Sunday, 30 August 2026

अवतार मौहम्मद भाग 1-K: गुमराह मुसलमान

गुमराह मुसलमान

आगे बढ़ते हैं और देखते हैं के पुस्तिका का लेखक क्या कुछ और लिख रहा है। अगला पैराग्राफ कहता हैः ‘दुनिया में इस्लाम के अलावा किसी और कारणों से इतना खून नहीं बहाया गया है जिनता इस्लामिक कटटरवाद ने बहा दिया। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक़ अकेले भारत में ही इस्लाम की तलवार से 8 करोड़ हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया, फ्रांस मिस्र और कई देशों में जहां लुटेरे मुसलमानों का आक्रमण हुआ लाखों लोगो को काट डाला गया, गैर-मुसलमानों के सामुहिक क़त्ल का वह सिलसिला उस वक्त तो चला ही जब यह लुटेरे हमला कर रहे थे इसके बाद भी सदियों तक यह जारी रहा और यह खून खराबा आज भी जारी है।’

यह पैराग्राफ शायद इस पूरी पुस्तिका का अकेला पैराग्राफ है जहां मैं पुस्तिका के लेखक से कुछ हद तक सहमत हूँ। अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत द्वारा बताया गया इस्लाम उन मुसलमानों के इस्लाम से बहुत भिन्न है जो बाद के मुसलमानों ने समझा और अपनाया। हालांकि यह समझने के लिए भी हम को इस समस्या को कई रूख से देखना होगा।

इस तथ्य को समझने के लिए पहले कृष्ण की ज़िंदगी के कुछ पहलू एक बार फिर देखते हैं। यदि आप समझते हैं कि जिस समय कृष्ण अवतार के रूप में अपनी शिक्षा पेश कर रहे थे उस समय तमाम लोग उनकी उच्च शिक्षा का आंख बंद करके अनुसरण कर रहे होंगे, तो आप ग़लत हैं। जबकि कृष्ण कलियुग के अवतार नहीं थे जब बुराईयां अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी हैं और अपनी आत्मा को साधने की कोशिश करते हुए उसको उत्थान के मार्ग पर लगाने वाले बस कुछ ही लोग बचे हैं। 

हम जब पुराण पढ़ते हैं तो साफ हो जाता है कि कृष्ण के समय के अधिकांश लोग उन के दिव्य रोल को पहचान पाने में असमर्थ थे। आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि यह मुमकिन नहीं है; जब करोड़ों लोग आज कृष्ण के लिए बहुत आदरभाव रखते हैं तो यह कैसे मुमकिन है कि स्वयं उनके समय में लोग कृष्ण के मार्ग को नहीं समझ पा रहे थे? 

सत्य यही है कि कृष्ण के समय में उनके मार्ग को अपनाने का अर्थ था अपने पहले के जीवन में बदलाव लाना, बाप दादा से मिली बहुत सी मान्यताओं और धर्म के ग़लत समझे गए उसूलों को तर्क करना और ज़िन्दगी में अधिकाधिक सात्विक कर्म करते रहना। परमात्मा और एक खुदा में इस तरह रमे रहना कि दुनिया के तमाम काम केवल उसको समर्पित करके ही करना। कृष्ण स्वयं कहते हैं कि उनके समय के लोग धर्म के नाम पर कुछ रस्में निभाने के अतिरिक्त केवल विभिन्न प्रकार के मनोरंजन में अपनी ज़िंदगी व्यतीत कर रहे थे। क्या यह सब करते हुए कृष्ण के मार्ग पर आना मुमकिन था? नहीं, बल्कि इस सब को तर्क करके कृष्ण के मार्ग को अपनाना था।

हम पहले आप को दिखा चुके हैं कि कैसे कृष्ण के आसपास के लोगों ने उन पर रत्न चोरी का आरोप लगाया, उनके सब से क़रीबी मित्र भी जम्बावत की गुफा में उन्हें अकेला छोड़ कर भाग आए और एक समय आया कि अनगिनत राजाओं ने एका करके अपनी सेनाओं को कृष्ण और उनकी शिक्षा का गला घोंटने हेतु महाभारत के युद्ध में भेज दिया। इस धर्म युद्ध में कृष्ण की यदि पराजय हो गई होती तो न आज गीता होती और न उनकी शिक्षा। ठीक वैसे जैसे यदि बद्र में अवतार मौहम्मद क़त्ल हो गए होते तो न तो कुरान होता, न मुसलमान और न अल्लाह की इबादत करने वाले।

केवल चैसर के खेल का ही उदाहरण देखिए। खेल में न केवल सारी धन दौलत दांव पर लगाई जाती थी बल्कि स्वयं की पत्नी तक को दांव पर लगा दिया जाता था। क्या इससे साबित नहीं होता कि उस ज़माने में भी औरत केवल प्रापर्टी से अधिक कुछ नहीं थी। जिस राजदरबार में एक बेसहारा नारी के वस्त्र उतारे गए उस में द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह जैसे गुरू एवं पंडित मौजूद थे। बहुत से अन्य ब्रहमिण भी यक़ीनन रहे होंगे। लेकिन किसी ने आपत्ती नहीं दिखाई। इसके विपरीत यह सब उन्हीं कौरवों को युद्ध के लिए उकसाते नज़र आते हैं जिन्होंने पांडवों को धोके से मात देकर सत्ता क़ब्ज़ाई थी। 

जिस धर्म पर यह लोग चल रहे थे वह वैसा ही धर्म था जैसा आज के बहुतेरे लोग मानते हैं। वह यह कि धर्म के नाम पर कुछ रस्में तो निभाते हैं लेकिन वह धर्म उनको आत्मिक उत्थान के मार्ग पर ज़रा भी आगे नहीं बढ़ाता। बल्कि दीवाली के दिन रस्मी तौर पर चैसर जैसा कोई खेल खेल कर पैसा दांव पर अवश्य लगाते हैं। यदि इन्होंने कृष्ण के वक्तव्य को ठीक ठीक समझा होता कि लोग धर्म के नाम पर कुछ रस्में निभाने के अतिरिक्त केवल मनोरंजन में गर्क हैं तो ऐसा नहीं करते। यह तो अपने आचरण से उस रस्म को आज भी मान्यता दिए पड़े हैं जिस के कारण पांडवों को वनवास में जाना पड़ा और उसके पूर्व द्रोपदी की भरे दरबार में रूसवाई हुई।

ऐसी ही अनेक रस्मों में आज मुसलमान भी डूबे हैं। कितने लोग तो नमाज़ या रोज़ा भी रस्म के तौर पर अदा करते हैं जबकि मैंने आप को अवतार मौहम्मद की हदीस पेश की है जिसके अनुसार यदि मुसलमान चाहता है कि जाने कि उसकी नमाज़ कुबूल हुई कि नहीं तो उसे यह देखना होगा कि नमाज़ के बाद उसमें कोई अच्छाई पैदा हुई कि नहीं। यानी हमारा हर कर्म, यदि वह अल्लाह और उसके Divine Creation Plan को याद रखते हुए किए जा रहा हो, तो वह इबादत है और यदि वह करते समय हमारी आत्मा दुनिया की चिंता में है तो वह कर्म दुनियावी कर्म है। यह बात केवल इबादत पर लागू नहीं होती, बल्कि हम अपने व्यापार या जाॅब को, बीवी या बच्चों के लालन-पोषण को, मित्रों और समाज में रिश्ते निभाने को - सब को इबादत बना सकते हैं यदि Divine Creation Plan को याद रखते हुए ऐसा कर रहे हैं। 

बहुतेरे मुसलमान वर्षों नमाज़ें पढ़ते रहते हैं परन्तु उनके चरित्र में कोई बदलाव नहीं आता। यही बात रोज़े या अन्य इबादतों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को स्वयं आकलन करना होगा कि इनकी इबादतें कुबूल हो रही हैं कि नहीं? कृष्ण के मानने वालों को भी समझना होगा कि उनका नाम जपने से लाभ नहीं होने वाला यदि हम अपने को उनकी शिक्षा का सच्चा अनुयायी नहीं बना पा रहे हैं। आज भी यदि कृष्ण की शिक्षा पर पूरी तरह से चलना आवश्यक हो जाए तो अपने को उनका अनुयायी कहने वाले बहुत से लोग उनका साथ छोड़ देंगे। क्योंकि कृष्ण हों या मौहम्मद, दोनों में से किसी के भी मार्ग पर चलने का अर्थ है केवल और केवल सात्विक जीवन व्यतीत करना, एक खुदा के रास्ते को समझते हुए बस कर्म करते जाना - बिना किसी फल की चिंता किए हुए - हर इंसान को बराबर समझना भले ही वे ब्रहमिण हो या किसी और ज़ात का, या जैसा गीता ने कहा भले ही कुत्ते का मास खाने वाला ही क्यों न हो। या यूँ कहें भले ही वह मुसलमान ही क्यों न हो! हमेशा सत्य और इंसाफ का साथ देना भले ही उस के लिए कुछ कुरबानियां देना पड़ें। कृष्ण तो जान तक की कुरबानी देने की बात कर रहे हैं। 

कृष्ण या मौहम्मद के मार्ग पर चलने वाला न तो रिश्वत ले सकता है न दे सकता है, न कालाबाज़ारी कर सकता है, न झूठ बोल सकता है, न रिश्तों की पवित्रता को भुला सकता है, न किसी पर जुल्म कर सकता है, न किसी के साथ नाइंसााफी कर सकता है और न दूसरे का हक़ मार सकता है। वह न तो हिंसा का पथ अपना सकता है और न ही रजसिक या तमसिक कर्मों को अपनी ज़िंदगी में स्थान दे सकता है।

यहां एक और तर्क देते हैं यह समझने के लिए कि अवतार मौहम्मद ने जो इस्लाम बतलाया उसमें do's and don'ts इतने क्यों हैं? कृष्ण वह मील का पत्थर हैं जिनकी बातों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। कृष्ण के समय तक बहुतेरे लोग सत्यमार्ग से बहक चुके थे। अब आवश्यक था कि कृष्ण सात्विक, रजसिक और तमसिक कर्मों की भी बात करें, अर्जुन को दिखाई गई परमात्मा की इमेज में इन लोगों को आग में भस्म होता दिखाएं और नर्क की भी बात करें। बल्कि यहां तक कहें कि सामने जो लोग हैं इनकी आत्मा पहले ही मर चुकी है और यदि अर्जुन इन का सफाया कर देते हैं तो वह केवल एक औपचारिकता होगी कि इन का हिलता डुलता शरीर शांत हो जाए। 

अवतार मौहम्मद, जैसा हम बता चुके हैं, कलियुग के अवतार थे जब आत्माएं गिरावट के उस कुएं में पहुंच चुकी थीं कि अब उनका बाहर निकलना बहुत कठिन था। यह तो अहललबैत की शिक्षा की शक्ति और प्रभाव था कि एक बार पुनः अनेक लोगों ने सात्विक मार्ग अपनाया, जिसका असर हमें काफी समय तक देखने को मिलता है। 

बहुतेरे लोग उसी प्रकार अवतार मौहम्मद के मार्ग को नहीं समझ पाए जैसे कृष्ण की शिक्षा को नहीं समझ पाए। वह इसलिए क्योंकि जैसा मैं बता चुका हूँ, गीता या कुरान की शिक्षा को समझने के लिए आत्मा का पाकीज़गी की किसी मंज़िल पर होना आवश्यक है। यह गीता और कुरान दोनों से साबित है। यदि आत्मा पाकीज़गी की उस मंज़िल पर नहीं है, तो सत्यमार्ग की समझ नामुमकिन है। 

यही कारण है कि कृष्ण के बाद आने वाले समय में जब बुद्ध ने देखा कि लोग गुमराही में बहुत आगे तक बढ़ गए हैं लेकिन फिर भी खुदा और उसके पथ पर चर्चा करते हैं, परमात्मा है कि नहीं इस पर बहस करते हैं और इसी प्रकार बहुतेरे वैचारिक मतभेदों में घिरे हैं, परन्तु आत्मा किसी गहरे कुएं से बाहर नहीं निकल पा रही तो उन्होंने खुदा की बात की ही नहीं बल्कि सात्विक जीवन व्यतीत करने पर सारा बल दिया। जो लोग दुनियावी सोच में ऐसे घिरे थे कि पंडित और धर्मगुरू भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहे थे, राजा और अमीर लोग भी पंडितों और धर्मगुरूओं को उपवन या सोने के सींघों वाली गाय और अन्य दुनियावी भेंट ही देते नज़र आते थे, तो ऐसे में उस जीवन से अपने अनुयायियांे को निकाल कर भिक्षु बना देना उचित समझा ताकि वे दुनिया के मोह से आज़ाद हो कर सात्विक जीवन व्यतीत करें। 

मैं अपनी किताबों में साबित करता आया हूँ कि यह कहना ग़लत है कि बुद्ध खुदा को नहीं मानते थे। हक़ीक़त तो यह है कि बुद्ध उसकी ही इबादत करके enlightenment मांग रहे थे और जगह जगह मिलता है कि उस खुदा की ओर से काम करने वाली दिव्यात्मा शक्तियां उन्हें भी मार्ग दिखा रही थीं। कितनी जगह ब्रहमा, देवताओं और देवी तक का उल्लेख मिलता है। 

कलियुग का चक्र भी काफी घूम चुका था जब अरब के मरूस्थल में सृष्टि के प्रारंभ में ब्रहमा नामी दिव्यात्मा शक्ति के विभाजन से बनी 7 दिव्यात्माओं ने, जिनमें एक देवी थी, 14 मानव जिस्मों में अवतरण लिया। यह नूरानी हस्तियां अहललबैत कहलाईं, जिनके 7 ही नाम थे। अब यह एक बड़ी घटना थी कि तमाम की तमाम नूरानी रूहें एक के बाद एक नवजात बच्चों के रूप में मानव शरीर में अवतरित हों ताकि बड़े होकर वह शरीर इंसान की हिदायत और रहनुमाई करे। यह इतनी ही बड़ी घटना थी कि प्राचीनतम ग्रन्थों जैसे वेद तक ने इस समय की भविष्यवाणी बहुत ही विस्तार से की थी।

ऐसे समय में जब तमाम नूरानी रूहें एक ही स्थान पर अवतरित हुई थीं, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि जुलमत यानी तमस ने अपनी तमाम कोशिशें न लगा डाली हों नूरानी ताक़तो द्वारा दी गई शिक्षा को रौंद देने के लिए। जिस प्रकार कृष्ण की शिक्षा को कमज़ोर करने के लिए जुलमत ने अनेक राजाओं को एकत्रित कर दिया था ऐसे ही अवतार मौहम्मद ने अपनी शिक्षा देना प्रारंभ किया तो जुलमत ने तमाम ताक़तों को लगा दिया कि उस शिक्षा को प्रारंभ में ही कुचल डालें या इतना कमज़ोर कर डालें कि उससे कम से कम लोग असर ग्रहण करें। 

यह याद रखने की बात है क्योंकि इस ज़माने में जब एक बार फिर हक़ीक़तें ज़ाहिर होने को हैं और सत्यमार्ग एक बार फिर प्रदर्शित होने को है, जुलमत एक बार फिर अपने तमाम दांव न लगाए, ऐसा कैसे हो सकता है। 

जुलमत ने अपने तमाम हथकंडे लगा दिए कि अवतार मौहम्मद के खि़लाफ लोगों को एकजुट कर सके। अवतार मौहम्मद और अली ने क्या कुछ कुरबानियां नहीं दीं थी कि अल्लाह की इताअत और बंदगी की ओर लोगों को लाने का मार्ग प्रशस्त करें और इसके लिए नमाज़ को अल्लाह से क़रीब होने का एक माध्यम बताया था। उसी नमाज़ में अब अली को बुरा कहा जाने लगा। 

कई दशक ऐसे गुज़रे जिनमें अवतार मौहम्म्द के बारे में कुछ भी लिखने पर पाबंदी थी। यह कहीं और नहीं हो रहा था बल्कि उनके हाथों हो रहा था जो अपने को मुसलमान कहते थे। अली और उनके पुत्रों हसन और हुसैन के साथियों और दोस्तों को विभिन्न बहानों से चुन चुन कर मार दिया गया। हालात यहां तक पहुंचे कि अवतार मौहम्मद के देहांत को बस 50 वर्ष ही गुज़रे थे कि उनके परिवार के अधिकतर मर्दों को, जिसमें उनके नवासे हुसैन भी शामिल थे, तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया। शहीद करने वाले भी अपने को मुसलमान ही कह रहे थे, जो नमाज़ भी पढ़ते थे और मौहम्मद के नवासे का सिर सिजदे की हालत में तन से जुदा भी करते थे। हुसैन के बाद तो हालात यहां तक पहुंच गए कि अहललबैत का अधिकतर जीवन कैद में या नज़रबंदी में गुज़रा। जहां मौक़ा मिलता, उन्हें भी किसी न किसी बहाने से ज़हर दे कर शहीद कर दिया जाता। 

इस तमाम दौर में मुसलमान फौजें जिहाद के नाम पर सरहदों के पार सरहदें बना रही थीं। गुलाम, औरतें और दौलत के अंबार मुस्लिम हुकूमत को और अधिक ताक़तवर और दौलतमंद बना रहे थे। लेकिन अब ये मौहम्मद और अन्य अहललबैत का इस्लाम नहीं था। हालांकि सब कुछ मौहम्मद के नाम पर हो रहा था लेकिन उनकी शिक्षा के असली वारिसों के लिए अब सियासत और इक़तेदार में कोई जगह बाक़ी नहीं रह गई थी। केवल बिकाऊ मौलवियों को ही मस्जिद की इमामत मिलती थी ताकि वे खलीफा के मनमुताबिक़ खुतबा दे सकें, सिंहासन की दहलीज़ पर सिर झुकाने वाले ही का़ज़ी बनते थे और सबसे बेरहम इंसान फौज के सरदार। 

आप प्रश्न कर सकते हैं कि इतनी बड़ी इस्लामी हुकूमत में क्या तमाम मुसलमानों ने अपना दीन बेच दिया था? उत्तर मैं एक उदाहरण से देता हूँ। मैं एक धार्मिक स्थल का हाल जानता हूँ जिसकी देखभाल एक सोसायटी बना कर ठीक ठाक लोग किया करते थे। आहिस्ता आहिस्ता उस सोसायटी में कुछ ऐसे लोग भी दाखिल हो गए जिन के लिए गाली गलोच करना और मार पीट करना आम बात थी। यह भी अपने को उस धर्म स्थल का सब से बड़ा शुभचिंतक ज़ाहिर करते थे और बड़ी जज़बाती बातें किया करते थे। फिर ऐसा समय आया कि इन्होंने पहले से देखभाल करने वालों में से किसी को थप्पड़ मार दिया और किसी को सरेआम धक्का दिया कि वह बेचारा दूर जा कर गिरा। इन्होंने किसी के खिलाफ एफआईआर लिखवाई और किसी के खिलाफ पोस्टर बाज़ी प्रारंभ कर दी। पहले से देखभाल करने वालों ने यही बेहतर समझा कि किनारे हो जाएं। आहिस्ता आहिस्ता तमाम सफेदपोश किनारे होते गए और यही लोग उस धर्मस्थल की देखभाल पर क़ाबिज़ होते गए। यदि आप देखें तो आज बहुतेरे ऐसे धर्मस्थल हैं जहां इसी प्रकार के लोगों का क़ब्ज़ा है। जो लोग बात बात में गालियां देते हैं, धर्म का उन्हें ज़रा भी ज्ञान नहीं और धार्मिक स्थलों और वक्फ़ को बेचने में लगे रहे हैं, ऐसे लोग आज अपने को धर्म का ठेकेदार और बड़ा जानकार दिखा रहे हैं।

कुछ ऐसा ही थोड़ा बड़े पैमाने पर अवतार मौहम्मद के बाद मुसलमानों के साथ हुआ। तलवार का डर गैरमुस्लिमों को तो बाद में दिखाया गया, पहले मुसलमानों की बस्तियों में नंगी तलवारें निकाल कर उनके दिलों पर डर बिठाया गया। माविया के दौर में सरेआम अली, हसन या हुसैन के हिमायतियों को क़त्ल कर दिया जाता, उनकी जायदाद पर क़ब्ज़ा कर लिया जाता और औरतों और बच्चों को गुलाम बना लिया जाता। डर के मारे मुसलमान उस इस्लामी कानून को भूल गए जो उन्हें हर जुल्म और नाइंसाफी के खि़लाफ आवाज़ उठाने को कहता था। धीरे धीरे नई नस्लें ऐसा ही जीवन जीने की आदी हो गईं। 

हर ज़माने में हक़ की आवाज़ को डरा कर ही कुचलने की कोशिश की गई। आज भी दुनिया में विभिन्न स्थानों पर यह हो रहा है। कोई आवाज़ उठाता है तो उसके घर तक को ध्वस्त कर दिया जाता है और डरे हुए दूसरे लोग यह तक नहीं बोलते कि इसमें परिवार का क्या कुसूर कि उनके सिरों पर से छत छीन ली गई। एक की ग़ल्ती पर अनेक को सज़ा मिलती है। माविया के बाद यजीद ने तो ऐसा डर का आतंक पैदा करने की कोशिश की कि उसकी फौजों ने जब मदीना पर चढ़ाई की तो तीन दिनों तक उन्हें आज़ाद छोड़ दिया गया कि जिस घर को चाहें लूटें और जिस औरत का चाहें बलात्कार करें। 

मस्जिदे नबवी में खड़े हो कर अवतार मौहम्मद ने न जाने कितनी बार नामहरम औरत की ओर आंख उठा कर न देखने की शिक्षा दी थी, किसी शहर पर हमला भी करना पड़े तो औरतों, बच्चों और बूढ़ों को न छूने की शिक्षा दी थी और अवाम को न छेड़ने की शिक्षा दी थी। उसी मस्जिदे नब्वी में पनाह लेने वाली औरतों के साथ मस्जिद परिसर में ही बलात्कार किया गया और बेगुनाह मर्दों को क़त्ल किया गया। फिर भी  क्या आप यही मानेंगे वह अवतार मौहम्मद का ही इस्लाम था जिस पर उमवी और अब्बासी ख़लीफा चल रहे थे?

इस सारे डर के माहौल में केवल हुसैन और उनके कुछ चुनिंदा साथी ही थे जिन्होंने इन मुसलमानों के चेहरे से नक़ली इस्लाम का मुखौटा हटा देने का फैसला किया। भूख, प्यास और हर प्रकार के जुल्म को सहते हुए इन्होंने दिखाया कि हक़ की राह पर चलने वाला मुसलमान भले ही क़त्ल कर दिया जाए लेकिन जुल्म और नाइंसाफी के खिलाफ सिर नहीं झुकाता। ऐसा ही कुछ कृष्ण के मुख से अर्जुन को सलाह दी गई थी जब उन्होंने अर्जुन से कहा कि हक़ की राह पर चलते हुए तुम मर जाओ या मारे जाओ, हर हाल में तुम्हारे लिए बेहतरी है। 

पुस्तिका का लेखक जब इस्लामी कट्टरवाद के हाथों असंख्य लोगों के मारे काटे जाने की बात लिखता है तो यह लिखना भूल जाता है कि इसका मौहम्मद और अन्य अहललबैत की शिक्षा से कोई लेना देना नहीं है। उमवी और अब्बासी खलीफाओं की ताक़त और दौलत की चकाचैंध में उसे जो इस्लाम का चेहरा नज़र आया उसी को उसने असली इस्लाम का चेहरा समझ लिया। वह भारत, फ्रांस, मिस्र और कई देशों में लुटेरे मुसलमानों के आक्रमण के फलस्वरूप लाखों गैर-मुसलमानों के मारे जाने की बात तो लिखता है पर यह लिखना भूल जाता है कि इन मुसलमानों ने गैर-मुसलमानोें से अधिक मुसलमानों का खुन बहाया और आज तक बहा रहे हैं। 

एक ओर आईसिस जैसी संस्थाएं मुसलमानों को भ्रमित करने के लिए खड़ी होती हैं तो उनसे लड़ने के लिए यदि मुसलमानों में से कुछ खड़े होते हैं तो एक दूसरे का ही तो खून बहाते हैं। इतिहास में भी कभी सलजूक, तुर्क, मंगोल, पठान और ईरानी के नाम पर, कभी शिया और सुन्नी के नाम पर, अरब और अजम के नाम पर यह लोग एक दूसरे का खून बहाते रहे। इनमें से अधिकतर लोग अवतार मौहम्मद और अन्य अहललबैत द्वारा बताए गए इस्लाम से कोसों दूर हैं और या तो अंधे हैं जिनको रास्ता दिखाने वाला भी अंधा है, जैसा कि उपनिषद ने कहा और या दुनिया में गर्क हैं और धर्म की आड़ में केवल अपने दुनियावी मतलब सीधे करने में लगे हैं। हर धर्म में ऐसा करने वाले हर ज़माने में आप को मिल जाएंगे।

कारण यदि कोई है तो यह कि सात्विक जीवन अपनाए बिना अपने को धर्म के मार्ग का मुसाफिर बताते हैं, दुनिया के मोह में ग्रस्त हैं और रूहानियत की शिक्षा देने वाले धर्म की बात करते हैं, इस सृष्टि के एक पालंहार द्वारा नामित पथप्रदर्शकों की पहचान तक भुला दी है और झूठे एवं नक़ली इमामों और लीडरों के पीछे बिना अक़ल लगाए जानवरों के रेवड़ के समान चल रहे हैं। यदि इंसान अक़ल का दामन छोड़ दे तो जानवर उससे बेहतर चरित्र के दिखाई देंगे।

जिस प्रकार कलियुग में पैदा हुए गुमराह हिन्दुओं के लिए आवश्यक है कि गीता और वेद की शिक्षा को समझें और उस पर चलें तो वे बेहतर इंसान बन सकते हैं उसी प्रकार मुसलमानों को बेहतर मुसलमान बनाने के लिए उन्हें उनके धर्म से दूर करना समाधान नहीं है बल्कि उनके लिए आवश्यक है कि मौहम्मद और अहललबैत की असली शिक्षा उन तक पहुंचाई जाए ताकि वे इन नूरानी हस्तियों का अनुसरण करके अम्न, सलामती और इंसाफ के पथ पर चलने वाले बन सकें। 


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