Friday, 28 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-G: तुम्हारा खुदा ही मेरा खुदा

 तुम्हारा खुदा ही मेरा खुदा

आगे बढ़ें और देखें कि पुस्तिका के लेखक ने और क्या कुछ लिखा है। वह कहते हैंः

‘पूरा विश्व इस बात पर सहमत है कि विश्व का रचेता एक है, और ज़्यादातर दुनिया में रह रहे लोग अपने धर्म के हिसाब से दुनिया के रचयिता को एक शक्ति मानते हुए उसका सम्मान करते हैं, मौहम्मद के ज़माने में यहूदी और क्रिस्चियन हुआ करते थे जिनसे मौहम्मद की अच्छी दोस्ती थी। मौहम्मद उनके धर्म के बारे में उनसे ज्ञान लिया करते थे और फिर मौहम्मद ने जब अपने को अल्लाह का पै़गम्बर घोषित किया तो उसने दुनिया के रचयिता को अल्लाह का नाम दिया।’

आईए, देखते हैं कि मुसलमानों का अल्लाह का कानसैप्ट क्या है? जो मुसलमान समझते हैं कि अल्लाह Noun यानी संज्ञा है, यानी अल्लाह किसी मुसलमानों के खुदा का नाम है, उनकी समझ ग़लत है। जो मुसलमान कहते हैं कि अल्लाह के 99 नाम हैं, वो भी ग़लत कहते हैं। क्योंकि अल्लाह और दूसरे जितने नामों से अल्लाह को पुकारा जाता है, वो दरअस्ल उसकी सिफात यानी विशेषण यानी Adjective हैं। वह सब कुछ सुनता है इसलिए उसे अरबी भाषा में समीअ कहते हैं, जिसका अर्थ होता है सुनने वाला। वह हमेशा से है इसलिए उसके हई कहते हैं, वह वक्ता है या वार्ताकार है इसलिए उसको कलीम कहते हैं, कोई उसका नाम कलीम नहीं है। यह ऐसे ही है कि वह सब कुछ जानता है इसलिए उसको हिन्दी में सर्वज्ञ कहते हैं, पर सर्वज्ञ उसका नाम तो नहीं है। ऐसे ही उसके साकार स्वरूप का नाम परमात्मा भी नहीं है।

नाम तो तब रखा जाता है जब कोई व्यक्ति वुजूद में आ जाता है। फिर नाम तो वह रखता है जो पहले से मौजूद है। जो हमेशा से है उसका नाम कौन रखेगा? इसलिए जो सिफात यानी Adjectives यानी विशेषण यानी उस हस्ती में पाई जाने वाली विशेषताएं हमने देखीं, उनको हमने उसका नाम समझ लिया। दूसरी भाषाएं बोलने वालों में उन सिफतों यानी विशेषताओं के लिए जो शब्द प्रयोग होते हैं, उन शब्दों से उसे बुलाया गया। जैसे सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाला। पर यह भी उसका नाम नहीं है।

जिसके कारण सारा कलाम हो, सारी शब्दावली हो, जो वार्ताकारों में सब से बेहतरीन हो, उसको एक जगह कलीम कहा गया तो दूसरी ओर उपनिष्दों में बताया गया कि यदि तुम बोलने में महारथी बनने के इच्छुक हो तो ‘क्लिम’ मंत्र का उच्चारण किया करो। लेकिन कलीम या क्लिम उस सर्वशक्तिमान के नाम नहीं हैं।

हर कोई मानता है कि सारी सृष्टि का रचयिता एक है। वह एक ही है जिसने इस ब्रहमाण्ड की रचना की। तमाम इंसानियत, भले ही आज वह हिन्दु, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि में बंटी है, उसका पैदा करने वाला एक ही है। एक ही सिस्टम है जो हम सब के अन्दर काम कर रहा है। एक ही समान हम खाना खाते हैं, एक ही तरीक़े से सांस लेते हैं, एक ही समान बच्चे पैदा करते हैं और एक ही रंग का खून रखते हैं। यदि हिन्दुओं का बनाने वाला कोई और होता, मुसलमानों का कोई और, तो कम से कम खून का रंग तो अलग कर देता। हिन्दुओं के खून का रंग केसरिया और मुसलमानों का हरा। तब तो हम मान लेते कि दोनो का लड़ना जाएज़ है। लेकिन वह निराकार ताक़त, जिसको सनातन किताबों ने ब्रहम या ब्रहमण या जैसा मैं साबित कर रहा हूँ महेश कहा, या गीता ने एबसोलूट कहा, उस खुदा को मुसलमान "The God" यानी अल्लाह कहते हैं तो क्या ग़लत कहते हैं। ठीक वैसे जैसे रूह को कोई आत्मा और कोई spirit कहे तो केवल भाषाओं का ही अन्तर तो हुआ न?

‘अल्लाह’ शब्द कोई proper noun या संज्ञा नहीं है। यह किसी खुदा का नाम नहीं है। मुसलमानों ने भी पहली ग़लती जो की वह यह कि इस डेफिनिशन के खुदा को अपना खुदा मानने की जगह अल्लाह शब्द को संज्ञा समझ लिया और हर किसी की पुस्तक में यदि एक निराकार खुदा का कानसैप्ट था भी तो अपने अल्लाह को दूसरों से अलग कर दिया । यहीं से मुसलमानों के बहकाओ की शुरूआत होती है। 

‘अल’ का अर्थ हुआ इंगलिश का "The", ग्रामर जानने वाले जानते हैं कि जब अंग्रेज़ी में किसी शब्द के आगे "The" लग जाए तो उसका मतलब कि किसी ख़ास चीज़ की बात हो रही है, जिसको हम पहचानते और जानते हैं। यानी ‘अल’ नहीं लगा है तो वह कोई आम चीज़ हो सकती है, जब ‘अल’ लग जाए तो वह उसकी ओर इशारा होता है जिसका ज्ञान या जानकारी हमको पहले से है।

यानी ‘अल’ का अर्थ हुआ वह ख़ास हस्ती और ‘इलाह’ का अर्थ हुआ ‘खुदा’। यानी 'The God'. यदि उपनिषद ने उस Absolute God को ब्रहमण या महेश कहा, तो बस वही तो हमारा अल्लाह यानी 'The God' है। उसको जिसने भी जिस नाम से पहचाना वही मुसलमानों का ‘अल्लाह’ यानी 'The God' है। कुरान कहता हैः Your Ilah (God) is One Ilah (The God –i.e. Allah).

अवतार मौहम्मद ने जब अरबों से कहा कि कहो ‘ला इलाहा इल्लललाह’, ‘कोई खुदा नहीं सिवाय उस एक खुदा के’, तो उसका अर्थ यह था कि मानो उस एक खुदा को जो सर्वव्यापी है, जो सर्वज्ञ है, जो निराकार है, जो सर्वशक्तिमान है; जो कोई भी ऐसे ख़ालिक़ में विश्वास रखता है, वही मुसलमानों का अल्लाह यानी 'The God' है। 

या दूसरे शब्दों में कहूँ तो जो कोई भी एक निराकार यानी जिस्म-ओ-जिस्मानियात से आज़ाद, सर्वज्ञ यानी सब कुछ जानने वाला, सर्व शक्तिमान यानी सब से ताक़तवर, सर्वव्यापी यानी हर जगह मौजूद, एबसोलूट यानी क़ादिरे मुतलक़ खुदा को क्रिएटर मानता है, तो उस खुदा को ही मुसलमान अल्लाह कहते हैं। अल्लाह का न कोई gender है, यानी न तो स्त्रिलिंग है न पुल्लिंग, और न plural है, जैसे god का gods हो सकता है। बल्कि वह The God यानी अल्लाह है। केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि अरबी बोलने वाले उस समय के यहूदी और ईसाई भी उस एक खुदा को अल्लाह या इलाह ही कहते थे। जब भी आप God लिखते हैं capital 'G' के साथ, बस वही अल्लाह है। 

आसमान से अवतरित होने वाली हर किताब में इस एक खुदा और उस तक पहुंचने के मार्ग को प्रदर्शित किया गया। विभिन्न भाषाओं में अवतरित होने वाली किताबों में विभिन्न नामों से उस एक हस्ती को याद किया गया। यदि कोई इन्हें विभिन्न हस्तियों के रूप में समझे तो यह उसकी बड़ी भूल है; यदि मुसलमानों में से कुछ ने समझा कि उनके खुदा का नाम अल्लाह है तो यह उनकी ग़ल्ती थी।

मैंने साबित किया है कि सनातन धर्मियों में भी एक सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, एबसोलूट खुदा का कानसैप्ट उसी तरह मौजूद है जैसे कि मुसलमानों को बताया गया। लेकिन हिन्दु उस सनातन मार्ग से इस मायनी में भटक गए कि वे विभिन्न नामों में उलझ गए। जैसे ब्रहम, ब्रहमण, विष्णु, ब्रहमा, शिव, शक्ति, महेश, परमात्मा, मनु, रूद्र, मारूत आदि शक्तियों का आपस में रिश्ता नहीं समझ पाए जो मैंने अपनी पुस्तकों में साफ तौर पर समझाया है और दिखाया है कि अल्लाह के लिए यदि कोई शब्दावली सनातन पुस्तकों में आई है तो वह ब्रहम या ब्रहमण और महेश है। 

जब मुसलमान कहते हैं ‘ला इलाहाइल्लललाह’ तो वे किसी मुसलमानों के खुदा को याद नहीं कर रहे होते, जिधर वे दूसरों को लाने के इच्छुक हों। ‘ला इलाहाइल्लललाह’ का अर्थ है ‘कोई खुदा नहीं सिवाय उस खास खुदा के’। रोचक बात यह है कि कृष्ण के दौर में जब अपने को वेद के पथ पर समझने वालों ने वेद में वर्णित देवताओं को खुदा समझ कर उनकी पूजा करना प्रारंभ कर दी तो उस समय कृष्ण के मुख से परमात्मा ने बताया कि देवताओं की उत्पत्ती तो परमात्मा के बाद है और सारी पूजा अर्चना और इबादत केवल और केवल Absolute God की होनी चाहिए जो कि ब्रहम या ब्रहमण या महेश या अल्लाह है।

इसका अर्थ क्या हुआ? कृष्ण और मौहम्मद एक ही मक़सद के लिए खड़े हुए थे। दोनों का मक़सद था अपने आसपास के लोगों को उस एबसोलूट खुदा के मार्ग पर लाना जिसको छोड़ कर वे दूसरे खुदाओं की परस्तिश करने लगे थे। दोनों के शरीर में नूरानी रूह का कोई न कोई अंश काम कर रहा था; इन नूरानी रूहों का काम हर ज़माने में इंसान को खुदा के सत्य मार्ग की ओर लाना है। दूसरी ओर दोनों के दुश्मन भी एक ही थे। जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक ताकतों ने अपने वश में आए लोगों को इनके खि़लाफ खड़ा कर दिया। उसका मक़सद केवल यह था कि मैसेज की ताक़त को कमज़ोर किया जा सके या शिक्षा के प्रारंभ में ही उसका गला घोंट दिया जाए। 

पुस्तिका के लेखक भी इस बात को मान रहे हैं कि पूरी दुनिया इस बात को मानती है कि विश्व का रचियता एक है। लेकिन अवतार मौहम्मद द्वारा की गई घोषणा कि ‘कोई खुदा नहीं सिवाय उस एक खुदा के’, इसको ही नहीं समझ पाए। अपनी संकीर्ण मानसिकता से उन्होंने समझा कि मौहम्मद ने अपने खुदा को अल्लाह नाम दे दिया। और क्योंकि कुरान पहले आए अवतारों का भी उल्लेख कर रहा था तो उन्होंने समझा कि अवतार मौहम्मद ने यहूदी और ईसाई किताबों की कहानियां अपने धर्म में ले लीं। यह कहना ऐसा ही है कि यदि कृष्ण ने परमात्मा की बात की थी और राम ने भी परमात्मा की बात की थी तो कोई कहे कि कृष्ण ने राम की शिक्षा को चुरा लिया। या दोनों ने वेद से ज्ञान लेकर अपने नाम से उसको फैलाया। यह वही कह सकता है जो इन दोनों को एक ही सोर्स से अवतार नहीं मानता। 


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