Sunday, 30 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-L: सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए

आईए आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि पुस्तिका का लेखक आगे क्या लिख रहा है? वह लिखता हैः

‘मौहम्मद की आलोचना 7वीं शताब्दी से ही शुरू हो गयी थी। उदाहरण के लिए उनके गैर-मुस्लिम अरब समकालीनों ने उनकी बड़ी आलोचना की थी जब उन्होंने एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार किया था। इसी प्रकार अरब के यहूदी जनजातियों ने उनकी यह कहकर आलोचना की कि मौहम्मद ने बाईबल के आख्यानों और व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से अपना लिया, यहूदी विश्वास के विष को पी गए थे, और बिना किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हुए खुद को ‘‘अंतिम पैगंबर’’ घोषित कर दिया था। यह भी आलोचना की गयी थी कि हिब्रू बाईबल में भगवान द्वारा चुने गए सच्चे पैगंबर और झूठे दावेदार के बीच अन्तर बताया गया है। उस पर भी मौहम्मद खरे नहीं उतरते। इन्हीं सब कारणों से वे लोग मौहमम्द को ‘‘हा-मेशुगा’’ कहकर बुलाने लगे जिसका हिब्रू में अर्थ होता है ‘‘पागल’’।

मध्य युग में विभिन्न पश्चिमी और बाईज़ैन्टीन ईसाई विचारक मौहम्मद को विकृत, दुराचारी, झूठा पैग़म्बर, और यहां तक कि ईसा विरोधी मानते थे। ईसाई जगत में उन्हें अकसर एक विधर्मी (heretic) या दानव के जाल में फंसा हुआ माना जाता था। उनमें से थाॅमस एक्विनास आदि कुछ विचारकों ने मौहम्मद की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने अगले जन्म में इन्द्रिय आनन्द मिलने का वादा किया।’

बेचारा लेखक अपनी कमअक़ली में ही मारा जाता है! यहां वह यह मानने पर मजबूर है कि मौहम्मद के खि़लाफ ‘बड़ी आलोचना’ का कारण उनके द्वारा ‘एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार’ था। जुलमत यानी तमस का एजेंडा साफ हो गया कि नहीं? हर ज़माने में एकेश्वरवाद का प्रचार करने वालों को जुल्म और आक्रोश का सामना करना पड़ा है। 

नमरूद ने यदि इब्राहीम को दहकती आग में डालने का प्लान बनाया तो उसके पीछे यही कारण था। राम ने अधर्मी रावण का नाश किया और उसकी लंका को जला कर राख कर दिया इसकी खुशी हिन्दु आज भी दीवाली के नाम पर हर वर्ष मनाते हैं। दाऊद और सुलेमान ने एक खुदा के मार्ग के प्रचार और प्रसार के लिए कितनी ही हुकूमतों से युद्ध लड़े यह आज भी बाईबल में मौजूद है। मूसा से फिरऔन की तमाम दुश्मनी का एकमात्र कारण था मूसा द्वारा एकेश्वरवाद का प्रचार। याद रहे कि यहूदी अपने को इब्राहीम और मूसा के रास्ते पर चलने वाला और ईसाई अपने को इब्राहीम, मूसा और ईसा के रास्ते पर चलने वाला बताते हैं जिन का कुरान जगह जगह उल्लेख करता है।

भारतीय लोकगाथाओं के अनुसार प्रहलाद के अपने पिता ने उसको जान से मार देने की हर मुमकिन कोशिश की, कभी उसे पहाड़ की ऊंचाई से नीचे बहती नदी में फेंका, कभी आग में जलाने की कोशिश की गई, पर हर बार वह बच जाता था। अपने पिता की नज़र में यदि प्रहलाद का कोई गुनाह था तो वह यह कि वह विष्णू का बड़ा भक्त था। सनातन पुस्तकों के अनुसार विष्णू कोई और नहीं बल्कि एक निराकार एबसोलूट ताक़त का साकार रूप है, जिसे परमात्मा भी कहते हैं। यानी एकेश्वरवाद की ही ख़ातिर प्रहलाद को भी बार बार मारने की कोशिश की जा रही थी, स्वयं उसके पिता द्वारा।

कृष्ण ने भी देवताओं की पूजा से आगे बढ़ कर विष्णू और एक एबसोलूट खुदा तक अपने कर्मों को सुपुर्द करने की बात की। उनके खिलाफ भी तमाम ताक़तें एकत्रित हो कर युद्ध को आ गईं। यदि अवतार मौहम्मद के खिलाफ अरब के बहुतेरे क़बीले अपनी तमाम नफरतों और दुश्मनी के साथ लामबंध हो गए और उनकी हर प्रकार से सहायता करने के लिए यहूदी और ईसाई क़बीले भी खड़े हो गए तो यह कोई नई बात नहीं थी। 

प्रश्न उठता है कि यहूदी और ईसाई क्यों? यही तो विधी का विधान रहा है। अवतार तब आता है जब लोगों ने पिछले अवतार के पथ को त्याग दिया। यदि यहूदी मूसा के पथ पर चल रहे होते तो बाद के अवतारों को आना ही नहीं पड़ता। न ही ईसा को आना पड़ता। इसी प्रकार यदि अपने को सनातन धर्मी कहने वाले सनातन वेद के मार्ग पर चल रहे होते तो कृष्ण ही क्यों आते और यदि कृष्ण की शिक्षा से लोग भटके न होते तो बुद्ध क्यों आए होते? 

जिस प्रकार अपने को सनातन धर्म का मुहाफिज़ समझने वाले ब्रहमिण कृष्ण से युद्ध करने को फौजें एकत्रित करते नज़र आते हैं ठीक वैसे ही हम पाते हैं कि अनेक यहूदी और ईसाई अवतार मौहम्मद और उनके दीन के खिलाफ झूठी बातों का प्रसार करते और अरब क़बीलों को उकसाते नज़र आते हैं। 

यह तो गीता से साबित है कि अवतार तब ही आता है जब अधर्म बढ़ जाए और लोग धर्म के उसूलों से भ्रमित हो जाएं। यदि दुनिया को    अंधकार ने न घेर लिया होता, तमस यानी जुलमत ने पैर न पसार लिए होते और कलियुग भी अंत की ओर न चल दिया होता तो मौहम्मद और अन्य अहललबैत को आकर एक बार फिर एक खुदा की इबादत और भक्ति के मार्ग को प्रशस्त न करना पड़ता। 

जो हक़ीक़त समझने की है वह ये कि इन्हीं यहूदियों, ईसाईयों और गैर-मुस्लिम समकालीनों में अनेक ऐसे थे जो एक के बाद एक अवतार मौहम्मद की शिक्षा को अपनाते जा रहे थे। कितने यहूदी और ईसाई अपनी अपनी किताबों में दी गई अंतिम मसीहा की भविष्यवाणियों और निशानियों को पहचानते हुए अवतार मौहम्मद द्वारा बताए जा रहे पथ पर आ रहे थे। जिन अनगिनत लोगों ने अवतार मौहम्मद की शिक्षा अपना ली, वे क्यों आलोचना करने लगे। आलोचना तो वे ही करेंगे न जिन के किसी क़रीबी ने अपना धर्म छोड़ कर इस शिक्षा को अपना लिया। या वे धर्म गुरू करेंगे जिन की जय-जयकार करने वाले निरंतर घटते जा रहे थे और उन्हें डर था कि कहीं धर्म के नाम पर जो धंधे उन्होंने चला रखे थे वही समाप्त न हो जाएं। यदि यहूदियों और ईसाईयों ने भी गै़र-मुस्लिम अरब समकालीनों की तर्ज़ पर विरोध का झंडा उठा लिया, जैसा कि लेखक ने कहा, तो उसके कारण समझे जा सकते हैं।

सुलह हुदैबिया के मौक़े पर संधी लिखे जाने वाला वाक़ेया फिर से याद दिला देते हैं। उन्होंने यही तो कहा था कि यदि हम आप को अल्लाह का रसूल मान रहे होते तो हम में मतभेद ही क्यों होता। जिनकी आत्मा एकेश्वरवाद की रूहानी शिक्षा ग्रहण करने के लिए थोड़ी सी भी तय्यार थीं उन्होंने विपरीत हालात होने के बावजूद न केवल उस शिक्षा को ग्रहण किया बल्कि तमाम जुल्म सहते रहने के बाद भी उस पर अड्गि रहे। 

एकेश्वरवाद की जितनी शिद्दत से अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत ने शिक्षा दी वह उससे पहले कभी भी नहीं दी गई थी। यदि आप यह समझ लेंगे तो आपको यह समझते देर नहीं लगेगी कि आखि़र क्यों जुलमत यानी तमस ने अपनी तमाम ताक़त नहीं लगा दी होगी उनकी शिक्षा को कमज़ोर करने के लिए। वह तो इतनी तेज़ काम करती है कि मूसा 30 रोज़ के लिए पहाड़ पर गए थे; वहां केवल 10 दिन अधिक रूक गए तो इतने समझ में जुलमत यानी तमस को अवसर मिल गया कि वह एकेश्वरवाद को मानने वाले यहूदियों को एक बछड़े की पूजा पर लगा दें। बुद्ध तमाम उम्र नाच और गाने को बुरा कहते रहे लेकिन उनके मरने पर 14 दिनों तक उनके चाहने वाले केवल नाच और गाने में मग्न रहे। 

जुलमत यानी तमस ने न केवल अवतार मौहम्मद के समय में उनकी शिक्षा की पहुंच को आहिस्ता करने की तमाम कोशिश कर डाली बल्कि अवतार मौहम्मद की आंख बंद होने के बाद उसने कोई कोशिश नहीं छोड़ी कि शिक्षा के तेज़ बहाव पर जितना रोक लगा सके उतना करे। इसके लिए इस्लाम के बाहर और अन्दर दोनों के बीच मोहरे तलाश करना आवश्यक था; जैसा कि हम पाते हैं कि जुलमत ने किया। 

अहललबैत के खिलाफ तमाम ताक़तों का खुल कर आ जाना और अवतार मौहम्मद के चरित्र को दाग़दार करने की कोशिशें इसी कड़ी का हिस्सा हैं। कौन व्यक्ति जुलमत यानी तमस का कारिंदा बन कर काम कर रहा था और कौन प्रोपेगेंडा के बहकावे में आकर अवतार मौहम्मद और अहललबैत की दुश्मनी पर उतर आया हम आप नहीं बता सकते। 

सत्य और असत्य की, नूर और जुलमत की यह लड़ाई हर ज़माने में जारी रही है। जुलमत निरे झूठ को प्रसारित नहीं करती बल्कि झूठ को सत्य का लबादा ओढ़ा कर पेश करती है ताकि इंसान को घेर कर जुलमत के मार्ग पर खींच लाया जा सके।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर एकेश्वरवाद के कानसैप्ट से दूसरों को इतनी नफरत और दुश्मनी क्यों पैदा हो जाती है कि वे उसका नामोनिशान तक मिटाने को एकजुट हो जाते हैं। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि इंसान अभी तक तमस यानी जुलमत नामी उस negative force को पहचान ही नहीं सका जिसका मुख्य उद्देश्य ही इंसान को सत्यमार्ग से भटका कर दुनिया की चाहतों और वसवसों में गर्क़ कर देना है। हर ज़माने में अनेक दुनियापरस्त लोग उस negative force से जुड़ कर नाम, ताक़त और दौलत हासिल करते रहे। 

अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कुछ लोग खुल कर इस negative force से न केवल जुड़े होने की बात को कुबूल करते हैं बल्कि यह भी मानते हैं कि इस की पूजा अर्चना करने से दुनिया की ताक़त, शोहरत, दौलत आदि मिलती है। ऐसे लोग illuminati के नाम से अपने विचारों का प्रसार तक करने लगे हैं, हालांकि अनेक अन्य भी हैं। यानी कलियुग के लोगों की गिरावट अब इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि उन्हें कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि अपने को खुल कर शैतानी ताक़तों का परस्तार बतलाएं। 

एक ही खुदा का मार्ग हर ज़माने में बताया जा रहा था इसका एक जीता जागता सुबूत यह है कि आज हर धर्म के मानने वाले किसी न किसी मसीहा की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके आने पर सारी दुनिया अम्न और इंसाफ से भर जाएगी। 

हिन्दु कलकी अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं और मानते हैं कि उनके आने पर हर ओर धर्म के उसूल फैल जाएंगे। यहूदी maschiach की प्रतीक्षा इस बेसब्री से कर रहे हैं कि उनके रब्बियों ने तमाम यहूदियों को दुनिया भर में अपने व्यापार आदि छोड़ कर इज़राइल पलटने का आहवान किया है। यहूदियों का मानना है कि इस maschiach के आने पर हर ओर यहूदियत फैल जाएगी। ईसाई ग्रन्थों में मिलता है कि एक नहीं बल्कि दो मसीहा आएंगे, जिनमें एक ईसा होंगे। इनके आने पर हर ओर ईसाई धर्म फैल जाएगा। मुसलमान भी मेहदी और ईसा दोनों के आने की प्रतीक्षा में हैं और यह मानते हैं कि उनके आने पर हर ओर इस्लाम की शिक्षा फैल जाएगी। उनका यह भी मानना है कि मेहदी स्वयं मुस्लिम उलमा से युद्ध करेंगे और उन्हें कत्ल करेंगे जिससे साफ हो जाता है कि मुसलमान भी धर्म की अपनी अस्ल शिक्षा से उतने ही पथभ्रष्ट हो चुके हैं जितने अन्य। केवल इतना ही नहीं, मध्यकालीन युग में उत्तर और दक्षिण अमरीका में रहने वाले रैड इंडियंस भी, जिनकी एक बड़ी सलतनत एज़टैक एमपायर के नाम से थी, Quetzalcoatl नामी किसी मसीहा के आने की प्रतीक्षा में थे। 

यह कैसे मुमकिन है कि यह तमाम मान्यताएं सच्ची साबित हो जाएं। हर कोई जो आज किसी धर्म या सोच को मान रहा है वह इसीलिए तो मान रहा है कि वह उसको सही और दूसरे धर्मों या सोच को ग़लत समझता है। तो क्या वे सब लोग ग़लत है जो यह मानते हैं कि अंतिम ज़माने के मसीहा के आने पर उनका धर्म हर ओर फैल जाएगा। हमारा मानना है कि यह सब लोग सही हैं पर इनकी अपने धर्म की समझ ग़लत है जिसपर यह पूरी तरह नहीं चल रहे हैं। 

हर ग्रन्थ में बताया जा रहा था कि अंतिम ज़माने में उस सत्यमार्ग पर, जिसे अरबी में सिराते मुस्तक़ीम यानी सीधा रास्ता कहा गया, इंसानियत आ जाएगी। केवल दो मार्ग रह जाएंगे - एक सत्यमार्ग और दूसरा उससे विचलित मार्ग। कोई किधर ही विचलित क्यों न हो, वह भटका हुआ तो कहलाएगा ही! फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि कोई हिन्दु है या कोई मुसलमान, ईसाई है या यहूदी। इससे भी क्या अन्तर पड़ता कि कोई हिन्दु धर्म त्याग कर मुसलमान होने की घोषणा कर रहा है या मुसलमान धर्म त्याग कर हिन्दु होने की घोषणा कर रहा है। ज़्यादा आवश्यक यह है कि हर कोई जिस अवतार को मान रहा है उसके द्वारा दी गई एकेश्वरवाद की शिक्षा को मान रहा कि नहीं और उसने जो ग्रन्थ दिए उनको सही सही समझकर अपनी आत्मा को पाकीज़गी की राह पर आगे बढ़ाने की कोशिश में लगा है कि नहीं?

जब सत्यधर्म का मसीहा, चाहे उसे maschiach कहें, कलकी कहें या मेहदी, वह आएगा, तो ग्रन्थों में है कि जुलमत भी दज्जाल या anti-Christ बनकर मानव रूप में आ जाएगी। यह इस बात का सबूत है कि जिस प्रकार नूरानी ताक़तें मानव शरीर को आफिस बना कर हिदायत का काम करती हैं, जुलमत भी मानव शरीर को अपने वश में करके गुमराही की राहें दिखाने में लगी है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या जुलमत खुदा की मंशा के विरूद्ध अपने आप ही एक ताक़त के रूप में खड़ी हो गई या वह खुदा के प्लान का हिस्सा है। 

जितना हम विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ और पुस्तकें पढ़ते हैं, यह बात साफ होती जाती है कि नूर और जुलमत, दोनों एक प्लान के तहत बनाए गए। दोनों की शक्तियां भी हर हाल में एक ही होंगी क्योंकि सब से अधिक इंसाफ करने वाले रब से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि एक शक्ति को थोड़ा कमज़ोर और दूसरे को थोड़ा अधिक ताक़त के साथ पैदा करता। दोनों ही शक्तियों के क्रिएट किए जाने के बाद इंसान का क्रिएशन हुआ जिसको सारे क्रिएशन से बेहतर मस्तिष्क देकर खुदा ने दोनों शक्तियों के बीच पैदा कर दिया ताकि देख सके कि कितने इंसान इस मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए अपने रब तक पहुंचते हैं। यही खुदा का Divine Creation Plan है इंसान को लेकर!

यही कारण है कि जुलमत अपनी तमाम ताक़तें लगा देती है जब वह पाती है कि कोई इंसान एकेश्वरवाद के उस मार्ग को पहचानने या उस पर चलने की कोशिश कर रहा है। उसको गुमराह करना ही जुलमत का काम है। इंसान के लिए अनिवार्य है कि वह जुलमत द्वारा फैलाई गई तमाम गुमराही और बिछाई गई भूलभुलईयां की बिसात को अक़ल की बुनियाद पर पार करते हुए राह में आने वाले कांटों को निकालते हुए बस सत्य मार्ग की पहचान कर उस पर चलते हुए आगे बढ़ता जाए।

इस पुस्तक के प्रारंभ में हम आपको मैत्री उपनिषद VII.8 दिखा चुके हैं जो साफ शब्दों में कहता है कि सब से बड़ी गुमराही यह है कि जो हस्तियां स्वर्ग के लाएक़ हैं यानी जो Divine Creation Plan का हिस्सा हैं उनके साथ वे हस्तियां जोड़ दी जाएं जो स्वर्ग मे जाने के भी लाएक़ नहीं हैं। क्या यही मुसलमानों का शिर्क का कानसैप्ट नहीं है? कोई भी चीज़ जो अल्लाह की ज़ात के बराबर खड़ी कर दी जाए, जो उस स्थान पर खड़ी किए जाने लाएक़ नहीं है, वह शिर्क कहलाती है और एक बड़ा गुनाह है। एकेश्वरवाद की ही बात सनातन किताबें भी कर रही हैं, जैसा मैंने अपनी पुस्तकों और लैक्चर्स में जगह जगह साबित किया है। 

मैंने यह भी दिखाया कि मैत्री उपनिषद यह तक कह रहा है कि जुलमत यानी तमस यानी डेमोनिक ताक़तों को एकदम विपनीत मार्ग बताया गया है जिसके कारण वे अशुभ को शुभ समझते हैं और शुभ को अशुभ। ये ताक़तें असत्य को ऐसे देखती हैं जैसे वही सत्य हो और इनका मुख्य उद्देश्य इंसान को निजात यानी मोक्ष की राह की पहचान से वापिस दुनिया में खींच लाना है। 

वे वेद की शिक्षा से और बाद में परमात्मा की ओर से आने वाले ग्रन्थों की शिक्षा से इंसान को दूर करने में केवल इसीलिए लगे हैं कि उनको यही रास्ता बताया गया है। जो लोग इनके मार्ग को अपना लेते हैं वे अंधेरे में ही चक्कर काटते रहते हैं, हालांकि वे अपने को अकलमंद और ज्ञानी समझ रहे होते हैं, पर वे उन अंधों के समान हैं जिनको कोई   अंधा ही मार्ग दिखा रहा हो।

साफ है कि नूर और जुलमत के बीच इंसान को सब से अधिक अक़ल देकर रखना ही विधि का विधान है ताकि देखा जा सके कि कौन सच्चे रास्ते की पहचान करते हुए अपनी आत्मा को उस मार्ग पर लगाता है और कौन दुनिया में गर्क़ हो जाता है। 

अवतार मौहम्मद भी जानते थे कि जुलमत उनकी शिक्षा को पथभ्रष्ट करने की भरपूर कोशिश करेगी। इसके लिए वह तरह तरह की कहानियां और हदीसें प्रचारित करने का प्रयास करेगी। जुलमत ने ऐसा किया भी। आज भी यदि कुछ लोग अवतार मौहम्मद की छवि को ख़राब करके पेश करने की कोशिश करते नज़र आते हैं तो वे सुबूत के तौर पर ऐसी ही हदीसों और रिवायतों को पेश करते हैं जो विभिन्न किताबों में दर्ज हैं। यही कारण है कि अवतार मौहम्मद ने कहा कि यदि मेरी कोई हदीस भी तुम्हें कुरान से टकराती नज़र आए तो उसे दीवार पर दे मारो, भले ही वह कथन स्वयं मौहम्मद या उनके किसी क़रीबी समझे वाले व्यक्ति से जोड़ कर क्यों न बताया गया हो।  

सोचने की बात यह है कि बनी उमैय्या के दौर में तमाम इस्लामी सलतनत में हर जुमे के खुबते में अली के खिलाफ झूठ प्रसारित किया जा रहा था। तो क्या यह समझा जाए कि बनी उमैय्या अली के दुश्मन थे और मौहम्मद को दोस्त रखते थे? जिस अली को अवतार मौहम्मद ने पहचनवाने में कोई कमी न छोड़ी, जिसको स्वर्ग के मर्दों का सरदार बतलाया, जिसकी मौहब्बत का दिल में होना ईमान की निशानी बताया, उस अली से दुश्मनी का मतलब था अवतार मौहम्मद द्वारा पेश किए गए अस्ल इस्लाम से दुश्मनी। यह अवतार मौहम्मद से खुल कर अपनी दुश्मनी ज़ाहिर नहीं कर सकते थे। क्योंकि उनके नाम पर ही इन्होंने अपनी हुकूमत क़ायम की थी। इसलिए इन्होंने जो कोशिश की वह यह कि झूठी रिवायतों के माध्यम से अवतार मौहम्मद के चरित्र को गुमराह करके पेश किया जाए। ये लोग मोहरे बने जुलमत यानी तमस के एजेंडे को लागू करने का।

यदि ऐसा नहीं था तो बताईए कि इनके ज़मानें में अवतार मौहम्मद की ज़िन्दगी पर कुछ भी लिखने पर रोक क्यों लगी थी? क्यों इन्होंने सुन्नियों के एक प्रख्यात इमाम को मौत की सज़ा सुनाई जब उन्होंने अली के बारे में ब्यान की गई फज़ीलतों पर किताब लिखी? अवतार मौहम्मद के दुनिया से जाने के सौ-दो सौ साल बाद जब हदीसे लिखने की मनाई हटी तब तक हक़ और बातिल, सत्य और असत्य में अंतर करना मुश्किल हो चुका था। 

यह ठीक वैसे था जैसे ईसा के जाने के बाद 300 सालों तक उनके मानने वालों पर प्रताड़ना जारी रही, उनका नाम लेने, उनके रास्ते पर खुल कर चलने पर पाबन्दी थी और ईसा के मानने वालों को भूखे शेरों के सामने डाल दिया जाता था या ज़िन्दा जला दिया जाता था। 300 साल बाद जब कांस्टेंटीन नामी बादशाह ने ईसा की शिक्षा को अपनाया और खुल कर ईसा की शिक्षा का प्रचार प्रसार प्रारंभ हुआ तब तक ईसा की अस्ली शिक्षा की समझ से लोग दूर आ चुके थे। जुलमत यानी तमस ने God, Holy Spirit and Jesus की शिक्षा को ऐसे पेश किया था कि अब उस शिक्षा के आगे किसी आने वाले अवतार का कोई स्थान शेष नहीं रह गया था।

आज यदि हिन्दुओं के घरों में वेद नहीं मिलते तो इसके पीछे भी यही कारण है। जुलमत यानी तमस अच्छी तरह जानती है कि वेद में वे राज़ छिपे हैं जो इंसान को हक़ और हक़ीक़तों की पहचान के क़रीब ला खड़ा करेंगे। उसने जो बड़ी कोशिश की है वह यह कि उसने वेद से लेकर कुरान तक की ग़लत समझ प्रचलित कर दी है। हक़ीक़तें दिन के उजाले के समान सामने आ जाएंगी जब वेद और कुरान आदि का इस नई रौशनी में जो हम पेश कर रहे हैं एक बार फिर अनुवाद होगा।

जुलमत यानी तमस का काम ही यह है कि वह इंसान को सत्यमार्ग से गुमराह करे और इसके लिए वह और उसके तमाम कारिंदे काम में जुटे हैं। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि आम लोग क्यों इनका अनुसरण करते हुए एकेश्वरवाद के खिलाफ मोर्चे में शामिल में हो जाते हैं?

यह कुछ वैसा ही था कि जब हर घराने का कोई न कोई कुलदेवता था जिसकी पूजा होती थी और विभिन्न अवसरों पर विभिन्न देवताओं की पूजा होती थी, तो ऐसे लोगों के बीच कृष्ण ने कहा कि देवता तो स्वयं एक डिवाईन प्लान का हिस्सा हैं, उनसे आगे बढ़ो और परमात्मा की समझ पैदा करो, वहां तक पहुंच जाओ तो एक निराकार एबसोलूट ब्रहम के आगे, जिसको मुसलमान अल्लाह कहते हैं, स्वयं को समपिर्त कर दो। वहां भी धर्म गुरू और ब्रहमिण ही सबसे अधिक नफरतें दिल में पाले कृष्ण के खिलाफ कौरवों और अन्य महारथियों को एकजुट करते नज़र आते हैं और यहां भी यहूदी और ईसाई पादरी एवं विभिन्न क़बीलों के सरदार ऐसी नफरतें लिए नज़र आते हैं कि ओहद के युद्ध में हम पाते हैं कि अबू सूफियान की पत्नी हिन्दा हमज़ा के मृत शरीर को काट कर दिल निकालती है और उसे खाती है। 

यदि अवतार मौहम्मद कहते कि तमाम खुदाओं के बीच मेरे खुदा को भी शामिल कर लो तो अरब क़बाएल को कोई आपत्ती न होती। आखि़र जो 360 खुदाओं को मान रहे थे उन्हें एक और खुदा के मानने में क्या आपत्ती हो सकती थी। लेकिन सवाल था 360 खुदाओं को नकारने का! बाप दादा ने जिन खुदाओं को पूजा था उनको कैसे छोड़ सकते थे। विशेषकर तब जब मक्का वासियों की तमाम दौलत, ताक़त और शान-ओ-शौकत उस काबा से जुड़ी थी जिसमें इन्होंने अपने 360 खुदाओं की मूर्तियां रखी हुई थीं। दूर दूर से बद्दू अरब अपनी कमाई ला कर इन खुदाओं के आगे न्योछावर करते थे, जो अंतः इनको ही मिलती थी। 

दरअस्ल हक़ीक़त तो यह है कि हर ज़माने में एक खुदा को न मानने के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण अधिक रहे है। कृष्ण के समय के गुरू और ब्रहमिणों की भी तमाम इज़्ज़त, दौलत और ताक़त इस कारण थी कि खुदा और आम इंसान के बीच उन्होंने अपने को विराजमान कर लिया था। उनके बिना न तो खुदा की पूजा हो सकती थी और न यज्ञ। इससे ही लोग उनका आदर करते थे, उनके लिए अपनी तमाम दौलत न्योछावर करने को तैयार थे। ऐसा इसलिए कि इन्होंने ऐसा माहौल बना रखा था जिसमें इन तक आने पर ही खुदा के मार्ग पर आगे बढ़ने के दरवाज़े खुलते थे। 

यह क्योंकर आसानी से मान लेते यदि कोई कहता कि उस खुदा से गहरा रिश्ता तो तुम अपनी कुटिया के किसी कोने में बैठ कर भी बना सकते हो। यदि कोई कहता कि तुम को आलीशान मंदिर में आ कर कुछ रस्में निभाने की आवश्यकता नहीं, तुम अपना हर कर्म सात्विक बना सकते हो यदि तुम उस कर्म को करते समय खुदा की याद को दिल में जगा लो। इबादतखानों की गुल्लक़ में अपनी दौलत डालने के स्थान पर सीधे किसी ग़रीब, अनाथ, विधवा, बेसहारा या यात्री पर खर्च करो। यदि कोई पंडित या मुल्ला के पास से स्वर्ग खींच कर कहे कि स्वर्ग तो मां के पैरों तले है इसलिए मां की सेवा करो। जिस दौलत को तुम अपनी पूंजी समझते हुए औरतों और शराब आदि पर उड़ा रहे हो, कोई कहे कि तमाम दौलतों के मालिक, यहां तक कि तुम जो खाना खाते हो, उसके भी मालिक देवता यानी अहललबैत हैं और तुम्हें वह दौलतें देकर उनका संरक्षक बनाया गया है, लिहाज़़ा यदि तुम अपने खाने में से इन देवताओं के नाम का नहीं निकालते तो तुम चोर हो।

Gita.III.12:

Those devas shall bestow on you all gratifications you desire: one who eats what is given to them without giving in turn to them, he is a thief indeed.

तुम ने औरतों को अपनी संपत्ति समझ लिया हो और जब चाहे एक औरत को किनारे कर दूसरी औरत पर अपना प्रेम न्योछावर करते फिरते हो और कोई तुम्हें अधिकतर 4 औरतों तक सीमित कर दे और वह भी इस शर्त के साथ कि तुम उन के साथ बराबरी और इंसाफ करो। यह बराबरी और इंसाफ ऐसी हो कि तुम यदि एक के लिए कोई उपहार लाए तो दूसरे के लिए भी लाओ, एक के साथ एक रात बिताओं तो दूसरी रात दूसरे के साथ बिताओ, विरासत में दोनों को बराबर का शरीक करो, चाहे तुम को एक दूसरे से अधिक पसंद क्यों न हो। 

जिस समाज में ऊंच नीच की दीवारें ऐसी खड़ी हो चुकी थीं कि एक के हाथ का छुआ दूसरा खाना पसंद नहीं करता था, ब्रहमिण बताते थे कि कौन मंदिर में आ सकता है कौन नहीं, ऐसे समय में गीता ने कहा कि पंडित तो वह है जिसके लिए ब्रहमिण, गाय, हाथी, कुत्ता और कोई यदि कुत्ता पका कर खाता हो, वे सब बराबर हैं। 

Gita.V.18:

In regard to a Brahmin endowed with learning or humility, a cow, an elephant, and even a dog, as also one who cooks dog (for food), the well-informed ones (panditah) see the same (differenceless reality).

आखि़र क्यों न ब्रहमिण कृष्ण के खि़लाफ उतर आते?

तो दूसरी ओर कुरान ने कहा कि तुम में ऊंच नीच का कोई अन्तर नहीं सिवाय इसके कि जो अच्छे कर्मों में दूसरों से बेहतर हो। तुम्हारा रंग, तुम्हारी नस्ल, क़बीला जिस में तुम पैदा हुए हो, मालदार हो या ग़रीब, कोई भी चीज़ तुम्हें दूसरे से बड़ा या बेहतर नहीं बनाती सिवाय इसके कि तुम अच्छे कर्म करने में दूसरों से आगे हो। 

Quran.49.13:

O people, we created you from the same male and female, and rendered you distinct peoples and tribes that you may recognize one another. The best among you in the sight of GOD is the most righteous. GOD is Omniscient, Cognizant.

कहा गया कि ईमान का रास्ता यदि हक़ीक़त में कोई छोड़ता है तो वह वो है जो अनाथ के साथ बुरा सुलूक करे या ग़रीब को खाना खिलाने के खि़लाफ हो, जो एक खुदा की पूरी सच्चाई से इबादत न करे बल्कि इबादत में दिखावा करे और जो दान दक्षिणा का विरोध करे। 

Quran.107.1-7:

Do you know who really rejects the faith? That is the one who mistreats the orphans. And does not advocate the feeding of the poor. And woe to those who observe the contact prayers (Salat) - who are totally heedless of their prayers. They only show off. And they forbid charity.

इस्लाम ने जबरन धर्म परिवर्तन को भी मना कर दिया। कोई ऐसा व्यक्ति जो अपने धर्म में रहते हुए अपनी आत्मा को साध नहीं पाया वह किसी दूसरे धर्म में जाकर भी क्या आत्मा को साध लेगा। यदि उसने किसी भी धर्म में रहते हुए अपनी आत्मा को बेहतरी के मार्ग पर लगाते हुए एक रब की इबादत की होती और सच्चे दिल से हक़ और हक़ीक़त को पाने की कामना किए होता तो उसको सत्यमार्ग की ओर खींच लेना तो स्वयं परमात्मा की जिम्मेदारी हो जाती है; हम और आप कौन होते हैं जबरन किसी को इस धर्म से उस धर्म में लाने वाले या उधर से इधर लाने वाले?

Quran.18.29:

Proclaim: “This is the truth from your Lord,” then whoever wills let him believe, and whoever wills let him disbelieve.

अब आप शायद समझ सकें कि अबू सूफियान जैसे कुरैश सरदार या स्वयं मौहम्मद के चाचा अबू लहब आदि क्यों मौहम्मद की इतनी शिद्दत से मुख़ालिफत कर रहे थे। अबू सूफियान मक्का आ रहे क़ाफिलों की देख भाल का काम करता था। इस देखभाल के काम में उनको ठहरने के स्थान के साथ शराब से लेकर औरतें तक मौहय्या कराई जाती थीं। जुए के अड्डे भी चलते थे और यदि बाहर से आया कोई मुसाफिर कुछ अधिक रक़म जीत लेता था तो वापसी के सफर पर डाकुओं के भेस में हमला करके उससे वह दौलत वापिस छीन ली जाती थी। 

एक खुदा के मानने वाले गैर औरतों को छूना तो दूर उनकी ओर निगाह भी उठा कर नहीं देखते थे। शराब से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था। इस्लाम उनसे जाएज़ आमदनी के लिए कोशिश करने को कहता था और जाएज़ रास्तों पर ख़र्च करने की नसीहत देता था। जुए और इस प्रकार के मनोरंजन से भी मुसलमान को दूर रखा गया था। अबू सूफियान जैसे बहुत अच्छी तरह जान रहे थे कि जो गुलाम आंख बंद करके उनके हर हुक्म पर अमल करते थे वे अब इंसाफ और जुल्म की बात करते दिखाई दे रहे हैं, जो कनीज़े सिर्फ थोड़ी सी रक़म की ख़ातिर किसी को भी खुश करने को तैयार थीं, वे अब पाकदामिनी की बात करने लगी हैं। इस्लाम ने बेगुनाह का क़त्ल करने या उस पर हमला करने की अब कोई गुंजाईश नहीं थी। जब इनके सिपाही ही बेगुनाह पर जुल्म करने या डाकुओं के भेस में हमला करने को ग़लत समझने लगेंगे तो फिर इनके हुक्म पर कौन चलेगा। 

वर्षों से आंख बंद करके हुक्म की तामील करने वाले गुलाम अब सत्य और असत्य, जाएज़ और नाजाएज़, हक़ और बातिल की बात करने लगे थे। इस सब के कारण कुरैश सरदार मौहम्मद और इस्लाम दुश्मनी पर उतर आए, यह तो समझ में आता है। आज के दौर के लोग क्यों दुश्मनी रखें हैं, यह ग़ौर करने का विषय है।

इस्लाम पस्ती में गिरी हुई रूहों को फिर से तरक्क़ी की राह पर आगे बढ़ाने आया था। इसके लिए आवश्यक था कि अपने कर्म खुदा की याद को दिल में बसाए हुए करें। रूहानी तरक़की के बिना धर्म के कोई मायनी नहीं। आत्मा को साधने में नाकाम रहे अनेक मुसलमानों ने भी अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत की शिक्षा को नहीं समझा। जो मुसलमान अपनी आत्मा को साधने में नाकाम रहे, उनकी आत्मा फिर पस्ती के दलदल में गिरती चली गई। अब वे कहने को तो मुसलमान थे लेकिन असली धर्म से इनका कोई लेना देना नहीं था। यही वे लोग हैं जिन्होंने अवतार मौहम्मद के बाद इस्लाम की शिक्षा को हाईजैक करके एक ऐसे इस्लाम की छवि पेश की जिसका अवतार मौहम्मद और कुरान के इस्लाम से कोई सरोकार नहीं था। यह लोग इस हद तक बढ़ गए कि अवतार मौहम्मद की आंख बंद होने के बाद उन्होंने अहललबैत को, जो उनकी शिक्षा के असली वारिस थे, हर प्रकार की यातनाएं दीं, उन्हें कैद में या नज़रबंद रखा, और उन्हें क़त्ल कर दिया। 

इन्हें यह तो नहीं पता था कि अहललबैत ही वेदों के देवता हैं, मनु हैं, मारूत हैं, रूद्र हैं, इनमें से दो अस्विन कहलाए और इनमें की एक देवी है और इन्ही देवताओं को तमाम गुनाह, बुराईयां और परेशानियां झाड़ देने वाला और हर चीज़ जो हमारे लिए लाभकारी और शुभ है वह प्रदान करने वाला बनाया गया है।

O All-creating Deva please sweep away from us all sins, vices and miseries and grant us all that is beneficial and auspicious.

अवतार मौहम्मद ने कितनी ही बार अपना और अन्य अहललबैत का खुदा से और उसके Divine Creation Plan में रिश्ता बताया था। जब आत्मा कुएं की गहराई में डूबी हों तो सत्यमार्ग की चमक क्योंकर दिखाई दे सकती है?

अब आप की समझ मे आ रहा होगा कि क्यों पुस्तिका का लेखक कह रहा है कि ‘मौहम्मद की आलोचना 7वीं शताब्दी से ही शुरू हो गयी थी। उदाहरण के लिए उनके गैर-मुस्लिम अरब समकालीनों ने उनकी बड़ी आलोचना की थी जब उन्होंने एकेश्वरवाद के पक्ष में प्रचार किया था।’ अब शायद आप यह भी समझ रहे हों कि समय के सब से बड़े ब्रहमिण और गुरू क्यों कृष्ण के विरूध युद्ध की आग भड़काते नज़र आते हैं; मूसा और ईसा द्वारा पेश की गई शिक्षा से क्यों उनके मानने वाले बार बार भटकाओ और गुमराही की राह पर चलते नज़र आते हैं। 

आगे पुस्तिका का लेखक लिखता है कि यहूदी और ईसाई क्योंकर मौहम्मद को पैगंबर मान लेते जिन्होंने ‘बिना किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हुए खुद को ‘‘अंतिम पैगंबर’’ घोषित कर दिया था।’ यह बात ग़ौर करने की है। इस पुस्तक में कुछ पहले हम अनेक चमत्कार लिख चुके हैं जो अवतार मौहम्मद ने दिखाए। यह तो बस कुछ ही हैं जो हमने लिखे हैं। कितने अन्य चमत्कार न केवल उनकी बल्कि अन्य अहललबैत की ज़िंदगी से जुड़े हैं जो किताबों में दर्ज हैं।

हर ज़माने में विभिन्न अवतारों ने चमत्कार दिखाए परन्तु लोगों ने आंखों से देखने के बाद भी उन्हें झुठलाया। मूसा का उदाहरण सामने है। कभी उन्होंने अपनी लाठी से नील नदी को छुआ और उसका पानी लाल हो गया। कभी उन्होंने जादूगरों द्वारा फेंके गए सांपों के सामने अपनी लाठी रख दी जिसने तमाम सांपों को निगल लिया। इस पर तमाम जादूगर तो एक खुदा की ताक़त को पहचानते हुए मूसा के मार्ग पर आ गए पर वहां उपस्थित फिरऔन और अन्य दरबारियों ने नहीं माना। ऐसे अनेक चमत्कार मूसा ने दिखाए पर अधिकांश लोगों ने नहीं माना। यहां तक कि समुद्र में डूब कर मौत आने तक फिरऔन और उसकी फौज मूसा और उनके साथियों को क़त्ल कर देने की कोशिश में लगे रहे।

कृष्ण ने अनेक चमत्कार दिखाए, यहां तक कि सूरज की गति को रोक दिया, लेकिन क्या सामने लड़ने आई फौज ने कृष्ण को सही मानते हुए उनकी शिक्षा को अपना लिया। ईसा भी तो अनेक चमत्कार दिखा रहे थे, कभी मुर्दे को ज़िन्दा कर रहे थे, कभी कोढ़ के मरीज़ को ठीक कर रहे थे, कभी कुछ मछलियों और रोटियों से उनके तमाम साथी पेट भर कर खाना खा रहे थे, लेकिन अनेक लोग फिर भी उनकी जान लेने पर उतारू थे। 

चमत्कार हिदायत नहीं बन सकते। बल्कि हमने तो मूसा की ही ज़िंदगी में देखा है कि जब मूसा को पहाड़ पर 10 दिन अधिक हो गए तो केवल इतने समय में जुलमत यानी तमस के एक कारिंदे ने तमाम लोगों का सोना इकट्ठा करवा के उससे एक बछड़ा बनवाया जो कुछ ऐेसे बना था कि जब हवा उसकी नाक में से निकलती थी तो उसमें से आवाज़ पैदा होती थी। आज कोई भी जो सीटी की साईंस को जानता है वह इसको समझ सकता है। लेकिन जो लोग मूसा के रब की पूजा कर रहे थे उन्हें अधिक समय नहीं लगा इस सोने के बछड़े की पूजा प्रारंभ कर देने में। 

चमत्कार केवल उस व्यक्ति की आस्था और विश्वास को बढ़ा सकता है जो पहले से सत्यमार्ग का मुसाफिर हो और उस मार्ग पर कुछ आगे बढ़ चुका हो। 

जो लोग चमत्कार द्वारा हक़ को पहचानने की कोशिश करते हैं वे गुमराह भी हो सकते हैं। बल्कि अंतिम ज़माने में दज्जाल यानी एंटीक्राईस्ट चमत्कार दिखा कर ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगा। फिर याद दिला दूं कि सब से बड़ा उपहार यदि इंसान को दिया गया है तो वह अक़ल है। अपनी रूह को पाक करने और पाक रखने की निरंतर कोशिश के साथ अक़ल का प्रयोग करने से ही इंसान के लिए सत्य मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वह सत्यमार्ग जो उन हस्तियों द्वारा प्रदर्शित किया गया जिनका स्थान स्वर्ग में है और जो तमाम सृष्टि के एक रचयिता की पूजा और उपासना की ओर लेकर जाता है। 

यही कारण है कि उपनिषद ने कहाः This is indeed the source of the net of delusion, the association of one who is worthy of heaven with those who are not worthy of heaven, that is it

कुरान भी उसी एक खुदा के मार्ग को प्रशस्त करने की गवाही दे रहा है जिस एक खुदा की ओर कुरान से पहले आने वाले तमाम ग्रन्थ इंसान को ले जाने की कोशिश कर रहे थे। मैं पहले भी दिखा चुका हूँ कि अल्लाह कोई मुसलमानों के खुदा का नाम नहीं है। बल्कि हर वह किताब जो परमात्मा की ओर से आई, भले ही इब्राहीम, इस्माईस, इस्हाक़ या याकूब पर, या विभिन्न क़बीलों में पैदा हुए ऋषियों पर, या मूसा और ईसा पर और या किसी भी ऋषि पर जिसका संबंध परमात्मा से हो, कुरान मुसलमान होने की परिभाषा बताते हुए कह रहा है कि वे न केवल इन सब किताबों पर ईमान रखते हैं, यानी उनके परमात्मा की ओर से होने को दिल से स्वीकारते हैं, बल्कि उनमें अंतर भी नहीं करते। 

Quran.2.136: 

(You) declare: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down to us, and that which was sent down to Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the Prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses and Jesus, and that which was given to all other Prophets from their Lord. We make no distinction between any of them, and we are Muslims (submitted to Him wholly and exclusively).

तमाम किताबें जो परमात्मा की ओर से हैं उन को उसकी ओर से स्वीकार करना ही बड़ी बात थी, कुरान उन तमाम किताबों में अंतर भी नहीं करने की बात कर रहा है। यानी यदि तुम मुसलमान हो तो तुम वेद और कुरान में कभी अंतर नहीं करोगे, दोनों को एक समान श्रद्धा से देखोगे, बिना कोई अन्तर किए दोनों को समझने की कोशिश करोगे और जो मायनी अपनी तमाम सच्ची कोशिश के बाद समझ में आएं उन्हें स्वीकार करोगे।

एक और स्थान पर कुरान में आयाः

Quran.3.84:

Say: “We have believed in God (without associating any partners with Him), and that which has been sent down on us, and that which was sent down on Abraham, Ishmael, Isaac, Jacob and the Prophets who were raised in the tribes, and that which was given to Moses, Jesus, and all other Prophets from their Lord; we make no distinction between any of them (in believing), and we are Muslims (submitted to Him exclusively).

कुरान में दो स्थान पर एक समान आयत का आना दिखाता है कि कुरान का भेजने वाला हर मुसलमान को पैग़ाम देना चाहता है कि मुसलमान होने का अर्थ है उस हिदायत के कारखाने को समझना जिस ने हर ज़माने में इसान को सत्यमार्ग पहचानने, अपनी बुराईयों और आत्मिक बीमारियों को उतार फेंकने और मोक्ष की राह पर चलने की हिदायत की। 

कुरान केवल परमात्मा की ओर से आए ग्रन्थों में अन्तर न करने की ही बात नहीं कर रहा बल्कि खुदा और उसके तमाम अवतारों को दिल से मानने और उनमें अन्तर न करने की बात कर रहा है। फिर यदि तुम पर यह साबित है कि राम, कृष्ण और बुद्ध भी उसी सोर्स के अवतार थे जिस सोर्स के अवतार मूसा, ईसा और मौहम्मद थे, और इन सब को आदर की एक ही नज़र से देखते हो तो यह भी कुरान की शिक्षा के अनुरूप ही है। 

Quran.4.152: 

But as for those who believe in God and His Messengers and make no distinction between them (between God and His Messengers or between the Messengers themselves), to them God will grant their rewards (in full). God is indeed All-Forgiving, All-Compassionate.

जब कुरान हर ज़माने में आए अवतारों में कोई अन्तर नहीं करने की बात कर रहा है और साफ कह रहा है कि यह अवतार विभिन्न भाषा बोलने वालों के दरमियान आए, तो यह कैसे समझा जा सकता है कि भारतवर्ष में अवतार नहीं आए होंगे। 

Quran.14.4:

We have sent no Messenger save with the tongue of his people, that he might make (the Message) clear to them. Then God leads whomever He wills astray, and He guides whomever He wills. He is the All-Glorious with irresistible might, the All-Wise.

एक ओर कुरान गवाही दे रहा है कि हर भाषा बोलने वालों के बीच अवतार आए तो दूसरी ओर गीता में परमात्मा कह रहा है कि जब जब धर्म से लोग दूर होते हैं और अधर्म फैल जाता है तब धर्म को पुनः स्थापित करने और अधर्म और अधर्मियों का नाश करने कोई अवतार आता है। 

Gita.IV.7:

Whenever there comes to be laxity in regard to right life (dharma) O Bharata (Arjuna), and wrong coming to assert itself, then I bring about the creation of myself.

Gita.IV.8:

To protect those who are good and to destroy evil doers, for establishing righteousness, I assume being, age by age.

जब सत्य धर्म पर चलने वालों की संख्या घट जाए और बुराई सब पर हावी होने लगे, तब परमात्मा या दिव्यात्मा का अवतार आता है। 'Age by age' की बात हुई है। ‘जब जब’ और ‘तब तब’ से साबित है कि तमाम सृष्टि पर अधीन परमात्मा का यह कानून हर उस जगह पर लागू है जहां जहां क्रिएशन बसती है। यह कानून केवल भारतवर्ष के लिए नहीं हो सकता जबकि तमाम इंसानियत, जिन्नात आदि उस परमात्मा के अधीन हैं। हालांकि पूरी दुनिया ही अंधकार में डूबी थी लेकिन विशेषकर अरब में तो यह वो समय था जब बुराई और अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका था, सत्स और असत्य, इंसाफ और जुल्म, अच्छाई और बुराई में अन्तर मिट गया था, ऐसे में एक बार फिर कोई रूह किसी पाक मानव शरीर को अपना आफिस बनाने जा रही थी, जिसको लोग मौहम्मद कहते थे। 

जब मुसलमानों ने पहले आई किताबों को त्याग दिया और कुरान को ही अपने लिए काफी मान लिया तो पहले आए स्क्रिपचर्स में दिए गए ज्ञान से वंचित रह गए। English में किसी ने उसे Holy Spirit कहा तो संस्कृत में परमात्मा और अरबी में रूह। Spirit, आत्मा और रूह के मायनी एक ही तो हुए। लेकिन ईसाईयों ने Holy Spirit को ईसा से जोड़ लिया और समझा कि अन्य सब अवतार झूठे और हिन्दुओं ने परमात्मा को कृष्ण से जोड़ लिया और अन्य अवतारों को झुठला दिया। कुरान रूह केे मौहम्मद से रिश्ते को ब्यान कर रहा था लेकिन पहले के ग्रन्थों में बताए गए तथ्यों को नज़रअंदाज़ करने के कारण मुसलमान रूह के सही मायनी की समझ से बहुत दूर भटकते रहे। 

एक ओर दिव्यात्मा की बात हो रही थी तो दूसरी ओर किसी ने उन्हें Lights लिखा और मुसलमानों ने नूर कहा। दिव्य का अंग्रेज़ी में अनुवाद करेंगे तो Light हुआ और अरबी में अनुवाद करेंगे तो नूर हुआ। दिव्यात्मा का अरबी अनुवाद नूरानी रूह हुआ। कुरान ने उसी हस्ती को कभी नूर कहा और कभी रूह और एक स्थान पर यह तक कहा कि रूह ही नूर है लेकिन मुसलमान इन हक़ीक़तों को ज़रा भी नहीं समझ पाए। यहां तक कि विभिन्न अनुवादकों ने कुरान में जब रूह शब्द आया तो उसके भिन्न भिन्न अर्थ लिए। 

आईए देखें कि कुरान इस बारे में क्या कह रहा है। कुरान का पहला सूरह जो अवतार मौहम्मद पर नाज़िल यानी अवतरित हुआ वह सूरह इन्ना अंज़लना है। आईए, देखें कि इसमें रूह का शब्द आया तो कमेंटेटर्स ने कैसे कैसे अनुवाद किया। 

In the name of Allah, the Most Affectionate, the Merciful

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहम करने वाला है। 

Undoubtedly we sent it down in the blessed and valuable night

बेशक हमने इसे शबे क़द्र में उतारा। 

शबे कद्र रमज़ान के महिने की किसी रात को कहते हैं, जिसमें ज़मीन पर कुछ उतरने की बात हो रही है। लेकिन क्या उतरने की बात हो रही है? अनुवाद में ‘इसे’ लिखा है और अंग्रेज़ी में 'It' के शब्द का प्रयोग हुआ है। ‘इस’ या 'It' इशारे के रूप में प्रयोग होते हैं जब हम उस चीज़ की पहचान रखते हों जिसकी ओर इशारा किया जा रहा है। हमें आयतों को ध्यान से पढ़ना होगा और चौकन्ना रहना होगा कि ‘इस’ या 'It' के इशारे से किस ओर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। 

अगली आयत में उस रात की बात हो रही है जिसमें वे हस्तियां अवतरित होती हैं जिन्हें ‘इस’ या 'It' के इशारे से संबोधित किया जा रहा है। 

And what you know, what the blessed night is?

तुम क्या जानो क्या है शबे क़द्र? 

The blessed and the valuable night is better than a thousand months

यह सौभाग्यशाली और मूल्यवान रात हज़ार महिनों से बेहतर है। 

Therein descends angels and the Rooh (the Spirit) by the command of their Lord for every affair

इसमें मलक यानी फरिश्ते और रूह उतरते हैं अपने रब के हुक्स से हर काम के लिए।

That is all peace till the rising of the dawn

वो सलामती है सुबह नमूदार होने तक

यह कुरान का पहला सूरह है जो अवतरित हुआ रमज़ान के महिने की आखि़री दहाई की किसी रात में। अवतार मौहम्मद अपने रब की पूजा और उपासना करने हेतु मक्का से बाहर एक गुफा में जाया करते थे। कभी अकेले जाते और कभी पत्नी ख़दीजा भी साथ जाती थीं। वहां वे कई कई दिन केवल खुदा की इबादत में गुज़ारा करते थे। एक दिन जब वह इबादत में लीन थे तब कुरान का यह सूरह अवतरित हुआ। इस सूरह की बात हम आगे करेंगे और देखेंगे कि उस दिन गुफा में क्या हुआ कि मौहम्मद ने बाहर आकर अपने अवतार होने की घोषणा की।

अभी केवल यह देखते हैं कि सूरह इन्नाअंज़लना क्या कह रहा है। किसी पाक दिन खुदा की ओर से कुछ नीचे भेजे जाने की बात हो रही है। ‘अंज़लना’ का शब्द प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ हुआ ‘नाज़िल होना’ या ‘अवतरित होना’। लेकिन क्या अवतरित हुआ? आगे कुरान उत्तर देते हुए कह रहा है कि ‘नाज़िल होते हैं मलक और रूह’। 

प्रश्न यह उठता है कि रूह क्या है? कुछ रिवायतों की बुनियाद पर मुसलमानों ने यह अर्थ निकाला कि ‘रूह’ से फरिश्ता जिब्रील मुराद है। कुरान बार बार कह रहा है कि तुम उसकी आयतों पर ग़ौर क्यों नहीं करते यानी अपनी अक़ल क्यों नहीं लगाते। एक ही लाईन में मलक और रूह के अवतरित होने की बात हुई। ज़रा ग़ौर कीजिए! पूरी specie यानी जनजाति को यदि एक जगह रख दिया जाए तो क्या उस specie के किसी भाग को आप अलग रखेंगे। 

कुरान का सूरह अस्र कह रहा है कि तमाम इंसान घाटे में हैं सिवाय उनके कि जो सीधे रास्ते पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और सत्य मार्ग पर चले और सब्र किया। इसको क्या ऐसे कोई कहेगा तमाम इंसान और सैयद हैदर घाटे में हैं। यदि ‘और’ के साथ आप यह कहंेगे तो इसका अर्थ हुआ कि सैयद हैदर इंसान के अतिरिक्त कुछ और है। आप ऐसा इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि सैयद हैदर भी इंसान है। यह तो कहा जा सकता है कि तमाम इंसान और जिन्नात या तमाम इंसान और जानवर पर क्या कोई कहेगा कि तमाम इंसान और नरेंद्र मोदी या इंसान और सैयद हैदर? लेकिन पहले आए ग्रन्थों को छोड़ देने वाले मुसलमानों ने ‘रूह’ का अर्थ निकाला ‘जिब्रील’ और कुरान की समझ को दूसरी किताबों से और दूर कर लिया। समझिए, बस ऐसे ही विभिन्न डिवाईन किताबें एक दूसरे से और दूर होती गईं! 

मुसलमानों द्वारा पेश किए जाना वाला अर्थ यह हुआ कि इस रात में फरिश्ते और जिब्रील उतरते हैं, जबकि जिब्रील भी फरिश्ता हैं। पहले अवतरित हुए किसी ग्रन्थ में आत्मा की बात हुई थी और किसी में Spirit की, फिर भी मुसलमानों ने रूह का अनुवाद ‘जिब्रील’ किया। परमात्मा से संबंध कृष्ण का बताया गया था तो Holy Spirit से संबंध ईसा का बताया गया था लेकिन मुसलमानों ने ‘रूह’ से मौहम्मद का संबंध न समझते हुए फरिश्ता जिब्रील को बीच में दाखि़ल कर लिया। 

कुरान का भेजने वाला फरिश्तों के साथ रूह के भेजने की बात कर रहा था। दूसरी ओर ईसाई किताबें पहले ही बताती आ रही थीं कि 7 रूहें थीं जो ज़मीन की ओर आई थीं। उपनिष्द भी 7 दिव्यात्माओं यानी नूरानी रूहों की बात कर रहे थे जिनमें एक देवी है। यही दिव्यात्माएं हर ज़माने में हिदायत देने की जिम्मेदार थीं। ग़लत अर्थ पहना देने के कारण मुसलमान इस समझ से दूर हो गए।

जैसा मैंने कहा, मुसलमानों ने कुरान की उन आयतों का अनुसरण ही नहीं किया जो कुरान और पहले भेजी गई किताबों मे अन्तर न करने की शिक्षा दे रही थीं, इसलिए वे नहीं जान पाए कुरान दरअस्ल रूह या spirit या दिव्यातमा के किसी पाक इंसान के शरीर में, जिसने तप और इबादत से अपनी आत्मा को पाक किया हो, अवतरित होने की बात कर रहा है।

जिस प्रकार ईसाई trinity के कानसैप्ट को अपनी अक़ल से समझने की कोशिश में भटक गए और God, Holy Spirit and Son of God का कानसैप्ट बना लिया उसी प्रकार हिन्दुओं ने भी God यानी ब्रहमण, Holy Spirit यानी विष्णु यानी परमात्मा और उसके बाद कृष्ण जिनके शरीर में नूरानी रूह काम कर रही थी उसको ही परमात्मा या भगवान कहना प्रारंभ कर दिया। एक ने God के साथ Son of God का कानसैप्ट बना लिया तो दूसरे ने परमात्मा ने जिस शरीर के माध्यम से बात की थी, उसको ही god कह दिया। लेकिन परमात्मा तो स्वयं कृष्ण के मुख से कह रहा है कि जब जब धर्म के उसूल मिटने लगते हैं, हर युग में, तब तब मैं किसी शरीर में अवतरित होता हूँ। पृथ्वी पर कोई इतिहास नहीं मिलता और न ही परमात्मा ने ऐसा कहा है कि जिस शरीर को कोई डिवाईन आत्मा आफिस के रूप में प्रयोग करे, उसका नाम कृष्ण ही होगा। शरीर का नाम तो कुछ भी हो सकता है जिसे आत्मा पसन्द करे। यदि गीता ने बार बार, युग युग में, अवतरण की बात न की होती तो हम इस राज़ को नहीं समझ सकते थे।   

कृष्ण तो बस एक ही आए हैं इस सृष्टि के इतिहास में। फिर यदि पृथ्वी के किसी और भाग में कोई अवतार किसी और नाम से आया, मान लीजिए मूसा के नाम से, तो क्या हम ये कहेंगे कि मूसा ही खुदा हैं। या खुदा मूसा के शरीर में उतर आया। हम खुदा को बहुत छोटा कर रहे हैं यदि हम उसको किसी मानव शरीर में उतरता मानें। फिर एक समय आने पर जब उस शरीर का देहांत होगा तो फिर क्या कहेंगे?

यदि हमें कृष्ण के नाम का कोई और अवतार नहीं मिलता और दूसरी पाक हस्तियां मिलती हैं जिनमें आत्मा या रूह के अवतरित होने की बात हो रही है तो हमको समझना होगा कि जिस शरीर में भी वह डिवाईन आत्मा आती है, उसे अवतार कहते हैं और ऐसे ही एक अवतार कृष्ण भी थे। 

मेरे एक सनातनी मित्र के अनुसार ग्रन्थों में दर्ज है कि कृष्ण पर जब योग अवतरित होता था तब लोग कहते थे कि अब वह परमात्मा हो गए। यानी जब आयत आना होती थी, या मेरे मित्र के अनुसार परमात्मा का भाव उन पर आता था, तब लोग समझते थे कि वह परमेश्वर हो गए। बल्कि उनके अनुसार कृष्ण ने स्वयं परमात्मा होने की बात को नकारा है और जब महाभारत समाप्त हो जाती है तो वह कहते हैं कि ‘हे लोगों, उस समय मैं योग में था, इस समय मैं योग में नहीं हूँ।‘ यदि वह परमेश्वर होते तो क्या कहते कि इस समय मैं योग में नहीं हूँ? गीता के अनुसार योग का अर्थ है वह समय जब मानव शरीर की आत्मा का परमात्मा से कनैक्शन स्थापित हो जाए या कोई देवात्मा उस शरीर को आफिस के रूप में प्रयोग करने लगे। 

कुरान भी अवतार मौहम्मद के शरीर में रूह के अवतरित होने की बात कर रहा था लेकिन मुसलमानों ने रूह का अनुवाद जिब्रील लिखकर कुरान के अर्थ और समझ को दूसरी ओर मोड़ दिया। उनकी अनेक हदीसें भी भुला दीं जिनमें वह अपने नूर की बात कर रहे थे, कभी तो अहललबैत के शरीर में भी उसी नूर के हिस्से होने की बात कर रहे थे और कुरान कह रहा था कि अल्लाह ने रूह को नूर बनाया यानी यह कि अवतार मौहम्मद जिस नूर की बात कर रहे थे वह दरअस्ल नूरानी रूह की बात थी। 

अधिक समझने के लिए आइए देखते हैं कि कुरान में रूह का शब्द और किस किस स्थान आया है। यदि सब स्थानों पर रूह का अर्थ जिब्रील ही साबित हो रहा है तो हमारी दलील कमज़ोर पड़ जाएगी परन्तु यदि विभिन्न स्थानों पर रूह का अर्थ जिब्रील नहीं निकल रहा है तो हमारी यह दलील साबित हो जाएगी कि रूह का अर्थ जिब्रील नहंी बल्कि कुछ और ही होना चाहिए। 

कुरान का सूरह अश-शूरह जो कि 42वां सूरह है, उसकी 52वीं आयत देखते हैं, जैसा कि अनुवाद किया गया है, जिसमें रूह का शब्द आया हैः

Quran.42.52:

Thus, have We revealed to you O Mohammad, a Spirit (inspired Book - The Qur’an) by Our command: while you did not know what is The Book and what is the Iman (faith)? But We have made it (The Qur’an) a light [noor] whereby We guide those of Our servants whom We please; and surely you are guiding mankind to the Right Way.

रूह का अनुवाद हर अनुवादक ने अपने हिसाब से किया। हमने जो अनुवाद दिया है वह मालिक का है। मालिक ने रूह के स्थान पर वैसे ही 'Spirit' रहने दिया लेकिन ब्रेकिट में कुरान लिख दिया है। मेरा इन अनुवादकों से प्रश्न है कि इसी आयत में आगे कहा जा रहा है कि इससे हम अपने बंदों में से जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं। तो क्या यह मायनी लें कि कुरान से हम जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं? क्या मौहम्मद को कुरान से हिदायत मिली या मौहम्मद हिदायत पाए हुए थे इसलिए उनके द्वारा कुरान हम तक पहुंचा?

जब कुरान नहीं आया था तब खुदा कैसे हिदायत करता था? हिदायत का यह कारख़ाना तो हर ज़माने में क़ायम रहा है और उसके लिए भी है जिसके पास कुरान मौजूद नहीं है।

कहा जा रहा है कि जो चीज़ मौहम्मद की ओर भेजी गई वह नूर है। ग़लत अनुवाद करके लोगों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया कि जो कुरान भेजा गया वह नूर है। जबकि हर पहले आई किताब में spirit यानी रूह को नूर बताया जा रहा था जिसे मुस्लिम कमेंटेटर्स इसलिए नहीं समझ पाए क्योंकि उन्होंने पहले की किताबों में दी गई जानकारी को पढ़ने या समझने की कोशिश ही नहीं की। अवतार मौहम्मद भी कुरान को नहीं बल्कि अपने और अहललबैत के अन्दर नूर होने की बात कर रहे थे, यहां तक कह रहे थे कि अली और मैं एक नूर के दो टुकड़े हैं, या मेरा नूर उस समय भी मौजूद था जब आदम आब-ओ-गिल के दरमियान थे यानी पैदा किए जा रहे थे।

किसी ने यह भी नहीं सोचा कि कैसे यह कहना उचित होगा कि हमने तुम्हारी ओर किताब को भेजा जबकि तुम को न तो किताब का ज्ञान था न ईमान था। किताब जब आई ही नहीं थी तो उसका ज्ञान हो ही कहां से सकता था? सत्य यह है कि रूह आई और आसमान पर मौजूद किताब में क्या लिखा है उसका ज्ञान भी हो गया और सत्य की आगाही भी हो गई। 

यही कारण है कुरान ने एक और स्थान पर कहा किः ये अल्लाह की आयतें हैं जो हम तुम्हें ठीक ठीक पढ़कर सुनाते हैं। 

कम से कम मालिक ने ये तो किया कि जहां अरबी भाषा में रूह था वहां अंग्रेज़ी के अनुवाद मे ैचपतपज ही लिखा और ब्रैकिट में कुरान लिखा जैसा वह समझ रहे थे लेकिन अनेक दूसरे अनुवादकों ने तो अनुवाद में ही अपनी समझ शामिल कर दी। 

अब्दुल्लाह यूसुफ अली ने रूह के मायनी 'inspiration' लिखे हैं। लेकिन इसी आयत में आगे जहां आया था कि हमने इसको नूर बनाया वहां कैसे कहते कि हमने inspiration को नूर बनाया तो उन्होंने इस स्थान पर ‘हमने इसको’ के आगे ब्रैकिट में ‘कुरान’ लिख दिया और फिर लिखा कि ‘इसको हमने नूर बनाया‘। स्वयं देखिएः

And thus have We by Our command sent inspiration to thee: thou knowest not (before) what was Revelation and what was Faith; but We have made (Qur’an) a Light (Noor) wherewith We guide such of Our servants as We will; and verily thou dost guide (men) to the Straight Way (Sirat-e-Mustaqeem)

मौहम्मद असद ने अंग्रेज़ी अनुवाद किया तो उन्होंने रूह का अनुवाद 'life giving message' किया और आगे लिखा कि ‘हमने इस मैसेज को लाईट यानी नूर बनाया’।

And thus, too, [O Mohammad,] have We revealed unto thee a life-giving message, [coming] at Our behest. [Ere this message came unto thee,] thou didst not know what revelation is, nor what faith [implies]: but [now] We have caused this [message]to be a light, whereby We guide whom We will of Our servants: and, verily, [on the strength thereof]thou, too, shalt guide [men] onto the straight way-

डाक्टर मुस्तफा खत्ताब ने ‘रूह’ का अंग्रेजी अनुवाद किया तो इसका अर्थ 'revelation' लिखा और आगे लिखा कि हमने इस 'revelation' को 'light' यानी नूर बनाया। 

And so We have sent to you O Prophet a revelation by Our command. You did not know of this Book and faith before. But We have made it a light, by which We guide whoever We will of Our servants. And you are truly leading all to the Straight Path –

इसी प्रकार उर्दू और हिन्दी अनुवादकों ने ‘रूह’ का अनुवाद विभिन्न मायनी के साथ किया, जिसको कुछ समझ नहीं आया उसने बस ‘रूह’ ही रहने दिया लेकिन किसी ने भी वे मायनी नहीं लिखे जो पहले के स्क्रिपचर्स और विशेषकर उपनिषद और गीता से साबित हो रहे थे। 

जबकि सीधा सरल अनुवाद जो वेद, उपनिषद और बाईबल आदि तमाम स्क्रिपचर्स से साबित है वह यह होना थाः 

ऐ मौहम्मद हमने अपने हुक्म से तुम्हारी ओर दिव्यात्मा यानी रूह को भेजा। ;इसको तुम्हारे शरीर को आफिस बनाने तकद्ध तुम न तो किताब को जानते थे न ईमान को। लेकिन हमने इसको नूर बनाया है कि इससे हम अपने बंदों में से जिसको चाहते हैं हिदायत करते हैं। बेशक तुम सीधा रास्ता दिखाते हो।

आप ने देखा कि जब कुरान की इस आयत में रूह का शब्द आया तो किसी ने Quran अनुवाद किया, किसी ने insiration, किसी ने revelation किसी ने वैसा का वैसा ‘रूह’ ही लिख दिया लेकिन सूरह इन्ना अंज़लना में जब ‘रूह’ का शब्द आया तो यही अनुवादक उसका अर्थ ‘जिब्रील’ लिख रहे हैं। 

एक और आयत दिखाकर आगे बढ़ते हैं। यदि सूरह इन्ना अंज़लना में फरिश्तों और रूह के ज़मीन पर अवतरित होने की बात हो रही है तो एक और आयत में रूह और फरिश्तों के एक साथ खड़े होने की बात हो रही है और कहा जा रहा है कि उस दिन इनमें से कोई बात नहीं करेगा सिवाय उसके जिसको अनुमति दी जाए अल्लाह की ओर से और जिसका वक्तव्य हमेशा सच्चा है। 

Quran.78.38:

On the day the holy spirit and the angels will stand in ranks. None will talk, except those granted permission by the Most Compassionate and whose words are true.

साफ है कि यहां पर जिब्रील की बात नहीं हो रही जबकि यह आयत बिलकुल उसी प्रकार बात कर रही है जैसे सूरह इन्ना अंज़लना की आयत बात कर रही थी। एक स्थान पर रूह और फरिश्तों के अवतरित होने की बात हो रही थी तो दूसरी जगह अपने रब के सामने खड़े होने की बात हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि उनमें से कोई भी कलाम नहीं करेगा, सिवाय उसके जिसको उनका रब अनुमति दे।

अनुवादकों ने यहां पर ‘रूह’ या 'spirit' का अनुवाद जिब्रील भी नहीं किया जैसा सूरह इन्ना अंज़लना में अनुवाद करके कुरान पढ़ने वालों को वेद, उपनिषद, गीता और बाईबल से दूर कर दिया था और बीच में ग़लत समझ की दीवार बना दी थी। 

यदि रूह शब्द के मायनी नहीं समझ आ रहे थे तो बस वैसे ही ‘रूह’ या 'spirit' लिख देते तो कम गड़बड़ी होती। जिन लोगों ने अपने मन से दूसरे मायनी पहनाए, उन्होंने कुरान की आयतों के मायनी को दूसरे ग्रन्थों से अलग कर दिया। यहां तक कि मौहम्मद किस प्रकार अवतार हुए, यह समझ भी धूमिल पड़ गई। मुसलमानों में कुछ ऐसी सोच बन गई कि जैसे जिब्रील आए और उन्होंने आयतों को पढ़ाया तो मौहम्मद ने पढ़ा। कुछ ने तो यहां तक कहा कि जिब्रील ने मौहम्मद के दिल को चीर कर नूर से धोया और फिर उन्हें आयत बताई। जबकि असलियत तो यह है कि जिब्रील या दूसरे तमाम फरिश्ते आसमानों पर इन दिव्यात्माओं यानी अहललबैत के मातहत हैं और यही दिव्यात्माएं यानी अहललबैत विभिन्न काम उनके सुपुर्द करती हैं। 

ऐसी ही समझ के फेर के कारण हमें वेद समझने में कठिनाई होती है। आज हालत यहां तक पहुंच गई है कि हिन्दु वेद को आसमानी किताबें मानते तो हैं लेकिन       अधिकांश घरों में आपको वेद नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जब वे वेद पढ़ने बैठते हैं तो वे उनकी अक़ल पर नहीं उतरते। इसलिए क्योंकि वेदों का अनुवाद करने वालों ने जो कुछ समझ नहीं आया उसका भी अनुवाद कर डाला। इंसानियत वेद से सही मायनों में लाभान्वित तब होगी जब नई उजागर हुई हक़ीक़तों की रौशनी में वेदों का एक बार फिर अनुवाद किया जाएगा। 

कुरान के 40वें सूरह की 15वीं आयत बिलकुल साफ कह रही है कि आसमान और ज़मीन का मालिक अपने बंदों में से जिस पर चाहता है अपने हुक्म से रूह अवतरित कर देता है ताकि वह लोगों को आखिरी दिन जब सब इकट्ठा किए जाएंगे उससे डराए। और कुरान के सूरह इसरा की 85वीं आयत साफ कह रही है कि रूह की हक़ीक़त एक राज़ है जिसके बारे में बहुत ही कम जानकारी दी जा रही है। 

अल्लामा तबातबाई ने तफसीरे मीज़ान में लिखा है कि रूह उन लोगों के शरीर में डाली जाती है जिन्हें रसूल के रूप में चुना जाता है, अन्यथा यह फरिश्तों के साथ स्वर्ग मंे रहती हैै। अल्लामा असलियत के क़रीब हैं लेकिन वह भी नहीं जानते थे कि उपनिषद आदि में बड़े विस्तार से इसकी हक़ीक़त बताई गई है। एक रूह के विभाजन से 7 रूहें बनीं जो हर ज़माने में हिदायत के काम में लगी हैं। 

गीता के शब्दों को ग़ौर से पढ़ने पर साफ होता है कि महाभारत के युद्ध में दोनों सेनाओं के आमने सामने आने और कृष्ण और अर्जुन के दरमियान वार्तालाप प्रारंभ होने के काफी समय बाद तक अर्जुन को इस बात का एहसास नहीं था कि कृष्ण के मुख से परमात्मा बोल रहा है। यानी साफ है कि यह जान पाना आसान नहीं कि अमुक व्यक्ति के शरीर को अपने आफिस के रूप में परमात्मा प्रयोग कर रहा है। न ही यह जान पाना आसान है कि अमुक शरीर को जुलमत ने अपना कारिंदा बना रखा है। हम किसी के बारे में यक़ीन के साथ कोई राय नहीं बना सकते। 

यही कारण है कि खुदा ने इंसान को बाद में पैदा किया पहले इस हिदायत के कारख़ाने को तैयार किया। जुलमत भी पैदा हुई क्योंकि इन दोनों के बिना इंसान की परीक्षा के कोई मायनी ही नहीं थे। इन चनिंदा हस्तियोें को नूरानी रूप में भी पाक तत्वों से बना बताया और जब यह मानव शरीर में अवतरित हुए और अहललबैत कह कर संबोधित किया, तो इनके लिए गारण्टी ली कि उनके क़रीब बुराई का गुज़र भी नहीं हो सकता। उनको perfectly pure बताया। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके शरीर में दिव्यात्मा शक्ति के वह अंश काम कर रहे थे जो पाक तत्वों से बनी थी। यही सप्तऋषि है। इनको ही गुरू मानना है। और क्योंकि परमात्मा ही इनकी मुकम्मल पाकीज़गी की गारण्टी ले रहा है, इसलिए यदि कोई पथ इनका बताया हुआ साबित है तो उसपर आंख बंद करके चलना ही अक़लमंदी होगी।

हर ज़माने में यह दिव्यात्माएं एक ही उपदेश देती नज़र आती हैं। वह उपदेश है एकेश्वरवाद का, एक खुदा के आगे अपने को समर्पित करने का, केवल उसकी इबादत करने का। यह उपदेश केवल उसके लिए है जो अपने मस्तिष्क को परमात्मा से जोड़ दे, जो केवल परमात्मा की याद बसा कर कर्म करे, उसके आगे ही सिर झुकाए और उसको ही अपनी मंज़िल जाने। सब कुछ त्याग कर उसकी ओर बढ़े, उसमें ही आसरा खोजे, तो ऐसे व्यक्ति के तमाम गुनाह धो दिए जाएंगे। कुरान और गीता दोनों एक ही मैसेज देते दिखाई देते हैं। 

Gita.XVIII.65:

Become one in mind with Me: be devoted to Me: sacrifice to Me: bow down to Me: you shall come to Me alone: I promise you (in) truth: you are dear to Me.

Gita.XVIII.66:

Abandoning all duties, come to Me, the One, for refuge; I shall absolve you from all sins; do not despair.

उस एक की पूजा और उपासना की शिक्षा वेद ने भी दी थी जो आम हिन्दु नहीं समझ पाए। ब्रहम सूत्र कहता हैः

Ekam Brahm dvitiya naste, neh, na, naste, kinchan

[The Brahm is One, there is none other, nay, none, not the least]

एक खुदा की बात कुरान भी करता है जब सूरह इखलास में कहा जाता हैः

In the name of Allah, The Most Gracious and Merciful

Say, “He is Allah, (who is) One,

Who is Eternal, (the uncaused cause of all that exists)

Who has neither given birth nor is he born

And there is no equivalent to Him.

यानी कहा जा रहा है किः 

कहो कि अल्लाह एक है

वह हमेशा के लिए है, बेनियाज़ है

न उसकी कोई संतान है और न किसी न पैदा किया

और न उस जोड़ का उस जैसा कोई है।

और कुरान कहता हैः

Quran.14.10:

. . . What! about Allah is there any doubt, the Originator of the heavens and the earth ?. . .

Quran.21.22:

Had there been in (the heavens and the earth [other]) gods except Allah, they both had been in disorder. . .

Quran.112.1-4:

Say: ‘He (Allah) is One (alone). Allah, the needless.He begetteth not, nor is He begotten. And there is none like unto Him

Quran.6.104:

Vision perceiveth Him not, and He perceiveth (all) vision; He is the Subtle, the All-aware

Quran.16.74:

So coin ye not any similitudes to Allah; verily Allah knoweth (every thing) and ye know not.

Quran.42.11:

. . .Nothing whatsoever (is there) like the like of Him; and He (alone) is the All-hearing and the All-seeing.

अहललबैत की तमाम ज़िन्दगी केवल एक खुदा को पहचनवाने और उसकी इबादत की ओर मानवता को लाने में गुज़री। यदि उन्होंने तमाम यातनाएं सही तो केवल इस मक़सद की ख़ातिर। इस एकेश्वरवाद की ओर लाने के लिए दिव्यात्माएं हर ज़माने में लगी रहीं। उन दिव्यातमाओं को पहचानते हुए उनके बताए जा रहे मार्ग पर आगे बढ़ते जाने से इंसान मोक्ष की राहों पर आगे बढ़ सकता है। 

अंत में आपको दिखाते हैं कि अहललबैत अली ने एकेश्वरवाद को किन शब्दों में ब्यान किया है। पेश है किताब नहजुल बलाग़ा से एक खुदा की पहचान और उसका विवरणः

Nahjul Balagha.Sermon 1:

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए जिस का व्याख्यान कोई वक्ता नहीं कर सकता, जिस की नेयमतों को किसी कैल्कूलेटर द्वारा गिना नहीं जा सकता। कोई भी उसकी इबादत और अनुपालन करके उसके हक़ को पूरा नहीं कर सकता। इंसान की अक़ल यानी सोच अपनी चरम ऊंचाई पर भी उसकी पहचान नहीं कर सकती, उसकी अक़ल अपनी तमाम गहराई में डूब कर भी उस तक नहीं पहुंच सकती। वो जिसके वर्णन की कोई सीमा नहीं रखी गई है, उसकी प्रशंसा के लिए कोई शब्द नहीं हैं, जिसके लिये न समय की सीमा है और न कोई बंदिश। 

धर्म की सबसे अधिक बुलंदी उसकी उपस्थिति का इक़रार करने में है, उसका इक़रार करने की सब से अधिक बुलंदी उसके वुजूद की गवाही देना है, उसके वुजूद की गवाही देने की सब से अधिक बुलंदी उसके एकमैव होने पर विश्वास रखना है, उसके एकमैव होने में विश्वास रखने की सबसे अधिक बुलंदी उसकी शुद्धता एवं पवित्रता को मानने में और उस पर विश्वास रखने में है, और उसकी पवित्रता की पूर्णता उसमें गुणों को नकारना है, क्योंकि हर गुण साबित करता है कि वह उससे भिन्न है जिससे उसको जोड़ा जा रहा है और हर वह जिससे कोई गुण जोड़ा जाए उस गुण से भिन्न हो जाता है। 

इसलिए जिस किसी ने अल्लाह के साथ कोई गुण जोड़ा उस ने उस जैसा किसी को माना, और जिस किसी ने उस जैसा किसी को माना, वह उसमें दुई मान रहा है, और जिस ने उसमें दुई को माना, वह उसके भाग मान रहा है, और जिस किसी ने उसके भाग माने, उसने ग़लत समझा, और जिस ने उसको ग़लत समझा उसने उस पर नुक्ताचीनी की, और जिस ने उस पर नुक्ताचीनी की, उसने उसको सीमाओं में      बांध दिया और जिस ने उसको सीमाओं में बांधा उसने उसको संख्या में सीमित किया। जिस किसी ने कहा कि वह किस में है, उस ने माना कि वह किसी चीज़ में अंतरविष्ट है और जिस किसी ने कहा वह किस पर है उसने माना कि कुछ है जिस पर वह नहीं। 

वह एक हस्ती है पर किसी घटना के कारण वह हस्ती वुजूद में नहीं आई। वह मौजूद है लेकिन गै़र वुजूद से वुजूद में नहीं आया। वह हर चीज़ के साथ है परन्तु यह भौतिक निकटता नहीं। वह हर चीज़ से जुड़ा है पर यह भौतिक जुदाई नहीं। वह कर्म करता है पर जुंबिश या हरकत और साधन या यंत्र का इशारा न समझ लेना। वह देखता है उस समय भी जब उसकी क्रिएशन में कुछ नहीं है देखने के लिए। वह केवल एक है ऐसा कि कोई दूसरा नहीं जो उसका साथी हो या जिसकी जुदाई का कोई दुख हो। 

Sermon 185:

सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। वह ऐसा है कि इंद्रियां उसको महसूस नहीं कर सकती, वह किसी स्थान में समा नहीं सकता, आंखें उसको देख नहीं सकती और पर्दे उसको ढक नहीं सकते। यह कि वह अनंत है, वह साबित करता है तमाम सृष्टि के वुजूद में आने से, और सृष्टि को पैदा करने से भी वह साबित करता है अपने वुजूद को, और उन में समानता के माध्यम से वह दिखाता है कि उसके समान कुछ भी नहीं। 

वह अपने प्रण से सच्चा है। वह इससे बहुत ऊंचा है कि अपनी सृष्टी के साथ नाइंसाफी करे। वह निष्पक्षता के साथ अपनी सृष्टी के साथ खड़ा होता है और उनके साथ केवल इंसाफ करता है। वह सृष्टि के सृजन से और उसकी ताक़त के आगे उनकी असक्षमता से और उसके अनंत होने की समाप्ति में उनकी असक्षमता से साबित करता है कि वह हमेशा से है, अनंत है। 

वह एक है पर गिनती में एक नहीं। वह हमेशा से रहने वाला है बिना किसी सीमा के। वह है पर बिना किसी सहायता के। मस्तिष्क उसको मानने को तैयार है पर किसी इंद्रियों के कारण नहीं। जो कुछ भी नज़र में आता है वह उसकी गवाही देता नज़र आता है बिना उसका साक्षात्कार किए। हमारी सोच के घेरे में वह समा नहीं सकता। वह हमारी कल्पना शक्ति में स्पष्ट होता है उसकी कल्पना की सहायता से, और कल्पना उसकी कल्पना करने में असक्षम है। उसने कल्पना को ही मध्यस्थ बना दिया है इस मामले में। वह बड़ा इस प्रकार नहीं है कि विस्तार या फैलाओ में बड़ा है और इसलिए उसका शरीर भी बहुत बड़ा है। और न ही वह शक्तिमान है इस तरह कि उसकी ताक़त की पहुंच बहुत दूर तक है और उसका डील डौल बहुत फैला हुआ है। लेकिन वह बड़ा है रूतबे में और कुदरत में शक्तिमान है। 

Sermon 91:

सारी प्रशंसा उस परवरदिगार के लिए है जिसके ख़ज़ाने में फज़्ल-ओ-करम के रोक देने और मेहरबानियों पर रोक लगा देने से बढ़ौतरी नहीं होती है और उसके करम और सख़ावत के खज़ाने में कमी नहीं आती। इसलिए कि उसके अतिरिक्त हर देने वाले के यहां कमी हो जाती है और उसके सिवा हर न देने वाला कंजूस कहलाता है। वह सबसे बेहतरीन नेयमतों और न समाप्त होने वाली रोज़ी के माध्यम से एहसान करने वाला है। तमाम जीव जन्तु और दूसरी क्रिएशन उस पर आश्रित है।

उसने सबकी रोज़ी निश्चित कर दी है और जीविका निर्धारित कर दी है। अपनी ओर तवज्जो करने वालों और उससे नेयमतें मांगने वालों के लिए रास्ता खोल दिया है और मांगने वालों को न मांगने वालो से अधिक अता नहीं करता है। 

वह ऐसा अव्वल है कि जिसकी कोई पूर्व नहीं कि उससे पहले कोई हो जाए और ऐसा आखि़र है जिसके आखि़र में कोई नहीं है कि उसके बाद कोई रह जाए। 

वह आंखों की रौशनी को अपने तक पहुंचने और उसको समझ पाने से रोके हुए है। उस पर ज़माना या समय कोई अन्तर नहीं डालता है कि हालात बदल जाएं, और वह किसी स्थान में नहीं है कि वहां से कहीं और चला जाए। यदि वह उन तमाम रत्न और जवाहेरात को तुम को अता कर दे जो पहाड़ अपने अन्दर से निकाल कर बाहर फेंकते है या जिन्हें समुद्र के सीप मुस्कराकर बाहर फेंक देते हैं, चाहे वह चांदी हो या सोना, मोती हों या मरजान, तो भी उसके करम और सख़ावत पर कोई असर न पड़ेगा और न उसके ख़ज़ानों की संख्या में कोई कमी आ सकती है। उसके बाद भी उसके पास नेयमतों के वह ख़ज़ाने रह जाएंगे, जिन्हें मांगने वालों का मांगना समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए कि वह ऐसा करीम है कि न मांगने वालों के सवाल उसके यहां कमी पैदा कर सकते हैं और न ग़रीबों की पुकार उसे बांटने से रोक सकती है। 

उसने तमाम क्रिएश्न को बग़ैर किसी नमूने को निगाह में रखे हुए पैदा किया है और किसी पहले के क्रिएटर और क्रिएश्न के बनाए नक़शे के बिना पैदा किया है।  ...

जब उनको नर्क में डाल दिया जाएगा तो वे आपस में झगड़ा करते हुए अपने झूठे खुदाओं से कहेंगे जो वहीं नर्क में उनके साथ होंगेः अल्लाह की क़सम हम खुली हुई गुमराही में थे, जब हम तुम्हें सब जहानों के रब के बराबर ठहराते थे।

Quran.26.97-98:

By Allah, we were certainly in manifest error when we equalled you with the Lord of the worlds.

और कुरान कहता है कि बेशक तुझे हर चीज़ पर कुदरत है।

Quran.66.8:

Certainly, Thou art powerful over every thing. 

इंसान की कमअक़ली की अंतिम हद यह है कि वह अल्लाह की हिकमत की दलील तलाश कर रहा है जबकि उसने अपनी अक़ल से काम लिया होता तो उसे अंदाज़ा हो जाता कि जिन आंखों से उसकी कुदरत की खोज कर रहा है और जिस दिमाग़ से उसके होने के सबूत ढूंढ रहा है, ये दोनों अपनी ज़बाने बे ज़बानी से आवाज़ दे रहे हैं कि अगर कोई क्रिएटर न होता तो हम भी न होते। हम स्वयं उसकी कुदरत और ताक़त के बेहरीन गवाह हैं। हमारे होते हुए अल्लाह की कुदरत और ताक़त की खोज करना बग़ल में कटोरा रखकर शहर में ढिन्ढोरा पीटने के बराबर है और यह अक़लमंदों को शोभा नहीं देता। 

Sermon 91: 

सुनो, ऐ प्रशन करने वाले, अपने को सीमित रखो उसके उन गुणों तक जो कुरान ने बताए हैं, और उसकी हिदायत की रौशनी से लाभांवित हो। शैतान तुम को और गहराई में जाने के लिए प्रेरित करता है, उससे आगे का ज्ञान अल्लाह पर छोड़ दो जो न तो कुरान तुम से जानने के लिए कहता है और न जिस के बारे में नबी या अन्य हिदायत याफता इमामों के कथन में उल्लेख है। बस जो बता दिया गया वही जानना अल्लाह की ओर से तुम पर फर्ज़ है।

जान लो ज्ञान अर्जित करने में पक्के वे हैं जो वह पर्दे उठाने से बचते हैं जो अनजान और नामालूम की ओर लेकर जाते हैं, और जिस का ज्ञान उनसे छिपा है जिसको न जानने पर वे अभिस्विकृति देते हुए और    अधिक छानबीन से बचते हैं। अल्लाह उनकी इस स्वीकृति की प्रशंसा करता है कि वे वे ज्ञान अर्जित नहीं कर पाए जो उनके लिए नहीं था। वे बहुत गहराई में बातचीत में नहीं जाते कि जो उस अनंत के बारे में जानने से निशेधित किया गया है और वे इसको दृढ़ता कहते हैं। वे इस पर रज़ामंद हैं और अल्लाह के प्रभुत्व और महानता को अपनी अक़ल के दायरे में परिसीमित नहीं करते, ऐसा करने पर वे तबाह होने से नहीं बच पाएंगे।

अपनी अक़ल के मुताबिक़ अल्लाह की बड़ाई और कुदरत का अन्दाज़ा न करो कि हलाक होने वालों में गिने जाओगे। देखो, वह ऐसा कुदरत रखने वाला है कि जब कोई अक़ल उसकी कुदरत की हद पता करने के लिए आगे बढ़ती है और हर तरह के वसवसे से पाक कोई सोच उसकी सलतनत के छिपे राज़ों को समझना चाहती है और दिल मौहब्बत में ओत पोत उसके गुणों को पता करने की चेष्टा करता है और अक़ल की राहें उसकी ज़ात का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसके गुणों की मदद से आगे बढ़ना चाहती हैं तो वह उन्हें उस हालत में वापिस कर देता है कि वह अदृश्य दुनिया की गहराईयों की राहें तय कर रही होती हैं और सम्पूर्ण रूप से उसकी ओर आकर्षित होती हैं जिसके नतीजे में अक़लें ये मानते हुए पलट आती हैं कि यदि सोच पाक नहीं तो उसकी हक़ीक़त की समझ प्राप्त नहीं हो सकती।

Quran.2.112:

No! Rather, whoever submits his whole being to God (and does so) as one devoted to doing good, aware that God is seeing him, his reward is with his Lord, and all such will have no fear ( for they will always find my support and help with them), nor will they grieve.

पूरी तरह समर्पण की बात हो रही है और अच्छे कर्म के लिए भी अपने को समर्पित करने की बात हो रही है। अपनी इंद्रियों को, शरीर को, सोच को, submits his whole being!

आप समझ सकते हैं कि एबसोलूट की समझ पैदा करना नामुमकिन है। केवल उस सोर्स से जुड़ी दिव्यात्माएं ही, अहललबैत ही, उस हक़ीक़त का सही और सच्चा विवरण पेश कर सकते हैं। अली द्वारा पेश किया गया विवरण हर डिवाईन पुस्तक, जिसमें गीता, उपनिषद और वेद भी शामिल हैं, सब से साबित है। कलियुग का इंसान ऐसा हटधर्म हो चुका है कि सृष्टि के उस रचयिता और मालिक की इबादत पर पाबंदी लगा रहा है या इबादत स्थलों को मलियामेट करने की सोच रहा है। सृष्टि का वह रचियता जिसको गीतन ने एबसोलूट यानी सर्व-शक्तिशाली यानी क़ादिरे मुतलक़ कहा और जिसकी बात करते हुए कहाः

Gita.IV.24:

(For him) the Absolute is the act of offering, the Absolute is the substance offered into the Absolute which is the fire offered by (him) the Absolute, the end to be reached by him being even the Absolute by means of his peace supreme of absolutist action.

Gita.V.17:

Those having That Absolute for reasoning, that for the Self, that for finalized discipline, that for supreme goal, they go to a state of final non-return, all their dross being cancelled out by wisdom. 


No comments:

Post a Comment