही हैं। लेकिन उसको केवल Light और Darkness अनुवाद करके न तो हम उन नूरानी हस्तियों की समझ बना पाए जो हिदायत और मार्गदर्शन की ज़िम्मेदार हैं और न उस तमस यानी जुलमत को पहचान पाए जो हर ज़माने में केवल सत्यमार्ग से गुमराह करने में लगी है।
Isaiah.9.2:
The people who walk in darkness will see a great light. Those live in a dark land, The light will shine on them.
हम आपको दिखा चुके हैं कि जुलमत यानी तमसिक ताक़त के कारिंदों के लिए वेद और उपनिषद में असुर का शब्द प्रयोग हुआ है जबकि गीता ने जुलमत का बिलकुल सही शाब्दिक अनुवाद तमस किया है। असुर का इंगलिश कमेंटेटर्स ने demonic forces अनुवाद किया है। कुरान में शब्द नूर आया है तो वेद और उपनिपषद ने दिव्यात्मा शक्ति की बात की है। यानी ऐसी शक्ति जो नूरानी भी है और आत्मा भी है। और कुरान भी कह रहा है कि रूह को हमने नूर बनाया, यानी कुरान से भी साफ है कि वह नूरानी रूह की बात कर रहा है जबकि वेद और उपनिषद दिव्यात्मा या दिव्य रूपी आत्मा की बात कर रहे हैं। कई उपनिषद में इस नूर को गोल्डन यानी स्वर्णिम बताया गया है। खुदा ही है जो उस बन्दे को जो सत्य मार्ग की तलाश में सच्चे दिल से लगा है, उसे जुलमत यानी तमसिक ताक़तों के चंगुल से निकाल कर नूरानियत की ओर लाता है। जबकि इंसान दोनों ही ताक़तों के बीच घिरा है। उपनिषद ने यहां तक कहा कि हम दोनों में से किसी के लिए भी food यानी अन्न बन सकते हैं, यानी हम नूर और जुलमत में से किसी को भी अधिक शक्तिशाली बना सकते हैं। जब दो बराबर की शक्ति रखने वाली ताकतें हमें अपनी ओर खींचने में लगी है तो खुदा ही है जो हमारी कोशिशों से खुश होकर हमको जुलमात के अंधेरों से नूर के उजालों की ओर ला सकता है। देखिए आयतः
Quran.Surah al-Hadeed.57.9:
It is He who sends down manifest Ayaat (proofs, evidences, verses, lessons, signs, revelations, etc.) to His slave (Mohammad) that He may bring you out from zulmat (darkness) into noor (light).
एक और आयत देखिए जिस में कहा जा रहा है कि धर्म के नाम पर रस्में निभाने से कोई लाभ नहीं। तुम पूरब की ओर मुंह करो या पश्चिम की ओर, यह भी मायनी नहीं रखता। जो सब से अधिक मायनी रखता है वह यह कि तुम दिल से अल्लाह पर यक़ीन रखो और उसके अंतिम हिसाब के दिन पर और उसके फरिश्तों पर और उसकी किताब पर और उन नबियों पर जो उसकी ओर से आए और उस अल्लाह की मौहब्बत में, ग़ौर कीजिएगा, उसकी मौहब्बत में अपनी पसन्दीदा दौलत को संबंधियों और अनाथ पर ख़र्च करो और ज़रूरत मंदों पर और जो सफर में हैं उन पर, भिखारियों पर और गुलामों को आज़ाद कराने पर, और उसकी मौहब्बत को दिल में रखते हुए ही उसकी इबादत करो और अपनी आमदनी में से जो कहा गया वह निकालो। और प्रशंसा के लाएक़ हैं वे जो अपनी प्रतिज्ञा पर पूरे उतरें जब वे कोई प्रतिज्ञा करें, मुश्किलों के सामने अडिग रहें और परेशानियों में और जब सत्य और असत्य के बीच कश्मकश हो। ऐसे होते हैं सच्चे और पाक लोग।
Quran.Surah al-Baqarah.2.177:
It is no virtue that you turn your faces towards the east or the west, but virtue is that one should sincerely believe in Allah and the Last Day and the Angels and the Book and the Prophets and, out of His love, spend of one’s choice wealth for relatives and orphans, for the needy and the wayfarer, for beggars and for the ransom of slaves, and establish the Salat and pay the Zakat. And the virtuous are those who keep their pledges when they make them and show fortitude in hardships and adversity and in the struggle between the truth and falsehood; such are the truthful people and such are the pious.
सूरह बक़रा की ही एक और आयत कहती है कि बनी इस्रायल में से जिन लोगों को हम ने तौरेत दी और जिन लोगों को हम ने कुरान दिया, उनको चाहिए कि उसकी शिक्षा पर चलें और उस पर ईमान रखें। और जो कोई भी उस पर यकीन नहीं रखें, वह नुक़सान उठाने वालों में से है।
Quran.Surah al-Baqarah.2.121:
Those to whom We have the book (the Taurat or Torah) or those to whom We have given the book (the Quran) recite it (i.e. obey its orders and follow its teachings) as it should be recited (i.e. followed), they are the ones who believe therein. And whoso disbelieve in it (the Taurat or the Quran), those are they who are the losers.
इसी प्रकार सूरह नमल की छठी आयत कहती है कि यक़ीनन आप की ओर कुरान भेजा जा रहा है उसकी ओर से जो सब से अधिक दाना यानी अक़ल रखने वाला और जानने वाला है।
Quran.Surah an-Naml.27.6:
And verily, you (O Mohammad) are receiving the Quran from the One, All-Wise, All-Knowing.
इसी प्रकार सूरह अल फुरक़ान की आयत 32 भी उस समय के लोगों के मन में उठ रहे प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहती है कि जो लोग यक़ीन नहीं करते वह कहते हैं कि कुरान एक बार में ही क्यों नहीं अवतरित कर दिया गया। इसको टुकड़ों में इस लिए भेजा जा रहा है कि तुम्हारे दिल को मज़बूती प्रदान करे। और हमने इसको आहिस्ता आहिस्ता, विभिन्न चरणों में भेजा। ज़रा सोचो कि क्या कोई स्वयं किताब लिख रहा हो तो वह ये कहेगा कि इसकी आयतें चरणों में लिखी जा रही हैं ताकि मेरे दिल को मज़बूती मिले। हर कोई चाहता है कि अपनी प्रशंसा करे, या कम से कम अपनी बुराई या कमज़ोरी तो न दिखाए। जबकि कुरान तो यहां तक कह रहा है कि मौहम्मद को न तो किताब का ज्ञान था और न ईमान था जब तक कि रूह को उन पर नहीं भेज दिया गया।
Quran.Surah al-Furqan.25.32:
And those who disbelieve say: Why is not the Quran revealed to him all at once? Thus (it is sent down in parts), that We may strengthen your heart thereby. And We have revealed it to you gradually, in stages.
सूरह अल इसरा तो न केवल इंसानों को बल्कि जिन्नातों को भी चैलेज देते हुए कह रहा है कि कह दो कि यदि इंसान और जिन्नात मिल कर कुरान जैसा कुछ बनाना चाहें, फिर भी वे इस जैसा कुछ नहीं बना सकते, यदि वे एक दूसरे के मददगार भी हो जाएं तो भी।
Quran.Surah al-Isra.17.88 (the challenge):
Say: “If the mankind and the jinns were together to produce the like of this Quran, they could not produce the like thereof, even if they helped one another.
आज तो बड़ा आसान है कह देना कि कुरान डिवाईन किताब नहीं है। या यह कि अवतार मौहम्मद ने स्वयं कुरान को गढ़ लिया। लेकिन जब कुरान की आयतें आना शुरू हुईं तो वह वो दौर था कि अरब हर बुराई में भले ही गिरफतार हों, भाषा पर उनकी कमांड ऐसी ज़बरदस्त थी कि बातों बातों में शायरी कह दिया करते थे। भाषा के मामले में अपने को इतना आगे समझते थे कि अन्य सारी दुनिया को अजम यानी गूंगा कहते थे। युद्ध के दौरान भी शेर-ओ-शायरी में सामने लड़ने आए दुश्मनों से बातचीत किया करते थे। ऐसे अरबों के बीच जब कुरान ने अपने सबसे छोटे चैपटर के जवाब में कुछ पेश करने का चैलेंज दिया तो उनमें के जो भाषा के बड़े ज्ञानी थे उन्होंने भी हार मान ली यह कहते हुए कि यह कलाम किसी बशर के बस की बात नहीं। यानी कोई इंसान ऐसा कलाम नहीं लिख सकता। कुरान का चैलेंज आज भी क़ायम हैः यदि तुम समझते हो कि यह इंसान का कलाम है तो इसके सब से छोटे सूरह जैसा कुछ दयानतदारी से लिख लाओ।
अरबी भाषा से अनभिज्ञ लोगों से वार्ता करते हुए नहीं बल्कि उस समय के उन लोगों से जो भाषा पर अपनी कमाण्ड के आगे सारी दुनिया को गूंगा कहते थे, कुरान चैलेंज दे रहा है कि यदि तमाम इंसान और जिन्नात मिल भी जाएं, और एक दूसरे की पूर्ण सहायता करें, तो भी कुरान जैसा कुछ सामने नहीं ला सकते।
तुम तो अरबी भाषा से अनभिज्ञ हो और जानते ही नहीं कि कुरान की भाषा में ऐसा क्या चमत्कार है कि अरबी भाषा पर बड़ी पकड़ रखने वाले भी यह मानने पर विवश हो गए कि यह इंसान का कलाम नहीं है। फिर तुम को क्या हक़ बनता है कि तुम कुरान के सोर्स पर टिप्पणी करो?
फिर इससे बड़ा चमत्कार क्या हो सकता है कि अवतार मौहम्मद, जिनको कुरान की आयतें आने के समय तक, किसी भी इंसान ने शिक्षा दीक्षा नहीं दी थी, उनके मुख से ऐसा कलाम निकले जैसा कोई भी कह सकने में अस़क्षम हो। जब तक कि तप से पाक किए गए शरीर की ओर रूह नहीं भेज दी गई, मौहम्मद को न तो किताब का ज्ञान था और न ईमान। दूसरी ओर वेदों के लिए कहा गया कि तपप्रभाव और देव प्रसाद के कारण ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया गया। हम बता चुके हैं कि देवता दरअस्ल देवात्माएं हैं, यानी नूरानी रूहें हैं। इसी नूरानी रूह के मौहम्मद की ओर भेजे जाने की बात कुरान कर रहा है जिसके फलस्वरूप वे अवतार कहलाए और उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हुआ जो इंसान के वश में नहीं।
यह नूरानी रूह उस समय भी मौजूद थी जब आदम को पैदा किया जा रहा था। यही कारण है कि अवतार मौहम्मद ने कहा कि मैं उस समय भी नबी था जब आदम आब-ओ-गिल के दरमियान थे। या कहीं पर यह रिवायत भी मिलती है कि मौहम्मद का नूर आदम से 4000 वर्ष पहले पैदा किया गया। नूरानी रूहों के बारे में अधिक जानकारी तो तुम्हें उपनिषदों और वेदों में ही मिलेगी!
सूरह बकरा की आयत 23 भी चैलेंज देते हुए कह रही है कि यदि तुम में से किसी को शक है इस कुरान पर जो हमने भेजा अपने बंदे मौहम्मद की ओर तो इसके एक सूरह के जैसा कुछ बना लो, और अपने गवाहों और मददगारों को ले आओ, अल्लाह के अतिरिक्त, यदि तुम सच्चे हो। यानी अल्लाह के अतिरिक्त जिस किसी को भी मदद के लिए बुला लो, इस जैसा तुम कुछ भी नहीं बना पाओगे। यह चैलेंज आज भी क़ायम है!
Quran.Surah al-Baqarah.2.23:
And if you are in doubt concerning that, which We have sent down (i.e. the Quran) to our slave (Mohammad), then produce a Surah (chapter) of the like thereof and call your witnesses (supporters and helpers) besides Allah, if you are truthful.
इसी प्रकार सूहर अल-हश्र की आयत 21 कह रही है कि यदि इस कुरान को किसी पर्वत पर उतारा गया होता तो वह भी इसके बोझ तले रेज़ा रेज़ा हो गया होता।
Quran.Surah al-Hashr.58.21:
Had We sent down this Quran on a mountain, you would surely have seen it humbling itself and rending asunder by the fear of Allah. Such are the parables which We put forward to mankind that they may reflect.
और सूरह अल-हिजर की 9वीं आयत कह रही है कि यह हम ही हैं जिसने इस कुरान को तुम तक भेजा और यक़ीनन हम ही इसकी हिफाज़त करेंगे।
Quran.Surah al-Hijr.15.9:
It is We who have sent down the Dhikr (i.e. the Quran) and surely, We will guard it (from corruption).
ठीक इसी प्रकार सूरह अन नहल की आयत 89 कह रही है कि हमने इस किताब को तुम तक भेजा, हर बात को ज़ाहिर करने के लिए, हिदायत के लिए, तुम पर रहम की ख़ातिर और शुभ संदेश देने के लिए उनके लिए जो अल्लाह के आगे अपने को सुपुर्द किए हैं।
Quran.Surah an-Nahl.16.89:
…And We have sent down to you the Book (the Quran), as an exposition of everything, a guidance, a mercy, and glad tidings for those who have submitted themselves (to Allah).
जो अपनी आत्मा को अल्लाह के आगे सुपुर्द नहीं किए उनके लिए कुरान नहीं है, यह एक बार फिर कहा जा रहा है। हम दिखा चुके हैं कि गीता भी इसी प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए कहती है कि जो wayward हैं, यानी भटके हुए हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को साधने की कोशिश नहीं की, और जिन्होंने इसको नकारा यानी इसका परमात्मा की ओर से होने पर उन्हें यक़ीन नहीं, उनके लिए गीता भी नहीं है।
सूरह यूनुस की आयत 57 भी ऐसा ही कुछ कह रही है। कुरान को नसीहत, तुम्हारी बीमारियों का इलाज, हिदायत और रहम बता रही है उनके लिए जो इसके खुदा की ओर से होने पर ईमान रखते हैं।
Quran.Surah Younus.10.57:
O mankind! There has come to you a good advice from your Lord (i.e. the Quran, ordering all that is good and forbidding all that is evil), and a healing for that (disease of ignorance, doubt, hypocrishy and differences, etc.) in your breasts ,- a guidance and mercy (explaining lawful and unlawful things, etc.) for the believers.
सूरह अल इसरा की आयत 82 भी कुरान को अल्लाह की ओर से आया हुआ मानने वालों के लिए स्वास्थ देने वाला और रहम बता रही है। स्वास्थ यदि कुरान दे रहा है तो क्या टीबी और डेंगु और कोरोना से स्वास्थ देगा? हो सकता है देता हो पर अस्ल में तो कुरान रूह के लिए हिदायत है और यह हमको रूहानी बीमारियों से स्वस्थ करता है जिनमें घिरे होने के कारण हम मोक्ष या salvation के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जब रूह की बीमारियों से छुटकारा पा लोगे तो शारिरिक बीमारियों से भी छुटकारा मिल जाएगा।
Quran.Surah al-Isra.17.82:
And We sent down in the Quran such things that have healing and mercy for the believers.
सूरह अन निसा तो यहां तक चैलेंज दे रहा है कि ज़रा इस कुरान को ध्यान से पढ़ कर तो देखो। यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और सोर्स से होता तो उनको यकीनन इसमें बहुत सारी विरोधाभासी बातें मिल जातीं। ध्यान से पढ़ने की बात हो रही है। लोग कुरान की आयतों के विभिन्न प्रकार के अर्थ निकालने की कोशिश करते हैं पर जरा मेरे साथ कुरान पढ़ कर तो देखें, तो आप पाएंगे, कि इसमें न केवल कुछ भी विरोधाभासी नहीं है बल्कि जो कुछ पहले के स्क्रिपचर्स ने मार्ग दिखाया है एकदम वही मार्ग कुरान भी दिखा रहा है। आवश्यक यह है कि तुम ने कुरान को भी ठीक ठीक समझा हो और पहले के स्क्रिपचर्स को भी।
Quran.Surah an-Nisa.4.82:
Do they not then consider the Quran carefully? Had it been from other than Allah, they would surely have found therein many a contradiction.
सूरह कहफ की पहली आयत भी अल्लाह की हम्द और शुक्राना अदा करते हुए कह रही है कि सारी प्रशंसाएं और शुक्राना उस खुदा के लिए है जिसने इस किताब को भेजा अपने बंदे के ऊपर, बिलकुल सीधी सीधी बात करते हुए।
Quran.Surah al-Kahf.18.1:
All the praises and thanks be to Allah, who has sent down to His slave (Mohammad) the Book (the Quran), and has not placed therein any crookedness.
आप ने देखा कि कैसे कुरान हर उस जुबान को खामोश कर रहा है जो उसको डिवाईन किताब न मानता हो या जो ये मानता हो कि इसको अवतार मौहम्मद ने स्वयं गढ़ लिया।
आप कह सकते हैं कि कुरान पर इल्ज़ाम है और कुरान स्वयं कैसे अपनी गवाही दे सकता है। तो मैं आप के सामने वह चैलेंज भी पेश कर चुका हूँ जो कुरान हर ज़माने के लोगों के लिए देता है। यदि सच्चे हो तो तुम तमाम इंसानों को जोड़ लो और जिन्नातों को भी मिला लो पर फिर भी इस जैसा कुछ नहीं ला सकते। कुरान हर ज़माने के लिए मोजिज़ा है, चमत्कार है, miracle है, ख़ासकर इस आखि़री जमाने के लिए जब आप देखेंगे कि अनेक छिपे राज़ आने वाले समय में ज़ाहिर होंगे।
अवतार मौहम्मद के अन्दर कोई दैवीय शक्ति काम कर रही थी तब तो उन्होंने अनेक चमत्कार यानी मोजिज़े दिखाए। मैं अनगिनत सुबूत के साथ यह साबित करता आया हूँ कि जो इंद्रदेव हैं वही मौहम्मद हैं। जब वेदों का पुनः अनुवाद होगा तो तमाम छिपे राज़ खुल कर सामने आ जाएंगे।
कितने ही मोजिजे़ यानी चमत्कार अवतार मौहम्मद ने अपनी 63 साल की इंसानी जिंदगी में दिखाएं। वे सब उस दिव्य शक्ति के कारण थे जो उनके शरीर को अपना आफिस बनाए थी। इनमें बहुतेरे ऐसे चमत्कार हैं कि अक़ल दंग रह जाती है और दिल चकाचैंघ रह जाते हैं। लेकिन अल्लाह ने किसी भी चमत्कार को उनकी नुबूवत की गवाही के रूप में नहीं पेश किया सिवाय कुरान के। यह कुरान ऐसा miracle है, ऐसा चमत्कार है जो हर ज़माने के लिए एक खुला हुआ चैलेंज है।
पुस्तिका के लेखक का आरोप है कि अरब के रेगिस्तान में जब इस्लाम अपने वजूद में आया और मौहम्मद मदीना शहर में दाखि़ल हुए तभी आतंक के अभियान की शुरूआत हुई। इस वक्तव्य से ज़ाहिर है कि पुस्तिका का लेखक अवतार मौहम्मद के लिए कितना ही निगेटिव नज़रया क्यों न रखता हो, उनके मक्का के क़्याम के दौरान वह कुछ भी ऐसा नहीं पा सका कि जिससे वह यह दिखा सकता कि अवतार मौहम्म्द का हिंसा या आतंक से कोई लेना देना था।
अवतार मौहम्म्द की उम्र 53 वर्ष थी जब उन्हें मजबूरन मक्का शहर छोड़ कर मदीना हिजरत करना पड़ी। वह भी ऐसे हालात में कि तमाम क़बीलों ने एका कर लिया और हर क़बीले के एक व्यक्ति को चुना गया कि वे सब मिलकर रात में अवतार मौहम्मद के घर में घुस कर उनका क़त्ल कर देंगे और किसी एक क़बीले पर इसका आरोप नहीं आएगा। अवतार मौहम्म्द के आलोचकों को इस सब में कोई बुराई, कोई आतंक नहीं दिखाई देता कि सब क़बीले एकजुट हो कर एक निहत्ते सोते हुए व्यक्ति के घर में रात के अंधेरे में घुसकर उसको क़त्ल कर दें। अवतार मौहम्मद ने न तो चोरी की थी न डाका डाला था। बस यही तो कहते थे कि सारी सृष्टि का बस एक खुदा है, उसकी ही इबादत करनी चाहिए। जो एक खुदा को नहीं मान रहे थे और मल्टीपल खुदाओं में यकीन रखते थे, वे मलटीपल खुदाओं को मानते रहते तो क्या अवतार मौहम्मद उनके दिलों में जबरदस्ती यह डाल सकते थे कि नहीं खुदा एक ही है। क्या वैचारिक मतभेद के कारण किसी बेगुनाह इंसान का क़त्ल करना जाएज है?
इससे पहले मक्का वालों ने मिलकर अवतार मौहम्म्द के तमाम साथियों का आर्थिक बहिष्कार तक किया और उन्हें शहर से बाहर निकल कर पहाड़ों पर रहने पर मजबूर कर दिया जहां वे तीन वर्षों तक इस हालत में रहे कि पेड़ों की छाल और घास और पत्तियां तक खानी पड़ीं और पेट पर पत्थर तक बांधना पड़े ताकि भूख की शिद्दत कम महसूस हो। अवतार मौहम्मद के कई साथी, यहां तक कि उनके चाहने वाले चाचा और पत्नी तक इन सख़्तियों को बरदाश्त न करते हुए कुछ समय बाद मौत को पहुंच गए।
इससे पहले भी और बाद में भी सख़्तियों का सिलसिला जारी रहा। यहां तक कि अवतार मौहम्मद की शिक्षा को अपनाने वालों को नंगे जिस्म जलती हुई रेत पर लिटा दिया जाता, उनके सीने पर पत्थर रख कर तोड़ा जाता, कभी उनके पैर रस्सियों में बांधकर दोनों ओर ऐसे खींचे जाते कि पैर चिर जाते, उनकी पीठ पर कोड़े बरसाए जाते, घरों का सामान निकाल कर फेंक दिया जाता या किसी और बहाने से उन्हें क़त्ल कर दिया जाता। बच्चों को उकसाया जाता कि अवतार मौहम्मद पर पत्थर बरसांए, गली में से गुजरते समय कोई उनके सिर पर कूड़ा फेंकता तो कोई उनके चेहरे पर थूकता, वह एक रब की इबादत में अश्टांग आसन करते हुए सिजदे में जाते तो कोई कटे हुए ऊंट की आंतड़ियों को लाकर उनकी पीठ पर डाल देता कि उसके बोझ से उठ न सकें। उनपर फब्तियां कसते और गाली गलोच करते।
यदि यह मान भी लिया जाए कि मक्का में अवतार मौहम्मद मजबूर थे, इसलिए कुछ न कर सके, लेकिन जब मदीना पहुंचने पर उनके अनुयायी बढ़े और वह ताकतवर हुए तो भी यदि अवतार मौहम्मद की जीवनी की जगह यह किसी हिन्दुस्तानी राजा की जीवनी होती तो यह आलोचक उसमें भी अच्छाई का पहलू देख लेते और बड़े गर्व से बताते कि कैसे राजा ने अपने ऊपर हुए जुल्म का बदला लिया।
जबकि अवतार मौहम्मद ने कभी बदला लिया ही नहीं! बल्कि वह तो अहिंसा और प्रेम की ऐसी मिसालें पेश करते नज़र आए कि उनके साथी तक इस सब को आसानी से पचा नहीं पाते थे। जो लोग अवतार मौहम्मद पर आतंक का आरोप लगाते हैं वह बताएं कि क्या वह मक्का से किसी की जान ले कर या माल लूट कर भागे थे? नहीं, बल्कि अपनी जान बचाकर गए थे ऐसे में जब तमाम क़बीलों ने एका कर लिया था उनको क़त्ल करने का। इसके बावजूद वह अली को पीछे छोड़ गए थे कि जिन मक्का वालों ने उनके पास अमानतें रखवा रखी हैं अली उनको वापिस लौटा दें। मक्का वाले भी क्या खूब थे! इनकी जान के पीछे पड़े थे और यह भी जानते थे कि इनसे सच्चा और ईमानदार कोई दूसरा नहीं, यदि इनके पास कुछ अमानत के रूप में रखवाएंगे तो ज्यों की त्यों वापिस अवश्य मिल जाएगी।
चलो, अब तो मौहम्मद मक्का से दूर चले गए थे, उनको वहां रहने देते। यदि अवतार मौहम्मद बदले की भावना से मक्का वालों पर हमलावर होते तब भी शायद ये कहना सही होता कि उन्होंने बदले की भावना से कारवाई की। पर इतिहास तो बताता है कि अवतार मौहम्मद के मदीना पहुंचने पर मक्का वाले वहां भी हमला करने की पहल करते नज़र आते हैं। ऐसे समय जब मुसलमान ठीक से मदीना में जमने भी नहीं पाए थे, मक्का वालों ने एक फौज के साथ मदीना वालों पर चढ़ाई कर दी।
यहां पर कहने वाले यह भी कहते हैं कि अवतार मौहम्म्द ने पहले अबू सूफियान के सीरिया से लौटते हुए क़ाफिले पर हमला करने के लिए एक जत्था तैयार किया था। अबू सूफियान को अवतार मौहम्मद के इस प्लान की किसी न किसी तरह जानकारी हो गई तो उसने एक क़ासिद मक्का भेज कर मदद तलब की। बदले में अबू जहल एक हज़ार से अधिक की फौज लेकर मदीना पर हमले के लिए आ गया।
यहां पर ग़ौर करने की बात यह है कि अवतार मौहम्मद ने सीरिया से आ रहे क़ाफिले पर हमला नहीं किया था बल्कि अवतार मौहम्मद के आलोचकों का कहना है कि अबू सूफियान को उसके जासूसों ने खबर दी थी कि अवतार मौहम्मद ने 300 लोगों का एक जत्था तैयार किया है इस क़ाफिले पर हमला करने के लिए। यह लोग भूल जाते हैं कि अवतार मौहम्मद के दुनिया से गुज़रने के मात्र 30 वर्ष के अन्दर मुसलमानों की हुकूमत इसी अबू सूफियान के पुत्र माविया, फिर पोते यज़ीद और आगे भी उसके खानदान में ही रही। माविया जिसने नक़ली हदीसें गढ़ने की पूरी फैक्टरी तैयार कर ली थी, उसने क्यों अपने बाप को मुसलमानों पर हमलावर होने के इल्ज़ाम से बरी करने के लिए कुछ कहानियां नहीं गढ़वाई होंगी। हमले की ख़बर अबू सूफियान को हो गई जबकि हमला किया नहीं गया। ख़बर कैसे हुई, रब जाने!
ध्यान रहे कि अवतार मौहम्म्द ने सीरिया से आते क़ाफिले पर हमला नहीं किया था बल्कि कथित तौर पर अबू सूफियान के जासूसों ने आ कर ख़बर दी थी कि मौहम्मद ने 300 लोगों का जत्था तैयार किया है सीरिया से आने वाले क़ाफिले को लूटने के लिए। इस पर अबू सूफियान ने अपना एक वफादार गुलाम मक्का रवाना किया था। गुलाम ने मक्का पहुंच कर यह ख़बर नहीं पहुंचाई कि जासूसों ने ख़बर दी है कि मौहम्मद अपने साथियों के साथ हमला कर सकते हैं। बल्कि इतिहास के शब्द कहते हैं कि अबू सूफियान के गुलाम दमदम ने काबा के करीब पहुंचते ही अपने ऊंट की नाक और कान काट दिए और ऊंट की ज़ीन को उलट दिया, अपने कपड़ों को फाड़ डाला और चिल्लाना शुरू कर दिया। यह कहते हुए कि ‘ऐ कुरैश, तुम्हारा माल अबू सूफियान के पास है। उसके काफिले को मौहम्मद और उसके साथी रोके हैं, मैं नहीं कह सकता कि उनके साथ क्या हुआ होगा। मदद करो। मदद करो।’
“O Quraish! Your merchandise! It is with Abu Sufyan. The caravan is being intercepted by Muhammad and his companions. I cannot say what would have happened to them. Help! Help!”
यहां ये गौर तलब है कि अबू सूफियान जब कोई काफिला ले कर जाता था तो मक्का के जिन लोगों ने कुछ न कुछ सामान तैयार किया होता था सब इकट्ठा करके ले जाया जाता था। सामान बिक जाने पर जो माल वापिस आता था, मुनाफे के तौर पर जिसका जितना माल था, उसी हिसाब से बंट जाता था। व्यापारिक क़ाफिले पर हमले की ख़बर से सब को चिंता मंे पड़ जाना लाज़मी था, क्योंकि हर किसी का उसमें हिस्सा था। इस ख़बर से मक्का के मर्दों और औरतों तक का गुस्से से भर जाना लाज़मी था। और फिर दमदम ने जो कुछ नाटक किया, वह गुस्से को भड़काने के लिए ही था। सिवाय क़ाफिले पर हमले की ख़बर के, कोई और ख़बर मक्का वालों को इतना जोश नहीं दिला सकती थी।
अबू सूफियान अवतार मौहम्मद और उनके साथियो से इस क़द्र नफरत करता था कि जब अवतार मौहम्मद ने मक्का के क़याम के दौरान मक्का वालों के जुल्म से मुसलमानों को बचाने के लिए उनको मक्का से निकल कर हबश में पनाह लेने की नसीहत की थी, तो अबू सूफियान उन लोगों को वापिस लाने हबश तक पहुंच गया था और वहां के बादशाह नज्जाशी के सामने हर मुमकिन कोशिश की थी कि मक्का से भाग कर हबश में पनाह लेने वाले मुसलमानों को उसके हवाले कर दे, जिस पर हबश के ईसाई बादशाह ने इंकार कर दिया था।
अवतार मौहम्मद के मक्का से मदीना हिजरत के बाद दूसरे वर्ष में बद्र का युद्ध हुआ था। यदि अवतार मौहम्मद को अब मदीना पहुंच कर मक्का वालों से पंगा लेने का ऐसा ही शौक था तो युद्ध की कुछ न कुछ तो तैयारी की होती। बल्कि हम देखते हैं कि जब युद्ध के लिए मुसलमान जमा हुए तो उनकी संख्या 313 थी जिनमें केवल 60 के पास शरीर पर पहनने के लिए ज़िरह थी, केवल 70 ऊंट थे और 2 घोड़े थे। अरब में युद्ध में घोड़ों की कितनी अहमियत होती थी सब को पता है। दो वर्ष में सिर्फ 2 घोड़े इकट्ठे कर पाए। तलवारें भी इतनी थीं कि दो हाथो की उंगलियो पर गिनी जा सकती थीं। दूसरी ओर अबू सूफियान का जो क़ाफिला सीरिया से वापिस आ रहा था केवल उसकी हिफाज़त के लिए 40 जंगजू घुड़सवार सिपाही साथ थे जो सब तलवारों और ज़िरह आदि से लैस थे। अवतार मौहम्मद के साथियो की तैयारी देखकर तो यह कहा ही नहीं जा सकता था कि वे अबू सूफियान के व्यापारिक क़ाफिले पर हमला करने के लिए तैयार थे। इस के विपरीत अबू जहल की क़यादत में जिस फौज ने बद्र मे मुसलमानों पर हमला किया उसमें 1000 से अधिक लड़ाका थे। यदि अली और हमज़ा जैसे बहादुर न होते, और जैसा मुसलमान मानते हैं कि फरिश्तों की शक्ल में आसमानी मदद न आई होती, तो बद्र की लड़ाई में मुसलमानों की जीत नामुमकिन थी।
इस युद्ध मेें मिली विजय का महत्व स्वयं अवतार मौहम्मद से अधिक कौन समझ सकता था। युद्ध से कुछ लम्हे पहले अवतार मौहम्मद द्वारा की गई अल्लाह से दुआ उनकी मनोस्थिति दर्शाती है। जब उन्होंने कहाः
God this is Quraish. It has come with all its arrogance and boastfulness, trying to discredit Thy Apostle. God, I ask Thee to humiliate them tomorrow. God, if this Muslim band will perish today, Thou shall not be worshipped.
ऐ अल्लाह, यह कुरैश हैं। वे अपने तमाम अभिमान और घमंड के साथ आए हैं ताकि तुम्हारे रसूल को बदनाम कर सकें। ऐ अल्लाह, मैं तुम से मदद मांगता हूँ कि उनकों कल केे दिन ज़लील करना। अल्लाह, यदि मुसलमानों का यह जत्था कल तबाह हो जाता है, तो तेरी पूजा और उपासना कौन करेगा?
जब सिर पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हों और सामने अपनी ताक़त से कई गुना बड़ा लश्कर हो, तो ऐसे में अवतार मौहम्मद की यह दुआ उनके मिशन को पूरी तरह दर्शाती है। मैं आप को बताता आ रहा हूँ कि जब जब जुलमत के बादल छा जाते हैं, लोग सत्य मार्ग से दूर हो कर अधर्म में गिरफतार हो जाते हैं, तब तब कोई अवतार आता है ताकि जुलमत के कारिंदों का नाश कर सके और धर्म के उसूलों को फिर से स्थापित कर सके। यही तो गीता कह रही है। और अवतार मौहम्मद की दुआ से साफ है कि बड़ी कठिनाईयां झेलने के बाद उन्होंने जो एक जत्था तैयार किया था जो एक खुदा के आगे अपने को समर्पित किए था, और उसकी ही इबादत करता था, उनको डर था कि जुलमत की साज़िशों के तहत कहीं यह जत्था मारा न जाए और अल्लाह की इबादत करने वाला कोई न बचे।
अवतार मौहम्मद की प्रार्थना उनके सारे मिशन की गवाही देती है और साबित करती है कि वे उसी सोर्स के अवतार थे जिस सोर्स से वेद और गीता अवतरित हुए। ऐसा इसलिए क्योंकि उपनिषद के अनुसार सृष्टि की रचना के प्रारंभ में जब निराकार एबसोलूट ने साकार ताक़त क्रिएट की, तो उस साकार ताक़त ने क्रिएट होते ही निराकार एबसोलूट यानी ब्रहम यानी महेश यानी अल्लाह की इबादत प्रारंभ कर दी। उपनिषद कहते हैं कि फिर इस साकार ताक़त ने चाहा कि निराकार एबसोलूट यानी अल्लाह की इबादत करने वाले और अधिक हों, तो फिर आगे की सृष्टि की संरचना ऐसे हुई कि नूरानी रूहें क्रिएट हुईं जिनका काम ही हर समय इंसान को सत्य मार्ग और इबादत के मार्ग पर ले जाने की कोशिश करते रहना है। यह नूरानी रूहें समय समय पर विभिन्न इंसानों के शरीर के माध्यम से निराकार एबसोलूट यानी अल्लाह की इबादत की राह की ओर मानवता को लाने की कोशिश में लगी रहीं।
अवतार मौहम्मद की प्रार्थना बताती है कि उनका मिशन भी वही था जिस मिशन में, उपनिषद के अनुसार, दिव्यात्माएं यानी नूरानी रूहें निरंतर लगी रहती हैं।
गीता के अनुसार हर ईश्वरीय अवतार का मिशन यही है। गीता कह रही है कि जब जब अधर्म बढ़ जाता है और लोग धर्म के मार्ग से दूर हो जाते हैं, तब तब धर्म के उसूलों को पुनः स्थापित करने और अधर्म का नाश करने के लिए किसी मानव शरीर को अपने आफिस के लिए प्रयोग करते हुए कोई अवतार आता है ताकि हक़ के उसूलों को फिर से स्थापित किया जा सके। हम देख रहे हैं कि अवतार मौहम्मद भी सारी ज़िन्दगी बस यही करते नज़र आए।
Gita.IV.7:
Whenever there comes to be laxity in regard to right life (dharma) O Bharata (Arjuna), and wrong coming to assert itself, then I bring about the creation of myself.
Gita.IV.8:
To protect those who are good and to destroy evil doers, for establishing righteousness, I assume being, age by age.
जब जब की बात हो रही है और समय समय पर आने की बात हो रही है। कहीं भी नहीं लिखा कि वह अवतार केवल भारत वर्ष में आएंगे। बल्कि जो परमात्मा गीता में कृष्ण के मुख से बोल रहा है, वह केवल भारतवर्ष का मालिक तो नहीं है; सारी सृष्टि उसके अधिकार में है। और सारे इंसान उसके ही मातहत हैं।
अक़ल से समझा जा सकता है कि इंसानों में जब जब भी और जहां जहां भी अधर्म फैला होगा, उस एक सोर्स से जुड़ी दिव्यात्मा शक्तियों यानी नूरानी रूहों ने एक खुदा की इबादत की ओर फिर से इंसानियत को लाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की होगी, जो कि अवतार मौहम्मद की दुआ से भी जाहिर हो रहा है। और दूसरी ओर यह भी मुमकिन नहीं कि जब कोई अवतार हक़ के उसूलों को फिर से स्थापित करने आया हो, अधर्म से लोगों को दूर करने की कोशिश में हो, तो जुलमत यानी तमस ने हक़ के उस मैसेज को फैलने से पहले ही कुचल देने की कोशिश न की होगी।
यह भी अवतार मौहम्मद की दुआ से जाहिर हो रहा है कि उन्हें चिंता थी तो बस यह कि उनकी बेइंतेहा कोशिशों के नतीजे में अल्लाह की इबादत करने वाला जो थोड़ा सा जत्था तैयार हुआ है, कहीं यह जत्था न मार दिया जाए और अल्लाह की इबादत करने वाला फिर से कोई न बचे। यही तो परमात्मा का सृष्टि रचाने का मक़सद था।
अवतार मौहम्मद सारी ज़िंदगी कहा करते थे कि मैं और अली एक ही नूर के दो टुकड़े हैं, और यह नूर आदम की पैदाईश से भी हज़ारों वर्ष पूर्व क्रिएट किया गया था। रिवायतों में है कि एक ही नूरानी रूह से जुड़ी दो हस्तियां होने के बावजूद रिसालत का फल मौहम्मद के हिस्से में आया जबकि अली उसी नूरानी रूह से जुड़े होने के बावजूद अवतार मौहम्मद के बाद भी मुसलमानों की खि़लाफत प्राप्त करने से वंचित रह गए।
इसी का उल्लेख करते हुए स्वेतास्वतर उपनिषद बड़ी ही अजीब बात कहता है। स्वेतास्वतर उपनिषद कहता है कि जो कुछ जुल्म नूरानी रूह से जुड़े उस दूसरे व्यक्ति के साथ हुआ उससे उसका दिल फटा जा रहा था लेकिन जब वह देखता है कि उसके रब की इबादत हो रही है और उसके आगे नतमस्तक होने वाले अधिक हैं, तो उसके सारे ग़म समाप्त हो जाते हैं। मौहम्मद और अली के उल्लेख के अतिरिक्त यदि स्वेतास्वतर उपनिषद के यह जुमले कहीं और फिट हो सकते हैं तो बताईएः
Svetasvatara Upanishad.IV.6:
Two birds, companions (who are) always united, cling to the self-same tree. (Of these two) the one eats the sweet fruit, and the other looks on without eating.
Svetasvatara Upanishad.IV.7:
On the self-same tree, a person immersed (in the sorrows of the world) is deluded and grieves on account of his helplessness. When he sees the other, the Lord who is worshipped and His greatness, he becomes freed from sorrow.
अली ने यदि अपने हक का मुतालबा नहीं किया तो इसके पीछे जो कारण था वह स्वेतास्वतर उपनिषद बिलकुल साफ शब्दों में ब्यान कर रहा है। एक ही नूर से जुड़ा दूसरा व्यक्ति, भले ही कितना अकेला पड़ गया़ हो, जब वह देखता था कि उसके रब की इबादत हो रही है और उसकी महिमा का जाप हो रहा है तो उसके तमाम ग़म समाप्त हो जाते थे।
बड़ी रोचक बात यह है कि उपनिषद ने दो साथियों का उल्लेख किया है जो एक ही सैल्फ-सेम ट्री से जुड़े हैं। मैंने अपने लैक्चर्स में एक से अधिक स्थानों पर दिखाया है कि उपनिषद और गीता एक उल्टे पेड़ की बात कर रहे हैं जिसकी जड़ें स्वर्ग में हैं और जिसकी टहनियां धरती की तरफ आती हैं। मैंने साबित किया है कि यह उसी एक देवात्मा शक्ति यानी नूरानी रूह से बनी 7 नूरानी रूहों की बात हो रही है जो धरती पर इंसानों को सत्य मार्ग की राह दिखाने और उस पर चलाने के लिए हर ज़माने और इलाक़े में मानव शरीर को अपने आफिस के रूप में प्रयोग करती रहीं। मैंने यह भी साबित किया है कि यही 7 नूरानी रूहें थीं जो अहललबैत के शरीर में काम कर रही थीं। सबसे अधिक रोचक बात तो यह है कि इधर उपनिषद दो साथियों को सैल्फ सेम ट्री से जुड़ा बता रहा हंै, ऐसे साथी जो हमेशा एक हैं, उधर मौहम्मद कह रहे हैं कि हम अहललबैत में से हर कोई मौहम्मद है। पहला भी मौहम्मद, आखिरी भी मौहम्मद, बीच वाला भी मौहम्मद, सब के सब मौहम्मद। साफ इशारा था कि अवतार मौहम्मद उन 7 नूरानी रूहों की ही बात कर रहे थे जिनके बारे में ईसा भी कहा करते थे कि 7 रूहों को इस दुनिया में भेजा गया। उन 7 रूहों की बात उपनिषद ने भी की और साफ कहा कि 7 में से एक देवी है। यह इस बात का सबूत है कि अन्य 6 देवता हैं। यह 7 रूहें जब धरती पर 14 जिस्मों में आईं तो अहललबैत कहलाए जिसका उल्लेख वेद ने भी अनगिनत स्थानों पर किया है।
सैल्फ सेम ट्री से जुड़े दो साथियों की बात हो रही है जो हमेशा से एक हैं। अली और मौहम्मद एक ही सैल्फ सेम ट्री से जुड़े थे यह दिखाने के लिए कुरान ने भी राह तैयार की। हुआ यूँ कि जब नजरान से आए ईसाई पादरियों के गुट से मुबाहिला करने की बात हुई तो कुरान ने अवतार मौहम्मद से कहा कि इन से कह दीजिए कि ये अपने self को लाएं, हम अपने self को लाएं, और दुनिया ने देखा कि अवतार मौहम्मद अपने self के रूप में केवल और केवल अली को ले कर गए।
उपनिषद के अनुवाद में helplessness यानी बेबसी का शब्द प्रयोग हुआ है। इस बेबसी का इससे बड़ा क्या सबूत हो सकता है कि अली, जो अवतार मौहम्मद की आंखों का तारा थे, और जिस अली के बिना अवतार मौहम्मद की ज़िंदगी का कोई पल पूरा नहीं होता था, और जिसको पहचनवाने के लिए अवतार मौहम्मद ने अंतिम हज से वापिस लौटते हुए करीब 70000 मुसलमानों के सामने कहा था कि याद रखो कि जिसका मौला यानी लार्ड मैं हूँ उसका मौला यानी लार्ड अली है और सब मुसलमानो ंको हुक्म दिया था कि अमीरूल मोमिनीन यानी तमाम मुसलमानों का लीडर कहते हुए अली को मुबारकबाद दें।
अवतार मौहम्मद के दुनिया के जाने से 6 महिने के भीतर एक बार फातिमा ने अली से पूछा कि ‘हे अली, मैंने सुना है कि मुसलमानों ने आपको सलाम करना तर्क कर दिया है।’ अली ने कहा था कि ‘मुझ को सलाम करना तो दूर, मुसलमान मेरे सलाम का भी उत्तर नहीं देते।’ इस बेबसी के बावजूद अली की ख़ामोशी के पीछे के मकसद को स्वेतास्वतर उपनिषद से अधिक बेहतर तरीक़े से और कौन ब्यान कर सकता है।
आप ने देखा, युद्ध के समय अवतार मौहम्मद के दिल में यही डर था कि यदि मुसलमानों का यह जत्था मारा गया तो फिर अल्लाह की इबादत करने वाले कहां बचेंगे। और तमाम बेबसी के बावजूद अली की ख़ामोशी के पीछे भी यही मक़सद था कि उसकी इबादत करने वालों में कोई कमी न आने पाए। यह दोनों उसी मक़सद की पूर्ती कर रहे थे जो साकार ताक़त, परमात्मा का था, जब वह और अधिक इबादत करने वालों की कामना कर रही थी।
अवतार मौहम्मद की दुआ के बदले में कुरान की आयत के माध्यम से उनको तसल्ली दी गई कि यदि ज़रूरत पड़ी तो हज़ार फरिश्ते आसमान से उनकी मदद के लिए भेजे जाएंगे।
Quran.8.9:
Indeed, I will reinforce you with a thousand from the angels, rank after rank.
कुरान की एक और आयत भी साफ शब्दों में कह रही है कि लड़ने वाले दो गुटों में से एक अल्लाह के मक़सद के लिए लड़ रहा था जबकि दूसरा गुट उसमें यक़ीन नहीं रख रहा था। यानी दूसरा ग्रुप एक रब की इबादत करने वालों को समाप्त करने पर तुला था। हालांकि मुसलमानों ने अपनी आंखों से देखा कि सामने लड़ने आने वाला लश्कर संख्या में उनसे तीन गुना था, लेकिन जैसा कुरान कह रहा है, अल्लाह जिसको चाहता है उसको अपनी ओर से विजयी बनाता है और यक़ीनन इसमें उन लोगों के लिए जो निगाह रखते हैं, बड़े सबक़ हैं।
Quran.3.13:
Already there has been for you a sign in the two armies which met – one fighting in the cause of Allah and another of disbelievers. They saw them [to be] twice their [own] number by [their] eyesight. But Allah supports with His victory whom He wills. Indeed in that is a lesson for those of vision.
आप ने यदि गीता पर मेरे विचार व्यक्त करती पुस्तक पढ़ी है तो उसमें भी मैंने दिखाया है कि कैसे कृष्ण के खि़लाफ लड़ने आने वाले संख्या में बहुत अधिक थे। कृष्ण से लड़ने आने वाले ब्रहमिण सही, अपने समय के बड़े नामवर गुरू सही, पर वे लड़ने इसलिए आए थे क्योंकि वेदिक देवताओं को खुदा मानने वालों और उन देवताओं के आगे ही तमाम यज्ञ पूजा आदि समर्पित करने वालों से जब कृष्ण ने परमात्मा और फिर एबसोलूट का कानसैप्ट समझाया तो उनको लगा कि कृष्ण वेदिक धर्म से विपरीत बात कर रहे हैं।
Gita.IX.20-21:
Knowers of the three (Vedas), soma-drinkers, purified from sin, worshipping by sacrifices, pray of Me the way to heaven; they, attaining the holy world of Indra (Lord of devatas) enjoy divine feasts in heaven.
They, having enjoyed that expansive heaven-world, then on their merit exhausted, they enter the world of mortality, thus conforming to the righteous notions implied in the three (Vedas), desiring desirable objects they obtain values which come and go.
Gita.IX.30:
Even if one of very evil actions should worship Me with a devotion exclusive of all else, he should be accounted to be good all the same merely by the fact that he has a properly settled determination.
Gita.IX.31:
Instantaneously he becomes established in his own right nature and enters into eternal peace. Believe Me in all confidence, O Son of Kunti (Arjuna), that one affiliated to me with fidelity knows no destruction.
Gita.IX.32:
They too who resort to Me for refuge, O Partha (Arjuna), whoever they might be, (whether) women, workers (sudras) as well as farmer-merchants (vaisyas), (all) of sinful origin, they too attain to the supreme goal.
Gita.IX.33:
How much more then the pure brahmanas as also the devoted royal sages. Having reached this transient joyless world do you worship Me.
Gita.IX.34:
Become one with Me; be devoted to Me; sacrifice to Me; bow down to Me; unifying thus yourself, you shall surely come to Me, your supreme Goal none other than Me.
इसी प्रकार अवतार मौहम्मद भी एक रब के आगे नतमस्तक होने के मार्ग पर अडिग थे, हालांकि मक्का में रहते हुए उन पर कुरैश ने तरह तरह से जुल्म और तशद्दुद किया था, और अब जब वे लोग मक्का से हिजरत करके मदीना आ गए थे तो यहां भी कुरैश लश्कर कशी कर रहे थे, तो क्या अब भी मुसलमान उनकी तलवारों के आगे अपनी गर्दनें पेश कर देते?
जिस समय अवतार मौहम्मद मक्का में थे, उस समय तलवार निकालते तो वह civilian unrest कहलाता। कोई कह सकता था कि मक्का के माहौल को खराब करने की कोशिश की गई। लेकिन अब वह मदीना में थे, जहां के निवासियों ने सर्व सम्मति से उनको मदीना का हाकिम मान लिया था। अब यदि कोई मदीना पर चढ़ाई करता है, तो यह एक स्टेट पर हमला करने जैसा है। उनसे युद्ध करने का हुक्म कुरान दे रहा है तो क्या गलत कर रहा है।
Quran.Surah Al-Baqarah.2.190-191:
And fight, in the way of Allah those who fight you; but transgress not the limits. Truly, Allah likes not the transgressors. And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out…
कुरान में आई इस प्रकार की आयतों को कुछ लोग ऐसे पेश करते हैं जैसे ये मारकाट की आयतें हैं। उनको कुरान से निकालने के लिए अदालत तक में गुहार लगाते हैं। जबकि यदि ऐसे लोग अपनी आत्मा को जुलमत के हवाले न किए होते और इन्होंने कुरान को समझने में गलती न की होती तो ये स्वयं देख पाते कि कुरान की आयत उनसे लड़ने को कह रही है जो तुम से लड़ने आ जाएं। यदि कोई लड़ने ही आ जाए तब यदि कहा जा रहा है कि कमज़ोरी न दिखाओ और उनसे लड़ो, जहां पाओ उन्हें क़त्ल कर दो, तो इसमें क्या बुराई है।
जो कुछ जुल्म कुरैश ने मक्का में मुसलमानों पर किए थे, वे क्या सब कुछ भूल गए थे। अनेक की पीठ पर अब भी कोड़ों के निशान थे। कितनों के प्रियजन क़त्ल कर दिए गए थे। बल्कि तमाम जुल्म के बाद और बावजूद इसके कि कुरैश अब भी हमलावर हो रहे हैं, और मुसलमानों को डर है कि अल्लाह की इबादत करने वाली जमाअत ही नष्ट न हो जाए, कुरान मुसलमानों से अपने नफस पर काबू रखने और हदें न पार करने की नसीहत दे रहा है। हद क्या है यह अवतार मौहम्मद ने बड़े विस्तार से बताया था। जो अहद-ओ-पैमान कर लिया है उसको न तोड़ो, यदि कोई दुश्मन तुम्हारी पनाह में आए तो उसे ज़रूर पनाह दो और उसको महफूज़ स्थान पर पहुंचा दो, कोई तुम से सुलह की बात करे तो तुम भी उससे सुलह करो, पीठ दिखाने वाले पर हमला न करो, जो युद्ध करने सामने न आए उसपर हमला न करो, जो निहत्ता हो, उससे न लड़ो, जो एक रब की इताअत कुबूल कर ले, भले ही तुम को लग रहा हो कि केवल अपनी जान बचाने के लिए ऐसा कह रहा है, उसको क़त्ल न करो, जो मारे गए हैं, उनकी लाशों की बेहुरमती न करो, लाशों के अंग न काटो, जो युद्ध के बंदी हैं उनपर जुल्म न करो, उन्हें क़त्ल न करो, बल्कि यहां तक कहा जा रहा है कि हो सके तो उनसे मुनासिब मुआवज़ा लेकर उनको रिहा कर दो।
Quran.Surah Hajj.22.39:
Permission to fight is given to those (i.e. believers against those disbelievers), who are fighting them, (and) because they (believers) have been wronged, and surely Allah is Able to give them (believers) victory.
पुस्तिका के लेखक को सिर्फ यह नज़र आ रहा है कि मदीना पहुंच कर मुसलमानों ने आतंक का राज स्थापित किया।
आप ने बद्र की लड़ाई का विस्तार से उल्लेख पढ़ा जो मदीना पहुंचने के बाद मुसलमानों की पहली लड़ाई थी जिसमें अवतार मौहम्मद के केवल 313 साथी थे। अब गज़वै तबूक या गज़वै उसरा का उल्लेख करते हैं जो हिजरत के बाद नवें वर्ष में 630 A.D. में पेश आया जिसमें अवतार मौहम्मद के साथ 30000 साथी थे। बद्र में तो मात्र 313 साथी थे यहां तो 30000 थे। अब तो अवतार मौहम्मद को दुश्मन के इलाक़े में रौंदते चले जाना था। लेकिन हम देखते हैं कि जो कुछ हुआ वह इसके विपरीत था।
खबरें आ रही थीें कि अरब की सरहद पार बैठे बाईज़ैनतीनी हमले की तैयारी कर रहे हैं और तबूक नामी स्थान के उत्तर में फौजें जमा कर रहे हैं। अवतार मौहम्मद और उनके साथी एक फौज की शक्ल में तबूक की ओर बढ़े। तबूक की ओर गई मुसलमानों की संख्या सबसे बड़ी थी जो कभी भी अवतार मौहम्मद को मिली थी। यदि वे हमलावर होेते थे या आतंकी हमले करते थे, जैसा कि पुस्तिका का लेखक कह रहा है, तो इससे बढ़िया क्या मौका था? बाईज़ैनतीनी इलाके़ को रौंदते चले जाते। अवतार मौहम्मद तबूक के स्थान पर पहुंचे तो वहां बाईजै़नतीनियों को नहीं पाया। वे 20 दिनों तक उसी स्थान पर रूके रहे। और फिर भी जब बाईज़ैनतीनी फौज नज़र नहीं आई तो अपनी 30000 की फौज को वापिस होने का हुक्म दिया।
जो लोग फौजी मामलात की जानकारी रखते हैं, उन्हें पता है कि 30000 की फौज को जमा करने और रसद आदि पर कितना खर्च होता है। युद्ध में मिलने वाला माल-ओ-दौलत तो अलग बात है, कोई और हुक्मरान होता तो केवल फौज को तबूक तक लाने के खर्चे की उगाही के लिए वहां के इलाकों में लूटमार का बाज़ार गर्म कर देता। पर यह तो अम्न और सलामती का मसीहा था। 20 दिन तबूक में कैंप करके उन्होंने यह दिखा दिया कि यदि हमलावर होगे तो हम युद्ध करेंगे लेकिन हम अपनी सरहदों से बाहर निकल कर तुम पर हमला नहीं करेंगे।
यह है अवतार मौहम्मद का तर्ज़ मदीना पहुंचने के बाद नवें वर्ष में। यह बात है 630 A.D. की। 632 A.D. में अवतार मौहम्मद इस दुनिया से कूच कर गए। यदि इस समय तक अवतार मौहम्मद का आचरण वह दिख रहा है जो हमने पेश किया तो फिर उन्होंने कब आतंकी हमले किए, पुस्तिका के लेखक बतलाएं।
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खुली हुई फतेह
यदि अवतार मौहम्मद या कुरान आतंकी हमलांे को बढ़ावा देता है और यदि अवतार मौहम्मद द्वारा लड़े गए युद्ध इसी मक़सद के लिए थे तो हमको ढूंढना होगा कि कुरान के मुताबिक़ सबसे बड़ी जीत मुसलमानों को किस युद्ध में मिली। कुरान फतह मुबीन यानी सब से बड़ी या खुली हुई फतह की बात कर रहा है। आईये देखते हैंः
अरब के लोगों के बीच काबा वह केंद्रीय स्थान था जिसका तवाफ करने दूर दूर से अरब जमा होते थे। मक्का के लोग तवाफ के लिए काबा आने वालों की बड़ी इज़्ज़त किया करते थे। हज के आसपास के महीने अम्न के महीने समझे जाते थे। यदि युद्ध भी हो रहा हो तो इस दौरान युद्ध तर्क कर दिया जाता था और दुश्मनों को भी काबा आ कर तवाफ करने की अनुमति रहती थी। हज के ख़ास दिनों के अतिरिक्त काबा का तवाफ करने को उमरा कहा जाता है।
अवतार मौहम्मद के साथियों में बहुतेरे ऐसे थे जो मक्का के ही रहने वाले थे और मदीना हिजरत करने के बाद से काबा से दूर हो गए थे। 628 A.D. में करीब 1400 साथियों के साथ अवतार मौहम्मद मदीना से मक्का की ओर काबा का तवाफ करने की ख़ातिर निकले। इन्होंने हथ्यार नहीं लगाए हुए थे। इन्होंने युद्ध के वस्त्र भी नहीं पहने थे बल्कि अहराम पहने हुए थे जो तवाफ के दौरान पहना जाता है। यह दो सफैद बिना सिले वस्त्र होते हैं जिनको लपेट लिया जाता है। बिना सिले धोती समान यह वस्त्र किसी भी प्रकार युद्ध के लिए साज़गार नहीं होते, न ही इनमें छिपा कर कोई हथ्यार रखा जा सकता है। मुसलमानों के साथ कुरबानी के जानवर थे। साफ था कि उनका मक़सद केवल और केवल काबा का तवाफ करना था।
अवतार मौहम्मद और उनके साथी मक्का के करीब पहुंचे तो मक्का की रिवायत के विपरीत कुरैश ने उनको मक्का में दाखिल होने की अनुमति नहीं दी। दोनों ओर से बातचीत का दौर चला जिसके पश्चात दोनों पक्षों के दरमियान एक संधी पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें चार मुख्य प्वाईंटस थे।
1) उस वर्ष अब्दुल्लाह के बेटे मौहम्मद उमरा नहीं करेंगे और ऐसे ही वापिस लौट जाएंगे। अगले वर्ष मुसलमानों को तीन दिन के लिए मक्का में रहने की इजाज़त होगी जिसमें वो उमरा कर पाएंेगे। उनके साथ कोई हथ्यार नहीं होंगे सिवाय मियान में रखी तलवारों के।
2) दोनों पक्षों के दरमियान 10 वर्षों तक अम्न रहेगा, जिसमें हर कोई सुरक्षित रहेगा।
3) जो कोई भी अवतार मौहम्मद से मुआहिदा करना चाहे उनसे कर सकेगा और जो कोई कुरैश से मुआहिदा करना चाहे, वह उनसे करने को आज़ाद होगा। यदि कोई अवतार मौहम्मद से संधी करता है तो वह उनके गुट का समझा जाएगा और जो कोई कुरैश से समझौता करेगा, वह उनके गुट का समझा जाएगा। अवतार मौहम्मद से संधी करने वाले पर यदि हमला होता है तो वह अवतार मौहम्मद पर हमला समझा जाएगा, ऐसा ही कुरैश के साथ होगा।
4) यदि कोई मक्का से भाग कर मुसलमानों के पास पहुंचता है तो उसको कुरैश को वापिस सौंप दिया जाएगा लेकिन यदि कोई मुसलमानों में से भाग कर कुरैश के पास आता है तो उसको वापिस नहीं दिया जाएगा।
यह संधी उस समय लिखी गई जब अवतार मौहम्मद और उनके साथी कुरैश द्वारा किए गए हर हमले में फतहयाब हो चुके थे। बद्र, ओहद, खंदक आदि जैसे अनेक युद्धों में मुसलमानों की फतह हुई थी। लेकिन जब संधी लिखने की बात आई तो पहले तो कुरैश ने उसमें कई तब्दीलियां कराईं। यहां तक कि जब अली ने लिखा कि ये संधी है मौहम्मद रसूलल्लाह और कुरैश के दरमियान तो कुरैश ने कहा कि यदि हम मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मान रहे होते तो फिर हममें मतभेद ही क्यों रहता। हालांकि सब मुसलमान मौहम्मद को अल्लाह की ओर का रसूल मान रहे थे और उन्हें अच्छा नहीं लगा कि संधी के दस्तावेज पर से रसूलल्लाह शब्द को हटाया जाए लेकिन अवतार मौहम्मद ने स्वयं अपने हाथ से मौहम्मद के आगे जहां रसूलल्लाह लिखा था उसको काट दिया।
पुस्तिका के लेखक मुसलमानों की ओर से लिखी गई रिवायतों को तो मानते नहीं जिनमें कहीं भी नहीं लिखा मिलता की मौहम्मद ने आतंकी हमले किए हों या अहिंसा फैलाई हो। कम से कम मौहम्मद के दुश्मनों का यह वक्तव्य ही देख लिया होता कि उन्होंने कहा कि यदि हम मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मान रहे होते तो हममें मतभेद ही क्यों होता। यानी साफ है कि कुरैश का सारा गुस्सा मौहम्मद को एक अल्लाह की ओर से अवतार न मानने को लेकर था। जब यह संधी लिखी गई तो अवतार मौहम्मद के साथियों में बड़ा आक्रोश था क्योंकि वे इस संधी को एकतरफा संधी देख रहे थे। उनके अनुसार कुरैश कमज़ोर थे पर फिर भी उन्होंने संधी में अपने मतलब के प्वाईंटस लिखवा लिए और प्र्रोफैट मौहम्मद ने उनकी हर शर्त को मान लिया। अंतिम प्वाईंट कि यदि कुरैश का कोई व्यक्ति भाग कर मुसलमानों की ओर जाए तो मुसलमान उसको वापिस कर देंगे और मुसलमानों में से कोई भाग कर कुरैश की ओर आए तो वे उसको वापिस नहीं करेंगे, इस पर अवतार मौहम्मद के साथियों में बड़ा रोष था। उनको लग रहा था कि संधी पर दस्तख़त करके मुसलमानों की रूस्वाई हुई है। इसके बावजूद जहां संधी की बात आई, अवतार मौहम्मद ने दो क़दम आगे बढ़ कर उसको माना। और कुरान ने इस संधी को फतह मुबीन यानी सबसे बड़ी, सबसे खुली हुई फतेह बताया।
समझिए, अम्न की संधी मौहम्मद और कुरान के नज़दीक सब से बड़ी फतेह है।
पुस्तिका के लेखक बताएं कि उन्होंने किस बुनियाद पर लिखा कि ‘अरब के रेगिस्तान में जब इस्लाम अपने वजूद में आया और मौहम्मद मदीना शहर में दाखिल हुए तभी आतंक के अभियान की शुरूआत हुई और तब से लेकर आज तक मौहम्मद को रसूल मानने वाले मुसलमान जो कुरान को अल्लाह की किताब कहते हैं आतंकवादी अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।’
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