Sunday, 30 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-I: सत्य और असत्य की लड़ाई

सत्य और असत्य की लड़ाई

पुस्तिका आगे लिखती हैः

‘मौहम्मद अनाथ थे और उनका बचपन कठिन था। बचपन में ही उनकी मां ने भी उन्हें छोड़ दिया था। फिर उनके दादा और चाचा की देखभाल में उनकी परवरिश हुई। उन्हें अपने मां-बाप का प्यार नहीं मिला। उनके दादा और चाचा ने उनको ज़रूरत से ज्यादा प्यार दिया जिसके कारण वह पूरी तरह से बिगड़ गए। उन्हें ना मर्यादा सिखाई गई और ना ही अनुशासन का पाठ पढ़ाया गया। वह सीमित ताक़त हासिल करने की कल्पना करने लगे क्योंकि वह बचपन में कठिन दौर से गुज़रे थे तो उन्होंने अपना व्यवहार ऐसा दिखाया कि लोग उन पर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें। वह स्वयं दूसरों से लाभ लेते थे और उन्हें यह भी लगता था कि लोग उनसे जलते हैं। जब कोई उन्हें अस्वीकार करता था तो बहुत आहत हो जाते थे और उसकी हत्या भी करवा देते थे। मौहम्मद झूठ बोलते थे। लोगों को धोका देते थे और ऐसा करना न्याययोजित और अपना अधिकार समझते थे। वह ऐसा व्यवहार अपनी मानसिक बीमारी के कारण करते थे।

क्योंकि मौहम्मद एक मानसिक बीमारी से ग्रस्त थे अपने को इस्लाम का रसूल घोषित कर कुछ ज्यादा घमंडी हो गए थे। वह अपनी बातें अल्लाह के संदेश के हिसाब से पेश करते थे। ऐसा नहीं था कि वो झूठ बोलते थे। मानसिक बीमार होने के कारण उन्हें काल्पनिक आवाज़ सुनाई देते थीं। असल में वह कल्पना और वास्तविकता में पहचान कर पाने में असमर्थ थे। मौहम्मद ऐसी मानसिक बीमारी से पीड़ित थे जिसके चलते वह रस्मो-रिवाज और कठोर नियमों को अपने विचारों से पैदा करते थे। इसी कारण मौहम्मद कठोर और हृदयहीन जीवन जी रहे थे। उनके विचार बेतुके नियमों से भरे हुए थे। मौहम्मद मानसिक तौर पर ऐसी बीमारी से ग्रस्थ थे जो मनुष्य के दिमाग में हार्मोन अधिक मात्रा में बना देती है। यह बीमारी मनुष्य की हड्डियां बड़ी कर देती है। हाथ पैर काफी रूखे हो जाते हैं। इस बीमारी से ग्रस्त लोगों में सैक्स करने की क्षमता और चाहत ज्यादा उत्पन्न हो जाती है, इसी कारण मौहम्मद में सैक्स करने की क्षमता व चाहत मरते दम तक बनी रही। मौहम्मद एक ही रात में अपनी 13 बीवियों के साथ सैक्स करते थे जबकि वह 50 वर्ष से ऊपर के हो चुके थे। ज्यादा बीवियां होने के कारण उनकी बीवियों को कोई दूसरा हासिल न कर ले इसलिए उन्होंने इस्लाम में अल्लाह की तरफ से पर्दे यानी बुरखे़ का रिवाज शुरू कर दिया और उनकी बीवियां किसी दूसरे के साथ यौन संबंध न करने पाएं इस कारण उन्होंने अपनी बीवियों को इस्लाम के मानने वालों की मां का दर्जा दे दिया क्योंकि मौहम्मद द्वारा बनाए गए इस्लाम में सिर्फ मां एक ऐसा रिश्ता है जिसके साथ यौन संबंद नहीं बनाए जा सकते।’ 

यह दो पैराग्राफ हम ने एक साथ लिए हैं क्योंकि इन दोनों में अधिकांश एक ही बात हो रही है। जैसा मैंने आप को पहले भी दिखाया था, पुस्तिका का लेखक शब्दों का जाल बिछाकर अच्छाई को भी बुरा बना कर पेश करने की कोशिश कर रहा है। 

मौहम्मद के जन्म से 6 महिने पूर्व ही उनके पिता अब्दुल्लाह का देहान्त हो गया था। 6 वर्ष के थे जब मां आमिना बिन्ते वहब का देहान्त हुआ और इस अनाथ बच्चे का संरक्षण दादा अब्दुल मुत्तलिब के ज़िम्मे आया। लेकिन मौहम्मद 8 वर्ष के ही हुए थे कि उनके दादा का भी देहान्त हो गया। अब उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी चाचा अबू तालिब ने संभाली। अब्दुल मुत्तलिब के बाद अबू तालिब बनी हाशिम के सरदार थे और अपने रोब और दबदबे के कारण जब अवतार मौहम्मद ने अल्लाह का रसूल होने की घोषणा की तो अबू तालिब के संरक्षण के कारण प्रारंभिक दौर में इस्लामी शिक्षा के प्रसार में बड़ी मदद मिली। 

सकारात्मक या आम घटनाओं को नकारात्मक ढंग से पेश करने में पुस्तिका के लेखक निपुण हैं। अपनी बात साबित करने की कोशिश में वह यह चिंता भी त्याग देते हैं कि इस्लामी इतिहास को ज़रा सा भी खंगोलने की कोशिश करने वाला व्यक्ति बड़ी आसानी से इस निष्कर्श तक पहुंच सकता है कि इस पुस्तिका के लेखक से अधिक झूठा व्यक्ति और कोई नहीं हो सकता। 

जिसने अपनी ज़िन्दगी इन्हीं अहललबैत के नाम पर वक़फ की गई सम्पत्तियों को बेचने में बिताई हो, उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह इन अहललबैत की ज़रा भी इज़्ज़त दिल में रखता हो।

आईए देखें कैसे सकारात्मक या आम घटनाओं को वह नकारात्मक ढंग से लिखने की कोशिश कर रहे हैं। 

मौहम्मद बचपन में ही अनाथ हो गए थे, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन इस के पश्चात उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने और फिर चाचा अबू तालिब ने उनकी ऐसे परवरिश की कि उन्हें मां बाप की कमी महसूस न हो सके। लेकिन बचपन में अनाथ हो जाने को पुस्तिका का लेखक ऐसे पेश करने की कोशिश करता है जैसे जितने बच्चे बचपन में अनाथ हो जाएं, वे बिगड़ ही जाते हैं। वह कहते हैंः ‘मौहम्मद अनाथ थे और उनका बचपन कठिन था।’ ‘बचपन कठिन था’ कह कर पुस्तिका का लेखक भूमिका बांध रहा है कि इन कारणों से मौहम्मद किसी दिमाग़ी बीमारी का शिकार हो गए। फिर कहता है कि ‘बचपन में ही उनकी मां ने भी उन्हें छोड़ दिया था। फिर उनके दादा और चाचा की देखभाल में उनकी परवरिश हुई।’ यहां तक भूमिका बांधने के बाद पुस्तिका का लेखक अपने असली मुद्दे पर आते हुए कहता है कि ‘उन्हें अपने मां-बात का प्यार नहीं मिला। उनके दादा और चाचा ने उनको ज़रूरत से ज़्यादा प्यार दिया जिसके कारण वह पूरी तरह से बिगड़ गए।’

हम ने पहले भी बताया है कि जो लोग लिखना जानते हैं वे बखूबी जानते हैं कि कोई लेखक कैसे शब्दों के जंजाल से जो कुछ भी साबित करना चाहे वह कर सकता है। यहां भी ऐसा ही करने की कोशिश की गई है। अन्यथा तथ्यों के आधार पर तो इस पुस्तिका में कुछ भी नहीं कहा गया है। केवल निराधार बातों और झूठ के माध्यम सेे शब्दों का हेर फेर करते हुए कमअक़ल लोगों या अपना दिमाग़ प्रयोग न करने वालों को अवतार मौहम्मद का कैरैक्टर समझाने की कोशिश की गई है। 

सकारात्मक सोच रखने वाला कुछ ऐसा भी निष्कर्ष निकाल सकता था किः ‘मौहम्मद के अनाथ हो जाने के बाद उनके दादा और चाचा ने इतना प्रेम दिया कि उनको मां बाप की कमी भी महसूस नहीं होने दी’। लेकिन उसको तो कुछ दूसरा निष्कर्ष निकालना था। वह कहता हैः ‘उनके दादा और चाचा ने उनको ज़रूरत से ज़्यादा प्यार दिया जिसके कारण वह पूरी तरह से बिगड़ गए। उन्हें ना मर्यादा सिखाई गई और ना ही अनुशासन का पाठ पढ़ाया गया। वह सीमित ताक़त हासिल करने की कल्पना करने लगे क्योंकि वह बचपन में कठिन दौर से गुज़रे थे तो उन्होंने अपना व्यवहार ऐसा दिखाया कि लोग उन पर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें।’

जब तक अवतार मौहम्मद ने अपने को खुदा का अवतार होने की घोषणा नहीं की थी, समूचे अरब में उनसे अधिक प्रशंसनीय कोई नहीं था। एक उदाहरण देते हैंः काबा की दीवार में पुरातन काल से एक काला पत्थर लगा है जिसको मुसलमान संगे असवद कहते हैं और उसकी बड़ी इज़्ज़त करते हैं। मान्यता है कि यह पत्थर आसमान से गिरा था ताकि आदम को उस स्थान की निशानदेही कराई जा सके जहां अहललबैत यानी (अल्लाह के) घर के लोगों को आना था। इस पत्थर ने मार्गदर्शन किया तो आदम ने अल्लाह का घर यानी बैतुल्लाह यानी काबा की बुनियाद डाली। यह पत्थर उस समय भी काबा की दीवार के एक कोने पर लगा था ;बवतदमत.ेजवदमद्ध जिस समय यरूशलम में ईसा भविष्यवाणी कर रहे थे किः 

Psalms.118.22 and Matthew.21.42:

The stone which the builders rejected has become the chief corner-stone.

अवतार मौहम्मद द्वारा अपने अवतार यानी रसूल होने की घोषणा से क़रीब 5 वर्ष पहले की बात है जब काबा की दीवार की मरम्मत हेतु इस पत्थर को अपनी जगह से हटाना पड़ा। पत्थर को फिर से अपने स्थान पर रखने को लेकर अरब के क़बीलों में झगड़ा पड़ गया। हर कोई चाहता था कि यह सम्मान उसके क़बीले को मिले। कोई रास्ता नहीं समझ आ रहा था। 

यह निष्कर्ष हुआ कि अगले रोज़ सुबह जो व्यक्ति भी सब से पहले काबा में दाखिल होगा, वह जो भी समाधान देगा वह सब पर मान्य होगा। खुदा की करनी कहिए या यह कि अवतार मौहम्मद इबादत की ख़ातिर सुबह सुबह काबा में आया करते थे, सब से पहले आने वाला कोई और नहीं था बल्कि मौहम्मद थे। उनके सामने समस्या रखी गई। वह यदि यह कहते कि बनी हाशिम में से अबू तालिब पत्थर को अपने स्थान पर रखेंगे, तो भी हर किसी को मान्य होता क्योंकि उन्होंने यही निर्णय लिया था कि काबा में आने वाला पहला व्यक्ति जो भी समाधान बताएगा, वह सब पर मान्य होगा। लेकिन अवतार मौहम्मद ने जो समाधान बताया उसने हर क़बीले को संतुष्ट कर दिया। 

उन्होंने एक चादर मंगवाई और पत्थर को उस चादर पर रख दिया। फिर उन्होंने हर क़बीले के सरदार को उस चादर के किनारे को पकड़ कर उठाने को कहा। चादर को काबा की दीवार के समीप उस स्थान पर लाया गया जहां उसको लगाना था। फिर अवतार मौहम्मद ने अपने हाथ से उस पत्थर को उठा कर उसे काबा की दीवार में लगा दिया।  

अपने रसूल यानी अवतार होने की घोषणा से बहुत पहले से मौहम्मद बेहद ईमानदार, सच्चे और अमानतदार मशहूर थे। उन्होंने ख़दीजा के व्यापारिक क़ाफिले में नौकरी की तो ख़दीजा को इतना मुनाफा दिया जो उससे पहले किसी ने नहीं दिया था। लोग यह भी मानते थे कि मौहम्मद से सच्चा कोई नहीं है लेकिन एकेश्वरवाद की शिक्षा को हज़्म करना उनके लिए मुश्किल था। 

ऐसा ही हमें देखने को मिलता है जब उन्होंने अपने रसूल यानी अवतार होने की घोषणा की और मक्का के लोगों को एक स्थान पर जमा किया। वे एक पहाड़ी पर चढ़ गए। वहां से उनको संबोधित करते हुए उन्होंने सब से पूछा कि ‘यदि मैं यह कहूँ कि इस पहाड़ी के पीछे एक बड़ा लश्कर खड़ा है जो तुम पर हमलावर होने आया है तो क्या तुम मानोगे?’ सब ने एक ज़बान कहा कि ‘हां अवश्य मानेंगे क्योंकि हमने आज तक आपको झूठ बोलते नहीं पाया।’ इस पर मौहम्मद ने कहा कि फिर यह भी जान लो कि ‘मैं अल्लाह का रसूल हूँ और तुम को सत्यमार्ग प्रदर्शित करने हेतु आया हूँ। 

मौहम्मद के घंटों इबादत करने को, हमेशा सच बोलने को, सारी ज़िन्दगी ईमानदार और अमानतदार होने को यदि कोई ऐसे पेश करे कि ‘उन्होंने अपना व्यवहार ऐसा दिखाया कि लोग उन पर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें’ तो तो इसमें लिखने वाले की मानसिकता साफ दिखाई देगी? ऐसे तो कोई किसी के लिए भी कह सकता है भले ही वह कितना ही बड़ा सदगुरू क्यों न हो। कहने वाला यह भी कह सकता है कि बुद्ध की सारी तपस्या और enlightenment पाने की कोशिश इसलिए थी कि लोग उनपर भरोसा करें और उनकी प्रशंसा करें। 

अवतार मौहम्मद अमानतदार तो ऐसे जाने जाते थे कि जिस समय मक्का के विभिन्न क़बीले एक खुदा की उनकी शिक्षा का हर प्रकार से विरोध करने में लगे थे, उस समय भी वे उनके पास ही अपनी क़ीमती चीज़ें अमानत के रूप में रखवाते थे। यहां तक कि उनको जान से मारने पर एका किए हुए थे लेकिन अपनी अमानतें उनके पास ही रखवाते थे। 

जिस समय अवतार मौहम्मद ने मक्का से मदीना को कूच किया, तो अपने पीछे अली को छोड़ गए कि कुरैश ने जो जो अमानतें उनके पास रखवा रखी थीं, अली उन सब अमानतों को लौटा सकें। अब तो अवतार मौहम्मद मदीना की ओर कूच कर रहे थे, अब तो मदीना में एक बड़े गुट ने उनके रास्ते को अपना लिया था और उन्हें हर प्रकार की सहायता देने की घोषणा की थी, यदि अब वह इन अमानतों को अपने साथ मदीना भी ले जाते तो कोई इसको बुरा न कहता क्योंकि यह उनकी अमानतें थीं जिन्होंने उन्हें और उनके साथियों को हर प्रकार की यातनाएं दीं थीं और अंतः जान से मारने तक का प्लान बनाए बैठे थे। लेकिन अवतार मौहम्मद ऐसे ईमानदार और इंसाफपसंद थे कि वह किसी को भी उसके हक़ से वंचित नहीं कर सकते थे, भले ही वह उनका दुश्मन ही क्यों न हो। 

मैंने आपको बताया कि कैसे तमाम कुरैश ने यह बात मानी कि आप जो कुछ भी कहेंगे हम उस पर यक़ीन करेंगे क्योंकि हम ने आपको कभी भी सच के सिवा कुछ बोलते नहीं पाया परन्तु पुस्तिका का लेखक केवल एक लाईन में यह लिख देता है कि ‘मौहम्मद झूठ बोलते थे’ जब वह लिखता है किः ‘वे स्वयं दूसरों से लाभ लेते थे और उन्हें यह भी लगता था कि लोग उनसे जलते हैं। जब कोई उन्हें अस्वीकार करता था तो बहुत आहत हो जाते थे और उसकी हत्या भी करवा देते थे। मौहम्मद झूठ बोलते थे।’

इसमें कुछ भी सत्य पर आधारित नहीं है बल्कि निरा झूठ है। यदि उन्हें दूसरों से लाभ लेना होता तो जब कुरैश के सरदारों ने आकर दौलत, सरदारी और कुरैश की सब से सुन्दर महिलाओं का आॅफर दिया तो उन्होंने उनका प्रस्ताव शर्तों के साथ मान लिया होता। यदि ऐसा नहीं तो अमानतें लेकर ही मदीना कूच कर लिया होता। परन्तु वह व्यक्ति जिसका किरदार यानी चरित्र और व्यक्तित्व के बारे में कोई कितना भी पढ़े, आंखे विस्मय और हैरत से फटी रह जाती हैं कि ऐसा व्यक्ति हक़ के नुमाईंदे के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता, उसके व्यक्तित्व पर हर प्रकार के आरोप लगाए गए केवल इसलिए क्योंकि जुलमत यानी तमस के कारिंदे मौहम्मद द्वारा प्रदर्शित पथ से विचलित करने की कोशिश में लगे थे और आज भी लगे हैं।

ऐसा जुलमत ने इंद्रदेव के लिए भी किया जो हमने साबित किया है कि दरअस्ल मौहम्मद का ही नाम है। नेपाल और भारत के कुछ इलाक़ों में आज भी प्रथा पाई जाती है कि यदि वर्षा नहीं होती तो औरतें नग्न अवस्था में खड़ी होकर इंद्रदेव से वर्षा की प्रार्थना करती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पता है कि इंद्रद्रेव वर्षा करने के ज़िम्मेदार हैं परन्तु उन्हें जुलमत यानी तमस ने यह भी समझाया कि नग्न महिला को देख कर इंद्रदेव प्रसन्न होकर प्रार्थना को सुन लेंगे। इंद्रदेव को लेकर फैली तमाम बातें केवल मिथ्य है जिनका संकलन कई आम इंसानों द्वारा रचित काव्यों आदि में मिल जाएगा। परन्तु जो ईश्वरीय पुस्तकें हैं, जैसे वेद, उपनिषद, आदि, वे तो इंद्रदेव की प्रशंसा करते नहीं थकतीं बल्कि उन्हें तमाम देवताओं का राजा तक बताती हैं और मोक्ष देने तक में उनका रोल बताती हैं। 

Mundaka Upanishad.II.9:

Indra art thou, O Life (prana), by thy valour; Rudra art thou as a protector. Thou movest in the atmosphere as the sun, the lord of the lights (Noors). 

अगले पैराग्राफ में भी पुस्तिका के लेखक ने अपने मनगढ़ंत आरोप लगाते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि बचपन में मां बाप के गुज़र जाने के कारण जैसे मौहम्मद किसी मानसिक बीमारी से ग्रसित हो गए थे। हालंाकि पुस्तिका के लेखक का आज भी मौहम्मद से वही मतभेद है जो उस समय के कुरैश और कुछ यहूदियों या ईसाईयों का था। वह यह कि वह मौहम्मद को अवतार मानने को तैयार नहीं थे ठीक वैसे जैसे जिन यहूदियों ने ईसा को अवतार नहीं माना उन्होंने उनको सूली तक पहुंचाने की कोशिश की और जिन्होंने कृष्ण को अवतार नहीं माना, उन्होंने दूर दूर फैली रियासतों के राजाओं की सेनाओं को कृष्ण के खिलाफ युद्ध के लिए एकत्रित कर लिया। 

पुस्तिका के लेखक ने लिखा हैः

‘क्योंकि मौहम्मद एक मानसिक बीमारी से ग्रस्थ थे अपने को इस्लाम का रसूल घोषित कर कुछ ज़्यादा घमंडी हो गए थे। वह अपनी बातें अल्लाह के संदेश के हिसाब से पेश करते थे। ऐसा नहीं था कि वो झूठ बोलते थे। मानसिक बीमार होने के कारण उन्हें काल्पनिक आवाज सुनाई देती थीं। असल में वह कल्पना और वास्तविकता में पहचान कर पाने में असमर्थ थे। मौहम्मद ऐसी मानसिक बीमारी से पीड़ित थे जिसके चलते वह रस्मो-रिवाज और कठोर नियमों को अपने विचाारें से पैदा करते थे। इसी कारण मौहम्मद कठोर और हृदयहीन जीवन जी रहे थे। उनके विचार बेतुके नियमों से भरे हुए थे।’

तमाम आरोप ही बेतुके और झूठ पर आधारित हैं। अवतार मौहम्मद पर आरोप लगता है कि उन्होंने धर्म को बहुत कठिन बना दिया। जहां हिन्दु धर्म हर किसी को आज़ाद छोड़ता है कि वह जैसे चाहे जिंदगी गुज़ारे, वहीं इस्लाम ने कठोर नियम बनाए, और उन पर चलने को अनिवार्य कर दिया। जैसे रोज़ाना पांच समय की नमाज़ें, वर्ष में एक महिने के रोज़े, यहां तक कि सहवास के बाद का नहान, आदि। आम तौर पर मुस्लिम उलमा संतोषमयी उत्तर नहीं दे पाते कि अवतार मौहम्मद द्वारा बताए गए इन कठोर नियमों के पीछे क्या कारण है?

उत्तर हम पेश कर रहे हैं! हिन्दुओं की मान्यता है कि इस सृष्टि पर मानव जीवन को चार युगों से गुज़रना होता है। इसमें अंतिम युग को कलियुग कहते हैं। खगोलशास्त्र के मशहूर ग्रन्थ ‘सूर्यसिद्धान्त’ के अनुसार कलियुग की शुरूआत ईसा पूर्व 3102 वर्ष के फरवरी महीने की 18 तारीख़ को हुई थी। पुराणों में इसी तारीख़ का उल्लेख कृष्ण के वैकुंठ जाने को लेकर होता है। यानी यह कि जब अवतार कृष्ण की आंख बंद हुई, तभी से कलियुग की शुरूआत हुई। 

इस मान्यता के अनुसार धरती पर कलियुग प्रारंभ हुए पांच हज़ार एक सौ से अधिक वर्ष गुज़र चुके हैं। एक मान्यता यह भी है कि कलियुग की कुल आयु 432000 वर्ष होना तय है। ऐसे में कोई हिन्दु क्यों चिंता करने लगा अपने को सत्यमार्ग पर लगाने की? अभी तो बड़ा समय पड़ा है कलियुग के अवतार को आने में। फिर कोई क्यों उस अवतार की प्रतीक्षा में सिर खपाए? यही कारण हैं कि अधिकतर हिन्दु निश्चिंत जीवन जीने में लगे हैं। 

हम आपको दिखाएंगे युगों की कालावधी का सत्य और दिखाएंगे कि आवश्यक नहीं कि कलियुग की कुल अवधि 432000 वर्ष ही हो। बल्कि कभी भी वे हालात बन सकते हैं कि कलियुग का अवतार - कलकी अवतार यानी मेहदी - हमारे बीच आ जाए। यह भी मुमकिन है कि दुनिया कलियुग के उस अंतिम मुहाने पर पहुंच रही हो कि कलकी हमारे बीच आ चुके हों और हमने न पहचाना हो?

हिन्दु शास्त्रों के अनुसार चार युग हैंः सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग। यह चार युगों की साईकिल एक के बाद एक चलती रहती है। सतयुग यानी वह समय जब धर्म अपने चारों पग पर खड़ा था, जब अधर्म नाम की कोई चीज़ नहीं थी, पुण्य था 100 प्रतिशत और पाप की मात्रा थी शून्य प्रतिशत। मान्यता के अनुसार सतयुग की कुल अवधि 1728000 वर्ष है। 

त्रेता युग यानी जब धर्म अपने तीन पैरों पर खड़ा था, यानी जब पुण्य की मात्रा थी 75 प्रतिशत और पाप की मात्रा थी 25 प्रतिशत। मान्यता के अनुसार इस युग की कुल आयु है 1296000 वर्ष। 

द्वापर युग यानी जब धर्म अपने दो पैरों पर खड़ा था, यानी जब पुण्य की मात्रा थी 50 प्रतिशत और पाप की मात्रा भी 50 प्रतिशत थी। मान्यता के अनुसार इस युग की कुल आयु 864000 वर्ष की है। 

कलियुग में धर्म केवल एक पग पर खड़ा है। पाप की मात्रा बढ़ कर 75 प्रतिशत रह गई जबकि पुण्य की मात्रा मात्र 25 प्रतिशत रह गई। इस युग की कुल आयु 432000 वर्ष है। इन चारों युगों की अवधि जोड़ लें तो चारों युगों की कुल कालाव्धि 4320000 वर्ष हो जाती है। 

इस मान्यता के अनुसार कलियुग की अवधि चारों युगों की कुल आयु का केवल 10 प्रतिशत ही रह जाती है पर फिर भी इस युग की आयु 432000 होती है जिसमें अभी तक 5000 वर्षां से कुछ ऊपर ही गुज़रे हैं। फिर आखिर हिन्दु क्यों न निश्चिंत बैठें?

हिन्दु मान्यता के अनुसार सतयुग के अवतार हैं मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह। त्रेता युग के अवतार हैं वामन, परशुराम और राम। द्वापर युग के अवतार हैं कृष्ण और बुद्ध। जबकि कलियुग के अवतार होंगे कलकी। बड़ी विरोधाभासी बात यह है कि जहां मान्यता के अनुसार द्वापर का अंत और कलियुग की शुरूआत कृष्ण के दुनिया से जाने पर हो गई थी वहीं बुद्ध को द्वापर युग का अवतार माना जाता है। हम जानते हैं कि बुद्ध का जन्म 623 ईसा पूर्व हुआ था यानी कृष्ण के इस दुनिया से जाने के करीब 2500 वर्ष बाद। फिर या तो बुद्ध द्वापर युग के अवतार नहीं हैं या कृष्ण के जाने पर कलियुग के प्रारंभ होने की बात ग़लत है? या फिर इन चार कालों का भेद लोगों ने बस अपनी समझ से बना लिया है और इसका हक़ीक़त से कोई संबंध नहीं है? 

आईए, एक और पहलू पर नज़र डालते हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि कोई दिन या तारीख़ हो कि बस उस दिन से एक युग दूसरे में बदल जाए। यानी आज सतयुग है और कल से त्रेता युग आ जाए। बल्कि धीरे धीरे हालात बदले होंगे, ठीक वैसे जैसे कलियुग में हर अगली पीढ़ी पहलों से अधिक कुकर्मी और दुनिया में ग़र्क़ नज़र आ रही है। 

समझिए, जिस प्रकार इस युग की औसत आयु सौ वर्ष बताई गई है पर अधिकतर लोगों की आयु 100 वर्ष से कम होती है और बस कुछ की अधिक, उसी प्रकार जब कहा जा रहा है कि कलियुग में पाप की मात्रा 75 प्रतिशत होगी, तो ऐसे लोग भी होंगे जिनके पाप 100 में 90 होंगे या 100 में 100 होंगे और ऐसे भी होंगे जिनके पाप 40 से 60 अंक तक होंगे, या उससे भी कम होंगे। कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनके पाप 100 में 10 और पुण्य 90 होंगे लेकिन कुरान पुष्टि कर रहा है कि अंतिम ज़माने में ऐसे लोग बस कुछ ही रह जाएंगे।

हम पहले ही बता चुके हैं कि गीता के अनुसार मोक्ष यानी स्वर्ग में हमेशा का जीवन प्राप्त करने के लिए आवश्यक है उस मार्ग को समझना जो दिव्यात्माओं के मार्ग से आगे बढ़ कर परमात्मा और फिर ब्रहमण यानी अल्लाह तक ले जाए। जो इस मार्ग को समझ लेगा उसके यदि थोड़े गुनाह भी होंगे तो वे माफ कर दिए जाएंगे और वह हमेशा के लिए स्वर्ग मंे जगह पाएगा। 

प्रश्न यह है कि क्या कलियुग की कालाव्धि अस्ल में 432000 वर्ष होगी और यदि अभी कुल 5000 वर्ष ही बीते हैं तो क्या कलियुग की समाप्ति में अभी 427000 वर्ष बचे हैं? क्या हम आराम से बिना किसी चिंता के जिंदगी गुज़ारते रहें और कलकि अवतार करीब 432000 वर्ष पूरे होने के करीब होंगे तब आएंगे; उस समय जो लोग धरती पर हांेगे वे जानें। पर ऐसा नहीं है! और आप स्वयं देखेंगे कि सत्य कुछ और है।

The Times of India में 8 नवम्बर 2003 में छपा एक लेख जिसका शीर्षक था ‘Lord Ram was born in 5114 BC’ इस लेख में सरोज बाला जो कि एक IRS Officer और इंकम टैक्स कमिश्नर थीं, उन्होंने Astronomy, Internet और धर्मग्रन्थों में मौजूद जानकारी का अध्ययन करके यह साबित किया कि राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व में हुआ था। इस जानकारी तक पहुंचने के लिए उन्होंने साफटवेयर का भी प्रयोग किया और सितारों की जो स्थिति बताई गई थी जब राम का जन्म हुआ था उसका भी अध्ययन किया। इसका अर्थ यह हुआ कि राम का जन्म आज से करीब सात हजार एक सौ से कुछ अधिक वर्षों पहले हुआ था। 

यदि यह मानें कि कलियुग की शुरूआत कृष्ण के इस दुनिया से जाने यानी 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व में हुई तो इससे साबित होता है कि कलियुग की शुरूआत आज से करीब पांच हज़ार एक सौ से कुछ अधिक वर्षों पहले हुई। ज़रा सोचिए! राम अवतार हैं त्रेता युग के, और कृष्ण अवतार हैं द्वापर युग के। और हम देख रहे हैं कि राम के जन्म और कृष्ण के परलोक जाने के बीच का समय है 2012 वर्ष। आम मान्यता के अनुसार तो द्वापर युग की कुल आयु 864000 वर्ष होना थी। ऐसा कैसे हुआ कि जिस युग को 864000 वर्ष में समाप्त होना था वह केवल दो हज़ार वर्ष से कुछ अधिक समय में ही सिमट गया? 

गीता इस का उत्तर दे रही है जिसके अनुसार हमारे कर्म इस दुनिया को विनाश की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमें इस दुनिया में मनुष्य के रहने की कालाव्धि बढ़ानी है तो हमें फिर से अच्छे कर्मों की ओर पलटना होगा, फिर से सात्विक जीवन को अपनाना होगा और सत्य मार्ग के पथप्रदर्शकों को पहचानना होगा। 

अवतार मौहम्मद जब दुनिया में आए उस समय दुनिया किस बदहाली से गुज़र रही थी यह उस समय का इतिहास पढ़ कर आप की समझ में आ जाएगा। जब मौहम्मद और अन्य अहललबैत नवजात बच्चों के समान middle country में, जैसा वेदों और उपनिष्दों ने बताया था, एक बार फिर दुनिया में अवतरित हुए उस समय यदि समूची दुनिया का हाल देखा जाए तो हमें हर ओर केवल अंधकार ही देखने को मिलता है। एक खुदा की इबादत लोग भूल चुके थे। जीवन में बुराईयां घर चुकी थीं। इन दिव्यात्माओं ने एक बार फिर एक खुदा की इबादत की ओर मानवता को लाकर इस दुनिया की कालाव्धि को कुछ और आगे बढ़ाया अन्यथा शायद कलियुग भी द्वापर युग के समान दो तीन हज़ार वर्षों में ही सिमट गया होता।

यहां पर समझने की बात यह है कि एक युग के क़ानून दूसरे युग में लागू नहीं हो सकते। यही कारण है कि कुरान कहता है कि हमने हर ज़माने में और हर भाषा बोलने वालों में अवतार भेजे। कृष्ण यदि द्वापर युग के अवतार थे तो मौहम्मद कलियुग के लिए अवतार हैं जिन्होंने कलियुग में जन्मे लोगों के लिए शरियत पेश की। 

यही कारण है कि जब पेंगल उपनिषद लिखा गया तो उस समय दूसरा युग था। पाप की मात्रा कम थी और अधिकतर लोग पाप किया ही नहीं करते थे और जो कुछ उनके पास था उससे संतुष्ट थे। इसलिए कहा गया कि सब से बड़े पाप हैं ब्रहमण का वध, गुरू की पत्नी से संबंध, सोने की चोरी, शराब और यह चार पाप करने वालों से किसी प्रकार का संबंध रखना। उस समय और कोई कानून नहीं बनाया गया, क्योंकि आवश्यकता नहीं थी। लेकिन कलियुग में पाप की मात्रा बढ़ चुकी थी। अब सतयुग की शरियत लागू नहीं हो सकती थी। अधिकतर मनुष्य पापों में लिप्त थे। अब उन्हें राह पर लगाने के लिए सख़्त कानून बनाना आवश्यक था। अब उन्हें वे तरीक़े बताने थे जिस पर अमल करके वे अपनी आत्मा पर लगाम लगा सकते थे या उसे साध सकते थे।

कुरान भी इस बात की पुष्टि कर रहा है जब कह रहा है कि पिछले ज़माने में आगे बढ़ जाने वाले यानी मोक्ष प्राप्त करने वाले बहुत अधिक जबकि अगले ज़माने में बहुत कम। लेकिन स्वर्ग में जाने वाले पिछले ज़माने में भी अधिक और अगले ज़माने में भी अधिक संख्या में। यानी साफ है कि अंतिम ज़माने में मोक्ष पाने वाले बहुत कम संख्या में रह जाएंगे। अब आत्माएं गुनाहों के बोझ में ऐसा घिरी होंगी कि अधिकतर बस स्वर्ग के लेवल तक ही अपने को आगे बढ़ा पाएंगी। मोक्ष का लेवल उससे भी बड़ा लेवल है जिसका उल्लेख कुरान भी कर रहा है पर साफ कह रहा है कि अंतिम ज़माने में इस लेवल तक बस चुनिंदा लोग ही पहुंच सकेंगे। क्या कुरान का यह कथन उसके उसी सोर्स से होने की दलालत नहीं करता जिस सोर्स से पहले के अवतार और उनके द्वारा दिए गए स्क्रिपचर्स थे?

जब अवतार मौहम्मद ने अपनी शरियत पेश की तो उन चारों पापों की ही सज़ा दुनिया में रखी जिनके बारे में पेंगल उपनिषद ने बात की थी और उन्हें सबसे बड़ा पाप बताया था। अन्य पापों की सज़ा खुदा पर छोड़ दी। अंतर इतना था कि ब्रहमण के वध की जगह अब हर बेगुनाह का वध बड़ा पाप हो गया, सोने की चोरी की जगह हर प्रकार की चोरी, यहां तक कि रिश्वत और white-collared चोरी भी बड़ा पाप हो गया। गुरू की पत्नी से संबंध बनाने की जगह अपनी पत्नी या अपने पति के अतिरिक्त किसी से भी संबंध बनाना बड़ा पाप हो गया। और शराब का पीना भी बड़ा पाप हो गया। 

यदि आप अक़ल को साथ रखकर सोच रहे हैं तो समझिए कि सतयुग या त्रेता युग में जब अच्छाई की राह पर अधिकांश लोग थे और बुराई की राह पर बस थोड़े से लोग, उस समय तो सभी जानते थे कि अपनी आत्मा को उस राह पर कैसे लगाना है कि वो परमात्मा तक पहुंच जाए? हर कोई ध्यानमग्न रहना और खुदा के आगे सिर झुकाने और उसकी उपासना के तरीक़े जानता था। आत्मा को कैसे परमात्मा में विलीन किया जाए यह सबको पता था। उस समय क्या आवश्यकता थी यह बताने के लिए कि यदि तुम गुमराह हो जाओगे तो तुम को सज़ा मिलेगी? उस समय क्या आवश्यकता थी चोरी के लिए कानून बनाने की? या फिर आत्मा को साधने के तरीक़े बताने की? लेकिन जब जुलमत और तमस ने अपने पैर पसार लिए तो अब कलियुग में आने वाले अवतार के लिए आवश्यक हो गया कि बताए कि कैसे अपने को गुनाहों से बचाना है, कैसे जीवन व्यतीत करना है, क्या क्या करने से आत्मा को बेहतरी के मार्ग पर बढ़ाना है, कैसे नमाज़ के माध्यम से कम से कम दिन में पांच बार खुदा को याद करना है, कैसे और कितनी दान दक्षिणा देना है, कौन औरत महरम है और कौन नामहरम, और इनसे कैसे व्यवहार करना है, आदि। ताकि जिन बीमारियों ने तम्हारी आत्मा को जकड़ रखा है, तुम उनकी पकड़ से अपने को आज़ाद करके आत्मिक उत्थान की राहों पर कुछ आगे बढ़ सको। 

कुरान पहले आए अवतारों की पुष्टि कर रहा है लेकिन मौहम्मद, जो हर हाल में कलियुग प्रारंभ होने के काफी बाद आए अवतार थे, उन्होंने आत्मा को सही मार्ग पर लगाने के लिए सख़्त कानून बनाए, यही काफी है यह समझने के लिए कि वह उसी सोर्स के अवतार थे जिस सोर्स से पहले के अवतार आए थे। क्योंकि कलियुग के भटके हुए और गुमराह इंसान के लिए सख़्त कानून का होना अनिवार्य था। 

यह सब बातें तो उसी की समझ में आ सकती थीं जिसने अपने को रूहानी तरक़्क़ी की राह पर लगाया हो। पर पुस्तिका के लेखक का इस सब से क्या सरोकार? इसीलिए वह कहते हैं कि ‘मौहम्मद ऐसी मानसिक बीमारी से पीड़ित थे जिसके चलते वह रस्मो-रिवाज और कठोर नियमों को अपने विचारों से पैदा करते थे। इसी कारण मौहम्मद कठोर और हष्दयहीन जीवन जी रहे थे। उनके विचार बेतुके नियमों से भरे हुए थे।’

जो दो पैराग्राफ हमने पुस्तिका में से नक़ल किए थे उसमें एक आरोप और रह जाता है जिसपर अभी चर्चा करना बाक़ी है। यह आरोप मौहम्मद की 13 पत्नियों को लेकर है। पहले देखिए कि पुस्तिका के लेखक ने इस बाबत क्या लिखा हैः ‘मौहम्मद मानसिक तौर पर ऐसी बीमारी से ग्रस्थ थे जो मनुष्य के दिमाग में हार्मोन अधिक मात्रा में बना देती है। यह बीमारी मनुष्य की हड्डियां बड़ी कर देती है। हाथ पैर काफी रूखे हो जाते हैं। इस बीमारी से ग्रस्त लोगों में सैक्स करने की क्षमता और चाहत ज्यादा उत्पन्न हो जाती है, इसी कारण मौहम्मद में सैक्स करने की क्षमता व चाहत मरते दम तक बनी रही। मौहम्मद एक ही रात में अपनी 13 बीवियों के साथ सैक्स करते थे जबकि वह 50 वर्ष से ऊपर के हो चुके थे। ज्यादा बीवियां होने के कारण उनकी बीवियों को कोई दूसरा हासिल न कर ले इसलिए उन्होंने इस्लाम में अल्लाह की तरफ से पर्दे यानी बुरखे का रिवाज शुरू कर दिया  और उनकी बीवियां किसी दूसरे के साथ यौन संबंध न करने पाएं इस कारण उन्होंने अपनी बीवियों को इस्लाम के मानने वालों की मां का दर्जा दे दिया  क्योंकि मौहम्मद द्वारा बनाए गए इस्लाम में सिर्फ मां एक ऐसा रिश्ता है जिसके साथ यौन संबंद नहीं बनाए जा सकते।’

जिस प्रकार कुरान या गीता केवल उस व्यक्ति की समझ में आ सकती हैं जो अपने को रूहानी मार्ग पर लगाए हो, उसी प्रकार इन महापुरूषों का जीवन भी उसी की समझ में आ सकता है जो रूहानी राहों का मुसाफिर हो। 

एक ओर कुरान कह रहा है कि यदि तुम्हें दो मार्ग साफ साफ बता दिए गऐ थे तो तुम उस मार्ग पर क्यों नहीं चले जिस पर तुम्हारी बेहतरी थी तो दूसरी ओर गीता भी कह रही है कि एक खुदा की ओर अपनी तमाम सोच और इंद्रियों को केंद्रित करके रूहानी चढ़ाई पर आगे बढ़ते जाओ, यही तुम्हारी बेहतरी का रास्ता है। 

Gita.XII.9:

If you are unable to fix your thoughts steadily on Me, then by means of unitive ascent (yoga of practice) seek to reach Me, O Dhanamjaya (Arjuna).

यहां पर ग़ौर करने की बात यह है कि हिन्दु मान्यता के अनुसार विभिन्न युगों में स्त्री और पुरूष के रिश्ते भी बदलते रहे। सतयुग में स्त्री और पुरूष को आपस में रिश्ता बनाने के लिए कोई नियम और कानून नहीं था, मनुष्य स्वाभाविक रूप से आत्म-सुधार और आध्यात्मिक विकास की ओर झुका हुआ था और स्वाभाविक रूप से स्वस्थ, ज़िम्मेदार और प्रेमपूर्ण तरीक़े से रिश्ते बनाए जाते थे, तथा एक ही समय में एक से ज्यादा लोगों के साथ रिश्ते बनाए जाते थे, सबके मन में प्रेम थे और पाप की मात्रा शून्य थी। वहीं त्रेता युग में विवाह का प्रचलन प्रारंभ तो हुआ पर एक पुरूष कई स्त्रियों से और एक स्त्री कई पुरूषों से विवाह कर सकती थी। द्वापर युग आने तक एक स्त्री के कई पुरूषों से विवाह करने की प्रथा तो समाप्त हो गई लेकिन एक पुरूष कई पत्नियां रखता था। यहां तक कि कृष्ण की पत्नियों की संख्या हज़ारों में थी, एक वर्णन के अनुसार 16100। पुराण में हमें ऐसे वर्णन भी पढ़ने को मिल जाते हैं कि एक बूढ़े ऋषि ने जो अपने पैरों पर चलने में भी असमर्थ था किसी राजा की 50 पुत्रियों से एक साथ विवाह कर लिया और 50 की 50 पत्नियों के लिए 50 आलीशान महल बनवाए। इस युग में शादी शपथ या प्रतिज्ञा लेने के समान थी। खुदा को साक्षी मान कर या प्रतिज्ञा लेकर शादी हो जाती थी। यानी इस युग में स्त्री और पुरूष का मिलन त्रेता युग से आसान था, इस युग में पाप बढ़ चुका था इसलिए नारी शोषण, नारी अपमान की बहुत सी बातें उस समय लिखे गए काव्यों आदि में मिल जाएंगी। 

यहां पर समझने की बात यह है कि सतयुग के कानून सतयुग के लिए थे और कलियुग के कानून कलियुग के लिए हैं। आप सतयुग के बनाए कानून कलियुग में लागू नहीं कर सकते और न ही द्वापर युग के, भले ही कानून बनाने वाली हस्तियां एक ही हों।

कृष्ण की 16100 पत्नियां थीं, लेकिन आज क्या आपको 16 पत्नियां रखने की भी इजाज़त मिल सकती है? नहीं, क्योंकि एक युग के कानून दूसरे युग में लागू नहीं हो सकते। इसीलिए कुरान कहता है कि हमने हर ज़माने में और हर भाषा बोलने वालों में अवतार भेजे। 

कृष्ण और बुद्ध यदि द्वापर युग के अवतार थे तो मौहम्मद कलियुग के लिए अवतार हैं जिन्होंने कलियुग के लोगों के लिए शरियत पेश की। प्रश्न यह उठता है कि यदि कृष्ण की 16100 पत्नियां थीं और कृष्ण के समय, जैसा महाभारत और पुराण में मिलता है, बहुत सारे लोग ऐसे थे जिनकी कई कई पत्नियां थीं तो फिर वह कानून कब आया जब केवल एक पत्नी तक सीमित रहने के लिए हिन्दुओं से कहा गया। कृष्ण के बाद तो बुद्ध आए, और कोई अवतार तो आया नहीं, और कृष्ण के बाद बुद्ध ने कभी भी पत्नियां कितनी हों और कितनी न हों, इस पर बात नहीं की। 

फिर आपको मानना पड़ेगा कि एक पत्नी तक सीमित रहने का कानून धर्म गुरूओं ने अपनी इच्छानुसार बनाया और किसी डिवाईन अवतार ने इस कानून को पेश नहीं किया। इसके बाद भी अकबर से लेकर रंजीत सिंह तक, या फिर मंगोलों से लेकर उसमानी खलीफाओं तक, जहां भी पुरूष के पास ताक़त और दौलत हुई, अधिक पत्नियां रखने की ओर वह आगे चल दिया। भारत जैसे देश में जहां अधिकतर एक ही पत्नी तक सीमित रहने पर पाबंदी है, वहां भी ताक़त और दौलत रखने वाले शादी तो एक ही करते दिखाई देते हैं पर अनेक हैं जो विवाह के बंधन के बाहर रिश्तों में डूबे दिखाई पड़ते हैं। कुछ नहीं बन पाता तो थाइलैंड जैसे किसी देश की यात्रा ही कर आते हैं। यह शायद मनुष्य प्रवृत्ति है। 

यही कारण है कि इस्लाम ने विवाह की संख्या बढ़ाई नहीं बल्कि घटाई, लेकिन एक तक सीमित नहीं किया। न ही इस्लाम ने सैक्स को कोई टैबू समझा और न ही उसको निषेध किया। बल्कि सैक्स को विनियमित करके इस प्रवृत्ति को भी इज़्ज़त थी। क्योंकि जो दिव्यात्माएं मानव प्रकृति बनाने की जिम्मेदार थीं, वही तो कानून बना रही थीं। 

इस्लाम ने शादी के बंधन से जुड़ी किसी महिला के अतिरिक्त किसी दूसरी महिला की ओर आंख उठाने तक पर पाबंदी लगा दी। औरत को बुरख़ा पहना कर इस्लाम ने घर की चारदिवारी में नहीं बिठाया बल्कि ऐसा करके मुसलमानों में से male chauvinistic सोच रखने वालों ने महिला को ज्ञान अर्जित करने और समाज में बराबरी का रोल अदा करने से दूर कर दिया। अन्यथा अवतार मौहम्मद की पत्नियां या पुत्री तो घोड़े या ऊंट पर सवारी भी करती थीं और पब्लिक के बीच व्याख्यान या भाषण भी देती थीं। ख़दीजा स्वयं बड़ी व्यापारी थीं।

इस्लाम ने पर्दा औरत और मर्द दोनों के लिए बनाया है। यदि औरतें अपना अंग प्रदर्शन नहीं कर सकतीं तो मर्द भी नहीं कर सकते। हां औरतों को कुछ अधिक अंग छिपाने को कहा गया है। यह आवश्यक था, इससे कोई भी इंकार नहीं करेगा। कपड़े हों और ऐसे हों कि छिपाने वाले अंग प्रदर्शित हो रहे हों, तो यह भी जाएज़ नहीं। मर्द को नामहरम औरत की ओर आंख उठा कर देखने को भी मना किया गया है। यदि एक बार नज़र पड़ जाए दो दूसरी नज़र डालने की मनाई है। इस बंधन में तो मर्द को बांधा गया है, न कि औरत को। यदि मर्द या औरतों में से कोई वह जिम्मेदारी पूरी न करे जो उसे सौंपी गई है तो इसमें इस्लाम या मौहम्मद की शिक्षा का क्या दोष? 

राम की ज़िन्दगी से एक उदाहरण देखते हैं जो मर्यादाओं एवं उसूलों का पालन करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी ज़िन्दगी हम देखें तो वह मर्यादाओं एवं उसूलों के लिए हर समय कुरबानी देते नज़र आते हैं। यहां तक कि अपने आराम की कुरबानी, अपनी पत्नी से जो रिश्ता हो सकता था, उसकी कुरबानी, तमाम तरह की कुरबानी राम ने दी तो केवल मर्यादाओं के पालन की ख़ातिर, उसूलों की ख़ातिर, सच्चाई के मार्ग पर चलने की ख़ातिर। वह अपने सकून और खुशियों को त्याग करने के लिए तय्यार थे - हर लम्हे - लेकिन उसूलों पर आंच नहीं आने देते थे। 

Chastity यानी पाकदामिनी यदि रिश्तों में है तो मर्यादा या उसूल यह है कि सीता पर एक लांछन सही, एक इल्ज़ाम सही, लेकिन पति पत्नी के रिश्ते की पाकीज़गी की अहमियत को बताना ज़्यादा आवश्यक समझा। बहुत आसान था राम के लिए कि एक ग़रीब धोबी के इल्ज़ाम को अंदेखा कर देते। आज के शासक होते तो रात के अंधेरे में धोबी ग़ायब करा दिया जाता या अनजाने तरीक़े से उसकी मौत हो जाती। लोभ से या डरा कर उसकी आवाज़ को ख़ामोश किया जा सकता था। लेकिन राम ने ऐसा नहीं किया। एक चाहने वाली पत्नी, जो राम के बच्चों को गर्भ में पाल रही थी, और यह जानते हुए कि वह पाकदामन थी, उस धोबी के इल्ज़ाम के कारण उसको अग्नि परीक्षा से गुज़ारा। इस धोबी की स्वयं की पत्नी कुछ समय तक गायब रही थी, जिसके फलस्वरूप उसने अवतार राम की पत्नी पर भी आरोप लगाने की कोशिश की। 

खुदा की ओर से आए अवतार से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह एक छोटा सा भी मैसेज ऐसा जाने दे कि जो हक़ और इंसाफ और मर्यादाओं के खिलाफ हो।

राम यह जानते थे कि वह हक़ पर हैं, यह जानते थे कि उनकी सौतेली मां ने साज़िश के तहत उन्हें वनवास में भेजना चाहा, राम के पिता भी जान रहे थे कि राम उनके सच्चे उत्तराधिकारी हैं, राम चाहते तो वनवास को जाते ही नहीं, पिता के सामने खड़े हो जाते, लेकिन पिता से या भाई से लड़ना पसंद नहीं किया, बल्कि अपनी राहत और आराम की कुरबानी देते हुए जंगल की राह ली। वह बहादुर योद्धा जिसने रावण की लंका को जला कर राख कर दिया, वह अपने पिता के एक हुक्म के आगे सिर झुकाए नज़र आता है हालांकि वह अच्छी तरह जान रहे थे कि वही राजसिंहासन के असली वारिस हैं। पर राजसिंहासन राम के लिए कोई मायनी नहीं रखता था क्योंकि वह हक़ के परस्तार थे। कुर्सी या दुनियावी ताक़त और राहतों को त्याग दिया अपने उसूलों की ख़ातिर। 

आज हम उन्हीं राम का नाम लेकर कैसे दुनिया की हवस पूर्ती में लगे हैं, इसमें क्या राम या उनकी शिक्षा का कोई दोष है?

जिस प्रकार राम जान रहे थे कि राजसिंहासन पर हक़ उनका है लेकिन उसके बावजूद वनवास में जाना पसंद किया उसी प्रकार राम यह भी जान रहे थे कि उनकी पत्नी पाकदामन है, फिर भी उसको अग्निपरीक्षा से गुज़रने को कहा। वह एक ऐसा मैसेज नहीं देना चाहते थे समाज को कि राम ने एक धोबी के लांछन को नज़रअंदाज़ कर दिया। यह है असली रामराज्य जिसमें समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग की भी आवाज़ का इतना महत्व था कि उस समय के राजा ने अपनी खुशियों को त्याग दिया।

यही रिश्तों की पाकदामिनी हमें और भी जगह देखने को मिलती है। लक्ष्मण जो राम और उनकी पत्नी के साथ साथ वनवास पर गए, जब रावण सीताहरण करके ले गया तो लक्ष्मण कहते हैं कि मैं उनको कैसे पहचानूंगा जबकि मैं ने आज तक अपनी भाभी की शकल भी नहीं देखी और मेरी नज़र आज तक भाभी के चरणों से ऊपर नहीं गई। याद रहे कि जंगल में कई वर्षों से राम, लक्ष्मण और सीता साथ साथ विचर रहे थे जब लक्ष्मण ने ऐसा कहा। क्या यह हमें इस्लाम के कानून की याद नहीं दिलाता कि किसी नामहरम पर दूसरी निगाह डालना ग़लत है। यहां तो लक्ष्मण ने अपनी आंखों को ऐसे झुकाए रखा कि एक निगाह भी भाभी के चेहरे पर नहीं पड़ी। क्या यह रिश्तों की पाकदामिनी नहीं दर्शाता? 

हमें समझना पड़ेगा कि मर्यादाओं का पालन इस लेवल पर था उस घराने में कि देवर और भाभी तक एक दूसरे की ओर नहीं देखते थे। अफसोस कि पुस्तिका के लेखक अवतार मौहम्मद द्वारा रिश्तों को पाक रखने के लिए दिए गए निर्देशों का उपहास उड़ा रहे हैं और यहां तक कह रहे हैं कि मां के अतिरिक्त सब के साथ इस्लाम सहवास की अनुमति देता है जो कि निरा झूठ है। इस्लाम ने 9 रिश्ते बताए हैं जो महरम हैं, यानी जिनकी ओर मर्द निगाह उठा कर देख सकता है। इसके अतिरिक्त तमाम रिश्ते नामहरम हैं। नामहरमों में यदि कोई गैरशादीशुदा है तो उससे शादी भी हो सकती है। पर ऐसा कहना कि किसी से भी सहवास हो सकता है, पुस्तिका के लेखक की अपनी मानसिकता दर्शाता है।

जब सीता को रावण उठा कर ले गया तो अपने पैर के अंगूठे में जो बिछिया या मैट्टी पहना करती थीं, उन्होंने उसको फेंका ताकि यदि लक्ष्मण भी ढूंढने आएं तो वह पहचान सकें कि यह भाभी की बिछिया है। देवर और भाभी, भाई भाई और पति पत्नी के पाक रिश्तों का यदि किसी पुस्तिका का लेखक उपहास उड़ाने लग जाए जैसा कि उपरोक्त पुस्तिका का लेखक अवतार मौहम्मद का उपहास उड़ाने की कोशिश कर रहा है तो आप को कैसा लगेगा? हमारे लिए राम और कृष्ण की जो इज्ज़त है उसके चलते उदाहरण स्वरूप ही सही, हम उन हस्तियों से जोड़ कर कुछ भी ग़लत नहीं कहना चाहते। जो जो कुछ झूठ पुस्तिका के लेखक ने अवतार मौहम्मद के लिए गढ़ा है, वही वही झूठ किसी के लिए भी गढ़ कर ब्यान किया जा सकता है। लेकिन हमारे लिए तो राम और कृष्ण, ईसा, मूसा और मौहम्मद सब एक ही सोर्स से आए अवतार थे।

कृष्ण ने जब इस दुनिया को त्यागा, उस समय भी उनकी तमाम 16100 पत्नियां मौजूद थीं। मान्यता है कि कृष्ण के बाद कुछ पत्नियों ने सती होकर अपनी जान दे दी। अन्य पत्नियों को अर्जुन लेकर हस्तिनापुर जा रहे थे कि डाकुओं ने हमला कर दिया और फिर कृष्ण की उन पत्नियों का कुछ पता नहीं चला। मैं तो मानता हूँ कि डाकुओं के इस हमले के पीछे भी खुदा की कुछ मसलहत या भलाई छिपी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि कृष्ण का चाहने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं चाहेगा कि कृष्ण की पत्नियों में से कोई किसी आम व्यक्ति से विवाह करे। ऐसे में यदि कुरान ने अवतार मौहम्मद की पत्नियों को तमाम मोमिनीन की मां बता दिया तो क्या ग़लत किया? क्या तुम चाहते हो कि उनसे अपेक्षा रखी जाती कि वे सती हो जाएं?

इन हक़ीक़तों को न समझ पाने के कारण पुस्तिका का लेखक लिखता हैः ‘उनकी बीवियां किसी दूसरे के साथ यौन संबंध न करने पाएं इस कारण उन्होंने अपनी बीवियों को इस्लाम के मानने वालों की मां का दर्जा दे दिया।’

जो लोग कष्ष्ण की 16100 पत्नियों के होने को यह कह कर छिपाते हैं कि उनकी अस्ल में केवल 8 पत्नियां ही थीं, और बाक़ी अन्य उन्हें मजबूरीवश अपनाना पड़ी थीं, वह भूल जाते हैं कि कृष्ण के शरीर में जो दिव्यात्मा काम कर रही थी वह भी इंसानी नेचर को बनाने वाली आत्मा थी और यह कैसे मुमकिन था कि कृष्ण हज़ारों युवतियों से विवाह करके अपना तो बना लेते परन्तु उनसे कोई शारिरिक रिश्ता नहीं बनाते या उनकी शारिरिक या अन्य आवश्यकताओं की पूर्ती न करते? यह उन तमाम युवतियों के साथ अन्याय होता। 

यही कारण है कि पुराण आदि में जहां कृष्ण की 16100 पत्नियों का उल्लेख है वहीं उनके एक लाख से अधिक पुत्रों का भी उल्लेख है। बल्कि एक जगह तो यहां तक मिलता है कि नारद को जानने की इच्छा हुई कि कृष्ण किस पत्नी के साथ हैं तो वह मायावी तरीक़े से एक एक करके सब के पास गए। उन्होंने एक ही रात में कृष्ण को हर पत्नी के पास पाया। यह चमत्कार था जो कृष्ण दिखाना चाहते थे ताकि अंतिम ज़माने तक का मनुष्य जान ले कि रसूल यानी अवतार के शरीर में जो भी दिव्यात्मा काम कर रही है वह तमाम मानवता के क्रिएशन की ज़िम्मेदार है और उसको अपना जैसा समझने की ग़लती न करना। यदि करोगे तो या तो उससे जुड़ी बातों को झुठला दोगे या फिर ऐसी ही बेबुनियाद बातें बनाने लग जाओगे कि अमुक बीमारी के कारण हारमोन अधिक बन रहे थे, या सैक्स की क्षमता अधिक पैदा हो गई थी। 

सारे हिन्दु यदि शिव और शक्ति के नाम पर शादी करते हैं और शिव का मनुष्य के क्रिएशन में कोई रोल मानते हैं, फिर यदि मानव शरीर में शिव अवतरित हों तो क्या उनको अपने जैसा समझने की ग़लती करोगे? यह हस्तियां तो वे हैं जो हर ज़माने में इंसानी नेचर को समझते हुए कानून बनाती रहीं पर जब यह स्वयं मानव शरीर में अवतरित हुईं तो तुम इन्हें कानून के दायरें में सीमित रखने की बात करते हो। 

आप आगे देखेंगे कि अवतार मौहम्मद ने किन परिस्थितियों में किन औरतों से विवाह किया था। उनमें अधिकतर बहुत बूढी थीं या विधवा थीं। आयशा से कमउम्री में शादी अवश्य की थी पर उनकी शादी जिस व्यक्ति से तय थी उसने इसलिए शादी तोड़ दी थी कि आयशा के पिता मुसलमान हो गए थे। यदि ज़ैद की पत्नी से शादी की तो वह भी इसलिए कि जैद की उससे नहीं निभ पा रही थी और रिश्ता तलाक़ तक पहुंच गया था। शादी की तो तलाक़ होने के बाद ही। इस पर मेरा एक लैक्चर ‘क्या कुरान बेटे की पत्नी से शादी करना जाएज़ करता है? Does Quran allows marriage with daughter-in-law?’ आप The True Voice यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं।

यह भी कितना बड़ा झूठ है कि ‘मौहम्मद द्वारा बनाए गए इस्लाम में सिर्फ मां एक ऐसा रिश्ता है जिसके साथ यौन संबंद नहीं बनाए जा सकते।’ इस्लाम तो यदि एक महिला से शादी हुई है तो उसके रहते उसकी बहन तक से शादी को नाजाएज़ करता है। अनेक रिश्ते हैं जिनसे किसी भी हालत में शादी नहीं की जा सकती। इसमें बहन, बेटी, पोती, मां, दादी, मौसी, फुफी, भांजी, भतीजी आदि तमाम खूनी रिश्ते हैं। हां यह अवश्य है कि हिन्दुओं से विपरीत इस्लाम ने cousin से शादी की इजाज़त दी है। हालांकि हिन्दुओं के भी कुछ गुट ऐसे हैं जहां cousins से शादी होती है, ऐसे भी गुट हैं जहां बहन की पुत्री पर पहला हक़ मामा का होता है और यदि मामा शादी नहीं करता तब कहीं और शादी होती है। लेकिन वहां रीति रिवाज या प्रथा के नाम पर लोग आलोचना नहीं करते। जबकि इस्लाम से दुश्मनी में यही लोग उसके बनाए हर कानून की आलोचना करने लग जाते हैं, भले ही वह कानून मानव हित में ही क्यों न हो।

बड़े दिन पहले की बात है मशहूर मैगज़ीन India Today में एक लेख छपा था जिसमें अनेक युवक और युवतियों से बातचीत के आधार पर यह दिखाने की कोशिश की गई थी कि अधिकांश नवजवान युवकों और युवतियों का पहला यौन संबंध cousins से बनता है क्योंकि यह वह रिश्ता है जो कुछ दूरी का तो है पर क़रीबी होने के कारण cousin को घर के अन्दर तक ले आता है। इस्लाम ने इस को समझते हुए cousin को नामहरम क़रार दिया और उससे शादी जाएज़ कर दी। 

यहां पर यह समझना आवश्यक है कि खुदा के नाम पर किसी से जाएज़ रिश्ता बनाना शादी है। अन्यथा इससे बाहर यदि कोई रिश्ता बनाना चाहे तो कौन रोक सकता है? यदि कोई रोकेगा तो सिर्फ धर्म या नैतिक मूल्य। जो व्यक्ति भी अपनी अक़ल से सृष्टी के एक खुदा को मानता है और मौहम्मद को उसका रसूल और अवतार मानता है, वही तो मौहम्मद के बताए कानून पर चलेगा। जब अल्लाह को सारी सृष्टि का ख़ालिक़ यानी रचयिता मान लिया और अपनी अक़ल से मौहम्मद को उसकी ओर का रसूल यानी अवतार मान लिया तब यदि तुम उसकी क़ुदरत और ताक़त के घेरे से निकल सको तब जो चाहे करो, अन्यथा तुम्हारे लिए यही बेहतर है कि जैसा जीवन व्यतीत करने को कहा जा रहा है, वही करो, क्योंकि उसी में तुम्हारी भलाई है। 


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