Friday, 28 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-F: प्रशंसा लाएक़ हस्ती

प्रशंसा लाएक़ हस्ती

आईए, आगे बढ़े और देखें कि पुस्तिका के लेखक क्या कुछ लिख रहे हैं। वह लिखते हैंः ‘मौहम्मद उन लोगों से प्यार करते थे जो की उनकी तारीफ करते थे और जो लोग मौहम्मद की बात से सहमत नहीं होते थे उनके संबंध में अल्लाह के नाम से संदेश देते थे कि उन्हें क़त्ल कर दिया जाए या उन्हें जबरन मौहम्मद को पैग़म्बर मानने पर मजबूर किया जाए।’

यदि आप अवतार मौहम्मद की जीवनी पढे़ंगे तो आपको मालूम हो जाएगा कि ऐसा कहना सत्य पर आधारित है कि नहीं! अवतार मौहम्मद ऐसे दयालु थे कि कुरान में अल्लाह ने उनको रहमतुलआलमीन कहा। यानी तमाम ब्रहमाण्ड के लिए रहमत या दया करने वाला। पर क्या किया जाए कि इस पुस्तिका का लेखक तो कुरान को अल्लाह की किताब मान ही नहीं रहा और कह रहा है कि जो लोग मौहम्मद की बात से सहमत नहीं होते थे उनके संबंध में अवतार मौहम्मद अल्लाह के नाम से संदेश देते थे कि उन्हें कत्ल कर दिया जाए या उन्हें जबरन मौहम्मद को पैग़म्बर मानने पर मजबूर किया जाए। 

जबकि हकीकत बिलकुल इससे उलट है! अवतार मौहम्म्द पर तरह तरह के जुल्म हो रहे थे कि वे अपनी शिक्षा देने से बाज़ आ जाएं। मक्का में जब विभिन्न क़बीले काबा के तवाफ की ख़ातिर आते थे तो कुरैश के सरदार उनसे कहा करते थे कि शहर में एक जादूगर आया है कि जो उसकी बातें सुन लेता है बस उसके पीछे हो लेता है। वह मक्का में आने वाले कबीलों को रूई दिया करते थे कि वे अपने कानों में रख लें ताकि उस जादूगर की बातें उनके कानों तक न पहुंचें। क्या कोई जबरदस्ती अपने दीन को फैला रहा हो तो उससे बचने का यह तरीक़ा था? बल्कि यह तो अवतार मौहम्मद की एक खुदा की और उसकी रहमत की शिक्षा थी कि आज़ाद और गुलाम, हर प्रकार के इंसान उनके बताए पथ को अपनाते चले गए। 

हम ने आप को बताया है कि जब कुरैश अवतार मौहम्मद के चाचा अबू तालिब के पास आए और कहा कि इनसे कहिए कि अपने दीन की शिक्षा देने से बाज़ आएं और बदले में दौलत के अंबार, तमाम अरब की सरदारी या सबसे खूबसूरत औरतों में से जो कुछ चाहें वे देने को तैयार थे। जब अबू तालिब ने अवतार मौहम्मद को ये पैग़ाम पहुंचाया तो उन्होंने कहा कि चचा, इन से कह दीजिए कि यदि ये एक हाथ पर चांद और दूसरे पर सूरज भी ला कर रख दें तो भी मैं खुदाए बरहक़़ के रास्ते की शिक्षा के प्रसार से पीछे नहीं हटूंगा। कुरैश के इस आफर को याद रखिएगा। इस समय अवतार मौहम्मद की उम्र 40 से कुछ ऊपर ही थी। आगे आप देखेंगे कि उपरोक्त पुस्तिका में अवतार मौहम्मद की शादियों पर भी टिप्पणी की गई है। जिस व्यक्ति ने 40 की उम्र में अरब की सब से खूबसूरत औरतों को पाने के आफर को ठुकरा दिया, वह 53 से 63 की उम्र में कभी किसी विधवा से शादी करता दिखाई देता है तो कभी किसी बूढ़ी औरत से। इस पर भी उसे अनेक आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। समय आएगा तो हम इस पर भी बात करेंगे! 

फिर से कुरैश द्वारा दिए गए आॅफर को ध्यान से पढ़िए। यदि अवतार मौहम्मद जबरन लोगों को इस्लाम में आने को कह रहे होते और ऐसा न मानने वालों को क़त्ल कर देने का हुक्म दे रहे होते तो क्या कुरैश इस प्रकार का आफर देते?

न केवल अवतार मौहम्मद पर तरह तरह के जुल्म हो रहे थे बल्कि उनके साथियों को भी हर प्रकार से सताया जा रहा था। यदि अवतार मौहम्मद को ज़बरदस्ती अपने दीन को फैलाना होता तो अपने साथियों को अपने साथ रखते ताकि उनकी ताक़त में बढ़ौतरी हो। अपने साथियों को हिजरत करके दूर दराज़ के इलाक़ों में जाने को न कहते ताकि वे कुरैश के जुल्म से बच जाएं। शेबे अबूतालिब में अवतार मौहम्मद ने कुरैश को जाने पर मजबूर नहीं किया था कि मुझे पैगम्बर मानो नहीं तो तुम्हारा बहिष्कार किया जाएगा बल्कि कुरैश ने तमाम बनु हाशिम को, जिस क़बीले से अवतार मौहम्मद का संबंध था, मजबूर किया कि वे एक बंजर वादी में तीन वर्ष तक रहें और कुरैश के अन्य क़बीलों ने उनसे कोई भी लेन देन तर्क कर दिया। कौन ज़ालिम था और कौन मज़लूम, हर हक़परस्त स्वयं अंदाज़ा लगा सकता है!

हां, यह ज़रूर है कि ख़ंदक और खै़बर जैसे युद्ध में जब बड़े नामवर जंगजू लड़ने को आते थे तो अली उनके सामने केवल तीन ही प्रस्ताव रखते थे। पहले यह कि युद्ध का इरादा छोड़ दो और वापिस लौट जाओ, दूसरे यह कि इस्लाम में दाखि़ल हो जाओ, और तीसरे यह कि यदि तुम न वापिस जाने को तैयार हो और न इस्लाम में दाखि़ल होने को, तो पहला वार तुम करो क्योंकि हमारी ओर से युद्ध की शुरूआत नहीं जा सकती। यह इस्लामी उसूल था जिसको अली हर हमलावर के सामने रखते थे। किसी को आपत्ती हो सकती है कि जान बचाने के लिए उसको इस्लाम में दाखि़ल होने का आफर देते थे। लेकिन याद रखने की बात यह है कि पहला आफर तो यह था कि जहां से आए हो वहीं वापिस चले जाओ, यानी हम पर हमला नहीं करो तो हम को भी तुम से कोई सरोकार नहीं। दूसरा मार्ग तो केवल इसलिए बताते थे कि ज़माना जान ले कि यह धर्म युद्ध था, ठीक वैसे जैसे महाभारत एक धर्म युद्ध था। तीसरा मार्ग जो अली बताते थे वह भी साफ तौर पर इस्लाम की शिक्षा को दर्शाता है। तुम पहले हमला करो, क्योंकि इस्लाम हमें पहले हमलावर होने की अनुमति नहीं देता। 

इस प्रस्ताव से भी साफ है कि जब हमला होता था तब अवतार मौहम्मद युद्ध की अनुमति देते थे और उसमें भी युद्ध की शुरूआत कभी उनकी ओर से नहीं हुई। जंगे तबूक का विवरण हम आप को दे चुके हैं कि मुसलमान एक बड़ी संख्या में अपनी सरहद तक गए लेकिन जब दुश्मन की फौज नज़र नहीं आई तो कुछ दिन रूक कर वापिस पलट आए। इस समय तो मुसलमानों का वर्चस्व सारे अरब में था। इस समय भी कोई झूठी से झूठी रिवायत नहीं मिलती कि अवतार मौहम्मद ने वहां गांवों पर हमला करके सरहदी इलाकों के रहने वालों को ज़ोर जबरदस्ती करके इस्लाम में दाखि़ल करने की ज़रा भी कोशिश की हो। 

लेकिन याद रहे, हम कहीं पर भी अवतार मौहम्म्द के इस दुनिया से गुज़र जाने के बाद अपने को मुसलमान कहने वालों के तौर-तरीकों की हिमायत नहीं कर रहे। क्योंकि इतिहास से एकदम साफ है कि इन बिफरे हुए मुसलमानों ने जिहाद की टर्म को ग़लत रूप से समझते और समझाते हुए सरहदों के पार हमले भी किए, वहां से धन-दौलत, गुलाम और दासियां भी प्राप्त कीं और ज़बरदस्ती लोगों को इस्लाम में दाखि़ल होने को भी कहा। इतिहास पढ़िए तो आप यह भी जानेंगे कि उन्होंने ग़ैर-मुस्लिमों को कम और स्वयं आपस में ही ज़्यादा खूंरेज़ी की।

वापिस चले जाओ, इस्लाम में दाखि़ल हो जाओ या पहला हमला करो, इसमें इस्लाम में दाखिल हो जाने का आॅफर भी न्यायसंगत था। ऐसा इसलिए क्योंकि जो लोग हमलावर हो रहे थे, उनकी नफरत ही उस रास्ते से थी जिसकी शिक्षा अवतार मौहम्मद दे रहे थे। सुलह हुदैबिया के मौक़े पर जब अली संधी लिखने बैठे और उन्होंने लिखा कि यह संधी है मौहम्मद रसूलल्लाह और कुरैश के बीच तो कुरैश ने यही तो आपत्ति की थी कि यदि हम मौहम्मद को अल्लाह का रसूल मान रहे होते तो हमारे बीच मतभेद ही क्यों होते। साफ है कि जो तमाम जुल्म हो रहे थे और समय समय पर फौजी दस्ते हमलावर हो रहे थे उनकी नफरत का यदि कोई कारण था तो यह कि वे अपने खुदाओं के आगे एक खुदा को मानने को तैयार नहीं थे और एकेश्वरवाद की शिक्षा को मिटा देना चाहते थे।

इतिहास ने ऐसा होते बार बार देखा है। जब जब परमात्मा की ओर से कोई अवतार आता है दुनियापरस्त लोग और वे लोग जिन्होंने सीधे रास्ते को अपने मन माने ढंग से तोड़ मरोड़ दिया वे उसकी शिक्षा को मानने को आसानी से तैयार नहीं होते। ऐसा तब भी हुआ जब यहूदियों के बीच ईसा आए और उन्होंने कहा कि मैं उसी सोर्स से आया हूँ जिससे मूसा आए थे लेकिन यहूदियों ने उनको खुदा की ओर का अवतार मानने से इंकार कर दिया और तमाम कोशिशों में लग गए कि ईसा को सूली पर चढ़ा दिया जाए। 

ऐसा तब भी हुआ जब कृष्ण ने अपने को परमात्मा का अवतार घोषित किया। जिन लोगों ने वेद की मनमाने ढंग से परिभाषाएं कर लीं थीं और देवताओं को खुदा मान लिया था उन्होंने कृष्ण की शिक्षा को उस सब से विपरीत पाया जो वे कर रहे थे हालांकि वे भी अपने को वेदों का मानने वाला कहा करते थे। 

गीता के अनुसार उन लोगों को देवताओं की पूजा से आगे बढ़ने को कहा गया, आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाने की बात की गई, जो देवताओं की भी उत्पत्ती का ज़िम्मेदार है, और उससे भी आगे एबसोलूट गाॅड यानी ब्रहमण यानी अल्लाह की पूजा और वंदना करने की बात की गई। यह सब न समझ पाने के कारण उस समय के बड़े इज़्ज़तदार हिन्दुओं ने कृष्ण के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

गीता का संदेश साफ हैः

Gita.IV.8:

For him who does not know that indestructible being of the Rig Veda, where on in the highest heaven all the devas reside, of what avail is the Rig Veda to him? They, indeed, who know that rest fulfilled.

Gita.IV.9:

The Vedas, the sacrifices, the rituals, the observances, the past, the future and what the Vedas declare, all this the maker sends forth out of this, in this the other is confined by maya.

अपने को वेदों की शिक्षा पर चलने वाला समझने वाले लोग समय के अवतार कृष्ण के मुक़ाबले पर आ गए और हर कोशिश कर डाली कि कृष्ण और उनके साथियों की हत्या करके उनकी शिक्षा का गला घोंट दिया जाए। ऐसा ही जुलमत यानी तमस यानी डैमोनिक ताक़तें हर ज़माने में हर अवतार के साथ करती आई हैं। 

यहां पर एक और भ्रांति जो हिन्दुओं में पाई जाती है उस पर बात करते चलें! 

जब 7 दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों में से किसी एक ने कृष्ण के शरीर को आफिस के रूप में प्रयोग किया तो कृष्ण भी अवतार हो गए। गीता और कुरान दोनों में एक ही तर्ज़ से बात हो रही है।  अर्जुन को बड़ा समय लगा समझने में कि सामने जो कृष्ण खड़े हैं, उनके शरीर से स्वयं कृष्ण नहीं बल्कि परमात्मा बोल रहा है। आप गीता में अर्जुन के हाव-भाव बदलते देख सकते हैं, कैसे बदलाव आता है जब उनको अहसास होता है कि यह कृष्ण नहीं बोल रहे जिनको वह बचपन से जानते थे, जिनका वह कभी उपहास भी उड़ाया करते थे, बल्कि उनके शरीर से परमात्मा बोल रहा है। 

आज अनेक हिन्दु समझते हैं कि परमात्मा ही कृष्ण बन कर आ गए। अर्जुन तो कृष्ण को बहुत पहले से जान रहे थे, उनसे मिलते भी रहते थे, जैसा उनकी बातों से ज़ाहिर है, फिर आज हिन्दु जो कृष्ण का परमात्मा से रिश्ता मानते हैं, यह पांडवों को, यहां तक कि अर्जुन को भी, उस समय तक क्यों नहीं पता था। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके सामने उस समय तक कृष्ण एक राजा, एक सत्य मार्ग पर चलने वाले ऋषि, या रूहानी गुरू के रूप में तो आए थे लेकिन वह अवतार हैं, ऐसा अर्जुन भी नहीं जानते थे। 

आज बहुत से हिन्दु समझते हैं कि परमात्मा ही कृष्ण हो कर आ गए। याद रखने की बात यह है कि परमात्मा स्वयं कह रहा है कि जब जब धर्म की हानी होती है, तब तब मैं अवतरित होता हूँ। 

Gita.IV.7:

Whenever there comes to be laxity in regard to right life (dharma) O Bharata (Arjuna), and wrong coming to assert itself, then I bring about the creation of myself.

Gita.IV.8:

To protect those who are good and to destroy evil doers, for establishing righteousness, I assume being, age by age.

हर स्थान पर तो अवतार का नाम कृष्ण नहीं था। वह बच्चा जिसका नाम कृष्ण रखा गया और जिसके पिता वासुदेव और माता देवकी थीं, और स्थानों पर जब जब अवतार आए होंगे तो उनके माता पिता का नाम और स्वयं अवतार का नाम भिन्न ही तो होगा। किसी भी अन्य स्थान पर अवतार का नाम कृष्ण नहीं था, जबकि गीता इस बात की पुष्टि कर रही है कि अवतार का आना बार बार होता रहा है और कृष्ण के बाद भी होता रहेगा। ऐसे में यदि हम कृष्ण को परमात्मा मान लेते हैं तो हम कहीं और आ रहे अवतारों को नहीं पहचान पाएंगे, जो कि गीता की ही शिक्षा के विपरीत बात है। यही गलती ईसाईयों ने की जिन्होंने मरयम के पुत्र ईसा यानी जिज़स को खुदा का बेटा मान लिया। ऐसा करके उन्होंने कोई और शरीर जिसमें वही दिव्यात्मा यानी नूरानी रूह काम कर सकती है, इसके दरवाज़े बन्द कर दिए। 

यह राज़ हिन्दु भी नहीं समझ पाए कि दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों में से यदि कोई किसी शरीर को अपने आफिस के रूप में प्रयोग करती हैं तो वे अवतार कहलाते हैं। कुरान भी कह रहा है कि मौहम्मद को न तो किताब का ज्ञान था और न ईमान, जब तक रूह यानी दिव्यात्मा को उनकी ओर नहीं भेज दिया गया। 

उधर जुलमत यानी तमस यानी डैमोनिक ताक़तों ने कौरवों को, यहां तक कि बड़े बड़े गुरूओं को एकजुट करके कृष्ण के खि़लाफ ला खड़ा किया तो इधर उन्हीं ताक़तों ने कुरैश और कुछ यहूदी क़बीलों को अवतार मौहम्मद के सामने ला खड़ा किया। दोनों का मक़सद एक था - सत्य मार्ग की शिक्षा के प्रसार पर अंकुश लगाएं, हो सके तो शिक्षा का ही गला घोंट दें। 

पुस्तिका के लेखक का कहना है कि मौहम्मद अल्लाह के नाम से संदेश देते थे जबकि हम पाते हैं कि कुरान की आयतें हालांकि मौहम्मद के मुख से ही निकल कर हम तक पहुंची लेकिन मौहम्मद को सैकंड पर्सन यानी तुम कह कर बात कर रही है। 

कृष्ण यह नहीं कह रहे कि भारत वर्ष में अवतार आते हैं बल्कि जहां जहां भी अधर्म बढ़ जाए, लोग सत्य मार्ग की समझ से दूर आ जाएं, वहां अवतार आने की बात कर रहे हैं। यह पृथ्वी और इस पर बसने वाले इंसान खुदा की इस सृष्टि में बहुत छोटा सा मक़ाम रखते हैं। यह तो हमारी छोटी सी मानसिकता है कि हम समझें कि अवतार केवल भारतवर्ष में आएंगे। विश्व के कोने कोने में जहां भी इंसानियत बसती है, वहां अवतार आए ताकि सीधे रास्ते को प्रशस्त कर सकें, मानवता के लिए खुदा का जो क्रिएशन प्लान है, उसको बता सकें। परन्तु इन दिव्यात्माओं के विपरीत एक और ताक़त काम कर रही है, वह भी खुदा द्वारा इंसानों के लिए बनाए गए क्रिएशन प्लान का हिस्सा है, जिसका काम ही हम को सत्य मार्ग से गुमराह करने या पथभ्रष्ट करने का है। देवताओं और असुरों का युद्ध यही है, जो हर ज़माने में होता रहा है। एक का काम इंसानियत को हिदायत की ओर लाना है और दूसरे का गुमराह करना। 

जैसा मैंने कहा कि गीता भी जब जब अधर्म बढ़ने की बात कर रही है और समय समय पर अवतार आने की बात कर रही है तो कहीं भी भारतवर्ष का उल्लेख नहीं कर रही कि कोई समझ बैठे कि अवतार केवल भारत में ही आएंगे। कुरान भी कह रहा है कि हर ज़बान बोलने वालों के बीच रसूल यानी अवतार भेजे गए। 

Quran.Surah Ibrahim.14.4:

Never did We send a Messenger except (to teach) in the language of his (own) people in order to make (things) clear to them.

जब कभी कोई रसूल यानी अवतार भेजा गया वह उन लोगों की भाषा बोलता हुआ भेजा गया। यानी यहां भी साफ हो रहा है कि मुसलमान यह समझ लें कि केवल अरबी भाषा में सत्यमार्ग बताया गया हो यह ग़लत है, क्योंकि सत्य मार्ग हर हर स्थान पर, हर क्षेत्र में बताने के लिए अवतार आते रहे। मुसलमान बताएं कि जब कोई रसूल या अवतार एक ही सोर्स से भारत और अरब दोनों जगह आया होगा तो क्या उसने यहां कुछ बताया होगा और अरब में विपरीत बातें बताई होंगी? हिन्दु बताएं कि अवतार यदि भारत में आया होगा तो क्या उसने कुछ बताया होगा और यदि ईजिप्ट या ग्रीस या अरब में आया होगा तो कुछ और बताया होगा? 

एक ही हक़ीक़तें बताई जा रही थीं। यदि दो स्थानों पर एक ही सोर्स से अवतार आए तो हम को मानना पड़ेगा कि उन्होंने एक ही सत्य मार्ग बताया, जो सनातन था, यानी हर ज़माने के लिए था, जिसको कुरान ने अद्दीन-अल-क़य्यम कहा, यानी ऐसा दीन जो हमेशा से एक ही है। आज यदि विपरीत या विरोधाभासी फलसफे या समझ हम को देखने को मिलती है तो केवल 3 कारण हो सकते हैं। या तो दोनों या दोनों में से एक खुदा की ओर से नहीं हैं या हमने उनके द्वारा दी गई शिक्षा का ग़लत अनुवाद या इंटरप्रेशन किया या हमने उनकी शिक्षा को ही बदल कर रख डाला।

एक ही शिक्षा वेद, गीता और कुरान के माध्यम से दी जा रही थी। हमने उसे समझा अपने अपने तरीक़े से, कई जगह तथ्यों को ग़लत ढंग से समझा, और धर्म की दीवारें खड़ी होती गईं। एक ही अवतार के मानने वालों ने जब उस एक अवतार की ही शिक्षा को भिन्न प्रकार से इंटरप्रेट किया तो सैक्टस बन गए। जैसे मुसलमानों में देखिए, सुन्नी, शिया, वहाबी, सलफी, बरेलवी, इस्माईली, आदि कितने ही सैक्टस हैं। यह सब बने एक ही मौहम्मद को अल्लाह का रसूल यानी अवतार मानते हुए, लेकिन उन्होंने अवतार मौहम्मद की शिक्षा को भिन्न भिन्न प्रकार से इंटरप्रेट किया। 

सनातन धर्म में भी यही हुआ। वैष्णव, शैव, देवी को मानने वाले, क्या वेद सबको प्रिय नहीं थे? लेकिन सब भिन्न प्रकार से वेदों को इंटरप्रेट कर रहे थे। कृष्ण से जो लड़ने आए वे भी इस धर्मयुद्ध में अपने को सही मार्ग पर समझ रहे थे। दोनों फौजें धर्म के भिन्न इंटरप्रेटेशन और समझ के नाम पर लड़ रही थीं। 

उधर ब्रहम सूत्र कह रहा है, एकम ब्रहम द्वित्ये नास्ते, नेह, ना, नास्ते किंचन

The Brahm is One, there is none other, nay, none, not the least. 

इधर उसी ब्रहम की बात करते हुए नहजुल बलाग़ा के सर्मन नम्बर 185 में अली कहते हैं, जिसका हिन्दी रूपांतर हम आगे देंगेः

Sermon 185

Praise be to Allah. He is such that senses cannot perceive Him, place cannot contain Him, eyes cannot see Him and veils cannot cover Him. He proves His eternity by the coming into existence of His creation, and (also) by originating His creation (He proves) His existence, and by their (mutual) similarity He proves that there is nothing similar to Him. He is true in His promise. He is too high to be unjust to His creatures. He stands by equity among His creation and practices justice over them in His commands. He provides evidence through the creation of things of His being from ever, through their marks of incapability of His power, and through their powerlessness against death of His eternity.

He is One, but not by counting. He is everlasting without any limit. He is existent without any support. Minds admit of Him without (any activity of the) senses. Things which can be seen stand witness to Him without confronting Him. Imagination cannot encompass Him. He manifests Himself to the imagination with his help for the imagination, and refuses to be imagined by the imagination. He has made imagination the arbiter (in this matter). He is not great in the sense that volume is vast and so His body is also great. Nor is He mighty in the sense that His limits should extend to the utmost and so His frame be extensive. But He is great in position and mighty in authority.

आप समझ सकते हैं कि निराकार एबसोलूट यानी अल्लाह तक अपनी समझ को पहुंचाना आसान नहीं। दिव्यात्माएं या नूरानी रूहें कड़ी के रूप में काम करती हैं। हमें इनको पहचानने की कोशिश करनी है क्योंकि इनको पहचानकर ही हम निराकार एबसोलूट यानी अल्लाह की कुछ कुछ समझ बना पाएंगे। हम को आत्मा को पाकीज़गी के मार्ग पर लगाना होगा और दिमाग़ी फैकल्टीज़ को जगाना होगा कि हम को वह अक़ल प्राप्त हो कि हम निराकार एबसोलूट ब्रहम यानी अल्लाह की समझ बना सकें। 

उधर कृष्ण ने एबसोलूट खुदा की बात की तो दुनियापरस्त तमसिक यानी जुलमत की ताक़तें उनके खिलाफ आ गईं और इधर मौहम्मद ने वही सनातन संदेश फिर से दोहराया तो दुनियापरस्त तमसिक यानी जुलमत की ताक़तों ने हर मुमकिन कोशिश कर डाली उनके पैग़ाम को फैलने से रोकने के लिए और आज तक यही करने में व्यस्त हैं। 


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